रिटायरमेंट के बाद भी पंद्रह दिन तक ऑफिस आकर बैठते रहे पीसीएसओ, पूर्वोत्तर रेलवे

रिटायर हो चुके एस. एन. शाह को “कारण बताओ नोटिस” जारी की जाए। तत्पश्चात इस बात की जांच की जानी चाहिए कि 14-15 दिनों में उन्होंने ऑफिस में बैठकर क्या-क्या घालमेल किया?

विजय शंकर, ब्यूरो प्रमुख,गोरखपुर

यह अजब है कि कोई विभाग प्रमुख (पीएचओडी) रिटायर होने के बाद भी ऑफिस में बाकायदा बैठकर लगातार पंद्रह दिनों से काम कर रहा हो, अपने मातहत रहे अधिकारियों और कर्मचारियों को डांट-डपट रहा हो, हड़का रहा हो, मातहत अधिकारी की गाड़ी जबरन इस्तेमाल कर रहा हो, फिर भी उसके मातहतों को तो छोड़ो, उसके ऊपर समकक्ष अधिकारी भी इसे अनदेखा करें, यह बात कुछ हजम में नहीं होती!

यह करिश्मा साक्षात घटित हुआ है पूर्वोत्तर रेलवे मुख्यालय गोरखपुर में, जहां पीसीएसओ एस. एन. शाह 30 अप्रैल को सेवानिवृत्त होने के बाद भी अब तक लगातार और बाकायदा अपने चैंबर में आकर पूर्व रुतबे के साथ बैठ रहे हैं।

बताते हैं कि उन्होंने इसका बहाना अपने मातहत काम कर रहे लोगों को यह कहकर बताया कि “उन्होंने सोचा, जब तक नए सीएसओ की पोस्टिंग नहीं होती, तब तक वह खुद पेंडिंग काम निपटा दें!”

अब एसएंडटी कैडर के इस वरिष्ठ मूढ़ व्यक्ति की नजर से देखा जाए, तो इसका तात्पर्य यह है कि जब तक नए जीएम की पोस्टिंग नहीं हो, तब तक रिटायर हो चुके जीएम को आकर काम करते रहना चाहिए!

आश्चर्य की बात यह है कि दूसरे विभागों के समकक्ष विभाग प्रमुखों ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? यदि वह अपना बिरादरी भाव नहीं बिगाड़ना चाहते थे, तब भी उन्होंने यह बात जीएम के संज्ञान में लाना जरूरी क्यों नहीं समझा?

इसके अलावा पता चला है कि सीएसओ/एनईआर का अतिरिक्त कार्यभार मैकेनिकल डिपार्टमेंट के एक अधिकारी बी. एस. दोहरे को सौंपा गया है। यदि वह सीएसओ के चैंबर में नहीं भी बैठ रहे थे, तब भी उन्होंने शाह को वहां बैठने अथवा कार्यालय आने से मना क्यों नहीं किया?

दोहरे यदि शाह को टोककर उनसे बुरे नहीं बनना चाहते थे, तब भी रिटायरमेंट के बाद शाह के चैंबर में आकर बैठने की जानकारी से उन्होंने स्वयं महाप्रबंधक को अवगत क्यों नहीं कराया? जबकि अन्य विभाग प्रमुखों की अपेक्षा अतिरिक्त कार्यभारी होने से यह खुद उनकी पहली जिम्मेदारी थी?

जब “रेल समाचार” द्वारा यह विषय जीएम/पूर्वोत्तर रेलवे श्री वी. के. त्रिपाठी से मोबाइल पर बात करके उनके संज्ञान में लाया गया, तब वह भी आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने कहा कि “ऐसा कैसे हो सकता है, क्योंकि सीएसओ का अतिरिक्त कार्यभार मैकेनिकल अधिकारी बी. एस. दोहरे को सौंपा गया है। तथापि वह इस पर अभी तत्काल कार्यवाही कर रहे हैं।”

यह वास्तव में अत्यंत आश्चर्यजनक है कि एक रिटायर हो चुका अधिकारी लगातार पंद्रह दिनों से प्रतिदिन आकर पूर्ववत अपने चैंबर में बैठ रहा है। पूर्व की भांति कार्यालयीन सभी दैनंदिन कामकाज निपटा रहा है, तथापि न तो मातहत उसे कुछ कह रहे हैं और न ही उसके समकक्ष अधिकारी उसे कुछ बोल रहे हैं।

