पूर्वोत्तर रेलवे द्वारा रेलवे बोर्ड के “केयर गिवर” संबंधी आदेश का उल्लंघन

जोनल अधिकारियों की मनमानी पर अविलंब अंकुश लगाए रेलवे बोर्ड!

गोरखपुर ब्यूरो : कोविड-19 महामारी के चलते रेलवे बोर्ड द्वारा रेल कर्मचारियों के स्थानांतरण पर लगाई गई रोक को पूर्वोत्तर रेलवे के सीएमएम/ई ने ताक पर रखते हुए कर्मचारियों का स्थानांतरण गोरखपुर डिपो से गोंडा डीजल डिपो करके एक कर्मचारी कृष्णानंद सिंह को 18 जुलाई को जबरन जॉइन भी करा दिया। इस स्थानांतरण से स्थानांतरण भत्ता भी देय होने से रेलवे पर अतिरिक्त भार भी पड़ा है।

सवाल यह उठता है कि यदि जोनल रेलों द्वारा बोर्ड के आदेशों और दिशा-निर्देशों का इसी तरह उल्लंघन किया जाता रहा, तो बोर्ड और उसके निर्देशों का औचित्य ही क्या रह जाएगा? ऐसा लगता है कि रेलवे बोर्ड की अनिश्चयात्मक स्थिति के चलते जोनल रेलों में कुछ अधिकारियों द्वारा मनमानी की जा रही है, जिस पर यदि समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो व्यवस्था में और अधिक अराजकता फैलने में ज्यादा देर नहीं लगेगी।

उपलब्ध कार्यालय आदेश से जाहिर है कि कोविड-19 महामारी के कारण आर्थिक संकट से गुजर रही रेलवे एवं कर्मचारियों की बीमारी से रोकथाम के लिए स्थानांतरणों पर बोर्ड द्वारा लगाई गई रोक के बावजूद सीएमएम/ई ने जानबूझकर आदेश का उल्लंघन कर अपनी मनमानी करते हुए 29 जून एवं 13 जुलाई को स्थानांतरण पत्र जारी करके तीन कर्मचारियों का स्थानांतरण गोरखपुर डिपो से गोंडा डीजल डिपो में किया है जो कि रेलवे बोर्ड के आदेश की खुली अवमानना है।

सीएमएम/ई/पूर्वोत्तर रेलवे ने आदेश सं. 20 को रेलवे बोर्ड के आदेश दि. 13.03.2020 का संज्ञान लिए बिना यूनियन के दबाव में निरस्त करते हुए ऐसे कर्मचारी का स्थानांतरण किया, जिसका भाई मानसिक विकलांग है और उक्त कर्मचारी ही उसका “केयर गिवर” है।

उल्लेखनीय है कि ऐसे कर्मचारियों का स्थानांतरण न किए जाने के संबंध में रेलवे बोर्ड द्वारा अलग से निर्देश जारी किया गया है। बोर्ड के उक्त निर्देश के साथ कर्मचारी ने जब सक्षम अधिकारी के समक्ष अपील दाखिल की तो उसकी इस अपील को भी रेलवे बोर्ड के आदेश का संज्ञान लिए बगैर निरस्त कर दिया गया।

कर्मचारियों का कहना है कि कोविड-19 महामारी के समय बोर्ड के दिशा-निर्देशों को दरकिनार करके स्थानांतरण करने वाले पूर्वोत्तर रेलवे के सीएमएम/ई ने कर्मचारी और राष्ट्र विरोधी कार्य किया है।

उनका यह भी आरोप है कि पहले आदेश के तहत स्थानांतरित किए गए दो कर्मचारियों को यूनियन ने मोटी राशि लेकर पिछली तारीख से पदाधिकारी बताकर उनको स्थानांतरण से बचाया, जबकि सीएमएम/ई ने जातिगत भेदभाव और पक्षपात तथा बोर्ड के आदेशों का उल्लंघन करते हुए “केयर गिवर कर्मचारी” तक का स्थानांतरण करने से गुरेज नहीं किया।

रेलवे बोर्ड और सक्षम जोनल अथॉरिटी द्वारा इस मामले का अविलंब संज्ञान लिया जाना चाहिए। 





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एलडीसीई की समस्त प्रक्रिया रेलवे बोर्ड द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर संयोजित की जाए

सिद्धांततः एलडीसीई में ऑब्जेक्टिव के बाद सब्जेक्टिव पेपर और इंटरव्यू भी होना चाहिए

सुरेश त्रिपाठी

“एलडीसीई में अब मनमाने तरीके से नहीं दे पाएंगे अंक” शीर्षक से “रेलसमाचार.कॉम” पर 24 जुलाई को प्रकाशित खबर पर बहुत सटीक और तीव्र प्रतिक्रिया कई विद्वान, वरिष्ठ और अनुभवी रेल अधिकारियों ने व्यक्त की है। इनमें कार्यरत एवं सेवानिवृत्त दोनों तरह के रेल अधिकारी शामिल हैं। उनकी सबसे पहली आशंका यह है कि एलडीसीई की यह जो नई गाइडलाइंस (पत्र सं. ई(जीपी)/2018/2/31, दि. 20 जुलाई 2020) रेलवे बोर्ड द्वारा जारी की गई हैं, उनके मद्देनजर किसी बड़े खेल की भावी तैयारी लग रही है, जो भविष्य में शायद ‘व्यापम’ से भी बड़ा घोटाला साबित हो सकती है। उनकी अनुभवी प्रतिक्रियाओं और विश्लेषणात्मक तथ्यों को रेल प्रशासन के समक्ष इस उद्देश्य से यहां प्रस्तुत किया जा रहा है कि इससे उसे अपनी विभागीय चयन प्रक्रिया को फुलप्रूफ बनाने में पर्याप्त मदद मिल सकती है।

रेलवे में ग्रुप ‘सी’ से ग्रुप ‘बी’ एक बहुत बड़ी छलांग होती है और यह जिम्मेदारी भी उतनी ही संवेदनशील होती है।राज्य सरकार या भारत सरकार के किसी भी विभाग में राजपत्रित अधिकारी बनाने के लिए सिर्फ “ऑब्जेक्टिव” से ही चयन प्रक्रिया पूरी नहीं की जाती है। आरआरबी, आरआरसी, एसएससी आदि ग्रुप ‘डी’ और ‘सी’ के सेलेक्शन होते हैं, उनके लिए तो यह ठीक हो सकती है, लेकिन राजपत्रित के लिए यह प्रक्रिया बिल्कुल भी उचित नहीं कही जा सकती। आरआरबी, आरआरसी आदि की ऑब्जेक्टिव आधारित चयन प्रक्रिया ज्यादा सहज (वल्नरेबल) होती है। आए दिन इसकी खबरें हम सुनते रहते हैं। इसमें संगठित और बड़े पैमाने पर अयोग्यों की नियुक्ति की आशंका होती है।

