जारी है उत्तर रेलवे निर्माण संगठन में बिड कैपेसिटी घोटाला

“आखिर कब तक चलेगा यह पिक एंड चूज का खेल? यह सब ऊपर बैठे बड़े लोगों (अधिकारियों) का खेल है, जो न केवल कर्मचारियों को, बल्कि ठेकेदारों को भी बेवकूफ बनाते हैं और अपनी जेबें भरते हैं।”

उत्तर रेलवे निर्माण संगठन में बिड कैपेसिटी का घोटाला आज भी लगातार चल रहा है। परंतु इस पर लगाम लगाने वाला कोई नहीं है, क्योंकि उत्तर रेलवे का जोनल विजिलेंस और रेलवे बोर्ड का सार्वभौमिक विजिलेंस दोनों गहरी नींद में सुला दिए गए हैं। फिर सीवीसी से ही क्या उम्मीद की जा सकती है।

पूर्व सीएओ/कंस्ट्रक्शन, उत्तर रेलवे बी. डी. गर्ग के समय में अथवा उनके द्वारा शुरू किया गया बिड कैपेसिटी का यह घोटाला आज भी उत्तर रेलवे में लगातार जारी है। अब तो उत्तर रेलवे निर्माण संगठन के अधिकारियों द्वारा इस घोटाले को यहां एक परंपरा के रूप में स्थापित कर दिया गया है।

सबको पता है कि 6 माह में काम नहीं हो सकता, फिर क्यों शॉर्ट टर्म टेंडर किया जा रहा है? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए उत्तर रेलवे निर्माण संगठन का कोई अधिकारी तैयार नहीं है।

सीपीआरओ को भी लगता है कि केवल दिल्ली के कुछ चुनिंदा पत्रकारों के ही फोन उठाने का निर्देश दिया गया है?

उल्लेखनीय है कि इसी तरह रोहतक-मेहम-हांसी नई रेल लाइन के निर्माण में हुए भारी भ्रष्टाचार और उसके विरुद्ध की गई ढ़ेरों लिखित शिकायतों के चलते मार्शल इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड का कांट्रैक्ट टर्मिनेट कर दिया गया था। तथापि दोषी अधिकारियों के विरुद्ध आजतक कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

अब इसी रोहतक-मेहम-हांसी लाइन की हांसी-तोशम रोड (स्टेट हाइवे-12) की क्रासिंग किमी. 68-110 पर रोड ओवर ब्रिज (आरओबी) का निर्माण करने का टेंडर सीएओ/सी/उ.रे. द्वारा जारी किया गया है।

जानकारों का कहना है कि यह टेंडर जारी करने से पहले कार्य की उचित समीक्षा भी नहीं की गई है।

इस टेंडर की विज्ञापित वैल्यू ₹2285068.10 है। इस टेंडर में भी उक्त आरओबी का निर्माण पूरा करने की अवधि छह महीने ही रखी गई है, जबकि यह निश्चित है कि छह महीनों में यह तो क्या, कोई भी ब्रिज (आरओबी) बनकर तैयार नहीं हो सकता। जबकि इसके साथ अन्य कई कार्य भी किए जाने हैं।

आखिर कब तक चलेगा यह पिक एंड चूज का खेल? यह कहना है उत्तर रेलवे निर्माण संगठन में कार्यरत कुछ फील्ड सुपरवाइजरों का। उनका कहना है कि “यह सब ऊपर बैठे बड़े लोगों (अधिकारियों) का खेल है, जो न केवल कर्मचारियों को, बल्कि ठेकेदारों को भी बेवकूफ बनाते हैं और अपनी जेबें भरते हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि “जो कोई इनसे फाइट करता है, उसे ये सब मिलकर बरबाद कर देते हैं।” वह कहते हैं कि वी. के. गुप्ता और बी. डी. गर्ग पर चूंकि कोई कार्रवाई नहीं हुई, इसलिए उनके द्वारा सेट किया गया भ्रष्टाचार का सिस्टम अब यहां परंपरा बन चुका है।

कर्मचारी और कांट्रैक्टर कहते हैं –

ऊपर तक मिले हैं कंस्ट्रक्शन अधिकारी!

जिन पर रिश्वतखोरी ने की हुई है सवारी!!

विशेष: टेंडर्स में “एडवरटाइज्ड वैल्यू” का कोई अर्थ नहीं निकलता। इन छद्म शब्दों का कोई औचित्य भी प्रमाणित नहीं होता। अतः इसे पहले की ही भांति “एस्टीमेटेड कास्ट” यानि “अनुमानित लागत” लिखा जाए और यह आंकड़ा, अंकों के साथ-साथ अक्षरों/शब्दों में भी लिखी जानी चाहिए!

