रेल मंत्रालय खोद रहा स्थाई रोजगार की जड़ें, टाटा ग्रुप दे रहा रिटायरमेंट तक की गारंटी!

“अब तो रोबोट तमाम काम कर रहे हैं, उनमें जिस तरह की प्रोग्रामिंग सेट कर दी जाती है, वे वैसा ही काम करते हैं, तो क्यों न रेलवे के चेयरमैन/सीईओ, बोर्ड मेंबर्स सहित सभी महाप्रबंधकों और सभी प्रमुख मुख्य विभागाध्यक्षों के पदों पर प्री-प्रोग्रामिंग करके रोबोट बैठा दिए जाएं और इनके पदों को सरेंडर कर दिया जाए!”

रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड), भारत सरकार ने 20 मई 2021 को कैलेंडर वर्ष 2021-22 के लिए एक वर्क स्टडी प्रोग्राम के तहत पदों को सरेंडर करने का दिशा-निर्देश सभी जोनल रेलों के महाप्रबंधकों को जारी किया है।

इस आदेश के अनुसार रेलवे के ग्रुप ‘सी’ और ‘डी’ श्रेणी के रेल कर्मचारियों के 13,450 पद चालू वर्ष में सरेंडर (खत्म) किए जाएंगे और इनकी कीमत को इम्पलाईज बैंक में जमा करने के लिए कहा गया है।

इसके अलावा कोरोना महामारी के चलते भी हजारों की संख्या में रेलकर्मी अकाल काल कवलित हुए हैं। यदि इसके चलते भी सरकार द्वारा खाली हुए रेलवे के इन हजारों पदों को भी स्कैप करके इम्प्लाइज बैंक में जमा करने का निर्णय निकट भविष्य में ले लिया जाए, तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।

रेल मंत्रालय का निश्चित रूप से यह एक आत्मघाती और युवाओं को स्थाई रोजगार मुहैया कराने का विरोधी फैसला है। सरकारी नौकरशाही की इस सरेंडर नीति के पीछे जो मानसिकता है, वह उच्च स्तर के पदों के सृजन की है।

पहले जो एक ‌विभाग प्रमुख का पद हुआ करता था, उसे अब मुख्य विभाग प्रमुख कर दिया गया है और अब उसके नीचे तीन-तीन, चार-चार विभाग प्रमुख हो गए हैं। इंजीनियरिंग विभाग में तो आधा दर्जन से ज्यादा ऐसे पद सृजित हो गए हैं, क्योंकि सबको मलाई यहीं से मिलनी है। इसी तरह हर विभाग में मुख्यालय स्तर पर चार-पांच-छह तक की संख्या में विभाग प्रमुखों की भरमार हो गई है।

प्रत्येक मंडल में अब तीन-तीन अपर मंडल रेल प्रबंधक (एडीआरएम) के पद हो गए हैं और इनका काम देखें तो शून्य है। अब हर जोन में एक अपर महाप्रबंधक (एजीएम) का पद भी सृजित कर दिया गया है। जब महाप्रबंधक का पद है, तो फिर अपर महाप्रबंधक की क्या जरूरत है? इसका औचित्य (जस्टिफिकेशन) बताने अथवा देने को कोई तैयार नहीं है।

पूर्व मध्य रेलवे के गठन के पहले पूर्वोत्तर रेलवे में पांच मंडल हुआ करते थे, जो वर्ष 2002-03 में विभाजन के पश्चात अब तीन रह गए हैं। जब इसमें पांच मंडल थे, तब इसे एक जनरल मैनेजर (जीएम) संभाल लेता था और आज केवल तीन मंडल हैं, तो भी इसकी व्यवस्था संभल नहीं रही है।

यही हाल उन बाकी सभी छोटी जोनल रेलों का भी है, जिनका गठन 2002-03 में हुआ था और जिन्हें राजनीतिक उद्देश्य से कमोबेश राज्यों के स्तर तक सीमित कर दिया गया था। सब में एक-एक एजीएम बैठाया गया है, तब भी परिणाम जस का तस ही है।

रेलवे के जिन 13,450 पदों को सरेंडर करने का आदेश रेलवे बोर्ड ने दिया है, वह इस देश के युवाओं के स्थाई और सम्मानित रोजगार की खुली लूट है।

