कोच पोजीशन में रेल अधिकारी थोड़ी तो उपयोग करें अपनी बुद्धिमत्ता

रेलवे को है केवल अपनी कमाई की चिंता, यात्रियों की कोई परवाह नहीं

गुरुवार, दि. 17.06.2021 को ट्रेन नं.  01079 लोकमान्य तिलक टर्मिनस से गोरखपुर के लिए चली स्पेशल ट्रेन में ए-1 कोच के यात्री लगातार ट्रेन कंडक्टर को शिकायत कर रहे हैं कि उनके कोच के साथ जुड़े जनरल कोच के यात्री उनका टॉयलेट गंदा कर रहे हैं, अतः दोनों कोचों के बीच खुला वेस्टिबुल बंद कराया जाए, क्योंकि इसके चलते न केवल एसी ए-1 कोच में बदबू आ रही है, बल्कि उनकी शांति भी भंग हो रही है और रेल की यह कोच व्यवस्था बिल्कुल गलत है।

गुरुवार को ए-1 कोच के यात्रियों की कोई सुनवाई ऑन बोर्ड ट्रेन स्टाफ ने नहीं की। ट्रेन में चल रहा कैटरिंग वेंडिंग स्टाफ बार-बार उक्त वेस्टिबुल को खोलकर अपना धंधा करता रहा। यात्रियों के मना करने पर उनका प्रतियुत्तर होता है कि “तुम्हारी शांति और कोच में होने वाली गंदगी के लिए हम अपना धंधा नहीं छोड़ सकते!”

शुक्रवार, 18.06.2021 की सुबह जब ट्रेन ललितपुर के आसपास पहुंच रही थी, तब फिर वही परिदृश्य उपस्थित हो गया जब वेंडिंग स्टाफ वेस्टिबुल खुला छोड़कर अपना धंधा करने गया, तो जनरल कोच के यात्री ए-1 कोच के टॉयलेट का उपयोग करके दोनों टॉयलेट पूरी तरह से गंदे कर चुके थे। इससे आई बदबू के चलते ए-1 कोच के गेट से लगे पहले कूपे में बर्थ नंबर एक से छह में बैठे सभी यात्री बिफर उठे।

कोच कंडक्टर (भोपाल मंडल स्टाफ) को बुलाया गया। वह उल्टे यात्रियों को ही यह कहकर समझाने लगा कि “कोच को यहां इसलिए लगाया गया है, क्योंकि स्टाफ कम है और इतने ही स्टाफ को ज्यादा से ज्यादा कैश/केस बनाने का दबाव रहता है। केस तो जनरल कोच में ही मिलते हैं।” अब स्टाफ की इस बेचारगी पर यात्री क्या कहें, क्योंकि यह उनकी समस्या नहीं है। तथापि कंडक्टर ने जो भी समझाया वह विषय अथवा यात्री समस्या से अलग था।

बहरहाल, कंडक्टर ने यह कहकर यात्रियों को शांत किया कि अब उक्त वेस्टिबुल नहीं खोला जाएगा। तथापि उपरोक्त यात्रियों ने कंडक्टर को संबोधित करते हुए सोशल मीडिया पर रेल प्रशासन द्वारा की जाने वाली कोविड प्रोटोकॉल संबंधी बड़ी-बड़ी बातों का उल्लेख करके रेलवे की तमाम लानत-मलामत कर दी। यात्रियों ने यह भी कहा कि “इसी तरह की गतिविधियों के कारण रेलवे अपने स्थाई उपयोगकर्ताओं को गंवा रहा है। वह तो अब भविष्य में कभी रेल से यात्रा नहीं करेंगे।”

वास्तविकता यह है कि किसी भी ट्रेन में एसी कोचों को जनरल कोचों के साथ संलग्न नहीं किया जाता, और ऐसा लगभग अन्य सभी ट्रेनों में है भी, जिनमें सेकेंड एसी कोच के बाद थर्ड एसी, फिर स्लीपर, पैंट्री तथा बाकी कोचों की सीक्वेंस होती है। तथापि इस ट्रेन में एसी कोच, वह भी सेकेंड एसी कोच, को जनरल कोच के साथ अटैच किया गया है।

“अब यह बुद्धिमत्ता जिस किसी अधिकारी ने दर्शाई है, उसे पीयूष गोयल की जगह रेलमंत्री की कुर्सी पर बैठाया जाना चाहिए, क्योंकि पीयूष गोयल की अपेक्षा उक्त अधिकारी ज्यादा तत्परता से रेलवे को बरबाद करेगा!” यह कहना था उपरोक्त रेलयात्रियों का।

#IndianRailway #CentralRailway #NERailway #GMNER #GMCR #PiyushGoyal





Source link

यदि एक बार में महंगाई भत्ता देने में मुश्किलें आ रहीं हैं तो इसे किश्तों में भी दिया जा सकता है -शिवगोपाल मिश्रा

महंगाई भत्ता: थोड़ी लंबी हो सकती है केंद्रीय कर्मियों की प्रतीक्षा, डीए पर होने वाली समिति की बैठक एक बार फिर टली

केंद्रीय कर्मचारियों को 1 जुलाई, 2021 से महंगाई भत्ता (डीए) फिर से देने की घोषणा केंद्र सरकार ने की थी। सातवें वेतन आयोग से जुड़ी समस्याओं को लेकर नेशनल काउंसिल ऑफ ज्वाइंट कंसल्टेटिव मशीनरी (एनसी-जेसीएम) के पदाधिकारी और डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेंनिग (डीओपीटी) तथा वित्त मंत्रालय के अधिकारी लगातार संपर्क में बने हुए हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार मई के अंत में इन सभी संस्थाओं के बीच बातचीत होनी थी, लेकिन कोरोना के कारण अब यह बैठक जून के तीसरे सप्ताह में होने की संभावना है। बैठक टलने के बाद अब कर्मचारियों की प्रतीक्षा अब थोड़ी लंबी हो सकती है।

बताते हैं कि महंगाई भत्ते से जुड़ी समस्याओं को लेकर एनसी-जेसीएम के पदाधिकारी, डीओपीटी और वित्त मंत्रालय के अधिकारियों की बैठक 8 मई को भी होनी थी जो टल गई और उसके बाद मई अंत में बैठक का फैसला किया गया था। अब वह बैठक भी टल जाने से महंगाई भत्ते पर अंतिम निर्णय होने में और देर होने की आशंका है।

एनसी-जेसीएम स्टाफ साइड के सेक्रेटरी शिवगोपाल मिश्रा का कहना है कि कोरोना के मौजूदा हालात में महंगाई भत्ते पर बैठक टलने को नकारात्मक रूप में लेने की जरूरत नहीं है। उनका कहना है कि एनसी-जेसीएम स्टाफ साइड ने सरकार को यह सुझाव दिया है कि यदि एक बार में महंगाई भत्ता देने में मुश्किलें आ रहीं हैं तो इसे किश्तों में भी दिया जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार 1 जुलाई से महंगाई भत्ता दिया जाना था। इसमें पिछली तीन किश्तों – 01.01.2020, 01.07.2020, 01.01.2021 – का बकाया भी शामिल है। केंद्रीय कर्मचारियों के लिए यह मामला वर्तमान में सबसे बड़ी चर्चा का विषय है। किस्तों पर फिलहाल कोई निर्णय न होने का असर उनके एरियर पर भी पड़ेगा।

#NC_JCM #DearnessAllowance





Source link

चिनॉय सेठ, “जब खुद का घर शीशे का हो, तो दूसरों के घरों में पत्थर नहीं फेंका करते!”

सरकार के खर्चों और सरकारी विभागों में हो रहे भ्रष्टाचार पर सरकार का कोई अंकुश नहीं

सुरेश त्रिपाठी

रेलमंत्री पीयूष गोयल द्वारा रेल अधिकारियों-कर्मचारियों को मिल रही सुविधाओं की समीक्षा करने और री-एंगेज्ड कठपुतली चेयरमैन, रेलवे बोर्ड यानि “वीकेन यादव” द्वारा राममंदिर के शिलान्यास के दिन 5 अगस्त को रेल अधिकारियों के बंगला प्यून हटाने के बारे में दिए गए बचकाने संदेश/आदेश के बाद पूरी रेलवे वर्कफोर्स में नीचे से ऊपर तक बहुत कड़ी और जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई है। रेलमंत्री और सीआरबी के तमाम बचकाने निर्णयों को अब तक जैसे-तैसे झेल रहे रेलकर्मी-अधिकारी उनके इस एक निर्णय से अचानक हड़बड़ाकर उठ खड़े हुए हैं, क्योंकि यह निर्णय उनके परिवारों की सुरक्षा और उनकी गरिमा तथा स्वाभिमान को प्रभावित करने वाला है।

रेलमंत्री और सीआरबी के इस कुटिल एवं अनैतिक निर्णय के खिलाफ जहां सभी जोनल अधिकारी संगठनों द्वारा न सिर्फ उन्हें पूरे जस्टिफिकेशन के साथ ज्ञापन भेजे जा रहे हैं, बल्कि उन्होंने यह सुविधा जूनियर/सीनियर स्केल पर भी लागू करने की पुरजोर वकालत की है।

कार्मिक सुविधाओं में कटौती, भ्रष्टाचार पर कोई लगाम नहीं

एक तरफ जहां सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के डीए/आरए में पहले ही डेढ़ साल तक की पाबंदी लगा दी है, वहीं अब उनके वेतन और पेंशन पर भी 20% की कटौती किए जाने का ऐलान किया जा रहा है। इसके साथ ही मितव्ययिता और लागत खर्च में कटौती के नाम पर अन्य कई भत्तों में कटौती की घोषणा की जा चुकी है। जबकि सरकार के खर्चों और सरकारी विभागों में हो रहे भ्रष्टाचार पर सरकार का कोई अंकुश नहीं लग पा रहा है।

इसके अलावा अब रेल अधिकारियों और कर्मचारियों की तैयारी यह भी दिख रही है कि यदि रेलमंत्री नहीं मानते हैं और अपनी मनमानी करने पर अड़े रहते हैं, तो रेल मंत्रालय में उनके द्वारा लगाई गई उनकी वैयक्तिक फौज के कारनामों को भी उजागर करने का उन्होंने मन बना लिया गया है।

ऐसा लगता है कि मंत्री की इस निजी फौज द्वारा किए जा रहे घोर अपमान और मनमानी से अब ये सभी रेल अधिकारी बुरी तरह तंग आ चुके हैं। इसीलिए शायद वे ऐसे ही किसी मौके की तलाश में थे कि कब वे मंत्री और उनके निजी सहायकों की करतूतों का पर्दाफाश कर सकें।

“करो या मरो” की स्थिति ला खड़ी की रेलमंत्री ने!

