अक्षम रेलकर्मियों के मरने के लिए लावारिस छोड़ देता है रेल प्रशासन – RailSamachar

मामलों को सालों-साल लटकाकर अक्षम रेलकर्मियों को मरने के लिए अकेला छोड़ देना अत्यंत अमानवीय कृत्य है!

खबर है कि मध्य रेलवे में मेडिकल इनवैलीडेशन के बहुत से मामले लंबे समय से पेंडिंग हैं। इसके लिए प्रिंसिपल सीएमडी, मध्य रेलवे द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है। यह पीसीएमडी की अकर्मण्यता है या लापरवाही? यह पूछ रहे हैं मेडिकली काम करने में अक्षम हो चुके रेलकर्मियों के तमाम परिजन।

बताते हैं कि पूरी भारतीय रेल में इस तरह के सैकड़ों-हजारों केस लंबित हैं। परिजनों के सामने उनके मरने की प्रतीक्षा करने के सिवा कोई विकल्प नहीं है।

उनका कहना है कि अपने एकमात्र कमाऊ व्यक्ति को मरते हुए देखना बहुत अमानवीय है, परंतु उनके सामने अन्य कोई विकल्प नहीं बचा है। आर्थिक रूप से भी ऐसे सभी परिवार बुरी तरह टूट चुके हैं।

इस मामले में जानकारों का कहना है कि रेल प्रशासन को वैसे भी संबंधित रेलकर्मी के किसी न किसी परिजन को अनुकंपा नियुक्ति देनी है। ऐसे में अगर लंबे समय से असाध्य बीमारियों के चलते कर्मचारी काम करने में अक्षम और अयोग्य हो चुका है, तो मेडिकली इनवैलीड सर्टिफाई करके और उसके किसी परिजन को अनुकंपा नियुक्ति देकर उसके परिवार को आर्थिक रूप से कंगाल होने से बचाया जा सकता है।

उनका कहना है कि जब उनको नियमानुसार अनुकंपा नियुक्ति देनी ही है, तो रेलकर्मी के मरने का इंतजार किए बिना भी यह काम बहुत आसानी से और मानवता के आधार पर समय रहते किया जाना चाहिए।

#PCMDCR #Medical_Invalidation #IRHS #CentralRailway #IndianRailway #RailwayBoard #RailMinIndia #PiyushGoyal





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बिहारी मजदूरों को लूट रहे पटना जंक्शन के टीटीई – RailSamachar

पटना जंक्शन के टिकट चेकिंग स्टाफ का भ्रष्टाचारपूर्ण कारनामा

गाड़ी संख्या 02587/ 05097/ 02331, जो जम्मू की तरफ जाती है, में पटना जंक्शन का कुछ टिकट चेकिंग स्टाफ यात्रियों से जमकर वसूली करता है।

मामला दरअसल यह है कि बिहार से बहुत सारे मजदूर अब कोरोना का कहर कुछ कम होने के बाद पंजाब, हिमाचल और जम्मू की तरफ रोजी-रोटी कमाने के लिए वापस लौट रहे हैं। ये लोग ज्यादातर अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे होते हैं।

कोई अगर थोड़ा-बहुत पढ़ा लिखा होता भी है तो भी यहां के टीटीई बाबू की तरफ से बनाई गई टिकट की रसीद ये मजदूर लोग तो क्या खुद टीटी बाबू भी न पढ़ पाएं।

ऐसे बहुत से लोगों को कन्फर्म टिकट नहीं मिलता, मगर ये लोग गाड़ी में बैठ जाते हैं या इन्हें बैठा दिया जाता है। टिकट का पूरा किराया जुर्माने सहित और उससे भी अधिक इनसे ले लिया जाता है।

मगर इनको दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन (डीडीयू) तक की ही टिकट बनाकर गाड़ी में यह कहकर बैठा देते हैं कि “आपकी जम्मू तक की टिकट बना दी है। चिंता मत करो, कोई दिक्कत नहीं होगी, आगे आपको कोई परेशान नहीं करेगा।”

रविवार, 13 जून को गाड़ी संख्या 02331 में ऐसे ही 42 लोग पकड़े गए, जिनमें से 8 को जालंधर, 22 को पठानकोट और बाकी को जम्मू जाना था। इनसे टिकट के निर्धारित किराए से भी अधिक पैसा लेकर गाड़ी में बिठा दिया गया था।

जालंधर में जब ये लोग नीचे उतरे तो इनको वहां के टिकट चेकिंग स्टाफ ने पकड़ लिया और जब उन्होंने इनके पास से मिली रसीद चेक की तो पता चला कि वह तो पटना जंक्शन से दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन तक की ही बनी हुई है।

यह पटना जंक्शन के टिकट चेकिंग स्टाफ की EFT है जिसे देखकर कोई भी ये नहीं बता सकता कि इस पर क्या लिखा है। यह 420220 नंबर से लेकर 420234 नंबर तक की EFT एक ही चेकिंग स्टाफ ने बनाई है, जो जालंधर में पकड़ी गई है।

तभी यात्रियों ने वहां रो-रोकर बताया कि उनसे तो पटना जंक्शन पर बहुत ज्यादा पैसे ले लिए गए हैं और फिर भी उनको गलत टिकट क्यों बनाकर दी गई।

बहरहाल, जालंधर में इन लोगों को फिर से जुर्माना देकर टिकट बनवानी पड़ी। ऐसे ही पठानकोट में भी हुआ और जम्मू जाने वाले 12 लोग कठुआ में उतर कर भाग गए।

इस तरह पटना जंक्शन का कुछ टिकट चेकिंग स्टाफ इन बिहारी मजदूरों को जमकर लूट रहा है और पता नहीं कि उनकी यह लूट-खसोट कब से चल रही है।

ये वह #EFT (एक्सट्रा फेयर टिकट) रसीद है जिससे यात्रियों को जालंधर में दुबारा जुर्माने सहित पैसा भरना पड़ा।

अतः रेल प्रशासन द्वारा पिछले एक-डेढ़ साल के दौरान पटना जंक्शन से डीडीयू स्टेशन तक की बनाई गई सभी टिकट रसीदों (ईएफटी) की गहराई से जांच की जानी चाहिए और संबंधित चेकिंग स्टाफ की जिम्मेदारी तय करते हुए उनके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।

#Patnajn #EastCentralRailway #ECR #Ticket #IndianRailway #NorthernRailway #TTE





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अब जीएम पोस्टिंग में देरी से और ज्यादा होगी रेल मंत्रालय की किरकिरी

सरकार, मंत्री और सीआरबी जब व्यवस्था के हित की सोचकर कोई निर्णय लेंगे, तभी इसका कुछ भला हो पाएगा। तभी समय पर सही निर्णय और उस पर अमल सुनिश्चित हो पाएगा, तभी रेल का और देश का भी भला होगा, अन्यथा व्यवस्था का तिया-पांचा तो हो ही रहा है।

साढ़े आठ महीने (सितंबर 2020 से 12 जून 2021) बीत जाने के बाद अंततः जीएम पैनल फाइनल होकर शनिवार, 12 जून को रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) में आ गया। अप्रैल में डीपीसी और एसीसी से फाइनल होकर 23-24 मई से यह प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर के लिए पीएमओ में लंबित था।

जीएम पैनल जिस तरह सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि रेलकर्मी और अधिकारी इसके फाइनल होकर आने की प्रतीक्षा कितनी बेसब्री के साथ कर रहे थे।

अब यह सुनिश्चित किया जाए कि बिना कोई देरी किए, बिना किसी फेवर या बारगेनिंग के वैकेंसी सीक्वेंस के अनुसार जीएम की पोस्टिंग की जाएं, अन्यथा ज्ञापनबाजी की शुरूआत होगी, फिर ज्यादा देरी होगी और फिर रेलवे की फजीहत होगी!

इसके अलावा, 30 जून को खाली हो रही तीन जीएम पोस्टों को भी इसी पोस्टिंग प्रस्ताव में शामिल किया जाना चाहिए!

यह अपेक्षा उन सभी वरिष्ठ अधिकारियों की है जो पिछले छह महीनों से अपनी पोस्टिंग की प्रतीक्षा कर रहे हैं और जिनका जीएम में काम करने का कार्यकाल पहले ही छह महीने कम हो चुका है, या जानबूझकर कम किया गया है।

फिलहाल क्रमवार खाली जीएम पद और वैकेंसी सीक्वेंस के अनुसार पोस्टिंग की प्रतीक्षा में वरिष्ठ अधिकारियों की स्थिति निम्नवत है –

1. पूर्व रेलवे                  – अरुण अरोरा
2. उत्तर मध्य रेलवे        – प्रमोद कुमार
3. आईसीएफ               – अतुल अग्रवाल
4. दक्षिण पश्चिम रेलवे   – संजीव किशोर
5. मध्य रेलवे                – ए. के. लाहोटी
6. दक्षिण पूर्व रेलवे        – अर्चना जोशी

इस महीने 30 जून को खाली हो रहे जीएम के तीन पद

1. जीएम/पूर्व मध्य रेलवे
2. डीजी/आरडीएसओ
3. जीएम/दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे

उपरोक्त तीनों पदों पर वैकेंसी सीक्वेंस के अनुसार जीएम पैनलिस्ट तीन वरिष्ठ अधिकारियों – अनुपम शर्मा, आलोक कुमार एवं विजय शर्मा – की जीएम पद पर पोस्टिंग का नंबर लगता है।

एडवांस में हो जीएम पैनल की प्लानिंग

अब आगे से यह भी सुनिश्चित किया जाए कि जीएम पैनल की तैयारी एडवांस में हो। अगर पैनल फाइनल करने की प्रक्रिया में छह-सात महीनों का समय लगता है, जो कि वास्तव में नहीं लगना चाहिए, तो कैलेंडर वर्ष 2022 के जीएम पैनल की तैयारी आज से ही शुरू कर दी जानी चाहिए।

डीआरएम की पोस्टिंग में देरी से भी असंतोष

इसके अलावा, यदि डीआरएम की भी पोस्टिंग में और ज्यादा विलंब होते देखकर पोस्टिंग की प्रतीक्षा कर रहे हताश अधिकारी कह रहे हैं कि यह इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि “रेल नेतृत्व विहीन है और शीर्ष पद पर बैठा अधिकारी उस पर बैठने के लायक नहीं है, उसे फौरन से पेश्तर रिप्लेस किए जाने की आवश्यकता है।”

बहुत पहले साबित हो चुकी थी अकर्मण्यता

हालांकि यह बात तो वर्ष 2018 में अनिर्णय, अकर्मण्यता, मानवीयता, सहृदयता और नेतृत्व गुणवत्ता इत्यादि को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा कराए गए सर्वे में पहले ही साबित हो चुकी थी, तथापि बलिहारी है भारत सरकार की कि जिसे अपरिमित टैलेंट्स से परिपूर्ण भारतीय रेल में शीर्ष पर बैठाने के लिए केवल वही मिलता है, जो उसे मौके पर सही सलाह देने में अक्षम होता है, जी-हजूरी करने में अव्वल होता है, और जो हुकुम का गुलाम होता है, जिसके लिए व्यवस्था के हित के बजाय मंत्री का या अपना हित सर्वोपरि होता है।

सरकार या मंत्री और सीआरबी जब व्यवस्था के हित की सोचकर कोई निर्णय लेंगे, तभी इसका कुछ भला हो पाएगा। तभी समय पर सही निर्णय और उस पर अमल सुनिश्चित हो पाएगा, तभी रेल का और देश का भी भला होगा, अन्यथा व्यवस्था का तिया-पांचा तो हो ही रहा है।

#PiyushGoyal #RailMinIndia #PMOIndia #IndianRailway #RailwayBoard #CEORlys #DoPTGoI





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जिसे निज देश, निज भाषा और निज गौरव का अभिमान नहीं!वह नर नहीं, नरपशु निरा, और मृतक समान है!!

“काबिलियत” नहीं – “योग्यता”। “इंसान” नहीं – “आदमी”, “मनुष्य”। “इंसानियत” नहीं – “मानवता”, “मानवीयता”

सुरेश त्रिपाठी

जिस प्रकार “काबिलियत” का शाब्दिक या भाषिक कोई अर्थ नहीं निकलता। उसी प्रकार “इंसान” और “इंसानियत” शब्दों के साथ भी है। यह केवल आभासी हैं, जो केवल आभास देते हैं। जबकि “योग्यता”, “योग्य” से बना शब्द है, जो “योग्य” है, वही “योग्यता” को धारण करता है। “काब” का कोई अर्थ नहीं निकलता, इसलिए उससे बने “काबिलियत” शब्द का भी कोई अर्थ नहीं है! यह केवल आभासी है।

हम और हमारी भाषा क्या इतने दरिद्र हो गए हैं कि अपने दैनंदिन बोलचाल और कार्य-व्यवहार में उर्दू, अरबी, फारसी, अंग्रेजी के निरर्थक शब्दों का घालमेल कर रहे हैं? अथवा जाने-अनजाने उनका उपयोग करके हम क्या स्वयं को ज्यादा जानकार, योग्य या श्रेष्ठ बताने-जताने का प्रयत्न करते हैं?

माना कि शब्दों के आदान-प्रदान से भाषाएं समृद्ध होती हैं, पर क्या हमारी भाषा इतनी दरिद्र है कि हम उसके लिए दूसरी भाषाओं के निरर्थक शब्दों का आयात करें?

हिंदी स्वयं में एक अत्यंत समृद्ध भाषा है। किसी अन्य भाषा के शब्दों को उधार लिए बिना हम अपने आपको हिंदी बहुत सरलता से व्यक्त कर सकते हैं। इसके हर तात्विक शब्द के कई-कई पर्यायवाची उपलब्ध हैं। इसके अलावा दुनिया की लगभग सभी भाषाओं की जननी “संस्कृत” हमारी वैदिक, ऐतिहासिक धरोहर भी हमारे पास सुरक्षित है। तथापि अगर हमें नए शब्दों की आवश्यकता है, तो उन्हें गढ़ा जाना चाहिए अथवा उनकी खोज संस्कृत में की जानी चाहिए।

स्मरण रहे, जो व्यक्ति अथवा समाज उधार पर जीवनयापन करता है, वह ज्यादा समय तक जीवित नहीं रहता। इसी प्रकार जो भाषा उधार के शब्दों पर अवलंबित हो जाती है, उसका अस्तित्व शीघ्र समाप्त हो जाता है। अतः हमें अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी के उन शब्दों का प्रयोग-उपयोग करने से भरसक बचना चाहिए, जिनके अर्थ वास्तव में हमें ज्ञात नहीं होते हैं।

जिसे निज देश, निज भाषा और निज गौरव का अभिमान नहीं! वह नर नहीं, नरपशु निरा, और मृतक समान है!!





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आज तक नहीं किया गया कटरा में टीटीई रेस्ट हाउस का इंतजाम, इधर-उधर भटकने को मजबूर चेकिंग स्टाफ

डीआरएम ने निकाल दिया मौज-मस्ती में अपना कार्यकाल, हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं मुख्यालय के वाणिज्य अधिकारी

सुरेश त्रिपाठी

फिरोजपुर: श्री वैष्णव देवी कटरा रेलवे स्टेशन पर कोई टीटीई रेस्ट हाउस नहीं है। जबकि इस स्टेशन को बने हुए और चालू हुए कई वर्ष बीत चुके हैं।

भारतीय रेल के अधिकांश अधिकारियों का श्री वैष्णव देवी के दर्शन लाभ के लिए यहां अक्सर आना-जाना लगा रहता है। तथापि आज तक उनका ध्यान इस एक बड़ी समस्या और आवश्यक व्यवस्था की तरफ क्यों नहीं गया, यह आश्चर्य की बात है।

अधिकारियों ने अपने ठहरने के लगभग सभी आलीशान इंतजाम वहां किए हैं। मगर अर्निंग स्टाफ की कोई यथोचित व्यवस्था आज तक नहीं की गई है।

विभिन्न मंडलों से गाड़ियां लेकर कटरा आने वाले टीटीई के लिए ठहरने के जो इंतजाम किए गए हैं, वहां बेड होता है, तो बेडशीट नहीं होती, साफ-सफाई का कोई इंतजाम नहीं होता, और इतनी गर्मी में एसी तो बहुत दूर की बात है, कूलर तक का कोई इंतजाम नहीं है।

डीआरएम/फिरोजपुर ने अपना दो साल का कार्यकाल पूरी अय्याशी, मौज-मस्ती और मनमानी करते हुए निकाल दिया। इसके अलावा दो साल में यहां उन्होंने तीन सीनियर डीसीएम बदलवा दिया, जिससे कमर्शियल स्टाफ का कोई माई-बाप ही नहीं रहा, वह अपनी समस्या कहें तो किससे जाकर कहें!

स्टाफ का कहना है कि मंडल में कई फालतू और अनुपयोगी काम कराए गए, परंतु टीटीई के लिए जो आवश्यक और मानक कार्य किया जाना चाहिए था, वह नहीं कराया गया।

इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि आज जब कुछ ही गाड़ियां चल रही हैं और बहुत थोड़ा स्टाफ वहां पहुंचता है, जब उसके लिए ही व्यवस्था कम पड़ रही है, तो जब सभी गाड़ियां चलेंगी, और ज्यादा स्टाफ वहां पहुंचेगा, तब तो उसके सामने प्लेटफार्म पर डेरा डालने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं होगा।

इस सबके साथ उत्तर रेलवे मुख्यालय बड़ौदा हाउस में हाथ पर हाथ धरे बैठे संबंधित वाणिज्य अधिकारियों की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे न सिर्फ अर्निंग बटोरने के लिए ही वाणिज्य स्टाफ को झोंकें, बल्कि उनकी आवश्यकताओं और आवश्यक सुविधाओं का भी बंदोबस्त करने-कराने की पहल करें।

अब जहां तक बात आती है मान्यताप्राप्त संगठनों और उनके पदाधिकारियों की, जो कि खुद को रेलवे का तथाकथित स्टेकहोल्डर और रेलकर्मियों का ठेकेदार मानते हैं, वे अपनी आत्मा गिरवी रख चुके हैं। ऐसे में उनके बारे में कुछ न ही कहा जाए, तो शायद अच्छा है, क्योंकि मृत अथवा मृतप्राय लोगों के बारे में कुछ बुरा कहने की भारतीय परम्परा नहीं है!

#NorthernRailway #GMNRly #DRMFZR #IndianRailway #RailMinIndia #PiyushGoyal #RailwayBoard #RailwayAdministration





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मध्य एवं पश्चिम रेलवे की नाला सफाई में मुंबई मनपा के बह गए 30 करोड़!

