Ram Vilas Paswan: Salute To The Qualification And Incomplete Ambition Of The First Dalit Prime Minister – प्रथम दलित प्रधानमंत्री की योग्यता और अधूरी महत्वाकांक्षा को नमन

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स्वामी अग्निवेश, रघुवंश प्रसाद सिंह और अब रामविलास पासवान के दुनिया से चले जाने की खबर भीतर तक हिला देने वाली है। अपने-अपने तरीके से ये तीनों योद्धा समाज के दलित, पिछड़े आदिवासी अल्पसंख्यक और वंचित वर्ग की लड़ाई लड़ने के लिए जाने जाते थे। मेरे साथ इन तीनों का बहुत अंतरंग संबंध था निजी भी और वैचारिक भी। रामविलास पासवान का नाम मैंने पहली बार 1977 में तब सुना था जब वह सबसे ज्यादा रिकॉर्ड मतों से लोकसभा चुनाव जीते थे और उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी आया था। खुद पासवान अपनी इस उपलब्धि को अक्सर लोगों से साझा करते थे। लेकिन उनके राजनीतिक जीवन में तमाम उतार चढ़ावों के बावजूद और भी कई उपलब्धियां रहीं जिनके लिए उन्हें याद किया जाना चाहिए।

सही मायनों में रामविलास पासवान में वह सारी योग्यताएं और संभावनाएं मौजूद थीं जो भारत के पहले दलित प्रधानमंत्री में होनी चाहिए थीं, लेकिन देश की राजनीति के टेढ़े मेढ़े उलझे रास्तों ने रामविलास पासवान जैसे प्रखर दलित नेता को महज बिहार की राजनीति और केंद्रीय मंत्री तक सीमित कर दिया। बहुत कम लोगों को पता होगा कि जिस मंडल की राजनीति ने देश को सामाजिक न्याय बनाम हिंदुत्व के राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच बांट दिया, उसके प्रमुख सूत्रधारों में एक रामविलास पासवान भी थे।

रामविलास पासवान से मेरा परिचय भी करीब चार दशक पुराना है यानी जब मैं पत्रकार नहीं बना था, उससे पहले का। अपनी समाजवादी वैचारिक पृष्ठभूमि के कारण रामविलास पासवान तब मेरे जैसे तमाम युवाओं के नेता होते थे और पत्रकारिता में आने के बाद वह जल्दी ही मेरे दोस्त बन गए। 1980 में जनता पार्टी की हार और कांग्रेस की प्रचंड जीत के बाद रामविलास पासवान, शरद यादव, जॉर्ज फर्नांडिस जैसे नेता अखबारों की सुर्खियों से लगभग बाहर हो गए थे और उनके पास आम तौर पर वही पत्रकार जाते थे जो या तो इन नेताओँ से वैचारिक नजदीकी महसूस करते थे या फिर जिनकी बीट की मजबूरी होती थी।

जनता पार्टी टूटकर बिखर चुकी थी और उसके नेता अलग अलग गुटों और दलों में बंट गए थे।उसी दौर में रामविलास पासवान से मेरी नजदीकी बढ़ी जो जल्दी ही दोस्ती में बदल गई।तब वह साउथ एवेन्यू के एक फ्लैट में रहते थे जहां मेरा आना जाना होता था। 1987-88 आते आते राजनीति फिर करवट ले रही थी और कांग्रेस के खिलाफ विपक्षी गोलबंदी तेज हो गई, जिसमें पुराने जनता परिवार के तमाम नेता फिर एकजुट होने लगे और रामविलास पासवान गैर कांग्रेसी धारा के सबसे बड़े और प्रखर दलित नेता के रूप में उभर कर सामने आए। तब तक कांशीराम और मायावती की राष्ट्रीय स्तर पर कोई पहचान नहीं बनी थी।

1984 के लोकसभा चुनावों में चली इंदिरा गांधी की सहानुभूति की आंधी ने तमाम विपक्षी दिग्गजों के साथ रामविलास पासवान को भी चुनाव में हरा दिया था। इसके बाद रामविलास पासवान ने 1985 में बिजनौर लोकसभा क्षेत्र और 1987 में हरिद्वार लोकसभा सीट के उपचुनावों में लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़ा। इन दोनों चुनावों में मायावती भी उनके खिलाफ बसपा से मैदान में थीं, लेकिन दोनों ही दिग्गज चुनाव हार गए। इन दोनों उपचुनावों को कवर करने के कारण मेरी रामविलास पासवान से नजदीकी और बढ़ गई। मैं उनमें एक सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के लिए प्रतिबद्ध और सर्वस्वीकार्य राष्ट्रीय स्तर के दलित नेता की छवि देखता था। गांधी अंबेडकर लोहिया के विचारों पर उनके साथ खूब चर्चा होती थी। लंबे समय तक लगभग उनका स्थाई निवास बन चुका 12 जनपथ के ड्राइंग रूम में हम कुछ पत्रकार मित्र रामविलास पासवान के साथ घंटों बैठकर राजनीतिक और वैचारिक चर्चा किया करते थे।