क्रिया की प्रतिक्रिया होना प्राकृतिक सिद्धांत है। यह हमारा वैदिक साहित्य बहुत पहले से कहता आ रहा है और जिसे बाद में प्रतिपादित करके सर न्यूटन विज्ञान में अमर हो गए। और यह भी हर निकृष्ट से निकृष्ट और निकम्मे से भी निकम्मे आदमी, यहां तक कि कबीरदास कह गए हैं कि “मरी खाल की स्वांस सों, लौह भसम होई जाए” का जांचा-परखा सत्य है कि आदमी तब तक प्रतिक्रिया नहीं करता जब तक कि उसकी गरिमा और सम्मान को चोट नहीं लगती। और ये भी कि आदमी अपने तक तो बर्दाश्त करता है, पर जब बात उसके परिवार की सुरक्षा और इज्जत की आ जाती है, तब वह इसके विरुद्ध अपनी पूरी ताकत से प्रतिकार करने के लिए उठ खड़ा होता है। पिछले पांच-छह सालों से हर दिन अनाचार, अत्याचार, उत्पीड़न झेल रहे और अपमानित हो रहे रेल अधिकारियों और कर्मचारियों के सामने रेलमंत्री और सीआरबी ने अब “करो या मरो” की यही स्थिति लाकर खड़ी कर दी है।

रेलमंत्री ने “कमर के नीचे वार” किया

एक पूर्व मंत्री के साथ काफी समय तक काम कर चुके एक वरिष्ठ रेल अधिकारी ने रेलवे के वर्तमान निजाम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि एक समय था जब इन्हीं रेलकर्मियों-अधिकारियों की बदौलत रेलवे ने हर फील्ड में बड़े-बड़े कीर्तिमान स्थापित किए थे, क्योंकि इन्हें सक्षम नेतृत्व मिला था। उनका कहना है कि वर्तमान रेलमंत्री और उनके सलाहकार अब तक रेलवे में जो भी ऊटपटांग उठापटक कर रहे थे, उसका सीधा प्रभाव किसी व्यक्ति विशेष या रेल कर्मचारियों-अधिकारियों के परिवारों पर नहीं पड़ रहा था। पहली बार रेलमंत्री ने एक ऐसा बचकाना और द्वेषपूर्ण निर्णय लिया है, जो सीधे अधिकारियों और उनके परिवारों को हिट कर रहा है, इसे ही अंग्रेजी में “below the belt hit” (कमर के नीचे वार) करना कहा जाता है।

जरूरी था विभिन्न स्तर पर स्टेक होल्डर्स से विचार-विमर्श

उनका स्पष्ट मत है कि अवल्ल तो मंत्री को ऐसा करना ही नहीं चाहिए। अगर इनको कुछ करना ही था तो इस तरह के मामले में जल्दबाजी नहीं करते और सभी जोनों के अधिकारी संगठनों, हर आयु वर्ग के अधिकारियों तथा उनके विभिन्न ट्रेनिंग इंस्टिट्यूटस से भी विचार-विमर्श कर लेते, क्योंकि हम लोगों के समय भी और प्रायः सभी रेलमंत्रियों के समय टीएडीके और सैलून का मुद्दा कुछेक कारणों से जब तब आता रहा है, लेकिन हम लोगों ने यह देखा कि रेल अधिकारियों के काम की प्रकृति के हिसाब से यह व्यस्था जरूरी भी है और होनहार युवाओं को रेलवे को जॉइन करने का  सबसे बड़ा आकर्षण/इंसेंटिव भी।

वह आगे कहते हैं कि ऐसे में कोई भी परिपक्व मंत्री अपने मंत्रालय के अधिकारियों और कर्मचारियों की उपलब्ध सुविधाओं में अगर कोई इजाफा नहीं करता है, तो उनमें छेड़छाड़ भी नहीं करता और खासकर जो निर्णय सीधे व्यक्तिगत स्तर पर और परिवारों को प्रभावित करता हो, उसे तो मंत्री कतई नहीं छूता है।

नेतृत्व की अक्षमता और सैडिस्टिक मानसिकता में इंसानियत का अभाव

एनडीए सरकार के कार्यकाल में ही रहे एक अन्य रेलमंत्री के साथ जुड़े एक और वरिष्ठ रेल अधिकारी का यह स्पष्ट मानना था कि रेलवे के अधिकारियों और कर्मचारियों जैसी टारगेट ओरियंटेड वर्कफोर्स शायद ही किसी अन्य विभाग मंत्रालय में होगी। उन्होंने कहा कि यह भी सही है कि वस्तुत: लीडरशिप जैसी होगी, ऑर्गनाइजेशन अपना रिजल्ट भी वैसा ही देगा। आज रेलवे की जो दुर्व्यवस्था है उसका सीधा कारण सिर्फ और सिर्फ नेतृत्व की अक्षमता ही है।

कोई निर्णय कैसे अपने घोर समर्थकों को भी विरोधी बना सकता है, इसकी बानगी तब देखने को मिली, जब इलेक्ट्रिकल के ही एक वरिष्ठ अधिकारी इसके लिए सीआरबी पर ही फटते नजर आए। उनका कहना था कि कम से कम रेलवे में काम किए सीआरबी “वीकेन यादव” जैसे एक अधिकारी से ऐसी अपेक्षा नहीं थी। उन्होंने कहा कि यदि वीकेन यादव के मन में टीएडीके के मामले को लेकर कुछ चल रहा है, या मंत्री ने इस पर कुछ करने को उनसे कहा था, तब भी कोरोना जैसी संक्रामक महामारी के समय में उन्हें इतनी तो इंसानियत जरूर दिखानी चाहिए थी कि अधिकारियों को एक माह का एडवांस नोटिस दे देते कि “फिलहाल इसे 1 सितंबर या 1 अक्टूबर से रोका जाएगा, जब तक इस पर आगे कोई निर्णय न हो जाए।”

उनका कहना था कि तब कम से कम जिन अधिकारियों ने अपना टीएडीके सरेंडर कर दिया है और जिनके टीएडीके की बहाली की प्रक्रिया चल रही है, उन्हें यह मिल जाता (ध्यान रहे कि पूरी भारतीय रेल में ऐसे बहुत ज्यादा मामले नहीं होंगे) तथा कोरोना काल में उनका परिवार इस तरह की असहाय स्थिति में अपने को नहीं पाता। इसके अलावा जिनके टीएडीके का समय पूरा हो गया है और जो सरेंडरिंग की प्रक्रिया शुरू करने वाले थे, वे भी तब तक रुक जाते, जब तक इस पर कोई सर्वसम्मत निर्णय नहीं हो जाता।

उनका कहना था कि “लेकिन यहां तो सैडिस्टिक तरीके से यह धमकी दे दी गई कि 1 जुलाई से भी जिसकी बहाली हो गई है, उसका भी रिव्यू होगा।” उन्होंने कहा कि अपनी समर्पित वर्कफोर्स अथवा अपने सहयोगियों के साथ इससे बड़ा भद्दा मजाक और ज्यादाती क्या हो सकती है? वह भी तब, जब खुद पूरे सेवाकाल में उन्होंने इस सुविधा का भरपूर इस्तेमाल किया और अब भी कर रहे हैं!