गत 12 वर्षों में रेलवे के 116 नालों की सफाई में मुंबई मनपा ने खर्च किए ₹30 करोड़ से अधिक

मुंबई में मध्य रेलवे एवं पश्चिम रेलवे के नालों (कल्वर्ट्स) की उचित साफ-सफाई नहीं होने से मानसून की पहली ही बारिश में बुधवार, 9 मई को कुर्ला से लेकर सायन और माटुंगा के बीच रेल पटरियों पर बारिश का पानी जमा हुआ और मुंबई उपनगरीय रेल सेवा बुरी तरह प्रभावित हुई।

गनीमत यह रही कि कोविड के चलते लोकल ट्रेन सेवाएं फिलहाल केवल आवश्यक सेवाओं से जुड़े सरकारी और कुछ गैर सरकारी कर्मचारियों के लिए ही चलाई जा रही हैं। अन्यथा सामान्य कामकाज के दिनों की तरह अगर सभी लोकल सेवाएं चल रही होतीं, तो पीक ऑवर में लाखों उपनगरीय यात्रियों का बहुत बुरा हाल हो गया होता।

“पिछले 12 सालों में रेलवे के 116 नालों की साफ-सफाई पर 30 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए गए हैं। यह सफाई उचित तरीके से न होने के कारण 30 करोड़ रुपये पानी में बह गए।” यह आरोप आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने रेलवे और मुंबई महानगर पालिका पर लगाया है।

मुंबई में रेलवे के अंतर्गत आने वाले कल्वर्ट, जिनकी हर साल रेल प्रशासन द्वारा सफाई कराई जाती है और मुंबई मनपा द्वारा हर साल 3 से 4 करोड़ रुपये का भुगतान रेलवे को किया जाता है।

पिछले 12 साल में मुंबई मनपा से रेलवे को 30 करोड़ रुपये मिले हैं, लेकिन आज तक रेलवे की ओर से कोई ऑडिट नहीं हुआ, और न ही आजतक मुंबई महानगर पालिका द्वारा किए गए खर्च का रेलवे से कोई हिसाब मांगा गया।

मुंबई में रेल लाइनों के नीचे से गुजरने वाले कुल 116 नालों में से 53 मध्य रेलवे, 41 पश्चिम रेलवे और 22 हार्बर लाइन के अंतर्गत आते हैं।

वर्ष 2009-10 से 2017-18 तक के 9 सालों में मुंबई मनपा ने रेल प्रशासन को 23 करोड़ रुपये दिए थे। वर्ष 2018-19 में 5.67 करोड़ मनपा ने खर्च किए।

कुल मिलाकर, नालों की साफ-सफाई के मद में पिछले 12 वर्षों के दौरान मुंबई मनपा द्वारा कुल 30 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान रेलवे को किया गया है।

मुंबई महानगरपालिका ने इस साल मुंबई सीएसएमटी से लेकर मुलुंड तक रेल लाइनों के नीचे से निकलने वाले सभी नालों की साफ-सफाई महज 15 दिनों में पूरा करने का दावा किया है।

अनिल गलगली के अनुसार, हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई के लिए मुंबई मनपा रेलवे को भुगतान करती है, लेकिन नालों की सफाई का कोई ऑडिट नहीं होता है।

उन्होंने कहा कि कुर्ला और सायन के बीच पिछले कई वर्षों से रेल सेवाएं ठप होती हैं। अगर 31 मई तक नालों की सफाई का सर्वे कराया जाए, तो ऐसी स्थिति नहीं पैदा होगी।

अनिल गलगली ने कहा कि दोनों एजेंसियां इसके लिए ​​समान रूप से जिम्मेदार हैं। जनता को दोनों एजेंसियों द्वारा किए गए खर्च के बारे में सूचित किया जाना आवश्यक है। फिर चाहे वह रेलवे हो या मुंबई महानगरपालिका!

उन्होंने इस मद में हुए खर्च की पूरी जानकारी सार्वजनिक किए जाने की मांग की है।

#Anil_Galgali, RTI activist demanding accountal of money from BMC, CR & WR on #Culvert_Cleaning

#CentralRailway #WesternRailway #BMC #Culvert_Cleaning #IndianRailway





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क्रीमी लेयर की मुफ्तखोरी और संविधान! – RailSamachar

सरकारी मलाई की मुफ्तखोरी को अब भूल जाएं! निजी उद्योग को यूरोप के गुणों के साथ अपनाया जाए। हर काम बराबर है। हर हाथ को काम मिले। संविधान भी यही कहता है!

“राष्ट्रवाद के सही मायने!” शीर्षक से प्रकाशित लेख के संदर्भ में वरिष्ठ लेखक श्री प्रेमपाल शर्मा के विचार

दसवीं क्लास की परीक्षा के लिए यह निबंध अच्छा कहा जाएगा और यह भी कि यह मानो 1960 में लिखा गया हो। सन 80 तक हम सब ने ऐसे निबंध लिखे हैं, क्योंकि सरकार और मीडिया बार-बार संविधान की ऐसी ही दुहाई देता था; निजी उद्योग, मेहनत तो पाप है।

लेकिन न औद्योगिक उत्पादन बढ़ा, न शिक्षा में गति आई, बल्कि लाइसेंस – परमिट राज में रिश्वतखोरी, कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार ऐसा फला-फूला कि जिसकी टीस आज तक कायम है।

सरकारी नौकरी को दामाद की तरह देखना अब आने वाले दिनों में एक दिवास्वप्न साबित होने वाला है, जिसके लिए एक प्रसिद्ध लेखक ने कहा था, “जब तक सरकारी नौकरी, तब तक हरामखोरी, और बाद में पेंशन की सुविधा मुफ्त!” ऐसे में डूबना ही था, सो डूब ही गया पूरा सरकारी तंत्र।

पहले एक के बाद एक निजी स्कूल सामने आए। फिर अस्पताल सामने आए। एयरलाइंस आईं। अब भारतीय रेल की बारी है, क्योंकि प्राइवेट सेक्टर के मुकाबले हरामखोरी, कामचोरी, मुफ्तखोरी जैसे दुर्गुणों को खत्म करने के लिए अब तक हमने एक भी कदम नहीं उठाया।

दुनिया में आज वे राष्ट्र आगे हैं जो निजी पूंजी और सरकारी कल्याणकारी नीतियों में तालमेल बिठाए हुए हैं। सोवियत संघ (यूएसएसआर) तो पूरा का पूरा 1990 में ही डूब गया। और अब अपने ही देश में पश्चिम बंगाल की हालत देख लें।

उत्तर भारत तो 3 में न 13 में। वहां न सरकार चल सकती, न तंत्र, और न ही निजी उद्योग चल सकते हैं। वहां तो जाति-धर्म रंगदारी, लूट ही चलेगी और इन सबको मिलाकर राजनीति चल सकती है।

इसलिए सरकारी मलाई की मुफ्तखोरी को अब भूल जाएं! निजी उद्योग को यूरोप के गुणों के साथ अपनाया जाए। हर काम बराबर है। हर हाथ को काम मिले। संविधान भी यही कहता है!

#प्रेमपाल_शर्मा, दिल्ली, 1 जून 2021.





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रेल संगठनों के निठल्ले पदाधिकारियों की चापलूसी से बचें रेल अधिकारी

DRH/KYN: डॉक्टर की तत्परता से बची रेलकर्मी की जान

डॉक्टरों और रेल अधिकारियों को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि वे रेल प्रशासन द्वारा सौंपी गई आधिकारिक जिम्मेदारी और अपने पेशेगत दायित्व का निर्वाह कर रहे होते हैं। अतः उन्हें रेल संगठनों के कुछ निठल्ले पदाधिकारियों की चापलूसी से बचने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए!

In absence of regular surgeon, Dr. Rafiqul Islam, ACMS, Divisional Railway Hospital, Kalyan (DRH/KYN) has again done an exemplary work by diagnosing injured on duty (IOD) railway employee as suffering from serious internal injury and going into in shocked state on 12.05.2021 at 12:00 Noon.

His clinical acumen and alacrity have saved Vikram Kumar’s life who is seriously injured on duty working at diesel loco shed, Kalyan.

His index of suspicion of internal injury came true as he underwent exploratory laparotomy at Fortis hospital Kalyan within half an hour of landing in the hospital.

His mesenteric artery was damaged due to blunt trauma and he lost two and half litres of blood internally.

This is all appreciable because of Dr Rafiqul’s efforts, sincerity and clinical presence of mind.

घटना का विवरण कुछ इस प्रकार है –

बुधवार, 12 मई 2021 को कल्याण डीजल शेड में विक्रम कुमार नामक टेक्नीशियन एक डीजल लोको पर मार्कर लाइट का काम कर रहा था। इसी दौरान अचानक पीछे से एक इंजन रोल डाउन होकर उसके इंजन से टकराया।

विक्रम कुमार जिस इंजन पर काम कर रहे थे, उसके बफर के सामने खड़े हुए थे और पिछले इंजन का बफर उनके इंजन के बफर से टकराया और वह दोनों बफर के बीच में दब गए।

तत्काल वहां आसपास उपस्थित अन्य रेलकर्मियों, जो एक रेल संगठन के सक्रिय सदस्य बताए गए हैं, ने विक्रम को उस बफर में से बाहर निकालकर बिना देरी किए कल्याण रेलवे हॉस्पिटल पहुंचाया।

कल्याण रेलवे अस्पताल में सर्जन की अनुपस्थिति में अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए एसीएमएस डॉ रफीकुल इस्लाम ने हादसे की गंभीरता को भांपते हुए तत्काल सीएमएस डॉ शशांक मल्होत्रा को सूचित किया और उनकी अनुमति से बिना देरी किए आंतरिक रूप से गंभीर घायल विक्रम कुमार को कल्याण के फोर्टिस हॉस्पिटल में भेज दिया गया, जहां डॉक्टरों की तात्कालिक सक्रियता से उसकी जान बच सकी।

ओछी मानसिकता का प्रदर्शन करने से बचें रेल संगठनों के पदाधिकारी

इस बीच उसे अस्पताल लाने वाले रेलकर्मी हर समय उसके साथ थे और जहां पैसे की जरूरत पड़ी वहां उन्होंने पैसा भी खर्च किया। लेकिन बताते हैं कि अगले दिन गुरुवार, 13 मई को एक अन्य रेल संगठन के कुछ लोग, जिनका कि इस महती कार्य में कोई विशेष योगदान नहीं रहा, वे डॉक्टरों को गुलदस्ते देकर फोटो खिंचा रहे थे।

इतनी गंभीर स्थिति में भी यदि कुछ रेलकर्मी अपने सहकर्मी रेल कर्मचारी का सहयोग करने के बजाय रेलवे अस्पताल में जाकर सीएमएस और डॉक्टरों को बुके देकर अपना क्रेडिट ले रहे थे, यह न सिर्फ अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि आपदा में अवसर तलाशने की विकृत मानसिकता का द्योतक भी है।

भविष्य में कोई भी सामाजिक कार्यकर्ता अथवा यूनियन के पदाधिकारी इस तरह की दूषित मानसिकता और ओछी हरकतों का प्रदर्शन करने से बचें, तो उचित होगा।

डॉक्टर और अधिकारी भी बचें चापलूसी से!

संदर्भ वश यहां डॉक्टरों और अधिकारियों को भी ऐसे हर मौके पर यह ध्यान रखना चाहिए कि वे रेल प्रशासन द्वारा सौंपी गई आधिकारिक जिम्मेदारी और अपने पेशेगत दायित्व का निर्वाह कर रहे होते हैं।

अतः उन्हें रेल संगठनों के कुछ दलाल टाइप निठल्ले पदाधिकारियों की चापलूसी से बचने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि उनके साथ नजदीकी दर्शाकर इस तरह कुछ संगठन पदाधिकारी कई बार सामान्य रेलकर्मियों का आर्थिक शोषण करने से भी बाज नहीं आते हैं।

#DRHKYN #CentralRailway #Union #Railway





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रिटायरमेंट के बाद भी पंद्रह दिन तक ऑफिस आकर बैठते रहे पीसीएसओ, पूर्वोत्तर रेलवे

रिटायर हो चुके एस. एन. शाह को “कारण बताओ नोटिस” जारी की जाए। तत्पश्चात इस बात की जांच की जानी चाहिए कि 14-15 दिनों में उन्होंने ऑफिस में बैठकर क्या-क्या घालमेल किया?

विजय शंकर, ब्यूरो प्रमुख,गोरखपुर

यह अजब है कि कोई विभाग प्रमुख (पीएचओडी) रिटायर होने के बाद भी ऑफिस में बाकायदा बैठकर लगातार पंद्रह दिनों से काम कर रहा हो, अपने मातहत रहे अधिकारियों और कर्मचारियों को डांट-डपट रहा हो, हड़का रहा हो, मातहत अधिकारी की गाड़ी जबरन इस्तेमाल कर रहा हो, फिर भी उसके मातहतों को तो छोड़ो, उसके ऊपर समकक्ष अधिकारी भी इसे अनदेखा करें, यह बात कुछ हजम में नहीं होती!

यह करिश्मा साक्षात घटित हुआ है पूर्वोत्तर रेलवे मुख्यालय गोरखपुर में, जहां पीसीएसओ एस. एन. शाह 30 अप्रैल को सेवानिवृत्त होने के बाद भी अब तक लगातार और बाकायदा अपने चैंबर में आकर पूर्व रुतबे के साथ बैठ रहे हैं।

बताते हैं कि उन्होंने इसका बहाना अपने मातहत काम कर रहे लोगों को यह कहकर बताया कि “उन्होंने सोचा, जब तक नए सीएसओ की पोस्टिंग नहीं होती, तब तक वह खुद पेंडिंग काम निपटा दें!”

अब एसएंडटी कैडर के इस वरिष्ठ मूढ़ व्यक्ति की नजर से देखा जाए, तो इसका तात्पर्य यह है कि जब तक नए जीएम की पोस्टिंग नहीं हो, तब तक रिटायर हो चुके जीएम को आकर काम करते रहना चाहिए!

आश्चर्य की बात यह है कि दूसरे विभागों के समकक्ष विभाग प्रमुखों ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? यदि वह अपना बिरादरी भाव नहीं बिगाड़ना चाहते थे, तब भी उन्होंने यह बात जीएम के संज्ञान में लाना जरूरी क्यों नहीं समझा?

इसके अलावा पता चला है कि सीएसओ/एनईआर का अतिरिक्त कार्यभार मैकेनिकल डिपार्टमेंट के एक अधिकारी बी. एस. दोहरे को सौंपा गया है। यदि वह सीएसओ के चैंबर में नहीं भी बैठ रहे थे, तब भी उन्होंने शाह को वहां बैठने अथवा कार्यालय आने से मना क्यों नहीं किया?

दोहरे यदि शाह को टोककर उनसे बुरे नहीं बनना चाहते थे, तब भी रिटायरमेंट के बाद शाह के चैंबर में आकर बैठने की जानकारी से उन्होंने स्वयं महाप्रबंधक को अवगत क्यों नहीं कराया? जबकि अन्य विभाग प्रमुखों की अपेक्षा अतिरिक्त कार्यभारी होने से यह खुद उनकी पहली जिम्मेदारी थी?

जब “रेल समाचार” द्वारा यह विषय जीएम/पूर्वोत्तर रेलवे श्री वी. के. त्रिपाठी से मोबाइल पर बात करके उनके संज्ञान में लाया गया, तब वह भी आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने कहा कि “ऐसा कैसे हो सकता है, क्योंकि सीएसओ का अतिरिक्त कार्यभार मैकेनिकल अधिकारी बी. एस. दोहरे को सौंपा गया है। तथापि वह इस पर अभी तत्काल कार्यवाही कर रहे हैं।”

यह वास्तव में अत्यंत आश्चर्यजनक है कि एक रिटायर हो चुका अधिकारी लगातार पंद्रह दिनों से प्रतिदिन आकर पूर्ववत अपने चैंबर में बैठ रहा है। पूर्व की भांति कार्यालयीन सभी दैनंदिन कामकाज निपटा रहा है, तथापि न तो मातहत उसे कुछ कह रहे हैं और न ही उसके समकक्ष अधिकारी उसे कुछ बोल रहे हैं।

मातहतों को तो एक बार यह मानकर बख्शा जा सकता है कि शाह ने अब तक उनकी एसीआर नहीं लिखी है, हालांकि यह उनकी अक्षम्य कर्तव्यहीनता है, मगर समकक्ष अधिकारियों को इस कोताही के लिए कतई माफ नहीं किया जाना चाहिए।

चूंकि एस. एन. शाह रिटायर हो चुके हैं, व्यवस्था से बाहर हो चुके हैं, इसलिए अधिकारिक तौर पर अथवा अन्य किसी भी रूप में वह ऑफिस या चैंबर में बैठने के हकदार नहीं रह गए थे। तथापि उन्होंने जानबूझकर ऐसा किया।

अतः सर्वप्रथम उन्हें “कारण बताओ नोटिस” जारी की जानी चाहिए। तत्पश्चात इस बात की जांच की जानी चाहिए कि इन 14-15 दिनों में उन्होंने ऑफिस में बैठकर क्या-क्या घालमेल किया?





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जीएम/डीआरएम को नहीं दिया महाराष्ट्र सरकार से कोई रिस्पांस – RailSamachar

जीएम/मध्य एवं पश्चिम रेलवे आलोक कंसल और डीआरएम, मुंबई मंडल शलभ गोयल ने सभी रेल कर्मियों को फ्रंटलाइन वर्कर मानकर वैक्सीन की उचित आपूर्ति सुनिश्चित करने की महाराष्ट्र सरकार से मांग की है।

मुंबई और महाराष्ट्र के दायरे में कार्यरत रेलकर्मियों के अर्जेंट वैक्सीनेशन और उन्हें वैक्सीनेशन में प्राथमिकता देने के लिए जीएम/मध्य रेलवे की तरफ से 17-18 मई के आसपास मुख्य सचिव महाराष्ट्र सरकार को एक पत्र लिखा गया था। ऐसा ही एक पत्र जीएम/पश्चिम रेलवे की तरफ से भी लिखा गया था। परंतु अब तक महाराष्ट्र सरकार की तरफ से दोनों जोनल रेलों के महाप्रबंधकों को कोई जवाब या रिस्पॉन्स नहीं मिला है।

डीआरएम/मुंबई मंडल, मध्य रेलवे शलभ गोयल ने 12 मई को डॉ प्रदीप व्यास, प्रिंसिपल सेक्रेटरी, पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट, महाराष्ट्र सरकार को पत्र लिखकर मुंबई मंडल के सभी रेल कर्मियों को फ्रंटलाइन वर्कर्स मानकर उनके वैक्सीनेशन की अर्जेंट आवश्यकता जताई है।

मुंबई मंडल, मध्य रेलवे में अब तक 9000 कर्मचारियों को वैक्सीन लगाई जा चुकी है, लेकिन अब तक किसी को केवल पहला डोज लग पाया है तो किसी को दोनों डोज लगे हैं, परंतु वैक्सीन की किल्लत लगातार बनी हुई है!

उन्होंने राज्य सरकार को लिखे गए पत्र में कहा है कि महाराष्ट्र में अब भी कोरोना के मामले ज्यादा हैं और ऐसे में ड्यूटी के दौरान ज्यादा लोगों के संपर्क में आने से रेल कर्मियों को अधिक संक्रमण होने का खतरा बना हुआ है। ऐसे में सभी रेल कर्मचारियों को फ्रंटलाइन वर्कर्स मानकर उन्हें वैक्सीनेशन में प्राथमिकता दी जाए।

उल्लेखनीय है कि उड़ीसा और केरल सरकार रेल कर्मियों को फ्रंटलाइन वर्कर्स घोषित कर चुकी हैं। इसी आधार पर जीएम मध्य एवं पश्चिम रेलवे की तरफ से भी महाराष्ट्र सरकार से यह मांग की गई है।

मध्य रेलवे में कुल करीब एक लाख कर्मचारी हैं, जबकि मुंबई मंडल में 32 हजार कर्मचारी कार्यरत हैं। इसके अलावा उनके परिजन तथा सेवानिवृत्त कर्मचारियों की संख्या भी काफी है।

रेलवे अपने स्तर पर अलग-अलग जगहों पर वैक्सीनेशन सेंटर खोलकर करीब 51% कर्मचारियों का वैक्सीनेशन कर चुकी है, लेकिन अब तक किसी को केवल पहला डोज लग पाया है, तो किसी को दोनों डोज लगे हैं।

मध्य रेलवे, मुंबई मंडल में अब तक 9000 कर्मचारियों को वैक्सीन लगाई जा चुकी है। वैक्सीन की किल्लत लगातार बनी हुई है। लगातार यात्रियों के संपर्क में आने से रेलकर्मी काफी ज्यादा संख्या में संक्रमित हो रहे हैं, जिससे उनके परिजन भी अछूते नहीं रह पा रहे हैं।

रेलवे द्वारा महाराष्ट्र सरकार को पत्र लिखने की मुख्य वजह यही है कि अगर रेलकर्मियों को फ्रंटलाइन वर्कर्स घोषित कर दिया जाता है, तो उन्हें वैक्सीनेशन में प्राथमिकता मिल सकती है।

रेलकर्मी 24 घंटे काम कर रहे हैं, इसलिए पब्लिक के संपर्क में ज्यादा आने से उन्हें संक्रमण का खतरा ज्यादा है। इसलिए रेलवे ने महाराष्ट्र सरकार से निवेदन किया है कि रेलकर्मियों को फ्रंटलाइन वर्कर्स घोषित किया जाए और उन्हें वैक्सीनेशन में प्राथमिकता दी जाए।

प्राप्त जानकारी के अनुसार दोनों जोनल रेलों – मध्य एवं पश्चिम रेलवे – को अब तक महाराष्ट्र सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला है।

एक तरफ महाराष्ट्र में वैक्सीन आपूर्ति की लगातार कमी बनी हुई है, यह कारण प्रत्यक्ष तो है ही, परंतु राज्य सरकारों द्वारा जोनल महाप्रबंधकों को तनिक भी तवज्जो नहीं दिए जाने का एक प्रमुख कारण यह भी है कि केंद्र सरकार, रेल मंत्रालय ने जोनल महाप्रबंधकों का राज्य सरकारों के मुख्य सचिवों से ऊपर का अपग्रेडेशन नहीं दिया है। इसलिए उन्हें राज्यों के सचिव स्तर के अधिकारी भी कोई तवज्जो नहीं देते हैं।

उल्लेखनीय है कि करीब दो साल पहले रेलमंत्री ने संसद में यह घोषणा की थी कि रेलवे बोर्ड सहित राज्यों के साथ उचित समन्वय स्थापित करने के लिए जोनल महाप्रबंधकों को बोर्ड मेंबर (सेक्रेटरी, भारत सरकार) के स्तर का अपग्रेडेशन दिया जाएगा। परंतु उनकी इस घोषणा पर अब तक जमीनी तौर पर अमल सुनिश्चित नहीं हो पाया है।

#CentralRailway #WesternRailway #GMCR #GMWR #IndianRailway #RailwayBoard #PiyushGoyal #RailMinIndia #PMOIndia 





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रेलवे के अधिकारियों ने डेपुटेशन पर आकर मेट्रो में भी फैलाई गंदगी

If Sreedharan wasn’t favourable to Mangu Singh then the scenario of DMRC would have been different today!