बहुत कम लोगों को पता होगा कि मंडल आयोग की जिन सिफारिशों को लेकर पूरे देश में आरक्षण समर्थक और आरक्षण विरोधी राजनीतिक ध्रुवीकरण हुआ और सामाजिक न्याय का सेहरा तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के सिर पर बंधा, उसके सूत्रधार तत्कालीन सामाजिक कल्याण मंत्री रामविलास पासवान और कपड़ा मंत्री शरद यादव थे। पासवान उस विभाग के मंत्री भी थे, जिस विभाग को इसे लागू करना था और उन्होंने बखूबी अपनी भूमिका को अंजाम दिया था। एक दौर था जब देश में कहीं भी दंगा हो, दलितों आदिवासियों अल्पसंख्यकों पर हमले और अत्याचार की घटना हो, रामविलास पासवान मौके पर जरूर पहुंचते थे। सामाजिक न्याय का मुद्दा हो या मानवाधिकारों के सवाल, संसद के भीतर उन्हें उठाने का कोई मौका पासवान नहीं छोड़ते थे।

हालांकि कांशीराम का बहुजन आंदोलन 1980 से ही शुरू हो चुका था और 1984 में बसपा का गठन भी हो गया था। लेकिन 1990 तक रामविलास पासवान का कद राष्ट्रीय राजनीति में ज्यादा चर्चित और लोकप्रिय था। लेकिन 1990 के बाद कांशीराम और फिर मायावती को वह दलित राजनीति में अपना प्रतिद्वंदी मानने लगे थे। लेकिन उन्हें लगता था कि इन दोनों की समाज को बांटने वाली बहुजन राजनीति की तुलना में उनकी समरसता की राजनीति लोगों को ज्यादा स्वीकार्य होगी। जब भी दलित प्रधानमंत्री की बात होती तो रामविलास पासवान खुद को सबसे मजबूत दावेदार मानते थे।

1996 के लोकसभा चुनावों से पहले गैर कांग्रेसी गैर भाजपा दलों की सियासी गोलबंदी में तत्कालीन जनता दल में रामविलास पासवान, मुलायम सिंह यादव को वापस लाने या उनकी समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करने के सबसे बड़े हिमायती थे। जबकि शरद यादव लालू प्रसाद यादव और खुद विश्वनाथ प्रताप सिंह इसके खिलाफ थे। पासवान ने मुलायम के पक्ष में अपने तब के सिपहसालार और पार्टी के महासचिव रामवीर सिंह विधूड़ी को आगे करके दिल्ली के बदरपुर स्थित स्टेडियम में एक रैली आयोजित करवाई जिसमें जनता दल के नेतृत्व की मनाही के बावजूद रामविलास पासवान, मुफ्ती मोहम्मद सईद और तत्कालीन माकपा महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत शामिल हुए और यहीं से केंद्र में भाजपा विरोधी संयुक्त मोर्चे की पहली नींव पड़ी जो आगे चलकर चुनाव के बाद संयुक्त मोर्चे की सरकार के रूप में सामने आई।

1996 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की अल्पमत सरकार का पतन हो गया और केंद्र में कांग्रेस के समर्थन से संयुक्त मोर्चे की सरकार बनने की तैयारी चल रही थी और विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया था और ज्योति बसु के लिए उनकी पार्टी माकपा राजी नहीं हुई थी। तब रामविलास पासवान की दबी कामना थी कि उन्हें देश के पहले दलित प्रधानमंत्री बनने का शायद मौका मिल सकता है। लेकिन मुलायम सिंह यादव ने अपने तत्कालीन सलाहकार अमर सिंह की सलाह पर कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री एचडी देवेगौड़ा का नाम आगे करके हरिकिशन सिंह सुरजीत के जरिए सबको राजी कर लिया। जबकि बहुत कम लोगों को पता होगा कि जब रामविलास पासवान जनता दल के साथ मुलायम सिंह को जोड़ने की कोशिश कर रहे थे तब दोनों के बीच एक सहमति बनी थी कि उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री होंगे और केंद्र में मिली जुली सरकार बनने पर मुलायम पासवान को प्रधानमंत्री बनने में मदद करेंगे। लेकिन मुलायम के देवेगौड़ा कार्ड ने पासवान के मन की बात को मन में ही दबा दिया।