कई अधिकारियों और कर्मचारियों का यह भी कहना है कि रेलमंत्री अपने किसी भावी लाभ को ध्यान में रखकर अपना एजेंडा पूरा करने और रेलवे को बदनाम करने के लिए पहले बहुत ही गंदे और ओछे तरीके से तोहमत लगाते हैं, और फिर जबरदस्ती उसके पीछे पड़ जाते हैं। ऐसा ओछापन आज तक शायद ही किसी रेलमंत्री ने दिखाया होगा।

पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़े वंचितों के बारे में भी सोचना होगा

उनका कहना है कि, “रेलमंत्री को पहले यह तो पता कर लेना चाहिए कि भले ही उनका कोई भी पूर्वाग्रह हो, लेकिन यह बहुत बड़ा सत्य है कि बंगला प्यून या टीएडीके के माध्यम से अधिकांश उन वंचित और आर्थिक, सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को एकमात्र सरकारी रोजगार का अवसर मिल पाता है, जो तबका सिर्फ और सिर्फ मेहनत के बूते पर ही जिंदा रहता है। जो सामाजिक तौर पर न तो किसी प्रतियोगी परीक्षा की दौड़ में आने वाले खर्च को वहन करने में सक्षम होता है और न ही मेहनत के अलावा उसका कोई मेरिट और जुगाड़ ही होता है। समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े ये लोग किसी भी पारंपरिक चयन प्रक्रिया के माध्यम से कोई भी सरकारी नौकरी कभी पा ही नहीं सकते।”

चाबुक और हिकारत से हांकने पर काम नहीं होता

उनका स्पष्ट मानना है कि “कायदे से यह सुविधा जूनियर और सीनियर स्केल अधिकारियों को भी मिलनी चाहिए, क्योंकि हर बेहतरीन ऑर्गनाइजेशन अपने कर्मचारियों को दिए गए इंसेंटिव से ही परखा और पहचाना जाता है। उसी से किसी कंपनी की आउटपुट निर्धारित होती है और कर्मचारी जब पूरी तरह से अपने मालिक में गार्जियन का भाव देखते हैं, तो अपना बेहतर देते हैं। टाटा ग्रुप इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। लेकिन जिस कंपनी  का मालिक चाबुक से और हिकारत से देखते हुए अपने कर्मचारियों अथवा मातहतों को हांकने की कोशिश करता है, वह जल्दी ही अपने पुरखों के द्वारा खड़ी की गई सम्पति का नाश कर देता है। वर्तमान रेलमंत्री शायद यही कर रहे हैं।”

यहां रेल मंत्रालय (रेल भवन) के गलियारों में चल रहे कई किस्सों में से एक मजेदार किस्सा एक अधिकारी ने शेयर किया –

“एक अन्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मजाक में एक सीरियस बात अपने साथ रुड़की में पढ़े एक रिटायर्ड बोर्ड मेंबर से एक बार कहा कि गनीमत है कि ये रेलमंत्री ही हैं, अगर ये रक्षामंत्री बन जाते, तो सबसे पहले सेना को खत्म कर देते और कहते चीनी आउटसोर्स एजेंसी से इनसे सस्ते में आदमी और हथियार दोनों डिप्लॉय हो जाएंगे। बाद में वह इसके फायदे भी गिना देंगे कि पहले तो कोई हिंदुस्तानी अब बॉर्डर पर मरेगा नहीं और दूसरे जहां एक मिलिट्री डिवीजन को मेनटेन करने पर 100 रुपए खर्च होते थे, वहां अब चाइनीज और चीनी एजेंसियां 30 रुपए में ही यह काम करेंगी। या फिर वे संभवतः यह भी बता देते कि “चीन अब इस आउटसोर्स के बदले उल्टे सरकार को भी 1000 रुपए हर महीने देने का ऑफर कर रहा है और इसी लागत विष्लेषण (कॉस्ट एनालिसिस) के आधार पर चीनी, पाकिस्तानी एजेंसियों और हिजबुल आदि को भी लेह, लद्दाख, कश्मीर, पंजाब, राजस्थान आदि बॉर्डर पर देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने का काम मिल जाएगा।” (बहुत से लोग तब तक इस नूतन प्रयोग की वाहवाही भी करेंगे, जब तक कि देश पर साक्षात चीन या पाकिस्तान का कब्जा न हो जाए।)

सुरक्षा के साथ खिलवाड़ साबित होगी कोई भी नई व्यवस्था

अब तक का यह अनुभव रहा है कि बीपी/टीएडीके माध्यम से आने वाले लोग कैटेगिरी चेंज होने पर जिस जिस विभाग में काम करते हैं, वे सबसे ज्यादा बेहतर, अनुशासित और कर्मठ मानव संसाधन सिद्ध हुए हैं। किसी और माध्यम से यह व्यवस्था थोपने पर यह न सिर्फ घातक सिद्ध हो सकती है, बल्कि अधिकारियों और उनके परिवारों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ भी होगा।

इसके कई उदाहरण मौजूद हैं। 2004 में इटारसी डीजल लोको शेड में तैनात रहे एक सीनियर डीएमई की घर में अकेली पत्नी की हत्या बंगला प्यून ने ही की थी। इसी प्रकार दक्षिण मध्य रेलवे की लालागुड़ा वर्कशॉप में पदस्थ रहे एक अधिकारी का परिवार बंगला प्यून की क्रूरता के चलते ही अकारण मौत के मुंह में समाकर बरबाद हो गया था।

इसी तरह जब तक रेलवे में रेल से जुड़े लोगों की बहाली होती रही अथवा ट्रेड अप्रेंटिस के माध्यम से स्किल्ड मानव संसाधन लाया जाता रहा, तब तक रेलवे का काम सुचारु रूप से चलता रहा। परंतु जब से यस व्यवस्था खत्म करके राजनीतिज्ञों के फायदे के लिए आरआरबी/आरआरसी जैसी भ्रष्टतम व्यवस्था के माध्यम से कथित पढ़े-लिखे लोगों को लाया जाने लगा, तब से उनसे काम लेना रेल अधिकारियों के लिए न सिर्फ एक बड़ा सिरदर्द साबित हुआ है, बल्कि रेलवे सहित रेलयात्रियों की भी संरक्षा और सुरक्षा हर स्तर पर प्रभावित हुई है।

जब वर्तमान व्यवस्था में, जहां सब कुछ जांच-परखकर किया जाता है, वहां जब अधिकारी और उनका परिवार सुरक्षित नहीं है, तब आरआरसी/आरआरबी जैसी महाभ्रष्ट व्यवस्था से आने वाले किसी अनजान, अज्ञात आदमी को रखे जाने पर क्या स्थिति हो सकती है, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

पहले आरआरसी से भर्ती लोगों से काम तो करवा लें रेलमंत्री

अधिकारियों का कहना है कि कुछेक विभागों, जिनमें सरप्लस मैनपावर है, उनके कुछ अधिकारियों को छोड़ कर बाकि सभी अधिकारियों की दिनचर्या सिर्फ एकमात्र टीएडीके के ऊपर ही निर्भर होती है। उनका कहना है कि रेलमंत्री पहले तो आरआरसी आदि से ट्रैकमैन, हेल्पर खलासी आदि के लिए बहाल हुए लोगों से ही व्यवस्थित काम करावा लें, वही बहुत होगा। इसके बाद ही आरआरसी, कांट्रेक्ट और आउटसोर्सिंग एजेंसियों से टीएडीके लगाने पर विचार करें! धीरे से उनका यह भी कहना है कि मंत्री जी शायद इसमें भी किसी पार्टी कार्यकर्ता या अपने सहयोगी को घुसाने की सुविचारित दीर्घावधि योजना की संभावना तलाश रहे हैं। जैसा कि उन्होंने ईएनएचएम आदि जैसी भ्रष्टाचार पैदा करने वाली कई अन्य नई योजनाओं को लागू करके किया है।

रेल परिवार के सामने “विलेन” बन गए मंत्री और सीआरबी

उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस एक निर्णय ने एक ही झटके में रेलमंत्री और सीआरबी “वीकेन यादव” को हर रेल अधिकारी के घर में “विलेन” के रूप में खड़ा कर दिया है। अब तक तो वे उन्हें वर्षों से स्थापित और सुचारू रूप से चल रही रेल व्यवस्था को सिर्फ तोड़ते-फोड़ते और बरबाद करते हुए ही देख रहे थे। उनको यह अंदाजा नहीं था कि रेलमंत्री और सीआरबी उनके घरों में घुसने की इस निम्नता अथवा अनैतिकता तक भी उतर सकते हैं!

जिनके घर शीशे के होते हैं, वह दूसरों के घरों में पत्थर नहीं फेंकते!

रेलवे बोर्ड के कई अति वरिष्ठ उच्च अधिकारी और हाल ही में बोर्ड से रिटायर हुए मेंबर्स, जिन्होंने काफी नजदीक से वर्तमान रेलमंत्री को देखा है और उनकी कार्यशैली को भली-भांति जानते हैं, का मानना है कि शायद इस घटना के कारण रेलमंत्री को ये सीख मिल जाए कि, “जिनके खुद के घर शीशे के होते हैं, उन्हें दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए।”

उनका कहना है कि, “क्योंकि यह मनुष्य की प्रकृति है कि वह तब तक सिर झुकाकर सब कुछ बर्दास्त करता है, जब तक वह देखता है कि उसका असर उसके परिवार, उसकी गरिमा या स्वाभिमान पर नहीं पड़ रहा, लेकिन जब इस सब पर असर पड़ने लगता है, तब छोटा से छोटा तथा कमजोर से कमजोर आदमी भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूरी ताकत से उसका प्रतिकार करता ही है।”

किसके लिए काम करती है मंत्री के साथ लगी फौज?