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कोटा मंडल, पश्चिम मध्य रेलवे में लगातार जारी हैं गंभीर अनियमितताएं

बोर्ड की रोक के बावजूद किया जा रहा है नए पदों का सृजन

सुरेश त्रिपाठी

रेलमंत्री पीयूष गोयल के निर्देश पर रेलवे बोर्ड द्वारा सभी जोनल रेलों और उत्पादन इकाईयों को लागत खर्चों में कटौती करने संबंधी कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके बावजूद कुछ जोनों/मंडलों द्वारा बोर्ड के इन निर्देशों को तनिक भी तवज्जो नहीं दी जा रही है। इनमें से पश्चिम मध्य रेलवे का कोटा मंडल भी शामिल है। कार्मिक शाखा, कोटा मंडल द्वारा 10 जून 2020 को पत्र सं. ईसी/1025/34/1, भाग-4 तथा समसंख्यक पत्र दि. 15.07.2020 जारी करके वाणिज्य निरीक्षकों के 4 रिक्त पदों के स्थान पर 6 अतिरिक्त यानि 6 नए पदों के सृजन के साथ कुल 10 वाणिज्य निरीक्षकों का चमन किया जा रहा है। इसकी परीक्षा गुरुवार, 6 अगस्त को मंडल प्रबंधक कार्यालय, कोटा में रखी गई है।

उल्लेखनीय है कि रेलवे बोर्ड द्वारा 2 जुलाई को नए पद सृजन के संबंध में पत्र सं. ई(एमपीपी)/2018/1/1 (आरबीई 48/2020) जारी करके लागत खर्च में कमी करने के लिए संरक्षा को छोड़कर अगले आदेश तक कोई भी नया पद सृजित नहीं करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा वर्तमान पदों में 50% की कटौती करने के साथ ही उन पदों, जो पिछले दो वर्षों में सृजित किए गए हैं और उन पर अब तक भर्ती नहीं की गई है, को सरेंडर करने को भी कहा है।

रेलवे बोर्ड ने उपरोक्त संबंधी आदेश 19 जून 2020 को भी अपने पत्र सं. 2015/बी/235 में जारी किया था।

इस पत्र के पैरा-III (ए) के अनुसार आउटसोर्सिंग गतिविधियों, विशेष रूप से ओबीएचएस, लिनन प्रबंधन, स्टेशन क्लीनिंग, लिफ्ट/एस्केलेटर्स मैनिंग और स्टेशन एनाउंसमेंट इत्यादि की समीक्षा गंभीरता से करने का निर्देश देते हुए इन सब गतिविधियों पर हो रहे अमापक खर्च पर कड़ाई से अंकुश लगाने को कहा था।

रेलवे बोर्ड के उपरोक्त निर्देशों के उल्लंघन के अलावा कोटा मंडल की वाणिज्य शाखा में कुछ अन्य गंभीर अनियमितताएं भी उजागर हुई हैं, जिसमें रेलवे बोर्ड के जिन नीति निर्देशों को दरकिनार किया गया है, वह इस प्रकार हैं-

कोटा मंडल द्वारा विभिन्न स्टेशनों पर कैडर में स्वीकृत ग्रुप ‘डी’ सफाई कर्मचारियों के पदों को सरेंडर कर 6 वाणिज्य निरीक्षकों के पदों का सृजन किया गया, जिसका मुख्य कारण पूरे मंडल में स्टेशनों को क्लब करते हुए जोन बनाकर सभी स्टेशनों पर सफाई का कार्य ठेके पर कराने की योजना थी।

कार्मिक कार्यालय के पत्र सं ईसी/1025/34/1 भाग-iv, दि. 10.06.2020 के अंतर्गत 10 वाणिज्य निरीक्षकों (08 अनारक्षित, 01 एससी, 01 एसटी) के पदों की रिक्तियों (लेवल-6 पे-बैंड 9300-34800 + 4200) को भरने हेतु आवेदन मंगाए गए। अब इन पदों पर रिक्तियों को भरे जाने हेतु होने वाली लिखित परीक्षा दि. 06.08.2020, पत्र सं. ईसी/1025/34/1 भाग-४, दि. 15.07.2020 जारी की गयी है।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि रेलवे बोर्ड का पत्र सं. 2015-बी-235 दि. 19.06.2020 के पैरा-III (ए) के अनुसार “आउटसोर्सिंग गतिविधियों – विशेष रूप से ओबीएचएस, लिनन प्रबंधन, स्टेशन क्लीनिंग, लिफ्ट/एस्केलेटर्स मैनिंग और स्टेशन एनाउंसमेंट इत्यादि – की गंभीर रूप से समीक्षा जानी चाहिए और इस पर अंकुश लगाया जाना चाहिए” के आधार पर पूरे मंडल में स्टेशनों को क्लब करते हुए जोन बनाकर सभी स्टेशनों पर सफाई का कार्य ठेके पर देने के जो भी कॉन्ट्रैक्ट थे, वे सभी मंडल रेल प्रबंधक, कोटा द्वारा निरस्त कर दिए गए हैं।