ऐसा नहीं है कि काम की कमी के चलते इन पदों को सरेंडर किया जा रहा है। इसके पीछे का उद्देश्य आउटसोर्सिंग एजेंसियों को लाभ पहुंचाना है, क्योंकि ग्रुप ‘डी’ के कर्मचारी जो काम करते हैं, उसके लिए तो हाथों की जरूरत पड़ेगी ही, लेकिन जिस काम को करने के लिए एक स्थाई रेलकर्मी माहवार 35 हजार से 50 हजार तक मजदूरी पाता है, उसी काम को आउटसोर्सिंग एजेंसी एक कर्मचारी से 10-15 हजार में कराएगी।

ऐसे संविदा कर्मियों को न पीएफ देने का झंझट होगा, न ही रोजगार सुरक्षा की कोई गारंटी होगी और न ही ईएसआईएस की कोई सुविधा देने का सरदर्द होगा, जब चाहे तब उसे कान पकड़कर निकाल बाहर करने की मनमानी छूट होगी, वह अलग!

यह इस देश के पढ़े-लिखे युवाओं का खुला शोषण है। श्रम पैसा है, और पैसे की यह बड़ी तथा खुली लूट हो रही है!

ऐसे मुद्दों पर सिविल सोसायटी की चुप्पी बहुत हैरान करने वाली है कि चौबीस घंटे हिन्दू-मुस्लिम पर बहस करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी अपने बच्चों के भविष्य को बरबाद होते देखकर भी सरकार की इन रोजगार विरोधी नीतियों पर मूकदर्शक क्यों बने हुए हैं? स्थाई रोजगार नहीं होने का दंश आज कोविड की महामारी में यह देश भुगत रहा है।

किसी भी देश को अस्थाई और संविदा पर काम करने वाले कर्मियों से कदापि संचालित नहीं किया जा सकता है। यह सब कोविड जैसी महामारी और आए दिन आ रहे तटवर्ती समुद्री तूफानों के चलते देखने को मिला है तथा लगातार अनुभव में भी आ रहा है।

रेलवे बोर्ड ने अपनी सरेंडर पालिसी के बचाव में तर्क दिया है कि “आज के दौर में तकनीक के विकास से कम लोगों के जरिए काम का लक्ष्य (वर्क टारगेट) हासिल कर लिया जा रहा है, इसलिए इन पदों को सरेंडर करने से रेलवे के काम पर कोई असर नहीं पड़ेगा।”

इस संबंध में मेरा यह मानना है कि “अब तो रोबोट तमाम काम कर रहे हैं, उनमें जिस तरह की प्रोग्रामिंग सेट कर दी जाएगी, वे वैसा ही काम करेंगे, तो क्यों न रेलवे के चेयरमैन सीईओ, बोर्ड मेंबर्स सहित सभी महाप्रबंधकों और सभी प्रमुख मुख्य विभागाध्यक्षों के पदों पर प्री-प्रोग्रामिंग करके रोबोट बैठा दिए जाएं और इनके पदों को सरेंडर कर दिया जाए, कम खर्च में बहुत सारा, बल्कि बहुत ज्यादा काम का लक्ष्य हासिल हो जाएगा। इस प्रकार बेईमानी और कमीशनखोरी की भी कोई आशंका नहीं रह जाएगी।”

परंतु रेलवे की स्थिति यह है कि जो महाप्रबंधक जितने ज्यादा पद सरेंडर करेगा, वह उतना ही काबिल माना जाएगा और जो अध्यक्ष रेलवे को जितनी जल्दी बेच देगा, वह नीति आयोग में भेज दिया जाएगा। हुक्म के गुलामों की यह स्थिति पूरी व्यवस्था को चौपट करने पर उतारू है।

इसलिए अब समय आ गया है कि देश का हर नौजवान अपने स्थाई रोजगार की इस चोरी को रोकने के लिए लामबंद होकर अविलंब उठ खड़ा हो, तभी स्थाई रोजगार को और इस देश की बरबाद होती व्यवस्था को बचाया जा सकता है।

लेखक रेलवे में कार्यरत एक वरिष्ठ अधिकारी हैं!

प्रस्तुति: सुरेश त्रिपाठी

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चिनॉय सेठ, “जब खुद का घर शीशे का हो, तो दूसरों के घरों में पत्थर नहीं फेंका करते!”