कई रेल अधिकारियों का कहना है कि अधिकांश रेल कर्मचारी और अधिकारी जो भी काम करते हैं, वह तो रेल के लिए और देश के लिए करते हैं। लेकिन रेलमंत्री तो सिर्फ अपने परिवार (कार्यकर्ताओं) के लिए ही काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि “भारत सरकार में ये पहले कॉर्पोरेट स्टाइल में काम करने वाले मंत्री हैं, जो सिर्फ रेल मंत्रालय में ही अपने 70 आदमियों की एक बड़ी फौज अपने साथ रखे हुए हैं, बाकी दो मंत्रालय और भी हैं उनके पास। हालांकि यह बात अलग है कि ये बहुत कुछ करते हुए दिखाई देते हैं, जिसमें रेलवे की स्थापित कार्यशैली और रेलकर्मियों एवं अधिकारियों को मिली सुविधाओं से सौतिया डाह के चलते उन्हें बदनाम करने की मात्रा ही ज्यादा रही है, पर जमीनी स्तर पर इनसे आज तक कुछ किया नहीं जा सका है।”

वह आगे कहते हैं कि, “स्पष्टतः रेलमंत्री के साथ लगी निजी लोगों की यह बड़ी फौज उनकी व्यक्तिगत पसंद के, व्यक्तिगत कारणों से और व्यक्तिगत तथा पारिवारिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही तो है। यह फौज रेल के लिए तो कतई काम नहीं कर रही और न ही देश के लिए कर रही है, तो आखिर अपनी इस फौज को किस महान कार्य पर लगा रखा है रेलमंत्री ने?” यह उनका सीधा सवाल है।

उनका कहना है कि अगर मंत्री के ही तर्कों का सहारा लिया जाए, तो रेलवे के 14 लाख लोगों में से रेलवे और देश के काम के लिए बड़ी आसानी से उपयुक्त और उपयोगी आदमी ढूंढे जा सकते हैं, इस सच्चाई के अलावा कि मंत्री आधिकारिक तौर पर अपनी पसंद से 5/6 लोगों को रख सकते हैं।

फेल होने की राह पर अग्रसर रेलमंत्री

यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि मंत्रियों और सांसदों में तब इस बात को लेकर कितनी नाराजगी थी, जब वैयक्तिक सहायक के रूप में प्रधानमंत्री ने कुछ मानक निर्धारित कर दिए थे और संघ से जुड़े लोगों को वरीयता दी जाने लगी थी। लेकिन फिर भी बाकी कौन होंगे, क्यों होंगे, कैसे होंगे, तब तुम घर पर उससे काम करवा सकोगे या साथ रखोगे, इसे प्रधानमंत्री ने रेलमंत्री के जैसी सैडिस्टिक मानसिकता से निर्देशित नहीं करवाया, क्योंकि यदि वे ऐसा करते तो शायद अब तक पार्टी में भयंकर विद्रोह हो गया होता और पार्टी खत्म होने के कगार पर कब की पहुंच गई होती। अधिकारियों का स्पष्ट मानना है कि अपने ऐसे ही सहायकों की वजह से इनके पहले वाले मंत्री फेल हुए थे और अब यह भी इसी वजह से उसी राह पर अग्रसर हैं।

आने वाले समय में सबसे कमजोर नब्ज साबित होगा रेल मंत्रालय

कई अधिकारियों और कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों का कहना है कि अभी तक तो दूसरे मंत्रालय के भ्रष्टचार की चर्चाएं होती थीं, लेकिन अब अगर कोई दूसरी सरकार आएगी, तो इस सरकार की सबसे कमजोर नब्ज रेल मंत्रालय ही होगा, क्योंकि जिस तुगलकी तरीके से इसको तहस-नहस किया जा रहा है, और जिस मनमाने तरीके से रेलवे को और इसकी गतिविधियों तथा संसाधनों को तोड़-मरोड़कर बेचा जा रहा है, वह स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा सुनियोजित घोटाला है, जिसकी सीधी मार इस देश की आम जनता पर पड़ेगी और फिर क्रमिक जांचों की शुरुआत रेल मंत्रालय से ही होगी।

कुछ अधिकारियों का यह भी कहना था कि इस सरकार को इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि तमाम दुश्वारियों के बावजूद भी अधिकांश लोग राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री मोदी के साथ खड़े हैं, लेकिन इस तरह के निर्णय से ये लोग बाध्य किए जा रहे हैं कि वे इस सरकार के विरुद्ध सिर्फ कुछ बोलें ही नहीं, बल्कि कुछ पुख्ता करें भी। और यही अथवा ऐसी ही कुछ अन्य साजिशें रेल मंत्रालय चला रहे लोगों द्वारा सरकार के खिलाफ की जा रही हैं। 

अंततः इस बात का ख्याल रेलमंत्री और सीआरबी को होना ही चाहिए कि “सब दिन होत न एक सामना!”

क्रमशः पढ़ें – “एक छत के नीचे कैसे चल रही है आरपीएफ में दोहरी व्यवस्था!”





Source link

“प्रकृति के कायदे में रहोगे, तो हमेशा फायदे में रहोगे!” – RailSamachar

“पहली बार मुझे अपनी कालोनी में सभी मुझसे बड़े देशभक्त, जिम्मेदार, जज्बाती और मानवीय संवेदनाओं की कद्र करने वाले लोग नजर आए”

Railway Samachar

#Mumbai #Locals also give #SALUTE to #PMModi at 5pm on 22nd March

<div class=”player-unavailable”><h1 class=”message”>An error occurred.</h1><div class=”submessage”><a href=”http://www.youtube.com/watch?v=xC3a2cIOsFE” target=”_blank”>Try watching this video on www.youtube.com</a>, or enable JavaScript if it is disabled in your browser.</div></div>

“रविवार, 22 मार्च को 5 बजे शाम को 5 मिनट का दृश्य अत्यंत अभिभूत करने वाला था। जहां मोबाइल और सोशल मीडिया ने हमें एक-दूसरे के प्रति धरातल पर पूरी तरह असंवेदनशील बना दिया है, वहां आभार व्यक्त करने की इस अभिव्यक्ति में जिस तरह से हर घर, हर झरोखे से लोगों ने अपनी सहभगिता दिखाई; वह बताता है कि हमारी भावनाओं का, संवेदनाओं का, संस्कारों का श्रोत अभी भी अंदर जीवन्त है, स्पंदित है।”

दिल्ली की पंचकुईंयां रोड उर्फ पी. के. रोड स्थित रेलवे ऑफिसर्स कॉलोनी, जहां उत्तर रेलवे और रेलवे बोर्ड के तमाम बड़े अफसर रहते हैं, में निवास करने वाले एक बड़े रेल अधिकारी ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा, “आज पहली बार मुझे अपनी कालोनी में सभी मुझसे बड़े देशभक्त, जिम्मेदार, जज्बाती और मानवीय संवेदनाओं की कद्र करने वाले लोग नजर आए।”

उन्होंने कहा, “आज पहली बार मुझे महसूस हुआ कि मैं सिर्फ मोटी-मोटी कंक्रीट की दीवारों और दड़बों के अंदर नहीं रहता हूं, जहां हम अपने-अपने स्वरचित अहंकार और दम्भ में एक-दूसरे को देखकर भी नहीं देख पाते हैं। एक-दूसरे की भावनाओं, दुःख-सुख को समझना तो बहुत दूर की बात थी। अब ये सारे लोग सचमुच अपने लगने लगे हैं। सबके लिए कुछ करने का मन करता है।भावविह्वलता में खुलकर रुदन करने का मन करता है।”

वह कहते हैं, “शायद मेरे ही ऐसे भाव नहीं है, मैंने देखा कि जब हमारे यहां घण्टा-घड़ियाल, तालियां, शंख आदि की आवाज बंद हुई, तो कोयल की कूक ने उसकी जगह ले ली। इस मौसम में दिल्ली के दिल ‘कनॉट प्लेस’ के इस कंक्रीट के जंगल में पहली बार कोयल की आवाज मैंने सुनी। मानो वह भी हमारी इस भावनात्मक और आत्मिक एकजुटता पर आह्लाद से भर गई हो।”

उसी तन्मयता से वह आगे कहते हैं, “क्योकि मनुष्य की एक-दूसरे के प्रति और प्रकृति के प्रति घोर उपेक्षा का दुष्परिणाम मनुष्य बाद में भुगतता है, निरीह जीव-जंतु पहले भुगतते हैं। क्योंकि हम पर होने वाले किसी भी नुकसान को अपने ऊपर पहली पंक्ति के तौर पर यही मूक और निरीह जीव-जंतु झेलते हैं।”

“शायद इसीलिए कोयल अपने लिए कम, हम सबके लिए ज्यादा खुश होकर कूक रही थी। अपने अंडे कौव्वों के घोंसलों में रखने वाली कोयल शायद आज हमारे बच्चों के लिए खुश हो रही थी, क्योंकि आज पहली बार हमने अपनी इस एकजुटता से उसे यह भरोसा दिलाया कि हम किसी भी विषम परिस्थिति से लड़ सकते हैं और निश्चित तौर पर जीत भी सकते हैं।”

वह कहते हैं, “बाद में उड़ते-उड़ते वह यह भी भरोसा दिला गई कि इसी एकजुट भाव से रहोगे, तो कोई भी समस्या कभी तुम्हारा बाल-बांका नहीं कर सकती है, और यदि रहा-सहा कुछ कष्ट बचेगा भी, तो अगले हफ्ते मातारानी तो नवरात्रा में आ ही रहीं हैं सारे कष्टों के मूल का सर्वनाश करने के लिए! इसलिए प्रकृति के कायदे में रहोगे तो हमेशा फायदे में रहोगे!!”

#PKRoadRailwayColony #Delhi #Covid19 #CORONA








Source link

रेल अधिकारी अपनी कुलबुलाहट को नियंत्रित रखकर सिर्फ पीएमओ के आदेशों का पालन करेंगे तो देश का ज्यादा भला होगा!

सीआरबी को अपने ‘क्रिटिकल उद्देश्य’ की पूर्ति के लिए पीएफटी, सीटीओ/एसीटीओ को काम पर लगाना चाहिए !!

“Railway is doing again the same blunder which it has done by running several special trains from Mumbai”

Suresh Tripathi

शुक्रवार, 28 मार्च को चेयरमैन, रेलवे बोर्ड  श्रीमान विनोद कुमार यादव ने सभी जोनल रेलों के जनरल मैनेजर्स को लिखित मोबाइल संदेश भेजकर कथित क्रिटिकल आइटम्स की ढुलाई शुरू करने की ‘एडवाइस’ दी है। हालांकि ये कौन से क्रिटिकल आइटम हैं, इनकी परिभाषा सीआरबी महोदय ने स्पष्ट नहीं की है। यह संदेश एक उच्च स्तरीय रेल अधिकारी से ‘रेलसमाचार’ को प्राप्त हुआ है। यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत है ‘सुज्ञान’ सीआरबी महोदय का वह संदेश:

Dear GMs

Good Evening. Let me compliment every one. We are doing very good. I will like to make a request to all of you on a very important issue in present context. Transportation of critical items, many of these in small parcel sizes, is going to be very important in the next few days to mitigate the effects of the lockdown. With VPs, SLRs, locomotives and paths  available, GMs may explore running  timetabled parcel trains on identified  routes. Railways may announce their planning and seek prospective  customers through suitable notification  to assess demand and start such services. Feedback on the action taken may be advised. AM/Commercial and PED/chg will coordinate from the Board.