Truck falls into caved road following heavy rainfall in Delhi

A truck falls in a caved-in part of a road near a metro construction site at Khaira More, following heavy rains, in Najafgarh area. According to police, information was received about the incident at around 1 am. Due to incessant rainfall Wednesday night, the road caved in and the rainwater entered inside many shops and buildings near the spot. “A truck fell into the caved portion of the road. But no injury or loss of life was reported,” a senior police officer said.

“A portion of the road along with the footpath at Khaira Road near the Dhansa Stand Metro Station caved in late Wednesday night after a drain burst in the area due to excess flow of continuous rain water. Adding that a truck fell in to the caved road.” the Delhi Metro Rail Corporation (DMRC) said in a statement on Thursday.

The incident has also caused partial damage to an adjacent building. There has been no casualty or injury and senior DMRC officials are at the site to supervise the repair work, it said.

“Repair work of the caved in portion is in progress and all efforts shall be made to complete the work at the earliest. DMRC is now filling below the road with additional concrete to avoid the recurrence of this problem in the future. The contractor firm working in this project is M/s Paras Railtech Pvt Ltd.” the DMRC stated.

चीनी कंपनी ने चार राज्यों का ट्रैफिक कैसे रोका? लोगों के घरों-मकानों को कैसे दरकाया? चीनी कंपनी ने लोगों की रोजी-रोटी और पानी कैसे बंद किया? दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार और मेट्रो रेल प्रशासन क्या कर रहा है? यह कुछ सवाल खैरा मोड़ नजफगढ़ दिल्ली के रहिवासी पूछ रहे हैं, जो पिछले दो सालों से मेट्रो रेल प्रशासन और चीनी कंपनी तथा उसके ठेकेदारों की मनमानी आजिज आ चुके हैं परंतु उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

देखें, “प्रेस नोट” चैनल की यह खबर

स्थानीय लोगों का कहना है कि जिसका डर था, वही हुआ, तीसरी बार दिल्ली के खैरा मोड़, नजफगढ़ में मेट्रो द्वारा निर्माणाधीन साइट गिर गई। ट्रैफिक बंद हो गया। मेट्रो के ठेकेदार और पीडब्ल्यूडी ने मिलकर यह कारनामा किया।

नजफगढ़ विकास मंच ने कल दिन में ही सूचित कर दिया था, परंतु मेट्रो के संबंधित ठेकेदार ने सिर्फ ट्विटर पर पीडब्ल्यूडी को सूचित करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली थी।

#हम_नहीं_सुधरेंगे वाली स्थिति है, क्योंकि इससे पहले भी इसी एरिया के एक गढ़्ढ़े में एक ट्रक धंस गया था, जिसकी भराई मेट्रो द्वारा सही तरीके से नहीं की गई थी और अब बुधवार, 19 मई को फिर एक ट्रक ऐसे ही गढ़्ढ़े में गिरकर चकनाचूर हो गया।

भ्रष्टाचार अब चरम सीमा पर है, रेलवे के अधिकारियों ने डेपुटेशन पर आकर मेट्रो में भी गंदगी फैला दी!

एक निजी ट्रैक निर्माण कंपनी को ठेका दिया गया। निर्माण कंपनी का मालिक रेलवे का ही एक पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर है, जिसके पुराने संबंध रेलवे से मेट्रो में प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारियों से पहले से ही हैं, जो कि मेट्रो में प्रमुख पदों पर कार्यरत हैं।

बताते हैं कि रेलवे का यह पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर रेलवे में रहते हुए भी ठेकेदारों के साथ मिलकर रेलवे की ठेकेदारी किया करता था और बाद में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर रेलवे और मेट्रो में ही ठेकेदार बन गया।

मेट्रो में सुपरवाइजर स्तर पर कार्यरत और नाम न उजागर करने की शर्त पर कुछ सीनियर सेक्शन इंजीनियरों ने बताया कि उक्त ठेकेदार अर्थात पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर की कंपनी को टेंडर के आवंटन में भी गड़बड़ी की गई है।

उन्होंने बताया कि ऐसी बहुत से आइटम्स का पेमेंट किया गया है जो कार्य हुआ ही नहीं है। इसकी पुष्टि मेट्रो में कार्य कर चुके कुछ अधिकारियों ने भी की है। उनका कहना था कि इस पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर और इसकी कंपनी ने मेट्रो पर पूरी तरह कुंडली मारकर रखी है।

उन्होंने बताया कि इस पूर्व रेल अधिकारी ने अपनी दो नंबर की कमाई को एक नंबर करने के लिए ही स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर ठेकेदारी चालू किया है।

उनका कहना है कि निर्माण कार्यों में निर्धारित मात्रा से कम मात्रा में इसने हमेशा सीमेंट-सरिया डाली है और बोगस भुगतान करने में यह माहिर था। अब मेट्रो में वैसा ही करके बोगस भुगतान लेने लगा है। इसकी भूख बढ़ती जा रही है।

सवाल यह उठ रहा है कि सेटिंग हो पाएगी या नहीं? क्योंकि पीडब्ल्यूडी दिल्ली के अधिकारी भी तो डेपुटेशन पर दिल्ली मेट्रो में कार्य कर रहे हैं!

उधर दो-दो बार एक्सटेंशन पा चुके दिल्ली मेट्रो के एमडी अपनी पूरी अकड़ में हैं। परंतु जब उनके अधिकारी कोविड के दौरान टेंडर जारी कर सकते हैं, टेंडर अवार्ड कर सकते हैं, तो मार्च 2021 में ही उन्होंने कार्य क्यों नहीं पूरा किया? इस प्रश्न का जवाब देने के लिए कोई तैयार नहीं है।

अब सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या अधिकारीगण – मंत्री को दिग्भ्रमित कर पाएंगे? क्योंकि मंत्री जी यदि काम के लिए बोलते हैं तो अधिकारी कोविड-19 का बहाना बनाकर घर में बैठ जाते हैं और कोविड पीरियड में ही काम करने के लिए ठेकेदारों पर लट्ठ चलाते हैं ये अधिकारी।

Though Sridharan was a result oriented engineer, had he been able to be great by following all Govt’s rules & regulations?

A former general manager of Railways, who is not wish to disclose his name, writes – “Sreedharan is too big a man, that’s why I don’t want to criticize him openly in any group, but in my opinion he is a bit of a fake, like another mechanical engineer who was retired as CRB, (although fake is probably too strong a word for sreedharan, but right now nothing softer comes to my mind).

As long as he was in Railways including as Member Engineering (ME), nobody had heard anything exceptional about him except his restoration of Pamban bridge in 1963. Apart from that he was just like any other ordinary Board Member who completed his tenure and retired.

Then AM (CE) once told me, when I was posted in the Railway Board, that when Sreedharan joined as ME, he called a meeting of all Advisers, EDs and Directors of the Civil Engineering department. He was Director in Selection Grade at that time, so he also attended.

In that first meeting Sreedharan told them something to this effect (I may be incorrect about the exact wordings); “All of you are very good in your work and also competent, moreover your field experience is much more recent than mine. So I expect all of you will deal with all files at your level without finding it necessary to mark any file to me. However, if you feel that some particular file is tricky or complicated and needs my personal perusal or order then you can put up that file to me. However, in that case, I’ll also seriously consider transferring you out of the Railway Board.” He said that after that meeting, no one ever put up any file to ME.

I was flabbergasted. I asked him, how can a Board Member with his supposedly superior knowledge and undoubtedly more experience, absolve himself of the responsibility of guiding his juniors and teaching them? He laughed, and remarked, “देख लो Partner, reputation ऐसे ही बनती है।”

Sreedharan was appointed as MD/KRCL because of his close proximity to George Fernandes, the then Minister for Railways.

As MD/KRCL (also as MD/DMRC) he had a red coloured digital timer on his side table facing visitors which displayed, “xxx days to completion of yyy project”. The number of days displayed used to keep blinking to catch the visitor’s eye, and the number kept reducing by one every day.

Visitors to his office were terribly impressed with this system of monitoring whereby the MD was personally keeping track of each project on a day to day basis.

A junior officer, who was my Director had earlier worked under Sreedharan in KRCL, told me that every few months the red digital timer clock would be reset and the number of ‘days to completion of a particular project’ would be increased to adjust for the time over run! Since the same visitor rarely returned twice, and even if he did, he was unlikely to remember what he had seen earlier, none of them could catch on to this trick.

As MD/KRCL he changed the alignment of the line passing through Goa, thereby saddling KRCL with additional cost over run of around 200+ crores. As it was, KRCL project was financially unviable, he made it even more so; knowing fully well that he would have earned all kudos and departed, leaving his successors to face the music.

In KRCL, there were rumours of his having made money, although nothing was either proved or disproved. (An honest railway civil engineer is an impossibility, if you ask me.)

As ME, Sreedharan wrote copious pages of notings on file insisting that DMRC must have broad gauge for smooth interoperability. However, within a few years, as MD/DMRC he did a 1800 turn and went in for standard gauge. As a result of standard gauge, 100% of rolling stock had to be imported at huge cost and foreign exchange. (Taking cuts in swiss banks is easier if it is from an international supplier). 

My main grouse against Sreedharan is that as MD/DMRC he did not follow any of the Government rules and regulations regarding award of tender. Tenders were awarded to L-3 or even L-4 bypassing the lower ones by writing some English and justifying the same; (in Govt. you can justify anything on file by writing a lot of English).

During Man Mohan Singh’s time as PM, once CVC officials had gone to DMRC to pick up some files. Sreedharan refused to hand over any file. Then he went to PM and threatened to resign as MD unless written orders were personally issued by PM forbidding CVC or any other investigating agency from scrutinizing any tender file of DMRC. Under that resignation threat PM issued those written orders!!

This information is 100% authentic since it was told to me by an IRSEE officer, who was the Director under me in the Railway Board and subsequently took absorption in DMRC. He was a super outstanding officer and finally retired from DMRC as Director.

In the PSEB interview to select Sreedharan’s successor, the Board wanted to select the IRSEE director as MD, but Sreedharan pitched for Mangnu Singh, Director Civil and put his foot down refusing to sign the proceedings if Mangnu Singh wasn’t selected. That is how that outstanding IRSEE director lost out.

My point is, if Railway Officers also had the freedom to award tenders to L-3 or L-4 then they could also do wonders, possibly as much as if not more than what DMRC has achieved!

My then Sr.DEN (Hq.), who is presently posted as ADRM, told me during my departure as DRM, “sir, throughout our service we’ve always been told by all our seniors that if we wanted to deliver then we must break the rules. We will not be able to deliver successfully by following all rules. Here sir, during the past 2 years, I’ve seen you follow each and every rule and still you’ve been able to deliver much more than any officer I’ve worked under. That has completely changed my mindset permanently.”

In my entire service, I’ve never flouted any rule and whatever I’ve achieved has been by strictly following all rules and regulations. Had Sreedharan been able to do that I would have certainly termed him as Great?

रिटायर्ड जीएम के उपरोक्त विचार बहुत स्पष्ट हैं। तथापि यहां श्रीधरन साहब की गरिमा को किसी भी तरह से डिग्रेड करने की कोई कोशिश नहीं की गई है। उन्होंने सिर्फ उनके काम करने के तौर-तरीकों का जिक्र किया है। उनको आए अनुभव का निष्कर्ष यह भी है कि श्रीधरन साहब भी पक्षपात और मनमानी से मुक्त नहीं थे। यदि ऐसा नहीं होता, तो आज दिल्ली मेट्रो का परिदृश्य कुछ अलग होता। यह भी कि यदि सारे स्थापित सरकारी रूल्स-रेगुलेशंस और दिशा-निर्देशों को दरकिनार करके काम करने और परिणाम देने की छूट दी जाए, तो वह कोई भी रेल अधिकारी दे सकता है।





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रेल मंत्रालय खोद रहा स्थाई रोजगार की जड़ें, टाटा ग्रुप दे रहा रिटायरमेंट तक की गारंटी!

“अब तो रोबोट तमाम काम कर रहे हैं, उनमें जिस तरह की प्रोग्रामिंग सेट कर दी जाती है, वे वैसा ही काम करते हैं, तो क्यों न रेलवे के चेयरमैन/सीईओ, बोर्ड मेंबर्स सहित सभी महाप्रबंधकों और सभी प्रमुख मुख्य विभागाध्यक्षों के पदों पर प्री-प्रोग्रामिंग करके रोबोट बैठा दिए जाएं और इनके पदों को सरेंडर कर दिया जाए!”

रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड), भारत सरकार ने 20 मई 2021 को कैलेंडर वर्ष 2021-22 के लिए एक वर्क स्टडी प्रोग्राम के तहत पदों को सरेंडर करने का दिशा-निर्देश सभी जोनल रेलों के महाप्रबंधकों को जारी किया है।

इस आदेश के अनुसार रेलवे के ग्रुप ‘सी’ और ‘डी’ श्रेणी के रेल कर्मचारियों के 13,450 पद चालू वर्ष में सरेंडर (खत्म) किए जाएंगे और इनकी कीमत को इम्पलाईज बैंक में जमा करने के लिए कहा गया है।

इसके अलावा कोरोना महामारी के चलते भी हजारों की संख्या में रेलकर्मी अकाल काल कवलित हुए हैं। यदि इसके चलते भी सरकार द्वारा खाली हुए रेलवे के इन हजारों पदों को भी स्कैप करके इम्प्लाइज बैंक में जमा करने का निर्णय निकट भविष्य में ले लिया जाए, तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।

रेल मंत्रालय का निश्चित रूप से यह एक आत्मघाती और युवाओं को स्थाई रोजगार मुहैया कराने का विरोधी फैसला है। सरकारी नौकरशाही की इस सरेंडर नीति के पीछे जो मानसिकता है, वह उच्च स्तर के पदों के सृजन की है।

पहले जो एक ‌विभाग प्रमुख का पद हुआ करता था, उसे अब मुख्य विभाग प्रमुख कर दिया गया है और अब उसके नीचे तीन-तीन, चार-चार विभाग प्रमुख हो गए हैं। इंजीनियरिंग विभाग में तो आधा दर्जन से ज्यादा ऐसे पद सृजित हो गए हैं, क्योंकि सबको मलाई यहीं से मिलनी है। इसी तरह हर विभाग में मुख्यालय स्तर पर चार-पांच-छह तक की संख्या में विभाग प्रमुखों की भरमार हो गई है।

प्रत्येक मंडल में अब तीन-तीन अपर मंडल रेल प्रबंधक (एडीआरएम) के पद हो गए हैं और इनका काम देखें तो शून्य है। अब हर जोन में एक अपर महाप्रबंधक (एजीएम) का पद भी सृजित कर दिया गया है। जब महाप्रबंधक का पद है, तो फिर अपर महाप्रबंधक की क्या जरूरत है? इसका औचित्य (जस्टिफिकेशन) बताने अथवा देने को कोई तैयार नहीं है।

पूर्व मध्य रेलवे के गठन के पहले पूर्वोत्तर रेलवे में पांच मंडल हुआ करते थे, जो वर्ष 2002-03 में विभाजन के पश्चात अब तीन रह गए हैं। जब इसमें पांच मंडल थे, तब इसे एक जनरल मैनेजर (जीएम) संभाल लेता था और आज केवल तीन मंडल हैं, तो भी इसकी व्यवस्था संभल नहीं रही है।

यही हाल उन बाकी सभी छोटी जोनल रेलों का भी है, जिनका गठन 2002-03 में हुआ था और जिन्हें राजनीतिक उद्देश्य से कमोबेश राज्यों के स्तर तक सीमित कर दिया गया था। सब में एक-एक एजीएम बैठाया गया है, तब भी परिणाम जस का तस ही है।

रेलवे के जिन 13,450 पदों को सरेंडर करने का आदेश रेलवे बोर्ड ने दिया है, वह इस देश के युवाओं के स्थाई और सम्मानित रोजगार की खुली लूट है।

ऐसा नहीं है कि काम की कमी के चलते इन पदों को सरेंडर किया जा रहा है। इसके पीछे का उद्देश्य आउटसोर्सिंग एजेंसियों को लाभ पहुंचाना है, क्योंकि ग्रुप ‘डी’ के कर्मचारी जो काम करते हैं, उसके लिए तो हाथों की जरूरत पड़ेगी ही, लेकिन जिस काम को करने के लिए एक स्थाई रेलकर्मी माहवार 35 हजार से 50 हजार तक मजदूरी पाता है, उसी काम को आउटसोर्सिंग एजेंसी एक कर्मचारी से 10-15 हजार में कराएगी।

ऐसे संविदा कर्मियों को न पीएफ देने का झंझट होगा, न ही रोजगार सुरक्षा की कोई गारंटी होगी और न ही ईएसआईएस की कोई सुविधा देने का सरदर्द होगा, जब चाहे तब उसे कान पकड़कर निकाल बाहर करने की मनमानी छूट होगी, वह अलग!

यह इस देश के पढ़े-लिखे युवाओं का खुला शोषण है। श्रम पैसा है, और पैसे की यह बड़ी तथा खुली लूट हो रही है!

