कोच पोजीशन में रेल अधिकारी थोड़ी तो उपयोग करें अपनी बुद्धिमत्ता

रेलवे को है केवल अपनी कमाई की चिंता, यात्रियों की कोई परवाह नहीं

गुरुवार, दि. 17.06.2021 को ट्रेन नं.  01079 लोकमान्य तिलक टर्मिनस से गोरखपुर के लिए चली स्पेशल ट्रेन में ए-1 कोच के यात्री लगातार ट्रेन कंडक्टर को शिकायत कर रहे हैं कि उनके कोच के साथ जुड़े जनरल कोच के यात्री उनका टॉयलेट गंदा कर रहे हैं, अतः दोनों कोचों के बीच खुला वेस्टिबुल बंद कराया जाए, क्योंकि इसके चलते न केवल एसी ए-1 कोच में बदबू आ रही है, बल्कि उनकी शांति भी भंग हो रही है और रेल की यह कोच व्यवस्था बिल्कुल गलत है।

गुरुवार को ए-1 कोच के यात्रियों की कोई सुनवाई ऑन बोर्ड ट्रेन स्टाफ ने नहीं की। ट्रेन में चल रहा कैटरिंग वेंडिंग स्टाफ बार-बार उक्त वेस्टिबुल को खोलकर अपना धंधा करता रहा। यात्रियों के मना करने पर उनका प्रतियुत्तर होता है कि “तुम्हारी शांति और कोच में होने वाली गंदगी के लिए हम अपना धंधा नहीं छोड़ सकते!”

शुक्रवार, 18.06.2021 की सुबह जब ट्रेन ललितपुर के आसपास पहुंच रही थी, तब फिर वही परिदृश्य उपस्थित हो गया जब वेंडिंग स्टाफ वेस्टिबुल खुला छोड़कर अपना धंधा करने गया, तो जनरल कोच के यात्री ए-1 कोच के टॉयलेट का उपयोग करके दोनों टॉयलेट पूरी तरह से गंदे कर चुके थे। इससे आई बदबू के चलते ए-1 कोच के गेट से लगे पहले कूपे में बर्थ नंबर एक से छह में बैठे सभी यात्री बिफर उठे।

कोच कंडक्टर (भोपाल मंडल स्टाफ) को बुलाया गया। वह उल्टे यात्रियों को ही यह कहकर समझाने लगा कि “कोच को यहां इसलिए लगाया गया है, क्योंकि स्टाफ कम है और इतने ही स्टाफ को ज्यादा से ज्यादा कैश/केस बनाने का दबाव रहता है। केस तो जनरल कोच में ही मिलते हैं।” अब स्टाफ की इस बेचारगी पर यात्री क्या कहें, क्योंकि यह उनकी समस्या नहीं है। तथापि कंडक्टर ने जो भी समझाया वह विषय अथवा यात्री समस्या से अलग था।

बहरहाल, कंडक्टर ने यह कहकर यात्रियों को शांत किया कि अब उक्त वेस्टिबुल नहीं खोला जाएगा। तथापि उपरोक्त यात्रियों ने कंडक्टर को संबोधित करते हुए सोशल मीडिया पर रेल प्रशासन द्वारा की जाने वाली कोविड प्रोटोकॉल संबंधी बड़ी-बड़ी बातों का उल्लेख करके रेलवे की तमाम लानत-मलामत कर दी। यात्रियों ने यह भी कहा कि “इसी तरह की गतिविधियों के कारण रेलवे अपने स्थाई उपयोगकर्ताओं को गंवा रहा है। वह तो अब भविष्य में कभी रेल से यात्रा नहीं करेंगे।”

वास्तविकता यह है कि किसी भी ट्रेन में एसी कोचों को जनरल कोचों के साथ संलग्न नहीं किया जाता, और ऐसा लगभग अन्य सभी ट्रेनों में है भी, जिनमें सेकेंड एसी कोच के बाद थर्ड एसी, फिर स्लीपर, पैंट्री तथा बाकी कोचों की सीक्वेंस होती है। तथापि इस ट्रेन में एसी कोच, वह भी सेकेंड एसी कोच, को जनरल कोच के साथ अटैच किया गया है।

“अब यह बुद्धिमत्ता जिस किसी अधिकारी ने दर्शाई है, उसे पीयूष गोयल की जगह रेलमंत्री की कुर्सी पर बैठाया जाना चाहिए, क्योंकि पीयूष गोयल की अपेक्षा उक्त अधिकारी ज्यादा तत्परता से रेलवे को बरबाद करेगा!” यह कहना था उपरोक्त रेलयात्रियों का।

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रेल संगठनों के निठल्ले पदाधिकारियों की चापलूसी से बचें रेल अधिकारी

DRH/KYN: डॉक्टर की तत्परता से बची रेलकर्मी की जान

डॉक्टरों और रेल अधिकारियों को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि वे रेल प्रशासन द्वारा सौंपी गई आधिकारिक जिम्मेदारी और अपने पेशेगत दायित्व का निर्वाह कर रहे होते हैं। अतः उन्हें रेल संगठनों के कुछ निठल्ले पदाधिकारियों की चापलूसी से बचने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए!