मातहतों को तो एक बार यह मानकर बख्शा जा सकता है कि शाह ने अब तक उनकी एसीआर नहीं लिखी है, हालांकि यह उनकी अक्षम्य कर्तव्यहीनता है, मगर समकक्ष अधिकारियों को इस कोताही के लिए कतई माफ नहीं किया जाना चाहिए।

चूंकि एस. एन. शाह रिटायर हो चुके हैं, व्यवस्था से बाहर हो चुके हैं, इसलिए अधिकारिक तौर पर अथवा अन्य किसी भी रूप में वह ऑफिस या चैंबर में बैठने के हकदार नहीं रह गए थे। तथापि उन्होंने जानबूझकर ऐसा किया।

अतः सर्वप्रथम उन्हें “कारण बताओ नोटिस” जारी की जानी चाहिए। तत्पश्चात इस बात की जांच की जानी चाहिए कि इन 14-15 दिनों में उन्होंने ऑफिस में बैठकर क्या-क्या घालमेल किया?





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रेलवे के अधिकारियों ने डेपुटेशन पर आकर मेट्रो में भी फैलाई गंदगी

If Sreedharan wasn’t favourable to Mangu Singh then the scenario of DMRC would have been different today!

Truck falls into caved road following heavy rainfall in Delhi

A truck falls in a caved-in part of a road near a metro construction site at Khaira More, following heavy rains, in Najafgarh area. According to police, information was received about the incident at around 1 am. Due to incessant rainfall Wednesday night, the road caved in and the rainwater entered inside many shops and buildings near the spot. “A truck fell into the caved portion of the road. But no injury or loss of life was reported,” a senior police officer said.

“A portion of the road along with the footpath at Khaira Road near the Dhansa Stand Metro Station caved in late Wednesday night after a drain burst in the area due to excess flow of continuous rain water. Adding that a truck fell in to the caved road.” the Delhi Metro Rail Corporation (DMRC) said in a statement on Thursday.

The incident has also caused partial damage to an adjacent building. There has been no casualty or injury and senior DMRC officials are at the site to supervise the repair work, it said.

“Repair work of the caved in portion is in progress and all efforts shall be made to complete the work at the earliest. DMRC is now filling below the road with additional concrete to avoid the recurrence of this problem in the future. The contractor firm working in this project is M/s Paras Railtech Pvt Ltd.” the DMRC stated.

चीनी कंपनी ने चार राज्यों का ट्रैफिक कैसे रोका? लोगों के घरों-मकानों को कैसे दरकाया? चीनी कंपनी ने लोगों की रोजी-रोटी और पानी कैसे बंद किया? दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार और मेट्रो रेल प्रशासन क्या कर रहा है? यह कुछ सवाल खैरा मोड़ नजफगढ़ दिल्ली के रहिवासी पूछ रहे हैं, जो पिछले दो सालों से मेट्रो रेल प्रशासन और चीनी कंपनी तथा उसके ठेकेदारों की मनमानी आजिज आ चुके हैं परंतु उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

देखें, “प्रेस नोट” चैनल की यह खबर

स्थानीय लोगों का कहना है कि जिसका डर था, वही हुआ, तीसरी बार दिल्ली के खैरा मोड़, नजफगढ़ में मेट्रो द्वारा निर्माणाधीन साइट गिर गई। ट्रैफिक बंद हो गया। मेट्रो के ठेकेदार और पीडब्ल्यूडी ने मिलकर यह कारनामा किया।

नजफगढ़ विकास मंच ने कल दिन में ही सूचित कर दिया था, परंतु मेट्रो के संबंधित ठेकेदार ने सिर्फ ट्विटर पर पीडब्ल्यूडी को सूचित करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली थी।

#हम_नहीं_सुधरेंगे वाली स्थिति है, क्योंकि इससे पहले भी इसी एरिया के एक गढ़्ढ़े में एक ट्रक धंस गया था, जिसकी भराई मेट्रो द्वारा सही तरीके से नहीं की गई थी और अब बुधवार, 19 मई को फिर एक ट्रक ऐसे ही गढ़्ढ़े में गिरकर चकनाचूर हो गया।

भ्रष्टाचार अब चरम सीमा पर है, रेलवे के अधिकारियों ने डेपुटेशन पर आकर मेट्रो में भी गंदगी फैला दी!