सरकार के खर्चों और सरकारी विभागों में हो रहे भ्रष्टाचार पर सरकार का कोई अंकुश नहीं

सुरेश त्रिपाठी

रेलमंत्री पीयूष गोयल द्वारा रेल अधिकारियों-कर्मचारियों को मिल रही सुविधाओं की समीक्षा करने और री-एंगेज्ड कठपुतली चेयरमैन, रेलवे बोर्ड यानि “वीकेन यादव” द्वारा राममंदिर के शिलान्यास के दिन 5 अगस्त को रेल अधिकारियों के बंगला प्यून हटाने के बारे में दिए गए बचकाने संदेश/आदेश के बाद पूरी रेलवे वर्कफोर्स में नीचे से ऊपर तक बहुत कड़ी और जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई है। रेलमंत्री और सीआरबी के तमाम बचकाने निर्णयों को अब तक जैसे-तैसे झेल रहे रेलकर्मी-अधिकारी उनके इस एक निर्णय से अचानक हड़बड़ाकर उठ खड़े हुए हैं, क्योंकि यह निर्णय उनके परिवारों की सुरक्षा और उनकी गरिमा तथा स्वाभिमान को प्रभावित करने वाला है।

रेलमंत्री और सीआरबी के इस कुटिल एवं अनैतिक निर्णय के खिलाफ जहां सभी जोनल अधिकारी संगठनों द्वारा न सिर्फ उन्हें पूरे जस्टिफिकेशन के साथ ज्ञापन भेजे जा रहे हैं, बल्कि उन्होंने यह सुविधा जूनियर/सीनियर स्केल पर भी लागू करने की पुरजोर वकालत की है।

कार्मिक सुविधाओं में कटौती, भ्रष्टाचार पर कोई लगाम नहीं

एक तरफ जहां सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के डीए/आरए में पहले ही डेढ़ साल तक की पाबंदी लगा दी है, वहीं अब उनके वेतन और पेंशन पर भी 20% की कटौती किए जाने का ऐलान किया जा रहा है। इसके साथ ही मितव्ययिता और लागत खर्च में कटौती के नाम पर अन्य कई भत्तों में कटौती की घोषणा की जा चुकी है। जबकि सरकार के खर्चों और सरकारी विभागों में हो रहे भ्रष्टाचार पर सरकार का कोई अंकुश नहीं लग पा रहा है।

इसके अलावा अब रेल अधिकारियों और कर्मचारियों की तैयारी यह भी दिख रही है कि यदि रेलमंत्री नहीं मानते हैं और अपनी मनमानी करने पर अड़े रहते हैं, तो रेल मंत्रालय में उनके द्वारा लगाई गई उनकी वैयक्तिक फौज के कारनामों को भी उजागर करने का उन्होंने मन बना लिया गया है।

ऐसा लगता है कि मंत्री की इस निजी फौज द्वारा किए जा रहे घोर अपमान और मनमानी से अब ये सभी रेल अधिकारी बुरी तरह तंग आ चुके हैं। इसीलिए शायद वे ऐसे ही किसी मौके की तलाश में थे कि कब वे मंत्री और उनके निजी सहायकों की करतूतों का पर्दाफाश कर सकें।

“करो या मरो” की स्थिति ला खड़ी की रेलमंत्री ने!

क्रिया की प्रतिक्रिया होना प्राकृतिक सिद्धांत है। यह हमारा वैदिक साहित्य बहुत पहले से कहता आ रहा है और जिसे बाद में प्रतिपादित करके सर न्यूटन विज्ञान में अमर हो गए। और यह भी हर निकृष्ट से निकृष्ट और निकम्मे से भी निकम्मे आदमी, यहां तक कि कबीरदास कह गए हैं कि “मरी खाल की स्वांस सों, लौह भसम होई जाए” का जांचा-परखा सत्य है कि आदमी तब तक प्रतिक्रिया नहीं करता जब तक कि उसकी गरिमा और सम्मान को चोट नहीं लगती। और ये भी कि आदमी अपने तक तो बर्दाश्त करता है, पर जब बात उसके परिवार की सुरक्षा और इज्जत की आ जाती है, तब वह इसके विरुद्ध अपनी पूरी ताकत से प्रतिकार करने के लिए उठ खड़ा होता है। पिछले पांच-छह सालों से हर दिन अनाचार, अत्याचार, उत्पीड़न झेल रहे और अपमानित हो रहे रेल अधिकारियों और कर्मचारियों के सामने रेलमंत्री और सीआरबी ने अब “करो या मरो” की यही स्थिति लाकर खड़ी कर दी है।