इसीलिए राजपत्रित स्तर की परीक्षाओं के लिए स्टेट पब्लिक सर्विस कमीशन और संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) का सिस्टम ज्यादा बेहतर और फुल प्रूफ माना जाता है, क्योंकि तीन स्तर पर मैनेज करना किसी के लिए भी अत्यंत मुश्किल होता है।

रेलवे बोर्ड में “राजपत्रित चयन बोर्ड” बनाया जाए

अब जहां तक बात रेलवे की आंतरिक विभागीय चयन परीक्षाओं की है, तो रेलवे की ऐसी सभी परीक्षाएं, अलग-अलग विभागों और जोनल स्तर पर न कराकर इसके लिए यूपीएससी की तर्ज पर राष्ट्रीय स्तर पर रेलवे बोर्ड में एक “राजपत्रित चयन बोर्ड” बनाकर कराई जानी चाहिए। इससे अलग-अलग जोनों की विभागीय चयन प्रक्रिया में जो विसंगतियां हैं, वह भी समाप्त हो जाएंगी। इसके अलावा नालायक, निकम्मे, जोड़-तोड़ करने, पैसे की बदौलत सिफारिश और पहुंच रखने वाले जो उम्मीदवार इन चयन प्रक्रियाओं में बार-बार बाधा डालते हैं, एक तरफ उनसे निपटा जा सकेगा, तो दूसरी तरफ इससे समय पर रेलवे को आवश्यक राजपत्रित अधिकारी उपलब्ध होने के साथ ही योग्य उम्मीदवारों का चयन भी सुनिश्चित हो सकता है।

इसीलिए तीन स्तरीय चयन प्रक्रिया – 1. ऑब्जेक्टिव 2. सब्जेक्टिव 3. इंटरव्यू – निश्चित रूप से होनी चाहिए और वह भी भारतीय रेल के स्तर पर। यह इसलिए भी जरूरी है, कयोंकि सिर्फ एक रेलवे ही पूरे देश में एकमात्र ऐसी संस्था है जिसमें कोई चतुर्थ श्रेणी में बहाल व्यक्ति अपनी जोड़तोड़ से मात्र 6-7 साल में तृतीय श्रेणी (ग्रुप ‘सी’) कर्मचारी बन जाता है और अगले 5 साल में वह राजपत्रित अधिकारी (ग्रुप ‘बी’) स्तर की विभागीय परीक्षा के लिए योग्य (एलिजिबल) हो जाता है।

सिर्फ रेलवे में चल रही अद्भुत व्यवस्था : खलासी को मिलता है ग्रुप ‘ए’ स्टेटस

यहां सबसे आश्चर्यजनक व्यवस्था यह भी है कि ग्रुप ‘बी’ में आने के 7-8 साल के अंदर उसे यूपीएससी से सीधी भर्ती अधिकारी – आईआरपीएस, आईआरटीएस, आईआरएसई, आईआरएएस इत्यादि – का दर्जा भी मिल जाता है। जबकि राज्यों में जो यूपीएससी के ही पैटर्न पर और उसी स्टैंडर्ड की परीक्षा से पीसीएस पास कर जो लोग सीधे ग्रुप ‘बी’ अधिकारी बनते हैं और एसडीएम, डीएसपी आदि में ज्वाइन करते हैं, उन्हें किसी भी राज्य में यूपीएससी से ग्रुप ‘ए’ का स्टेटस मिलने में कम से कम 20 साल का समय लगता है।

इस तरह से देखा जाए तो रेलवे बोर्ड द्वारा यह निर्णय भी या तो किसी पूर्व नियोजित और बहुत बड़ी साजिश के तहत लिया गया है, या फिर इसमें अपेक्षित संजीदगी के साथ रेल हित को ध्यान में रखकर पर्याप्त सोच-विचार नहीं किया गया है।

वर्तमान विभागीय चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव

अब जहां तक बात वर्तमान चयन प्रक्रिया में कमी की है, तो इसकी सबसे बड़ी कमी है यहां पूरी पारदर्शिता के साथ प्रश्न पत्र, परीक्षा हॉल की व्यवस्था, कॉपी चेक करने की गाइडलाइन, इंटरव्यू के मानक इत्यादि जानबूझकर स्पष्ट नहीं रखे गए हैं। इसके अलावा देश की सबसे बड़ी परीक्षाएं लेने वाली संस्थाओं – जैसे यूपीएससी, पीसीएस, सीबीएसई, स्टेट एग्जाम बोर्ड्स, यूनिवर्सिटी एग्जाम्स आदि – की परीक्षा प्रक्रियाओं को भी इसमें फॉलो नहीं किया जाता है। इसीलिए जब जो भी असफल और खुराफाती उम्मीदवार फेल होगा, वह पूरी प्रक्रिया को ही जब चाहे तब डिस्टर्ब कर देगा और किसी के भी ऊपर और कैसा भी आरोप लगा देगा।

सिर्फ ऐसी किसी परीक्षा में ही नहीं, बल्कि बाकी व्यवस्था में भी यह अत्यंत महत्वपूर्ण होता है कि पहले तो नियम और व्यवस्था-प्रक्रिया ऐसी बनाई जाए, जो कि पूरी तरह से स्पष्ट, पारदर्शी, बिना किसी विरोधाभास के ईमानदारी से फूल प्रूफ तैयार की गई हो। इसमें इस बात को भी अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए कि कोई व्यक्ति या उम्मीदवार इसको कहां-कहां और कैसे-कैसे बदनाम अथवा दुरुपयोग (मिस्यूज) कर सकता है।

चयन प्रक्रिया में शामिल लोगों को सेफगार्ड की जरूरत

इसके साथ ही रेल प्रशासन को अपनी व्यवस्था की चयन प्रक्रिया में शामिल लोगों को किसी भी तरह के परिवाद से बचाने अथवा सेफगार्ड करने के भी नियम स्पष्ट रखने चाहिए, जैसा कि यूपीएससी, पीसीएस, या अन्य परीक्षा बोर्डों में होता है। जैसे कि यह लगभग सभी लोगों को पता है कि आज की तारीख में असली खेल क्वेश्चन पेपर (प्रश्न पत्र) सेट करने वाला ही खेलता है। जो असल खेल होता है, वह यही है, जिसमें पहले से निर्धारित उम्मीदवार को पैसे के बदले या पैरवी के दबाव में क्वेश्चन बता दिया जाता है। चूंकि यह सबसे ‘सेफ’ है और सीबीआई के अलावा अन्य कोई, चाहे वह रेलवे विजिलेंस हो, या कोई विभागीय जांच समिति, इसे सिद्ध नहीं कर सकता। सीबीआई द्वारा भी सिद्ध करने के चांस बहुत ब्राइट नहीं होते हैं, इसीलिए धड़ल्ले से इसका ‘उपयोग’ होता है।