एक निजी ट्रैक निर्माण कंपनी को ठेका दिया गया। निर्माण कंपनी का मालिक रेलवे का ही एक पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर है, जिसके पुराने संबंध रेलवे से मेट्रो में प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारियों से पहले से ही हैं, जो कि मेट्रो में प्रमुख पदों पर कार्यरत हैं।

बताते हैं कि रेलवे का यह पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर रेलवे में रहते हुए भी ठेकेदारों के साथ मिलकर रेलवे की ठेकेदारी किया करता था और बाद में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर रेलवे और मेट्रो में ही ठेकेदार बन गया।

मेट्रो में सुपरवाइजर स्तर पर कार्यरत और नाम न उजागर करने की शर्त पर कुछ सीनियर सेक्शन इंजीनियरों ने बताया कि उक्त ठेकेदार अर्थात पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर की कंपनी को टेंडर के आवंटन में भी गड़बड़ी की गई है।

उन्होंने बताया कि ऐसी बहुत से आइटम्स का पेमेंट किया गया है जो कार्य हुआ ही नहीं है। इसकी पुष्टि मेट्रो में कार्य कर चुके कुछ अधिकारियों ने भी की है। उनका कहना था कि इस पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर और इसकी कंपनी ने मेट्रो पर पूरी तरह कुंडली मारकर रखी है।

उन्होंने बताया कि इस पूर्व रेल अधिकारी ने अपनी दो नंबर की कमाई को एक नंबर करने के लिए ही स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर ठेकेदारी चालू किया है।

उनका कहना है कि निर्माण कार्यों में निर्धारित मात्रा से कम मात्रा में इसने हमेशा सीमेंट-सरिया डाली है और बोगस भुगतान करने में यह माहिर था। अब मेट्रो में वैसा ही करके बोगस भुगतान लेने लगा है। इसकी भूख बढ़ती जा रही है।

सवाल यह उठ रहा है कि सेटिंग हो पाएगी या नहीं? क्योंकि पीडब्ल्यूडी दिल्ली के अधिकारी भी तो डेपुटेशन पर दिल्ली मेट्रो में कार्य कर रहे हैं!

उधर दो-दो बार एक्सटेंशन पा चुके दिल्ली मेट्रो के एमडी अपनी पूरी अकड़ में हैं। परंतु जब उनके अधिकारी कोविड के दौरान टेंडर जारी कर सकते हैं, टेंडर अवार्ड कर सकते हैं, तो मार्च 2021 में ही उन्होंने कार्य क्यों नहीं पूरा किया? इस प्रश्न का जवाब देने के लिए कोई तैयार नहीं है।

अब सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या अधिकारीगण – मंत्री को दिग्भ्रमित कर पाएंगे? क्योंकि मंत्री जी यदि काम के लिए बोलते हैं तो अधिकारी कोविड-19 का बहाना बनाकर घर में बैठ जाते हैं और कोविड पीरियड में ही काम करने के लिए ठेकेदारों पर लट्ठ चलाते हैं ये अधिकारी।

Though Sridharan was a result oriented engineer, had he been able to be great by following all Govt’s rules & regulations?

A former general manager of Railways, who is not wish to disclose his name, writes – “Sreedharan is too big a man, that’s why I don’t want to criticize him openly in any group, but in my opinion he is a bit of a fake, like another mechanical engineer who was retired as CRB, (although fake is probably too strong a word for sreedharan, but right now nothing softer comes to my mind).

As long as he was in Railways including as Member Engineering (ME), nobody had heard anything exceptional about him except his restoration of Pamban bridge in 1963. Apart from that he was just like any other ordinary Board Member who completed his tenure and retired.

Then AM (CE) once told me, when I was posted in the Railway Board, that when Sreedharan joined as ME, he called a meeting of all Advisers, EDs and Directors of the Civil Engineering department. He was Director in Selection Grade at that time, so he also attended.

In that first meeting Sreedharan told them something to this effect (I may be incorrect about the exact wordings); “All of you are very good in your work and also competent, moreover your field experience is much more recent than mine. So I expect all of you will deal with all files at your level without finding it necessary to mark any file to me. However, if you feel that some particular file is tricky or complicated and needs my personal perusal or order then you can put up that file to me. However, in that case, I’ll also seriously consider transferring you out of the Railway Board.” He said that after that meeting, no one ever put up any file to ME.

I was flabbergasted. I asked him, how can a Board Member with his supposedly superior knowledge and undoubtedly more experience, absolve himself of the responsibility of guiding his juniors and teaching them? He laughed, and remarked, “देख लो Partner, reputation ऐसे ही बनती है।”

Sreedharan was appointed as MD/KRCL because of his close proximity to George Fernandes, the then Minister for Railways.

As MD/KRCL (also as MD/DMRC) he had a red coloured digital timer on his side table facing visitors which displayed, “xxx days to completion of yyy project”. The number of days displayed used to keep blinking to catch the visitor’s eye, and the number kept reducing by one every day.

