OPINION: गैर बीजेपी शासित राज्यों में रेप और हत्या पर बहस क्यों नहीं? | – News in Hindi

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राजस्थान के करौली में जमीन विवाद को लेकर कुछ दबंगों ने पेट्रोल छिड़क कर एक मंदिर के पुजारी को आग के हवाले कर दिया. अस्पताल में पुजारी की मौत होने के तीन दिन बाद भी कुछ सिलेक्टिव मामलों में मानवाधिकारों की दुहाई देकर दुनिया भर में हिंसक माहौल बनाने वालों के कानों पर जूं नहीं रेंगी है. खुद को संवेदनशील मानने वाले जो लोग और राजनैतिक पार्टियां हाल तक उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक दलित लड़की के साथ हुई बर्बरता को लेकर आसमान सिर पर उठाए हुए थे, वे चुप हैं. किसी दलित लड़की या कहें लड़की या कहें कि किसी भी इंसान के साथ हुए नृशंस और हिंसक व्यवहार को किसी भी स्तर पर सही नहीं ठहराया जा सकता. राजस्थान में दबंग किसी पुजारी को सरेआम आग लगाकर मार डालते हैं, तो क्या यह मानवता के प्रति बेहद गंभीर अपराध नहीं है?

ऐसा हमने पहले भी देखा है. 16 अप्रैल को महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं समेत तीन लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई थी, वह भी पुलिस की मौजूदगी में. लेकिन कथित संवेदनशील सेक्युलर लोगों के मुंह से इसके विरोध में एक बोल तक नहीं फूटा. क्या महज इसलिए कि महाराष्ट्र में ग़ैर-भारतीय जनता पार्टी सरकार है? देश भर में हिंसक वारदात के कथित विरोध का पैटर्न अगर देखें, तो इसका साफ़ उत्तर यही मिलता है कि बीजेपी शासित यूपी में अगर किसी कमजोर के साथ अपराध किया जाता है, तो ही सेक्युलर  लोगों और संस्थाओं को उसमें ‘मानवता के प्रति संगठित अपराध’ की दुर्गंध आती है. अन्यथा नहीं. ऐसे लोगों को इंसानी भावनाएं और खून का रंग भी राजनैतिक चश्मों से ही नज़र आता है.

अक्सर ऐसा होने लगा है कि भाजपा की सरकार वाले राज्यों, ख़ासकर उत्तर प्रदेश में जब भी ऐसी कोई वारदात सामने आती है, तो देश की राजधानी के सीमावर्ती इलाक़ों में हंगामा खड़ा करने की कोशिशें की जाती हैं. जब वैसी ही वारदात किसी कांग्रेस शासित राज्य में होती है, तब वही लोग मुंह पर ताला लगा लेते हैं. हाथरस की वारदात में तो तथ्यों को भी तोड़-मरोड़ कर पेश करने तक की कोशिश की गई. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में रेप की पुष्टि नहीं की गई थी, बावजूद इसके कुछ लोग रेप-रेप कह कर चिल्लाने-चीखने लगे. हालांकि लड़की को जानलेवा चोटें लगी थीं, लिहाजा उसकी मौत अस्पताल में हो गई. उस वारदात को लेकर पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों ने असंवेदनशील रवैया अपनाया था, ऐसा मीडिया रिपोर्ट्स देख कर लगा था. बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी ज़िले में पुलिस-प्रशासन से जुड़े किसी अधिकारी या कर्मचारी के ग़ैर-ज़िम्मेदार रवैये पर विरोध जताने के लिए आप पहले ही स्तर पर राज्य के मुख्यमंत्री या सरकार से इस्तीफा मांगेंगे? इस तरह तो किसी भी राज्य में किसी भी पार्टी की सरकार दो-चार दिनों से ज्यादा समय तक टिक ही नहीं पाएगी.