परीक्षा कक्ष में नकल अथवा अन्य प्रकार की जोड़-तोड़ या परीक्षा के बाद कॉपी में घालमेल की बात वह लोग करते हैं जिनको क्वेश्चंस नहीं मिले होते हैं और फेल हो जाते हैं। तभी वह अपनी भड़ास निकालने के लिए परीक्षा की हर स्तर की प्रक्रिया में भ्रष्टाचार, पक्षपात, विसंगति और गलतियां देखते हैं। हालांकि अपवाद स्वरूप कई बार कुछ योग्य उम्मीदवार भी इसकी बलि चढ़ जाते हैं।

एग्जाम पेपर में मेनिपुलेशन का ‘स्कोप’ नहीं बचा, तथापि…

वर्तमान में अत्यंत जोखिमपूर्ण स्थितियों को देखते हुए कोई निहायत ही बेवकूफ अधिकारी भी एग्जाम पेपर में ‘मेनिपुलेशन’ की बात नहीं सोचता होगा, न ऐसा करता होगा, और न ही अब इसका कोई ‘स्कोप’ बचा है कि कोई कॉपी में परीक्षा के बाद कुछ और लिख पाए, क्योंकि परीक्षा के तुरंत बाद और कॉपियां सीलबंद करने से पहले प्रत्येक कॉपी में हर प्रश्न के उत्तर के बाद के बचे ‘स्पेस’ को ‘क्रॉस’ कर दिया जाता है, जिससे बाद उसमें कोई एक लाइन भी न लिख पाए। सभी परीक्षा कक्षों के निरीक्षक और कोऑर्डिनेटर इस प्रक्रिया को सुनिश्चित करते हैं और “विजिलेंस कंप्लेंट माफिया” भी इससे बखूबी वाकिफ है। इसीलिए विजिलेंस का अनुभवी घाघ माफिया इंस्पेक्टर अपनी कंप्लेंट में अधिकारियों के ज्ञान के आधार पर परीक्षा कक्ष में नकल या जोड़तोड़ की बात भी जरूर लिखवाता है, जिससे कॉपी में जोड़-तोड़ की कहानी आगे बढ़ाई जा सके।

सर्वप्रथम तो कॉपियां जांचने में होने वाले विवाद और जोड़-तोड़ की संभावनाओं से सभी अधिकारी परिचित होते हैं और इसीलिए अधिकांश अधिकारी इस जांच प्रक्रिया का हिस्सा बनने से पहले दूर से ही अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। तथापि यदि जबरदस्ती यह जिम्मेदारी उन पर डाल भी दी गई, तो ज्यादातर सतर्क और समझदार अधिकारी एकलाइन से सभी उम्मीदवारों को ‘फेल’ करने में ही अपनी भलाई समझते हैं, क्योंकि तब न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी!

लेकिन वहीं कुछ अधिकारी ऐसे भी होते हैं, जो मजबूरी में मिली जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाते हुए कॉपी चेक करते हैं और बाद में उसका दुष्परिणाम भुगतते हैं। कई वरिष्ठ रेल अधिकारियों का कहना है कि ऐसे ही अधिकारी कंप्लेंट माफिया का शिकार बनते हैं, क्योंकि सब्जेक्टिव पेपर में मॉडल पेपर के अलावा कॉपी चेक करने वाला अधिकारी अपने अनुभव से, जानकारी से, हैंडराइटिंग से लेकर उत्तर की शैली आदि कई तथ्यों को ध्यान में रखकर मार्किंग करता है। और यह तो तय है कि हर दूसरे आदमी की मार्किंग तथा उसके द्वारा दिए गए नंबर किसी दूसरे अधिकारी से हमेशा/शार्त्तिया भिन्न होगा। इसीलिए इसी बात का ध्यान रखकर जितने भी एग्जाम बोर्ड और संस्थाए हैं, उन्होंने अपने नियम बहुत स्पष्ट बना रखे हैं।

उत्तर पुस्तिकाओं की पुनर्जांच और विजिलेंस कंप्लेंट माफिया

उत्तर पुस्तिका की पुनर्जांच (री-चेकिंग) में हर प्रश्न पर दिए गए नंबरों को जोड़कर देखा जाता है और यह भी देखा जाता है कि कहीं पर दिया गया नंबर जुड़ने से तो नहीं रह गया। यदि रह गया है, तो उसे जोड़कर परिणाम बता दिया जाता है। इसी प्रकार अगर किसी प्रश्न पर परीक्षक द्वारा नंबर देना छूट गया है, तो उसे ठीक करके परिणाम निकाल दिया जाता है।

कुछ परिस्थितियों में जहां पर परीक्षार्थी यह आरोप लगाता है या आशंका जताता है कि उसने लिखा बहुत था, लेकिन उस अनुपात में उसे नंबर नहीं दिए गए हैं। तब उस कॉपी की दुबारा चेकिंग दूसरे सक्षम व्यक्ति से कराई जाती है और उसमें परिणाम कुछ भी आए, चाहे नंबर पहले से भी कम हो जाएं, तो भी वह परिणाम फाइनल होता है। कायदे से रेलवे में भी यही प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए, लेकिन यहां “विजिलेंस कंप्लेंट माफिया” के गाइडेंस में वैसी ही जलेबियां बनाई जाती हैं, जैसी वे चाहते हैं। नियम, तार्किक विश्लेषण और इस संबंध में दूसरी जगहों पर अपनाई जा रही रीति-नीति इत्यादि उनके लिए कोई मायने नहीं रखती।

किसी भी नौकरी या शैक्षिक परीक्षा व्यवस्था में जिनको कॉपी चेक करने की जिम्मेदारी दी जाती है, वह उनकी प्रोफेशनल कैपेबिलिटी और सभी क्रेडेंसियल्स को देख कर ही दी जाती है और उनकी गरिमा (रेपुटेशन) तथा सम्मान की रक्षा भी की जाती है।