Visitors to his office were terribly impressed with this system of monitoring whereby the MD was personally keeping track of each project on a day to day basis.

A junior officer, who was my Director had earlier worked under Sreedharan in KRCL, told me that every few months the red digital timer clock would be reset and the number of ‘days to completion of a particular project’ would be increased to adjust for the time over run! Since the same visitor rarely returned twice, and even if he did, he was unlikely to remember what he had seen earlier, none of them could catch on to this trick.

As MD/KRCL he changed the alignment of the line passing through Goa, thereby saddling KRCL with additional cost over run of around 200+ crores. As it was, KRCL project was financially unviable, he made it even more so; knowing fully well that he would have earned all kudos and departed, leaving his successors to face the music.

In KRCL, there were rumours of his having made money, although nothing was either proved or disproved. (An honest railway civil engineer is an impossibility, if you ask me.)

As ME, Sreedharan wrote copious pages of notings on file insisting that DMRC must have broad gauge for smooth interoperability. However, within a few years, as MD/DMRC he did a 1800 turn and went in for standard gauge. As a result of standard gauge, 100% of rolling stock had to be imported at huge cost and foreign exchange. (Taking cuts in swiss banks is easier if it is from an international supplier). 

My main grouse against Sreedharan is that as MD/DMRC he did not follow any of the Government rules and regulations regarding award of tender. Tenders were awarded to L-3 or even L-4 bypassing the lower ones by writing some English and justifying the same; (in Govt. you can justify anything on file by writing a lot of English).

During Man Mohan Singh’s time as PM, once CVC officials had gone to DMRC to pick up some files. Sreedharan refused to hand over any file. Then he went to PM and threatened to resign as MD unless written orders were personally issued by PM forbidding CVC or any other investigating agency from scrutinizing any tender file of DMRC. Under that resignation threat PM issued those written orders!!

This information is 100% authentic since it was told to me by an IRSEE officer, who was the Director under me in the Railway Board and subsequently took absorption in DMRC. He was a super outstanding officer and finally retired from DMRC as Director.

In the PSEB interview to select Sreedharan’s successor, the Board wanted to select the IRSEE director as MD, but Sreedharan pitched for Mangnu Singh, Director Civil and put his foot down refusing to sign the proceedings if Mangnu Singh wasn’t selected. That is how that outstanding IRSEE director lost out.

My point is, if Railway Officers also had the freedom to award tenders to L-3 or L-4 then they could also do wonders, possibly as much as if not more than what DMRC has achieved!

My then Sr.DEN (Hq.), who is presently posted as ADRM, told me during my departure as DRM, “sir, throughout our service we’ve always been told by all our seniors that if we wanted to deliver then we must break the rules. We will not be able to deliver successfully by following all rules. Here sir, during the past 2 years, I’ve seen you follow each and every rule and still you’ve been able to deliver much more than any officer I’ve worked under. That has completely changed my mindset permanently.”

In my entire service, I’ve never flouted any rule and whatever I’ve achieved has been by strictly following all rules and regulations. Had Sreedharan been able to do that I would have certainly termed him as Great?

रिटायर्ड जीएम के उपरोक्त विचार बहुत स्पष्ट हैं। तथापि यहां श्रीधरन साहब की गरिमा को किसी भी तरह से डिग्रेड करने की कोई कोशिश नहीं की गई है। उन्होंने सिर्फ उनके काम करने के तौर-तरीकों का जिक्र किया है। उनको आए अनुभव का निष्कर्ष यह भी है कि श्रीधरन साहब भी पक्षपात और मनमानी से मुक्त नहीं थे। यदि ऐसा नहीं होता, तो आज दिल्ली मेट्रो का परिदृश्य कुछ अलग होता। यह भी कि यदि सारे स्थापित सरकारी रूल्स-रेगुलेशंस और दिशा-निर्देशों को दरकिनार करके काम करने और परिणाम देने की छूट दी जाए, तो वह कोई भी रेल अधिकारी दे सकता है।





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महीनों से लंबित भुगतान न मिलने और भारी प्रताड़ना से तंग आकर रेलवे ठेकेदार ने की आत्महत्या

आईआरआईपीए ने ठेकेदार की आत्महत्या के लिए डिप्टी सीई/सी/द.म.रे. एस. के. शर्मा को जिम्मेदार ठहराया

6 मार्च को पूरी भारतीय रेल के कांट्रेक्टर नहीं करेंगे रेलवे का कोई काम, ‘भुगतान दो – काम लो’ का लगाया नारा