रेलमंत्री ने “कमर के नीचे वार” किया

एक पूर्व मंत्री के साथ काफी समय तक काम कर चुके एक वरिष्ठ रेल अधिकारी ने रेलवे के वर्तमान निजाम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि एक समय था जब इन्हीं रेलकर्मियों-अधिकारियों की बदौलत रेलवे ने हर फील्ड में बड़े-बड़े कीर्तिमान स्थापित किए थे, क्योंकि इन्हें सक्षम नेतृत्व मिला था। उनका कहना है कि वर्तमान रेलमंत्री और उनके सलाहकार अब तक रेलवे में जो भी ऊटपटांग उठापटक कर रहे थे, उसका सीधा प्रभाव किसी व्यक्ति विशेष या रेल कर्मचारियों-अधिकारियों के परिवारों पर नहीं पड़ रहा था। पहली बार रेलमंत्री ने एक ऐसा बचकाना और द्वेषपूर्ण निर्णय लिया है, जो सीधे अधिकारियों और उनके परिवारों को हिट कर रहा है, इसे ही अंग्रेजी में “below the belt hit” (कमर के नीचे वार) करना कहा जाता है।

जरूरी था विभिन्न स्तर पर स्टेक होल्डर्स से विचार-विमर्श

उनका स्पष्ट मत है कि अवल्ल तो मंत्री को ऐसा करना ही नहीं चाहिए। अगर इनको कुछ करना ही था तो इस तरह के मामले में जल्दबाजी नहीं करते और सभी जोनों के अधिकारी संगठनों, हर आयु वर्ग के अधिकारियों तथा उनके विभिन्न ट्रेनिंग इंस्टिट्यूटस से भी विचार-विमर्श कर लेते, क्योंकि हम लोगों के समय भी और प्रायः सभी रेलमंत्रियों के समय टीएडीके और सैलून का मुद्दा कुछेक कारणों से जब तब आता रहा है, लेकिन हम लोगों ने यह देखा कि रेल अधिकारियों के काम की प्रकृति के हिसाब से यह व्यस्था जरूरी भी है और होनहार युवाओं को रेलवे को जॉइन करने का  सबसे बड़ा आकर्षण/इंसेंटिव भी।

वह आगे कहते हैं कि ऐसे में कोई भी परिपक्व मंत्री अपने मंत्रालय के अधिकारियों और कर्मचारियों की उपलब्ध सुविधाओं में अगर कोई इजाफा नहीं करता है, तो उनमें छेड़छाड़ भी नहीं करता और खासकर जो निर्णय सीधे व्यक्तिगत स्तर पर और परिवारों को प्रभावित करता हो, उसे तो मंत्री कतई नहीं छूता है।

नेतृत्व की अक्षमता और सैडिस्टिक मानसिकता में इंसानियत का अभाव

एनडीए सरकार के कार्यकाल में ही रहे एक अन्य रेलमंत्री के साथ जुड़े एक और वरिष्ठ रेल अधिकारी का यह स्पष्ट मानना था कि रेलवे के अधिकारियों और कर्मचारियों जैसी टारगेट ओरियंटेड वर्कफोर्स शायद ही किसी अन्य विभाग मंत्रालय में होगी। उन्होंने कहा कि यह भी सही है कि वस्तुत: लीडरशिप जैसी होगी, ऑर्गनाइजेशन अपना रिजल्ट भी वैसा ही देगा। आज रेलवे की जो दुर्व्यवस्था है उसका सीधा कारण सिर्फ और सिर्फ नेतृत्व की अक्षमता ही है।