अधिकारियों की प्रोफेशनल इंटीग्रिटी और उनकी दुर्वस्था

रेलवे में भी खासकर कॉपी चेकिंग में महाप्रबंधक सभी ऑफिसर्स में जिसके क्रेडेंशियल सबसे अच्छे होते हैं और जिनकी प्रोफेशनल इंटीग्रिटी तथा कंपीटेंसी सबसे विश्वसनीय होती है, उसे ही तमाम फीडबैक और सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर नामित करते हैं। लेकिन रेलवे में विडंबना यह होती है कि जैसे ही कंप्लेंट माफिया और विजिलेंस में उसके स्लीपर सेल्स सक्रिय होते हैं, वही ईमानदार अधिकारी तुरंत संदिग्ध और अपराधी मान लिया जाता है और व्यवस्था की पूरी सोच ही विजिलैंस माफिया/कंप्लेंट माफिया के नैरेटिव के अनुसार सेट हो जाती है। फिर भले ही अन्ततः सत्य की जीत होती हो, लेकिन तब तक उस अधिकारी की मानहानि हो चुकी होती है और आगे के लिए उसे स्पष्ट सीख भी मिल जाती है कि या तो इन माफियाओं के अनुसार चलो या इनके रास्ते से हट जाओ, भले ही पूरा सिस्टम भाड़ में चला जाए।

ऐसी स्थिति में अधिकारी को इस बात का अहसास हो जाता है कि उसने पेपर चेक करके बहुत बड़ा पाप कर दिया, क्योंकि कंप्लेंट माफिया किसी भी स्तर पर उत्तर कर कंप्लेंट करता है और आरोप लगाता है, जिसमें लोगों को चटखारे लेने का कम से कम मौका तो मिल ही जाता है। इससे अधिकारी की सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ-साथ सहकर्मियों के बीच उसकी छवि भी प्रभावित होती है, क्योंकि केस सच है या झूठ, इसमें दूसरों की कोई रुचि नहीं होती, उनको तो मजा सिर्फ इतने से ही मिल जाता है कि सामने वाला उनसे ज्यादा नहीं तो कम से कम बराबर ही गिरा हुआ जरूर है।

इसके अलावा अधिकारी के परिवार पर उसके इस “ईमानदार एडवेंचर” के कारण क्या बीतती होगी, इतनी दूर तक भी कौन सोचता है! कुल मिलाकर इस तंत्र का ताना-बाना ऐसा बुना गया है कि ईमानदारी, निष्पक्षता, निर्भीकता, कर्मठता, योग्यता इत्यादि हमेशा हासिये पर रहें और बेईमानों, फरेबियों, अवसरवादी, निक्कमे, निकृष्ट तथा अयोग्य लोगों का ही वर्चस्व बना रहे।

“विजिलेंस संरक्षित और गाइडेड कंप्लेंट माफिया” का मकसद

रेलवे में स्थिति यह है कि यहां “विजिलेंस माफिया” अपनी मर्जी से कुछ भी लिखवा देता है और जांच करने वाला उसके गाइडेंस के हिसाब से तब तक जांच करता रहता है, जब तक कि “विजिलेंस संरक्षित कंप्लेंट माफिया” का मकसद पूरा नहीं हो जाता। वह कहेगा उक्त प्रश्न में 5 अंक मिलने चाहिए थे, 10 मिलने चाहिए थे, तो 5 की जगह 3 मिला या 10 की जगह 8 मिला, या फिर 5 की जगह 7 मिला, अथवा 10 की जगह 12 मिला। और फिर उसी की मानसिकता के प्रशासन में बैठे लोग उसी के हिसाब से मामले को देखने लगते हैं।

किसी परीक्षा में या प्रायः सभी परीक्षाओं में कई बार एक ही नंबर पर कितने लोग होते हैं और एक नंबर से ही कितने रैंक का अंतर हो जाता है, इसी पर संबंधित उम्मीदवार का पास-फेल होना निर्भर करता है। उसमें इस तरह की सोच और परिवाद को रेलवे की तरह डील करने पर तो न तो कभी किसी भी एग्जाम का रिजल्ट आ पाएगा और न ही कोई एग्जाम से संबंधित व्यक्ति या कॉपी चेक करने वाला अधिकारी बिना चार्जशीट के बच पाएगा।

रेलवे की जांच पद्धति अपनाने पर यूपीएससी जैसी परीक्षाओं में किसी नीचे की सर्विस पर 300 के रैंक वाला यह कह सकता है कि मेरे तक तो मार्किंग ठीक है, लेकिन मेरे से ऊपर जितने हैं, सबको पैसा लेकर ज्यादा नंबर दिया गया है, या क्वेश्चन पहले बता दिया गया था, अथवा पूरा एग्जाम हॉल बिक गया था, इसलिए मुझे आईएएस मिलना चाहिए। या फिर फेल होने वाला कोई भी उम्मीदवार इसी तरह से पूरे रिजल्ट को गलत ठहरा सकता है।

कंप्लेंट माफिया की कुंठित और भ्रष्ट मानसिकता

“कंप्लेंट माफिया की कुंठित और महाभ्रष्ट मानसिकता के लोगों का मकसद सिर्फ इतना ही होता है कि या तो लाइन उनसे शुरू हो, या फिर वे पूरी प्रक्रिया ही दूषित कर देंगे।” लेकिन रेलवे में ऐसी स्पष्ट व्यवस्था नहीं होने से “विजिलेंस संरक्षित और गाइडेड कंप्लेंट माफिया” यह खेल खूब खेलता है और कई बार पैनल भी कैंसल करवा लेता है। अधिकारियों को चार्जशीट मिलती है, सो अलग।

इस पर कार्मिक एवं अन्य विभागों के कई अनुभवी वरिष्ठ अधिकारियों का यह कहना है कि कोई भी अधिकारी अपनी नौकरी जोखिम में डालकर कुछ पैसों के लालच में अथवा किसी के दवाब में आकर पेपर में कुछ नहीं कर सकता है। उनका यह भी कहना है कि अगर कोई अधिकारी पैसा ही कमाना चाहे, तो उसके पास इसके कई सुरक्षित स्रोत और अवसर होते हैं। अधिकारियों का यह भी कहना है कि एग्जाम को फुलप्रूफ बनाने का एक तरीका यह भी हो सकता है – जिसे कई एग्जाम बोर्ड खासकर यूपीएससी फॉलो करता है – सब्जेक्टिव पेपर का मॉडरेशन। रेलवे के एग्जाम में इसे ऐसे किया जा सकता है कि एक अधिकारी के एक पेपर चेक करने के बाद कोई दूसरा अधिकारी भी उसी पेपर को पुनः चेक करे और फिर दोनों के मॉडरेशन से जो नंबर फाइनल किया जाएगा, वही अंतिम परिणाम का आधार होना चाहिए।

