पूरी भारतीय रेल में अब तक हजारों रेलकर्मी हुए कोरोना का शिकार, झूठे आंकड़े देकर झूठ बोलते रहे सीईओ/रे.बो.

झूठ बोलने में रेलवे बोर्ड का कोई सानी नहीं, सुनीत शर्मा, चेयरमैन/सीईओ/रे.बो. ने तोड़े अकर्मण्यता और अनिर्णय के सारे रिकॉर्ड

सुरेश त्रिपाठी

कोरोना महामारी के दूसरे चरण में पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल 314 लोको पायलट्स की मृत्यु का आंकड़ा सामने आया है। हालांकि यह अविश्वसनीय संख्या है, क्योंकि मौत के समाचार जिस गति से चल रहे हैं, उनको देखकर इस आंकड़े पर कोई भी रनिंग स्टाफ भरोसा नहीं कर पा रहा है।

रनिंग स्टाफ के कई वरिष्ठ सुपरवाइजरों का कहना है कि “वास्तव में यह आंकड़ा इससे भी ज्यादा है।” वे कहते हैं, “हॉस्पिटल में कोविड से हुई मौत बताया जाता है, परंतु जब डाटा उनके कार्यालय में आता है तो वही डेथ किसी अन्य कारण से हुई बताई जाती है। यह अत्यंत अविश्वसनीय है।”

स्टेशन मास्टर कैडर में भी अब तक 150 से ज्यादा मौतें कोविड संक्रमण के चलते हो चुकी हैं। पूरा कैडर जब रेल प्रशासन की अनमनस्कता के प्रति आक्रोशित हुआ और उचित ध्यान नहीं दिए जाने पर ड्यूटी न करने की चेतावनी दी, तब प्रशासन को होश आया और उसने उनके साथ वर्चुअल मीटिंग करके समस्या का समाधान करने की पहल हुई।

टिकट चेकिंग, टिकट बुकिंग, पार्सल, लगेज, आरक्षण इत्यादि कैडर्स, जो लगातार पब्लिक के संपर्क में रहते हैं, में भी काफी रेलकर्मी कोरोना का शिकार हुए हैं, परंतु उनके अधिकृत आंकड़े अब तक सामने नहीं आए हैं। तथापि उनकी मौतों के दु:खद समाचार लगातार आते रहते हैं।

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इस महामारी के दूसरे चरण में, जब उम्र का कोई बंधन नहीं रह गया, हर आयु-वर्ग के बहुत सारे रेलकर्मी और अधिकारी काल-कवलित हुए हैं। परंतु ऐसा लगता है कि रेल प्रशासन ने उनकी मौतों को अब तक भी गंभीरता से नहीं लिया है, बल्कि देखने में यही आया है कि उनकी मौत के आंकड़े छिपाने में और व्यवस्था को दिग्भ्रमित करने में रेलवे बोर्ड की ज्यादा रुचि रही है।

चेयरमैन/सीईओ/रेलवे बोर्ड ने झूठ बोला

यदि ऐसा नहीं होता, तो ओपन प्रेस कॉन्फ्रेंस में चेयरमैन सीईओ रेलवे बोर्ड झूठ नहीं बोलते, झूठे आंकड़े प्रस्तुत नहीं करते, मांगे जाने पर भी वह रेलकर्मियों-अधिकारियों की मौत के आंकड़े देने से इंकार नहीं करते!

यदि ऐसा नहीं होता, तो वे मार्च 2020 से दिए गए आंकड़ों का औचित्य सिद्ध करते और जनवरी 2021 से अब तक हुई रेलकर्मियों-अधिकारियों की मौत के आंकड़े शेयर करते! जो कि दिन-प्रतिदिन के हिसाब से रेलवे बोर्ड में संकलित होते हैं।

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जोनल रेलों के विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 1 मई 2021 को पूरी भारतीय रेल में कोरोना से संक्रमित रेलकर्मियों की कुल संख्या 1,15,358 थी। जबकि उसी दिन कोविड से मृत्यु को प्राप्त हुए रेलकर्मियों की कुल संख्या 1695 थी। इस एक दिन में कोविड का शिकार हुए गैर रेलकर्मियों अर्थात रेलकर्मियों के परिजनों एवं रेल अस्पतालों में भर्ती अन्य लोगों की मौत का कुल आंकड़ा 2761 था।

इससे पहले 18 अप्रैल 2021 के दिन पूरी भारतीय रेल में कोरोना से संक्रमित रेलकर्मियों की कुल संख्या 83,180 थी। जबकि उस दिन कोविड से मृत्यु को प्राप्त हुए रेलकर्मियों की कुल संख्या 979 थी और इस एक दिन में कोविड का शिकार हुए गैर रेलकर्मियों अर्थात रेलकर्मियों के परिजनों एवं रेल अस्पतालों में भर्ती अन्य लोगों की मौत का कुल आंकड़ा 1814 था।

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इस प्रकार यह पूरी तरह स्पष्ट है कि 11 मई के आसपास और उससे पहले हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीईओ रेलवे बोर्ड ने प्रेस के सामने साफ-साफ झूठ बोला था।

यहां तक कि जो लोग उनके द्वारा दिए गए आंकड़ों पर सवाल पूछना चाहते थे, उन्हें कुछ भी कहकर साइड लाइन कर दिया गया, परंतु उन्हें मार्च 2020 से दिए गए आंकड़ों का कोई औचित्य नहीं समझाया गया।

जबकि उपरोक्त आंकड़ों से स्पष्ट है कि सीईओ/रेलवे बोर्ड द्वारा मार्च 2020 से 10 मई 2021 तक 13 महीने 10 दिन के लिए बताए गए कुल आंकड़ों से यहां एक दिन का ही आंकड़ा अधिक है।

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यदि ऐसा नहीं था, तो “रेल समाचार” द्वारा 10 मई 2021 को चेयरमैन सीईओ/रेलवे बोर्ड सुनीत शर्मा से जब यह पूछा गया कि –

1. कृपया श्री प्रदीप कुमार, पूर्व मेंबर स्टाफ, रेलवे बोर्ड और वर्तमान मेंबर कैट, जो कि एनआरसीएच में भर्ती हैं और वेंटिलेटर पर हैं, की हेल्थ पोजीशन की अपडेट देने की कृपा करें।

2. रेल अस्पतालों को अपग्रेड करने और रेलकर्मियों को उचित स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने के लिए रेल प्रशासन द्वारा अब तक क्या किया गया?

3. वर्तमान में कितने रेलकर्मी और अधिकारी पूरी भारतीय रेल में कोरोना संक्रमित हैं?

4. पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल कितने रेलकर्मी और अधिकारी कोरोना से काल कवलित हुए हैं? कृपया रेलवे वाइज संख्या देने की कृपा करें।

5. पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल कितने रेलकर्मियों और अधिकारियों का वैक्सीनेशन हो चुका है? कृपया रेलवे वाइज संख्या प्रदान करने की कृपा करें।

6. क्या रेलकर्मियों और अधिकारियों तथा उनके परिजनों को अलग से अथवा सीधे वैक्सीन मुहैया कराने की व्यवस्था नहीं की जा सकती? यदि हां, तो इसके लिए रेल मंत्रालय क्या उपाय कर रहा है? यदि नहीं, तो इसमें समस्या क्या है? कृपया बताने का प्रयास करें।

यह नहीं, 12 मई 2021 को, सीईओ रेलवे बोर्ड की प्रेस कॉन्फ्रेंस के एक दिन बाद भी उन्हें रिमाइंड करते हुए “रेल समाचार” द्वारा पूछा गया था कि –

Resp. Sharma ji, kindly share latest daily “ZONE WISE COVID PREPAREDNESS REPORT-2021” on Indian Railways.

उपरोक्त में से किसी भी तथ्य का कोई स्पष्टीकरण अथवा कोई जवाब अब तक चेयरमैन/सीईओ/रेलवे बोर्ड की तरफ से नहीं आया है।

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“जान है तो जहान है” के सिद्धांत पर जब रेल प्रशासन को अपनी वर्क फोर्स का जीवन बचाना चाहिए था, तब वह झूठ और फरेब का सहारा लेकर केवल ऑक्सीजन एक्सप्रेस चलाने के लिए अपनी पीठ थपथपा रहा है।

हालांकि जनता को भी उसके गंतव्य पर पहुंचाकर सेवा कार्य भी इस संकटकाल में जरूरी है। तथापि झूठ बोलना कतई जरूरी नहीं है। यह वैश्विक महामारी है, इस पर आदमी का कोई वश नहीं है। इसके लिए केवल सावधानियां ही बरती जा सकती हैं।

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अतः पब्लिक के संपर्क में आने वाले रेलकर्मियों को सुरक्षा उपकरणों की आपूर्ति सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके अलावा उम्र और किसी बीमारी से ग्रस्त कर्मचारियों को जनसंपर्क से दूर रखने की यथासंभव कोशिश करते हुए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

“रेल समाचार”, रेल प्रशासन की अकर्मण्यता के कारण अब तक अकाल काल-कवलित हुए सभी रेलकर्मियों को विनम्र श्रृद्धांजलि अर्पित करता है और संक्रमित हुए कर्मचारियों के शीध्र स्वस्थ होने की कामना करता है।

ट्रेन की गति से ढ़हा चांदनी रेलवे स्टेशन:





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दो लाख करोड़ का पैकेज, आम आदमी और कोरोना – RailSamachar

सरकार से त्राहि माम् कर रहा आम आदमी

भारत में आदमी बाहर से कम अपने दिमाग से ज्यादा बीमार है। कोरोना नामक यह बीमारी मौका देखकर आई है। यकीन नहीं आता न ! तो देखिए, जब से कोरोना आया है, तब से दूसरी बीमारियां गायब हो गई हैं। घबराहट में डॉक्टरों ने अपने नर्सिंग होम बंद कर दिए, तब भी कोई फर्क नहीं पड़ा, आदमी फिर भी जिंदा है, क्या इतना काफी नहीं इस सत्यापन के लिए कि बीमारी आदमी के दिमाग में होती है।

भारत का सबसे सुसंगठित लुटेरा तंत्र प्राइवेट अस्पतालों का है। जिन अस्पतालों में बीमारों की भीड़ लगी रहती थी, उनके महीनों बंद होने पर भी आदमी सुरक्षित बना रहा। यानि जबरदस्ती बीमार बनाने का जरिया हैं प्राइवेट हॉस्पिटल !

डॉक्टरों ने अपने अस्पताल बंद क्यों कर दिए? कोरोना से डरकर? बिल्कुल नहीं? वे इस बात से डरे थे कि इस वैश्विक बीमारी का इलाज बिल्कुल संभव है, सरकार हमसे मुफ्त में इसका इलाज करने को कहेगी। इसीलिए सभी प्राइवेट अस्पतालों के संचालक खुद अंडर ग्राउंड हो गए, यानि स्वतः क्वॉरेंटाइन हो गए थे। 14 दिन? नहीं, 21 दिन? नहीं, फिर..

फिर क्या, वे सभी तब तक क्वारंटाइन रहे, जब तक कि सरकारी मशीनरी ने उनको आश्वस्त नहीं कर दिया कि “भाई हम खुद दो लाख करोड़ लूटने के प्लान में लगे हैं, तो तुमको परोपकार करने को कैसे कह सकते हैं!”

“पहले तो यह समझ लो कि यह दुनिया की सबसे सस्ते में ठीक होने वाली बीमारी है, जो गर्म पानी पीने, उसके गरारे करने, हल्दी का दूध पीने, अदरक-लहसुन की चटनी खाने, आयुष के द्वारा सुझाया गया काढ़ा पीने से ठीक हो जाती है। इसमें इलाज करने जैसा कुछ नहीं है।”

“हमको तो पेशेंट को अपना मेहमान बना कर रखना है। वह अपने आप ठीक हो जाएगा, तो उसे छोड़ दो और उससे ₹2,00,000 से ₹3,00,000 वसूल लो। इसके लिए लैब, स्कैनिंग सेंटर सभी को अपना हिस्सेदार बनाना लो।”

“अभी तक स्कैनिंग सेंटर एवं लैब से तुम्हारे पास 40 परसेंट का हिस्सा आता था, अब उल्टा तुमको उन्हें हिस्सा देना होगा। सर्दी, जुखाम, सिरदर्द, बुखार या अन्य किसी भी बीमारी से आए मरीज को कोरोना संक्रमित/पॉजिटिव बताओ और उनसे, यानि मरीज की हैसियत से भी ज्यादा फीस वसूली करो।”

इतना आश्वासन मिलते ही धड़ाधड़ सारे प्राइवेट अस्पताल खुल गए, जो कल तक कोरोना पेशेंट नहीं ले रहे थे, वे आज केवल और केवल कोरोना पेशेंट ही भर्ती कर रहे हैं। बिना मेहनत बिना इलाज किए 5 से 8 दिन बिस्तर पर सुलाने की 2-3 लाख यानी सेवन स्टार फीस किसे बुरी लगेगी?

अब स्थिति यह बन गई है कि अन्य बीमारी से ग्रसित पेशेंट को कोई भी अस्पताल भर्ती नहीं कर रहा है। बीमार लोग दर-दर भटक रहे हैं। लोग कोविड से नहीं, बल्कि डॉक्टर की लापरवाही के चलते और उचित इलाज न मिलने के कारण अन्य बीमारियों से मर रहे हैं। मगर मौत की गिनती कोविड के नाम पर की जा रही है। यह कितना बड़ा अमानवीय कृत्य है?

यह सिलसिला तब तक चलेगा, जब तक कि दो लाख करोड़ सभी में नहीं बंट जाएंगे। आज सामान्य आदमी की जान तमाशा बनकर रह गई है। इस नौटंकी का कब अंत होगा, होगा भी कि नहीं, ईश्वर ही जानें!