इस हिसाब से जो ग्रुप ‘डी’ सफाई कर्मचारियों के पद सरेंडर किए गए थे, वे भी स्वत: रद्द होने चाहिए थे और जिन पदों को सरेंडर कर जो पद सृजित किए गए थे, वे भी स्वत: रद्द होने चाहिए थे। परंतु कोटा मंडल द्वारा ऐसा कुछ नहीं किया गया।

उपरोक्त नियम के अनुपालन में यथोचित कार्य न करके इन नियमों को ताक पर रखकर वाणिज्य निरीक्षकों के नए पदों के साथ रिक्तियों के लिए कथित रूप से निजी हित साधने हेतु यह परीक्षा करवाई जा रही है, जबकि उक्त नियमों के अनुपालन में पिछले दो सालों में सृजित किए पदों को भी सरेंडर किया जाना है।

बताते हैं कि इस कार्य हेतु फाइल चलाई भी गई परंतु नए सृजित वाणिज्य निरीक्षकों के पदों को डीसीएमआई मैन पावर प्लानिंग पर दबाव बनाकर और उससे लिखवाकर इन पदों को यथावत रखकर केवल कागजी कार्यवाही कर ली गई और इस पर पुनः वित्तीय सहमति लिया जाना उचित नहीं समझा गया तथा गंभीर अनियमितता को मूर्त रूप दिया जा रहा है।

कर्मचारियों का कहना है कि वास्तव में इन पदों के सृजन की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि प.म.रे. मुख्यालय जबलपुर द्वारा दिए गए आदेश में यह प्रावधान दिया गया है कि “यदि कोई पर्यवेक्षक के पद पर लेवल-7, पे-बैंड 9300-34800+4600 ग्रेड पे में हो और प्रशासन उसे अपनी आवश्यकता के अनुरूप वाणिज्य निरीक्षक के पद पर काम लेना चाहे, तो उस पर्यवेक्षक से वर्तमान रिक्ति पर वाणिज्य निरीक्षक का कार्य लिया जा सकता है। तथापि उस पर्यवेक्षक का कार्यकाल 5 वर्ष से अधिक का नहीं होगा।

कर्मचारियों का कहना है कि मुख्यालय का तत्संबंधी आदेश मंडल कार्मिक शाखा के पास अवश्य उपलब्ध होना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि इतनी लचीली पालिसी उपलब्ध होते हुए भी नए पदों के सृजन की आवश्यकता क्यों हो रही है? इसका सीधा मतलब यही निकल रहा है कि मनवांछित व्यक्ति को पदोन्नत करके मनवांछित लाभ कमाने के इरादे से इन सब नियमों को ताक में रखा जा रहा है।

कर्मचारियों ने बताया कि मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय का पत्र सं. ईसी/174/2 (मर्जर ऑफ सीसी/ईसीआरसी दि. 02.01.2019 के अंतर्गत मंडल के समस्त वाणिज्य कैडर, जिसमें बुकिंग, पार्सल, गुड्स, टिकट चेकिंग स्टाफ को मर्ज करने और री-पिन प्वाइंटिंग भी मनवांछित व्यक्ति को पद पर लाने और मनवांछित लाभ कमाने के इरादे से की गई है।

इसी के तहत जहां कोटा बुकिंग और पीआरएस में केवल दो पर्यवेक्षक (एक कैश और एक स्टोर्स) के पद सालों से थे, वहां पर 7-7 पद सृजित कर दिए, जबकि इनका न तो कोई औचित्य है और न ही आवश्यकता है, वहीं कई स्टेशनों पर पर्यवेक्षक के पदों की आवश्यकता है, वहां यह पद सृजित नहीं किये गए हैं।