निश्चित है हर दूसरे अधिकारी की चेकिंग/मार्किंग में अंतर

इन विद्वान और अनुभवी अधिकारियो का कहना है कि भले ही पेपर चेक करने वाले जिन अधिकारियों की मनगढ़ंत कंप्लेंट हुई हो, अगर उसी पेपर को डीआरएम, जीएम, एसडीजीएम, पीईडी/विजिलेंस, सीआरबी या खुद रेलमंत्री अथवा सीवीसी भी चेक करेंगे, तो सबकी मार्किंग अलग-अलग ही होगी और सब पर भी “कंप्लेंट माफिया” पैसा लेकर बढ़िया से बढ़िया मेनिपुलेशन की कंप्लेंट कर सकता है और रेल प्रशासन यदि अपनी रेलवे विजिलेंस की कार्यशैली तथा परम्परा का निर्वहन करेगा, तो उस कंप्लेंट के आधार पर इन सभी को निश्चित रूप से मेजर पेनाल्टी चार्जशीट मिल ही जाएगी।

इन वरिष्ठ अधिकारियों का दावा है कि यदि उनकी इस बात पर भरोसा न हो, तो इसको उपरोक्त में से कोई भी अथॉरिटी कभी भी आजमाकर देख सकती है।

मन-मुताबिक न होने पर होती है “स्ट्रक्चर्ड कंप्लेंटबाजी”

यह बात भी सही है कि जब भी किसी विभागीय परीक्षा में विजिलेंस इंस्पेक्टर कंडीडेट होते हैं, तो उन एग्जाम्स में संबसे ज्यादा परीक्षा समिति के सदस्यों पर ये हर तरफ से दबाब डलवाते हैं और इनके मन का नहीं होने पर सबसे ज्यादा ‘स्ट्रक्चर्ड कंप्लेंटबाजी’ भी उन्हीं सदस्यों के खिलाफ होती है। 

दूसरी तरफ रिटायरमेंट के करीब पहुंचे अधिकारियों को क्वेश्चन पेपर सेट करने और विभागीय चयन की प्रक्रिया से तुरंत रोका जाना चाहिए, क्योंकि इसमें कुछेक मामलों में इसकी संभावना रहती है कि पैसे के लोभ में कुछ क्वेश्चन कुछेक चुनिंदा लोगों, जिनसे डील हो गई हो, को बेच दिया जाए, या फिर उस अधिकारी के सीधेपन और अपने सचिवालय पर अतिविश्वास तथा निर्भरता के चलते उसके सचिवालय के कॉन्फिडेंसियल स्टॉफ और सेक्रेटरी, जो क्वेश्चन पेपर टाइप/प्रिंट करते हैं, क्वेश्चंस को बेच दें। इसके एक नहीं, सैकड़ों उदाहरण खुद रेलवे बोर्ड के संज्ञान में पहले से ही हैं। अतः सेवाकाल के अंतिम वर्ष में और रिटायरमेंट के करीब पहुंचने वाले विभाग प्रमुखों को इस चयन प्रक्रिया से सर्वथा विलग किया जाए, इससे उनका ही भला होगा।

आमतौर पर जितने घाघ कंडीडेट होते हैं, वे परीक्षा की संभावना के आधार पर एक साल पहले से ही विभाग प्रमुख (पीएचओडी) के सेक्रेटरी और गोपनीय मामले देखने/डील करने वालों तथा टाइपिंग करने वालों की प्रदक्षिणा करने लगते हैं और अंततः उन्हें अपने चक्कर में ले ही लेते हैं।

आज की तारीख में यही सबसे सुरक्षित और एकमात्र तरीका है रेलवे की आंतरिक विभागीय परीक्षाओं में भ्रष्टाचार करने का और अयोग्य कंडीडेट्स को फायदा पहुचाने का। और हकीकत में बाकी तथ्य तो  सब सिर्फ पानी पर लाठी पीटने जैसे ही हैं।





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विजिलेंस माफिया द्वारा खड़े किए वॉलंटियर्स के चलते वेंटीलेटर पर गई भारतीय रेल

कैंसर की तरह देश की पूरी व्यवस्था में फैला हुआ है कंप्लेंट माफिया का बड़ा तंत्र !

सरकार ही जाने कि आज तक उसकी भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था के कितने उद्देश्य पूरे हुए?

सुरेश त्रिपाठी

रेलवे बोर्ड विजिलेंस से निकाले गए तीनों आईआई (इंवेस्टीगेशन इंस्पेक्टर) “देर आए, दुरुस्त आए“ और “क्या कारण है कि सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे में ही बनते हैं“ शीर्षक से प्रकाशित पिछली दो किस्तों में उजागर हुई अपनी करतूतों से इतने विचलित हुए हैं, अथवा रेलवे विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन विचलित हुआ है, कि अब और ज्यादा उनके कुकर्म उजागर न हों, इसके लिए वे विभिन्न माध्यमों से हम पर दबाव बना रहे हैं। इसके लिए वे अपने मीडिया सहित भिन्न-भिन्न स्रोतों-संपर्कों का इस्तेमाल कर रहे हैं, क्योंकि इससे उनके रेलवे बोर्ड में बने रहने अथवा किसी रेलवे पीएसयू में एडजस्ट होने पर ही नहीं, बल्कि उनके संरक्षकों के हितों पर भी खतरा मंडराता नजर आ रहा है।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि निष्कासित किए गए इन तीनों आईआई की कुत्सित करतूतों को तब उजागर किया जा सका है, जब डायरेक्टर विजिलेंस (पुलिस), रेलवे बोर्ड ने महीनों तक फील्ड में की जा रही इनकी कारगुजारियों पर दिल्ली पुलिस के सहयोग से लगातार नजर रखी थी। उनकी ही पुख्ता सबूतों के साथ सब्मिट की गई रिपोर्ट के आधार पर इन तीनों को अब और ज्यादा रेलवे बोर्ड विजिलेंस में बनाए रख पाना ट्रैफिक विजिलेंस के अधिकारियों के लिए आसान नहीं रह गया था। परिणामस्वरूप इन्हें तुरंत बाहर किया गया है। तथापि अब निर्लज्ज विजिलेंस अथवा उसकी नाक का सवाल न बनाकर उक्त रिपोर्ट के आधार पर इन तीनों को मेजर पेनाल्टी चार्जशीट भी पकड़ाने के साथ ही इन्हें इनके पैरेंट कैडर/रेलवे में भेजा जाना चाहिए, तभी इनके द्वारा सताए गए, उत्पीड़ित किए गए रेलकर्मियों और अधिकारियों के साथ समुचित न्याय हो पाएगा।

अब आगे..