Regards 

Vinod

सीआरबी महोदय जिस तरह अपने संदेश में खाली पड़ी वीपी, एसएलआर, लोकोमोटिव और रेलवे पाथ की उपलब्धता का उल्लेख कर रहे हैं, उससे जाहिर है कि वह इन सबकी इफरात उपलब्धता का उपयोग करके छूत की महामारी की गंभीरतम स्थिति में भी कुछ अतिरिक्त लाभ कमा लेने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं। परंतु उनकी इस अनुभवहीनता या बनियागीरी अथवा बनिया-नीति का खामियाजा देश को और रेलकर्मियों को जिस बड़े पैमाने पर भुगतना पड़ सकता है, रेलवे की इस अतिरिक्त कमाई के लालच में उन्हें शायद इस बात का कोई अंदाजा नहीं है।

रेलवे के गहन अनुभवी और जानकारों का मानना है कि “ऐसे गंभीर समय में कुछ अति उत्साही अफसरों से उनका विनम्र आग्रह है कि वे अपने अंदर कुलबुलाते कीड़ों को कुछ दिन शांत रखें तथा इस तरह के बचकाने आइडिया, सुझाव और आदेश देने से बचें, नहीं तो अभी-अभी उनके मुंबई से स्पेशल चलाने की होशियारी दिखाए जाने से आने वाली तबाही से उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल आदि के लोग अगर बच जाएं, तो फिर यह पलीता भी लगा देना, लेकिन भगवान के लिए आप अपने घर पर, अपने अंदर बैठे जन्मजात कीड़े के साथ, कुछ दिन शांति से बैठे रहेंगे, तो उससे देश का ज्यादा भला होगा।”

इसके साथ ही उनका यह भी कहना था कि “यदि सीआरबी को कथित क्रिटिकल आइटम्स की ढुलाई ही करनी है, तो यह एकदम सही समय है, जब इसके लिए प्राइवेट फ्रेट टर्मिनल्स (पीएफटी), सीटीओ, एसीटीओ को काम पर लगाया जाए।” उनका कहना है कि कम से कम इसी बहाने सरकार को ये तो पता चल जाए कि सरकारी गतिविधियों का निजीकरण उर्फ प्रावेटाइजेशन कितना सही है और राष्ट्र की विषम परिस्थितियों में ये कितना सक्रिय योगदान दे रहें हैं या दे सकते हैं।

A retired COM and a CCM, when asked their opinion on this subject, openly said, “PFTs & CTOs are well equipped or they can develop methodology in no time to carry the essential consignment with minimum risk of spreading”.

“It will not augur well if it is done by Rly parcel. It will create more problem than the solution. It will make the station crowded place and deployment of staffs will be needed as per the activity. Moreover package will be potential career to spread the pandemic making railway station an epicenter for this. And again railway is doing the same blunder which it has done by running several special trains from Mumbai and other Cities”, they said.

https://twitter.com/kanafoosi/status/1243888390707142658?s=19

उन्होंने कहा कि “इसके अलावा यह भी देखने में आया है कि कई जगह पर सैनिटाइजर के नाम पर स्पिरिट और अल्कोहल का धंधा शुरू हो गया है। इनकी कालाबाजारी को कई शहरों में पुलिस ने उजागर किया है। ऐसी गंभीर स्थिति में रेलवे में हर पार्सल पैकेट को खोलकर यह कौन सुनिश्चित करेगा कि उसमें सिर्फ ‘क्रिटिकल आइटम’ ही भेजा जा रहा है और वही चीज जा रही है, जो पार्टी ने डिक्लेयर किया है।”

उन्होंने स्पष्ट कहा कि सीआरबी की उक्त अनुभवहीन ‘एडवाइस’ प्रधानमंत्री के लॉकडाउन को धता बताने वाली है। उन्होंने रेल मंत्रालय से यह अनुरोध भी किया है कि “#कोविद-19 से संबंधित किसी भी मामले में अपने से कोई पहल न करे और न कोई सुझाव दे। पीएमओ पर सबको भरोसा है, क्योंकि वहां पर स्थितियों के आकलन के आधार पर जिस मंत्रालय को जैसा निर्देश देना है, वैसा देने पर ही कोई कार्यवाही करें, अन्यथा फिर से समझ लें कि रेलवे के बचकाने निर्णयों से जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई कोई नहीं कर पाएगा और तब स्थितियां किसी के संभालने मान की भी नहीं रहेंगी!”

एक रिटायर्ड एडीशनल मेंबर/कमर्शियल का कहना है कि “जब गुड्स ट्रेनें चल रही हैं, और अत्यावश्यक जिन्सों की ढुलाई तत्परता से की जा रही है, तब इस तरह की भयावह परिस्थिति में पार्सल ट्रैफिक को खोलने के इस तरह के आदेश का कोई औचित्य ही नहीं बनता है। यह आत्मघाती और जानलेवा साबित होगा।” उनका यह भी कहना था कि पीएमओ को सीआरबी की इस आदेश का तुरंत संज्ञान लेकर आवश्यक कदम उठाना चाहिए, क्योंकि यदि इस पर अमल हुआ तो महामारी को और ज्यादा फैलने से रोक पाना काफी मुश्किल हो जाएगा।

जानकारों का मानना है कि अभी ये 10-15 दिन काफी क्रिटिकल हैं। इस दौरान लोग जितना ज्यादा समय घर में रहेंगे, उतना ही वे न सिर्फ सुरक्षित बचेंगे, बल्कि देश का भी बहुत भला करेंगे, लेकिन इसी दौरान रेलवे अपनी अनावश्यक गतिविधियों से पैनिक क्रिएट कर रही है।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पता चला है दक्षिण रेलवे से एक पीसीईटी चलाई जा रही है, जिसमें क्रिटिकल आइटम नहीं, बल्कि बीज की लोडिंग होगी और जिसकी जरूरत फिलहाल तो बिल्कुल भी नहीं है और जब भी होगी, वह मई-जून के बाद ही होगी।

तथापि जिस राज्य को यह बीज भेजा जा रहा है, उस राज्य ने यदि इसे क्रिटिकल माना होता, तो वह भारत सरकार से आग्रह करता, तब सरकार उसके लिए रेल चलाती, तो यह समझ में आने वाली बात होती। लेकिन इसका फायदा कुछ शातिर बिजनेस घराने उठाने की कोशिश में लग गए हैं। अनुभवी जानकारों का मानना है कि पैसा कमाना भी रेलवे के लिए जरूरी है, परंतु ऐसे समय में नहीं, जब एक छूत की महामारी के चलते देश में युद्ध जैसे हालात पैदा हो गए हैं, यह बात उन व्यापारियों को भी समझना चाहिए, जिनकी बदौलत सीआरबी की यह एडवाइस सामने आई है।

इस बीज वाली पीसीईटी को चलाने के निर्णय पर कोई यह पूछने वाला नहीं है कि इस समय जब मजदूर और ट्रक उपलब्ध ही नहीं हैं, तब कितने दिनों तक पार्टी रेक खाली करने के नाम पर स्टेशन या गुड्स शेड में लाइन और जगह घेर करके रखेगी? जबकि मात्र गुड्स ट्रेनों के संचालन में भी लाइन पर भारी कंजेशन की दुहाई देकर जोनल रेलों द्वारा मंगाए जा रहे खाली रेक हफ्ते भर में भी उनके गंतव्य पर नहीं पहुंचाए जा पा रहे हैं।

अभी तो स्ट्रेटेजी यह होनी चाहिए कि रेलवे के पार्सल स्पेस और स्टॉक खाली रहें, क्योंकि अगर अगले हफ्ते से हालात ज्यादा बिगड़ने शुरू होते हैं, तब सरकार को तुरंत हर जगह क्रिटिकल और एसेंसियल आइटम की सप्लाई शुरू करने की जरूरत पड़ेगी और जब इस सबके लिए स्टेशनों एवं टर्मिनल्स पर पर्याप्त जगह ही उपलब्ध नहीं होगी, तब क्या किया जाएगा?

वैसे भी आवश्यक गुड्स में केवल क्रिटिकल एवं एसेंसियल आइटम्स की ही लोडिंग और सप्लाई की अनुमति दी जानी चाहिए थी, जैसे कोयला, खाद्यान्न और खानपान संबंधी सामग्री तथा मेडिकल इक्विपमेंट्स एवं दवाईयां इत्यादि।

परंतु प्रत्यक्ष देखने में यह आ रहा है कि इसमें सीमेंट, स्टील, खाद आदि जैसे नॉन-क्रिटिकल आइटम्स की लोडिंग भी शुरू कर दी गई, जबकि वर्तमान स्थिति में ऐसी सभी गैर-जरूरी (नॉन-क्रिटिकल/नॉन-एसेंसियल) वस्तुओं की ढुलाई पर रोक लगा दी जानी चाहिए थी, क्योंकि अब अधिकांश टर्मिनल और गुड्स शेड को ये लोग घेर कर खड़े हो रहे हैं और इनके चलते रेलवे इस गंभीर स्थिति में बुरी तरह और भारी मुसीबत में फंसने के हालात खुद पैदा करने जा रही है।

https://twitter.com/kanafoosi/status/1243873573858500614?s=19

https://twitter.com/kanafoosi/status/1243883051177803777?s=19








Source link

कहीं निजी घाटे की पूर्ति करने के लिए तो नहीं दी जा रही प्राइवेट ऑपरेटरों को अनुमति?