1995 में जब उत्तर प्रदेश में सपा बसपा गठबंधन टूटा और भाजपा के समर्थन से मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो रामविलास पासवान को लगा कि दलित अल्पसंख्यकों और पिछड़ों की राजनीति में अब वह एकछत्र नेता होंगे। उन्हें पूरा भरोसा था कि बसपा का जनाधार अब खत्म होगा क्योंकि उसने उसी भाजपा से हाथ मिलाया है जिसे कांशीराम मायावती लगातार मनुवादी और सांप्रदायिक कहते रहे। लेकिन इसके बाद प्रदेश और देश की राजनीति में मायावती का कद लगातार बढ़ता गया, जिसने रामविलास पासवान की राजनीति को राष्ट्रीय स्तर से बिहार तक समेट दिया। वह बिहार की दलित राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा तो जरूर बने लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर धीरे धीरे उन्हें कभी कांग्रेस तो कभी जॉर्ज. शरद तो कभी लालू पर निर्भर होना पड़ा।

हालांकि उन्होंने अपना अलग दल लोक जनशक्ति पार्टी बनाकर अपनी सियासी सौदेबाजी की ताकत मजबूत कर ली थी, लेकिन फिर भी उन्हें बिहार और राष्ट्रीय राजनीति में किसी न किसी सहारे की जरूरत पड़ती रही। लंबे समय तक धुर भाजपा विरोधी होने के बावजूद 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व मे एनडीए सरकार का हिस्सा बने। लेकिन 2002 में गुजरात दंगों ने उन्हें बेहद आहत किया और सरकार से बाहर आकर उन्होंने गुजरात के दौरे किए। तब पासवान ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को लगातार कठघरे में खड़ा किया।

दिल्ली में उनका घर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पड़ोस में था और इसने उन्हें सोनिया गांधी और कांग्रेस के नजदीक लाने में काफी मदद की। अटल सरकार में मंत्री रहने वाले पासवान 2004 के लोकसभा चुनाव कांग्रेस के साथ आ गए और यूपीए की पहली पारी में मंत्री बने। लेकिन 2009 में लालू के साथ उन्होंने यूपीए और कांग्रेस का साथ छोड़ा और पूरे पांच साल सरकार से बाहर रहे। 2014 में कांग्रेस से गठबंधन करते करते वह अचानक भाजपा के साथ चले गए और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार में मंत्री बने जो आखिर तक रहे।

एक वक्त में रामविलास पासवान सांप्रदायिकता विरोधी धर्मनिरपेक्ष राजनीति में सबसे मुखर और प्रखर चेहरा थे। हर रमजान में दिल्ली और पटना में उनके घरों पर होने वाली इफ्तार दावतों में नेताओं से लेकर आम लोगों की भारी भीड़ उमड़ती थी। इसी तरह हर मकर संक्रांति पर वह दिल्ली में दही चूड़े की दावत भी देते थे। खाने-खिलाने के शौकीन रामविलास पासवान बेहद मिलनसार और व्यवहार कुशल थे। दोस्तों के दोस्त थे और उनका कोई निजी दुश्मन नहीं था। हर दल हर विचारधारा के लोगों से उनके निजी रिश्ते बेहद अच्छे थे। एक दलित नेता के रूप में उन्होंने अपनी पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बनाने की कोशिश की। 1993 में उन्होंने काठमांडो में नेपाल के दलितों पिछड़ों और आदिवासियों का एक बड़ा सम्मेलन किया था।

इसी तरह का एक सम्मेलन उन्होंने अमेरिका में भी किया था। वह मंत्री रहे हों या न रहे हों उनके सरकारी निवास 12 जनपथ में हमेशा मिलने वालों की भीड़ रहती थी। अपने बेटे चिराग पासवान को उन्होंने विरासत में राजनीतिक समर्थकों, मित्रों और शुभचिंतकों की एक बड़ी जमात, लोक जनशक्ति पार्टी और उसके कार्यकर्ताओं की ताकत और अपने नाम की गुडविल दी है। अब चिराग के लिए इस विरासत को न सिर्फ बनाए और बचाए रखने की चुनौती है बल्कि उसे आगे बढ़ाने की संभावना भी है। चिराग के राजनीतिक कौशल की पहली परीक्षा मौजूदा बिहार विधानसभा चुनाव हैं जिनमें पहली बार उन्हें अपने पिता की छत्रछाया के बिना अकेले लड़ना है और जीतना है। शायद यही एक लायक बेटे की अपने लोकप्रिय पिता को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

 

सार

रामविलास पासवान का नाम मैंने पहली बार 1977 में तब सुना था जब वह सबसे ज्यादा रिकॉर्ड मतों से लोकसभा चुनाव जीते थे और उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में भी आया था।