सारे पीडब्ल्यूआई, एसएसई, टीटीई और जनसामान्य यानि यात्रियों के सीधे संपर्क में काम करने वाला स्टॉफ चोर नहीं होता, और न ही उनके एडीईएन, सीनियर डीईएन, एडीएमई, सीनियर डीएमई, एडीईई, सीनियर डीईई, एएसटीई, सीनियर डीएसटीई, एसीएम, सीनियर डीसीएम, एओएम, सीनियर डीओएम, एडीएफएम, सीनियर डीएफएम आदि भी हमेशा गलत नहीं होते। यह सभी मंडल अधिकारी जिन परिस्थितियों में और जिन मुश्किलों का सामना करते हुए काम कर रहे होते हैं, उसी से रेलवे का अस्तित्व इतनी अंधेरगर्दी के बाद भी अब तक बचा हुआ है।

यही वे लोग हैं, जो अपने जीवन का अधिकांश समय अपने परिवार को न देकर, यहां तक कि अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान न रखकर दधीचि की तरह रेलवे को चलाते रहे हैं। इनका प्रयास होता है कि उनका यह क्षण बिना किसी अनहोनी के गुजर जाए और रेलवे को जो आय आनी है, आ जाए। इनके लिए बीता हुआ क्षण संतोषजनक स्मृति से ज्यादा कुछ नहीं होता और उस क्षण इनके कर्तव्य की सार्थकता उसी में होती है। यही प्रमाण है इनकी ईमानदारी का, मेहनत का, निष्ठा का और अपने काम के प्रति समर्पण का भी।

लेकिन यह बहुत ही आसान काम है, उनके काम में ऐब निकलना। वैसे भी किसी चीज का पोस्टमार्टम करना बहुत ही आसान काम होता है। यह ऐसा काम है, जिसमें न संवेदना होती है, न जिम्मेदारी जिंदा करने की, न काम के परिणाम के दायित्व की! और कहना कि ऐसा करता, ऐसे करता, इस समय में करता, इतने समय में करता, आदि आदि, तो सही होता या ज्यादा सही होता और यह जानबूझकर इसने गलत मोटिव से किया है। अतः इस पर तो केस बनता है और फिर केस बना दिया जाता है।

विजिलेंस में, पहला- या तो खेले-खेलाए लोग आते हैं, या फिर, दूसरा- वे लोग आते हैं, जिनको फील्ड में काम का कोई बहुआयामी और लंबा अनुभव न के बराबर होता है। लेकिन पहला आते-आते अपना बाजार शुरू कर देता है, जबकि दूसरा पहले से स्थापित माफिया इंस्पेक्टर्स और सिस्टम के हाथ में खेलने लगता है और फिर ये इतना खेलते हैं कि कुछ समय में ही पहले वाले को भी पीछे छोड़ देते हैं।

टीटीई, जो ट्रेन में ड्यूटी के दौरान स्टॉफ शॉर्टेज के चलते 6/7 कोच मैन्ड करता है, उसको पता होता है कि वह कितना कठिन काम कर रहा है और एक पूरे कोच को ठीक से चेक करने में कम से कम 45 मिनट से एक घंटा लगेगा ही। फिर जब तक वह दूसरे-तीसरे कोच में जाएगा, तब तक किसी स्टेशन पर कोई भी आदमी उसके किसी भी कोच में चढ़ सकता है। हम सब जानते हैं कि यह सामान्य घटनाक्रम है, जिसको रोकना किसी के वश में नहीं है। जब तक कि प्रत्येक कोच टीटीई द्वारा मैन्ड न किए जाएं।

लेकिन वही टीटीई जब विजिलेंस में जाता है और जब उसे विजिलेंस का पानी लग जाता है, तब वह भी अपने जैसे ही दूसरे टीटीई की इसी कथित कोताही पर धड़ाधड़ केस बनाता है, यह कहकर कि “तुम्हारे द्वारा मैन्ड किए जा रहे कोच में इतने आदमी बिना रिजर्वेशन के या बिना टिकट के कैसे मिल गए?” अब वह (टीटीई से ही आईआई/विजिलेंस बना) कोच मैन कर रहे बेचारे टीटीई को या तो केस बनाने की धमकी देकर धन दोहन करेगा या फिर केस बनाएगा। दोनों ही गलत हैं। लेकिन यही विजिलेंस है।और वह भी रेलवे की।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। केस बनने के बाद उस टीटीई की नारकीय जिंदगी शुरू होती है। वह अब दस जगह पर रोएगा, गिड़गिड़ाएगा, अपनी बेगुनाही की दलील देगा और दस जगह पर पैसा भी खर्च करेगा। लाख रहम कर, सब जानकर अनुशासनिक अधिकारी (डीए) भी विजिलेंस के डर से उसे कोई न कोई दंड दे ही देता है, वरना यही विजिलेंस माफिया खुद या किसी से कंप्लेंट करवा देता है कि पैसा लेकर डीए ने माफ कर दिया। तब डीए साहेब की परिक्रमा शुरू हो जाती है।

अब उस टीटीई के कैरियर पर धब्बा भी लग गया। कुछ समय बाद उसके परिवार वालों को और उसे खुद भी यह लगने लगता है कि वह बहुत बड़ा अपराधी और चोर है। इसके बाद वह सीख जाता है कि ईमानदारी से काम करोगे, तो फंसोगे और जब फंसोगे तो यह पैसा ही काम आता है। जितना पैसा होगा, उतना ही ज्यादा चांस अपने को ईमानदार साबित करने का होता है और जितने ठन ठन गोपाल रहोगे, उतने ही बड़े नकारे और बेईमान साबित कर दिए जाओगे। इसलिए पैसा जितना कमा सकते हो, कमा लो, क्योंकि यही पैसा बोलता है और जैसा चाहोगे वैसा ही यही बुलवाता भी है।

इस प्रकार रेलवे विजिलेंस के भ्रष्टाचार और स्वस्थ आर्गेनाइजेशन के निर्माण हेतु कदम-कदम पर एक-एक नया वॉलंटियर खड़ा करता रहता है और अपने महान उद्देश्य को सार्थक करते हुए अपना कारवां लगातार बढ़ाता चलता है। इन्होंने अब इतने वॉलंटियर्स खड़े कर दिए हैं कि जिसके चलते भारतीय रेल ही वेंटीलेटर पर चली गई है। अब वही टीटीई विजिलेंस माफिया का नया वॉलंटियर बन जाता है और अब ट्रेन पर चढ़ने से पहले उसे विजिलेंस टीम के मूवमेंट का पूरा डिटेल पता होता है। अब अगर उसको अपने किसी सहयोगी/प्रतिद्वंद्वी टीटीई को निपटाना होता है, तो वह उसकी भी सेटिंग कर लेता है कि उसको कैसे फंसाना है तथा कब और कहां उसे चेक करवाना है? 