भारतीय जनमानस बड़ी उम्मीद लगाए बैठा था कि उसको हमारे जैसे आम आदमी का नेतृत्व मिला है। शाही खानदानी लोग शायद जनमानस की वास्तविक स्थिति को नहीं समझ पा रहे थे। इनके आते ही जनसामान्य ने सोचा अब तो हमारे प्रधानमंत्री हमें समझेंगे भी और हमारा उद्धार भी करेंगे।

परंतु स्थिति विपरीत निकली, “न खाउंगा, न खाने दूंगा” की बात ऐसी सच हो रही है कि लोग दाने-दाने को मोहताज हो रहे हैं। उद्योग धंधे चौपट हो गए हैं, लोगों का रोजगार छिन गया है, एक जून की रोटी मिलना मुश्किल हो गया है, घरों में खाने के लाले पड़े हैं। ऊपर से थोड़ा भी बीमार हो गए, तो कोविड पेशेंट बताकर लाखों की लुटाई। आखिर आम आदमी करे तो क्या करे?

जैसा कि प्रधानमंत्री ने कहा था कि कोरोना को अवसर में बदलना है, कोविड-१९ भारत के लुटेरों के लिए बहुत बड़ा वरदान साबित हो रहा है। सैनिटाइजर, मास्क के नाम पर बाजार में खुली लूट मची हुई है। इस लूट तंत्र द्वारा सच में कोरोना को अवसर में बदल दिया गया है।

सर्वसामान्य आदमी अब सरकार से त्राहि माम् कर रहा है और उससे अपेक्षा कर रहा है कि भगवान के लिए अब तो आंखें खोलिए सरकार, कसाई से भी बदतर इन प्राइवेट अस्पतालों, नर्सिंग होम्स तथा दूकानदारों की लूट पर केवल काबू पाने से काम नहीं चलेगा, अपितु इनको ऐसा सबक दिया जाए, जो सभी के लिए एक सबक साबित हो ! 





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सैकड़ों रेलकर्मी हो रहे हैं कोरोना संक्रमित, परंतु रेल प्रशासन को नहीं है उनके मरने-जीने की कोई परवाह!

मुंबई, दिल्ली और चेन्नई, तीनों महानगरों में कार्यरत रेलकर्मियों को है कोरोना संक्रमण का ज्यादा खतरा

सुरेश त्रिपाठी

यह सर्वविदित है कि मुंबई महानगर कोरोना वायरस की महामारी से बुरी तरह जूझ रहा है। दिन प्रति प्रतिदिन इसके मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। फिलहाल निकट भविष्य में इनके नियंत्रण की कोई उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है। तथापि मजबूरीवश राज्य सरकार को सीमित लॉकडाउन के चलते भी कामकाजी गतिविधियां शुरू करनी पड़ रही हैं। इस हेतु अब राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए उसके कहने और टिकट भाड़ा वहन करने पर सोमवार, 15 जून से मध्य एवं पश्चिम रेलवे को सीमित लोकल ट्रेनों की भी शुरुआत करनी पड़ी है।

यह सही है कि किसी महामारी अथवा किन्हीं विपरीत परिस्थितियों के कारण तमाम कामकाजी और व्यावसायिक गतिविधियां लंबे समय तक रोककर नहीं रखी जा सकतीं। तथापि फील्ड में बड़ी संख्या में कार्यरत अपने कर्मचारियों के लिए उनसे बचाव के हरसंभव उपाय अवश्य अपनाए जा सकते हैं, क्योंकि तमाम नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों ने तो अपने बचाव के सभी संभव उपाय कर लिए हैं, यही कारण है कि एकाध अपवाद को छोड़कर इनमें से कोई भी इस महामारी से ज्यादा प्रभावित होता नजर नहीं आया। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं है कि कर्मचारियों के मामले में राज्य सरकार और रेल प्रशासन दोनों प्राधिकारों द्वारा भारी कोताही बरती जा रही है।

Railway workers are waiting for workman special at platform without maintaining any physical distancing

अब जहां तक रेलकर्मियों की बात है, तो ऐसा लगता है जैसे कि उनका कोई माई-बाप ही नहीं रह गया है और उन्हें इस महामारी से निपटने तथा काम करने के लिए भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। भले ही रेलवे द्वारा इस महामारी से मरने और संक्रमित होने वाले रेलकर्मियों का एकीकृत आंकड़ा जारी नहीं किया जा रहा है, परंतु एक अनुमान के अनुसार रेलवे में कार्यरत सैकड़ों कर्मचारियों की मौत हो चुकी है। हर दिन दो-चार-दस की संख्या में ऐसी मौतें होने की खबरें किसी न किसी जोनल रेलवे से आ रही हैं। तथापि जोनो/मंडलों में इन असामयिक मौतों को लेकर कोई चिंता है, ऐसा नहीं लगता!

इस महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित रेलवे का फील्ड स्टाफ हो रहा है, जिनमें टीटीई, लोको पायलट्स, गार्ड्स, ट्रैक मेनटेनर, सिग्नल मेनटेनर, कमर्शियल एवं ट्रैफिक स्टाफ प्रमुख रूप से शामिल है। इसके अलावा ऑफिस स्टाफ भी इसलिए प्रभावित हो रहा है, क्योंकि वहां भी काम करते हुए फिजिकल डिस्टेंसिंग नियमों का पर्याप्त रूप से पालन करना संभव नहीं हो पा रहा है, क्योंकि निर्देशित 20% स्टाफ के बजाय लगभग पूरे ऑफिस स्टाफ को जबरन ड्यूटी पर बुलाया जा रहा है। इस सब के लिए अधिकारियों की प्रशासनिक एवं अनुशासनिक दादागीरी और मनमानी भी जिम्मेदार है।

उदाहरण स्वरुप पश्चिम रेलवे के वसई स्टेशन पर पिछले हफ्ते चार रेलकर्मियों को कोरोना संक्रमित पाया गया था। इसके लिए उन्हें इलाज हेतु भेजने के बाद पता चला कि उन चारों के संपर्क में करीब 45-46 जो अन्य रेलकर्मी भी आए थे, उन्हें नियमानुसार 14 दिन के लिए होम कोरेंटीन की एडवाइस की गई थी और पूरा वसई स्टेशन बंद कर दिया गया था। परंतु अभी उनका यह निर्धारित पीरियड पूरा भी नहीं हुआ था कि राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए सोमवार, 15 जून से लोकल शुरू होते ही उन सभी को फौरन ड्यूटी पर पहुंचने का आदेश मुंबई सेंट्रल मंडल के संबंधित वाणिज्य अधिकारी द्वारा दनदना दिया गया।

इसी तरह पश्चिम रेलवे के ही सूरत रेलवे स्टेशन पर एक चीफ टिकट इंस्पेक्टर (सीटीआई) के 2 जून को कोरोना पॉजिटिव, जिसकी जांच रिपोर्ट 12 जून को मिली, पाए जाने के बाद वहां के 21-22 स्टाफ को होम कोरेंटीन किया गया था। इनमें दो एडीआरएम और एक डीसीएम जैसे बड़े अधिकारी भी शामिल थे। यह सभी लोग उक्त सीटीआई के संपर्क में आए थे। इसी प्रकार उधना रेलवे स्टेशन पर भी एक बुकिंग क्लर्क को पॉजिटिव पाए जाने पर वहां के स्टेशन स्टाफ को भी आइसोलेट किया गया।

वसई और सूरत के मामलों में मंडल अधिकारियों द्वारा बरती गई लापरवाही तथा मनमानी का विरोध दोनों यूनियनों (डब्ल्यूआरएमएस/डब्ल्यूआरईयू) के मंडल एवं मुख्यालय पदाधिकारियों द्वारा किया गया है, परंतु उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई, क्योंकि किसी की भी नहीं सुनने का जैसा रवैया केंद्र सरकार ने अपना रखा है, वैसा ही रवैया केंद्र सरकार के अधिकारियों ने भी लंबे समय से अपनाया हुआ है। नतीजा यह है कि कोई भी कितना ही चिल्लाता रहे, किसी की कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

इसके अलावा दक्षिण रेलवे, उत्तर रेलवे की स्थिति भी काफी डरावनी है। पिछले हफ्ते दक्षिण रेलवे के पेरंबूर, चेन्नई स्थित प्रमुख रेलवे अस्पताल में एक साथ बीस रेलकर्मियों की मौत की खबर स्थानीय अंग्रेजी दैनिक में प्रकाशित हुई थी। इसी तरह उत्तर रेलवे मुख्यालय बड़ौदा हाउस और भारतीय रेल के मुख्यालय “रेल भवन” में भी कई अधिकारी और कर्मचारी इस महामारी से प्रभावित हो चुके हैं। उत्तर रेलवे के सेंट्रल हॉस्पिटल की दुर्गति, कोविद केसेस की जांचों में कमीशनखोरी और एमडी को जनरल प्रैक्टिस में भेजे जाने के बाद पुनः उसी पद पर उनकी पुनर्नियुक्ति में रेल प्रशासन की पूरी मनमानी भी सामने आ चुकी है।

अन्य जोनल रेलों में भी उपरोक्त से स्थिति अलग नहीं है। मगर मुंबई, दिल्ली और चेन्नई में जो हालत चल रही है, उसको देखते हुए इन तीनों महानगरों में कार्यरत अधिकांश रेलकर्मियों को संक्रमण का खतरा ज्यादा है। अतः यदि सेफ और सिक्योर वर्किंग सुनिश्चित करनी है, तो रेल प्रशासन को अपने कर्मचारियों के लिए इस महामारी से बचाव के पर्याप्त इंतजाम करने के साथ ही केंद्रीय गृहमंत्रालय द्वारा जारी की गई नियमावली का अक्षरशः पालन करवाना भी सुनिश्चित करना होगा।

Chief Typist of SrDOM/G office, Mumbai Division, Central Railway, B. R. Damse expired on Monday, 15th June morning at Kalyan Railway hospital. He was admitted in Kalyan Railway Hospital on Sunday, 14th June of breathlessness. As per Doctors of Kalyan Railway Hospital, a case of suspected Covid. As per sources, he last attended office on 5/6/2020. Entire SrDOM office is being fully sanitised on Monday. The Office was Last sanitised on 12/6/2020.

“It is come to know that a vacant building, behind building no.8 is handed over to BMC for covid-19 patients, if it is true we all have to protest against it, to save containment of our Mazgaon Railway colony”, this message viral on social media on Saturday-Sunday in between employee and officers who resides at Mazgoan Railway colony.








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देश की लाइफलाइन – भारतीय रेल – को “कोरोना अवसर” ने स्वार्थ और मंसूबों के लिए निगल लिया!

केंद्र सरकार और रेल मंत्रालय दोनों इस समय साँप-सीढ़ी का खेल खेल रहे हैं। पहले विभिन प्रदेशों में फंसे श्रमिकों को उनके गृह प्रदेश पहुंचाने का खेल श्रमिक स्पेशल चलाकर खेला गया और अब फिर से उन्हें उनके गृह प्रदेश से रोजी-रोटी कमाने के लिए अन्य प्रदेशों में वापस भेजने का खेल चालू हो गया है।

अब तो लूडो का गेम बनाने वाला भी घनचक्कर हो गया है कि उससे भी बुद्धिमान कौन आ गया! सकारात्मक सोच रखने वाले खासकर सत्ताधीश लोग कोरोना को अवसर के रूप में प्रचारित कर रहे थे। शायद उनकी बात को किसी ने सही ढंग से जज नहीं किया।

सरकार सबसे पहले इस अवसर को रेल का दिवाला करके उसे बेपटरी करके ही भुनायेगी। कर्मचारी हैरान और परेशान हैं कि आखिर रेल में हो क्या रहा है??

नियमित गाड़ी नहीं चलेगी, लेकिन उसी के नाम और शेड्यूल पर स्पेशल चलाएंगे। रेल कर्मचारी इतनी गफलत में आ गए हैं कि उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि उन्हें करना क्या है??

Vinod Kumar Yadav, Chairman, Railway Board

धन्य हो प्रशासक और नीति-नियंता ! देश की लाइफ लाइन कही जाने वाली भारतीय रेल को तथाकथित कोरोना नामक अवसर ने अपने स्वार्थ और मंसूबों को पूरा करने के लिए लील लिया !!








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लापरवाह एएनओ के कुप्रबंधन से एनआरसीएच की कई नर्सें हुईं कोरोना संक्रमित

स्टाफ करता है सप्ताह में 72 घंटे की ड्यूटी, एएनओ और उसके चहेते करते हैं सिर्फ 24 घंटे की साप्ताहिक ड्यूटी, एनआरसीएच में एचओईआर के समस्त नियम-निर्देश हैं ताक पर

उत्तर रेलवे सेंट्रल हॉस्पिटल (एनआरसीएच) की कई नर्सें कोरोना संक्रमित हो हैं। उन्हें फिलहाल होम कोरंटाइन किया गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार इन नर्सों की यह हालत लापरवाह और एरोगेंट असिसटेंट नर्सिंग ऑफिसर/मैन पॉवर प्लानिंग (एएनओ/एमपीपी) की मनमानी तथा कुप्रबंधन के कारण हुई है।

पता चला है कि एनआरसीएच में एएनओ की मनमानी के चलते नर्सों एवं अन्य पैरामेडिकल स्टाफ से अनावश्यक रूप से 12-12 घंटे की ड्यूटी करवाई जा रही है। इस दौरान सभी नर्सों को लगातार पीपीई पहने रहना पड़ता है।

इसके अलावा एएनओ द्वारा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों की पूरी तरह से अनदेखी तथा अवहेलना करके एनआरसीएच के समस्त स्टाफ को एकसाथ ड्यूटी पर बुलाया जाता है। इसीलिए स्टाफ का एक-दूसरे के साथ अधिकतम संपर्क हो रहा है।

एनआरसीएच के सूत्रों का कहना है कि ऑपरेशन थिएटर (ओटी) में कार्यरत समस्त नर्सिंग स्टाफ को भी एकसाथ ड्यूटी पर बुलाया जा रहा था। इसी वजह से उनमें से कोई एक-दो स्टाफ बाहर से संक्रमित होकर आया होगा, जिसके निकट संपर्क में आने के कारण बाकी स्टाफ भी संक्रमित हुआ।

स्टाफ का कहना है कि चूंकि बाहर से संक्रमित होकर आया स्टाफ दो-तीन दिनों तक आराम से ड्यूटी कर रहा था, इसलिए उसके संपर्क में आईं ओटी की 6 नर्सें भी संक्रमित पाई गई हैं, जिनको फिलहाल होम कोरंटाइन किया गया है।

समस्त नर्सिंग स्टाफ का कहना है कि एनआरसीएच में उनसे 12-12 घंटों की ड्यूटी करवाकर उनका भयानक शोषण किया जा रहा है और रेलवे की कोई सक्षम अथॉरिटी उनकी कोई समस्या सुनने-समझने को तैयार नहीं है।

उनका कहना है कि एरोगेंट एएनओ और उसका खास चापलूस स्टाफ सुबह 8 बजे से शाम को 4 बजे तक की ही ड्यूटी करता है, वह भी सप्ताह में सिर्फ 3 दिन। इस तरह एएनओ और उसके खास चहेते साप्ताहिक सिर्फ 24 घंटे की ही नौकरी कर रहे हैं।

जबकि वहीं अन्य स्टाफ से – नॉन-कोविद में ३६ घंटे और कोविद वार्ड एवं ओपीडी में 72 घंटे – की ड्यूटी ली जा रही है। यानि अन्य स्टाफ से 14 दिन की ड्यूटी, वह भी लगातार 12-12 घंटे की!