इंडियन रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर्स एसोसिएशन ने 2 मार्च को चेयरमैन, रेलवे बोर्ड को एक पत्र लिखकर रेलवे कांट्रेक्टर डी वेंकट रेड्डी की आत्महत्या के लिए दक्षिण मध्य रेलवे, सिकंदराबाद के डिप्टी सीई/सी एस के शर्मा को जिम्मेदार ठहराते हुए रेड्डी को प्रताड़ित करने और महीनों से उसका भुगतान नहीं करने का आरोप लगाया है। इस मौके पर हुई रेलवे ठेकेदारों की एक बैठक में 6 मार्च को देश भर में ठेकेदारों द्वारा रेलवे का काम बंद करने का निर्णय भी लिया गया।

“अत्यंत खेद और भारी दुःख का विषय है कि विषम आर्थिक परिस्थितियों के चलते रेलवे विभाग में काम करने वाले हमारे एक ठेकेदार साथी डी वेंकट रेड्डी को आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा है।” यह लिखा है रेलवे कांट्रेक्टर वेंकट रेड्डी की आत्महत्या के बाद इंडियन रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर्स एसोसिएशन (आईआरआईपीए) के अध्यक्ष बाल किशन शर्मा और महासचिव राकेश कुमार मेघनानी द्वारा चेयरमैन, रेलवे बोर्ड को भेजे गए पत्र में। 

उन्होंने पत्र में लिखा है कि अपने खून पसीने की कमाई लगाकर और दिन-रात एक करके कड़ी मेहनत कर रेलवे ठेकेदारों द्वारा सरकारी/रेलवे ठेकों को निर्धारित गुणवत्ता और समयानुसार पूरा किया जाता है और तब कहीं जाकर किए गए कार्यों के सापेक्ष उन्हें अपना और अपने सहयोगी मजदूरों का पेट पालने तथा सप्लायर्स की रोजी-रोटी चलाने के लिए शासकीय विभागों से भुगतान प्राप्त हो पाता है। मगर शोषण की पराकाष्ठा तब हो जाती है, जब काम पूरा करने के कई-कई महीने बीतने के बाद भी रेलवे विभाग ठेकेदारों को भुगतान नहीं देता है।

उन्होंने लिखा है कि इसके बावजूद निरंतर काम जारी रखने के लिए विभाग द्वारा ठेकेदारों पर अनुचित दबाव बनाया जाता है, जिसके चलते ठेकेदारों पर लेबर और सप्लायर्स के भुगतान का दबाव लगातार बढ़ता चला जाता है। उस पर भी अनेक अधिकारियों द्वारा ठेकेदार को भुगतान मांगने पर विभिन्न तरीकों से प्रताड़ित किया जाता है।

https://youtu.be/sYI_RCYSy9A

!पत्र में उन्होंने कहा है कि इन विषम परिस्थितियों में कोई भी सामान्य व्यक्ति टूट सकता है और उसकी सहनशक्ति जवाब दे जाती है। इसी का नतीजा विगत दिनों उत्तर प्रदेश में दो ठेकेदारों द्वारा की गई आत्महत्या की घटनाएं रही हैं और वर्तमान में शोषण की इन्हीं परिस्थितियों के चलते हमारे अभिन्न साथी और कर्मठ ठेकेदार डी वेंकट रेड्डी को यह आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा है।

उन्होंने लिखा है कि रेलवे जैसे देश के सबसे व्यापक शासकीय विभाग में ठेकेदारों को कई-कई महीनों तक भुगतान नहीं मिलना सरकार की घोर असफलता का परिचायक है।

https://youtu.be/rYJZHoBigtM

बिल्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (बीएआई) की ओर से भी अपने सदस्य स्व. डी वेंकट रेड्डी के असामयिक निधन पर दुःख और संवेदना व्यक्त की गई है। “इस शोक और संकट की घड़ी में बीएआई का समस्त संगठन अपनी पूरी शक्ति के साथ इरिपा के साथ खड़ा है। हम बीएआई की ओर से विश्वास दिलाते हैं कि आपके द्वारा किए जाने वाले राष्ट्रव्यापी आंदोलन में हमारा पूर्ण सहयोग और समर्थन रहेगा।” इस श्रृद्धांजलि सभा में बीएआई की राष्ट्रीय संविधान संशोधन समिति के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ सदस्य मैनेजमेंट कमेटी संजय त्यागी ने यह बात कही।

#IRIPA #RailwayBoard #IndianRailways 








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