ऐसे मुद्दों पर सिविल सोसायटी की चुप्पी बहुत हैरान करने वाली है कि चौबीस घंटे हिन्दू-मुस्लिम पर बहस करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी अपने बच्चों के भविष्य को बरबाद होते देखकर भी सरकार की इन रोजगार विरोधी नीतियों पर मूकदर्शक क्यों बने हुए हैं? स्थाई रोजगार नहीं होने का दंश आज कोविड की महामारी में यह देश भुगत रहा है।

किसी भी देश को अस्थाई और संविदा पर काम करने वाले कर्मियों से कदापि संचालित नहीं किया जा सकता है। यह सब कोविड जैसी महामारी और आए दिन आ रहे तटवर्ती समुद्री तूफानों के चलते देखने को मिला है तथा लगातार अनुभव में भी आ रहा है।

रेलवे बोर्ड ने अपनी सरेंडर पालिसी के बचाव में तर्क दिया है कि “आज के दौर में तकनीक के विकास से कम लोगों के जरिए काम का लक्ष्य (वर्क टारगेट) हासिल कर लिया जा रहा है, इसलिए इन पदों को सरेंडर करने से रेलवे के काम पर कोई असर नहीं पड़ेगा।”

इस संबंध में मेरा यह मानना है कि “अब तो रोबोट तमाम काम कर रहे हैं, उनमें जिस तरह की प्रोग्रामिंग सेट कर दी जाएगी, वे वैसा ही काम करेंगे, तो क्यों न रेलवे के चेयरमैन सीईओ, बोर्ड मेंबर्स सहित सभी महाप्रबंधकों और सभी प्रमुख मुख्य विभागाध्यक्षों के पदों पर प्री-प्रोग्रामिंग करके रोबोट बैठा दिए जाएं और इनके पदों को सरेंडर कर दिया जाए, कम खर्च में बहुत सारा, बल्कि बहुत ज्यादा काम का लक्ष्य हासिल हो जाएगा। इस प्रकार बेईमानी और कमीशनखोरी की भी कोई आशंका नहीं रह जाएगी।”

परंतु रेलवे की स्थिति यह है कि जो महाप्रबंधक जितने ज्यादा पद सरेंडर करेगा, वह उतना ही काबिल माना जाएगा और जो अध्यक्ष रेलवे को जितनी जल्दी बेच देगा, वह नीति आयोग में भेज दिया जाएगा। हुक्म के गुलामों की यह स्थिति पूरी व्यवस्था को चौपट करने पर उतारू है।

इसलिए अब समय आ गया है कि देश का हर नौजवान अपने स्थाई रोजगार की इस चोरी को रोकने के लिए लामबंद होकर अविलंब उठ खड़ा हो, तभी स्थाई रोजगार को और इस देश की बरबाद होती व्यवस्था को बचाया जा सकता है।

लेखक रेलवे में कार्यरत एक वरिष्ठ अधिकारी हैं!

प्रस्तुति: सुरेश त्रिपाठी

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पूरी भारतीय रेल में अब तक हजारों रेलकर्मी हुए कोरोना का शिकार, झूठे आंकड़े देकर झूठ बोलते रहे सीईओ/रे.बो.

झूठ बोलने में रेलवे बोर्ड का कोई सानी नहीं, सुनीत शर्मा, चेयरमैन/सीईओ/रे.बो. ने तोड़े अकर्मण्यता और अनिर्णय के सारे रिकॉर्ड

सुरेश त्रिपाठी

कोरोना महामारी के दूसरे चरण में पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल 314 लोको पायलट्स की मृत्यु का आंकड़ा सामने आया है। हालांकि यह अविश्वसनीय संख्या है, क्योंकि मौत के समाचार जिस गति से चल रहे हैं, उनको देखकर इस आंकड़े पर कोई भी रनिंग स्टाफ भरोसा नहीं कर पा रहा है।

रनिंग स्टाफ के कई वरिष्ठ सुपरवाइजरों का कहना है कि “वास्तव में यह आंकड़ा इससे भी ज्यादा है।” वे कहते हैं, “हॉस्पिटल में कोविड से हुई मौत बताया जाता है, परंतु जब डाटा उनके कार्यालय में आता है तो वही डेथ किसी अन्य कारण से हुई बताई जाती है। यह अत्यंत अविश्वसनीय है।”

स्टेशन मास्टर कैडर में भी अब तक 150 से ज्यादा मौतें कोविड संक्रमण के चलते हो चुकी हैं। पूरा कैडर जब रेल प्रशासन की अनमनस्कता के प्रति आक्रोशित हुआ और उचित ध्यान नहीं दिए जाने पर ड्यूटी न करने की चेतावनी दी, तब प्रशासन को होश आया और उसने उनके साथ वर्चुअल मीटिंग करके समस्या का समाधान करने की पहल हुई।

टिकट चेकिंग, टिकट बुकिंग, पार्सल, लगेज, आरक्षण इत्यादि कैडर्स, जो लगातार पब्लिक के संपर्क में रहते हैं, में भी काफी रेलकर्मी कोरोना का शिकार हुए हैं, परंतु उनके अधिकृत आंकड़े अब तक सामने नहीं आए हैं। तथापि उनकी मौतों के दु:खद समाचार लगातार आते रहते हैं।

Also Read: “नेतृत्वविहीन और हेडलेस हो गई है भारतीय रेल!“

इस महामारी के दूसरे चरण में, जब उम्र का कोई बंधन नहीं रह गया, हर आयु-वर्ग के बहुत सारे रेलकर्मी और अधिकारी काल-कवलित हुए हैं। परंतु ऐसा लगता है कि रेल प्रशासन ने उनकी मौतों को अब तक भी गंभीरता से नहीं लिया है, बल्कि देखने में यही आया है कि उनकी मौत के आंकड़े छिपाने में और व्यवस्था को दिग्भ्रमित करने में रेलवे बोर्ड की ज्यादा रुचि रही है।

चेयरमैन/सीईओ/रेलवे बोर्ड ने झूठ बोला

यदि ऐसा नहीं होता, तो ओपन प्रेस कॉन्फ्रेंस में चेयरमैन सीईओ रेलवे बोर्ड झूठ नहीं बोलते, झूठे आंकड़े प्रस्तुत नहीं करते, मांगे जाने पर भी वह रेलकर्मियों-अधिकारियों की मौत के आंकड़े देने से इंकार नहीं करते!

यदि ऐसा नहीं होता, तो वे मार्च 2020 से दिए गए आंकड़ों का औचित्य सिद्ध करते और जनवरी 2021 से अब तक हुई रेलकर्मियों-अधिकारियों की मौत के आंकड़े शेयर करते! जो कि दिन-प्रतिदिन के हिसाब से रेलवे बोर्ड में संकलित होते हैं।

Also Read: “जब आपदा सिर पर आई हुई हो, तब कसीदे नहीं पढ़े जाते!“

जोनल रेलों के विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 1 मई 2021 को पूरी भारतीय रेल में कोरोना से संक्रमित रेलकर्मियों की कुल संख्या 1,15,358 थी। जबकि उसी दिन कोविड से मृत्यु को प्राप्त हुए रेलकर्मियों की कुल संख्या 1695 थी। इस एक दिन में कोविड का शिकार हुए गैर रेलकर्मियों अर्थात रेलकर्मियों के परिजनों एवं रेल अस्पतालों में भर्ती अन्य लोगों की मौत का कुल आंकड़ा 2761 था।

इससे पहले 18 अप्रैल 2021 के दिन पूरी भारतीय रेल में कोरोना से संक्रमित रेलकर्मियों की कुल संख्या 83,180 थी। जबकि उस दिन कोविड से मृत्यु को प्राप्त हुए रेलकर्मियों की कुल संख्या 979 थी और इस एक दिन में कोविड का शिकार हुए गैर रेलकर्मियों अर्थात रेलकर्मियों के परिजनों एवं रेल अस्पतालों में भर्ती अन्य लोगों की मौत का कुल आंकड़ा 1814 था।

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इस प्रकार यह पूरी तरह स्पष्ट है कि 11 मई के आसपास और उससे पहले हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीईओ रेलवे बोर्ड ने प्रेस के सामने साफ-साफ झूठ बोला था।

यहां तक कि जो लोग उनके द्वारा दिए गए आंकड़ों पर सवाल पूछना चाहते थे, उन्हें कुछ भी कहकर साइड लाइन कर दिया गया, परंतु उन्हें मार्च 2020 से दिए गए आंकड़ों का कोई औचित्य नहीं समझाया गया।

जबकि उपरोक्त आंकड़ों से स्पष्ट है कि सीईओ/रेलवे बोर्ड द्वारा मार्च 2020 से 10 मई 2021 तक 13 महीने 10 दिन के लिए बताए गए कुल आंकड़ों से यहां एक दिन का ही आंकड़ा अधिक है।

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यदि ऐसा नहीं था, तो “रेल समाचार” द्वारा 10 मई 2021 को चेयरमैन सीईओ/रेलवे बोर्ड सुनीत शर्मा से जब यह पूछा गया कि –

1. कृपया श्री प्रदीप कुमार, पूर्व मेंबर स्टाफ, रेलवे बोर्ड और वर्तमान मेंबर कैट, जो कि एनआरसीएच में भर्ती हैं और वेंटिलेटर पर हैं, की हेल्थ पोजीशन की अपडेट देने की कृपा करें।

2. रेल अस्पतालों को अपग्रेड करने और रेलकर्मियों को उचित स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने के लिए रेल प्रशासन द्वारा अब तक क्या किया गया?

3. वर्तमान में कितने रेलकर्मी और अधिकारी पूरी भारतीय रेल में कोरोना संक्रमित हैं?

4. पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल कितने रेलकर्मी और अधिकारी कोरोना से काल कवलित हुए हैं? कृपया रेलवे वाइज संख्या देने की कृपा करें।

5. पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल कितने रेलकर्मियों और अधिकारियों का वैक्सीनेशन हो चुका है? कृपया रेलवे वाइज संख्या प्रदान करने की कृपा करें।

6. क्या रेलकर्मियों और अधिकारियों तथा उनके परिजनों को अलग से अथवा सीधे वैक्सीन मुहैया कराने की व्यवस्था नहीं की जा सकती? यदि हां, तो इसके लिए रेल मंत्रालय क्या उपाय कर रहा है? यदि नहीं, तो इसमें समस्या क्या है? कृपया बताने का प्रयास करें।

यह नहीं, 12 मई 2021 को, सीईओ रेलवे बोर्ड की प्रेस कॉन्फ्रेंस के एक दिन बाद भी उन्हें रिमाइंड करते हुए “रेल समाचार” द्वारा पूछा गया था कि –

Resp. Sharma ji, kindly share latest daily “ZONE WISE COVID PREPAREDNESS REPORT-2021” on Indian Railways.

उपरोक्त में से किसी भी तथ्य का कोई स्पष्टीकरण अथवा कोई जवाब अब तक चेयरमैन/सीईओ/रेलवे बोर्ड की तरफ से नहीं आया है।

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“जान है तो जहान है” के सिद्धांत पर जब रेल प्रशासन को अपनी वर्क फोर्स का जीवन बचाना चाहिए था, तब वह झूठ और फरेब का सहारा लेकर केवल ऑक्सीजन एक्सप्रेस चलाने के लिए अपनी पीठ थपथपा रहा है।

हालांकि जनता को भी उसके गंतव्य पर पहुंचाकर सेवा कार्य भी इस संकटकाल में जरूरी है। तथापि झूठ बोलना कतई जरूरी नहीं है। यह वैश्विक महामारी है, इस पर आदमी का कोई वश नहीं है। इसके लिए केवल सावधानियां ही बरती जा सकती हैं।

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अतः पब्लिक के संपर्क में आने वाले रेलकर्मियों को सुरक्षा उपकरणों की आपूर्ति सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके अलावा उम्र और किसी बीमारी से ग्रस्त कर्मचारियों को जनसंपर्क से दूर रखने की यथासंभव कोशिश करते हुए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

“रेल समाचार”, रेल प्रशासन की अकर्मण्यता के कारण अब तक अकाल काल-कवलित हुए सभी रेलकर्मियों को विनम्र श्रृद्धांजलि अर्पित करता है और संक्रमित हुए कर्मचारियों के शीध्र स्वस्थ होने की कामना करता है।

ट्रेन की गति से ढ़हा चांदनी रेलवे स्टेशन:





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डीआरएम के बाद जीएम पद की गरिमा को भी शर्मशार कर रहे आलोक कंसल !

जब तक चमचों/चाटुकारों की फौज को भी दंडित नहीं किया जाएगा, तब तक जीएम जैसे ताकतवर पद पर बैठे लोगों के बेलगाम संवेदनशून्य मानसिक विकार से उत्पन्न फूहड़ प्रदर्शनों का सिलसिला नहीं रुकेगा!

#AlokKansal, #GMWR & his wife #TanujaKansal

सुरेश त्रिपाठी

नाचने-गाने, रास रचाने और पत्नी की उंगलियों तथा इशारों पर नाचने, उठने-बैठने-चलने के लिए मशहूर पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक आलोक कंसल के कई रोमांटिक वीडियो पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहे हैं। अब यह तो सर्वज्ञात ही है कि रेलवे के ऐसे उच्च पदों पर बैठे आलोक कंसल जैसे कुछ महानुभावों की यह कथित रोमांटिक नौटंकी अथवा भौंड़ेपन का बेशर्म प्रदर्शन या तो ऑफीसर्स क्लब के फंड – जो अधिकारियों के कंट्रीब्यूशन से जमा होता है – से होता है, या फिर अन्य कदाचारी माध्यमों से इसका इंतजाम किया जाता है।

रेलवे में आलोक कंसल जैसे महानुभावों की कोई कमी नहीं है। पहले भी कभी नहीं रही – अरुणेंद्र कुमार जैसे बीवी के गुलाम पहले भी रह चुके हैं – अभी भी है – कंसल के ही कैडर बिरादर उत्तर रेलवे की एक मजबूत कमाऊ पोस्ट पर आज भी मौजूद हैं – ऐसे सैंकड़ों उदाहरण हैं और ऐसा भी नहीं है कि इसमें किसी एक कैडर विशेष का ही एकाधिकार रहा हो। सभी कैडर में “आलोक कंसल” विद्यमान रहे हैं। इसी का परिणाम की आज रेलवे की लुटिया डूब रही है। फिर भी इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा।

आलोक कंसल जैसे दरिद्र मानसिकता के लोगों को न पद की गरिमा का ख्याल है, न ही रेलवे की बदहाल होती जा रही आर्थिक स्थिति का। इन्हें तो पद पर रहते हुए सिर्फ अपनी जेबें भरने और जी-भरकर मौज-मस्ती करने की ही फिक्र रहती है। पद की गरिमा और रेलवे की हालत गई चूल्हे भाड़ में, क्योंकि इन्हें बखूबी मालूम होता है कि पद से हटने और रिटायर होने के बाद अपने खर्च पर यह मौज-मस्ती नहीं हो पाएगी, और रेलवे में फिर कोई कुत्ता भी इन्हें नहीं पूछेगा!

यह भी सबको पता है कि डीआरएम/नागपुर/द.पू.म.रे. रहते हुए कंसल वहां भी रेलवे के काम को तरजीह देने के बजाय इसी तरह के रास-रंग में डूबे रहते थे। तब भी कुछ अधिकारियों ने इन्हें पद की गरिमा का हवाला दिया था। उन्होंने उस समय जिस बात की आशंका व्यक्त की थी, आज जीएम पद पर आसीन होकर कंसल उसे ही बखूबी अंजाम दे रहे हैं।

भीषण खतौली दुर्घटना के बाद इन्हें सीटीई/उ.रे. के पद से तत्काल शिफ्ट करके किसी फालतू जगह डालने के बजाए पूर्व मध्य रेलवे कंस्ट्रक्शन में डाला गया था, वहां भी इन्होंने कमीशनखोरी में कोई कसर नहीं छोड़ी थी और कुछ समय बाद ही पुनः उत्तर रेलवे वापस पहुंचने में कामयाब रहे थे। जहां से अब मंत्री की पसंद से उनके जूरिस्डिक्शन में पदस्थ होकर तन-मन-धन से पूरी सेवा करने में जुटे हैं।

रेलमंत्री यदि बोर्ड मेंबर्स और कुछ ईडी’ज की ही दिनचर्या देख लें, जिनके बंगलों में न सिर्फ बोर्ड की कैंटीन से खाना सप्लाई होता है, बल्कि वह छह-सात सौ रुपए प्रति बोतल का इंपोर्टेड पानी पीते रहे हैं। वह तो भला हो फाइनेंस विभाग का, जिसने इनके तमाम दबावों को दरकिनार करते हुए हाल ही में इनकी ये लक्जरियस नक्शेबाजी पर रोक लगा दी।

रेलमंत्री को जहां भ्रष्टाचार और निकम्मेपन पर अपना ध्यान केंद्रित करके ऐसी अय्याशियों पर हो रहे फालतू खर्चों पर नियंत्रण और निकम्मों-नचनियों को घर भेजना चाहिए था, वहां वह बेकार और अनावश्यक मुद्दों पर न सिर्फ अपना कीमती समय जाया कर रहे हैं, बल्कि अपनी क्षणिक कार्य-प्रणाली से रेलवे की बदनामी सहित सरकार की छवि को भी धूमिल होने से नहीं बचा पा रहे हैं।

रेलमंत्री जी! आलोक कंसल जैसे महान प्रतिभासंपन्न जीएम्स (महाप्रबंधकों) से भरा पड़ा है आपका रेल महकमा। अब लगे हाथ आलोक कंसल साहब को भी सीआरबी बनने का मौका दे ही दीजिए। क्योंकि आपके रेल महकमे में योग्य अधिकारी हाशिये पर और निराशा के माहौल में ढ़केल दिए गए हैं, जबकि कंसल जैसे विकृत रास-रंग में डूबे खड़की बूढ़े जिस ऑर्गनाइजेशन की पतवार संभालेंगे, उसका तो ईश्वर ही मालिक होगा।

अब जब सिर्फ ईएसई (#ESE) से ही आईआरएमएस (#IRMS) का सेलेक्शन करने का राग छेड़ दिया गया है, तो अब आपके पास ऐसी नचनिया प्रतिभाओं की शायद ही कोई कमी रह जाएगी। कई वरिष्ठ रेल अधिकारियों का कहना है कि अगर रेलमंत्री और सीआरबी में थोड़ी सी भी शर्मोहया और नैतिकता बची है, तो इस संवेदनहीन फूहड़ नचनिया को तुरंत निलंबित करते हुए अविलंब जीएम पद से हटाने का प्रशासनिक साहस दिखाया जाए।

उनका कहना है कि जहां पूरे देश में कोरोनावायरस से हर गली-मोहल्ले में मातम पसरा हुआ है, और मुंबई महानगर इस मामले में भयानक दौर से गुजर रहा है, वहां इस नचनिया जीएम की ही रेलवे के कई कर्मचारी कोरोना के शिकार होकर अकाल काल-कलवित हो चुके हैं और यह जीएम पद की गरिमा को भूलकर तथा बेशर्म होकर “सावन की झड़ी” का राग अलापते हुए रास-रंग में डूबकर वीडियो बनवाने में लगा हुआ है।

एक यूनियन पदाधिकारी का कहना था कि जहां एक तरफ रेल कर्मचारियों के घरों/परिवारों में मातम, मायूसी और डर का माहौल है, हजारों कर्मचारी कोरोना संक्रमित हो चुके हैं, जबकि सैकड़ों रेलकर्मियों की मौत हो चुकी है, वहां ये जीएम “रोम के नीरो” से भी दस कदम आगे निकलकर अपनी भौंड़ी ऐय्याशी का निर्लज्ज और संवेदनशून्य तकनीकी कौशल का प्रदर्शन कर रहे हैं।

कई अधिकारियों और यूनियन पदाधिकारियों ने रेलमंत्री से सीधी मांग करते हुए कहा कि इनको तत्काल निलंबित करने के बाद इनकी कम से कम ब्रांच अफसर (बीओ) लेवल से भी जांच हो, तब इनके सामने कुबेर भी शायद छोटे पड़ जाएंगे।

उनका कहना था कि पूरे रेल महकमे में ये पति-पत्नी दोनों ही कुख्यात हैं। इनकी पत्नी के नाम से तो कई आईओडब्ल्यू/पीडब्ल्यूआई और डिप्टी लेवल तक के अफसरों की रूह कांपती है। कितने ही कर्मचारी इतने अपमानित हुए हैं कि उनके सामने आत्महत्या करने या नौकरी छोड़ने तक की नौबत आ गई। यदि यकीन न हो तो उत्तर रेलवे सहित ये जहां-जहां रहे हैं, वहां-वहां के इनके मातहतों से इस बात का वेरिफिकेशन करा लिया जाए।

#TanijaKansal wife of #AlokKansal, #GMWR

यह बात बिल्कुल सही है कि ऐसे एक नहीं कई अफसर रेल में भरे पड़े हैं, जो आने वाले समय में निश्चित तौर पर जीएम, सीआरबी मैटीरियल हैं, जिनकी एकमात्र प्रतिभा सिर्फ उनकी “एज प्रोफाइल” है। इसी प्रोफाइल के चलते आज बोर्ड मेंबर और सीआरबी बने बैठे लोग मौके पर मंत्री को उचित बात बताने के बजाय घिघिया रहे हैं।

इसीलिए ऐसे अफसरों को उनके मातहत शुरू से ही जीएम, बोर्ड मेंबर तथा सीआरबी के नजरिये से देखते हैं। यही कारण है कि मातहतों की यह फौज भविष्य के डर से इनके सारे आसुरी कृत्यों को नपुंसकों की तरह अथवा न चाहते हुए भी मजबूरी वश बर्दाश्त करती रहती है।

लेकिन कुछ अधिकारियों का कहना है कि कंसल से दुःखी पूरे जोन के अधिकारी यह जानते हैं कि इनका कोई कुछ नहीं करेगा, क्योकि यह रेलमंत्री की पसंद से ही पश्चिम रेलवे में जीएम बनकर आए हैं और मंत्री जी को यह हर तरह से खुश रखते हैं!