स्टाफ का कहना है कि एनआरसीएच में एचओईआर के नियमों-निर्देशों का किसी भी स्तर पर किसी भी तरह से अनुपालन नहीं किया जा रहा है। यहां सीनियर डॉक्टर सिर्फ अपने केबिन में बैठकर हवा-हवाई निर्णय लेते हैं, जबकि जमीन पर स्टाफ की जो परेशानियां हैं, भौतिक समस्याएं हैं और अन्य जो वास्तविकताएं हैं, उनका सामना कोई नहीं करना चाहता।

प्राप्त ताजा जानकारी के अनुसार अब जब कई नर्सें कोरोना संक्रमित हो चुकी हैं, और इससे हॉस्पिटल की भी काफी बदनामी हो रही है, तथा यह बात केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय सहित कोविद ग्रुप के भी संज्ञान में आ चुकी है, तब रेल प्रशासन को कुछ होश आ रहा है, क्योंकि उसको स्थिति सुधारने तथा उस पर पूरा नियंत्रण करने के लिए सख्ती से कहा गया है।








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जब हम कोरोना से लड़ते हुए देश सेवा में लगे थे, तब सरकार हमारी पीठ पर खंजर घोंप रही थी -शिवगोपाल मिश्रा

यह समय चुनौतीपूर्ण है, इसलिए हमें कोरोना से डरकर नहीं, लड़कर यूनियन का काम करना होगा -महामंत्री

एनआरएमयू, लखनऊ मंडल की समीक्षा बैठक संपन्न

नई दिल्ली: नार्दर्न रेलवे मेंस यूनियन, लखनऊ मंडल की समीक्षा बैठक शनिवार, 30 मई को संपन्न हुई। बैठक में महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने कहा कि ये वक्त चुनौतीपूर्ण है, इसलिए हमें कोरोना से डरकर नहीं, लड़कर यूनियन का काम करना होगा। उन्होंने कहा कि ये सही है कि कोरोना के चलते चौतरफा दहशत का माहौल है। फिर ये जल्दी खत्म होने वाला भी नहीं है। ऐसे में हम सब घर तो नहीं बैठ सकते है। परंतु सावधानी के साथ अपना काम भी करना है और यूनियन की गतिविधियों को भी जारी रखना है।

वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए लखनऊ मंडल की समीक्षा बैठक में महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने सभी मामलों पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि लॉकडाउन के बावजूद रेलकर्मचारी पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ ट्रेनों का संचालन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन से जब पूरा देश ठप हो गया, लोग घरों में बैठ रह गए, तब देशवासियों की चिंता रेलकर्मियों ने की, क्योंकि अगर इस दहशत के माहौल में मालगाडियों और पार्सल ट्रेनों का संचालन न होता, तो कई राज्यों में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति ठप हो जाती।

उन्होंने कहा कि रेलकर्मचारियों ने मालगाड़ियों, पार्सल ट्रेनों का संचालन कर अनाज, फल, सब्जी, दूध की ही आपूर्ति को नहीं, बल्कि अन्य जरूरी सामानों की भी किसी राज्य में कमी नहीं होने दी। जब राज्य सरकारें मजदूरों को उनके घर पहुंचाने में नाकाम साबित हुईं, तो फिर किसी तरह की चिंता किए बगैर हजारों ट्रेनों के जरिए 50 लाख से ज्यादा मजदूरों को उनके घर रेलकर्मियों ने ही पहुंचाया।

महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि जब हम कोरोना से लड़ते हुए देश की सेवा कर रहे थे, तब हमारी सरकार हमारी पीठ थपथपाने के बजाय हमारी पीठ पर हमला कर रही थी। उस दौरान सरकार श्रमिक विरोधी काम करते हुए कर्मचारियों को मिल रही सुविधाओं में कटौती करने की साजिश में जुट गई। उन्होंने कहा कि एक तरफ तो रेलकर्मचारियों ने बिना मांगे पीएम केयर फंड में 151 करोड़ रुपये का योगदान दिया, तो दूसरी तरफ सरकार ने हमारी पीठ पर खंजर घोंपा। वह हमसे कहते तो हम कुछ और भी मदद करते, लेकिन ऐसा न करके सरकार ने डीए फ्रीज करने का एकतरफा फैसला सुना दिया।

उन्होंने कहा कि एआईआरएफ और एनआरएमयू का इतिहास है कि हमने कभी किसी भी सरकार की मनमानी नहीं चलने दी। हमने कर्मचारी हितों के साथ कभी समझौता नहीं किया। इसलिए इस मामले पर फेडरेशन ने अपना रुख साफ कर दिया कि सरकार की ये चालबाजी हमें मंजूर नहीं है।

महामंत्री ने कहा कि फिलहाल तो डीए को फ्रीज करने का मामला हो, या  फिर पदों को खत्म करने की बात हो, पुरानी पेंशन की बहाली समेत अन्य दूसरे मुद्दों पर एनआरएमयू और फेडरेशन लगातार सरकार के संपर्क में रहकर अपना विरोध जताती रही है। जब देखा गया कि इस सबके बाद भी सरकार का रवैया कर्मचारियों के खिलाफ ही है, तो एआईआरएफ की स्टैंडिग कमेटी की बैठक में संघर्ष का निर्णय लिया गया।

उन्होंने कहा कि इसी क्रम में एक से छह जून तक तो हम राष्ट्रीय स्तर पर जनजागरण करेंगे और आठ जून को काला दिवस मनाने के लिए काली पट्टी बांधकर काम करेंगे। इसके बाद भी अगर हमारी बात नहीं सुनी जाती है, तो आगे की रणनीति पर विचार किया जाएगा।

उन्होंने दोहराया कि अगर सरकार को बैकफुट पर लाना है, तो हमें निचले स्तर पर गर्मी पैदा करनी होगी। इसके बिना काम चलने वाला नहीं है। महामंत्री ने कहा कि इन हालात में हमें कोरोना से डरकर घर नहीं बैठ जाना है, बल्कि कोरोना से भी लड़कर सरकार का भी मुकाबला करने को तैयार रहना है।

महामंत्री ने संगठन की समीक्षा बैठक में लखनऊ मंडल की तारीफ की और कहा कि मेंबरशिप का मामला हो या फिर केंद्र से निर्धारित किए गए कार्यक्रम हों, हर मामले में लखनऊ मंडल का प्रदर्शन बेहतर रहा है। उन्होंने युवाओं को संगठित करने पर जोर दिया। संगठन में दो शाखाओं के चुनाव भी होने हैं, लिहाजा सभी शाखा सचिव अपना  इलेक्टोरल तैयार कर केंद्र को भेज दें, ताकि आगे की कार्रवाई की जा सके।

केंद्रीय अध्यक्ष एस. के. त्यागी ने लखनऊ मंडल के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि अभी तो देख रहा हूं कि कोरोना का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, इसलिए सावधानी  बरतनी होगी, क्योंकि  इसकी चपेट में कुछ रेलकर्मचारी भी आ गए हैं, लिहाजा रेल भवन ही नहीं बड़ौदा हाउस को भी बंद करना पड़ा है। उन्होंने कहा कि रेलकर्मियों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। सरकार ने हमें कोरोना वारियर्स तो माना, लेकिन दूसरे विभागों की तरह हमें किसी तरह की सहूलियत नहीं दी। इससे रेल कर्मचारियों में रोष होना स्वाभाविक है। आने वाला समय काफी चुनौतीपूर्ण है, इसलिए हमें काम के साथ अपनी सुरक्षा का भी पूरा ख्याल खुद ही रखना होगा।

केंद्रीय उपाध्यक्ष प्रवीना सिंह ने कहा कि लखनऊ मंडल विपरीत हालात में भी अच्छी मेंबरशिप की है। इसके लिए पूरी टीम बधाई की पात्र है। उन्होंने कहा कि मंडल  में महिला संयोजक के रिटायर होने के बाद ये पद रिक्त है, इस पर अगर जल्दी नियुक्ति हो जाए तो महिलाओं को संगठित करने में और सुविधा होगी।

नेशनल यूथ कन्वीनर प्रीति सिंह ने मंडल में युवाओं के बीच हुए कार्यों पर चर्चा की। इस कांफ्रेंस को केंद्रीय उपाध्यक्ष एस. यू. शाह, कोषाध्यक्ष जोनल यूथ कन्वीनर मनोज श्रीवास्तव ने भी संबोधित किया।

मंडल अध्यक्ष राजेश सिंह ने कहा कि ये सही है कि कोरोना की वजह से हमारे संगठन के कार्यों पर थोड़ा असर पड़ा, लेकिन जब हम सब ने देखा कि महामंत्री खुद इतनी देर तक काम कर रहे हैं, रोज आफिस आ रहे हैं, तो अपने लोगों ने भी संगठन के काम में कोई कोताही नहीं की और अपना प्रदर्शन बेहतर किया। उन्होंने कहा कि हमारी तैयारी है और जल्दी शाखास्तर पर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए कार्यक्रम को आगे बढ़ाया जाएगा।

मंडल मंत्री आर. के. पांडेय ने संगठन के कार्यों की विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि कोरोना के दौरान हमारे साथियों ने तमाम सामाजिक कार्यों में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। हम लोगों ने भूखे मजदूरों को श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में खाने के पैकेट का वितरण किया, लगेज पोर्टरों की मुश्किल घड़ी में मदद की गई। ऐप बेस्ट ट्रांसपोर्टर्स को भी राहत सामग्री का वितरण किया गया।

उन्होंने कहा कि इस दौरान कुछ रेलकर्मियों की भी कुछ समस्याएं रहीं, उनका भी समाधान किया गया। कई मसलों में केंद्रीय नेतृत्व से भी काफी मदद मिली, जिससे हम ये सब कर पाने में कामयाब हुए। उन्होंने आश्वस्त किया एक से छह जून के बीच जनजागरण अभियान के तहत हमारी तैयारी पूरी है और हम बेहतर प्रदर्शन करेंगे। इसके  अलावा आठ जून को हर कर्मचारी काली पट्टी जरूर बांधेगा, इसकी तैयारी की जा चुकी है।

कांफ्रेंस में सेवानिवृत्त हो रहे सहायक मंडलमंत्री घनश्याम पांडेय के कार्यों की भी सराहना की गई। इस दौरान मीटिंग को मुख्य रूप से राकेश कनौजिया, सुधीर तिवारी, एस. के. सिंह, रंजन सिह, संजय श्रीवास्तव, सुनिल सिंह, धीरेन्द्र सिंह, बिंदा प्रसाद, राकेश कुमार पांडेय, मदन गोपाल मिश्रा, राजकुमार, हीरा लाल और अजय श्रीवास्तव ने भी संबोधित किया।

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किसी का फेवर करना कोई मेंबर ट्रैफिक और सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड से सीखे!

भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था की बात कोरी बकवास है – जुगाड़ है, तो सब कुछ संभव है!

एक मजाक बनकर रह गई है 10-15 साल वाली रेलवे बोर्ड और रेलमंत्री की ट्रांसफर नीति

Suresh Tripathi

किसी अधिकारी या कर्मचारी को यदि सारी लाज-शरम छोड़कर फेवर करना हो, तो वह जाकर मेंबर ट्रैफिक और सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड सह एडीशनल मेंबर ट्रैफिक का शागिर्द बन जाए, क्योंकि इन दोनों अधिकारियों की अब तक की जो गतिविधियां रही हैं, उनके मद्देनजर यह बात सही साबित होती है। स्थिति यह है कि मेंबर ट्रैफिक ने एक विवादास्पद अधिकारी को अनावश्यक फेवर करके कम से कम रिटायरमेंट तक तो अपने लिए “फ्री-सोमरस आपूर्ति” का पुनः बंदोबस्त कर लिया है, क्योंकि उनके जीएम/द.पू.रे. रहते हुए भी वही उनकी आपूर्ति का सबसे बड़ा माध्यम था, ऐसा बताया गया है!