In absence of regular surgeon, Dr. Rafiqul Islam, ACMS, Divisional Railway Hospital, Kalyan (DRH/KYN) has again done an exemplary work by diagnosing injured on duty (IOD) railway employee as suffering from serious internal injury and going into in shocked state on 12.05.2021 at 12:00 Noon.

His clinical acumen and alacrity have saved Vikram Kumar’s life who is seriously injured on duty working at diesel loco shed, Kalyan.

His index of suspicion of internal injury came true as he underwent exploratory laparotomy at Fortis hospital Kalyan within half an hour of landing in the hospital.

His mesenteric artery was damaged due to blunt trauma and he lost two and half litres of blood internally.

This is all appreciable because of Dr Rafiqul’s efforts, sincerity and clinical presence of mind.

घटना का विवरण कुछ इस प्रकार है –

बुधवार, 12 मई 2021 को कल्याण डीजल शेड में विक्रम कुमार नामक टेक्नीशियन एक डीजल लोको पर मार्कर लाइट का काम कर रहा था। इसी दौरान अचानक पीछे से एक इंजन रोल डाउन होकर उसके इंजन से टकराया।

विक्रम कुमार जिस इंजन पर काम कर रहे थे, उसके बफर के सामने खड़े हुए थे और पिछले इंजन का बफर उनके इंजन के बफर से टकराया और वह दोनों बफर के बीच में दब गए।

तत्काल वहां आसपास उपस्थित अन्य रेलकर्मियों, जो एक रेल संगठन के सक्रिय सदस्य बताए गए हैं, ने विक्रम को उस बफर में से बाहर निकालकर बिना देरी किए कल्याण रेलवे हॉस्पिटल पहुंचाया।

कल्याण रेलवे अस्पताल में सर्जन की अनुपस्थिति में अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए एसीएमएस डॉ रफीकुल इस्लाम ने हादसे की गंभीरता को भांपते हुए तत्काल सीएमएस डॉ शशांक मल्होत्रा को सूचित किया और उनकी अनुमति से बिना देरी किए आंतरिक रूप से गंभीर घायल विक्रम कुमार को कल्याण के फोर्टिस हॉस्पिटल में भेज दिया गया, जहां डॉक्टरों की तात्कालिक सक्रियता से उसकी जान बच सकी।

ओछी मानसिकता का प्रदर्शन करने से बचें रेल संगठनों के पदाधिकारी

इस बीच उसे अस्पताल लाने वाले रेलकर्मी हर समय उसके साथ थे और जहां पैसे की जरूरत पड़ी वहां उन्होंने पैसा भी खर्च किया। लेकिन बताते हैं कि अगले दिन गुरुवार, 13 मई को एक अन्य रेल संगठन के कुछ लोग, जिनका कि इस महती कार्य में कोई विशेष योगदान नहीं रहा, वे डॉक्टरों को गुलदस्ते देकर फोटो खिंचा रहे थे।

इतनी गंभीर स्थिति में भी यदि कुछ रेलकर्मी अपने सहकर्मी रेल कर्मचारी का सहयोग करने के बजाय रेलवे अस्पताल में जाकर सीएमएस और डॉक्टरों को बुके देकर अपना क्रेडिट ले रहे थे, यह न सिर्फ अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि आपदा में अवसर तलाशने की विकृत मानसिकता का द्योतक भी है।

भविष्य में कोई भी सामाजिक कार्यकर्ता अथवा यूनियन के पदाधिकारी इस तरह की दूषित मानसिकता और ओछी हरकतों का प्रदर्शन करने से बचें, तो उचित होगा।

डॉक्टर और अधिकारी भी बचें चापलूसी से!

संदर्भ वश यहां डॉक्टरों और अधिकारियों को भी ऐसे हर मौके पर यह ध्यान रखना चाहिए कि वे रेल प्रशासन द्वारा सौंपी गई आधिकारिक जिम्मेदारी और अपने पेशेगत दायित्व का निर्वाह कर रहे होते हैं।

अतः उन्हें रेल संगठनों के कुछ दलाल टाइप निठल्ले पदाधिकारियों की चापलूसी से बचने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि उनके साथ नजदीकी दर्शाकर इस तरह कुछ संगठन पदाधिकारी कई बार सामान्य रेलकर्मियों का आर्थिक शोषण करने से भी बाज नहीं आते हैं।

#DRHKYN #CentralRailway #Union #Railway





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विडंबना और विसंगति के मारे रेलवे के जनसंपर्क अधिकारी बेचारे!