कोई निर्णय कैसे अपने घोर समर्थकों को भी विरोधी बना सकता है, इसकी बानगी तब देखने को मिली, जब इलेक्ट्रिकल के ही एक वरिष्ठ अधिकारी इसके लिए सीआरबी पर ही फटते नजर आए। उनका कहना था कि कम से कम रेलवे में काम किए सीआरबी “वीकेन यादव” जैसे एक अधिकारी से ऐसी अपेक्षा नहीं थी। उन्होंने कहा कि यदि वीकेन यादव के मन में टीएडीके के मामले को लेकर कुछ चल रहा है, या मंत्री ने इस पर कुछ करने को उनसे कहा था, तब भी कोरोना जैसी संक्रामक महामारी के समय में उन्हें इतनी तो इंसानियत जरूर दिखानी चाहिए थी कि अधिकारियों को एक माह का एडवांस नोटिस दे देते कि “फिलहाल इसे 1 सितंबर या 1 अक्टूबर से रोका जाएगा, जब तक इस पर आगे कोई निर्णय न हो जाए।”

उनका कहना था कि तब कम से कम जिन अधिकारियों ने अपना टीएडीके सरेंडर कर दिया है और जिनके टीएडीके की बहाली की प्रक्रिया चल रही है, उन्हें यह मिल जाता (ध्यान रहे कि पूरी भारतीय रेल में ऐसे बहुत ज्यादा मामले नहीं होंगे) तथा कोरोना काल में उनका परिवार इस तरह की असहाय स्थिति में अपने को नहीं पाता। इसके अलावा जिनके टीएडीके का समय पूरा हो गया है और जो सरेंडरिंग की प्रक्रिया शुरू करने वाले थे, वे भी तब तक रुक जाते, जब तक इस पर कोई सर्वसम्मत निर्णय नहीं हो जाता।

उनका कहना था कि “लेकिन यहां तो सैडिस्टिक तरीके से यह धमकी दे दी गई कि 1 जुलाई से भी जिसकी बहाली हो गई है, उसका भी रिव्यू होगा।” उन्होंने कहा कि अपनी समर्पित वर्कफोर्स अथवा अपने सहयोगियों के साथ इससे बड़ा भद्दा मजाक और ज्यादाती क्या हो सकती है? वह भी तब, जब खुद पूरे सेवाकाल में उन्होंने इस सुविधा का भरपूर इस्तेमाल किया और अब भी कर रहे हैं!

कई अधिकारियों और कर्मचारियों का यह भी कहना है कि रेलमंत्री अपने किसी भावी लाभ को ध्यान में रखकर अपना एजेंडा पूरा करने और रेलवे को बदनाम करने के लिए पहले बहुत ही गंदे और ओछे तरीके से तोहमत लगाते हैं, और फिर जबरदस्ती उसके पीछे पड़ जाते हैं। ऐसा ओछापन आज तक शायद ही किसी रेलमंत्री ने दिखाया होगा।

पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़े वंचितों के बारे में भी सोचना होगा

उनका कहना है कि, “रेलमंत्री को पहले यह तो पता कर लेना चाहिए कि भले ही उनका कोई भी पूर्वाग्रह हो, लेकिन यह बहुत बड़ा सत्य है कि बंगला प्यून या टीएडीके के माध्यम से अधिकांश उन वंचित और आर्थिक, सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को एकमात्र सरकारी रोजगार का अवसर मिल पाता है, जो तबका सिर्फ और सिर्फ मेहनत के बूते पर ही जिंदा रहता है। जो सामाजिक तौर पर न तो किसी प्रतियोगी परीक्षा की दौड़ में आने वाले खर्च को वहन करने में सक्षम होता है और न ही मेहनत के अलावा उसका कोई मेरिट और जुगाड़ ही होता है। समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े ये लोग किसी भी पारंपरिक चयन प्रक्रिया के माध्यम से कोई भी सरकारी नौकरी कभी पा ही नहीं सकते।”

चाबुक और हिकारत से हांकने पर काम नहीं होता

उनका स्पष्ट मानना है कि “कायदे से यह सुविधा जूनियर और सीनियर स्केल अधिकारियों को भी मिलनी चाहिए, क्योंकि हर बेहतरीन ऑर्गनाइजेशन अपने कर्मचारियों को दिए गए इंसेंटिव से ही परखा और पहचाना जाता है। उसी से किसी कंपनी की आउटपुट निर्धारित होती है और कर्मचारी जब पूरी तरह से अपने मालिक में गार्जियन का भाव देखते हैं, तो अपना बेहतर देते हैं। टाटा ग्रुप इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। लेकिन जिस कंपनी  का मालिक चाबुक से और हिकारत से देखते हुए अपने कर्मचारियों अथवा मातहतों को हांकने की कोशिश करता है, वह जल्दी ही अपने पुरखों के द्वारा खड़ी की गई सम्पति का नाश कर देता है। वर्तमान रेलमंत्री शायद यही कर रहे हैं।”