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ज्ञातव्य है कि मंगलवार, 19 मई 2020 को दोपहर बाद करीब पांच बजे रेलवे बोर्ड से मनोज कुमार का प्रमोशन/पोस्टिंग ऑर्डर निकला, उन्हें डायरेक्टर/रेल मूवमेंट, कोलकाता से उठाकर वहीं दक्षिण पूर्व रेलवे में अस्वाभाविक रूप से सीएफटीएम के पद पर पदस्थ किया गया, जो कि सभी अधिकारियों के लिए अत्यंत आश्चर्यजनक था, क्योंकि किसी को भी यह उम्मीद नहीं थी कि इतने विवादास्पद और जूनियर अधिकारी की पहली पोस्टिंग ही सीएफटीएम में हो सकती है। जबकि वहीं उससे कई बैच सीनियर और सक्षम अधिकारी बैठे हुए हैं तथा वहीं उसे बैठाया जा सकता है जहां वह कई साल लगातार बतौर डिप्टी सीओएम रहकर अपने सीनियर्स की जड़ें खोदता रहा था। ऐसे अधिकारी का मेंबर ट्रैफिक द्वारा इतना अधिक फेवर किया जाएगा, किसी को भी भरोसा नहीं था।

उनका यह फेवर यहीं खत्म नहीं हुआ। अगले ही दिन गुरुवार, 20 मई 2020 को सुबह ही उन्होंने मनोज कुमार को सीएफटीएम/द.पू.रे. का चार्ज लेने दक्षिण पूर्व रेलवे मुख्यालय, गार्डेन रीच भेज दिया। जहां प्राप्त जानकारी के अनुसार पीसीओएम को उन्होंने रिपोर्ट किया। वह उन्हें ज्वाइन कराने के लिए महाप्रबंधक के पास लेकर पहुंचीं। मिली जानकारी के अनुसार वर्तमान सीएफटीएम ने तभी उन्हें दो दिन बाद सोमवार को चार्ज हैंड ओवर करने के बारे में सूचित किया था। इसके बाद उन्होंने मनोज कुमार को सोमवार को आने के लिए कहकर वापस भेज दिया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार ऐसा माना जाता है कि गार्डेन रीच मुख्यालय से निकलने के बाद मनोज कुमार ने मेंबर ट्रैफिक को उपरोक्त ताजा स्थिति से अवगत कराया। इसके लिए उन्होंने मेंबर ट्रैफिक से मोबाइल पर बात की या उन्हें टेक्स्ट मैसेज भेजा, यह तो पता नहीं चल सका, मगर द.पू.रे. मुख्यालय से उनके निकलने के तुरंत बाद मेंबर ट्रैफिक का फोन पीसीओएम को पहुंचा और उन्होंने उनसे मनोज कुमार को फौरन सीएफटीएम का चार्ज दिलवाने को कहा। तत्पश्चात मनोज कुमार को कॉल करके बुलाया गया, जो कि कहीं आसपास ही थे और फौरन पहुंच गए, तथा उन्हें चार्ज सौंप दिया गया। अधिकारी आश्चर्यचकित हैं कि आखिर मेंबर ट्रैफिक द्वारा मनोज कुमार का इतना फेवर करने का औचित्य क्या है?

एमटी के फेवर की हद ये है कि 20 मई को ही जैसे ही मनोज कुमार ने करीब 2 बजे सीएफटीएम/द.पू.रे. का चार्ज लिया, उसके थोड़ी देर बाद ही एमटी ने उन्हें डायरेक्टर/रेल मूवमेंट का भी अतिरिक्त प्रभार सौंपते हुए तत्संबंधी आदेश रेलवे बोर्ड से जारी करा दिया। अधिकारियों का कहना है कि यह तो अपक्षित ही था, क्योंकि इस बारे संबंधित अधिकारी ने कोलकाता में पहले से ही हवा बनाई हुई थी। उनका कहना है कि इस फेवर के चलते एमटी ने अपनी रही-सही इज्जत भी गंवा दी है। उनके इस कदम से ट्रैफिक सर्विस के सभी अधिकारी उनसे सख्त नाराज हुए हैं।

अधिकारियों का कहना है कि “मनोज कुमार को तो तुरंत चार्ज लेने की जल्दी समझी जा सकती है, क्योंकि उन्होंने इस पोस्टिंग के लिए कथित तौर पर काफी मोटा दाम चुकाया होगा। परंतु मेंबर ट्रैफिक को उन्हें चार्ज दिलवाने की ऐसी क्या जल्दी थी, यह समझने वाली बात है।” उन्होंने इसका कारण यह बताया कि “इस पोस्टिंग के लिए मेंबर ट्रैफिक ने जो डील की है, यदि चार्ज टेकिंग ओवर में देरी होती, तो उन्हें यह पोस्टिंग रद्द होने और एक मोटी डील उनके हाथ से न निकल जाने की आशंका रही होगी! इसीलिए उन्हें चार्ज दिलाने की जल्दी थी।” उनका यह भी कहना था कि “यह आशंका सिर्फ मेंबर ट्रैफिक को ही नहीं, बल्कि उस पूर्व रेल राज्यमंत्री को भी थी, जिसने यह डील करवाई है!” उनका तो यह भी मानना है कि इस मामले में पीएमओ के भी सूत्र जुड़े हुए हैं। इस बात से रेलवे बोर्ड के हमारे विश्वसनीय सूत्रों ने भी इत्तेफाक जाहिर किया है।

उल्लेखनीय है कि आईआरटीएस-2000 बैच के कई अधिकारियों का पैनल जनवरी 2020 में ही फाइनल हो चुका था। पक्की खबर यह भी है कि फाइल पर इन सबकी प्रमोशनल पोस्टिंग भी तभी कर दी गई थी। तथापि चूंकि सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड को इनमें से अपने एक चहेते, जिसकी फाइल पर प्रस्तावित पोस्टिंग उत्तर पश्चिम रेलवे, जयपुर की गई है, को दिल्ली में ही बनाए रखना है, इसलिए उन्होंने हम सबकी पोस्टिंग अटकाई हुई है।

अब इसमें से चूंकि मनोज कुमार ने अपनी गोटियां सीधे मेंबर ट्रैफिक के साथ फिट कर लीं, इसलिए उनको फेवर करने के लिए उनके साथ कमलेश गोसाई की पोस्टिंग की गई है। सूत्रों का कहना है कि यह फाइल सीआरबी को भी नहीं भेजी गई, जबकि सीएफटीएम की पोस्टिंग की फाइल सीआरबी तक जाती है। चूंकि रेलमंत्री ने डायरेक्टर/रेल मूवमेंट के पद को अपग्रेड करने और उस पर मनोज कुमार की ही पोस्टिंग की मेंबर ट्रैफिक की अनुशंसा को खारिज करते हुए फाइल लौटा दी थी, अतः अब उनकी सीएफटीएम में पोस्टिंग की फाइल सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड द्वारा चालाकी दिखाते हुए सीआरबी के पास भी नहीं भेजी गई।

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अटके हुए अधिकारियों का कहना है कि बाकी हम सब अभी भी इसलिए अटके हुए हैं, क्योंकि हमारी पोस्टिंग तो तभी हो पाएगी जब सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड अपने चहेते को दिल्ली में फिट करने का कोई मुकम्मल जुगाड़ कर लेंगे। अभी तो फिलहाल उन्होंने कोविद के नाम पर उसे स्वास्थ्य मंत्रालय में टिकाकर दिल्ली में ही रखा हुआ है।

जिस तरह सरकार और रेलमंत्री द्वारा भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था की बात करना न सिर्फ बेमानी है, बल्कि यह केवल एक कोरी बकवास है। उसी तरह रेलमंत्री द्वारा 10-15 साल से एक शहर-एक रेलवे में टिके ऐसे तमाम अधिकारियों को दर-बदर करने की घोषित नीति भी अब तक केवल बकवास ही साबित हुई है। रेलवे बोर्ड के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि “यदि सरकार में, और रेलमंत्री सेल से लेकर मंत्रियों और पार्टी सांसदों तक किसी की पहुंच है, तो उसके लिए सब कुछ संभव है।” रेल मंत्रालय में ऐसे अनेकों उदाहरण मौजूद हैं।

Why this IRTS officer is being most favoured by Railway Board repeatedly?

रेल मंत्रालय में भ्रष्टाचार का यह आलम रेलमंत्री सेल से लेकर कमोबेश हर बोर्ड मेंबर और विभाग प्रमुख तक पसरा हुआ है। ठेकेदारों का कहना है कि “प्रत्येक टेंडर में कमीशन का रेट कुल मिलाकर लगभग 10% तक पहुंच चुका है। तथापि अब जब रेलवे की आंतरिक आर्थिक स्थिति गड़बड़ा गई है और कर्मचारियों को वेतन देने तक के लाले पड़ने की नौबत आ चुकी है, तब एक तरफ वैश्विक महामारी के समय भी मालगाड़ियां चलाई गईं हैं, तो दूसरी तरफ खुद के साथ रेलवे की कमाई के लिए आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के नाम पर पार्सल स्पेशल ट्रेनें चलाकर हार्ड पार्सल की ढ़ुलाई की जा रही है।”

जाहिर है कि ऐसे में यह महामारी रेलमंत्री के साथ ही कुछ कदाचारी रेल अधिकारियों के लिए भी वरदान स्वरुप साबित हो रही है। यही वजह है कि उन्हें मनोज कुमार जैसे जुगाड़ू और कमाऊ पूतों की सख्त जरूरत है। इसीलिए उनको कमाऊ पोस्ट पर बैठाना उन्हें जरूरी लगता है। इसीलिए उनकी नीति और निर्णय में कहीं कोई एकरूपता नहीं है। इसीलिए अब कास्ट कटिंग की बात की जा रही है। इसके लिए रेलवे बोर्ड ने सभी जोनल रेलों को मौखिक आदेश जारी किया है। रेलकर्मियों की 50% कटौती के लिए रेलमंत्री ने तो पहले ही फरमान जारी किया हुआ है।








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जरूरत है हर मुद्दे पर सरकार से सवाल करने की! – RailSamachar

लग्घी से पानी पिलाने से किसी की प्यास नहीं बुझती, आज जरूरत है कि सरकार किसी की भी हो, जहां जैसी जरूरत हो, वहां उससे वैसा सवाल किया जाए!

तो सवाल यह है कि जब बीस लाख करोड़ के पैकेज से भारत को “आत्मनिर्भर” बनाने कि बात की जा सकती है, तो कुछ सौ करोड़ खर्च करके राष्ट्रीय महामार्गों पर पैदल चलते लाखों लोगों को उनके घर क्यों नहीं पहुंचाया जा सकता?

तो सवाल है कि जब यह भीड़ ही नहीं रहेगी, तो आप किसके दम पर “आत्मनिर्भर भारत” बनाएंगे?

आप भूल रहें हैं कि यही वह भीड़ है, जिसने दिल्ली को दिल्ली बनाया। मुंबई को चमकाया और सूरत की सूरत सुधारी है।

इन्हीं के दम पर फैक्ट्री हैं, धंधे हैं, मॉल और पब हैं। आप इन्हीं के दम पर नेता हैं और इन्हीं के दम पर आपकी राजनीति है, पत्रकार हैं, बुद्धिजीवी हैं और हम लेखक हैं।

यही वह भीड़ है, जिसकी मेहनत और जिसके सीने से निकलने वाले पसीने के दम पर आपकी पांच ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी का सपना खड़ा हुआ है।

यही वह भीड़ है, जो थाली बजाती है, दीये जलाती है और ठीक आठ बजे टीवी खोलकर आपका इंतजार करती है। लेकिन आप तो मुंह में गमछा बांधकर कुछ दिन से “मेरा भाषण ही तेरा राशन है” वाली मुद्रा में हैं।

इधर भीड़ खाली पेट बीस लाख करोड़ के जीरो गिनते हुए सोच रही है कि आत्मनिर्भर भारत के विज्ञापन में वो कहां खड़ी होगी। पैदल चलते लोगों की थकी आंखें जानना चाहती हैं कि देश और राज्यों का ये कौन सा तंत्र है, जो अपने नागरिकों को उनके घर नहीं पहुंचा सकता?

क्या इतने संसाधन विहीन थे हम? शायद नहीं। इसलिए माफ करें प्रधानमंत्री जी, आप “लग्घी से पानी पिलाने” की बात करते हैं!

अब इस देश का तंत्र जनता को लग्गी से पानी पिला रहा है। जिनको तत्काल खाना और पानी चाहिए, उन्हें आत्मनिर्भर और लोकल से वोकल का मंत्र देकर बीस लाख करोड़ के जीरो गिनवा रहा है।

लेकिन दिक्कत है कि मुझे ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए थी। मुझे डरना चाहिए था, क्योंकि अब मुझे भी सर्टिफिकेट दे दिया जाएगा। कहा जाएगा कि तुम क्या जानो देश कैसे चलता है ?

मैं भी जानता हूं कि कमरे में बैठकर बातें करना दुनिया का सबसे आसान काम है। लेकिन इस सवाल से कैसे मुंह मोड़ लूं कि जब बीस लाख करोड़ खर्च करके इकोनॉमी बचाई जा सकती है, तो कुछ सौ करोड़ खर्च करके इन इकोनॉमी बचाने वालों को क्यों नहीं बचाया जा सकता!