उनका कहना है कि यदि नए पद सृजित करने ही थे, तो उससे पहले पैरा 6 में वर्णित प.म.रे. मुख्यालय के आदेश में दिए गए प्रावधान का विचार कर उसका लाभ उठाते हुए रेल राजस्व बचाया जा सकता था। परंतु ऐसा नहीं किया गया, क्योंकि फिर वही मनवांछित व्यक्ति को पद पर लाने और मनवांछित लाभ कमाने के इरादे से की जा कोशिश बाधित हो जाती।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि वर्तमान कोटा मंडल की वित्तीय शाखा द्वारा भी कार्मिक शाखा के उक्त 6 नए वाणिज्य निरीक्षकों के पदों के सृजन के औचित्य पर बिना कोई सवाल उठाए आंख मूंदकर वित्तीय सहमति दे दी गई। जबकि रेलवे बोर्ड के उपरोक्त दिशा-निर्देशों के अंतर्गत सफाई वालों के पदों के एवज में जो पद सृजित किए गए हैं, उनकी समीक्षात्मक जांच की जानी चाहिए थी, जो कि वित्तीय शाखा द्वारा नहीं की गई। यह घोर अनियमितता एवं सरासर रेलवे बोर्ड द्वारा जारी किए गए उपरोक्त निर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन है।

रेलवे बोर्ड के उक्त निर्देशों की अवेहलना का आलम यह है कि मंडल प्रशासन ने भी अपनी आंखें बंद कर ली हैं, क्योंकि ऐसा लगता है कि मंडल की कार्मिक, वाणिज्य, परिचालन, वित्त और अन्य शाखाओं में जो खुलेआम कदाचार चल रहा है उस पर मंडल प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं रह गया है।

उपरोक्त तमाम कदाचार की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए और इनकी उच्च स्तरीय जांच कराने के लिए कई कर्मचारियों ने महाप्रबंधक/प.म.रे. को एक ज्ञापन भी सौंपा है और उनसे मांग की है कि गुरुवार 6 अगस्त को होने जा रही परीक्षा को तुरंत रोका जाए।

इस ज्ञापन की प्रतियां उन्होंने वरिष्ठ उप महाप्रबंधक एवं मुख्य सतर्कता अधिकारी, प्रमुख मुख्य परिचालन प्रबंधक, प्रमुख मुख्य वाणिज्य प्रबंधक, प्रमुख मुख्य वित्तीय सलाहकार एवं मुख्य लेखाधिकारी, पमरे/जबलपुर को भी उचित कार्यवाही हेतु प्रेषित की हैं। क्रमशः 





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देश में भारी आर्थिक संकट के बावजूद जारी हो रहे करोड़ों-अरबों के अनावश्यक टेंडर

महामारी के संकटकाल में रेल अस्पतालों की दुर्दशा, नहीं मिल रहा रेलकर्मियों को उपचार

सुरेश त्रिपाठी

कोरोना महामारी के संकटकाल में रेलवे अस्पतालों और हेल्थ यूनिटों का बुरा हाल है। कोरोना फंड के नाम पर न जाने कितनी धनराशि रेल अस्पतालों को दी गई लेकिन परिणाम क्या निकला! आज स्थिति यह है कि रेल कर्मचारी और उनके परिवार रेल अस्पतालों में जाने से कतरे रहे है।

सामान्य रोगी को भी पहले जिला अस्पताल से कोविड टेस्ट कराने की सलाह रेलवे डॉक्टर दे रहे हैं। कमाल है, जो सामान्य मरीज है, वह क्यों कोरोना का टेस्ट कराए? अस्पताल के डॉक्टर तो ऐसे पीपीई किट पहन रहे हैं, मानो सिर्फ उन्हीं पर कोरोना अटैक करेगा, बाकी जो रेलकर्मी फील्ड और कार्यालयों में काम कर रहे हैं, मानो वे सब अमृत पीकर और कर्ण के कवच-कुंडल पहनकर आए हैं।

अगर ऐसे ही रेलवे अस्पतालों के हालात हैं तो फिर रेल अस्पताल बंद कर देने चाहिए और इस मद के फंड को सही जगह इस्तेमाल किया जाना चाहिए। डॉक्टर यदि अपने चैम्बर में ओपीडी का केस देख भी रहे हैं तो मरीज उनके चैम्बर के बाहर ही खड़ा होकर अपना दुखड़ा रोएगा और वहीं से दवा लिख दी जाएगी.. ऐसी दयनीय हालत हो गई है रेल कर्मचारियों और उनके परिवारों की! लेकिन रीढ़हीन यूनियन पदाधिकारी, अधिकारी और मंत्री सब मौन हैं।