भारतीय रेल के जनसंपर्क अधिकारियों की दुर्दशा पर एक नजर

सुरेश त्रिपाठी

भारतीय रेल आज जिस ऊंचाई पर है, आए दिन जिसका सोशल मीडिया तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बहुत सारा प्रचार-प्रसार होता है, इसके पीछे रेलवे में कार्यरत जनसंपर्क अधिकारियों की लगन और मेहनत का बहुत बड़ा योगदान है। रेलमंत्री तथा रेल मंत्रालय के सोशल एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर प्रचार-प्रसार से सभी अच्छी तरह वाकिफ हैं, जिसे बहुत सराहा जाता है। विशेषकर प्रधानमंत्री द्वारा भी इन सभी की तारीफ की गई है।

यह सब रेलवे के जनसंपर्क अधिकारियों की देन है, जो कि अपना पूरा समय और जीवन भर रेलवे के लिए काम करते हैं तथा पूरी नौकरी के दरम्यान अपना घर-परिवार सब कुछ भूलकर भारतीय रेल के लिए प्रचार माध्यम पर दिन-रात कार्यरत रहते हैं। परंतु उन्हें अत्यंत मानसिक पीड़ाओं एवं जिल्लतों का सामना करना पड़ता है। यह बात मीडिया सहित शायद रेल प्रशासन और रेलमंत्री के संज्ञान में नहीं है।

जनसंपर्क अधिकारी, जो कि ग्रुप ‘बी’ में आते हैं, भारतीय रेल के अधिकारी होने के बाबजूद रेलवे ने आज तक इनके लिए कुछ नहीं किया। विडंबना यह है कि आज तक इन अधिकारियों का एक कैडर भी नहीं बनाया जा सका है, जिससे कि उन्हें नौकरी के दौरान यथोचित पदोन्नति मिल पाती। सब जानते हैं कि रेलवे में सभी विभागों के अधिकारियों का अपना कैडर है, यहां तक कि राजभाषा एवं आईटी विभाग के ग्रुप ‘बी’ अधिकारी भी 15 से 17 सालों में, उप मुख्य राजभाषा अधिकारी तथा सीनियर ईडीपीएम तक बन रहे हैं।

अधिकांश जनसंपर्क अधिकारी, जिन्होंने 20 से 22 वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया है, उन्हें अभी तक ग्रुप ‘ए’ का दर्जा तक नसीब नहीं हो पाया है। जब उन्हें ग्रुप ‘ए’ ही नहीं मिल पाता, तो प्रमोशन मिलने का सवाल ही पैदा नहीं होता। इसीलिए कोई भी जनसंपर्क अधिकारी, मुख्य जनसंपर्क अधिकारी नहीं बन पाता। सिर्फ कुछ गिने-चुने लोगों को सीनियर स्केल में, वह भी एडहॉक, पदोन्नति मिल पाई है।

वहीं इसके विपरीत भारतीय रेल के सभी जोनों तथा उत्पादन इकाईयों के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी, जिनका जनसंपर्क से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं, जैसे कि ट्रैफिक सर्विस, स्टोर्स सर्विस, इलेक्ट्रिकल एवं मैकेनिकल सर्विस के अधिकारियों को मुख्य जनसंपर्क अधिकारी में पदस्थापित किया जाता है और उनके हिसाब से रेलवे का जनसंपर्क विभाग कार्य करता है।

यहां यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह अधिकारी जिसने कभी भी जर्नलिज्म, मास मीडिया एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं पढ़ी, वह उन जनसंपर्क अधिकारीयों को, जिन्होंने यह सब पढ़ा-कढ़ा होता है और इसकी डिप्लोमा-डिग्री भी ली हुई होती है, उन्हें वे जनसंपर्क का पाठ पढ़ाते हैं और निर्देश देते हुए कहते हैं कि “आप लोगों को कुछ नहीं आता! जो हम बोल रहे हैं, वही करिए!” इससे रेलवे के जनसंपर्क विभाग और अधिकारियों का मनोबल रसातल में चला जाता है।

इन विषम परिस्थितियों में भी जनसंपर्क अधिकारी  निष्काम भाव से रेलवे की छवि बनाता है और अपना काम यथासंभव सुचारू रूप से करने का प्रयास करता रहता है। माना कि कुछ जनसंपर्क अधिकारी आजकल के सोशल मीडिया प्रचार के आदी नहीं हैं, लेकिन वे इन सभी को पूरी तरह से सीख कर आधुनिक प्रजन्म के टूल्स अपनाते हुए रात-दिन लगे हुए हैं।