यहां रेल मंत्रालय (रेल भवन) के गलियारों में चल रहे कई किस्सों में से एक मजेदार किस्सा एक अधिकारी ने शेयर किया –

“एक अन्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मजाक में एक सीरियस बात अपने साथ रुड़की में पढ़े एक रिटायर्ड बोर्ड मेंबर से एक बार कहा कि गनीमत है कि ये रेलमंत्री ही हैं, अगर ये रक्षामंत्री बन जाते, तो सबसे पहले सेना को खत्म कर देते और कहते चीनी आउटसोर्स एजेंसी से इनसे सस्ते में आदमी और हथियार दोनों डिप्लॉय हो जाएंगे। बाद में वह इसके फायदे भी गिना देंगे कि पहले तो कोई हिंदुस्तानी अब बॉर्डर पर मरेगा नहीं और दूसरे जहां एक मिलिट्री डिवीजन को मेनटेन करने पर 100 रुपए खर्च होते थे, वहां अब चाइनीज और चीनी एजेंसियां 30 रुपए में ही यह काम करेंगी। या फिर वे संभवतः यह भी बता देते कि “चीन अब इस आउटसोर्स के बदले उल्टे सरकार को भी 1000 रुपए हर महीने देने का ऑफर कर रहा है और इसी लागत विष्लेषण (कॉस्ट एनालिसिस) के आधार पर चीनी, पाकिस्तानी एजेंसियों और हिजबुल आदि को भी लेह, लद्दाख, कश्मीर, पंजाब, राजस्थान आदि बॉर्डर पर देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने का काम मिल जाएगा।” (बहुत से लोग तब तक इस नूतन प्रयोग की वाहवाही भी करेंगे, जब तक कि देश पर साक्षात चीन या पाकिस्तान का कब्जा न हो जाए।)

सुरक्षा के साथ खिलवाड़ साबित होगी कोई भी नई व्यवस्था

अब तक का यह अनुभव रहा है कि बीपी/टीएडीके माध्यम से आने वाले लोग कैटेगिरी चेंज होने पर जिस जिस विभाग में काम करते हैं, वे सबसे ज्यादा बेहतर, अनुशासित और कर्मठ मानव संसाधन सिद्ध हुए हैं। किसी और माध्यम से यह व्यवस्था थोपने पर यह न सिर्फ घातक सिद्ध हो सकती है, बल्कि अधिकारियों और उनके परिवारों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ भी होगा।

इसके कई उदाहरण मौजूद हैं। 2004 में इटारसी डीजल लोको शेड में तैनात रहे एक सीनियर डीएमई की घर में अकेली पत्नी की हत्या बंगला प्यून ने ही की थी। इसी प्रकार दक्षिण मध्य रेलवे की लालागुड़ा वर्कशॉप में पदस्थ रहे एक अधिकारी का परिवार बंगला प्यून की क्रूरता के चलते ही अकारण मौत के मुंह में समाकर बरबाद हो गया था।

इसी तरह जब तक रेलवे में रेल से जुड़े लोगों की बहाली होती रही अथवा ट्रेड अप्रेंटिस के माध्यम से स्किल्ड मानव संसाधन लाया जाता रहा, तब तक रेलवे का काम सुचारु रूप से चलता रहा। परंतु जब से यस व्यवस्था खत्म करके राजनीतिज्ञों के फायदे के लिए आरआरबी/आरआरसी जैसी भ्रष्टतम व्यवस्था के माध्यम से कथित पढ़े-लिखे लोगों को लाया जाने लगा, तब से उनसे काम लेना रेल अधिकारियों के लिए न सिर्फ एक बड़ा सिरदर्द साबित हुआ है, बल्कि रेलवे सहित रेलयात्रियों की भी संरक्षा और सुरक्षा हर स्तर पर प्रभावित हुई है।

