डीआरएम/फिरोजपुर पर कदाचार के गंभीर आरोप – RailSamachar

यदि रेलवे विजिलेंस सुशुप्तावस्था में न होता, तो एसओपी, प्लेसमेंट कमेटी और ब्रांच अधिकारियों के अधिकारों का अतिक्रमण करने से पहले उच्च अधिकारी सौ बार सोचते!

सुरेश त्रिपाठी

डीआरएम/फिरोजपुर राजेश अग्रवाल की कुछ गतिविधियों को लेकर मंडल के कर्मचारियों में भारी असंतोष देखने में आया है। उनके बारे में पिछले काफी समय से सोशल मीडिया पर कई प्रकार की पोस्ट डाली गई हैं, जिनमें डीआरएम के विरुद्ध कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। उन पर यह भी आरोप लगाया गया कि करीब एक साल से बिना किसी सूचना के अनुपस्थित रहने वाले एक महाकदाचारी कर्मी को न सिर्फ पुनः ड्यूटी पर ले लिया, बल्कि उसे उसकी मनचाही जगह पोस्टिंग भी दे दी, जिसके लिए उन्होंने पांच लाख रुपए कमाए!

इसके लिए डीआरएम ने ब्रांच अधिकारी के अधिकारों का अतिक्रमण करने के साथ ही एसओपी एवं प्लेसमेंट कमेटी को भी बाईपास किया। डीआरएम पर अपने मातहत ब्रांच अफसरों के अधिकारों का अतिक्रमण करने और स्टाफ के कुछ ऐसे ट्रांसफर करने के आरोप रेलकर्मियों द्वारा लगाए गए हैं, जो अत्यंत विवादास्पद रहे हैं। उन पर यह भी आरोप है कि मंडल में ऐसे तमाम कर्मचारी लंबे समय से एक ही जगह पदस्थ हैं, जिन्हें भ्रष्ट यूनियन नेताओं का पूरा संरक्षण प्राप्त है, डीआरएम के चलते कोई भी ब्रांच अफसर ऐसे महाभ्रष्ट और कदाचारी कर्मचारियों के खिलाफ चाहकर भी कोई कदम नहीं उठा पा रहा है।

उदाहरण स्वरूप डीआरएम पर आरोप है कि पूछताछ एवं आरक्षण क्लर्कों (ईसीआरसी) के ट्रांसफर में तमाम नियम-निर्देश हवा में उड़ाकर अथवा कचरे के डिब्बे में फेंक कर डीआरएम/फिरोजपुर ने मोटा माल कमाया। इसके कुछ उदाहरण भी दिए गए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार सीनियर डीसीएम/फिरोजपुर जब 4 फरवरी 2020 को पैटर्निटी लीव पर गए थे, उसके ठीक अगले दिन यानि 5 फरवरी 2020 को डीआरएम ने डीसीएम और एपीओ को अपने चेंबर में बुलाकर आदेश दिया कि तत्काल आज के आज ट्रांसफर लिस्ट तैयार की जाए।

इसके लिए मॉडल एसओपी के प्रावधान के अनुसार उक्त ट्रांसफर/पोस्टिंग की फाइल प्लेसमेंट कमेटी को भी नहीं भेजी गई। यही नहीं, ईसीआरसी कैडर के यह ट्रांसफर करके डीआरएम ने मॉडल एसओपी के उस प्रावधान का भी उल्लघंन किया, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि “डीआरएम/जेएजी अफसर को पूरा अधिकार (फुल पॉवर) होने के बावजूद, सभी ट्रांसफर प्लेसमेंट कमेटी की अनुशंसा/सिफारिश के अनुसार ही किए जाएंगे!”

“The Model SOP which require that even if the DRM or JAG officer has full powers, the transfers of the staff and officers are to be done as per the recommendation of the Placement Committee.”

आरोप है कि इन्हीं ट्रांसफर (पत्र सं.918-E/10/XVIII/2017/PIA, dtd. 06.02.2020) में डीआरएम/फिरोजपुर ने मोटा माल बनाया और उनके इसी कृत्य के बाद सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ पोस्टें डाली जाने लगीं।

उल्लेखनीय है कि यह यह सभी ट्रांसफर/पोस्टिंग जहां की तहां की गई और सबको मनचाही जगह प्राप्त हुई। जबकि 11 रिजर्वेशन सुपरवाइजर (आरएस-2) में से सिर्फ एक (राजकुमार) को छोड़कर, पुरुषोत्तम सिंह सहित बाकी सभी 10 लोगों को उनकी खुद की “रिक्वेस्ट” पर मनचाही पोस्टिंग मिल गई।