लेकिन मैं देख रहा हूं, इस देश के बौद्धिक चलन को! यहां सवाल करने वाले हाशिये पर ढ़केल दिए जातें हैं और सवाल से समर्थन और विरोध करने वाले मजे में रहते हैं।

मुझे यकीन हो गया है कि अब यहां दो ही किस्म के लोग बचे रहेंगे.. या तो वो आंख मूंदकर किसी के समर्थन में खड़े होने वाले होंगे या आंख मूंदकर किसी के विरोध में। या तो वो किसी को भगवान मानते हैं, या किसी को शैतान। लेकिन न जाने क्यों, मुझे अब इन दोनों अतियों से चिढ़ होने लगी है।

यही कारण है कि मेरे जैसे आदमी ने लिखना कम कर दिया। और ये देखकर हैरान रह गया कि यहां मोदी की आलोचना करने पर भीड़ से निकला एक भक्त किसी को वामपंथी और कांग्रेसी ठहरा देता है।

अगर आपने उलटकर राजमाता और उनके युवराज से या फिर बाबूजी की राजनीतिक विरासत ढ़ो रहे राजकुमारों से सवाल कर दिया तो एक कथित सेक्युलर बुद्धिजीवी आपको “भक्त” का सर्टिफिकेट लाल कागज पर जारी कर देता है।

वहीं आपने गलती से भी यदि वामपंथियो की बौद्धिक बेईमनियों को आईना दिखा दिया, तब तो आप इस तथाकथित समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं।

यही कारण है कि मैंने मान लिया है कि यहां संतुलन बनाए रखना मुश्किल है। सत्य एक भ्रम है। निरपेक्षता एक ढोंग है और संवेदना एक बाजार है।

एक बुद्धिजीवी अपने हिस्से का सामान लेकर, बाजार में जब तक घूमता रहता है, तब तक वो प्रासंगिक बना रहता है, वरना गायब हो जाता है।

मुझे यकीन हो गया है कि मेरे जैसे लोग शायद नहीं पढ़े जाएंगे, क्योंकि अब वो हर वक्त किसी का गुणगान या विरोध करने की कला में शायद माहिर नहीं हो पाएंगे।

तथापि इतना तो तय है कि हम प्रासंगिक बने रहें या नहीं, साहित्यकार कहे जाएंगे या नहीं, लेकिन जब भी देश के हाशिये पर खड़े आम आदमी के ऊपर संकट आएगा, तब न हम किसी सत्ता के साथ खड़े रहेंगे, न ही किसी विपक्ष के साथ।

हम अटैची पर अपनी संतान को लेकर रोड पर घसीटने वाली मां के साथ ही खड़े रहेंगे। हम उन हाथों के साथ खड़े रहेंगे, जिन हाथों को थामने वाला कोई बचा नहीं है।

हम उन आंखों के साथ खड़े रहेंगे, जो पानी की खाली बोतलों और भोजन के बिखरे पैकेटों को टुकुर-टुकुर देखकर अपनी किस्मत को कोस रही हैं।

हम उन पैरों के साथ खड़े रहेंगे, जो अपने मरे हुए सपने को लेकर वक्त की कठिन चढ़ाईयां चढ़ रहे हैं। हम तय करेंगे कि भूख के साहित्य और मजबूरी की कविता को लाचारी के छंदों में लपेटकर कभी न बेचें।

हम पहले आईना देखेंगे और फिर दूसरों को दिखाएंगे, क्योंकि सत्तर सालों से इस देश में अंधे ही आईने बेचते आएं हैं और हम इन आईनों में अपनी मन-पसंद छवियां देखते आए हैं। इस महामारी में अब इस चलन को खारिज करने की जरूरत है। इसको सिरे से नकारने की जरूरत है।

आज जरूरत है कि सरकार किसी की हो, जहां जैसी जरूरत हो, वहां उससे वैसा सवाल किया जाए। काम अच्छा हो तो तारीफ की जाए और गलत हो तो झट से विरोध किया जाए। मन करे तो सलाह भी दी जाए।

क्योंकि जरूरी नहीं है कि आप अपने कमरे में इस लेख को पढ़ते हुए बचे रहेंगे। ये भयानक दौर है। किसी का भी कोई भरोसा नहीं है। कल को आप भी अपने भूखे बच्चे को लेकर इस पैदल चलती मजबूर भीड़ का हिस्सा हो सकते हैं। आप भी भूख-प्यास से चिल्ला सकते हैं।

और तब.. तब शायद आपको सोचकर अफसोस होगा कि इस अंध विरोध और अंध समर्थन की परम्परा ने सत्तर सालों से इस देश की जनता के साथ सबसे बड़ा धोखा किया है।

*लेखक अतुल कुमार राय एक वरिष्ठ साहित्यकार हैं।








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बहुत फर्क होता है कठोर कदम उठाने और कठोर कदम उठाने की बातें करने में !

लॉकडाउन के नियमों और एडवाइजरी का सरकारी दफ्तरों में सरकारी बाबुओं द्वारा ही किया जा रहा सर्वाधिक उल्लंघन

सरकारी बाबुओं की देखरेख और संरक्षण में हो रही है अत्यावश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी/मुनाफाखोरी

बहुराष्ट्रीय ऑनलाइन मार्केटिंग कंपनियों को कारोबार शुरू करने की अनुमति देने से बरबाद हो जाएंगे देश के छोटे व्यापारी

कोरोना वायरस की महामारी के मद्देनजर लॉकडाउन में सरकार को गुमराह करने का गोरखधंधा पूरे देश में चल रहा है। जहां कुछ अधिकारी अपनी जागीर बनाए रखने के लिए लॉकडाउन के नियमों और कार्मिक मंत्रालय द्वारा जारी एडवाइजरी को दरकिनार करके, मातहतों का दुरुपयोग कर उन्हें मौत के मुंह में ढ़केल रहे हैं, वहीं मार्केट में व्यापारी वर्ग के बीच सेनिटाइजर हो, मास्क हो, खाने-पीने की चीजें हों या डॉक्टरों की पीपीई किट, सभी में मुनाफाखोरी और कालाबाजारी चल रही है।

संभवतः वैश्विक स्तर पर भी यही स्थिति है और तमाम सरकारें इस विषाणु से डरी हुई हैं तथा अपने-अपने स्तर पर अपने नागरिकों को इससे बचाव के लिए हरसंभव प्रयास कर रही हैं। 56 इंच की छाती रखने वाले हों या 36 इंच वाले, सब इस एक विषाणु से डरे हुए हैं, मगर फिर भी वह किसी भी तरीके से पढ़े-लिखों की तरह इस बचाव मुहिम को अंजाम देते नजर नहीं आ रहे हैं।

जबकि इस समय देश और दुनिया को केवल पढ़-लिखे और कुशल प्रशासक ही बचा सकते हैं। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि कठोर कदम उठाना और कठोर कदम उठाने की बातें करना, दोनों में बहुत फर्क होता है।

यदि इस समय हर प्रकार से कालाबाजारी, मुनाफाखोरी पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो देश को बर्बाद होने में केवल और केवल तीन महीने का समय ही लगेगा।

भुखमरी चरम सीमा पर है, जहां-तहां अटके लोगों तक उचित आपूर्ति नहीं पहुंच पा रही है, जबकि कुछ अधिकारी, किराना दुकानदार, सरकारी राशन वितरण से जुड़े व्यापारी, केमिस्ट तथा सेनिटाइजर बनाने वाले उद्योग, पीपीई किट बनाने में जुटे उद्योगों, इत्यादि में हर प्रकार से मुनाफाखोरी चल रही है।

हालांकि सरकार द्वारा इस सबको रोकने की भी तमाम घोषणाएं की गई हैं, नियम और नंबर जारी किए गए हैं, परंतु जहां हर दूसरा व्यक्ति निजी स्वार्थ में डूबा हो, और कहीं किसी सामान्य आदमी की सुनवाई न हो रही हो, वहां किसकी मजाल है कि वह नियम का हवाला दे और जारी किए गए नंबरों पर कॉल करके शिकायत करने की हिमाकत कर सके!

पीपीई किट और सेनिटाइजर के भी कोई मानक स्थापित नहीं किए गए हैं। फील्ड में कोरोना की रोकथाम से लगातार जूझ रहे डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ को अब तक पर्याप्त पीपीई किट्स और अन्य बचाव सामग्री उपलब्ध नहीं कराई जा सकी है।

बड़े-बड़े किराना स्टोर, सुपर मार्केट, केमिस्ट की दुकानें जनता की छाती से खून चूसने में लगी हुई हैं, लेकिन सरकार में बैठे बाबुओं को यह सब नहीं दिख रहा है, वह पद और सत्ता के मद में धृतराष्ट्र हो रहे हैं।

छोटे घरेलू व्यापारियों और 10-20-50 मजदूर लेकर सरकारी-अर्धसरकारी या निजी कांट्रेक्ट वर्क करने वाले छोटे-छोटे व्यापारियों-कांट्रेक्टरों के लिए सरकार की तरफ से कोई खास राहत की घोषणा नहीं की गई है।

इस पर भी उनके जले में नमक छिड़कने के लिए सरकार ने बड़ी और बहुराष्ट्रीय ऑनलाइन मार्केटिंग कंपनियों को अपना कारोबार शुरू करने की तैयारी दर्शाई है, जिनका इस महामारी की रोकथाम में अब तक कोई योगदान सामने नहीं आया है।

सरकार द्वारा जारी लॉकडाउन के नियमों और एडवाइजरी का सर्वाधिक उल्लंघन सरकारी दफ्तरों में सरकारी बाबुओं द्वारा ही किया जा रहा है, जो अनावश्यक रूप से अपने मातहत लगभग सभी स्टाफ को दफ्तर आने के लिए बाध्य कर रहे हैं। रेल मंत्रालय भी उनमें से एक है, जहां कोई देखने-सुनने वाला ही नहीं है।

Sadistic people want their empire running and with number of slaves around them constantly gives them egoistic kick!

प्रस्तुत है ऐसे ही एक केंद्रीय मंत्रालय में कार्मिकों की लॉकडाउन पीरियड में उपस्थिति की संकल्पना – In a Ministry assume..

Secretary : 1

Additional Secretary : 2

Joint Secretary level : 10

Personal staff say, Multi-tasking staff (MTS) PA, driver for each to above : 52

Dy Secretary/Director level : 12

MTS and PA each for above : 24

Total = 101

Who are required to come mandatorily.

Now see others number

Under Secretary and equal : 20

Senior Section Officers and equal : 25

Assistant Section Officers and equal : 30

All rest : 60

MTS : 40

Total : 175

1/3rd of 175 required to come that is 58.

So out of total officials of 276, a total no. of 159 official are required to be present in a Ministry.

What an awesome way to follow lockdown !

Brilliant work by a “Government of IAS” supported by BJP from outside.

A reliable source in MHA says, the home secretary was almost bullied by other departments secretaries, कि इसको डिप्टी सेक्रेटरी और डायरेक्टर लेवल तक लेकर जाओ, क्योंकि इन स्लेव्स के बिना हमारे जॉइंट सेक्रेटरी काम नहीं कर सकते हैं।

सूत्र का यह भी कहना है कि “जॉइंट सेक्रेटरीज और सेक्रेटरीज ने कहा होगा कि अगर डायरेक्टर तथा डिप्टी सेक्रेटरी नहीं आएंगे, तो काम कौन करेगा! उनका काम तो पालिसी बनाना है, काम तो डायरेक्टर और डिप्टी सेक्रेटरी करते हैं।”

सूत्र का कहना था कि जितना खटने वाला काम यानि “अनरेम्यूनरेटिव वर्क” होता है, वह आईएएस बाकी विभागीय लोगों से करवाते हैं, जैसे अंग्रेज भारतीयों से करवाते थे। आईएएस तो नोट की अंग्रेजी ठीक करता है और फाइनल नोट पर हस्ताक्षर करता है बस!

यह तो एक छोटी मिनिस्ट्री का “हाईपोथेटिकल मिरर” है, क्योंकि मीडियम साइज की लगभग हर मिनिस्ट्री में औसतन इतना ही स्टाफ होता है।

https://twitter.com/kanafoosi/status/1250651559647539201?s=19

रेलवे का तो अन्य मंत्रालयों की अपेक्षा और भी बुरा हाल है। यहां अधिकारियों की मनमानी की कोई सीमा नहीं रह गई है और कोई देखने-सुनने वाला भी नहीं है। जानकारी मिली है कि रेलवे बोर्ड में भी अनावश्यक भीड़ लगाई जा रही है और एडवाइजरी का पालन नहीं किया जा रहा है। हालत यह है कि दिल्ली मंडल के एक महान अधिकारी 25 मार्च से ऑफिस में बैठकर स्टाफ के अटेंडेंस रजिस्टर में सिर्फ छुट्टियां लिखे जा रहे हैं।

ऐसा ही हाल लगभग सभी जोनल रेलों और मंडलों का भी है। जहां शतरंज की बिसात (भारतीय रेल) पर बादशाह और वजीर (छोटे-बड़े अधिकारी) तो सब अंदर यानि ऑफिस और घरों में सुरक्षित बैठे हैं, जबकि प्यादों (सर्वसामान्य रेलकर्मियों) को बिना उचित सुरक्षा इंतजाम के फील्ड (युद्ध क्षेत्र) में मरने के लिए हांका जा रहा है।

A senior officer says, In normal time duty even one meaningful work in entire day justified your existence in office. This is extraordinary situation concerning life and death not of your but your near and dear family members and society at large.

In this situation you can filter what is priority and what is routine, and then you can decide what can be done from home and what cannot, he said.

He further added, “going by these two criteria one can see nothing worth and meaningful to be in office physically and to put himself at unnecessary risk. But sadistic people want their empire running and with number of slaves around them constantly gives them egoistic kick!!” 








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कोरोना का क़हर और अमीरों के नख़रे – RailSamachar

एक वायरस ने अमीरों को शिक्षा का पहला पाठ सिखा दिया है, जो न गांधी की नई तालीम सिखा पाई, न टालस्टॉय का दर्शन, और न हमारे आईआईटी, जेएनयू और आईआईएम जैसे शिक्षा संस्थान सिखा पाए हैं

प्रेमपाल शर्मा

भारत के शहरी मध्यवर्ग का जवाब नहीं! कोरोना वायरस और चीन के बारे में यों तो महीने भर से सनसनी चल रही थी, लेकिन यह वैसा ही था जैसे कुछ-कुछ भूत-प्रेत की सी बातें हों। रात हुई तो भूत और दिन होते ही साफ।

उन्हीं दिनों एक सरकारी भर्ती के लिए चल रहे साक्षात्कार में तो एक सदस्य सिर्फ यही कोरोना प्रश्न हर बच्चे से कर रहे थे। लेकिन ज्यों-ज्यों इटली, स्पेन, इंग्लैंड, फ्रांस की खबरें भारत पहुंचने लगीं, अमीरों को असली भूत का एहसास गरीबों से बहुत पहले होने लगा।

इसके कई कारण थे। ज्यादातर के बच्चे इन सभी देशों में हैं। कुछ आने वाले दिनों में बच्चों को वहां पढ़ाने के लिए वीजा की लाइन में लगे हुए थे, तो कुछ मई-जून की तपती दिल्ली में अपना वक्त रोम और स्विट्जरलैंड में गुजारना चाहते थे।

लेकिन उनकी तत्काल समस्या कुछ दूसरी थी और वो यह कि पूरा लॉक डाउन होने वाला है। यानि किसी को भी आने-जाने की छूट नहीं मिलेगी। यहां तक कि घर में काम करने वाली बाई, नौकर-नौकरानी को भी नहीं।

खाते-पीते अमीरों की बस्ती की स्मृति में यह सबसे बड़ी विपत्ति थी। हालांकि अभी लॉक डाउन में दो दिन बाकी थे, लेकिन उनके चेहरे पर चिंताएं साफ-साफ पढ़ी जा सकती थीं। हर तरफ यही खुसुर-पुसुर।

आनन-फानन में सोसायटी के हरे-भरे गार्डन में मीटिंग बुलाई गई और उसमें सबसे पहले वे सभी हाजिर थे, जो 15 अगस्त और 26 जनवरी को भी कभी नहीं देखे गए।

छूटते ही एक अमीर ने गोला दागा। बाई को बुलाने में क्या दिक्कत है? उनके घरों में कोई विदेशी थोड़े ही आते हैं? सरकार ने लाक डाउन इसलिए किया है कि जो विदेश से आ रहे हैं, उनके संपर्क में कोई नहीं आए। ये तो सुबह आएंगी और काम करके चली जाएंगी।

दूसरी अमीरन ने भी हां में हां मिलाई। एक पुराने अफसर तो ऐसे मौके पर अपनी बायोग्राफी तुरंत सुनाने लगते हैं कि जब वे कृषि मंत्रालय में थे, तो कैसे पूरी-पूरी रात ड्यूटी बजाते थे।

चौथे अमीर ने 1965 और 1971 की दास्तां सुनाने में पहले 10 मिनट लगाए। अपनी बहादुरी के किस्सों को बीच-बीच में पिरोते हुए कि कैसे हम खाईयों में घुस जाते थे। और फिर निष्कर्ष निकाला कि बाइयों का आना, नौकरों का आना तो उन दिनों भी बंद नहीं हुआ था। इसलिए हम तो अपनी नौकरानी को बुलाएंगे। इस उम्र में हमसे तो खाना बनाना नहीं होता।

दो अमीरन खुसर-पुसर कर रही थीं कि हमने तो अभी 10 दिन पहले ही नई बाई लगाई है तो हम घर बैठे पैसे कैसे दे दें? सरकार देना चाहे तो दे!