जब वर्तमान व्यवस्था में, जहां सब कुछ जांच-परखकर किया जाता है, वहां जब अधिकारी और उनका परिवार सुरक्षित नहीं है, तब आरआरसी/आरआरबी जैसी महाभ्रष्ट व्यवस्था से आने वाले किसी अनजान, अज्ञात आदमी को रखे जाने पर क्या स्थिति हो सकती है, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

पहले आरआरसी से भर्ती लोगों से काम तो करवा लें रेलमंत्री

अधिकारियों का कहना है कि कुछेक विभागों, जिनमें सरप्लस मैनपावर है, उनके कुछ अधिकारियों को छोड़ कर बाकि सभी अधिकारियों की दिनचर्या सिर्फ एकमात्र टीएडीके के ऊपर ही निर्भर होती है। उनका कहना है कि रेलमंत्री पहले तो आरआरसी आदि से ट्रैकमैन, हेल्पर खलासी आदि के लिए बहाल हुए लोगों से ही व्यवस्थित काम करावा लें, वही बहुत होगा। इसके बाद ही आरआरसी, कांट्रेक्ट और आउटसोर्सिंग एजेंसियों से टीएडीके लगाने पर विचार करें! धीरे से उनका यह भी कहना है कि मंत्री जी शायद इसमें भी किसी पार्टी कार्यकर्ता या अपने सहयोगी को घुसाने की सुविचारित दीर्घावधि योजना की संभावना तलाश रहे हैं। जैसा कि उन्होंने ईएनएचएम आदि जैसी भ्रष्टाचार पैदा करने वाली कई अन्य नई योजनाओं को लागू करके किया है।

रेल परिवार के सामने “विलेन” बन गए मंत्री और सीआरबी

उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस एक निर्णय ने एक ही झटके में रेलमंत्री और सीआरबी “वीकेन यादव” को हर रेल अधिकारी के घर में “विलेन” के रूप में खड़ा कर दिया है। अब तक तो वे उन्हें वर्षों से स्थापित और सुचारू रूप से चल रही रेल व्यवस्था को सिर्फ तोड़ते-फोड़ते और बरबाद करते हुए ही देख रहे थे। उनको यह अंदाजा नहीं था कि रेलमंत्री और सीआरबी उनके घरों में घुसने की इस निम्नता अथवा अनैतिकता तक भी उतर सकते हैं!

जिनके घर शीशे के होते हैं, वह दूसरों के घरों में पत्थर नहीं फेंकते!

रेलवे बोर्ड के कई अति वरिष्ठ उच्च अधिकारी और हाल ही में बोर्ड से रिटायर हुए मेंबर्स, जिन्होंने काफी नजदीक से वर्तमान रेलमंत्री को देखा है और उनकी कार्यशैली को भली-भांति जानते हैं, का मानना है कि शायद इस घटना के कारण रेलमंत्री को ये सीख मिल जाए कि, “जिनके खुद के घर शीशे के होते हैं, उन्हें दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए।”

उनका कहना है कि, “क्योंकि यह मनुष्य की प्रकृति है कि वह तब तक सिर झुकाकर सब कुछ बर्दास्त करता है, जब तक वह देखता है कि उसका असर उसके परिवार, उसकी गरिमा या स्वाभिमान पर नहीं पड़ रहा, लेकिन जब इस सब पर असर पड़ने लगता है, तब छोटा से छोटा तथा कमजोर से कमजोर आदमी भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूरी ताकत से उसका प्रतिकार करता ही है।”

किसके लिए काम करती है मंत्री के साथ लगी फौज?

कई रेल अधिकारियों का कहना है कि अधिकांश रेल कर्मचारी और अधिकारी जो भी काम करते हैं, वह तो रेल के लिए और देश के लिए करते हैं। लेकिन रेलमंत्री तो सिर्फ अपने परिवार (कार्यकर्ताओं) के लिए ही काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि “भारत सरकार में ये पहले कॉर्पोरेट स्टाइल में काम करने वाले मंत्री हैं, जो सिर्फ रेल मंत्रालय में ही अपने 70 आदमियों की एक बड़ी फौज अपने साथ रखे हुए हैं, बाकी दो मंत्रालय और भी हैं उनके पास। हालांकि यह बात अलग है कि ये बहुत कुछ करते हुए दिखाई देते हैं, जिसमें रेलवे की स्थापित कार्यशैली और रेलकर्मियों एवं अधिकारियों को मिली सुविधाओं से सौतिया डाह के चलते उन्हें बदनाम करने की मात्रा ही ज्यादा रही है, पर जमीनी स्तर पर इनसे आज तक कुछ किया नहीं जा सका है।”