इसीलिए आरोपों में दम नजर आ रहा है। यूनियनें ने भी इस पोस्टिंग आर्डर पर अपना ठप्पा लगाकर इसका पर्याप्त श्रेय लूटने से पीछे नहीं रहीं, क्योंकि इस लूट में उनकी भी उसी तरह समान भागीदारी रही है, जिस तरह उनके संरक्षण में हर डिपो में लंबे समय से पदस्थ लोगों के माध्यम से रेल की लूट को अंजाम दिया जा रहा है।

इनमें से एक विशेष मामला अत्यंत विवादास्पद रेलकर्मी पुरुषोत्तम सिंह का है। वर्ष 2018 में उसके खिलाफ प्रशासन को मिली कदाचार की ढ़ेरों शिकायतों के बाद उसका ट्रांसफर प्रशासनिक आधार पर जम्मू से गुरदासपुर किया गया था। इसके अलावा वह जम्मू में पिछले 24 साल से लगातार पदस्थ था और भ्रष्ट यूनियन नेताओं से लेकर बड़ौदा हाउस में बैठे कुछ उच्च पदस्थ वाणिज्य अधिकारियों सहित राजनीतिक रूप से भी बहुत पहुंचा हुआ था। इसके अलावा वह कुछ गैरकानूनी व्यावसायिक गतिविधियों के लिए भी बदनाम था।

सीबीआई/जम्मू ने भी पुरुषोत्तम सिंह के विरुद्ध आय से अधिक संपत्ति रखने का मामला दर्ज किया था। इस सब के चलते उसने गुरदासपुर में ड्यूटी ज्वाइन नहीं की और यह कहकर खुले तौर पर रेल प्रशासन को चैलेंज किया कि “रेलवे में अब तक कोई माई का लाल पैदा नहीं हुआ जो उसे जम्मू एरिया से हटा सके!”

इसके बाद से वह लगातार लगभग एक साल तक ड्यूटी से नदारद रहा। इस बीच उसने न तो गुरदासपुर में ज्वाइन किया, और न ही प्रशासन को अपनी अनुपस्थिति के बारे में कोई सूचना देने की उसने जरूरत महसूस की। परिणामस्वरूप प्रशासन ने उसे रेलसेवा से बर्खास्त (रिमूव) कर दिया था।

परंतु अपीलेट अथॉरिटी (डीआरएम/फिरोजपुर) ने बिना उसकी किसी पृष्ठभूमि पर कोई विचार किए एक झटके में उसकी अपील स्वीकार कर ली और उसे ड्यूटी पर बहाल कर दिया, तथा उसकी पुरानी जगह जम्मू के नजदीक कटरा स्टेशन पर पदस्थ कर दिया। उसने तत्काल वहां जाकर ज्वाइन भी कर लिया। आरोप है कि अपने बचाव के लिए डीआरएम ने रीढ़हीन सीनियर डीपीओ से भी फाइल पर यह सिफारिश लिखा ली कि “संबंधित कर्मचारी को ड्यूटी पर लेने और कटरा में पोस्ट करने में कोई अड़चन नहीं है!”

अब पुरुषोत्तम सिंह को यह भी दावा करते हुए कुछ कर्मचारियों ने सुना है कि वह छह महीने के अंदर जम्मू में अपनी पोस्टिंग करवाकर दिखाएगा। इसीलिए यह चर्चा हो रही है कि उसने कटरा स्टेशन पर पोस्टिंग के लिए ही डीआरएम को पांच लाख रुपए दिए थे?

यहां तक कि अब यह भी कहा जा रहा है कि डीसीएम पर बहुत अधिक दबाव डाला गया, जबकि उसने फाइल पर यह बात दर्ज कर दी थी कि पुरुषोत्तम सिंह के ट्रांसफर पर विचार नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसका ट्रांसफर प्रशासनिक आधार पर गुरदासपुर किया गया था।

इसके अलावा, पुरुषोत्तम सिंह के खिलाफ विभागीय अनुशासनिक जांच (डीएंडएआर इंक्वायरी) अभी भी लंबित है। परंतु इसके बावजूद डीआरएम/फिरोजपुर, कटरा में उसकी पोस्टिंग के लिए अत्यंत उतावले थे, “क्योंकि पैसा बोल रहा था!” यह कहना है मंडल के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों का।

