French Alzheimers village where nursing home meets the outside world | इस गांव के रहने वाले सभी लोग मेमोरी लॉस से जूझ रहे, पर सुविधाएं ऐसी कि सभी मरीज जी रहे आत्मनिर्भर जिंदगी

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6 दिन पहले

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  • अल्जाइमर्स पीड़ित के परिवार और सरकार गांव का खर्च मिलकर उठाते हैं, सरकार हर साल करीब आधा खर्च यानी 60 करोड़ रुपए देती है
  • गांव में मरीजों के लिए फिजियोथेरेपी सेंटर भी हैं, इसी साल जून में हुई थी अल्जाइमर्स विलेज की स्थापना

फ्रांस के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में डाक्स नाम का छोटा सा गांव है। वॉलेंटियर्स को छोड़कर सिर्फ 105 लोग यहां रहते हैं। ये सभी अल्जाइमर्स पीड़ित हैं। इसलिए इस गांव को अल्जाइमर गांव कहा जाता है। अल्जाइमर्स यानी मेमोरी लॉस। आज सुबह क्या खाया याद नहीं, कल रात किससे मिला, भूल गया, ऐसे लक्षण मरीजों में दिखते हैं।

लोग मरीज न महसूस करें, इसलिए गांव बनाया

याददाश्त खत्म कर देने वाली अल्जाइमर्स बीमारी से जूझते हुए भी गांव के लोग निराश नहीं दिखाई देते। इसका कारण यह है कि स्थानीय प्रशासन और कुछ बाहरी लोगों ने मिलकर गांव ऐसा बना दिया है, जिससे ग्रामीण खुद को मरीज महसूस न करें। यहां इन अल्जाइमर्स पीड़ितों के लिए खास किराना और फलों की दुकानें, कैफेटेरिया, लाइब्रेरी, म्यूजिक रूम उपलब्ध हैं।

मरीज को बीमारी का अहसास न हो इसके लिए नर्स भी आम कपड़ों में दोस्त की तरह देखभाल करती नजर आती हैं।

मरीज को बीमारी का अहसास न हो इसके लिए नर्स भी आम कपड़ों में दोस्त की तरह देखभाल करती नजर आती हैं।

नर्स भी सामान्य कपड़ों में दिखाई देती हैं, ताकि नकारात्क असर न पड़े

मरीजों की देखभाल के लिए नर्स भी हैं, लेकिन वे आम कपड़ों में ही दिखाई देती हैं, न कि कोट जैसे यूनिफॉर्म में। मकसद वही है कि मरीज खुद को अस्पताल के बजाय खुले प्राकृतिक वातवारण में महसूस करें। बार-बार उन्हें बीमारी याद न आए। गांव की स्थापना इसी साल जून में हुई थी।

मरीजों को पोलो खिलाया जा रहा है ताकि ये खुश रहें और दिमाग पर सकारात्मक असर हो।

मरीजों को पोलो खिलाया जा रहा है ताकि ये खुश रहें और दिमाग पर सकारात्मक असर हो।

धीरे-धीरे मरीज आत्मनिर्भर हो जाते हैं

गांव में रहने आई पहली महिला मैडेलीन एलिसाल्डे (82) कहती हैं, ‘पूरा गांव मेरे घर की तरह है। यहां हमारी ठीक से देखभाल की जाती है।” पहले मैडेलीन बेटी के परिवार के साथ रहती थी। मैडेलीन की नातिन ओरोरे कहती हैं कि हमारे साथ रहते हुए भी वो हमें भूल चुकी थीं। खुशी की बात यह है कि नानी ने अब आत्मनिर्भर होकर रहना सीख लिया है।

गांव में किराना दुकान चलाने वाली वॉलेंटियर क्रिस्टाइन सुरेले कहती हैं कि हमें सबसे बड़ा फायदा अल्जाइमर्स पीड़ितों के चेहरे पर मुस्कान देखकर ही मिल जाता है। एल्जाइमर पीड़ित के परिवार और सरकार गांव का खर्च मिलकर उठाते हैं। सरकार हर साल करीब आधा खर्च यानी 60 करोड़ रुपए देती है। गांव में मरीजों के लिए फिजियोथेरेपी सेंटर भी हैं।

क्या है अल्जाइमर्स

डिमेंशिया का मतलब है मेमोरी लॉस। अल्जाइमर डिमेंशिया का एक प्रकार है। डिमेंशिया के दो प्रकार हैं। पहला, वो जिसका इलाज संभव है। दूसरा, वो जिसका कोई इलाज नहीं है यानी डिजेनेरेटिव डिमेंशिया, अल्जाइमर इसी कैटेगरी की बीमारी है। ब्रेन की ऐसी कोशिकाएं जो मेमोरी को कंट्रोल करती हैं वो सूखने लगती हैं। जिसका असर गिरती याद्दाश्त के रूप में दिखता है और रिकवर करना नामुमकिन हो जाता है।

अक्सर कहा जाता है स्वस्थ रहने के लिए सिर्फ फिजिकली ही नहीं मेंटली फिट रहना भी जरूरी है। अल्जाइमर को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता है लेकिन इसका असर कम या धीमा करने के लिए एक्सपर्ट शारीरिक और मानसिक रूप से एक्टिव रहने की सलाह देते हैं। रिसर्च में पुष्टि हुई है कि पूरी नींद, सुबह-सुबह पार्क में चहलकदमी और सूडोकू या दिमाग पर दबाव डालने वाले गेम घटती याद्दाश्त की रफ्तार को धीमा रखने में मदद करते हैं।

रिसर्च भी बताती हैं पुराना लाइफस्टाइल ही बेहतर

अमेरिका की वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में हुए शोध में कहा गया है कि गहरी नींद लेने वालों की याद्दाश्त बेहतर होती है। ऐसे जब सोकर उठते हैं तो खुद को तरोताजा महसूस करते हैं। ऐसे बुजुर्ग जो कम गहरी नींद लेते हैं उनके मस्तिष्क में एक खास किस्म के प्रोटीन की मात्रा बढ़ती है जिससे उनकी याद्दाश्त में गिरावट आती है। शोध के मुताबिक युवावस्था और उसके बाद के समय में पूरी नींद न ले पाना मस्तिष्क स्वास्थ्य में गिरावट का एक बड़ा संकेत हो सकता है।



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