वह आगे कहते हैं कि, “स्पष्टतः रेलमंत्री के साथ लगी निजी लोगों की यह बड़ी फौज उनकी व्यक्तिगत पसंद के, व्यक्तिगत कारणों से और व्यक्तिगत तथा पारिवारिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही तो है। यह फौज रेल के लिए तो कतई काम नहीं कर रही और न ही देश के लिए कर रही है, तो आखिर अपनी इस फौज को किस महान कार्य पर लगा रखा है रेलमंत्री ने?” यह उनका सीधा सवाल है।

उनका कहना है कि अगर मंत्री के ही तर्कों का सहारा लिया जाए, तो रेलवे के 14 लाख लोगों में से रेलवे और देश के काम के लिए बड़ी आसानी से उपयुक्त और उपयोगी आदमी ढूंढे जा सकते हैं, इस सच्चाई के अलावा कि मंत्री आधिकारिक तौर पर अपनी पसंद से 5/6 लोगों को रख सकते हैं।

फेल होने की राह पर अग्रसर रेलमंत्री

यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि मंत्रियों और सांसदों में तब इस बात को लेकर कितनी नाराजगी थी, जब वैयक्तिक सहायक के रूप में प्रधानमंत्री ने कुछ मानक निर्धारित कर दिए थे और संघ से जुड़े लोगों को वरीयता दी जाने लगी थी। लेकिन फिर भी बाकी कौन होंगे, क्यों होंगे, कैसे होंगे, तब तुम घर पर उससे काम करवा सकोगे या साथ रखोगे, इसे प्रधानमंत्री ने रेलमंत्री के जैसी सैडिस्टिक मानसिकता से निर्देशित नहीं करवाया, क्योंकि यदि वे ऐसा करते तो शायद अब तक पार्टी में भयंकर विद्रोह हो गया होता और पार्टी खत्म होने के कगार पर कब की पहुंच गई होती। अधिकारियों का स्पष्ट मानना है कि अपने ऐसे ही सहायकों की वजह से इनके पहले वाले मंत्री फेल हुए थे और अब यह भी इसी वजह से उसी राह पर अग्रसर हैं।

आने वाले समय में सबसे कमजोर नब्ज साबित होगा रेल मंत्रालय

कई अधिकारियों और कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों का कहना है कि अभी तक तो दूसरे मंत्रालय के भ्रष्टचार की चर्चाएं होती थीं, लेकिन अब अगर कोई दूसरी सरकार आएगी, तो इस सरकार की सबसे कमजोर नब्ज रेल मंत्रालय ही होगा, क्योंकि जिस तुगलकी तरीके से इसको तहस-नहस किया जा रहा है, और जिस मनमाने तरीके से रेलवे को और इसकी गतिविधियों तथा संसाधनों को तोड़-मरोड़कर बेचा जा रहा है, वह स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा सुनियोजित घोटाला है, जिसकी सीधी मार इस देश की आम जनता पर पड़ेगी और फिर क्रमिक जांचों की शुरुआत रेल मंत्रालय से ही होगी।

कुछ अधिकारियों का यह भी कहना था कि इस सरकार को इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि तमाम दुश्वारियों के बावजूद भी अधिकांश लोग राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री मोदी के साथ खड़े हैं, लेकिन इस तरह के निर्णय से ये लोग बाध्य किए जा रहे हैं कि वे इस सरकार के विरुद्ध सिर्फ कुछ बोलें ही नहीं, बल्कि कुछ पुख्ता करें भी। और यही अथवा ऐसी ही कुछ अन्य साजिशें रेल मंत्रालय चला रहे लोगों द्वारा सरकार के खिलाफ की जा रही हैं। 

अंततः इस बात का ख्याल रेलमंत्री और सीआरबी को होना ही चाहिए कि “सब दिन होत न एक सामना!”

क्रमशः पढ़ें – “एक छत के नीचे कैसे चल रही है आरपीएफ में दोहरी व्यवस्था!”





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