यह भी सर्वज्ञात है कि इसी शासनकाल में सुशासन बाबू और रेलमंत्री के जीरो टॉलरेंस की ये स्थिति थी कि डीआरएम के डिवीजनल इंस्पेक्शन के दौरान जब डीआरएम ने भरी गर्मी में टेंट के नीचे लंच कर लिया था, तो डीआरएम (रांची) का तबादला इसे ऐय्याशी मानते हुए कर दिया गया था और उनको चार्जशीट देने की भी तैयारी थी। इसी तरह के कई और उदाहरण भी देखने में आए थे।

ऐसे में यदि कंसल के मामले में रेलमंत्री कार्रवाही नहीं करते हैं, तो न सिर्फ यह कोरोना संक्रमण से लड़ रहे और मर रहे सैकड़ों रेल कर्मचारियों और अधिकारियों के जख्मों पर नमक रगड़ने जैसा होगा, बल्कि देश में कोरोना से सबसे बुरी तरह प्रभावित महाराष्ट्र और मुंबई की जनता का भी यह घोर अपमान होगा।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को भी इसका संज्ञान लेना चाहिए और अगर उन्हें रेलमंत्री की तरह यह रचनात्मक प्रतिभा लगे, तो फिर उन्हें अपने “मन की बात” कार्यक्रम में इसकी प्रेरणास्प्रद चर्चा जरूर करनी चाहिए। तब हो सकता है कि इससे देश के करोड़ों बेरोजगार युवाओं को अपनी आर्थिक बदहाली को भुलाने में कुछ मदद हो सके।

#TanujaKansal wife of #AlokKansal, #GMWR

इसमें सिर्फ जीएम/पश्चिम रेलवे ही नहीं, जब तक उनके चमचों और चाटुकारों की फौज को भी दंडित नहीं किया जाएगा – जो जीएम्स के इस तरह के ऊल-जलूल कार्यों में बढ़-चढ़कर अपना योगदान देते हैं – तब तक जीएम जैसे ताकतवर पद पर बैठे लोगों के बेलगाम संवेदनशून्य मानसिक विकार से उत्पन्न फूहड़ प्रदर्शनों का सिलसिला नहीं रुकेगा।

कई अफसर और उनकी पत्नियां अपना काम और घर द्वार छोड़कर जीएम की चमचागीरी में कॉस्टिंग डायरेक्टर, क्रिएटिव डायरेक्टर, प्रोडक्शन मैनेजर, फ्लोर मैनेजर, सिनेमॅटोग्राफर आदि का ही काम करते-करते अपने को बहुत बड़ा फिल्म प्रोफेशनल समझने लगते हैं और बिना रेल का कोई काम किए, फील्ड में बिना पसीना बहाए, पूरे सेवाकाल में रेलवे की सारी सुख-सुविधाएं भोगते रहते हैं। कई तो यही सब करते-करते कब खुद डीआरएम, जीएम और सीआरबी बन जाते हैं, और बने भी हैं, पर किसी को इसका आजतक अहसास नहीं हुआ।

#TanijaKansal wife of #AlokKansal, #GMWR

इसमें कैमरा, साज-सज्जा आदि का प्रबंध करने वाले, ऑफीसर्स क्लबों के सेक्रेटरी, जीएम के सेक्रेटरी, महिला समितियों की सदस्य विभिन्न अधिकारियों की पत्नियों आदि की भी पहचान कर उन्हें कहीं किसी दूरस्थ रेलवे में भेजने से ही बहुसंख्यक ईमानदार, मेहनतकश, बिना माई-बाप के अधिकारियों-कर्मचारियों में एक सही संदेश जाएगा।





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अधिकारियों को अन्य कोई मॉडेलिटी मान्य नहीं! – RailSamachar

जबरन थोपी जाने वाली किसी भी मॉडेलिटी के खिलाफ विद्रोह करने को तैयार हैं अधिकारी

जो भी प्रक्रिया उन्हें सुझाई दे रही है, उसका प्रयोग मंत्री, सीआरबी और बोर्ड मेंबर्स पहले एक साल तक खुद करें!

सुरेश त्रिपाठी

रेल अधिकारी टीएडीके के मामले में कोई अन्य मॉडेलिटी बनाए जाने और स्वीकार करने से साफ इंकार कर रहे हैं। उनका कहना है कि अगर सीआरबी या मंत्री द्वारा कोई अन्य मॉडेलिटी जबरन थोपी जाती है, तो इस पर विद्रोह ही होगा। उनका यह भी कहना है किसी भी अन्य चयन प्रक्रिया से जो भी आएगा वह यूनियन का सदस्य बनकर ही आएगा और कुछ यूनियन पदाधिकारी भी यही चाहते हैं कि उनकी घुसपैठ अधिकारी के घर के अंदरखाने तक हो जाए। इससे अधिकारियों की निजी और परिवारिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा पैदा होना निश्चित है। अतः अन्य कोई कथित मॉडेलिटी मान्य नहीं हो सकती।

अधिकांश अधिकारियों का मानना है कि चूंकि सीआरबी ने फील्ड और रेलवे में न के बराबर काम किया है और एडीआरएम, डीआरएम, जीएम इत्यादि ज्यादा सुरक्षित (प्रोटेक्टेड) माहौल में रहते/काम करते हैं और उस स्तर पर काम को लेकर उनका कुछ भी दांव पर नहीं लगा रहता है, इसीलिए वे टीएडीके पर अपने मातहत जूनियर अधिकारियों की मजबूरी और बौखलाहट को समझ नहीं पा रहे हैं, जबकि वह भी इस दौर से गुजर कर ही वहां तक पहुंचे हैं।

उनका कहना है कि फील्ड में और विभागीय पद (डिपार्टमेंटल पोस्ट) पर काम करने वाले अधिकारियों को रेल चलाने के लिए हर दिन कुछ न कुछ सख्त निर्णय लेने पड़ते हैं। इस तरह वे और उनका परिवार हर तरह से सिस्टम में मौजूद शरारती और आपराधिक तत्वों के लिए आसान टारगेट बने रहते हैं। वह कहते हैं कि मंत्री और सीआरबी का यह निर्णय अधिकारी को परिवार सहित, सीधे इन तत्वों के ही मुँह में झोंक देने का प्रयास है। ये बात या तो वे समझ ही नहीं रहे हैं, या फिर जानबूझकर न समझने का दिखावा कर रहे हैं।

उन्होंने तल्ख लहजे में आगे कहा कि मंत्री को याद होना चाहिए कि लखनऊ के अधिवेशन में मंत्री और सुरक्षा के तमाम कवच होने के बावजूद वहां उनकी क्या गति हुई थी? कैसे लंगोट उठाकर उन्हें वहां से भागना पड़ा था? क्या मंत्री जी वह सब परिदृश्य भुला बैठे हैं! यदि ऐसा है तो उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि कोई पार्टी जनता के समर्थन से सत्ता हासिल करती है, यूनियनों की बदौलत नहीं।

वह कहते हैं कि यह पहले रेलमंत्री हैं, जो रेल से नहीं, बल्कि चार्टर्ड प्लेन से चलते हैं, इसलिए इनको अंदाजा ही नहीं है कि घर से लेकर जहां तक रेल और रेल पटरी जाती है, वहां तक यह खतरा रेलहित में निर्णय लेकर ट्रेन चलाने वाले अधिकारियों और उनके परिवार का पीछा करता रहता है और इसमें सपोर्ट के नाम पर उनके साथ सिर्फ एक टीएडीके ही होता है, क्योंकि वह उसका जांचा-परखा होता है, उसके परिवार के विषय में भी उसको रखने से पहले संबंधित अधिकारी बखूबी आश्वस्त हो लेता है, इसलिए वह 24/48 घंटे बाहर रहकर भी घर-परिवार की सुरक्षा और जरूरतों के बारे में आश्वस्त रहता है।

लेकिन कल्पना करें कि जब यह टीएडीके दूसरे का आदमी होगा, या यूनियन का सदस्य होगा, तो अधिकारी के हर मूवमेंट से लेकर उसके बच्चों, पत्नी आदि सबकी पूर्व सूचना देकर अधिकारी को निजी या ऑफीसियल मूवमेंट के दौरान खतरे में डाल सकता है, बच्चों का अपहरण करवा सकता है। इससे अधिकारी और उसके परिवार की गोपनीयता तो खत्म होगी ही, जबकि टीएडीके होने के कारण वह जो भी बोलेगा, कहेगा, उसे ही बाहर वाले “ऑथेंटिक” मानेंगे। इसके अलावा इसका उपयोग गलत और आपराधिक किस्म के जो लोग सिस्टम में हैं, खूब करेंगें, क्योंकि बाकी किसी भी तरह से चयनित टीएडीके की निष्ठा कतई उस अधिकारी के साथ नहीं होगी, जिसके साथ वह लगेगा।

इन रेल अधिकारियों ने सीआरबी और रेलमंत्री से अनुरोध करते हुए कहा कि जो भी प्रक्रिया उनके दिमाग में हो, उसका प्रयोग पहले अपने ऊपर एक साल कर लें, उसके बाद भी यदि उन्हें लगे कि वह ठीक है/सही है, तो फिर सबके ऊपर उसे लागू कर दें, तब उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी।

इन अधिकारियों ने इस मौके पर अदम गोंडवी की एक नज्म भी रेलमंत्री को समर्पित किया-

आंख पर पट्टी रहे और अक्ल पर ताला रहे, अपने शाहे वक्त का यूं मर्तबा आला रहे ।

तालिबे शोहरत है कैसे भी मिले मिलती रहे, आये दिन अखबार में प्रतिभूति घोटाला रहे।

एक नेता को दुनिया में अदम क्या चाहिए, चार छह चमचे रहें माइक रहे माला रहे ।

हालांकि यह अंतिम पंक्ति तब के लिए सही थी, जब अदम गोंडवी ने इसे लिखा था, और तब “चार्टर्ड प्लेन” वाले कॉर्पोरेट स्टाइल के मंत्री नहीं हुआ करते थे, जो अपने लिए तो कॉर्पोरेट स्टाइल में हर चीज चाहते हैं, लेकिन जब कर्मचारियों/अधिकारियों की बारी आती है, तो कॉर्पोरेट की तरह सुविधा देने की जगह उन्हें ठीक मध्यकालीन सामंतों की तरह हिकारत से गुलामों जैसा ट्रीट करते हैं अथवा ट्रीट करने लगते हैं।

यह बात भी उभरकर सामने आ रही है कि यूनियनें भले ही खुलेआम जाहिर न कर रही हों, मगर उनकी भी यह अंदरूनी ख्वाहिश अवश्य है कि “लारजेस” जैसी अवैधानिक व्यवस्था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया, को किसी अन्य स्वरूप में पुनर्स्थापित कराने की उनकी पुरजोर कोशिशों के आड़े आ रहे अधिकारियों को इस टीएडीके के बहाने ब्लैकमेल किया जाए। इसका एक उदाहरण तब सामने आया जब कल 12 अगस्त को “रेलसमाचार.कॉम पर “टीएडीके मामला – एक छत के नीचे दोहरी व्यवस्था: अनजान हैं रेलमंत्री और सीआरबी या..“ शीर्षक से प्रकाशित खबर पर सत्ताधारी पार्टी से जुड़े एक अनाम संगठन के तथाकथित राष्ट्रीय अध्यक्ष महोदय ने फोन करके ज्ञान देने का प्रयास किया। जबकि यह उनका विषय भी नहीं था। इससे जाहिर होता है कि यूनियनों की इस विषय पर न सिर्फ भारी दिलचस्पी है, बल्कि पर्दे के पीछे से वह मंत्री और सीआरबी पर इसके खिलाफ दबाव भी बना रही हैं। इस अनाम यूनियन, जिसकी भारतीय रेल में दस प्रतिशत सदस्यता भी नहीं है, ने तो इस विषय पर मंत्री को दो पत्र भी लिखे हैं। क्रमशः





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रेल मंत्रालय की तदर्थ स्थिति खत्म करके पूर्ण रूप से शुरू किया जाए ट्रेनों का संचालन

जनता और सरकार की छवि से सीधे जुड़े रेल मंत्रालय की तदर्थ व्यवस्था को अविलंब समाप्त कर पूर्णकालिक मंत्री एवं सीआरबी नियुक्त किया जाना चाहिए

Narendra Modi, PM/India

#प्रधानमंत्री देश को आखिर किस दिशा में ले जाना चाहते हैं, यह फिलहाल किसी को समझ में नहीं आ रहा है। यह सही है कि कोरोना नामक इस वैश्विक महामारी ने सबका सब कुछ अस्त-व्यस्त कर दिया है, लेकिन इसका ये मतलब भी नहीं है कि हाथ पर हाथ धरे बैठे रहा जाए!

पिछले साल से ही देश की अर्थव्यवस्था पर ग्रहण लगा हुआ है। जबकि मार्च महीने से पूरा देश ठप पड़ा हुआ है। बेरोजगारी, महंगाई विकराल रूप ले चुकी है। देखते-देखते लॉकडाउन के भी 6 महीने गुजर रहे हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था में कोई सकारात्मक सुधार जैसी संभावनाएं कहीं दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रही हैं।

इसलिए बेहतर होगा कि अर्थव्यवस्था से जुड़ी चीजों को पूर्णतः खोल दिया जाए, क्योंकि अनलॉक सीरीज बहुत कारगर साबित नहीं हुई है। तमाम अर्थशास्त्रियों का भी यही मत है।

सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में देश की लाइफलाइन कही जाने वाली भारतीय रेल का नियमित संचालन इतने लंबे समय से बंद करके रेल मंत्रालय ने पहले रेल का कबाड़ा कर दिया है।

मात्र कुछ ट्रेनों का संचालन करके रेलमंत्री सोशल मीडिया पर लंबी-चौड़ी हांक रहे हैैं। इससे वह आखिर क्या साबित करना चाहते हैं, यह किसी की समझ में नहीं आ रहा है।

जब लगभग सभी प्रदेशों का राज्य परिवहन पूर्व की भांति चलाया जा रहा है, एयर ट्रैफिक भी चालू हो गया है, तो फिर रेल का सामान्य संचालन बंद करके देश की अर्थव्यवस्था का कबाड़ा किया जा रहा है। क्या इसमें भी कोई अवसर ढूंढा जा रहा है?

ट्रेनों का संचालन बंद करने से कोरोना के मामले कम तो नहीं हुए हैं, बल्कि इनमें लगातार वृद्धि हुई है।

यदि देश भर की स्थिति को देखा जाए तो कोरोना का कहर फिलहाल कम नहीं होने वाला है, बल्कि यह अभी और बढ़ेगा, ऐसा अनुमान है, क्योंकि देश में अभी रैपिड जांच पर्याप्त संख्या में नहीं हो रही हैं।

अब यह अलग बात है कि दिल्ली सहित कुछ राज्यों ने रैपिड जांचों को कम करके अथवा क्रत्रिम तरीके से कोरोना के मामले कम होने की बात कही है।

हो सकता है कि इसके पीछे उनका उद्देश्य लोगों में व्याप्त भय को कुछ कम करना हो, पर इस महामारी के प्रकोप को इस तरीके से कम करके बताना तो वास्तव में जनता के साथ एक बड़ा धोखा है। 

बहरहाल, जब पूरा मार्केट खोल दिया गया है, राज्यों का सामान्य परिवहन चल रहा है, तब देश की धड़कन कही जाने वाली भारतीय रेल का पहिया रोक देना देश की सामान्य अर्थव्यवस्था को रोक देने जैसा है।

रेल का सामान्य संचालन इस वक्त देश की सबसे बड़ी जरूरत है। इस पर प्रधानमंत्री द्वारा रेल मंत्रालय को तुरंत आवश्यक निर्देश दिए जाने चाहिए।

इसके अलावा प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे रेल मंत्रालय की तदर्थ व्यवस्था को अविलंब समाप्त कर सीधे जनता और सरकार की छवि से जुड़े इस महत्वपूर्ण मंत्रालय को पूर्णकालिक मंत्री तथा सीआरबी प्रदान करें।





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भोपाल मंडल को जुलाई 2020 माह में 69.59% अधिक माल राजस्व की प्राप्ति – RailSamachar

रेलवे की माल परिवहन आय और रेलवे के माध्यम से माल लदान बढ़ाने के लिए भोपाल मंडल, पश्चिम मध्य रेलवे द्वारा लगातार प्रयास किया जा रहा है।

रेलवे बोर्ड के निर्देशानुसार भोपाल मंडल द्वारा व्यापारियों, व्यावसायियों, व्यापार/वाणिज्य संगठनों, फैक्ट्री मालिकों, माल उत्पादकों और मार्केटिंग कंपनियों से संपर्क कर रेलवे के जरिए माल परिवहन की संभावनाओं को तलाशकर अधिक से अधिक माल लदान के साथ पीस-मील माल लदान को भी रेलवे की तरफ आकर्षित करने का प्रयास किया जा रहा है।

इसी क्रम में बल्क माल लदान के साथ-साथ पीस-मील माल लदान के तहत जुलाई 2020 में भोपाल मंडल के विभिन्न माल गोदामों और साइडिंग्स से फर्टिलाइजर, पीओएल, रेलवे गुड्स, कंटेनर एवं खाद्यान्न आदि के कुल 255 रेक 0.65 मिलियन टन माल कुल 11966 वैगनों में लोड करके विभिन्न गंतव्य स्थानों को भेजा गया।

इससे भोपाल मंडल को जुलाई 2020 माह में 69.43 करोड़ रुपए की आय प्राप्त हुई है, जो कि गत वर्ष की समान अवधि में 148 रेक और 7633 वैगनों में लोड किए गए 0.40 मिलियन टन माल से प्राप्त कुल 40.94 करोड़ के राजस्व की अपेक्षा 69.59% अधिक है।

उल्लेखनीय है कि व्यापारियों, व्यावसायियों, व्यापार/वाणिज्य संगठनों, फैक्ट्री मालिकों, माल उत्पादकों और मार्केटिंग कंपनियों को रेलवे के जरिए माल लदान करने के अलावा पीस-मील माल लदान करने की भी सुविधा प्रदान की गई है। इससे फुटकर व्यापारियों को भी पर्याप्त लाभ मिलेगा।

“फुटकर व्यापारी यदि अपना माल सिर्फ दो-चार कंटेनरों में भेजना चाहते हैं, तो वे वैगन लोड रेट पर मालभाड़ा जमा करके अपने माल का लदान कर सकते हैं। इसके अलावा यदि वे ट्रेन लोड पर माल का परिवहन करना चाहते हैं, तो भी उन्हें मालभाड़ा प्रोत्साहन योजनाओं का लाभ मिलेगा।”

यह जानकारी जनसंपर्क विभाग, भोपाल मंडल द्वारा जारी एक विज्ञप्ति में दी गई है।





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चिनॉय सेठ, “जब खुद का घर शीशे का हो, तो दूसरों के घरों में पत्थर नहीं फेंका करते!”