बहरहाल, हाथरस मामले की जांच अब केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई कर रही है, लिहाजा उस पर ज्यादा टिप्पणी करना अभी ठीक नहीं होगा. हैरत की बात तो यह है कि जब हाथरस की वारदात पर हंगामा खड़ा किया जा रहा था, तभी राजस्थान में भी रेप की वारदात को अंजाम दिया गया था, लेकिन यूपी की महिलाओं के मसीहा बन कर सड़कों पर उतरे लोगों को राजस्थान में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कोई चिंता नहीं थी. देश पर पांच दशक से ज्यादा शासन करने वाली कांग्रेस की महासचिव और यूपी की प्रभारी प्रियंका वाड्रा और उनके भाई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी तो हाथरस में पीड़ित लड़की के गांव तक पहुंचे और जमकर सियासत की. दोनों ने राजस्थान की पीड़ित महिलाओं के पक्ष में एक शब्द भी नहीं कहा. मानो राजस्थान में अगर किसी महिला के साथ रेप होता है, तो क्योंकि वहां कांग्रेस का शासन है, लिहाजा वह कोई गंभीर बात नहीं हो. राहुल और प्रियंका क्या ऐसा सोचते हैं कि आम लोगों को उनका दोहरा रवैया समझ में नहीं आता?

देश का कथित सेक्युलर फ्रेब्रिक पहले भी एकपक्षीय था, लेकिन तब उसमें तुष्टीकरण के लक्षण होते थे. अब जबसे पोल खुलने लगी है, तबसे वह फेब्रिक चीनी मांझे से भी ज्यादा खतरनाक साबित होता जा रहा है. लोकतंत्र के लिए यह बात अच्छा संकेत नहीं है. कथित सेक्युलर सोच निंदा और चुप्पी के दो खांचों में ही सिमट कर रह जाए, तो वैचारिक तौर पर ही परेशानी की बात है, लेकिन सामाजिक तौर पर बहुत दिक्कत की बात नहीं है. लेकिन जब कथित सेक्युलर लोग एकपक्षीय सोच के साथ सामाजिक शांति-सद्भाव और सौहार्द के माहौल में चिंगारियां भरने के लिए बाक़ायदा साज़िश रचें और उसे अमली जामा पहनाने की कोशिश अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर की जाने लगे, तो बहुत चिंता की बात है. सीएए के विरोध के नाम पर जिस तरह हमने दिल्ली में आग भड़काने के लिए गर्म किए गए अंगारों से असलियत की राख की परतें झड़ते देखीं और अब यूपी के हाथरस ज़िले में दलित लड़की के साथ हुई बर्बरता के मामले के बाद माहौल बिगाड़ने के लिए बाकायदा फंडिंग की साज़िश का रहस्योद्घाटन बहुत गंभीर मसला है.

ऐसे मामलों में क्योंकि भारतीय जनता पार्टी और उससे जुड़े विचार परिवार पर ही हर बार निशाना साधा जाता है, लिहाज़ा यह उन्हीं की प्राथमिक जिम्मेदारी भी है कि तथ्यों को स्पष्ट रूप से लोगों के सामने रखें. जागरूकता का माहौल बनाए रखें. बहुत बार जवाब भी उसी अंदाज में देना चाहिए, जिस अंदाज में सवाल खड़े किए जाएं. यही वजह है कि राजस्थान के करौली में मंदिर के पुजारी को जलाकर मार डालने के मामले में केंद्र सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने राजस्थान की कांग्रेस सरकार को कटघरे में खड़ा करने में देर नहीं लगाई. उन्होंने राजधानी जयपुर में मीडिया के सामने राज्य की गहलोत सरकार पर तो गंभीर आरोप लगाए ही, साथ ही राहुल गांधी को भी नसीहत दी कि वे ऐसी वारदात की अनदेखी न करें. इससे पहले राजस्थान बीजेपी के अध्यक्ष सतीश पूनिया और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने भी ट्वीट कर करौली की वारदात के लिए गहलोत सरकार पर निशाना साधा है.

इस बीच राजस्थान के ही बाड़मेर में मई में नाबालिग लड़की के साथ हुए बलात्कार के आरोपित को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया जा सका है. पीड़ित नाबालिग लड़की ने राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष संगीता बेनीवाल से मिलकर इंसाफ़ की गुहार लगाई है. बेनीवाल ने वारदात के पांच महीने बाद भी आरोपित के खुले घूमने पर ऐतराज जताते हुए राज्य पुलिस से मामले की जानकारी मांगी है. इस मामले में जल्द ही गिरफ्तारी नहीं हुई, तो गहलोत सरकार और कांग्रेस को घेरने के लिए बीजेपी के हाथ एक और मुद्दा लग जाएगा.(ये लेखक के निजी विचार हैं)





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