उधर उत्तर रेलवे केंद्रीय अस्पताल (एनआरसीएच) का जो हाल है, वह अब सबको पता है कि वहां लंबे समय से मरीजों की बाहर से जांच कराने में किस कदर कमीशन का खेल चल रहा था और किस तरह अस्पताल प्रमुख को एमडी के पद से निवृत्त करके जनरल प्रैक्टिस में भेजने के पांच दिन बाद पुनः उसी पद पर उनकी नियुक्ति कर दी गई। जाहिर है कि सेटिंग और पहुंच बहुत ऊपर तक रही होगी। एनआरसीएच में कमीशनखोरी का यह खेल कानाफूसी.कॉम रेलसमाचार.कॉम की “उत्तर रेलवे केंद्रीय अस्पताल में जारी कमीशनखोरी का खेल” शीर्षक खबर प्रकाशित होने के बाद रेल प्रशासन यह कमीशनखोरी का खेल रोककर कोविद सहित सभी प्रकार की जांचें अब अस्पताल में ही करना अनिवार्य कर दिया है। 

Also Read: उत्तर रेलवे केंद्रीय अस्पताल में जारी कमीशनखोरी का खेल?

एक तरफ केंद्र सरकार कर्मचारियों की मूल सुविधाओं पर आर्थिक संकट दिखाकर कैंची चला रही है, तो दूसरी तरफ रेलवे और अन्य सरकारी विभागों में बिना वर्तमान परिस्थिति का आकलन किए अरबों-खरबों के टेंडर निकाले जा रहे हैं। सरकार का यह कृत्य विरोधाभासी है!

जब मुद्रा संकट है और देश चौतरफा आर्थिक संकट का सामना कर रहा है, तो अनावश्यक कार्यों को कुछ समय के लिए रोक दिया जाना चाहिए। टेंडर अवार्ड करने की इतनी जल्दी क्यों है? क्या स्टेशनों पर मेकेनाइज्ड क्लीनिंग का काम विभागीय सफाई कर्मचारियों से नहीं कराया जा सकता? वह भी तब जब अगले साल तक भी सामान्य रेल यातायात और ट्रैफिक बहाल होना मुश्किल लग रहा है, तब ऐसे में अनाप-शनाप और अनावश्यक खर्च क्यों किया जाना चाहिए??

यह सब जानते-बूझते होने के बाद भी यदि यही हाल है, तो कहना ही पड़ेगा कि कोरोना कहीं न कहीं अवसर भी लेकर आया है! लेकिन कमजोर विपक्ष के कारण इस चालाकी को कोई उजागर नहीं कर पा रहा है।

प्रयागराज स्टेशन की मेकेनाइज्ड तरीके से साफ-सफाई करने के लिए टेंडर 4 साल की अवधि के लिए अभी हाल ही में निकाला गया है जिसकी कीमत 29 करोड़ रुपया है। इसी हफ्ते कानपुर सेंट्रल के लिए भी लगभग 30 करोड़ रुपये का टेंडर निकलेगा। अब इसे अवसर नहीं तो क्या कहा जाए! इस वक्त इसकी क्या जरूरत थी?

उल्लेखनीय है कि अभी दो साल पहले ही प्रयागराज और कानपुर सेंट्रल दोनों रेलवे स्टेशनों की मेकेनाइज्ड साफ-सफाई के ठेके करीब 15-15 करोड़ में दिए गए थे, अब यह राशि पुनः बढ़कर दोगुनी हो गई है, जबकि दो साल पहले तक साफ-सफाई के यही ठेके ढ़ाई-तीन करोड़ के हुआ करते थे। स्टेशनों की सफाई को लेकर यह स्थिति सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि यही हाल सभी जोनल रेलों में भी हुआ है जिसमें कमीशनखोरी की प्रमुख भूमिका है।

इसके साथ ही उत्तर रेलवे वाराणसी मंडल द्वारा हाल ही में एक ऐसा ही सफाई का टेंडर (एम-सीएनडब्ल्यू-42/2019-20, इशू दि. 30.03.2020, क्लोज्ड दि. 20.05.2020) जारी किया गया है, जिसकी सेवा-शर्तें (टर्म्स एंड कंडीशंस) देखकर ही लगता है कि उक्त टेंडर किसी खास पार्टी को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इस टेंडर की कुल एडवरटाइज्ड वैल्यू ₹64448684.81 है।

क्या रेल प्रशासन को नहीं पता कि सामान्य रेल संचालन और यात्रियों की आवाजाही कम से कम इस साल तो सामान्य होने से रही, फिर किसके लिए रेल राजस्व को लुटाने की तैयारी क्यों की जा रही है?