सरकार के खर्चों और सरकारी विभागों में हो रहे भ्रष्टाचार पर सरकार का कोई अंकुश नहीं

सुरेश त्रिपाठी

रेलमंत्री पीयूष गोयल द्वारा रेल अधिकारियों-कर्मचारियों को मिल रही सुविधाओं की समीक्षा करने और री-एंगेज्ड कठपुतली चेयरमैन, रेलवे बोर्ड यानि “वीकेन यादव” द्वारा राममंदिर के शिलान्यास के दिन 5 अगस्त को रेल अधिकारियों के बंगला प्यून हटाने के बारे में दिए गए बचकाने संदेश/आदेश के बाद पूरी रेलवे वर्कफोर्स में नीचे से ऊपर तक बहुत कड़ी और जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई है। रेलमंत्री और सीआरबी के तमाम बचकाने निर्णयों को अब तक जैसे-तैसे झेल रहे रेलकर्मी-अधिकारी उनके इस एक निर्णय से अचानक हड़बड़ाकर उठ खड़े हुए हैं, क्योंकि यह निर्णय उनके परिवारों की सुरक्षा और उनकी गरिमा तथा स्वाभिमान को प्रभावित करने वाला है।

रेलमंत्री और सीआरबी के इस कुटिल एवं अनैतिक निर्णय के खिलाफ जहां सभी जोनल अधिकारी संगठनों द्वारा न सिर्फ उन्हें पूरे जस्टिफिकेशन के साथ ज्ञापन भेजे जा रहे हैं, बल्कि उन्होंने यह सुविधा जूनियर/सीनियर स्केल पर भी लागू करने की पुरजोर वकालत की है।

कार्मिक सुविधाओं में कटौती, भ्रष्टाचार पर कोई लगाम नहीं

एक तरफ जहां सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के डीए/आरए में पहले ही डेढ़ साल तक की पाबंदी लगा दी है, वहीं अब उनके वेतन और पेंशन पर भी 20% की कटौती किए जाने का ऐलान किया जा रहा है। इसके साथ ही मितव्ययिता और लागत खर्च में कटौती के नाम पर अन्य कई भत्तों में कटौती की घोषणा की जा चुकी है। जबकि सरकार के खर्चों और सरकारी विभागों में हो रहे भ्रष्टाचार पर सरकार का कोई अंकुश नहीं लग पा रहा है।

इसके अलावा अब रेल अधिकारियों और कर्मचारियों की तैयारी यह भी दिख रही है कि यदि रेलमंत्री नहीं मानते हैं और अपनी मनमानी करने पर अड़े रहते हैं, तो रेल मंत्रालय में उनके द्वारा लगाई गई उनकी वैयक्तिक फौज के कारनामों को भी उजागर करने का उन्होंने मन बना लिया गया है।

ऐसा लगता है कि मंत्री की इस निजी फौज द्वारा किए जा रहे घोर अपमान और मनमानी से अब ये सभी रेल अधिकारी बुरी तरह तंग आ चुके हैं। इसीलिए शायद वे ऐसे ही किसी मौके की तलाश में थे कि कब वे मंत्री और उनके निजी सहायकों की करतूतों का पर्दाफाश कर सकें।

“करो या मरो” की स्थिति ला खड़ी की रेलमंत्री ने!

क्रिया की प्रतिक्रिया होना प्राकृतिक सिद्धांत है। यह हमारा वैदिक साहित्य बहुत पहले से कहता आ रहा है और जिसे बाद में प्रतिपादित करके सर न्यूटन विज्ञान में अमर हो गए। और यह भी हर निकृष्ट से निकृष्ट और निकम्मे से भी निकम्मे आदमी, यहां तक कि कबीरदास कह गए हैं कि “मरी खाल की स्वांस सों, लौह भसम होई जाए” का जांचा-परखा सत्य है कि आदमी तब तक प्रतिक्रिया नहीं करता जब तक कि उसकी गरिमा और सम्मान को चोट नहीं लगती। और ये भी कि आदमी अपने तक तो बर्दाश्त करता है, पर जब बात उसके परिवार की सुरक्षा और इज्जत की आ जाती है, तब वह इसके विरुद्ध अपनी पूरी ताकत से प्रतिकार करने के लिए उठ खड़ा होता है। पिछले पांच-छह सालों से हर दिन अनाचार, अत्याचार, उत्पीड़न झेल रहे और अपमानित हो रहे रेल अधिकारियों और कर्मचारियों के सामने रेलमंत्री और सीआरबी ने अब “करो या मरो” की यही स्थिति लाकर खड़ी कर दी है।

रेलमंत्री ने “कमर के नीचे वार” किया

एक पूर्व मंत्री के साथ काफी समय तक काम कर चुके एक वरिष्ठ रेल अधिकारी ने रेलवे के वर्तमान निजाम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि एक समय था जब इन्हीं रेलकर्मियों-अधिकारियों की बदौलत रेलवे ने हर फील्ड में बड़े-बड़े कीर्तिमान स्थापित किए थे, क्योंकि इन्हें सक्षम नेतृत्व मिला था। उनका कहना है कि वर्तमान रेलमंत्री और उनके सलाहकार अब तक रेलवे में जो भी ऊटपटांग उठापटक कर रहे थे, उसका सीधा प्रभाव किसी व्यक्ति विशेष या रेल कर्मचारियों-अधिकारियों के परिवारों पर नहीं पड़ रहा था। पहली बार रेलमंत्री ने एक ऐसा बचकाना और द्वेषपूर्ण निर्णय लिया है, जो सीधे अधिकारियों और उनके परिवारों को हिट कर रहा है, इसे ही अंग्रेजी में “below the belt hit” (कमर के नीचे वार) करना कहा जाता है।

जरूरी था विभिन्न स्तर पर स्टेक होल्डर्स से विचार-विमर्श

उनका स्पष्ट मत है कि अवल्ल तो मंत्री को ऐसा करना ही नहीं चाहिए। अगर इनको कुछ करना ही था तो इस तरह के मामले में जल्दबाजी नहीं करते और सभी जोनों के अधिकारी संगठनों, हर आयु वर्ग के अधिकारियों तथा उनके विभिन्न ट्रेनिंग इंस्टिट्यूटस से भी विचार-विमर्श कर लेते, क्योंकि हम लोगों के समय भी और प्रायः सभी रेलमंत्रियों के समय टीएडीके और सैलून का मुद्दा कुछेक कारणों से जब तब आता रहा है, लेकिन हम लोगों ने यह देखा कि रेल अधिकारियों के काम की प्रकृति के हिसाब से यह व्यस्था जरूरी भी है और होनहार युवाओं को रेलवे को जॉइन करने का  सबसे बड़ा आकर्षण/इंसेंटिव भी।

वह आगे कहते हैं कि ऐसे में कोई भी परिपक्व मंत्री अपने मंत्रालय के अधिकारियों और कर्मचारियों की उपलब्ध सुविधाओं में अगर कोई इजाफा नहीं करता है, तो उनमें छेड़छाड़ भी नहीं करता और खासकर जो निर्णय सीधे व्यक्तिगत स्तर पर और परिवारों को प्रभावित करता हो, उसे तो मंत्री कतई नहीं छूता है।

नेतृत्व की अक्षमता और सैडिस्टिक मानसिकता में इंसानियत का अभाव

एनडीए सरकार के कार्यकाल में ही रहे एक अन्य रेलमंत्री के साथ जुड़े एक और वरिष्ठ रेल अधिकारी का यह स्पष्ट मानना था कि रेलवे के अधिकारियों और कर्मचारियों जैसी टारगेट ओरियंटेड वर्कफोर्स शायद ही किसी अन्य विभाग मंत्रालय में होगी। उन्होंने कहा कि यह भी सही है कि वस्तुत: लीडरशिप जैसी होगी, ऑर्गनाइजेशन अपना रिजल्ट भी वैसा ही देगा। आज रेलवे की जो दुर्व्यवस्था है उसका सीधा कारण सिर्फ और सिर्फ नेतृत्व की अक्षमता ही है।

कोई निर्णय कैसे अपने घोर समर्थकों को भी विरोधी बना सकता है, इसकी बानगी तब देखने को मिली, जब इलेक्ट्रिकल के ही एक वरिष्ठ अधिकारी इसके लिए सीआरबी पर ही फटते नजर आए। उनका कहना था कि कम से कम रेलवे में काम किए सीआरबी “वीकेन यादव” जैसे एक अधिकारी से ऐसी अपेक्षा नहीं थी। उन्होंने कहा कि यदि वीकेन यादव के मन में टीएडीके के मामले को लेकर कुछ चल रहा है, या मंत्री ने इस पर कुछ करने को उनसे कहा था, तब भी कोरोना जैसी संक्रामक महामारी के समय में उन्हें इतनी तो इंसानियत जरूर दिखानी चाहिए थी कि अधिकारियों को एक माह का एडवांस नोटिस दे देते कि “फिलहाल इसे 1 सितंबर या 1 अक्टूबर से रोका जाएगा, जब तक इस पर आगे कोई निर्णय न हो जाए।”

उनका कहना था कि तब कम से कम जिन अधिकारियों ने अपना टीएडीके सरेंडर कर दिया है और जिनके टीएडीके की बहाली की प्रक्रिया चल रही है, उन्हें यह मिल जाता (ध्यान रहे कि पूरी भारतीय रेल में ऐसे बहुत ज्यादा मामले नहीं होंगे) तथा कोरोना काल में उनका परिवार इस तरह की असहाय स्थिति में अपने को नहीं पाता। इसके अलावा जिनके टीएडीके का समय पूरा हो गया है और जो सरेंडरिंग की प्रक्रिया शुरू करने वाले थे, वे भी तब तक रुक जाते, जब तक इस पर कोई सर्वसम्मत निर्णय नहीं हो जाता।

उनका कहना था कि “लेकिन यहां तो सैडिस्टिक तरीके से यह धमकी दे दी गई कि 1 जुलाई से भी जिसकी बहाली हो गई है, उसका भी रिव्यू होगा।” उन्होंने कहा कि अपनी समर्पित वर्कफोर्स अथवा अपने सहयोगियों के साथ इससे बड़ा भद्दा मजाक और ज्यादाती क्या हो सकती है? वह भी तब, जब खुद पूरे सेवाकाल में उन्होंने इस सुविधा का भरपूर इस्तेमाल किया और अब भी कर रहे हैं!

कई अधिकारियों और कर्मचारियों का यह भी कहना है कि रेलमंत्री अपने किसी भावी लाभ को ध्यान में रखकर अपना एजेंडा पूरा करने और रेलवे को बदनाम करने के लिए पहले बहुत ही गंदे और ओछे तरीके से तोहमत लगाते हैं, और फिर जबरदस्ती उसके पीछे पड़ जाते हैं। ऐसा ओछापन आज तक शायद ही किसी रेलमंत्री ने दिखाया होगा।

पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़े वंचितों के बारे में भी सोचना होगा

उनका कहना है कि, “रेलमंत्री को पहले यह तो पता कर लेना चाहिए कि भले ही उनका कोई भी पूर्वाग्रह हो, लेकिन यह बहुत बड़ा सत्य है कि बंगला प्यून या टीएडीके के माध्यम से अधिकांश उन वंचित और आर्थिक, सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को एकमात्र सरकारी रोजगार का अवसर मिल पाता है, जो तबका सिर्फ और सिर्फ मेहनत के बूते पर ही जिंदा रहता है। जो सामाजिक तौर पर न तो किसी प्रतियोगी परीक्षा की दौड़ में आने वाले खर्च को वहन करने में सक्षम होता है और न ही मेहनत के अलावा उसका कोई मेरिट और जुगाड़ ही होता है। समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े ये लोग किसी भी पारंपरिक चयन प्रक्रिया के माध्यम से कोई भी सरकारी नौकरी कभी पा ही नहीं सकते।”

चाबुक और हिकारत से हांकने पर काम नहीं होता

उनका स्पष्ट मानना है कि “कायदे से यह सुविधा जूनियर और सीनियर स्केल अधिकारियों को भी मिलनी चाहिए, क्योंकि हर बेहतरीन ऑर्गनाइजेशन अपने कर्मचारियों को दिए गए इंसेंटिव से ही परखा और पहचाना जाता है। उसी से किसी कंपनी की आउटपुट निर्धारित होती है और कर्मचारी जब पूरी तरह से अपने मालिक में गार्जियन का भाव देखते हैं, तो अपना बेहतर देते हैं। टाटा ग्रुप इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। लेकिन जिस कंपनी  का मालिक चाबुक से और हिकारत से देखते हुए अपने कर्मचारियों अथवा मातहतों को हांकने की कोशिश करता है, वह जल्दी ही अपने पुरखों के द्वारा खड़ी की गई सम्पति का नाश कर देता है। वर्तमान रेलमंत्री शायद यही कर रहे हैं।”

यहां रेल मंत्रालय (रेल भवन) के गलियारों में चल रहे कई किस्सों में से एक मजेदार किस्सा एक अधिकारी ने शेयर किया –

“एक अन्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मजाक में एक सीरियस बात अपने साथ रुड़की में पढ़े एक रिटायर्ड बोर्ड मेंबर से एक बार कहा कि गनीमत है कि ये रेलमंत्री ही हैं, अगर ये रक्षामंत्री बन जाते, तो सबसे पहले सेना को खत्म कर देते और कहते चीनी आउटसोर्स एजेंसी से इनसे सस्ते में आदमी और हथियार दोनों डिप्लॉय हो जाएंगे। बाद में वह इसके फायदे भी गिना देंगे कि पहले तो कोई हिंदुस्तानी अब बॉर्डर पर मरेगा नहीं और दूसरे जहां एक मिलिट्री डिवीजन को मेनटेन करने पर 100 रुपए खर्च होते थे, वहां अब चाइनीज और चीनी एजेंसियां 30 रुपए में ही यह काम करेंगी। या फिर वे संभवतः यह भी बता देते कि “चीन अब इस आउटसोर्स के बदले उल्टे सरकार को भी 1000 रुपए हर महीने देने का ऑफर कर रहा है और इसी लागत विष्लेषण (कॉस्ट एनालिसिस) के आधार पर चीनी, पाकिस्तानी एजेंसियों और हिजबुल आदि को भी लेह, लद्दाख, कश्मीर, पंजाब, राजस्थान आदि बॉर्डर पर देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने का काम मिल जाएगा।” (बहुत से लोग तब तक इस नूतन प्रयोग की वाहवाही भी करेंगे, जब तक कि देश पर साक्षात चीन या पाकिस्तान का कब्जा न हो जाए।)

सुरक्षा के साथ खिलवाड़ साबित होगी कोई भी नई व्यवस्था

अब तक का यह अनुभव रहा है कि बीपी/टीएडीके माध्यम से आने वाले लोग कैटेगिरी चेंज होने पर जिस जिस विभाग में काम करते हैं, वे सबसे ज्यादा बेहतर, अनुशासित और कर्मठ मानव संसाधन सिद्ध हुए हैं। किसी और माध्यम से यह व्यवस्था थोपने पर यह न सिर्फ घातक सिद्ध हो सकती है, बल्कि अधिकारियों और उनके परिवारों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ भी होगा।

इसके कई उदाहरण मौजूद हैं। 2004 में इटारसी डीजल लोको शेड में तैनात रहे एक सीनियर डीएमई की घर में अकेली पत्नी की हत्या बंगला प्यून ने ही की थी। इसी प्रकार दक्षिण मध्य रेलवे की लालागुड़ा वर्कशॉप में पदस्थ रहे एक अधिकारी का परिवार बंगला प्यून की क्रूरता के चलते ही अकारण मौत के मुंह में समाकर बरबाद हो गया था।

इसी तरह जब तक रेलवे में रेल से जुड़े लोगों की बहाली होती रही अथवा ट्रेड अप्रेंटिस के माध्यम से स्किल्ड मानव संसाधन लाया जाता रहा, तब तक रेलवे का काम सुचारु रूप से चलता रहा। परंतु जब से यस व्यवस्था खत्म करके राजनीतिज्ञों के फायदे के लिए आरआरबी/आरआरसी जैसी भ्रष्टतम व्यवस्था के माध्यम से कथित पढ़े-लिखे लोगों को लाया जाने लगा, तब से उनसे काम लेना रेल अधिकारियों के लिए न सिर्फ एक बड़ा सिरदर्द साबित हुआ है, बल्कि रेलवे सहित रेलयात्रियों की भी संरक्षा और सुरक्षा हर स्तर पर प्रभावित हुई है।

जब वर्तमान व्यवस्था में, जहां सब कुछ जांच-परखकर किया जाता है, वहां जब अधिकारी और उनका परिवार सुरक्षित नहीं है, तब आरआरसी/आरआरबी जैसी महाभ्रष्ट व्यवस्था से आने वाले किसी अनजान, अज्ञात आदमी को रखे जाने पर क्या स्थिति हो सकती है, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

पहले आरआरसी से भर्ती लोगों से काम तो करवा लें रेलमंत्री

अधिकारियों का कहना है कि कुछेक विभागों, जिनमें सरप्लस मैनपावर है, उनके कुछ अधिकारियों को छोड़ कर बाकि सभी अधिकारियों की दिनचर्या सिर्फ एकमात्र टीएडीके के ऊपर ही निर्भर होती है। उनका कहना है कि रेलमंत्री पहले तो आरआरसी आदि से ट्रैकमैन, हेल्पर खलासी आदि के लिए बहाल हुए लोगों से ही व्यवस्थित काम करावा लें, वही बहुत होगा। इसके बाद ही आरआरसी, कांट्रेक्ट और आउटसोर्सिंग एजेंसियों से टीएडीके लगाने पर विचार करें! धीरे से उनका यह भी कहना है कि मंत्री जी शायद इसमें भी किसी पार्टी कार्यकर्ता या अपने सहयोगी को घुसाने की सुविचारित दीर्घावधि योजना की संभावना तलाश रहे हैं। जैसा कि उन्होंने ईएनएचएम आदि जैसी भ्रष्टाचार पैदा करने वाली कई अन्य नई योजनाओं को लागू करके किया है।

रेल परिवार के सामने “विलेन” बन गए मंत्री और सीआरबी

उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस एक निर्णय ने एक ही झटके में रेलमंत्री और सीआरबी “वीकेन यादव” को हर रेल अधिकारी के घर में “विलेन” के रूप में खड़ा कर दिया है। अब तक तो वे उन्हें वर्षों से स्थापित और सुचारू रूप से चल रही रेल व्यवस्था को सिर्फ तोड़ते-फोड़ते और बरबाद करते हुए ही देख रहे थे। उनको यह अंदाजा नहीं था कि रेलमंत्री और सीआरबी उनके घरों में घुसने की इस निम्नता अथवा अनैतिकता तक भी उतर सकते हैं!

जिनके घर शीशे के होते हैं, वह दूसरों के घरों में पत्थर नहीं फेंकते!

रेलवे बोर्ड के कई अति वरिष्ठ उच्च अधिकारी और हाल ही में बोर्ड से रिटायर हुए मेंबर्स, जिन्होंने काफी नजदीक से वर्तमान रेलमंत्री को देखा है और उनकी कार्यशैली को भली-भांति जानते हैं, का मानना है कि शायद इस घटना के कारण रेलमंत्री को ये सीख मिल जाए कि, “जिनके खुद के घर शीशे के होते हैं, उन्हें दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए।”

उनका कहना है कि, “क्योंकि यह मनुष्य की प्रकृति है कि वह तब तक सिर झुकाकर सब कुछ बर्दास्त करता है, जब तक वह देखता है कि उसका असर उसके परिवार, उसकी गरिमा या स्वाभिमान पर नहीं पड़ रहा, लेकिन जब इस सब पर असर पड़ने लगता है, तब छोटा से छोटा तथा कमजोर से कमजोर आदमी भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूरी ताकत से उसका प्रतिकार करता ही है।”

किसके लिए काम करती है मंत्री के साथ लगी फौज?