लेकिन ‘विभागवाद’ से ओतप्रोत चेयरमैन, रेलवे बोर्ड (सीआरबी) विनोद कुमार यादव के दांव-पेंच से वंदेभारत को बनाने वाले रेल अधिकारियों पर निहित उद्देश्य से विजिलेंस इंक्वायरी अभी भी चल रही है। इसके चलते एक तरफ जहां रेल अधिकारियों में भारी हताशा व्याप्त है, तो दूसरी ओर देश-विदेश में इन अधिकारियों सहित भारतीय रेल का भी मखौल उड़ाया जा रहा है।

https://twitter.com/sritara/status/1237728058091528192?s=19

मात्र 97 करोड़ की लागत से बनी नई दिल्ली-वाराणसी 22435/22436 वंदेभारत एक्सप्रेस ने एक वर्ष में 115% ऑक्यूपैंसी के साथ 92 करोड़ की कमाई की। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या कोई प्राइवेट ट्रेन ऑपरेटर इससे अच्छी, सस्ती और लाभदायक सेवा दे सकता है? फिर भारतीय रेल के निजीकरण और इम्पोर्ट की ऐसी ताबड़तोड़ जल्दी क्यों है?

खबर है कि 38000 करोड़ की लागत से 60 ट्रेनसेट आयात करने और उससे मोटा कमीशन खाने की योजना जब मीडिया में लीक हो गई, तब देश की आंखों में धूल झोंकने के लिए 44 वंदेभारत रेक बनाने की अनुमति आईसीएफ को दी गई। परंतु इसके लिए जो टेंडर निकाला गया है, बताते हैं कि वह कभी फाइनल नहीं होने वाला है। प्राप्त जानकारी के अनुसार हाल ही इस संबंध में रेलवे बोर्ड में हुई बैठक में कोई सहमति नहीं बन पाई, बल्कि संबंधित अधिकारियों और वेंडर्स के बीच कुछ तथ्यों को लेकर गरमागरम बहस अवश्य हुई।

बताते हैं कि जीएम/आईसीएफ में इतना साहस नहीं है कि वह इस टेंडर को फाइनल कर सकें। विश्वसनीय सूत्रों का तो यह भी कहना है कि ऊपर से दबाव डाले जाने पर भी वह यह काम नहीं कर पाएंगे। एक अपुष्ट खबर यह भी है कि पहले सिर्फ 10 रेक बनाने की अनुमति दी गई थी, मगर प्रोपल्शन सिस्टम उपलब्ध कराने वाली कंपनी से जब मोटे कमीशन की डिमांड की गई, तब उसने रेक की संख्या बढ़ाने की मांग कर दी। बताते हैं कि इस तरह 10 रेक को बढ़ाकर 44 रेक किया गया।

सूत्रों का कहना है कि अब यह 44 रेक का टेंडर भी कभी फाइनल नहीं होगा, क्योंकि पहले वाली आयात योजना मीडिया के कारण फेल हो जाने से कमीशन का जो भारी निजी घाटा हुआ है, उसकी भरपाई प्राइवेट ऑपरेटरों को ट्रेनसेट आयात करने की अनुमति देकर की जा रही है।

देश में इस समय करीब 10 करोड़ युवा बेरोजगार हैं और यह बेरोजगारी लगातार बढ़ती जा रही है। रेल मंत्रालय ने भर्ती के नाम पर बेरोजगारों से फार्म भरवाकर पिछले एक साल से भी ज्यादा समय से उनकी 1000 करोड़ रुपये से भी अधिक की राशि हड़प रखी है। परंतु एक साल से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद इस भर्ती की कोई तारीख घोषित नहीं कर सका है।

https://youtu.be/0tsBT7SWLdw

महात्मा गांधी ने विदेशी उत्पादों के बहिष्कार से इंग्लैंड के उद्योगों की कमर तोड़ डाली थी, देशी खादी को बढ़ावा दिया था और ब्रिटिश-शासन को उखाड़ फेंका था। लेकिन ‘अति-समझदार’ रेलमंत्री पीयूष गोयल और ‘नासमझ’ सीआरबी विनोद कुमार यादव स्वदेशी रेल उद्योग को नष्ट करके निजी रेल कंपनियों के माध्यम से ट्रेनसेट इंपोर्ट करने पर आमादा हैं। जबकि देश में करोड़ों युवा बेरोजगारी के कारण इधर-उधर भटक रहे हैं।

Uncertainty on Cadre-Merger issue

Does CRB VKYadav think before he leaps? He has quite obviously misled the Cabinet.

Now he say that officers will be permitted to remain in their “own” cadres since IRMS is not legally enforceable. Were Law Ministry, DOPT and UPSC consulted before making the Cabinet note?

What does mean Mr BACKTRACKER

On Cadre-Merger CRB VKYadav initially claimed that none would suffer, then he backtracked & said that some people may lose & some gain. Now in a complete reversal he says that officers need not opt for IRMS.

https://twitter.com/kanafoosi/status/1228955966814572544?s=19

#CRB #VKYadav #CadreMerger #IRMS #DoPT #UPSC #Cabinet #TrainSet #Vandebharat #IndianRailway #PiyushGoyal #PMO #PMOIndia 





Source link

वो सब तो ठीक है, मगर परनाला तो यहीं गिरेगा, यानि प्रशासन सुनेगा फेडरेशनों की, पर करेगा अपने मन की!

सुझाव लेना और उन पर अमल करना दो अलग मुद्दे हैं, सुझाव लेने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए -रेलमंत्री

रेलवे का निजीकरण नहीं होगा और हर मुद्दे पर कोई अंतिम फैसला न होने की बात कहकर रेलमंत्री ने छुड़ा लिया अपना पिंड

दोनों फेडरेशनों के साथ रेलमंत्री की रेल भवन में संपन्न हुई डिपार्टमेंटल काउंसिल की बैठक

बुधवार, 16 जनवरी को रेल भवन में रेलमंत्री पीयूष गोयल के साथ डिपार्टमेंटल काउंसिल की बैठक हुई। इस बैठक में एनएफआईआर के महामंत्री डॉ एम राघवैया, अध्यक्ष गुमान सिंह, एआईआरएफ के महामंत्री कॉम. शिवगोपाल मिश्रा, एल. एन. पाठक इत्यादि सहित दोनों मान्यताप्राप्त फेडरेशन के सभी वरिष्ठ पदाधिकारीगण उपस्थित थे।

रेलमंत्री की उपस्थिति में फेडरेशन के नेताओं ने स्पष्ट रूप से कहा कि आज रेलवे का हर एक कर्मचारी और अधिकारी डरा हुआ है, क्योंकि कभी बड़ी संख्या में कर्मचारियों को निकालने की बात हो रही है, तो कभी  निजीकरण और निगमीकरण की बात कही जा रही है, इससे उनके काम पर भी असर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि इस सब की मुख्य वजह संवादहीनता है, जिसके चलते भारतीय रेल में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। अगर निजीकरण और निगमीकरण की बात  हुई, तो उनके सामने रेलवे का चक्का जाम करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता है।

इस पर रेलमंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारतीय रेल तयशुदा नियम-कायदों से चलती है, अखबारों में छपी खबरों के आधार पर उन्हें कोई राय नहीं बनानी चाहिए। उन्होंने कहा कि हमने संसद से लेकर आम बैठकों में भी कहा है कि भारतीय रेल का किसी भी हाल में निजीकरण नहीं होगा। प्रिटिंग प्रेस के मामले में एक उच्चस्तरीय टीम  स्टडी करेगी, इसके बाद फेडरेशन/यूनियन के साथ फिर बैठक करके ही कोई निर्णय लिया जाएगा। यूनियनों की मान्यता का चुनाव फरवरी में कराने का निर्णय भी लिया गया।

ज्ञातव्य है कि गत दिनों हुई परिवर्तन संगोष्ठी और उसमें  आए सुझावों पर एनएफआईआर ने तीखा विरोध जताया था। इस पर रेलमंत्री ने कहा कि वैसी ही एक और संगोष्ठी कर ली जाएगी, इसके लिए ही आज यह विशेष डिवीजनल काउंसिल की बैठक बुलाई गई है। इस बैठक में एनएफआईआर के महामंत्री डॉ एम राघवैया ने सभी विषयों पर गंभीरतापूर्वक अपनी बात रखी।

फेडरेशन के नेताओं ने कहा कि जो हालात हैं, उनमें किस किस बात की चर्चा की जाए। आज एकतरफा फैसले लिए जा रहे हैं, जबकि 74 की हडताल के बाद कुछ बातें तय हुईं थीं, जिसमें प्रेम की बैठक के जरिए हर विवादित मामले को सुलझाने की बात हुई थी, लेकिन आज सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि हर स्तर पर संवादहीनता बढ़ती जा रही है। उन्होंने कहा कि जब भी रेलमंत्री से समय मांगा जाता है वो तुरंत बात करते हैं, लेकिन एक जो व्यवस्था बनाई गई है उसका पालन नहीं हो रहा है, जिसकी वजह से तरह-तरह की बातें हो रही हैं।