विभागीय सफाई कर्मचारी अधिकांश अधिकारियों, निरीक्षकों, और सुपरवाइजरों के घरों में काम कर रहे हैं और उनके एवज में रेल प्रशासन साफ-सफाई का ठेका प्राइवेट पार्टी को देने के लिए टेंडर निकाल रहा है। इसी तरह सिग्नल एंड टेलीकम्यूनिकेशन, इंजीनियरिंग आदि विभागों में भी अनावश्यक कार्यों के लिए करोड़ों-अरबों के टेंडर निकाले जा रहे हैं जिनकी कम से कम इस साल तक सामान्यतः कोई विशेष जरूरत नहीं पड़ने वाली है।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान तथाकथित यात्री सुख-सुविधाओं और साफ-सफाई सहित सिविल इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल एवं एसएंडटी के टेंडर्स की लागत जिस तरह अनाप-शनाप बढ़ी है, या जानबूझकर बढ़ाई गई है, उसको देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि भ्रष्टाचार किस सीमा तक पहुंच चुका है और इस लूट का हिस्सा कहां तक पहुंच रहा होगा? जबकि आर्थिक संकट के नाम पर देशवासियों की भावनाओं को उभारकर तथा उनकी मनोदशा को दिग्भ्रमित करके राजनीतिक रोटियां सेंकने का खेल बदस्तूर जारी है।





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यात्री ट्रेनें नहीं चल रही हैं, ऐसे मार्जिन में केबल मेगरिंग कराने पर अधिकारियों का जोर

केबल मेगरिंग करने का नया फरमान, रिले रूम के वायरस ग्रस्त होने पर कैसे बचेगी रेलकर्मियों की जान !

अब तक एसएंडटी कर्मचारियों को इंजीनियरिंग विभाग के कर्मचारियों के साथ रेल बदलने, ट्रैक मशीन से पैकिंग करने के कार्य में लगाया गया था परंतु अब एक और नया फरमान जारी कर दिया गया है। इस नए आदेश में केबल मेगरिंग कराने के निर्देश दिये गये हैं।

जब कर्मचारियों का कहना है कि समस्या काम करने की नहीं, बल्कि काम करने की जगह को लेकर है, क्योंकि केबल मेगरिंग कराने के लिए रिले रूम जिस पर दो लाॅक होते हैं, जिनकी एक चाभी एसएंडटी विभाग के पास तथा दूसरी चाभी स्टेशन मास्टर के पास होती है।

स्टेशन मास्टर चाभी तभी देते हैं, जब एसएंडटी विभाग का जेई या एसएसई स्तर का निरीक्षक चाभी मांगने के लिए कंट्रोल से पीएन लेता है और स्टेशन मास्टर को कंट्रोल चाभी देने के लिए अनुमति देता है।

यानि रिले रूम पूरी तरह से बंद और सुरक्षित होता है। अतः रिले रूम को खोले बगैर केबल मेगरिंग करना संभव नहीं है।

जबकि रिले रूम के अंदर सिग्नल की सारी सर्किट तथा हजारों-लाखों की संख्या में सिग्नलिंग तारों का गुच्छा सिग्नलिंग उपकरणों को चलाने के लिए लगा होता है।

अब प्रश्न यह है कि क्या एक बंद और सुरक्षित कमरे को इस कोविद-19 महामारी के समय खोलकर उसे भी असुरक्षित नहीं किया जा रहा है और क्या इस प्रकार के रिले रूम को सैनेटाइज किया जाना संभव है जहाँ हजारों-लाखों की संख्या में सिगनलिंग तारों का गुच्छा तथा सिगनलिंग सिस्टम मौजूद हो?

एसएंडटी कर्मियों का आग्रह है कि आखिर अधिकारियों को कर्मचारियों की सुध क्यों नहीं हो रही है? उनका कहना है कि जब प्रधानमंत्री खुद देश के हर नागरिक को ‘घर पर रहिये और केवल घर पर रहिये’ के लिए निवेदन कर रहे हैं, तो क्या हमारे अधिकारी अपने मातहत कर्मचारियों को ‘घर पर रहिये और केवल घर पर रहिये’ के लिए प्रेरित नहीं कर सकते हैं?

उन्होंने कहा कि अभी हाल ही में चेयरमैन, रेलवे बोर्ड ने भी सभी अधिकारियों को केवल मालगाड़ियों के लिए आवश्यक स्टाफ को ही ड्यूटी पर लगाने का निर्देश दिया है, वह भी रोटेशन में। परंतु ब्रांच अधिकारियों, खासतौर पर एसएंडटी तथा इंजीनियरिंग विभाग के अधिकारियों को ट्रेनें कम चल रही हैं, तो काम करने के लिए अच्छा मार्जिन दिख रहा है, इसीलिए वह सामान्य दिनों से भी ज्यादा काम करवा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि कहने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल रखा जा रहा है, परंतु इंजीनियरिंग तथा एसएंडटी विभाग का प्रत्येक काम रिस्क एवं हार्डशिप के बिना संभव ही नहीं है, ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग तो मात्र एक छलावा है। ऐसी परिस्थितियों में कई रेलकर्मी कोरोना महामारी के चपेट में आ रहे हैं, जिसका एक बेहतरीन उदाहरण पश्चिम रेलवे के मुंबई सेंट्रल मंडल के नंदुरबार सेक्शन में आ चुका है, जहां संदिग्ध मामले पाए जाने पर तीन ट्रैकमैनों को होम क्वारंटाइन किया गया है।