एक अन्य अपनी दास्तां और जोरों से बताने लगी कि जब वे सरकारी नौकरी करती थी, तो कैसे-कैसे पहाड़ तोड़ती थी। घंटों तक वाद-विवाद चलता रहा और बिना फैसले के मीटिंग खत्म हो गई।

समय की तो चिंता उनको थी ही नहीं, क्योंकि सभी के घरों में बाईयां या तो खाना बना गई थीं या बना रही थीं। कुछ तेज पत्रकार किस्म के लोगों की सूचना पर कि यह लॉक डाउन और भी लंबा खिंच सकता है, उनकी घबराहट और बढ़ गई।

तुरंत कई आवाज उठने लगीं कि हम भी घर पर रहेंगे, बच्चे भी स्कूल नहीं जाएंगे, तब तो खाना बनाने वाली, काम करने वाली की जरूरत तो और भी ज्यादा है, इसलिए कोई बुलाए, न बुलाए, हम तो अपनी नौकरानी को बुलाएंगे। सोसाइटी का इसमें क्या लेना-देना, यह हमारे और हमारी नौकरानी के बीच का मामला है।

लेकिन बाईयों के सामने बड़ा धर्म संकट था। न आएं तो नौकरी चली जाएगी और आएं, तो कैसे आएं? एक बाई की मालकिन ने बताया कि उसकी मालकिन कह रही है कि तुम सुबह सूरज निकलने से पहले ही आ जाना। मैं तुझे आने-जाने के अलग से पैसे दे दूंगी। लेकिन उनकी चिंता यह थी कि एक घर में आऊंगी और दूसरे में नहीं, तो कानपुर वाली तो मेरी जान ही ले लेगी। नौकरी भी चली जाएगी।

बाईयां तीन-तीन, चार-चार के झुंड में अलग विमर्श पर जुटी हैं कि किया जाए तो क्या किया जाए? अब मेमसाब और साब को भी तो सरकार घर बैठे पगार देगी। एक बाई कह रही थी कि उसकी मालिकन ने तो आज ही अगले दो-तीन दिन का खाना बनवा लिया है।

इस पर दूसरी ने कहा कि मेरी मालकिन भी यही करती है। होली-दिवाली की छुट्टी बाद में आती है, उस दिन का खाना पहले बनवा लेती हैं। भले ही वह बासी हो जाए और फेंकना पड़े। कई बार तो पूरी-सब्जी के डोंगे के डोंगे डस्टबिन में डाल देते हैं।

उसने आगे कहा, अरे भाई तुम्हें नहीं खाना तो हमें दे दो, गेट पर दे दो, किसी भिखारी को दे दो, अन्न का ऐसा अपमान तो मत करो। गोयल साब के घर में तो रोटियों को छत पर डाल देते हैं। पिछले दिनों इसीलिए उनकी छत पर बंदर आने लगे और उन बंदरों को रोकने के लिए सोसाइटी में एक लंगूर रखा गया।

एक बाई ने बताया कि उसकी मालकिन कह रही हैं कि हम तीन घरों ने मिलकर फैसला किया है कि बाईयों को एक-एक करके बुलाया करेंगे। वे तीनों घरों में काम करके चली जाया करेंगी।

एक अमीर ने कहा, कार साफ करने वाले और ड्राइवरों को भी हम ऐसे ही बुलाएंगे। सरकार अपना काम करे। हमारे काम में दखल न दे। नौकरों के शोषण का दिल्ली का कोपरेटिव फार्मूला। सरकारी आदेश की ऐसी-तैसी!

याद आए भारत-पाकिस्तान विभाजन के वे भयानक दिन! उर्वशी बुटालिया ने विभाजन के बाद सन् 2000 के आसपास एक किताब लिखी थी जिसमें विभाजन से गुजरे हुए लोगों के अनुभव दर्ज किए गए थे। बताते हैं सब से निश्चिंत पाकिस्तान में शौचालय साफ करने वाले जमादार थे।

वे थे तो हिंदू जमादार लेकिन पाकिस्तान के रईसों ने और मुस्लिम लीग के नेताओं ने यह स्पष्ट कर दिया था कि उन पर कोई आंच नहीं आनी चाहिए। यहां तक कि उन्हें तरह-तरह के लालच देकर रहने को फुसलाया भी गया।

उन्हें डर था कि यदि ये काम वाले जमादार चले गए तो हमारी गंदगी कौन साफ करेगा? कोरोना के दौर में वैसी ही स्थिति बाइईयों की बन रही थी। वैसे बाईयां इनके टॉयलेट की तरफ देख भी नहीं सकती।

बस्ती के अमीरों की चिंता में कोरोना का कहर नहीं था, बाईयों के न आने का कहर ज्यादा था। फिर कूढ़ा कौन उठाएगा? मेरा तो बच्चा छोटा है! अमुक घर में तो सिर्फ बूढ़े रहते हैं! उनको खाना कौन खिलाएगा?

किसी ने कहा भी दो-चार दिन के लिए आप इन बूढ़ों को भी नहीं खिला सकते? और बूढ़े खाते भी कितना हैं? क्या ऐसे दौर में जरूरी है कि छप्पन भोग बनवाए जाएं!

जिस देश का किसान अपने हाड़ तोड़कर अन्न उगाता है, सब्जियां पैदा करता है, वहां के शहरों के अमीर अपने हाथ से खाना भी बना-खा नहीं सकते! उनकी सोचो जो पांच-पांच सौ किलोमीटर पैदल चलकर अपने परिवार के पास पहुंचना चाहते हैं। कितने हिम्मती और मेहनतकश हैं यह गरीब!

कोरोना की चपेट में आज पूरी दुनिया आ चुकी है। चीन, कोरिया, यूरोप, अमेरिका से लेकर अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया तक, लेकिन छोटे-मोटे कामों को लेकर ऐसा संकट शायद किसी भी समाज के सामने नहीं होगा और न आएगा। भारत-पकिस्तान जैसे कुछ देशों को छोड़कर।

दरअसल ऐसी ऐतिहासिक चुनौतियों के सामने ही सत्ता समाज और तंत्र की पोल खुलती है। सर्वत्र हाहाकार की सी स्थितियां बनती जा रही हैं। हलवाई की दुकान पर काम करने वाले मजदूर कहां जाएं और कहां जाएं सड़क भवन और दूसरे निर्माण कार्यों में लगे लोग।

गरीब कैसे जिंदा रहे, जिन्हें दो जून की रोटी का जुगाड़ भी न हो और वह भी ऐसी अनिश्चितता में! ऊपर से मौत का डर अलग। लेकिन अमीरों की चिंता! बाप रे बाप!!बाई और नौकरों के बिना जिंदगी कैसे चलेगी? सुबह की चाय कौन बनाएगा और कौन उनके बच्चे को खिलाएगा?यह सबसे दुखद पहलू है।

चिंताओं में यूरोप, अमेरिका, चीन भी गुजर रहे हैं, लेकिन उनके वैज्ञानिक, उनकी प्रयोगशालाएं इससे निपटारे के लिए लगातार जूझ रही हैं। हमारी शिक्षा और आरक्षण व्यवस्था के चलते हम ऐसे वैज्ञानिक तो बाद में पैदा करेंगे, अभी तो हमारे बच्चे रसोई और छोटे-मोटे काम ही करना सीख लें, वही बहुत है।

दरअसल इस सबके पीछे लगातार बढ़ती सामाजिक आसमानताएं हैं। मुगलों और अंग्रेजों के समय जो जमीदारी, सामंती व्यवस्था फल-फूल रही थी, उसे आजादी के बाद न संविधान मिटा पाया, न कोई दूसरे उपाय।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का संदेश “डिग्निटी ऑफ लेबर” लगातार छीजता ही चला गया है।

ईश्वर करे, यह कोरोना जल्दी ही अपनी मौत मरे। लेकिन इसने भारतीय मध्यवर्ग की विशेष रूप से चूलें हिला दी हैं। चूलें तो सभी धर्म गुरुओं की भी हिली हैं, जो एक कार्टून में माइक्रोस्कोप में झांकते वैज्ञानिक के पीछे खड़े हुए किसी दवा का इंतजार कर रहे हैं। सब चमत्कार भूल गए और भूलना भी चाहिए। मानव सभ्यता विज्ञान के बूते ही आज यहां तक पहुंची है।

रहीम दास ने ठीक ही कहा है कि-

हिमन विपदा हू भली जो थोड़े दिन होय।

हित-अनहित या जगत में जान परत सब कोय।।

आज पांचवा दिन है। सरकार की सख्ती का। इसलिए सब कुछ बंद कर दिया गया है। शुरू में तो नौकरी की धमकी देकर कुछ लोगों की काम वालियां आती रहीं, लेकिन अब सुनते हैं उन घरों के बच्चे भी अपने गिलास उठाकर पानी पीने लगे हैं और चिड़-चिड़ करते बर्तन भी मांजने करने लगे हैं।

बड़े साहब इस बात पर बड़ा नाज करते थे कि उन्हें चाय बनानी भी नहीं आती। वे चाय भी बनाना सीख गए हैं और फोन पर दिनभर दोस्तों को बताते हैं कि चावल बनाना भी सीख लिया है।

ज्यादातर मेम साहब खाना बनाना तो जानती थीं, लेकिन जिस देश में बाई और काम वाली इतनी सस्ती मिल जाए तो वे भी क्यों बनाएं? अगर वे खाना बनाएंगी, तो फिर जिम में जाने के लिए समय कहां मिलता! मोबाइल से घंटों बात करने की फुर्सत कैसे मिलती! और किटी पार्टी में फिर कब जाएंगी?

कुछ तो सरकारी कर्मियों को अपने घर पर बच्चों को खिलाने और उनकी पॉटी साफ करने के लिए अपने घरों में लगाए रहती थी। वह भी अब ये सब चौकड़ी भूल गए।

अमीरों को खूब पता है कि जब उनके बच्चे अमेरिका में जाते हैं, यूरोप में जाते हैं, तो वहां हर काम खुद करते हैं, लेकिन हिंदुस्तान में वे तब तक नहीं करेंगे, जब तक कि कोरोना जैसा कोई वायरस इनके घुटने न टिका दे!

वाकई एक वायरस ने इन अमीरों को शिक्षा का पहला पाठ सिखा दिया है, जो न गांधी की नई तालीम सिखा पाई, न टालस्टॉय का दर्शन सिखा पाया, और न हमारे आईआईटी, जेएनयू और आईआईएम जैसे शिक्षा संस्थान सिखा पाए हैं।

#प्रेमपाल शर्मा, पूर्व संयुक्त सचिव, रेल मंत्रालय, 96, कला विहार अपार्टमेंट्स, मयूर विहार फेज-1, एक्सटेंशन दिल्ली-9. मोबाइल 997139 90461.








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पूर्वोत्तर रेलवे ने शुरू कर दिया कोरोना अवार्ड वितरण

अभी कोविद-19 मुहिम खत्म नहीं हुई, न ही ऐसे कोई लक्षण फिलहाल नजर आ रहे हैं, पर रेलवे में शुरू हो गया पुरस्कार बांटना

जहां एक तरफ कोरोनावायरस की महामारी से देश को और इसके 135 करोड़ देशवासियों को बचाने की जी-तोड़ कोशिश प्रधानमंत्री सहित पूरी भारत सरकार और सभी राज्य सरकारें कर रही हैं, जनता भी लॉकडाउन में सरकार के साथ भरपूर सहयोग कर रही है, वहीं कुछ अति होशियार सरकारी अधिकारी अपनी होशियारी दिखाते हुए प्रधानमंत्री से भी दस कदम आगे निकल जाना चाहते हैं।

अभी कोरोनावायरस से संक्रमित तमाम मामले सामने आ रहे हैं। इससे संक्रमित लोगों की संख्या घटने के बजाय बढ़ती ही जा रही है। इस महामारी को नियंत्रित करने की अथक कोशिशों के बावजूद इसके मामलों में कमी आने के कोई लक्षण फिलहाल कहीं से नजर नहीं आ रहे हैं।

इसके बावजूद लुक ऑफ्टर जीएम, पूर्वोत्तर रेलवे द्वारा इसके लिए तीनों मंडल रेल प्रबंधकों सहित सभी विभाग प्रमुखों और कोविद-सेल्स को पुरस्कृत कर दिया गया। जीएम द्वारा इसके पुरस्कार स्वरूप 35 लाख रुपए बांटे गए हैं। जब अभी तक महामारी पर नियंत्रण की कोई घोषणा सरकार की तरफ से नहीं की गई है और  का अभी कोविद19 मुहिम खत्म हुई ही नहीं है, तब पुरस्कार देने की बात न सिर्फ समझ से परे है, बल्कि यह जल्दबाजी भी है।

इस संदर्भ में पूछे जाने पर पूर्वोत्तर रेलवे के लुक ऑफ्टर जीएम एल. सी. त्रिवेदी का कहना था कि “अभी सिर्फ फंड अलॉट किए गए हैं। यह ग्रूप अवार्ड हैं। जरूरत पड़ने पर ऑन द स्पॉट अवार्ड के लिए इस्तेमाल किए जाएंगे। बहुत से रेल कर्मचारी विभिन्न विभागों के पहले ही अच्छा प्रदर्शन कर चुके हैं और इनाम के हकदार हैं।”

नेक काम के लिए पुरस्कार अवश्य दिए जाने चाहिए, इसके लिए अच्छा काम करने वाले लोगों को पुरस्कृत और प्रोत्साहित भी किया जाना चाहिए मगर मुहिम की सफलता और इसकी अंतिम सरकारी घोषणा के बाद, यही परंपरा भी रही है।

अब जीएम द्वारा भले ही अपने बचाव में “अभी सिर्फ फंड कलॉट करने और जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किए जाने” की सफाई दी गई है, परंतु वक्त की नजाकत को देखते हुए उनका यह कदम कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता है। जहां तक जानकारी है, ऐसा कोई अनावश्यक निर्णय, वह भी समय से पहले, अन्य किसी जोनल जीएम द्वारा अब तक नहीं लिया गया है!