लेकिन जब कोई काम बिगड़ता है, अथवा जाने-अनजाने कहीं कोई गलती होती है, तो इन्हीं जनसंपर्क अधिकारियों को बोला जाता है कि “डैमेज कंट्रोल करो।” वाह, क्या नियम-कानून है रेलवे का। जब अच्छा होता है, तो मुख्य जनसंपर्क अधिकारी अच्छा और काबिल है! और अगर बिगड़ता है या कुछ खराब होता है, तो जनसंपर्क अधिकारी नालायक एवं निकम्मा है। इससे यह उजागर होता है कि रेलवे में जनसंपर्क विभाग कैसे कार्यरत है।

यहां एक उदाहरण देखें, हाल ही में एक मंडल में पहली श्रमिक स्पेशल ट्रेन के संचालन की योजना बनी। इसके लिए जो प्रेस विज्ञप्ति तैयार की गई उसमें संबंधित जोन के जीएम और मंडल के डीआरएम सहित सभी संबंधित ब्रांच अधिकारियों के योगदान और प्रयासों को समाहित किया गया। इस विज्ञप्ति को संबंधित ग्रुप ‘ए’ ब्रांच अधिकारी ने ‘ओके’ भी कर दिया।

जब यह विज्ञप्ति प्रेस को भेजी जाने वाली थी, तभी किसी चापलूस रेलकर्मी ने उक्त मंडल के एक प्रभावशाली नेता, जो कि सरकार में उच्च सम्मानित पद पर हैं और उस समय वह उक्त मंडल स्थित अपने आवास पर भी नहीं, बल्कि दिल्ली में थे, जिनका उक्त ट्रेन के चलने से दूर-दूर तक कोई प्रयास या सरोकार नहीं था, के कार्यालय को वह विज्ञप्ति फारवर्ड कर दी। नेता जी के कार्यालय से तुरंत डीआरएम और जीएम को फोन आ गया कि उनके नाम और योगदान का उल्लेख किए बिना ऐसी विज्ञप्ति जिसने बनाने की हिम्मत की है, उसे तुरंत निलंबित करके मेजर पेनाल्टी चार्जशीट दी जाए।

अब सभी अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। वह ग्रुप ‘ए’ अधिकारी महाशय, जिन्होंने उक्त विज्ञप्ति को ‘ओके’ किया था, अपनी बात से फौरन मुकर गए और सारा दोष विज्ञप्ति बनाने वाले जनसंपर्क कर्मचारी पर मढ़ दिया। परिणामस्वरूप उक्त कर्मचारी को मेजर पेनाल्टी चार्जशीट देने का आदेश हो गया और इसकी फीडबैक नेता जी के कार्यालय को देकर अपनी-अपनी खाल बचाई गई। रीढ़विहीन रेल प्रशासन का यह एक छोटा सा उदाहरण है, जबकि ऐसी रीढ़हीनता के ऐसे सैकड़ों-हजारों उदाहरण रेलवे में भरे पड़े हैं।

अब अगर रेलवे बोर्ड की ही बात करें, तो अन्य विभागों के ग्रुप ‘ए’ अधिकारी ही जनसंपर्क का पूरा कार्य देख रहे हैं। बोर्ड में इंफर्मेशन सर्विस के रिटायर्ड अधिकारियों को रखा गया है, जिससे कि उनकी कुछ न कुछ रोजी-रोटी चलती रहे। भारतीय रेल की जोनल रेलों तथा उत्पादन इकाईयों में पहले से ही जनसंपर्क विभाग है तथा बड़ी सरलता एवं सहजता से प्रचार-प्रसार का कार्य हो रहा है। उनके यहां से रोज-रोज प्रेस विज्ञप्ति तथा अन्य प्रचार का कार्य जोर-शोर से चलता रहता है।

परंतु रेलवे बोर्ड के अकुशल मीडिया मैनेजरों द्वारा सभी जोनल एवं उत्पादन इकाईयों के जनसंपर्क अधिकारियों को निर्देश दिए जाते हैं कि वे उनके द्वारा बताए गए तरीकों पर प्रचार करें तथा अपनी डेली रिपोर्ट भेजें, जिसे वे मंत्रीजी को पेश करेंगे। सोशल मीडिया पर रोज टविट् और रीट्विट् करने को कहा जाता है। लेकिन यह सब वह रेलवे बोर्ड से नहीं कर सकते। मतलब यह कि काम दूसरे लोग करें और रेलवे बोर्ड में बैठकर यह तथाकथित मीडिया मैनेजर उसका क्रेडिट लेते रहें। रेलवे बोर्ड में मीडिया मैनेजर बनकर ऐसे लोग प्राइवेट एजेंसीज द्वारा काम चलाकर अपना नाम कमा रहे हैं। उनका रेलवे की छवि और प्रचार-प्रसार से कोई लेना-देना नहीं है। सिर्फ एजेंसियों को देखना है कि किससे कितना फायदा होगा, बस उसी से काम करवाना है।