कई रेल अधिकारियों का कहना है कि अधिकांश रेल कर्मचारी और अधिकारी जो भी काम करते हैं, वह तो रेल के लिए और देश के लिए करते हैं। लेकिन रेलमंत्री तो सिर्फ अपने परिवार (कार्यकर्ताओं) के लिए ही काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि “भारत सरकार में ये पहले कॉर्पोरेट स्टाइल में काम करने वाले मंत्री हैं, जो सिर्फ रेल मंत्रालय में ही अपने 70 आदमियों की एक बड़ी फौज अपने साथ रखे हुए हैं, बाकी दो मंत्रालय और भी हैं उनके पास। हालांकि यह बात अलग है कि ये बहुत कुछ करते हुए दिखाई देते हैं, जिसमें रेलवे की स्थापित कार्यशैली और रेलकर्मियों एवं अधिकारियों को मिली सुविधाओं से सौतिया डाह के चलते उन्हें बदनाम करने की मात्रा ही ज्यादा रही है, पर जमीनी स्तर पर इनसे आज तक कुछ किया नहीं जा सका है।”

वह आगे कहते हैं कि, “स्पष्टतः रेलमंत्री के साथ लगी निजी लोगों की यह बड़ी फौज उनकी व्यक्तिगत पसंद के, व्यक्तिगत कारणों से और व्यक्तिगत तथा पारिवारिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही तो है। यह फौज रेल के लिए तो कतई काम नहीं कर रही और न ही देश के लिए कर रही है, तो आखिर अपनी इस फौज को किस महान कार्य पर लगा रखा है रेलमंत्री ने?” यह उनका सीधा सवाल है।

उनका कहना है कि अगर मंत्री के ही तर्कों का सहारा लिया जाए, तो रेलवे के 14 लाख लोगों में से रेलवे और देश के काम के लिए बड़ी आसानी से उपयुक्त और उपयोगी आदमी ढूंढे जा सकते हैं, इस सच्चाई के अलावा कि मंत्री आधिकारिक तौर पर अपनी पसंद से 5/6 लोगों को रख सकते हैं।

फेल होने की राह पर अग्रसर रेलमंत्री

यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि मंत्रियों और सांसदों में तब इस बात को लेकर कितनी नाराजगी थी, जब वैयक्तिक सहायक के रूप में प्रधानमंत्री ने कुछ मानक निर्धारित कर दिए थे और संघ से जुड़े लोगों को वरीयता दी जाने लगी थी। लेकिन फिर भी बाकी कौन होंगे, क्यों होंगे, कैसे होंगे, तब तुम घर पर उससे काम करवा सकोगे या साथ रखोगे, इसे प्रधानमंत्री ने रेलमंत्री के जैसी सैडिस्टिक मानसिकता से निर्देशित नहीं करवाया, क्योंकि यदि वे ऐसा करते तो शायद अब तक पार्टी में भयंकर विद्रोह हो गया होता और पार्टी खत्म होने के कगार पर कब की पहुंच गई होती। अधिकारियों का स्पष्ट मानना है कि अपने ऐसे ही सहायकों की वजह से इनके पहले वाले मंत्री फेल हुए थे और अब यह भी इसी वजह से उसी राह पर अग्रसर हैं।

आने वाले समय में सबसे कमजोर नब्ज साबित होगा रेल मंत्रालय

कई अधिकारियों और कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों का कहना है कि अभी तक तो दूसरे मंत्रालय के भ्रष्टचार की चर्चाएं होती थीं, लेकिन अब अगर कोई दूसरी सरकार आएगी, तो इस सरकार की सबसे कमजोर नब्ज रेल मंत्रालय ही होगा, क्योंकि जिस तुगलकी तरीके से इसको तहस-नहस किया जा रहा है, और जिस मनमाने तरीके से रेलवे को और इसकी गतिविधियों तथा संसाधनों को तोड़-मरोड़कर बेचा जा रहा है, वह स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा सुनियोजित घोटाला है, जिसकी सीधी मार इस देश की आम जनता पर पड़ेगी और फिर क्रमिक जांचों की शुरुआत रेल मंत्रालय से ही होगी।

कुछ अधिकारियों का यह भी कहना था कि इस सरकार को इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि तमाम दुश्वारियों के बावजूद भी अधिकांश लोग राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री मोदी के साथ खड़े हैं, लेकिन इस तरह के निर्णय से ये लोग बाध्य किए जा रहे हैं कि वे इस सरकार के विरुद्ध सिर्फ कुछ बोलें ही नहीं, बल्कि कुछ पुख्ता करें भी। और यही अथवा ऐसी ही कुछ अन्य साजिशें रेल मंत्रालय चला रहे लोगों द्वारा सरकार के खिलाफ की जा रही हैं। 

अंततः इस बात का ख्याल रेलमंत्री और सीआरबी को होना ही चाहिए कि “सब दिन होत न एक सामना!”

क्रमशः पढ़ें – “एक छत के नीचे कैसे चल रही है आरपीएफ में दोहरी व्यवस्था!”





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#बोल कि लब आजाद हैं तेरे… – RailSamachar

रेलमंत्री और सीआरबी को शायद राममंदिर का बनना और शिलान्यास होना रास नहीं आया!

लगता है कि प्रधानमंत्री से रेल मंत्रालय को चला रहे लोगों की कोई अंदरूनी दुश्मनी है? जिसे अब तक शायद वह समझ नहीं पाए हैं!

सुरेश त्रिपाठी

Narendra Modi, Hon’ble PM/India

बुधवार, 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में राममंदिर के शिलान्यास और इसके निर्माण की शुरुआत होते देखकर जहां पूरा देश सदियों के इस सपने को साकार होता देख अभिभूत था, खुशी मना रहा था, दीप जलाने की तैयारी कर रहा था, वहां सीआरबी महोदय ने रेल अधिकारियों के लिए एक ऐसा फरमान उपहार स्वरूप जारी किया, जो पाकिस्तान का रेल मंत्रालय भी शायद ऐसा करने से पहले कम से कम आज के दिन तो एक बार जरूर सोचता।

रेल अधिकारियों में आज इतनी निराशा और हतोत्साह था कि एकाध रेलवे आवास को छोड़कर किसी भी आवास में आज दीपक जलाकर 5 अगस्त के इस ऐतिहासिक दिन का अभिनंदन नहीं किया गया।

ऐसा लगता है कि रेल मंत्रालय को चला रहे लोगों की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कोई अंदरूनी खुन्नस है, जो वह मोदी जी के रेलवे और देश के लिए किए जा रहे हर अच्छे काम और हर कोशिश को हर मौके पर पलीता लगाने और उस पर पानी फेरकर उनकी छवि को धूमिल करने का प्रयास करते नजर आते हैं। पिछले पांच-छह सालों से जो देखने में आ रहा है, उससे तो कम से कम यही निष्कर्ष निकलता है!

सीआरबी का किसी आतंकवादी मुखिया जैसा व्यवहार?

बहरहाल, जितना कोई आतंकवादी संगठन धमाकाकर और हजारों लोगों को मारकर निराशा, शोक और मनहूसियत का माहौल बना सकता था, उससे कहीं ज्यादा बड़ा उन आतंकवादियों का काम आज 5 अगस्त को रेल मंत्रालय के इस मैसेज में भेजे गए सीआरबी के फरमान ने किया।

“CRB has directed that not a single case of bungalow peon appointment shall be approved. All cases approved in the last one month should be reviewed  immediately. This may please be confirmed”.

“Kind attention all PFAs: Hon’ble MR has desired that number of TADK appointments made w.e.f  01.07.2020 in each Railway/PU should be provided immediately. It is requested to provide the information by 12:00 hrs on 06.08.2020 for your railway. The same may be sent at financialcommissioner@gmail.com. This may be treated most urgent. -Naresh Salecha, AM/R”.

इस दिन की महत्ता और संवेदनशीलता को देखकर शायद ही कोई देशभक्त या रामभक्त आज इस तरह का कोई फरमान जारी करता।

एक तरफ प्रधानमंत्री का साष्टांग, देश के समस्त लोगों को अभिभूत कर रहा था और शुभ भविष्य का संदेश देता नजर आ रहा था, तो वहीं दूसरी तरफ उनके एक मंत्रालय का कृत्य ऐसा बर्ताव कर रहा था मानो वह फिर से इस देश में रावण और बाबर की सत्ता के आगमन की आहट दे रहा हो।

सीआरबी और बोर्ड के उच्च अधिकारी पहले स्वीकार करें

“या तो सीआरबी और रेलवे बोर्ड में रिटायरमेंट के कगार पर बैठे तमाम “शिखंडी” उच्च रेल अधिकारी पहले यह स्वीकार करें कि बंगला प्यून उर्फ #टीएडीके रेलवे में शुरू से एक गैरजरूरी सुविधा रही है, या फिर यह रेल अधिकारियों की विशेष कार्य परिस्थितियों को देखते हुए निहायत ही जरूरी सुविधा मानकर उन्हें अब तक दी जाती रही है!”

क्योंकि अब तक टीएडीके जैसी जरूरी सुविधा का उपभोग कर जब रेल छोड़ने की बारी आई, तो निहायत ही दोगलेपन से आप उस निहायत ही जरूरी टीएडीके की सुविधा को खत्म कर रहे हो, जबकि आप जानते हो कि रेल अधिकारी जिन कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं, वहां यह सुविधा कम, जरूरत ज्यादा है।

लेकिन फिर भी अगर आप लोग टीएडीके को गलत मानते हैं, तो सबसे पहले उसकी भरपाई करें और कम से कम लिखित में दें कि “हां, हमने इस सुविधा का अभी तक गलत उपभोग किया है, जबकि हमें इसकी जरूरत ही नहीं थी!” कम से कम ऊपर वालों को इसे नैतिक आधार पर जरूर स्वीकार (कन्फेस) करना चाहिए।

विषय और समय की गंभीरता को समझे बिना निर्णय

दूसरी बात इस कोविड-19 पैन्डेमिक जैसी भयानक वैश्विक महामारी जनित अनिश्चितता के दौर में इस तरह से बिना समुचित गंभीरता अपनाए, बिना इसके औचित्य का उपयुक्त मंथन किए, और बिना किसी समिति की अनुशंसा के एकाएक मैसेज देकर इसे रोकने का औचित्य क्या है? यह भी स्पष्ट किया जाए।

इस तुगलकी फरमान की एक विसंगति यह भी है कि  “एलिजिबिलिटी” होने के बावजूद जिन अधिकारियों के पास अभी टीएडीके नहीं है, या जिनका प्रक्रिया में है, अथवा जिनके टीएडीके 1 जुलाई के बाद बहाल हुए हैं, या कैटेगरी चेंज करने के लिए जिनके टीएडीके की मियाद निकट भविष्य में पूरी होने वाली है, वे अधिकारी तब तक बिना टीएडीके के रहेंगे!

किसके भक्त हैं सीआरबी और बोर्ड अधिकारी!

रेल अधिकारियों के लिए 5 अगस्त का यह दिन जैसे युगों में आने वाले किसी ऐतिहासिक दिन का उपहार है! अब भारतीय रेल मंत्रालय इस दिन को इतिहास में उपहार के रूप में दर्ज कराना चाहता था, या उपहासास्पद और निराश करने वाले दिन के रूप में, यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसके आधुनिक नीति-नियंता रामभक्त हैं या बाबर के अथवा मोहम्मद बिन तुगलक के भक्त हैं!

सर्वप्रथम पहल अपने से करें मंत्री और सीआरबी

वैसे भी अगर किसी भी जिम्मेदार और नैतिक नेतृत्व को इस तरह का कदम उठाना होता है, तो सर्वप्रथम उसकी पहल अपने से करनी चाहिए! गांधी की तरह!!

मंत्री, सीआरबी, बोर्ड मेंबर्स और बोर्ड में बैठे बाकी अन्य “ऊदबिलाव” जैसे रेल अधिकारी, जिनके सरकारी आवासों में 20/25 रेलकर्मी काम कर रहे हैं, इन सभी रेलकर्मियों को हटाकर सबसे पहले वे अपनी इस मुहिम की शुरुआत करें।

इसके साथ ही वह भी पहले खुद के टीएडीके भी हटाएं। अगर तब ये तथाकथित बड़े नीति-नियंता एक दिन भी काम कर लें, तब फिर इनको जो समझ में आए, वह करें और तब रेल अधिकारियों की इस टीएडीके नाम की कथित लक्जरी सुविधा की जरूरत का अंत कर दें।

लेकिन ऐसा अनर्थ नहीं होना चाहिए कि मंत्री, सीआरबी, बोर्ड मेंबर्स के आवासों में सरकरी आदमियों की फौज लगी हो और दूसरों के लिए आप आदर्शवादी प्रवचन दें।

“पर उपदेश कुशल बहुतेरे”

25 साल पहले तक जो रेलमंत्री रहे, चाहे रामविलास पासवान हों या लालू यादव, इन सभी पूर्व रेलमंत्रियों/नेताओं के घरों पर आज भी रेलवे के कई-कई कर्मचारी काम कर रहे हैं। कई बीसों साल पहले रिटायर जीएम, बोर्ड मेंबर्स और सीआरबी के घरों पर भी आज भी रेलवे के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी काम कर रहे हैं। सुशासन बाबू के घर से लेकर उनके टारगेट पर रहे पूर्व सीआरबी कांतारू के घर पर भी रेलवे के लोग आज भी काम कर रहें हैं। लेकिन है किसी में इतनी हिम्मत या साहस कि इनमें से किसी नेता या रिटायर्ड अधिकारी के घर से किसी आदमी को हटा दे?

या है किसी वर्तमान मंत्री, सीआरबी या बोर्ड मेंबर में इतना नैतिक बल, कि अपनी कोठियों में एक भी रेलवे स्टॉफ या टीएडीके न रखे?

या है किसी सीवीसी में, सीबीआई में दम, जो अचानक इनकी कोठियों पर छापा मारकर देखे कि कितने सरकारी आदमी इनकी कोठियों पर काम कर रहें है?

ब्लैकमेलिंग पावर और सैडिस्टिक प्लेजर

लेकिन अपने को ज्यादा काबिल और आदर्शवादी दिखाने की जुगत में, जिनको जरूरत है और जिनका काम, मेहनत, योगदान ही जिनके अस्तित्व को जस्टीफाई करता है, उनकी जरूरतों का बलिदान करना उन्हें ज्यादती नहीं, वरन जायज लगता है, क्योंकि इसमें ज्यादा “ब्लैकमेलिंग पावर” भी है और उससे ज्यादा “सैडिस्टिक प्लेजर” भी !

जरा सोचिये, बुढ़ापे में जहां सीआरबी, बोर्ड मेंबर्स आदि घर में मात्र दो प्राणी ही होते हैं और सामाजिक जिम्मेदारी न के बराबर होने से नाते-रिश्तेदार भी न के बराबर ही आते हैं, अगर उन्हें 10-20 आदमी रखने की जरूरत और जस्टीफिकेशन है, तो फिर उनके जूनियर अधिकारी जिनके बच्चे अभी पढ़ ही रहे हैं, बीमार बुजुर्ग मां-बाप भी उनके साथ ही रहते हैं और सामजिक जिम्मेदारी का बोझ भी सबसे ज्यादा इन्हीं पर होता है तथा गांव-घर से नाते-रिश्तेदार भी गाहे-बगाहे आते ही रहते हों, तो फिर उनके लिए यह टीएडीके गैरजरूरी कैसे हो गया?

महान ईमानदार योगी बाबा उर्फ सुशासन बाबू

जिंदगी भर “रंगीला बादशाह की लाइफस्टाइल” से रेलवे का उपभोग करने वाले महान ईमानदार योगी बाबा उर्फ सुशासन बाबू (लौह… पुरूष) रेलवे के ऐसे पहले अधिकारी थे, जिन्होंने अपनी निजी छवि या दूकान चमकाने के लिए इसका कीड़ा अपने राजनीतिक आकाओं के दिमाग में घुसाया।

रेल अधिकारी भ्रष्ट हैं, नाकाबिल हैं, सुविधाभोगी हैं, ऐय्याशी करते हैं, मैनपावर का बहुत मिस्यूज करते हैं, आदि आदि यह सब इन्हीं सुशासन बाबू के द्वारा प्रतिपादित विचार थे, जो कि बहुत तेजी से आम जनता और वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व में भी “परसेप्शन” बन गए। (हालांकि यह भी माना जाता है कि दूसरों में ये सारे ऐब वही खोज सकता है, जिसमें ये सारे (अव)गुण खुद पहले से मौजूद रहे हों!)

उन्होंने अपनी स्वतःस्फूर्त प्रेरणा से अभियान शुरु किया कि किसी भी अफसर के घर पर टीएडीके के अलावा कोई अन्य रेलवे स्टाफ काम करता मिल गया, तो परिणाम बहुत बुरा होगा। अनुशासनिक कारवाही होगी, विजिलेंस कार्यवाही होगी, आदि आदि। हालांकि हुआ कुछ भी नहीं, सब कुछ टांय-टांय फिस्स हो गया। तथापि उनका निशाना कहां था और इसमें उनको कितनी सफलता मिली, यह तो रेलवे के लोग ही बेहतर जानते हैं, लेकिन इसका फायदा सुशासन बाबू को जरूर हुआ।

उनकी छद्म ईमानदारी का, आत्मप्रवंची प्रखर बहुमुखी प्रतिभा(?) का, बहरूपिया लोकलुभावन छवि का इतना जबरदस्त प्रभाव इस सरकार पर पड़ा कि उन्हें फिर से एयर इंडिया का बचा-खुचा बंटाधार करने – क्षमा करें – बचा-खुचा कार्य करने के लिए सीएमडी बना दिया गया।

इसके बाद ईमानदारी के प्रतिरूप महान योगी सुशासन बाबू की कथित बहुमुखी प्रतिभा के व्यामोह में पड़कर दक्षिण के एक राज्य ने इनसे अपनी सेवाएं देने का आग्रह किया और इन्होंने उसे अनुग्रहित कर कृतार्थ भी किया, लेकिन कहते हैं न कि “हीरे की असली परख जौहरी ही करता है” और सुशासन बाबू की परख भी इस देश की उन्हीं के जैसी एक बड़ी ईमानदार(?) कंपनी ने किया, जो सिर्फ अपने ईमानदार(?) कार्यों के लिए ही जानी जाती है, जिस पर आज तक कोई लांछन ही नहीं लगा !