उन्होंने कहा कि जो लोको पायलट ट्रेन चलाते हैं, उनको भी ब्रेथ एनालाईजर टेस्ट तथा बायोमैट्रिक उपकरणों से छुट दी गई है, परंतु कुछ लाॅबियों में यह अभी मान्य नहीं किया जा रहा है और कहा जा रहा है कि उनके पास मंडल कार्यालय से अभी तक कोई निर्देश प्राप्त नहीं हुए हैं। अब जबकि अभी हाल ही में पालनपुर में एक लोको पायलट को कोरोना से संक्रमित पाया गया था, तब भी रेल प्रशासन के आदेशों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। 

सवाल यह है कि आखिर इस वैश्विक कोरोना महामारी से इन रेल कर्मचारियों को कौन बचाएगा और इसके लिए जिम्मेदार किसे ठहराया जाएगा?

“हम बचेंगे, तो देश बचेगा”

एसएंडटी कर्मचारियों के एक व्हाट्सऐप ग्रुप में डाला गया मैसेज भी कानाफूसी.कॉम को प्राप्त हुआ है। इसमें कहा गया था कि – “जबकि भारत सरकार एवं देश के प्रधानमंत्री खुद बार-बार सभी नागरिकों से ‘घर में ही रहें और केवल घर में ही रहें’ की अपील कर रहे हैं, ऐसी स्थिति में घर से बाहर निकलना मौत के मुँह में जाने के बराबर ही नहीं, बल्कि पूरे भारत को मौत के मुँह डालने के बराबर माना जा रहा है। ऐसी विकट परिस्थिति में हम रेल कर्मचारियों के ऊपर विशेष जिम्मेदारियां आ जाती हैं। परंतु हमारी जिम्मेदारियों की आड़ में हमारा शोषण किया जाना उचित नहीं है। हम कर्मचारी भी आप अधिकारियों के परिवार के एक सदस्य की तरह ही हैं और हमसे काम लेना आपकी जवाबदारी है, परंतु इसे किसी भी अधिकारी को अपने इगो पर नहीं लेना चाहिए। और जहां तक संभव हो, हम सभी को एक-दूसरे की भावनाओं को तथा समस्याओं को इससे भी ज्यादा हमारे घर से बाहर निकलने के डर को महसूस करना चाहिए। अगर बात केवल हम कर्मचारियों की होती, तो कोई बात नहीं थी, परंतु यह महामारी हमारे परिवार को ही नहीं, पूरे देश को महामारी के दलदल में डाल रही है। हमारी एक गलती न जाने किस-किस को लील जाए। आज किसी भी प्रकार किसी से हुई एक छोटी सी गलती भी बहुत बड़ी गलती बन सकती है। अतः आप सभी से हाथ जोड़ कर नम्र निवेदन है कि आप सभी के हाथों में हमारी ही नहीं, बल्कि हमारे पूरे परिवार के साथ-साथ हमारे समाज की जिंदगियां भी हैं। मेरे इस अनुरोध पर आप सभी एक बार पुनर्विचार करें तथा शिफ्ट ड्यूटी में कार्यरत कर्मचारियों के दर्द को समझने की कोशिश करें, जब गाड़ियां चल नहीं रही हैं, तो शिफ्ट ड्यूटी में कर्मचारियों की संख्या कम की जानी चाहिए, उन्हें अल्टर्नेट दिन में बुलाया जाना चाहिए तथा जनरल ड्यूटी में भी किसी भी प्रकार का नया काम नहीं किया जाना चाहिए। जहां तक संभव हो, हमें इस वक्त केवल और केवल इमरजेंसी कार्यों का संपादन ही करना चाहिए। इस महामारी से बचेंगे, तो बहुत सारे काम कर लेंगे। हम बचेंगे तो देश बचेगा।”