बिगड़ा हुआ है रेलवे बोर्ड जनसंपर्क का पूरा तंत्र

जनसंपर्क अधिकारियों ने अपनी पदोन्नति के लिए क्या नहीं किया। कैट में केस किया, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक गए। वहां से सभी निर्णय उनके पक्ष में भी आए। परंतु रेलवे बोर्ड के अधिकारियों और तथाकथित मीडिया मैनेजरों को यह बात बर्दास्त नहीं हुई। कुछ जनसंपर्क अधिकारियों को किसी न किसी बहाने इसके लिए दंडित भी किया गया कि उन्होंने केस क्यों किया। कुछ को प्रमोशन दिया, परंतु चार्ज लेने नहीं दिया गया। उनके रिटायरमेंट का इंतजार किया गया।

कुछ वर्ष पहले सारे जनसंपर्क अधिकारियों को ट्रैफिक सर्विस के साथ मर्ज किया गया था। इसके लिए रेलवे बोर्ड स्तर पर तत्कालीन एएम/कमर्शियल आर. डी. शर्मा की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन भी किया गया था। इस कमेटी ने मर्जर की सभी मॉडेलिटीज और सेलेक्शन प्रोसेस भी तैयार करके अपनी रिपोर्ट मर्जर के पक्ष में दाखिल की थी। परंतु ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों के जोनल संगठनों से ही शिकायत करवाकर इसके केंद्रीय संगठन द्वारा इस मर्जर को रुकवा दिया गया, जिसमें इसके होनहार अध्यक्ष एवं महामंत्री की देन से सभी विभागों के ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों के लिए प्रमोशन के लिए संग्राम होता है। परंतु जनसंपर्क अधिकारियों के लिए नहीं।

विडंबना यह है कि जो ग्रुप ‘सी’ कर्मचारी 1998 में ग्रुप ‘बी’ अधिकारी बने थे, वह आज की तारीख में सेलेक्शन ग्रेड के ग्रुप ‘ए’ अधिकारी बने हुए हैं। ट्रैफिक वालों को 15/18 सालों में, स्टोर्स वालों को 16/17 सालों में, एकाउंट्स वालों को 18 सालों में, इलेक्ट्रिकल वालों को 15 सालों में तथा मैकेनिकल वालों को 15 सालों में ग्रुप ‘ए’ मिल जाता है। रेलवे में यह कितनी बड़ी विडंबना और विसंगति है कि जहां खलासी/हेल्पर से चतुर्थ श्रेणी में भर्ती हुआ कोई कर्मचारी अपने पैसे और पहुंच के बल पर देखते-देखते सेलेक्शन ग्रेड और सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड (एसएजी) तक पहुंच जाता है, वहीं जनसंपर्क अधिकारियों को बीस-पच्चीस सालों तक सीनियर स्केल तक भी नसीब नहीं हो पाता!

यदि देखा जाए तो रेलवे में लगभग 50/60 ही ग्रुप ‘बी’ के जनसंपर्क अधिकारी होंगे। पीयूष गोयल के रेलमंत्री बनकर आने के बाद से रेलवे की कार्य प्रणाली में काफी बदलाव हुए हैं। एक ओर कैडर रिस्ट्रक्चरिंग की बात हो रही है, तो दूसरी ओर सभी अधिकारियों और कर्मचारियों के हित के लिए रेलवे में मूलभूत परिवर्तन किए जा रहे हैं। लेकिन रेलवे बोर्ड में बैठे महानुभाव लोग सिर्फ जनसंपर्क अधिकारियों का शोषण कर रहे हैं और बदले में पूरे के पूरे जनसंपर्क अधिकारियों की जमात को एक सिरे से खत्म करने की जुगत भिड़ा रहे हैं।

इसका मूलभूत कारण यह समझ में आता है कि कैडर रिस्ट्रक्चरिंग होने के बाद से नीचे के अधिकारियों के पद कम हो गए और ऊपर के अधिकारियों के पद ज्यादा बना लिए गए हैं। ऊपर में अधिकारियों के पास कोई काम नहीं होता, सिर्फ पद होता है। इसीलिए उनको दूसरों का काम करने की चाहत जागती है। ऐसे अधिकारी, जो अपने कैडर में किसी काम के लायक नहीं रहते, उन्हें दूसरे के काम ज्यादा लुभावने लगते हैं। ऐसे में बड़े अधिकारियों की सिफारिश पर अपने लिए मुख्य जनसंपर्क अधिकारी का पद प्राप्त करते हैं और मीडिया में रहने के लिए पहले से कार्यरत जनसंपर्क अधिकारियों का शोषण करने में जुट जाते हैं।