अगर साहेब लोगों का मूवमेंट उसकी ट्रेन में है, तो फिर या तो उनकी मांग के अनुसार बंदोबस्त रखेगा या फिर ऑन द स्पॉट उनके टेस्ट के अनुरूप चीजों की व्यवस्था करेगा। अब से पहले वह अपनी जानकारी में एक भी अवैध यात्री को अपने कोच में नहीं चढ़ने देता था, या  लड़कर भी पेनाल्टी के साथ उसकी टिकट बनाता ही था। अब वह हर ट्रिप में जब तक कम से कम 10 हजार नहीं कमा लेता है, अपनी ईमानदारी को कोसता रहता है। अब तो जो यात्री टिकट बनाने की जिद्द भी करता है, उसको कुछ डिस्काउंट कर सधे हुए चार्टेर्ड एकाउंटेंट की तरह समझा देता है कि टिकट बनाने में उसका कितना नुकसान है।

अब तो विजिलेंस टीम को ट्रेन से उतरने से पहले इतना देकर मुट्ठी गरम कर देता है कि जितनी उसके हफ्ते भर की सैलरी होती है, यह कहते हुए कि साहब यह तो सब आप लोगों की ही कृपा है। उसकी इस ईमानदारी, निश्छलता और सेवाभाव से भावविह्वल होते हुए विजिलेंस टीम स्टेशन पर उतरकर अपने अगले “भ्रष्टाचार उन्मूलन अभियान” की ओर बढ़ जाती है। अब वही टीटीई ट्रेन में भरपूर कमाई करने के साथ-साथ विजिलेंस केस में फंसे दूसरे स्टॉफ से दलाली करके भी कमाने लगता है।

विजिलेंस से पाला पड़ने के बाद इसी तरह की ईमानदारी की सीख फील्ड में कार्यरत लगभग सभी कर्मचारियों को मिलती है और इसी तरह से भ्रष्टाचार को खत्म करने की उनकी जिजीविषा बलवती होती जाती है। तकरीबन यही कहानी हर विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों के साथ कभी न कभी घटित होती है।

पहला, मेरा मानना है कि विजिलेंस की जगह रेलवे और अन्य मंत्रालयों में भी एक विभाग ऐसा बनाया जाए, जिसका काम विजिलेंस से ठीक उल्टा हो, जिसमें जैसे विजिलेंस (सतर्कता) में खोज-खोजकर केस बनाए जाते हैं, उस नए विभाग (समर्थता-क्षमता की खोज, पहचान और असलियत को समझने वाला विभाग) द्वारा पुरस्कार देने के लिए खोज-खोजकर ईमानदारी से सभी कर्मचारी और अधिकारी के काम का भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से निष्पक्ष ऑडिट करे, जो या तो आउट ऑफ टर्न प्रमोशन के रूप में हो या इंक्रीमेंट के रूप में। जिस कार्यसंस्कृति को आप बढ़ावा देना चाहते हों, उसी को इसका सबसे बड़ा क्राइटेरिया रखा जाना चाहिए।

जैसे अगर विश्वस्तरीय कार्य गुणवत्ता, अथवा विश्वस्तरीय से भी बेहतर कार्य, समय से या कम समय में, कम लागत पर कार्य, बिना गुणवत्ता पर समझौता किए पूरा करना, नए ट्रैफिक लाकर या इन्नोवेटिव तरीके से आय बढ़ाने पर, सेवा क्षेत्र में मानक स्वरूप नए तरह का कार्य करने पर, तकनीकी में दूरगामी सकारात्मक नया काम करने जैसे कार्यों को क्राइटेरिया रखा जाए। इसके लिए आउट ऑफ टर्न प्रमोशन, इंक्रीमेंट, मनचाहे शहर में पोस्टिंग, आउट ऑफ टर्न मकान अलॉटमेंट का प्रावधान या स्वेच्छा से परिवार नॉन-डिपेंडेंट (जैसे पैरेंट्स) में से किसी को भी अपने अधिकार में से एक या दो पास देने का प्रावधान, रिटायरमेंट के बाद अपनी पसंद के शहर में 2/3/4/5 साल के लिए रेलवे आवास में रहने की सुविधा आदि जैसे कुछ छोटे-बड़े ऐसे प्रावधान हों, जिन्हें कार्य के अनुसार और कार्य के रिकॅग्निशन के तौर पर दिया जाना चाहिए। इस रीति से अपने आप स्वस्थ और राष्ट्रहित वाली सकारात्मक कार्यसंस्कृति कुछ सालों में विकसित हो सकती है।

जब 10 रुपये का डिकॉय करके नियमानुसार किसी को नौकरी से तो निकाला जा सकता है और उसके साथ कई जिंदगियों को भी सड़क पर लाया जा सकता है, तो फिर ऐसा नियम क्यों नहीं बनाया जा सकता, जिससे अच्छा काम करने पर सब में उत्साह भरने के लिए और एक नई कार्यसंस्कृति को विकासोन्मुख तथा राष्ट्रहित में उपयोग करने के लिए उपरोक्त पुरस्कार रेलकर्मी और अधिकारी को देने का प्रावधान भी तो किया जा सकता है!

इसमें से कुछ सुविधाएं अभी भी दूसरे रूप में दी जा रही हैं, लेकिन उनका जो क्राइटेरिया है, वह जुगाड़, कार्टेल, चमचागीरी, भ्रष्टाचार, जात-पात, पैसा, लूट-खसोट और माफिया नियंत्रित है। नकारात्मक कार्यसंस्कृति के जितने भी अवयव हैं, वह अभी सभी प्रोत्साहन के, पुरस्कार के, रिकॅग्निशन के क्राइटेरिया हैं और विजिलेंस इसका पहला पहरुआ है।

दूसरा, मेरा मानना है कि एक ईमानदार समाज ही ईमानदार व्यवस्था को डिजर्व करता है। अगर कोई नागरिक अपनी नीयत और ध्येय में ईमानदार है, तो वह पहचान छुपाकर कोई बात या कंप्लेंट कतई नहीं करेगा।

यह मनुष्य की प्रकृति है कि जब उसे किसी पर घात करना होता है, तभी वह क्षद्म रूप अपनाता है। जो निडर होता है, वह छुपकर बात नहीं करता, बल्कि पहचान गलत बताकर या छिपाकर बात वही करता है, जिसमें खुद कोई कमी होती है, खोट होती है, जो अवसरवादी और घातकी होता है, क्योंकि जो वास्तव में डरा होता है, वह कुछ करता ही नहीं है, चूंकि उसे बखूबी पता होता है कि अंततः छुपता कुछ भी नहीं है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज सरकारी तंत्र में जो लोग विजिलेंस या इस तरह की अन्य एजेंसियों से संरक्षित (पैट्रोनाइज) नहीं हैं, वे काम न करना, निर्णय न लेना, अधिकार संपन्न न्याय न करना, सबसे सुरक्षित रास्ता मानते हैं, क्योंकि कंप्लेंट माफिया का बड़ा तंत्र कैंसर की तरह इस देश की पूरी व्यवस्था में फैला हुआ है।

ब्लैकमेलिंग और धन उगाही का इससे ज्यादा सम्मानित और आसान रास्ता और कोई नहीं है। इसमें कानून के बड़े-बड़े कथित जानकारों से लेकर छोटे स्तर के शातिर और अपराधिक दिमाग के लोग शामिल हैं। वे खुद परिवाद और आरटीआई की कमाई खाते हैं और इसके लिए एक बड़ा विजिलेंस जैसा डिपार्टमेंट भी उनके ही काम को आगे बढ़ाने के लिए सरकार ने खोल रखा है। सरकार ही जाने कि इससे आज तक उसकी भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था के कितने उद्देश्य पूरे हुए?