सामान्यतः, ऐसे विवादास्पद मामले प्रशासनिक क्लीयरेंस के लिए निश्चित तौर पर वाणिज्य विभाग या उस संबंधित विभागीय अधिकारी के पास भेजे जाते हैं, जो ट्रांसफर करता है, परंतु आरोप है कि चूंकि सीनियर डीपीओ, फिरोजपुर की इस पूरे मामले में डीआरएम के साथ पूरी मिलीभगत चल रही थी, इसीलिए उन्होंने फाइल पर यह रिमार्क दे दिया कि “संबंधित कर्मचारी (पुरुषोत्तम सिंह) को कटरा में पदस्थ करने में कोई प्रशासनिक अड़चन नहीं है।” जबकि सामान्यतः सीनियर डीपीओ यह क्लीयरेंस नहीं दे सकता है।

यह है पुरुषोत्तम सिंह का कच्चा चिट्ठा:-

Details of Purushottam Singh background

सीबीआई ने पुरुषोत्तम सिंह के विरुद्ध आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज किया था। इस मामले में उन्हें मेजर पेनाल्टी चार्जशीट (एसएफ-5) दी गई है और इसकी जांच उत्तर रेलवे विजिलेंस द्वारा की जा रही है।

CBI letter against Purshottam Singh

वह इस मामले में लगभग एक साल तक ड्यूटी से गायब रहे हैं। बताते हैं कि इसीलिए वह जांच से भागने और इसे लंबित करने की कोशिश में लगा हुआ है। ऐसी स्थिति के बावजूद डीआरएम ने उसे जम्मू के पास ही कटरा में पोस्टिंग दे दी। उस पूरे क्षेत्र में उसके प्रभाव को देखते हुए यह कहा जा रहा है कि वह अपने केस से संबंधित रिकार्ड और सबूत नष्ट करने में सफल हो सकता है, क्योंकि अब तो उसे मंडल के सर्वोच्च अधिकारी (डीआरएम) का भी वरदहस्त प्राप्त है।

Westage of Railway Revenue at Firozpur Division

उपरोक्त तमाम प्रकरण पर डीआरएम/फिरोजपुर राजेश अग्रवाल से जब उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो उनका स्पष्ट कहना था कि उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया है जो नियम के विपरीत हो। उनका कहना था कि किसी काम को अनावश्यक रूप से लंबे समय तक टालना उनके स्वभाव में नहीं है। उन्होंने वही किया, जो न्यायोचित था। उन्होंने कहा कि किसी स्टाफ के प्रति किसी अधिकारी का पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिए।

SOP which provides that any transfer can only be made by placement committee

इस पर जब उनसे यह पूछा गया कि पुरुषोत्तम सिंह के मामले में किसी अधिकारी का कोई पूर्वाग्रह कैसे हो सकता है, जबकि उसमें दो अधिकारियों ने निर्णय लिया था, एक ने ट्रांसफर किया तो दूसरे ने रिमूवल का निर्णय लिया था। कर्मचारी लंबे समय से अनुपस्थित था, उसने निर्धारित स्टेशन पर ज्वाइन नहीं किया, फिर उन्होंने बिना किसी पृष्ठभूमि की जांच किए कैसे उसे पुरानी जगह के नजदीक पदस्थ कर दिया? मॉडल एसओपी के प्रावधान का उल्लघंन और प्लेसमेंट कमेटी सहित ब्रांच अफसर के अधिकारों का भी आपने अतिक्रमण किया?

इस पर डीआरएम राजेश अग्रवाल का कहना था कि मंडल के सभी अधिकार डीआरएम में निहित हैं और जब ब्रांच अफसर नहीं हो अथवा वह काम नहीं कर रहा हो, तो डीआरएम यानि मंडल के सर्वोच्च अधिकारी को निर्णय लेना ही पड़ता है। इस पर जब उनसे यह कहा गया कि आरोप है आपने यह निर्णय पैसे के लेनदेन के आधार पर लिया, तो उनका कहना था कि ऐसे आरोपों का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि किसी को कोई आरोप लगाने या ऐसी चर्चा करने से रोका नहीं जा सकता।

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बहरहाल, सच्चाई जो भी हो, यह पूरा प्रकरण गंभीर जांच का विषय तो है ही, साथ में यह भी कहना पड़ेगा कि यदि रेलवे विजिलेंस सुशुप्तावस्था में न होता अथवा मुर्दा न पड़ा होता, तो इस तरह के मामले ही न होते या फिर एसओपी, प्लेसमेंट कमेटी और ब्रांच अधिकारियों के अधिकारों का अतिक्रमण करने से पहले उच्च अधिकारी सौ बार सोचते! उल्लेखनीय है कि यही सब कदाचार उत्तर रेलवे के अंबाला और दिल्ली मंडल सहित कई अन्य मंडलों में भी खुलेआम हो रहा है, तथापि रेलवे विजिलेंस और रेल प्रशासन चौतरफा रामराज्य मानकर निश्चिंत है। क्रमशः








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