Lifted Lc 67  both the booms air

Replaced point no 13A and 11B today at KKLR yard

A boom 90, 90 89

B boom  90,94 96

Planned special work on Barabhum Station – spot vedio

https://youtu.be/dp2Kk_gsNYg

New and special works are going on in Godiwada section, Vijayawada division, South Central Railway

https://twitter.com/irstmu/status/1244405020109361152?s=08








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अधिकारियों द्वारा जारी है रेल सेवाओं के विलय का पुरजोर विरोध

कैडर मर्जर का रेल संचालन और यात्री संरक्षा/सुरक्षा पर पड़ेगा बुरा प्रभाव

मर्जर का फैसला रेल अधिकारियों की सहमति से लिया गया है, यह सरासर झूठ है

भारतीय रेल की आठ संगठित सेवाओं के मर्जर के खिलाफ रेलवे की तीन सिविल सर्विसेस के अधिकारियों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। इन अधिकारियों का कहना है कि यह फैसला एकतरफा लिया गया है और इसमें सबकी सहमति शामिल नहीं है। उनका कहना है कि इससे रेल संचालन पर बुरा असर पड़ेगा और यात्री संरक्षा/सुरक्षा भी बुरी तरह प्रभावित होगी।

उल्लेखनीय है कि रेलमंत्री ने बिना किसी सलाह-मशवरे के रेलवे में सर्विस मर्जर का बड़ा फैसला लिया है, लेकिन रेलवे के अधिकारी इस फैसले से सहमत नहीं हैं और इसीलिए वे इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं। रेलवे के 13 जोन और 60 डिविजन के सिविल सर्विस अधिकारियों ने 250 पेज का ज्ञापन प्रधानमंत्री सहित रेलमंत्री और रेलवे बोर्ड को सौंपा है। इसमें कहा गया है कि सरकार का यह फैसला एकतरफा है और इस फैसले से यात्री संरक्षा और ट्रेनों के संचालन पर बुरा असर पड़ेगा।

रेल मंत्रालय ने आठ सर्विस कैडरों को एक साथ मर्ज करने का फैसला किया है। मंजूरी के लिए इसे कैबिनेट और प्रधानमंत्री के पास भी भेजा गया है। रेलवे ने प्रेस विज्ञप्ति जारी करके घोषणा की थी जिसमें कहा गया था कि मर्जर का फैसला रेलवे के अधिकारियों की सहमति से लिया गया है, जबकि यह सरासर झूठ है। तथापि इसमें बताया गया था कि 7-8 दिसंबर 2019 को अधिकारियों के साथ ‘परिवर्तन संगोष्ठी’ का आयोजन किया गया था।

अधिकारियों का दावा है कि परिवर्तन संगोष्ठी में 12 ग्रुप बनाए गए थे जिनका हेड जनरल मैनेजर को बनाया गया था और यह फैसला सिविल सर्विस अधिकारियों को नजरअंदाज करने तथा इंजिनियरिंग सर्विस के अधिकारियों को तवज्जो देने के लिए किया गया था।

उनका कहना है कि सभी जनरल मैनेजर इंजिनियरिंग सर्विस के हैं। इन अधिकारियों का कहना है कि बैठक में केवल जीएम (जनरल मैनेजर) ही अपनी बात रख सकते थे। ऐसे में जनरल मैनेजर की व्यक्तिगत राय को पूरे ग्रुप की राय बताया गया, जो कि गलत है, क्योंकि एक जीएम की व्यक्तिगत राय को सभी कैडर अधिकारियों की राय नहीं माना जा सकता है।

इसमें कहा गया है कि जब इस फैसले में आम सहमति शामिल नहीं है तो यह तरीका लोकतांत्रिक कैसे हो गया? एक रेल अधिकारी का कहना था कि ज्ञापन में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि रेलवे का यह फैसला यात्री संरक्षा और सुरक्षा के साथ समझौता साबित हो सकता है।

अधिकारी ने बताया कि मंत्रालय पहले ही आश्वस्त कर चुका है कि सिविल सर्विस के जरिए आने वाले अधिकारियों के अधिकारों को सुरक्षित रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि अधिकारयों से ईमेल के माध्यम से भी सुझाव देने की अपील की गई है और 900 से ज्यादा सुझाव अब तक मिले भी हैं।

ज्ञातव्य है कि रेल मंत्रालय ने मकैनिकल, इलेक्ट्रिकल, स्टोर्स, पर्सनल, ट्रैफिक, सिविल इंजिनियरिंग, सिग्नल एंड टेलिकॉम और एकाउंट्स सर्विस कैडर को मिलाकर एक सर्विस ‘इंडियन रेलवे मैनेजमेंट सर्विस’ बनाने का निर्णय किया गया है। फिलहाल आरपीएफ और मेडिकल को इससे अलग रखा गया है। 








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