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यात्री ट्रेनें नहीं चल रही हैं, ऐसे मार्जिन में केबल मेगरिंग कराने पर अधिकारियों का जोर

केबल मेगरिंग करने का नया फरमान, रिले रूम के वायरस ग्रस्त होने पर कैसे बचेगी रेलकर्मियों की जान !

अब तक एसएंडटी कर्मचारियों को इंजीनियरिंग विभाग के कर्मचारियों के साथ रेल बदलने, ट्रैक मशीन से पैकिंग करने के कार्य में लगाया गया था परंतु अब एक और नया फरमान जारी कर दिया गया है। इस नए आदेश में केबल मेगरिंग कराने के निर्देश दिये गये हैं।

जब कर्मचारियों का कहना है कि समस्या काम करने की नहीं, बल्कि काम करने की जगह को लेकर है, क्योंकि केबल मेगरिंग कराने के लिए रिले रूम जिस पर दो लाॅक होते हैं, जिनकी एक चाभी एसएंडटी विभाग के पास तथा दूसरी चाभी स्टेशन मास्टर के पास होती है।

स्टेशन मास्टर चाभी तभी देते हैं, जब एसएंडटी विभाग का जेई या एसएसई स्तर का निरीक्षक चाभी मांगने के लिए कंट्रोल से पीएन लेता है और स्टेशन मास्टर को कंट्रोल चाभी देने के लिए अनुमति देता है।

यानि रिले रूम पूरी तरह से बंद और सुरक्षित होता है। अतः रिले रूम को खोले बगैर केबल मेगरिंग करना संभव नहीं है।

जबकि रिले रूम के अंदर सिग्नल की सारी सर्किट तथा हजारों-लाखों की संख्या में सिग्नलिंग तारों का गुच्छा सिग्नलिंग उपकरणों को चलाने के लिए लगा होता है।

अब प्रश्न यह है कि क्या एक बंद और सुरक्षित कमरे को इस कोविद-19 महामारी के समय खोलकर उसे भी असुरक्षित नहीं किया जा रहा है और क्या इस प्रकार के रिले रूम को सैनेटाइज किया जाना संभव है जहाँ हजारों-लाखों की संख्या में सिगनलिंग तारों का गुच्छा तथा सिगनलिंग सिस्टम मौजूद हो?

एसएंडटी कर्मियों का आग्रह है कि आखिर अधिकारियों को कर्मचारियों की सुध क्यों नहीं हो रही है? उनका कहना है कि जब प्रधानमंत्री खुद देश के हर नागरिक को ‘घर पर रहिये और केवल घर पर रहिये’ के लिए निवेदन कर रहे हैं, तो क्या हमारे अधिकारी अपने मातहत कर्मचारियों को ‘घर पर रहिये और केवल घर पर रहिये’ के लिए प्रेरित नहीं कर सकते हैं?

उन्होंने कहा कि अभी हाल ही में चेयरमैन, रेलवे बोर्ड ने भी सभी अधिकारियों को केवल मालगाड़ियों के लिए आवश्यक स्टाफ को ही ड्यूटी पर लगाने का निर्देश दिया है, वह भी रोटेशन में। परंतु ब्रांच अधिकारियों, खासतौर पर एसएंडटी तथा इंजीनियरिंग विभाग के अधिकारियों को ट्रेनें कम चल रही हैं, तो काम करने के लिए अच्छा मार्जिन दिख रहा है, इसीलिए वह सामान्य दिनों से भी ज्यादा काम करवा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि कहने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल रखा जा रहा है, परंतु इंजीनियरिंग तथा एसएंडटी विभाग का प्रत्येक काम रिस्क एवं हार्डशिप के बिना संभव ही नहीं है, ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग तो मात्र एक छलावा है। ऐसी परिस्थितियों में कई रेलकर्मी कोरोना महामारी के चपेट में आ रहे हैं, जिसका एक बेहतरीन उदाहरण पश्चिम रेलवे के मुंबई सेंट्रल मंडल के नंदुरबार सेक्शन में आ चुका है, जहां संदिग्ध मामले पाए जाने पर तीन ट्रैकमैनों को होम क्वारंटाइन किया गया है।

उन्होंने कहा कि जो लोको पायलट ट्रेन चलाते हैं, उनको भी ब्रेथ एनालाईजर टेस्ट तथा बायोमैट्रिक उपकरणों से छुट दी गई है, परंतु कुछ लाॅबियों में यह अभी मान्य नहीं किया जा रहा है और कहा जा रहा है कि उनके पास मंडल कार्यालय से अभी तक कोई निर्देश प्राप्त नहीं हुए हैं। अब जबकि अभी हाल ही में पालनपुर में एक लोको पायलट को कोरोना से संक्रमित पाया गया था, तब भी रेल प्रशासन के आदेशों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। 

सवाल यह है कि आखिर इस वैश्विक कोरोना महामारी से इन रेल कर्मचारियों को कौन बचाएगा और इसके लिए जिम्मेदार किसे ठहराया जाएगा?

“हम बचेंगे, तो देश बचेगा”

एसएंडटी कर्मचारियों के एक व्हाट्सऐप ग्रुप में डाला गया मैसेज भी कानाफूसी.कॉम को प्राप्त हुआ है। इसमें कहा गया था कि – “जबकि भारत सरकार एवं देश के प्रधानमंत्री खुद बार-बार सभी नागरिकों से ‘घर में ही रहें और केवल घर में ही रहें’ की अपील कर रहे हैं, ऐसी स्थिति में घर से बाहर निकलना मौत के मुँह में जाने के बराबर ही नहीं, बल्कि पूरे भारत को मौत के मुँह डालने के बराबर माना जा रहा है। ऐसी विकट परिस्थिति में हम रेल कर्मचारियों के ऊपर विशेष जिम्मेदारियां आ जाती हैं। परंतु हमारी जिम्मेदारियों की आड़ में हमारा शोषण किया जाना उचित नहीं है। हम कर्मचारी भी आप अधिकारियों के परिवार के एक सदस्य की तरह ही हैं और हमसे काम लेना आपकी जवाबदारी है, परंतु इसे किसी भी अधिकारी को अपने इगो पर नहीं लेना चाहिए। और जहां तक संभव हो, हम सभी को एक-दूसरे की भावनाओं को तथा समस्याओं को इससे भी ज्यादा हमारे घर से बाहर निकलने के डर को महसूस करना चाहिए। अगर बात केवल हम कर्मचारियों की होती, तो कोई बात नहीं थी, परंतु यह महामारी हमारे परिवार को ही नहीं, पूरे देश को महामारी के दलदल में डाल रही है। हमारी एक गलती न जाने किस-किस को लील जाए। आज किसी भी प्रकार किसी से हुई एक छोटी सी गलती भी बहुत बड़ी गलती बन सकती है। अतः आप सभी से हाथ जोड़ कर नम्र निवेदन है कि आप सभी के हाथों में हमारी ही नहीं, बल्कि हमारे पूरे परिवार के साथ-साथ हमारे समाज की जिंदगियां भी हैं। मेरे इस अनुरोध पर आप सभी एक बार पुनर्विचार करें तथा शिफ्ट ड्यूटी में कार्यरत कर्मचारियों के दर्द को समझने की कोशिश करें, जब गाड़ियां चल नहीं रही हैं, तो शिफ्ट ड्यूटी में कर्मचारियों की संख्या कम की जानी चाहिए, उन्हें अल्टर्नेट दिन में बुलाया जाना चाहिए तथा जनरल ड्यूटी में भी किसी भी प्रकार का नया काम नहीं किया जाना चाहिए। जहां तक संभव हो, हमें इस वक्त केवल और केवल इमरजेंसी कार्यों का संपादन ही करना चाहिए। इस महामारी से बचेंगे, तो बहुत सारे काम कर लेंगे। हम बचेंगे तो देश बचेगा।”

Lifted Lc 67  both the booms air

Replaced point no 13A and 11B today at KKLR yard

A boom 90, 90 89

B boom  90,94 96

Planned special work on Barabhum Station – spot vedio

https://youtu.be/dp2Kk_gsNYg

New and special works are going on in Godiwada section, Vijayawada division, South Central Railway

https://twitter.com/irstmu/status/1244405020109361152?s=08








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कहीं निजी घाटे की पूर्ति करने के लिए तो नहीं दी जा रही प्राइवेट ऑपरेटरों को अनुमति?

लेकिन ‘विभागवाद’ से ओतप्रोत चेयरमैन, रेलवे बोर्ड (सीआरबी) विनोद कुमार यादव के दांव-पेंच से वंदेभारत को बनाने वाले रेल अधिकारियों पर निहित उद्देश्य से विजिलेंस इंक्वायरी अभी भी चल रही है। इसके चलते एक तरफ जहां रेल अधिकारियों में भारी हताशा व्याप्त है, तो दूसरी ओर देश-विदेश में इन अधिकारियों सहित भारतीय रेल का भी मखौल उड़ाया जा रहा है।

https://twitter.com/sritara/status/1237728058091528192?s=19

मात्र 97 करोड़ की लागत से बनी नई दिल्ली-वाराणसी 22435/22436 वंदेभारत एक्सप्रेस ने एक वर्ष में 115% ऑक्यूपैंसी के साथ 92 करोड़ की कमाई की। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या कोई प्राइवेट ट्रेन ऑपरेटर इससे अच्छी, सस्ती और लाभदायक सेवा दे सकता है? फिर भारतीय रेल के निजीकरण और इम्पोर्ट की ऐसी ताबड़तोड़ जल्दी क्यों है?

खबर है कि 38000 करोड़ की लागत से 60 ट्रेनसेट आयात करने और उससे मोटा कमीशन खाने की योजना जब मीडिया में लीक हो गई, तब देश की आंखों में धूल झोंकने के लिए 44 वंदेभारत रेक बनाने की अनुमति आईसीएफ को दी गई। परंतु इसके लिए जो टेंडर निकाला गया है, बताते हैं कि वह कभी फाइनल नहीं होने वाला है। प्राप्त जानकारी के अनुसार हाल ही इस संबंध में रेलवे बोर्ड में हुई बैठक में कोई सहमति नहीं बन पाई, बल्कि संबंधित अधिकारियों और वेंडर्स के बीच कुछ तथ्यों को लेकर गरमागरम बहस अवश्य हुई।

बताते हैं कि जीएम/आईसीएफ में इतना साहस नहीं है कि वह इस टेंडर को फाइनल कर सकें। विश्वसनीय सूत्रों का तो यह भी कहना है कि ऊपर से दबाव डाले जाने पर भी वह यह काम नहीं कर पाएंगे। एक अपुष्ट खबर यह भी है कि पहले सिर्फ 10 रेक बनाने की अनुमति दी गई थी, मगर प्रोपल्शन सिस्टम उपलब्ध कराने वाली कंपनी से जब मोटे कमीशन की डिमांड की गई, तब उसने रेक की संख्या बढ़ाने की मांग कर दी। बताते हैं कि इस तरह 10 रेक को बढ़ाकर 44 रेक किया गया।

सूत्रों का कहना है कि अब यह 44 रेक का टेंडर भी कभी फाइनल नहीं होगा, क्योंकि पहले वाली आयात योजना मीडिया के कारण फेल हो जाने से कमीशन का जो भारी निजी घाटा हुआ है, उसकी भरपाई प्राइवेट ऑपरेटरों को ट्रेनसेट आयात करने की अनुमति देकर की जा रही है।

देश में इस समय करीब 10 करोड़ युवा बेरोजगार हैं और यह बेरोजगारी लगातार बढ़ती जा रही है। रेल मंत्रालय ने भर्ती के नाम पर बेरोजगारों से फार्म भरवाकर पिछले एक साल से भी ज्यादा समय से उनकी 1000 करोड़ रुपये से भी अधिक की राशि हड़प रखी है। परंतु एक साल से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद इस भर्ती की कोई तारीख घोषित नहीं कर सका है।

https://youtu.be/0tsBT7SWLdw

महात्मा गांधी ने विदेशी उत्पादों के बहिष्कार से इंग्लैंड के उद्योगों की कमर तोड़ डाली थी, देशी खादी को बढ़ावा दिया था और ब्रिटिश-शासन को उखाड़ फेंका था। लेकिन ‘अति-समझदार’ रेलमंत्री पीयूष गोयल और ‘नासमझ’ सीआरबी विनोद कुमार यादव स्वदेशी रेल उद्योग को नष्ट करके निजी रेल कंपनियों के माध्यम से ट्रेनसेट इंपोर्ट करने पर आमादा हैं। जबकि देश में करोड़ों युवा बेरोजगारी के कारण इधर-उधर भटक रहे हैं।

Uncertainty on Cadre-Merger issue

Does CRB VKYadav think before he leaps? He has quite obviously misled the Cabinet.