यही हाल रेलवे बोर्ड का भी है। दिल्ली में स्टूल-पोस्टिंग तक लेने के लिए और किसी भी पद पर कार्य करने की तैयारी दर्शाकर सिफारिश कराई जाती है। इसीलिए मक्खियां मारते बैठे हैं 5/6 साल से कुछ लोग। कुछ तो रिटायरमेंट के बाद भी बकायदा अपनी रोटी सेंक रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि उनको रेलवे बोर्ड में बैठकर उन्हें सिर्फ अपना ही उल्लू सीधा करना है। वर्षों से शोषित-पीड़ित जनसंपर्क अधिकारियों के कैरियर और भविष्य की उन्हें कोई चिंता नहीं है।

जोनल रेलों में सभी मुख्य जनसंपर्क अधिकारी तथा उत्पादन इकाईयों में कार्यरत जनसंपर्क अधिकारी, उप महाप्रबंधक या महाप्रबंधक के सचिव, जो कि डिफेक्टो मुख्य जनसंपर्क अधिकारी ही होते हैं, ये सब मिलकर बोर्ड में बैठे मीडिया मैनेजरों के साथ मुख्य धारा से जुड़े रहते हैं और रेलवे के विचार को प्रवक्ता के हिसाब से मीडिया में संप्रेषित करते हैं। इससे वे मीडिया में लगातार बने रहते हैं। शायद यही आकर्षण उन्हें मुख्य जनसंपर्क अधिकारी बनने के लिए प्रेरित करता है।

उपरोक्त तमाम तथ्यों से यह पता चलता है कि इन्हीं सब कारणों से भारतीय रेल में कार्यरत ग्रुप ‘बी’ जनसंपर्क अधिकारियों में भारी रोष व्याप्त है, जिनको उनका वाजिब हक आज तक नहीं दिया गया है। भारतीय रेल में कार्यरत सभी अधिकारियों में अगर कोई सबसे उपेक्षित, शोषित और पीड़ित वर्ग है, तो वह जनसंपर्क अधिकारी का है, जो गिनती में बमुश्किल 50 या 60 ही होंगे। परंतु पूरी भारतीय रेल के प्रचार-प्रसार की बागडोर को बखूबी संभाले हुए हैं। मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (ग्रुप ‘ए’) तो भिन्न कैडर से और भिन्न प्रकार से आते हैं तथा दो-तीन वर्षों में चले जाते हैं। परंतु जनसंपर्क अधिकारी जोनल रेलों तथा उत्पादन इकाईयों में जनसंपर्क का कार्य लगातार निभाते रहते हैं।

उम्मीद की जाती है कि रेलमंत्री एवं अध्यक्ष, रेलवे बोर्ड, अपना कुछ कीमती समय निकालकर रेलवे में कार्यरत जनसंपर्क अधिकारियों की फजीहत को थोड़ा समझेंगे और इस भारी विसंगति का निवारण करने का यथोचित प्रयास करेंगे। 





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रेल अधिकारी अपनी कुलबुलाहट को नियंत्रित रखकर सिर्फ पीएमओ के आदेशों का पालन करेंगे तो देश का ज्यादा भला होगा!

सीआरबी को अपने ‘क्रिटिकल उद्देश्य’ की पूर्ति के लिए पीएफटी, सीटीओ/एसीटीओ को काम पर लगाना चाहिए !!

“Railway is doing again the same blunder which it has done by running several special trains from Mumbai”

Suresh Tripathi

शुक्रवार, 28 मार्च को चेयरमैन, रेलवे बोर्ड  श्रीमान विनोद कुमार यादव ने सभी जोनल रेलों के जनरल मैनेजर्स को लिखित मोबाइल संदेश भेजकर कथित क्रिटिकल आइटम्स की ढुलाई शुरू करने की ‘एडवाइस’ दी है। हालांकि ये कौन से क्रिटिकल आइटम हैं, इनकी परिभाषा सीआरबी महोदय ने स्पष्ट नहीं की है। यह संदेश एक उच्च स्तरीय रेल अधिकारी से ‘रेलसमाचार’ को प्राप्त हुआ है। यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत है ‘सुज्ञान’ सीआरबी महोदय का वह संदेश:

Dear GMs

Good Evening. Let me compliment every one. We are doing very good. I will like to make a request to all of you on a very important issue in present context. Transportation of critical items, many of these in small parcel sizes, is going to be very important in the next few days to mitigate the effects of the lockdown. With VPs, SLRs, locomotives and paths  available, GMs may explore running  timetabled parcel trains on identified  routes. Railways may announce their planning and seek prospective  customers through suitable notification  to assess demand and start such services. Feedback on the action taken may be advised. AM/Commercial and PED/chg will coordinate from the Board.