कृपया यहां सिर्फ तीन लिंक देखने का कष्ट करें!

https://m.economictimes.com/markets/stocks/news/gmr-group-under-cbi-lens/articleshow/47278528.cms

http://www.cnbctv18.com/business/ashwani-lohani-joins-gmr-group-as-ceo-services-business-6431391.htm

https://www.firstpost.com/business/gmrs-big-steal-rs-24000-cr-land-for-rs-31-lakh-421326.html/amp

रेलवे और रेलकर्मियों-अधिकारियों की छवि को जानबूझकर किया गया छिन्न-भिन्न

रेलवे के अधिकारियों और कर्मचारियों की छवि को छिन्न-भिन्न करने का और उनकी जरूरत को सुविधा या विलासिता बताने का जो कुत्शित कार्य सुशासन बाबू ने शुरू किया था, उसे अंतिम रूप देने का कार्य वर्तमान सीआरबी वी. के. यादव उर्फ “वीकेन यादव”, भारतीय रेल का पहला “सीईओ” बनने की चाहत में कर रहें है।

“सुशासन बाबू” और “वीकेन यादव” की अजगरी प्रवृत्ति

किसी भी “ऑर्गनाईजेशन” के “मुखिया” के लिए उस ऑर्गनाइजेशन में काम करने वाले लोग उसके परिवार और बच्चों की तरह होते हैं और इनके जरूरी हितों की देखभाल और रक्षा करना उसका पहला कर्तव्य होता है, लेकिन इस धरती पर “अजगर” जैसे भी कुछ जीव होते हैं, जो अपनी “भूख” मिटाने के लिए अपने बच्चों को ही निगल जाते हैं। “सुशासन बाबू” और “वीकेन यादव” ने भी अपनी महत्त्वाकांक्षा और भूख के लिए वही किया और कर रहे हैं, जो सदियों से “अजगर” करता रहा है।

समकक्ष व्यवस्था उपलब्ध कराए बिना वापस नहीं ली जा सकती कोई सुविधा

सुचारु रूप से चल रही व्यवस्था में बदलाव या परिवर्तन उसमें तोड़फोड़ कर अथवा उसे बरबाद करके नहीं हो सकता और न ही इसे विकास या नई/अनोखी व्यवस्था का नाम दिया जा सकता है। तथापि प्रबंधन और व्यवस्था में सुधार करने के बजाय जो लोग ऐसा करते हैं, या करने का प्रयास कर रहे होते हैं, वह निहायत निकम्मे, नालायक, नामुराद, जाहिल, गंवार और सौतिया डाह रखने वालों की श्रेणी में गिने जाते हैं।

संवैधानिक व्यवस्था है और प्राकृतिक न्याय का तकाजा भी, कि “जनता अथवा सरकारी कर्मियों के लिए पहले से चली आ रही कोई सुविधा तब तक वापस नहीं ली जा सकती है, जब तक कि उसके समकक्ष वैसी ही दूसरी कोई सुधारित या परिष्कृत सुविधा उन्हें मुहैया न करा दी जाए!” पर ऐसा कुछ कभी इस देश में होता नहीं देखा गया, सिर्फ खुद के लिए सुविधाएं बटोरने का काम राजनीतिक नेतृत्व द्वारा किया गया, वह भी बाकायदा संविधान की डुगडुगी बजाकर!

कहते हैं कमजोर पर ही सबका वश चलता है और अभी रेल अधिकारियों-कर्मचारियों से ज्यादा कमजोर, बेचारा और लावारिस शायद इस देश में कोई और नहीं है।

सोची-समझी रणनीति के तहत उभारा गया विभागवाद

अभी तक भारतीय रेल को सफलतापूर्वक चलाने वाले अधिकारी और कर्मचारी आचानक पिछले चार-पांच सालों में आपसी “विभागवाद” के इतने तीखे विवाद में धंस चुके हैं कि न तो वह रेलवे का, देश का दूरगामी हित देख पा रहें हैं, और न ही अपना।

इनकी आपस की लड़ाई इन्हें इतना अंधा बना चुकी है कि इन्हें ये सब देखते हुए भी कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि रेलवे को बेचने वाले बहरूपिये इन्हें कितनी चालाकी से आपस मे लड़ाकर अपने गोल की ओर बढ़ रहे हैं और ये हर बीतते दिन के साथ कमजोर कठपुतली बनते जा रहे हैं।

मुंबई में फुट ओवरब्रिज गिरने पर जब रेलवे इंजीनियर्स को भ्रष्ट और नाकाबिल बताकर सेना को उनका कार्य दे दिया गया था, उस समय सबने एक होकर इसका विरोध करने के बजाय सिर्फ सिविल इंजीनियर्स का मामला मानकर बाकी विभागों ने खूब रस लिया।

फिर जब इलेक्ट्रिकल वालों के साथ अन्याय होना शुरू हुआ, तो मैकेनिकल वाले इसमें अपनी साम्राज्य विस्तार नीति की जीत मान रहे थे और बाकी डिपार्टमेंट इलेक्ट्रिकल-मैकेनिकल की आपसी लड़ाई मानकर मजा लूट रहे थे।

फिर जब ट्रैफिक वालों की बजाई जाने लगी, तो बाकी लोग इसका रसास्वादन करने लगे। ट्रैफिक वालों का भी अहंकार ऐसा कि यहां कोई अपने को बावन हाथ से कम नहीं मानता, परिणाम सामने है कि आज इस पूरे कैडर को ढ़केलकर दीवार से चिपका दिया गया है और अब इनकी चूं भी नहीं निकल पा रही है।

और अब जब इलेक्ट्रिकल सीआरबी ने मैकेनिकल वालों को पद-दलित करने के लिए चुटिया बांधकर कमर कसी हुई है, तब भी बाकी डिपार्टमेंट ताली बजा रहे हैं।

एकाउंट्स जैसे कुछ डिपार्टमेंट अपने को सबसे ज्यादा काबिल, अभिजात्य और दूसरे ग्रह से आया प्राणी मानकर सिर्फ अपनी बात करते रहे हैं, जबकि व्यवस्था को आगे बढ़ाने के काम में सबसे बड़ा अड़ंगा यही हैं।

यही हाल तकरीबन कार्मिक, स्टोर्स, आरपीएफ आदि अन्य विभागों का भी रहा। जहां-जहां ऑर्गनाइजेशन के हित को ध्यान में रखकर सबको कैडर से अलग हटकर एकजुट होना चाहिए था, वहां-वहां सबने “इंडिविजुअल कैडर इंटरेस्ट और एजेंडा” को लेकर चतुराई से चलना शुरू किया।

“फूट डालो, राज करो” की अंग्रेज नीति का अनुसरण

चालाक-चतुर नेतृत्व ने इन सबकी इसी कमजोरी को पकड़ा। और अंग्रेजों की दी गई “फूट डालो, राज करो” की नीति को बिना किसी प्रभावी प्रतिरोध के सफलता से लागू कर दिया। इसी का दुष्परिणाम है कि आज रेलवे के सभी अधिकारी-कर्मचारी इस बद्तर हालात में लावारिस खड़े हैं, जहां हांक लगाने पर भी उनका साथ देने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है।

दरअसल ये सब यह भूल गए थे कि ट्रैफिक, सिविल, मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, पर्सनल, स्टोर्स, एकाउंट्स आदि तथा टेक्निकल-नॉन टेक्निकल आप एक-दूसरे की नजर में ही हो, लेकिन राजनीतिक आकाओं और दुनिया की नजर में आप सिर्फ और सिर्फ एक मामूली “सरकारी अधिकारी” या “कर्मचारी” ही हो, इससे ज्यादा कुछ नहीं! और यह भी कि आड़े वक्त लोगों के काम आकर जनमानस में आपने कभी अपनी छवि सुधारने की कोशिश नहीं की!

कोई भी बड़ा या छोटा दिखने वाला निर्णय, जो रेलवे को निजीकरण (#privatization) या निगमीकरण (#corporatization) की तरफ लेकर जाने वाला होगा, वह सभी के सभी “रेल अधिकारियों और रेल कर्मचारियों” के लिए होगा, न कि किसी एक कैडर विशेष के लिए!

“स्टोरकीपर”, “सुशासन बाबू” और वर्तमान “वीकेन यादव” के काल का ही सिर्फ रेल अधिकारी और कर्मचारी शांत दिमाग से आकलन कर लें, तो उनकी समझ में बखूबी आ जाएगा कि कबीरदास की चक्की ही चल रही है, जिसमें बचना किसी को नहीं है।

ए. के. मित्तल (ईश्वर उनकी दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे) के समय जो लोग अपने साम्राज्य विस्तार का जयघोष कर रहे थे, सुशासन बाबू के काल में वे ही पाटन के बीच आ गए। और सुशासन बाबू के समय जो लोग (मैकेनिकल वाले) अपने साम्राज्य विस्तार का उत्सव मना रहे थे, आज अपना अस्तित्व बचाने की जुगत में हलकान हुए पड़े हैं। इसलिए यदि अभी भी यह सब देख और सीखकर सुधर जाएं, तो रेल भी बचे और देश भी।

कैडरिज्म युक्त मारिज़ुआना का नशा

एक बात का और ख्याल रखें कि कैडर का भला सोचने से एक-दो अफसरों या मुठी भर लोगों का ही भला होता है और स्टोरकीपर, सुशासन बाबु, वीकेन यादव सरीखे अक्षम, परंतु अति चालाक या छुपे रुस्तम टाइप के लोग ही इस कैडर मानसिकता की आड़ में राज भोग लेते हैं, बाकी कैडरिज्म युक्त मारिज़ुआना के नशे में ऐसे धुत्त पड़े रहते हैं कि भले ही वे 22/25 साल की नौकरी और काबिलियत के बाद भी एसएजी में किसी सड़ी हुई जगह पड़े रहें, लेकिन इसी में आह्लादित रहते हैं कि मानो वही सीआरबी बन गए हों।

विश्वसनीयता खो चुके हैं दोनों अधिकारी संगठन

जहां एक तरफ चापलूसी और दलाली के चलते एक अधिकारी संगठन लगभग खत्म हो चुका है, वहीं दूसरी तरफ दूसरे अधिकारी संगठन के पदाधिकारी विश्वसनीयता खोकर शिखंडी साबित हो रहे हैं। रेल अधिकारियों में एफआरओए (#FROA) को लेकर काफी गुस्सा है। उनका कहना है कि इसमें ऐसे लोग पदाधिकारी हैं जो अधिकारियों की और रेल हित की बात करने के बजाय अपने पद का उपयोग व्यक्तिगत हित साधने और अपनी अच्छी पोस्टिंग सुनिश्चित करने के लिए करते हैं।

उनका कहना है कि वर्तमान का एफआरओए पहले से ही उस बात की भूमिका बनाने/गढ़ने लगता है जो वास्तव में सीआरबी या रेलमंत्री चाहते हैं। उन्होंने बताया, टीएडीके के मामले में भी कल रात चली मैराथन मीटिंग में इन्होंने कहने के लिए टीएडीके का मुद्दा उठाया। पर जब रेलमंत्री ने कहा कि “टीएडीके की व्यवस्था को खत्म नहीं किया जाएगा, लेकिन पर्सनल चॉइस नहीं होगी।” तब ये इसका प्रोटेस्ट किए बिना और उसका औचित्य समझाए बिना ही मान गए, जबकि इन्हें रेलमंत्री को तत्काल बताना चाहिए था कि टीएडीके की पर्सनल चॉइस के पीछे कई महत्वपूर्ण तथ्य रहे हैं, जो किसी अन्य तरीके से या आरआरसी जैसे पूल से देने से न सिर्फ अधिकारी के परिवार की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है, बल्कि टीएडीके उसके लिए एक बहुत बड़ा सिरदर्द भी साबित हो सकता है। अधिकारी अपनी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के आधार पर टीएडीके इसलिए लगाते हैं, क्योंकि जरूरत पड़ने पर वह चौबीसों घंटे भी उनके साथ परिवार के एक सदस्य की तरह रहता है।

कुछ अधिकारियों ने आरआरसी जैसी व्यवस्था यानि कि दूसरे की “अनुशंसा” या किसी अन्य “कंसिडरेशन” के आधार पर, और बिना व्यक्तिगत पसंद को वरीयता दिए जब टीएडीके बहाल किए हैं, तो भारी मुसीबत में पड़े हैं।ऐसा भी नहीं है कि आरआरसी जैसी कोई भ्रष्ट और छद्म व्यवस्था अभी नहीं है?

जांचे-परखे बिना लिए गए टीएडीके की असलियत

प्रायः हर जगह एक संगठित गिरोह सक्रिय रहता है, जो शुरू में ही ताड़ लेता है कि किस अधिकारी को टीएडीके की जरूरत है और उसके पास खोजने का समय नहीं है। तब धीरे से वह अपना कैंडिडेट लेकर पहुंच जाता है, कुछ दिन खूब सेवा करता है, जब अधिकारी प्रभावित होकर उसे बहाल कर लेता है, तब फिर वह अपना असली रंग दिखाना शुरू करता है और अधिकारी एवं उसके परिवार का जीना हराम कर देता है। कोर्ट केस से लेकर अन्य कई झूठे आरोपों में फंसा देता है।

इसीलिए आमतौर पर जब अधिकारी अपनी पसंद से और परखकर टीएडीके बहाल नहीं करता है, तो उसकी यही गति होती है। यही कारण है कि अधिकारी की पसंद से रखे गए टीएडीके जब कैटेगरी चेंज होकर दूसरी जगह पर जाते हैं, तो अन्य माध्यमों से आए कर्मचारियों से वह ज्यादा व्यवहार में सभ्य और अपने काम के प्रति समर्पित साबित होते हैं। इस तरह रेलवे को एक ज्यादा बेहतर मानव संसाधन की प्राप्ति भी होती है। इस तरह के सैकड़ों उदाहरण ऐसे मौके पर एफआरओए के मूर्धन्य पदाधिकारियों को रेलमंत्री के संज्ञान में लाकर पर्सनल चॉईस के औचित्य को जस्टीफाई करना चाहिए था।

पर्सनल चॉइस का अन्य औचित्य

इसके अलावा टीएडीके की पर्सनल चॉइस की सुविधा कहीं न कहीं रेलवे में आने और रहने का एक बड़ा मोटिवेटिंग फैक्टर तथा इंसेंटिव भी है। अभी तक इसका लाभ ले चुके सीआरबी और उनके जैसे अधिकारियों को यह बात रेलमंत्री को बतानी चाहिए और एफआरओए को भी इसी बात को स्पष्ट करना चाहिए। लेकिन वर्तमान में एफआरओए के जो पदाधिकारी हैं, वे अधिकारियों के बीच तो आईआरएमएस (#IRMS) के विरोध में अपना सुर मिलाते हैं, मगर वही जब रेलमंत्री के सामने जाते हैं, तो सब पर अपना समर्थन देकर/हाथ खड़ा करके चले आते हैं और फिर बाहर आकर यूनियन वालों की तरह अपनी झूठी कहानी सुनाते हैं। इसीलिए उन पर जयचंद का ठप्पा लग चुका है और अब उन पर न किसी को भरोसा रह गया है, न विश्वास।

अब टीएडीके विषय पर लिए बनाई गई समिति के सदस्यों से यह अपेक्षा की जा रही है कि उन्हें किसी प्रकार के दबाब में आए बिना टीएडीके को वर्तमान स्वरूप में ही बनाए रखने की अनुशंसा करनी चाहिए।

दिल्ली से हटकर बनाए जाएं अधिकारी संगठनों के पदाधिकारी

रेल अधिकारी जब तक दक्षिण रेलवे, पूर्व तट रेलवे, पूर्व रेलवे, दक्षिण पूर्व रेलवे या पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे अथवा दिल्ली से हटकर किसी अन्य रेलवे के अधिकारियों के हाथ में अधिकारी संगठनों की कमान नही थमाएंगे तब तक दिल्ली और रेलवे बोर्ड से बनाए गए इनके अध्यक्ष और महामंत्री आदि पदाधिकारी अपनी ही डीलिंग करते रहेंगे। एनएफआर वाले को या एसआर वाले को तो कोई यह कहकर धमका नहीं सकता है कि तुम्हें वहां भेज देंगे जहां तुम हो! किसी भी हाल में उनको खोने को कुछ नहीं होगा। उनके लिए जो भी होगा, उससे बेहतर ही होगा। इसीलिए वे निर्भीक होकर हर फोरम में सच्ची बात ही बोलेंगे।

अगर रेल अधिकारियों और कर्मचारियों में अभी भी और थोड़ी सी भी गैरत बची है तथा रेल के प्रति निष्ठा और देश के प्रति थोड़ी सी भी राष्ट्रभक्ति जिंदा है, तो मेरे हिसाब से टीएडीके का मसला अब जरूरत, सुविधा या बार्गेनिंग के लिए कमजोर नस दबाने का न होकर सभी रेल अधिकारियों-कर्मचारियों के लिए स्वयं की, रेल की अस्मिता का और रेल को निजीकरण, निगमीकरण से बचाने की बची जिजीविषा की ज्वलंत प्रतिक्रिया और इसके लिए लड़ी जाने वाली अंतिम लड़ाई के रूप में होनी चाहिए।

#बोल कि लब आजाद हैं तेरे,

#बोल कि जबां अब तक तेरी है!

#बोल कि सुतवां जिस्म है तेरा,

#बोल की जां (रेल) अब तक तेरी है!!

—फ़ैज़





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पूर्वोत्तर रेलवे द्वारा रेलवे बोर्ड के “केयर गिवर” संबंधी आदेश का उल्लंघन

जोनल अधिकारियों की मनमानी पर अविलंब अंकुश लगाए रेलवे बोर्ड!

गोरखपुर ब्यूरो : कोविड-19 महामारी के चलते रेलवे बोर्ड द्वारा रेल कर्मचारियों के स्थानांतरण पर लगाई गई रोक को पूर्वोत्तर रेलवे के सीएमएम/ई ने ताक पर रखते हुए कर्मचारियों का स्थानांतरण गोरखपुर डिपो से गोंडा डीजल डिपो करके एक कर्मचारी कृष्णानंद सिंह को 18 जुलाई को जबरन जॉइन भी करा दिया। इस स्थानांतरण से स्थानांतरण भत्ता भी देय होने से रेलवे पर अतिरिक्त भार भी पड़ा है।

सवाल यह उठता है कि यदि जोनल रेलों द्वारा बोर्ड के आदेशों और दिशा-निर्देशों का इसी तरह उल्लंघन किया जाता रहा, तो बोर्ड और उसके निर्देशों का औचित्य ही क्या रह जाएगा? ऐसा लगता है कि रेलवे बोर्ड की अनिश्चयात्मक स्थिति के चलते जोनल रेलों में कुछ अधिकारियों द्वारा मनमानी की जा रही है, जिस पर यदि समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो व्यवस्था में और अधिक अराजकता फैलने में ज्यादा देर नहीं लगेगी।

उपलब्ध कार्यालय आदेश से जाहिर है कि कोविड-19 महामारी के कारण आर्थिक संकट से गुजर रही रेलवे एवं कर्मचारियों की बीमारी से रोकथाम के लिए स्थानांतरणों पर बोर्ड द्वारा लगाई गई रोक के बावजूद सीएमएम/ई ने जानबूझकर आदेश का उल्लंघन कर अपनी मनमानी करते हुए 29 जून एवं 13 जुलाई को स्थानांतरण पत्र जारी करके तीन कर्मचारियों का स्थानांतरण गोरखपुर डिपो से गोंडा डीजल डिपो में किया है जो कि रेलवे बोर्ड के आदेश की खुली अवमानना है।

सीएमएम/ई/पूर्वोत्तर रेलवे ने आदेश सं. 20 को रेलवे बोर्ड के आदेश दि. 13.03.2020 का संज्ञान लिए बिना यूनियन के दबाव में निरस्त करते हुए ऐसे कर्मचारी का स्थानांतरण किया, जिसका भाई मानसिक विकलांग है और उक्त कर्मचारी ही उसका “केयर गिवर” है।

उल्लेखनीय है कि ऐसे कर्मचारियों का स्थानांतरण न किए जाने के संबंध में रेलवे बोर्ड द्वारा अलग से निर्देश जारी किया गया है। बोर्ड के उक्त निर्देश के साथ कर्मचारी ने जब सक्षम अधिकारी के समक्ष अपील दाखिल की तो उसकी इस अपील को भी रेलवे बोर्ड के आदेश का संज्ञान लिए बगैर निरस्त कर दिया गया।

कर्मचारियों का कहना है कि कोविड-19 महामारी के समय बोर्ड के दिशा-निर्देशों को दरकिनार करके स्थानांतरण करने वाले पूर्वोत्तर रेलवे के सीएमएम/ई ने कर्मचारी और राष्ट्र विरोधी कार्य किया है।

उनका यह भी आरोप है कि पहले आदेश के तहत स्थानांतरित किए गए दो कर्मचारियों को यूनियन ने मोटी राशि लेकर पिछली तारीख से पदाधिकारी बताकर उनको स्थानांतरण से बचाया, जबकि सीएमएम/ई ने जातिगत भेदभाव और पक्षपात तथा बोर्ड के आदेशों का उल्लंघन करते हुए “केयर गिवर कर्मचारी” तक का स्थानांतरण करने से गुरेज नहीं किया।

रेलवे बोर्ड और सक्षम जोनल अथॉरिटी द्वारा इस मामले का अविलंब संज्ञान लिया जाना चाहिए। 





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