Now he say that officers will be permitted to remain in their “own” cadres since IRMS is not legally enforceable. Were Law Ministry, DOPT and UPSC consulted before making the Cabinet note?

What does mean Mr BACKTRACKER

On Cadre-Merger CRB VKYadav initially claimed that none would suffer, then he backtracked & said that some people may lose & some gain. Now in a complete reversal he says that officers need not opt for IRMS.

https://twitter.com/kanafoosi/status/1228955966814572544?s=19

#CRB #VKYadav #CadreMerger #IRMS #DoPT #UPSC #Cabinet #TrainSet #Vandebharat #IndianRailway #PiyushGoyal #PMO #PMOIndia 





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कैंटीन में 36 लाख के घोटाले की भरपाई रेट बढ़ाकर कर्मचारियों से करने पर आमादा वर्कशॉप प्रशासन – RailSamachar

वर्कशॉप प्रशासन के इस निंदनीय निर्णय का यूनियन और कर्मचारियों का भारी विरोध

माटुंगा वर्कशॉप, मध्य रेलवे की कर्मचारी कैंटीन में वर्ष 2012 से चले आ रहे 36 लाख रुपए के घोटाले की राशि यह घोटाला करने वाले संबंधित अधिकारियों से करने के बजाय वर्कशॉप प्रशासन कैंटीन के खाद्य पदार्थों के रेट बढ़ाकर कर्मचारियों से इसकी भरपाई करने का अत्यंत अन्यायपूर्ण प्रयास कर रहा है। प्रशासन के इस निंदनीय प्रयास का विरोध यूनियन के साथ ही वर्कशॉप के लगभग सभी कर्मचारियों द्वारा भी किया जा रहा है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार माटुंगा वर्कशॉप प्रशासन द्वारा 26 जनवरी 2020 को कैंटीन में मिलने वाले खाद्य पदार्थों की कीमतों में मनमानी और कुतर्कपूर्ण वृद्धि कर दी गई थी। तभी से यूनियन और कर्मचारियों द्वारा इसका जबरदस्त विरोध किया जा रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि 36 लाख की गड़बड़ी करने वालोें को वर्कशॉप प्रशासन द्वारा अन्यायपूर्ण तरीके से बचाने और इस गड़बड़ी का पैसा कर्मचारियों से वसूलने का शर्मनाक प्रयास किया जा रहा है।

पता चला है कि वर्कशॉप प्रशासन के साथ हुई पिछली बैठक में नेशनल रेलवे मजदूर यूनियन (एनआरएमयू) ने चर्चा के दौरान रेट बढ़ाने का सख्त विरोध किया था और इस घोटाले की राशि कर्मचारियों से नहीं, बल्कि घोटाला करने वाले मैनेजमेंट कमेटी के संबंधित अधिकारियों से किए जाने की मांग की थी। परंतु ऐसा लगता है माटुंगा वर्कशॉप प्रशासन ने कर्मचारियों के हित में सोचने के बजाय घोटालेबाजों को बचाना ज्यादा जरूरी समझा है।

संभवतः आज शनिवार 7 मार्च को भी वर्कशॉप प्रशासन के साथ यूनियन प्रतिनिधियों और कैंटीन मैनेजमेंट कमेटी की बैठक होने वाली है।

यूनियन ने वर्कशॉप के अंदर चीफ वर्कशॉप मैनेजर (सीडब्ल्यूएम) कार्यालय के सामने अपना बोर्ड लगाकर वर्कशॉप प्रशासन को चेतावनी देते हुए लिखा था कि यूनियन, वर्कशॉप प्रशासन के अन्यायपूर्ण निर्णय की निंदा करती है और इस बारे में उसे सचेत करती है कि 28 मार्च 2018 को यूनियन द्वारा दिए गए मांग पत्र के अनुसार तत्काल कार्रवाई की जाए।

यूनियन ने अपने बोर्ड में यह भी लिखा था कि 36 लाख की गड़बड़ी करने वालोें के खिलाफ सख्त कदम उठाते हुए इस घोटाले की उपरोक्त राशि उनसे वसूल की जाए और वर्कशॉप कर्मचारियों से इसकी भरपाई करने के प्रयास का निंदनीय कदम तत्काल वापस लिया जाए, अन्यथा कर्मचारियों के हित में यूनियन को आंदोलन करने पर मजबूर होना पड़ सकता है, क्योंकि प्रशासन की वसूली नीति अन्यायपूर्ण है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार एनआरएमयू ने इससे पहले 11 नवंबर 2017 को भी वर्कशॉप प्रशासन को एक मांग पत्र देकर कैंटीन के रेट्स का पुनरीक्षण किए जाने की मांग की थी। उस पर भी वर्कशॉप प्रशासन ने आजतक कोई उचित निर्णय नहीं लिया है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2012 के बाद से आजतक कैंटीन के लेखा-जोखा का समुचित ऑडिट नहीं किया गया है। जो ऑडिट किया भी गया, उसकी रिपोर्ट को प्रशासन ने सार्वजनिक करना जरूरी नहीं समझा।

तथापि वर्ष 2010-11 से 2015-16 तक की जो कथित ऑडिट रिपोर्ट्स (संदर्भ- सीआर/कैंटीन/एमटीएन/आरआर, दि.08.03.2018) कर्मचारियों के हाथ लगी हैं, उनके गहन अध्ययन से माटुंगा वर्कशॉप की कर्मचारी कैंटीन में भारी गड़बड़ियां उजागर हुई हैं। इनके अवलोकन से जाहिर है कि माटुंगा वर्कशॉप की कर्मचारी कैंटीन की मैनेजिंग कमेटी भारी कुप्रबंधन और ऑडिट रिपोर्ट्स के मुताबिक अपरिमित वित्तीय गड़बड़ियों से कैंटीन की स्थिति काफी गंभीर है।

वर्कशॉप प्रशासन की “लापरवाही किसी की और भरपाई किसी से” की अन्यायपूर्ण नीति का विरोध करते हुए यूनियन ने 11 नवंबर 2017 को लिखे पत्र में कैंटीन की विस्तृत समीक्षा सहित “भाव बढ़ाने के कुत्सित प्रयास” की पूरी सच्चाई भी उजागर की थी। इसके साथ ही यूनियन ने कर्मचारियों के हित में चार मांगें भी वर्कशॉप प्रशासन से की थीं।

बताते हैं कि 7 मार्च 2018 की बैठक में सीडब्ल्यूएम ने यूनियन की चार मांगें मान ली थीं। इनमें उच्चाधिकार कमेटी का गठन करने, ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक की करने, सभी सामग्री ई-टेंडर प्रणाली से खरीदे जाने और टेंपरिंग मुक्त कंप्यूटराइज्ड रिकॉर्ड कीपिंग प्रणाली लागू किए जाने की मांग शामिल थी। बताते हैं कि यह सारी व्यवस्था आजतक लागू नहीं हो पाई है। जबकि वर्कशॉप प्रशासन 36 लाख के घोटाले को या तो रफा-दफा करने अथवा खाद्य पदार्थों का रेट बढ़ाकर घोटाले की भरपाई कर्मचारियों से करने पर आमादा है।

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एआईआरएफ सरकार की रेलवे को निजीकरण करने की मंशा कभी पूरी नहीं होने देगी – काम. शिव गोपाल मिश्र

सरकार कर्मचारी यूनियनों को भी समाप्त करने पर तुली है। न यूनियनें रहेंगी और न ही समस्याएं उजागर होंगी। इसके लिए नई नीति बन रही है, जिसमें कर्मचारी संगठन मालिकों के आदेश के बिना हड़ताल की तो बात दूर अपनी बात भी नहीं कह पाएंगे। लेकिन फेडरेशन ऐसा नहीं होना देगा। आंदोलन का बिगुल बज चुका है।

यह बातें आल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन (एआइआरएफ) के महामंत्री शिव गोपाल मिश्र ने कही। वह सोमवार को रेल अधिकारी क्लब परिसर में एनई रेलवे मजदूर यूनियन (नरमू) के 59वें वार्षिक अधिवेशन के खुले सत्र को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। महामंत्री ने सरकार पर सीधे हमला बोला। कहा कि यह सही है कि सरकार अंग्रेजी हुकूमत की तर्ज पर कार्य कर रही है लेकिन इसको लेकर तनिक भी भयभीत होने की जरूरत नहीं है। सुनने में आ रहा है कि रेलवे बोर्ड हड़ताल करने वाले कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाएगा। यूनियन करने वाले 50 हजार कर्मचारियों को जबरन रिटायर्ड कर दिया जाएगा लेकिन यह सही नहीं है। यूनियन से जुड़े 99 फीसद कर्मचारी अपना 100 फीसद कार्य करते हैं। रेल कर्मचारियों के चलते देश में सस्ते कोच और इंजन तैयार हो रहे हैं। ट्रेनें निर्बाध गति से चल रही हैं। कर्मचारी अपनी कुर्बानियां दे रहे हैं। इसके बाद भी सरकार रेलवे को टुकड़े-टुकड़े में निजी हाथों में सौंपना चाहती है, लेकिन फेडरेशन सरकार की मंशा को पूरा नहीं होने देगा।

एआइआरएफ के महामंत्री ने कहा कि कर्मचारियों के कार्य करने के घंटे बढ़ते जा रहे हैं। संरक्षा कोटियों में भी आठ घंटे से अधिक ड्यूटी ली जा रही है। स्टेशनों और कार्यालयों का नव निर्माण हो रहा है। लेकिन कालोनियों की सुध नहीं ली जा रही। इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट फेडरेशन की चेयरपरसन प्रीती सिंह ने अपने उद्बोधन में आंदोलन में युवाओं और महिलाओं को अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने का आह्वान किया। अधिवेशन का संचालन नरमू के अध्यक्ष बसंत लाल चतुर्वेदी ने किया। अध्यक्षता केएल गुप्त ने की। इस मौके पर संयुक्त महामंत्री नवीन कुमार मिश्र, एससीएसटी एसोसिएशन के महामंत्री चंद्रशेखर और मुन्नी लाल आदि मौजूद थे।

नरमू ने निकाला जुलूस, लाल झंडों से रंगा रेलवे परिसर

एनई रेलवे मजदूर यूनियन ने रेलवे स्टेशन से अधिकारी क्लब तक गाजे- बाजे के साथ जुलूस निकाला। कार्यकर्ताओं ने एआइआरएफ और नरमू के पक्ष में जमकर नारेबाजी की। निजीकरण, निगमीकरण व नई पेंशन योजना को लेकर सरकार के विरोध में प्रदर्शन भी किया।

कार्यकर्ताओं ने एआइआरएफ के महामंत्री शिव गोपाल मिश्र और सहायक महामंत्री केएल गुप्त का फूलमालाओं से स्वागत किया। आगे बैंड के साथ घोड़े चल रहे थे, पीछे खुली जीप में पदाधिकारी कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा रहे थे। स्टेशन और मुख्यालय परिसर लाल झंडों से रंग गया था।

आल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन (एआइआरएफ) के महामंत्री शिव गोपाल मिश्र ने कहा कि रेलवे बोर्ड ही नहीं सरकार भी झूठा प्रचार कर रही है कि देश की पहली कॉरपोरेट एक्सप्रेस तेजस 70 लाख के फायदे में है। लोगों को भ्रमित किया जा रहा है। जबकि यह ट्रेन पूरी तरह से घाटे में चल रही है। इसके बाद भी रेलवे बोर्ड ने 150 प्राइवेट ट्रेन और 50 स्टेशनों को निजी हाथों में देने की योजना तैयार कर ली है।

फेडरेशन सरकार की मंशा सफल नहीं होने देगा। ट्रेनों और स्टेशनों को बेचने नहीं देगा। महामंत्री सोमवार को रेलवे अधिकारी क्लब में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। एनई रेलवे मजदूर यूनियन के 59वें वार्षिक अधिवेशन में बतौर मुख्य अतिथि भाग लेने आए शिव गोपाल मिश्र ने कहा कि न रेलवे का निजीकरण होगा और न ही निगमीकरण। सरकार ने मजबूर किया तो हड़ताल होगा। एक साथ देशभर में भारतीय रेलवे का चक्का जाम हो जाएगा। रेलवे में निजीकरण, निगमीकरण, नई पेंशन योजना, खाली होते रिक्त पद और कर्मचारियों के बढ़ते कार्य की अवधि बड़ी चुनौती बनती जा रही है। चेन्नई में आयोजित एआइआरएफ के अधिवेशन में लड़ाई की रणनीति पर मुहर लग चुकी है। फेडरेशन देश भर के श्रमिक और कर्मचारी संगठनों को एक मंच पर लाने का कार्य करेगा। कर्मचारी संगठन ही नहीं रेल उपभोक्ताओं को भी आंदोलन से जोड़ा जाएगा। क्योंकि अब यह आंदोलन फेडरेशन और रेल कर्मचारियों का ही नहीं आम जन का मुद्दा बन गया है। सेंट्रल ट्रेड यूनियन ने पुरानी पेंशन योजना की बहाली को लेकर बजट सत्र में आठ जनवरी को संसद पर प्रदर्शन करने का निर्णय लिया है।

’>>अंग्रेजी हुकूमत की तर्ज पर चल रही वर्तमान सरकार

’ भयभीत होने की जरूरत नहीं, बज चुका है आंदोलन का बिगुल

पेंशन बंद होने से छह लाख से अधिक युवाओं का भविष्य अंधकार में है। फेडरेशन भी संसद सहित देशभर में आंदोलन करेगा। निजीकरण, निगमीकरण पर अंकुश लगाने तथा पुरानी पेंशन योजना की बहाली पर सरकार नहीं मानी तो फेडरेशन बजट सत्र में ही हड़ताल की घोषणा भी कर देगा। लेकिन हड़ताल को राजनीतिक रंग नहीं देगा।

शिव गोपाल मिश्र, महामंत्री, एआइआरएफ





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