Regards 

Vinod

सीआरबी महोदय जिस तरह अपने संदेश में खाली पड़ी वीपी, एसएलआर, लोकोमोटिव और रेलवे पाथ की उपलब्धता का उल्लेख कर रहे हैं, उससे जाहिर है कि वह इन सबकी इफरात उपलब्धता का उपयोग करके छूत की महामारी की गंभीरतम स्थिति में भी कुछ अतिरिक्त लाभ कमा लेने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं। परंतु उनकी इस अनुभवहीनता या बनियागीरी अथवा बनिया-नीति का खामियाजा देश को और रेलकर्मियों को जिस बड़े पैमाने पर भुगतना पड़ सकता है, रेलवे की इस अतिरिक्त कमाई के लालच में उन्हें शायद इस बात का कोई अंदाजा नहीं है।

रेलवे के गहन अनुभवी और जानकारों का मानना है कि “ऐसे गंभीर समय में कुछ अति उत्साही अफसरों से उनका विनम्र आग्रह है कि वे अपने अंदर कुलबुलाते कीड़ों को कुछ दिन शांत रखें तथा इस तरह के बचकाने आइडिया, सुझाव और आदेश देने से बचें, नहीं तो अभी-अभी उनके मुंबई से स्पेशल चलाने की होशियारी दिखाए जाने से आने वाली तबाही से उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल आदि के लोग अगर बच जाएं, तो फिर यह पलीता भी लगा देना, लेकिन भगवान के लिए आप अपने घर पर, अपने अंदर बैठे जन्मजात कीड़े के साथ, कुछ दिन शांति से बैठे रहेंगे, तो उससे देश का ज्यादा भला होगा।”

इसके साथ ही उनका यह भी कहना था कि “यदि सीआरबी को कथित क्रिटिकल आइटम्स की ढुलाई ही करनी है, तो यह एकदम सही समय है, जब इसके लिए प्राइवेट फ्रेट टर्मिनल्स (पीएफटी), सीटीओ, एसीटीओ को काम पर लगाया जाए।” उनका कहना है कि कम से कम इसी बहाने सरकार को ये तो पता चल जाए कि सरकारी गतिविधियों का निजीकरण उर्फ प्रावेटाइजेशन कितना सही है और राष्ट्र की विषम परिस्थितियों में ये कितना सक्रिय योगदान दे रहें हैं या दे सकते हैं।

A retired COM and a CCM, when asked their opinion on this subject, openly said, “PFTs & CTOs are well equipped or they can develop methodology in no time to carry the essential consignment with minimum risk of spreading”.

“It will not augur well if it is done by Rly parcel. It will create more problem than the solution. It will make the station crowded place and deployment of staffs will be needed as per the activity. Moreover package will be potential career to spread the pandemic making railway station an epicenter for this. And again railway is doing the same blunder which it has done by running several special trains from Mumbai and other Cities”, they said.

https://twitter.com/kanafoosi/status/1243888390707142658?s=19

उन्होंने कहा कि “इसके अलावा यह भी देखने में आया है कि कई जगह पर सैनिटाइजर के नाम पर स्पिरिट और अल्कोहल का धंधा शुरू हो गया है। इनकी कालाबाजारी को कई शहरों में पुलिस ने उजागर किया है। ऐसी गंभीर स्थिति में रेलवे में हर पार्सल पैकेट को खोलकर यह कौन सुनिश्चित करेगा कि उसमें सिर्फ ‘क्रिटिकल आइटम’ ही भेजा जा रहा है और वही चीज जा रही है, जो पार्टी ने डिक्लेयर किया है।”

उन्होंने स्पष्ट कहा कि सीआरबी की उक्त अनुभवहीन ‘एडवाइस’ प्रधानमंत्री के लॉकडाउन को धता बताने वाली है। उन्होंने रेल मंत्रालय से यह अनुरोध भी किया है कि “#कोविद-19 से संबंधित किसी भी मामले में अपने से कोई पहल न करे और न कोई सुझाव दे। पीएमओ पर सबको भरोसा है, क्योंकि वहां पर स्थितियों के आकलन के आधार पर जिस मंत्रालय को जैसा निर्देश देना है, वैसा देने पर ही कोई कार्यवाही करें, अन्यथा फिर से समझ लें कि रेलवे के बचकाने निर्णयों से जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई कोई नहीं कर पाएगा और तब स्थितियां किसी के संभालने मान की भी नहीं रहेंगी!”