उन्होंने कहा कि आज यह जो चर्चा हो रही है कि 30% स्टाफ कम करने का फैसला लिया गया है, इससे हर एक कर्मचारी पूरे समय इन्हीं बातों पर चर्चा कर रहा है, उसके अंदर डर पैदा हो गया है। इससे उसकी कार्यक्षमता पर भी स्वाभाविक रूप से असर पड़ रहा है। एक तरफ खुद प्रधानमंत्री लालकिले से वंदे भारत ट्रेन की बात कहकर रेलकर्मियों की प्रशंसा करते हैं, दूसरी तरफ उत्पादन इकाईयों के निगमीकरण की  बात की जा रही है।

उन्होंने कहा कि तेजस जैसी ट्रेन को निजी हाथों में सौंपकर उन्हें यात्रियों से मनमानी किराया वसूलने की छूट दी जा रही है, जबकि दिल्ली से लखनऊ के बीच चल रही शताब्दी एक्सप्रेस तेजस से मात्र पांच मिनट पीछे पहुंचती है। अब 150 ट्रेनों का निजीकरण करने की बात शुरु हो गई है। यही नहीं, तेजस के पहले 15 मिनट तक कोई ट्रेन आगे नहीं चलेगी।

उन्होंने कहा कि सवाल ये है कि रेल की पटरी हमारी, बोगी हमारी, लोको हमारा, मेंटीनेंस हमारा, लोको पायलट, स्टेशन मास्टर, केबिन, प्लेटफार्म सब हमारा, सिर्फ मुनाफा प्राईवेट आँपरेटर का हो, यह कैसा समझौता है? उनका कहना था कि इन स्थितियों में तो हमारी ट्रेनों के दुश्मन खुद हमें ही बनाया जा रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर पैसा ही कमाना मकसद है, तो रेल को भी मनमानी किराया वसूलने और स्टापेज तय करने के अधिकार दे दे दिए जाएं, हम उनसे बेहतर आमदनी करके दिखाएंगे।

उन्होंने कहा कि हम भारतीय रेल में सुधार के मद्देनजर नीति आयोग के जो सुझाव हैं, हम हर सुझाव पर उसके खिलाफ नहीं हैं, ट्रेन की स्पीड बढ़ाई जानी चाहिए, वाई फाई, सुरक्षा, साफ-सफाई, ये सब हम भी चाहते हैं, लेकिन निजीकरण और निगमीकरण हमें कतई बर्दास्त नहीं है।

उनका कहना था कि ट्रेनों के संचालन में हर साल चार से पांच सौ कर्मचारी शहीद हो जाते हैं, इतनी मेहनत से हमारे कर्मचारी काम करते हैं, फिर भी हमें हमेशा नौकरी छिन जाने का डर दिखाया जाता है। उन्होंने कहा कि समय के साथ हमने भी बदलाव किया है। पहले स्टीम इंजन फिर डीजल अब इलेक्ट्रिक इंजन हमारे लोग चला ही रहे हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि कैडर मर्जर को लेकर अधिकारी वर्ग में काफी नाराजगी है। मर्जर का निर्णय लेने से पहले फेडरेशनों से कोई सलाह-मशवरा नहीं किया गया। उनका कहना था कि दोषपूर्ण मर्जर से सभी अधिकारियों में निराशा व्याप्त है। तमाम अफसर आईपीएस की नौकरी छोड़कर रेलवे की नौकरी करने आए हैं, अब उन्हें  भी नौकरी जाने का भय सता रहा है।

उन्होंने कहा, प्रिटिंग प्रेस के मामले में पहले जो फैसला हो चुका है कि पांच प्रेस बंद नहीं किए जाएंगे, उसका पालन किया जाना चाहिए। रेलवे प्रिटिंग प्रेस के कर्मचारी बड़ी मेहनत से काम करते हैं, लेकिन आज उन्हें भी बंद करने का फरमान जारी  किया गया है, यह गलत है। उन्होंने रेलमंत्री को याद दिलाया कि एनपीएस को खत्म कर पुरानी पेंशन बहाल करने की बात पहले भी की गई है।

उन्होंने रेलमंत्री से कहा कि, इसके लिए आवश्यक है कि प्रधानमंत्री से बात करके इस मामले का अविलंब समुचित समाधान किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि इस मामले में फेडरेशन ने दुनिया के 26 देशों में क्या व्यवस्था चल रही है, वह भी सौंपा था। आज भारतीय रेल में छह लाख से ज्यादा ऐसे कर्मचारी हैं जो गारंटीड पेंशन के दायरे में नहीं है। 1800 और 4600 ग्रेड पे के कर्मचारियों के पास प्रमोशन का ऑप्सन न होने पर भी विस्तार से बात की गई।

उन्होंने कहा कि परिवर्तन संगोष्ठी में कहा गया कि रेल संगठनों से जुड़े 50 हजार पदाधिकारी काम नहीं करते। इस परिवर्तन संगोष्ठी में अगर फेडरेशनों को भी आमंत्रित किया गया होता, तो इस तरह की एक तरफा बात नहीं होती। दोनों फेडरेशनों के पदाधिकारियों को सुनने के बाद रेलमंत्री पीयूष गोयल ने हर मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की और कहा कि भारतीय रेल में आप सभी हमसे सीनियर हैं। फिर भी आपको पता होना चाहिए कि रेलवे कायदे-कानूनों से चलती है, अखबारों में छपी खबरों के आधार पर हमें कोई राय नहीं बनानी चाहिए।

उन्होंने स्वीकार किया कि परिवर्तन संगोष्ठी में अगर फेडरेशनों को भी आमंत्रित किया गया होता तो और बेहतर नतीजे सामने आते। आगे से इसका ध्यान रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि फेडरेशनों के साथ लगातार संवाद को दोबारा चालू किया जाएगा। कोशिश होगी कि हर दूसरे महीने के किसी बुधवार को फेडरेशनों के साथ बात हो। उन्होंने प्रेम की बैठकों को भी नियमित करने की बात कही। गोयल ने कहा कि अफसरों की हर छह महीने में बैठक होती है, हमारी कोशिश होगी कि हर तीन महीने में फेडरेशनों के साथ जरूर बैठक हो।

रेलमंत्री ने पुनः कहा कि मैंने संसद में ही नहीं, हर मीटिंग में पूरी जिम्मेदारी के साथ कहा है कि भारतीय रेल का निजीकरण नहीं किया जाएगा। उन्होंने स्वीकार किया कि रेलवे के आधुनिकीकरण के लिए अगले 12 साल में 50 लाख करोड़ रुपये की आवश्यकता है। इसके लिए कुछ  लक्जरी ट्रेन प्राईवेट ऑपरेटर्स को देने की बात जरूर हुई है, लेकिन इससे किसी भी रेलकर्मचारी या अधिकारी पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है।

उन्होंने कहा कि भारतीय रेल में किराया बढ़ाना संभव नहीं है, क्योंकि आज हवाई जहाज का किराया काफी कम हो गया है, ऐसे में हमारे पैसेंजर वहां चले जाएंगे। हमें इस बात का भी ध्यान रखना है। रेलमंत्री ने कहा कि हमें 21वीं सदी की ओर देखना है, आप सब ने विदेशों में ट्रेनों को देखा है, हमारी कोशिश है कि हम भी वर्ल्ड क्लास ट्रेनों का संचालन कुशलता पूर्वक कर सकें। इसके लिए कुछ जरूरी काम तो करने पड़ेंगे।

परिवर्तन संगोष्ठी की चर्चा करते हुए रेलमंत्री ने कहा कि उसमें अधिकारियों के 12 समूहों ने कुछ सुझाव दिए हैं, लेकिन किसी पर भी अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है, उस संगोष्ठी के मीनिट्स तैयार किए गए हैं, उसी के आधार पर अखबारों से लेकर हर जगह कुछ बातें  हो रही हैं। जहां तक यूनियन पदाधिकारियों के काम न करने का सवाल है, ये बात तो किसी ग्रुप ने भी नहीं कहा था, ये किसी एक अधिकारी ने अपनी बात में शायद यह कहा था।

उन्होंने कहा कि हमने तो रेलवे के सभी 13 लाख कर्मचारियों से सुझाव मांगे थे। 430 सुझाव आए भी हैं, उसमें कई सुझाव काफी अच्छे हैं। इसमें 50 लोगों को बुलाकर सम्मानित भी किया गया। रही बात नीति आयोग के 100 दिन की कार्य-योजना की, तो उनका काम ही नीति बनाना और संबंधित महकमें को देना है। लेकिन उन सभी को लागू करने से पहले उन पर काफी विचार विमर्श किया जाता है। उनका कहना था कि हमें सुझाव लेने में परेशानी नहीं होनी चाहिए।

प्रिटिंग प्रेस के मामले में रेलमंत्री ने कहा कि इस पर हम विचार करेंगे, बात हुई है कि एक उच्चस्तरीय कमेटी से इसकी उपयोगिता पर स्टडी करा ली जाए। इसके बाद हर बिंदु पर फेडरेशनों के साथ बात करने के बाद ही कोई फैसला लिया जाएगा।

रेलवे बोर्ड चेयरमैन विनोद यादव ने कहा कि इस साल हमारे कर्मचारियों ने काफी बेहतर काम किया है, हमने रिकार्ड स्तर पर कोच और इंजनों का उत्पादन किया है, चूंकि इतनी बड़ी मात्रा में उत्पादन हुआ है तो हम इसके निर्यात का भी विचार कर रहे हैं। पिछले साल संरक्षा के मामले में भी हम काफी बेहतर रहे हैं। एक भी जानमाल की क्षति नहीं हुई है। उन्होंने भी भरोसा दिलाया कि ऐसा कोई काम नहीं होगा, जिससे किसी कर्मचारी का कोई नुकसान हो।