विस्तार

स्वामी अग्निवेश, रघुवंश प्रसाद सिंह और अब रामविलास पासवान के दुनिया से चले जाने की खबर भीतर तक हिला देने वाली है। अपने-अपने तरीके से ये तीनों योद्धा समाज के दलित, पिछड़े आदिवासी अल्पसंख्यक और वंचित वर्ग की लड़ाई लड़ने के लिए जाने जाते थे। मेरे साथ इन तीनों का बहुत अंतरंग संबंध था निजी भी और वैचारिक भी। रामविलास पासवान का नाम मैंने पहली बार 1977 में तब सुना था जब वह सबसे ज्यादा रिकॉर्ड मतों से लोकसभा चुनाव जीते थे और उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी आया था। खुद पासवान अपनी इस उपलब्धि को अक्सर लोगों से साझा करते थे। लेकिन उनके राजनीतिक जीवन में तमाम उतार चढ़ावों के बावजूद और भी कई उपलब्धियां रहीं जिनके लिए उन्हें याद किया जाना चाहिए।

सही मायनों में रामविलास पासवान में वह सारी योग्यताएं और संभावनाएं मौजूद थीं जो भारत के पहले दलित प्रधानमंत्री में होनी चाहिए थीं, लेकिन देश की राजनीति के टेढ़े मेढ़े उलझे रास्तों ने रामविलास पासवान जैसे प्रखर दलित नेता को महज बिहार की राजनीति और केंद्रीय मंत्री तक सीमित कर दिया। बहुत कम लोगों को पता होगा कि जिस मंडल की राजनीति ने देश को सामाजिक न्याय बनाम हिंदुत्व के राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच बांट दिया, उसके प्रमुख सूत्रधारों में एक रामविलास पासवान भी थे।

रामविलास पासवान से मेरा परिचय भी करीब चार दशक पुराना है यानी जब मैं पत्रकार नहीं बना था, उससे पहले का। अपनी समाजवादी वैचारिक पृष्ठभूमि के कारण रामविलास पासवान तब मेरे जैसे तमाम युवाओं के नेता होते थे और पत्रकारिता में आने के बाद वह जल्दी ही मेरे दोस्त बन गए। 1980 में जनता पार्टी की हार और कांग्रेस की प्रचंड जीत के बाद रामविलास पासवान, शरद यादव, जॉर्ज फर्नांडिस जैसे नेता अखबारों की सुर्खियों से लगभग बाहर हो गए थे और उनके पास आम तौर पर वही पत्रकार जाते थे जो या तो इन नेताओँ से वैचारिक नजदीकी महसूस करते थे या फिर जिनकी बीट की मजबूरी होती थी।

जनता पार्टी टूटकर बिखर चुकी थी और उसके नेता अलग अलग गुटों और दलों में बंट गए थे।उसी दौर में रामविलास पासवान से मेरी नजदीकी बढ़ी जो जल्दी ही दोस्ती में बदल गई।तब वह साउथ एवेन्यू के एक फ्लैट में रहते थे जहां मेरा आना जाना होता था। 1987-88 आते आते राजनीति फिर करवट ले रही थी और कांग्रेस के खिलाफ विपक्षी गोलबंदी तेज हो गई, जिसमें पुराने जनता परिवार के तमाम नेता फिर एकजुट होने लगे और रामविलास पासवान गैर कांग्रेसी धारा के सबसे बड़े और प्रखर दलित नेता के रूप में उभर कर सामने आए। तब तक कांशीराम और मायावती की राष्ट्रीय स्तर पर कोई पहचान नहीं बनी थी।

1984 के लोकसभा चुनावों में चली इंदिरा गांधी की सहानुभूति की आंधी ने तमाम विपक्षी दिग्गजों के साथ रामविलास पासवान को भी चुनाव में हरा दिया था। इसके बाद रामविलास पासवान ने 1985 में बिजनौर लोकसभा क्षेत्र और 1987 में हरिद्वार लोकसभा सीट के उपचुनावों में लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़ा। इन दोनों चुनावों में मायावती भी उनके खिलाफ बसपा से मैदान में थीं, लेकिन दोनों ही दिग्गज चुनाव हार गए। इन दोनों उपचुनावों को कवर करने के कारण मेरी रामविलास पासवान से नजदीकी और बढ़ गई। मैं उनमें एक सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के लिए प्रतिबद्ध और सर्वस्वीकार्य राष्ट्रीय स्तर के दलित नेता की छवि देखता था। गांधी अंबेडकर लोहिया के विचारों पर उनके साथ खूब चर्चा होती थी। लंबे समय तक लगभग उनका स्थाई निवास बन चुका 12 जनपथ के ड्राइंग रूम में हम कुछ पत्रकार मित्र रामविलास पासवान के साथ घंटों बैठकर राजनीतिक और वैचारिक चर्चा किया करते थे।



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