एक रिटायर्ड एडीशनल मेंबर/कमर्शियल का कहना है कि “जब गुड्स ट्रेनें चल रही हैं, और अत्यावश्यक जिन्सों की ढुलाई तत्परता से की जा रही है, तब इस तरह की भयावह परिस्थिति में पार्सल ट्रैफिक को खोलने के इस तरह के आदेश का कोई औचित्य ही नहीं बनता है। यह आत्मघाती और जानलेवा साबित होगा।” उनका यह भी कहना था कि पीएमओ को सीआरबी की इस आदेश का तुरंत संज्ञान लेकर आवश्यक कदम उठाना चाहिए, क्योंकि यदि इस पर अमल हुआ तो महामारी को और ज्यादा फैलने से रोक पाना काफी मुश्किल हो जाएगा।

जानकारों का मानना है कि अभी ये 10-15 दिन काफी क्रिटिकल हैं। इस दौरान लोग जितना ज्यादा समय घर में रहेंगे, उतना ही वे न सिर्फ सुरक्षित बचेंगे, बल्कि देश का भी बहुत भला करेंगे, लेकिन इसी दौरान रेलवे अपनी अनावश्यक गतिविधियों से पैनिक क्रिएट कर रही है।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पता चला है दक्षिण रेलवे से एक पीसीईटी चलाई जा रही है, जिसमें क्रिटिकल आइटम नहीं, बल्कि बीज की लोडिंग होगी और जिसकी जरूरत फिलहाल तो बिल्कुल भी नहीं है और जब भी होगी, वह मई-जून के बाद ही होगी।

तथापि जिस राज्य को यह बीज भेजा जा रहा है, उस राज्य ने यदि इसे क्रिटिकल माना होता, तो वह भारत सरकार से आग्रह करता, तब सरकार उसके लिए रेल चलाती, तो यह समझ में आने वाली बात होती। लेकिन इसका फायदा कुछ शातिर बिजनेस घराने उठाने की कोशिश में लग गए हैं। अनुभवी जानकारों का मानना है कि पैसा कमाना भी रेलवे के लिए जरूरी है, परंतु ऐसे समय में नहीं, जब एक छूत की महामारी के चलते देश में युद्ध जैसे हालात पैदा हो गए हैं, यह बात उन व्यापारियों को भी समझना चाहिए, जिनकी बदौलत सीआरबी की यह एडवाइस सामने आई है।

इस बीज वाली पीसीईटी को चलाने के निर्णय पर कोई यह पूछने वाला नहीं है कि इस समय जब मजदूर और ट्रक उपलब्ध ही नहीं हैं, तब कितने दिनों तक पार्टी रेक खाली करने के नाम पर स्टेशन या गुड्स शेड में लाइन और जगह घेर करके रखेगी? जबकि मात्र गुड्स ट्रेनों के संचालन में भी लाइन पर भारी कंजेशन की दुहाई देकर जोनल रेलों द्वारा मंगाए जा रहे खाली रेक हफ्ते भर में भी उनके गंतव्य पर नहीं पहुंचाए जा पा रहे हैं।

अभी तो स्ट्रेटेजी यह होनी चाहिए कि रेलवे के पार्सल स्पेस और स्टॉक खाली रहें, क्योंकि अगर अगले हफ्ते से हालात ज्यादा बिगड़ने शुरू होते हैं, तब सरकार को तुरंत हर जगह क्रिटिकल और एसेंसियल आइटम की सप्लाई शुरू करने की जरूरत पड़ेगी और जब इस सबके लिए स्टेशनों एवं टर्मिनल्स पर पर्याप्त जगह ही उपलब्ध नहीं होगी, तब क्या किया जाएगा?

वैसे भी आवश्यक गुड्स में केवल क्रिटिकल एवं एसेंसियल आइटम्स की ही लोडिंग और सप्लाई की अनुमति दी जानी चाहिए थी, जैसे कोयला, खाद्यान्न और खानपान संबंधी सामग्री तथा मेडिकल इक्विपमेंट्स एवं दवाईयां इत्यादि।

परंतु प्रत्यक्ष देखने में यह आ रहा है कि इसमें सीमेंट, स्टील, खाद आदि जैसे नॉन-क्रिटिकल आइटम्स की लोडिंग भी शुरू कर दी गई, जबकि वर्तमान स्थिति में ऐसी सभी गैर-जरूरी (नॉन-क्रिटिकल/नॉन-एसेंसियल) वस्तुओं की ढुलाई पर रोक लगा दी जानी चाहिए थी, क्योंकि अब अधिकांश टर्मिनल और गुड्स शेड को ये लोग घेर कर खड़े हो रहे हैं और इनके चलते रेलवे इस गंभीर स्थिति में बुरी तरह और भारी मुसीबत में फंसने के हालात खुद पैदा करने जा रही है।

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