बहरहाल, एक बार फिर रेल प्रशासन दोनों फेडरेशनों को बरगलाने में कामयाब हो गया है। फेडरेशनों को लगभग हर मुद्दे पर दिए गए रेलमंत्री के जवाब से यह साफ जाहिर होता है। उनका यह कहना सही है कि सुझाव लेने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए, इन्हीं सुझावों पर वह निजी ट्रेनों को एक-एक करके संचालित करते जा रहे हैं, मगर फिर भी फेडरेशनों से कह रहे हैं कि हर सुझाव और हर मामले पर उनसे बात करके ही कोई अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

प्रिंटिंग प्रेस के विषय को भी वह कमेटी बनाने और स्टडी की बात कहकर टाल गए। अधिकारियों के कैडर मर्जर पर जहां रेलवे बोर्ड द्वारा यूपीएससी से सभी भर्तियों की इंडेंट्स वापस ले ली गई हैं, वहां भी उन्होंने अंतिम फैसला नहीं होने की बात कहकर अपना पिंड छुड़ा लिया। कहने का तात्पर्य यह है कि फेडरेशनों को सरकार की मंशा पर भरोसा करके भी किसी मुगालते में नहीं रहना चाहिए, क्योंकि सरकार को जो करना है, वह बेरोकटोक कर ही रही है।








Source link

अस्तित्व बचाना है तो रेल संगठनों और रेलकर्मियों को स्वत:स्फूर्त खड़ा होना होगा

नेताओं को निजी हित में सार्वजनिक संपत्तियों को बांटने की प्रवृत्ति से बाज आना चाहिए

यदि रेलवे को अधिक उपयोगी और उत्पादनकारी बनाना है, तो सबसे पहले रेलमंत्री उसे बनाया जाना चाहिए, जिसे रेलवे का पर्याप्त ज्ञान भी हो और वह सीधे जनता से चुनकर आया हो, जिससे जनता की सामान्य जरूरतों का उसे भान हो, जैसे स्वास्थ्य मंत्री या विदेश मंत्री को अपने अपने विभागों की जानकारी है।

ट्रेनों को प्राइवेट आपरेटरों से चलाना यदि इतना ही आवश्यक लगता है, तो सरकार को चाहिए कि वह उन्हें कोई एक ऐसा यात्री रूट दे दे, जिस पर वह अपना पूरा इंफ्रास्ट्राक्चर तैयार करके चलाएं, तभी सरकार की नीति और आपरेटर की कार्यक्षमता का सही आकलन किया जा सकेगा।

रेलवे का ट्रैक जो पहले से ही ‘ए’-‘बी’ इत्यादि भागों में बंटा हुआ है, जिसमें अधिकतम गतिसीमा भी पहले से ही 130/160 किमी. निर्धारित है, ऐसे में यह कहना कि अमुक गाड़ी को इस गति से चलाया जायेगा, केवल देश को तथा जनता को बेवकूफ बनाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

इससे तो यह पता चलता है कि या तो मंत्री जी को कुछ पता नहीं है, अथवा उनके अधिकारी उन्हें बेफकूफ बनाने या दिग्भ्रमित करने में सफल हैं, तथा मंत्री जी की इसमें कुछ स्वार्थसिद्धि हो रही है? अतः मंत्री ऐसा हो, जो न सिर्फ ईमानदार हो, बल्कि कर्तव्यनिष्ठ और दूरदृष्टि वाला भी हो। और जिसने अपने जीवन में देश के लिए कुछ खास किया हो तथा उसके अंदर भविष्य में भी कुछ विशेष कर गुजरने की इच्छाशक्ति हो।

यदि सरकार ईमानदारी से रेलवे का उद्धार करना चाहती है, तो उसे अधिकारियों की संख्या को कंट्रोल करना चाहिए और नीचे स्तर पर कार्य करने वाले कर्मचारियों की संख्या को पूर्व मानकों के अनुरूप पुनर्स्थापित करना चाहिए। ठेके पर मजदूरों की नियुक्ति, ठेकेदारों से अमापक काम करवाने, रिटायर्ड कर्मियों का रिएंगेजमेंट, स्थाई कर्मचारियों की छंटनी, सरकारी संस्थानों/विभागों/सेवाओं आदि का निजीकरण इत्यादि से देश में बढ़ती बेरोजगारी की समस्या का समाधान नहीं होने वाला है।

तेजस एक्सप्रेस को चलाने में कुछ विसंगतियां प्रतीत होती हैं, जैसे कि जमीन हमारी, ट्रैक हमारा, स्टेशन हमारे, उन पर स्टाफ हमारा, अनुरक्षण हमारा, गार्ड और ड्राइवर भी हमारे, मगर किराया तय करेगा निजी आपरेटर, यह कहां की, किस तरह की समझदारी और कैसी व्यापारिक नीति है? गंतव्य पर पहुंचने में एक-दो घंटे की देरी पर यात्रियों को 100-200 रुपये का मुआवजा देकर सरकार जन-सामान्य को भिखारी की तरह लाइन में खड़ा करके आखिर कौन सा आदर्श उपस्थित करना चाह रही है?

रेलवे की सभी उत्पादन इकाईयों का एक साथ निगमीकरण करने के बहाने निजीकरण करने के बजाय सरकार किसी एक उत्पादन इकाई को ट्रायल आधार पर किसी कमर्शियल अनुभवी प्राइवेट सेक्टर को देकर पहले निजी क्षेत्र की क्षमता का आकलन करे और उसमें राजनीतिक दखलंदाजी रोककर उनके हिसाब से चलाए। ऐसा करने से भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी, उत्पादन की गुणवत्ता उच्चकोटि की होगी तथा उत्पादन भी अधिक होगा।

सरकार को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आजादी के बाद से देश के विकास में सर्वाधिक योगदान देने वाले सभी बड़े संस्थान सार्वजनिक क्षेत्र के संरक्षण में ही खड़े हो पाए हैं। इस दौरान निजी क्षेत्र सिर्फ अपना मुनाफा कमाने में लगा था।

सिर्फ रेलवे में ही नहीं, बल्कि सभी सरकारी विभागों में शिलान्यास और उद्घाटन की प्रथा पूरी तरह समाप्त होनी चाहिए। इससे जनता की गाढ़ी कमाई से जमा सार्वजनिक राजस्व की बरबादी तो होती ही है, बल्कि इसका कोई लाभ जनता को नहीं मिलता। ऐसे लगभग सभी समारोह सिर्फ नेताओं की वाहवाही के कर्मकांड बनकर रह गए हैं। रेलवे में पहले राजनीतिक हस्तक्षेप शून्य के बराबर था। परंतु पिछले करीब 15-20 सालों में यह बहुत ज्यादा बढ़ गया है। इस कारण से भ्रष्टाचार भी बढ़ता जा रहा है। इसका नतीजा रेलवे की बरबादी के रूप में सामने है।

सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि रेलवे सिर्फ एक परिवहन माध्यम ही नहीं है, बल्कि यह इस देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ के साथ ही सामाजिक और सांस्कृतिक समरसता की एक महत्वपूर्ण नब्ज भी है, जिसे निजी क्षेत्र को सौंपकर कुछ खास हासिल नहीं होगा। विश्व के किसी भी देश में रेलवे का निजीकरण उस देश और उसकी जनता के लिए आजतक फायदेमंद साबित नहीं हुआ है।

यह भी याद रखना चाहिए कि अटलबिहारी बाजपेई सरकार द्वारा वर्ष 2003-04 में रेलवे के जोनों की संख्या बढ़ाना भी रेलवे के लिए नुकसानदेह ही साबित हुआ है। इसके लिए जो हजारों करोड़ रुपये बरबाद किए गए, उस फंड का इस्तेमाल रेलवे की अतिरिक्त क्षमता बढ़ाने में बखूबी किया जा सकता था। अतः राजनीतिक दलों और नेताओं को देश को तोड़ने और सार्वजनिक संपत्तियों का अपने-अपने हितों के अनुरूप बांटने तथा अपनी-अपनी राजनीतिक रियासतें बनाने की प्रवृत्ति से समय रहते बाज आना चाहिए।

अब जहां तक रेलवे के मान्यताप्राप्त संगठनों की बात है, तो उन पर से अधिकांश रेलकर्मियों का भरोसा उठ चुका है। सब खेमेबाजी और कौटुंबिक (कैटेगराइज) हितों की आपसी लड़ाई में गुत्थमगुत्था हैं। उनके ढ़ुलमुल नेतृत्व और नीतियों के चलते उन्हें कहीं न कहीं सरकार द्वारा बड़ी चालाकी से अलग-थलग भी किया गया है, जिससे उन पर कार्मिकों का विश्वास डगमगाया है। शायद यही कारण है कि वह सरकार के साथ कोई बड़ी लड़ाई लड़ने अथवा निर्णायक आंदोलन छेड़ने से हिचकिचा रहे हैं। यदि ऐसा नहीं है तो अब तक वह ऐसे किसी निर्णायक आंदोलन की रूपरेखा लेकर सामने क्यों नहीं आ पाए हैं?

हालांकि इसके लिए सिर्फ मान्यताप्राप्त संगठन ही अकेले दोषी नहीं हैं, बल्कि करीब 12 लाख रेलकर्मी भी दोषी हैं, क्योंकि रेलवे की बरबादी और सरकार की निजीकरण की नीति के खिलाफ उनकी तरफ से भी ऐसा कोई स्वत: स्फूर्त आंदोलन उठ खड़ा नहीं हुआ, जैसा कि बिहार के सासाराम में करीब तीन लाख छात्रों ने कर दिखाया। अभी भी समय है, रेलवे के मान्यताप्राप्त संगठनों और रेलकर्मियों को यदि अपना अस्तित्व बचाए रखना है, तो उन्हें स्वत: स्फूर्त उठ खड़ा होना चाहिए!








Source link

Translate »