सुनने, पढ़ने, देखने और अनुभव में देश के हर नागरिक को तो यही लगता है कि 1947 के बाद और इन संस्थाओं की स्थापना के बाद से इस देश में कोई एक चीज “दिन दूनी रात चौगुनी” बढ़ी है, तो वह सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार, कदाचार और इसके उप-उत्पाद (बाई प्रोडक्ट्स) इत्यादि हैं।

फिर भी अगर सरकार इतना प्रावधान कर दे कि यदि परिवाद गलत साबित हुआ, तो परिवादकर्ता को उतनी ही कड़ी सजा दी जाएगी, जितनी परिवाद सत्य सिद्ध होने पर कर्मचारी/अधिकारी को दी जाती, तो बहुत हद तक विजिलेंस और सीबीआई जैसी संस्थाओं के समय, संसाधन और शक्ति का दुरुपयोग होने से बच जाता तथा देश के लाखों ईमानदार कर्मठ सरकारी कर्मचारी और अधिकारी निर्भीक होकर काम कर पाते। क्रमशः





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रेल मंत्रालय द्वारा मुंशी प्रेमचंद और मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित

रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) द्वारा रेल कर्मचारियों की साहित्यिक प्रतिभा और अभिरुचि को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से हिंदी में कहानी, उपन्यास, नाटक एवं अन्य गद्य साहित्य के लिए ‘मुंशी प्रेमचंद्र पुरस्कार’ और काव्य गजल संग्रह के लिए ‘मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार’ योजनाएं विगत काफी समय से चलाई जा रही हैं।

इन दोनों योजनाओं के अंतर्गत पुरस्कार एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान किए जाते हैं I पुरस्कारों में कथा, कहानी, उपन्यास, नाटक एवं अन्य गद्य साहित्य हेतु – प्रेमचंद्र पुरस्कार – जिसमें प्रथम पुरस्कार ₹20000, द्वितीय पुरस्कार ₹10000 एवं तृतीय पुरस्कार ₹7000 प्रदान किया जाता है।

इसी प्रकार मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार योजना के अंतर्गत काव्य/गजल संग्रह हेतु प्रथम पुरस्कार ₹20000,  द्वितीय पुरस्कार ₹10000 एवं तृतीय पुरस्कार ₹7000 दिया जाता हैI यह योजना रेल अधिकारियों और कर्मचारियों दोनों के लिए समान रूप से लागू है।

उपरोक्त दोनों विधाओं के लिए प्रविष्टियाँ प्राप्त करने की अंतिम तिथि 20.08.20 है। इच्छुक अधिकारी और कर्मचारी गण अपनी प्रविष्टियाँ निर्धारित तिथि के अंदर भेजने का प्रयास करें।



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रेलवे के निर्माण संगठनों द्वारा कब किया जाएगा गुणवत्तापूर्ण निर्माण कार्य!

एडवांस टेंडर, एडवांस स्टेशन स्थापनाओं, एडवांस खरीद और गुणवत्ताविहीन कार्यों जैसी तमाम भारी भ्रष्टाचारपूर्ण गतिविधियों को अविलंब रोका जाना चाहिए

सुरेश त्रिपाठी

रेलवे के निर्माण संगठनों द्वारा कब गुणवत्तापूर्ण निर्माण कार्य किया जाएगा, यह सवाल इन निर्माण संगठनों के ही फील्ड में कार्यरत अब लगभग सभी कर्मचारियों द्वारा उठाया जाने लगा है। उनका कहना है कि निर्माण संगठन के अधीन गुणवत्तापूर्ण तरीके से निर्माणाधीन नई लाइनों का निर्माण कब देखने को मिलेगा?

आखिर कब वह दिन आएंगे कि सीना ठोंक कर कहा जा सकेगा कि सीआरएस के निरीक्षणों के लिए नई लाइनें प्रस्तुत हैं। आखिर ऐसी गुणवत्तापूर्ण कार्यपद्धति को भौतिक रूप में कौन सीएओ अपने आउटपुट में दर्ज करवाएगा? और कौन महाप्रबंधक या मेंबर इंजीनियरिंग रेलवे बोर्ड इन्हेें ऐसे कार्यों के लिए विवश कर सकेंगे? यह सब देखने के लिए हम  फीलड कर्मचारियों को बड़ी बेसब्री से इंतजार है। यह उद्गार हैं रेलकर्मियों के!

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उनका बार-बार यही सवाल है कि आखिर निर्धारित मानक के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण निर्माण कार्य क्यों नहीं किया जा रहा है! नई लाइनों में रिवर्स कर्व डालने का आखिर क्या औचित्य है? आधा-अधूरा निर्माण कार्य करके “पेड सीआरएस निरीक्षण और अनुमोदन” से आखिर किसका हितसाधन पूरा हो रहा है। यह गंभीर जांच का विषय है।

आखिर लाइन बिछाने के लिए बनाए गए फार्मेशन में मिट्टी की क्वालिटी के साथ ही ब्लैंकेटिंग की क्वालिटी और उसके कम्पैक्शन की जांच और साथ ही वास्तविक एलाइनमेंट, जो ‘एल’ सेक्शन में प्रस्तावित होता है, उसके अनुरूप कार्य क्यों नहीं किया जाता है। इसकी जबाबदेही आखिर कब तय की जाएगी?

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जहां सीधी लाइन या सर्कुलर कर्व प्रस्तावित होता है, वहां उक्त लोकेशन पर रिवर्स कर्व डालने का आखिर औचित्य क्यों नहीं पूछा जाता है? आखिर क्यों लूट की छूट देकर रखी गई है कि जैसे-तैसे छोटे-बड़े पुलों के फार्मेशन का निर्माण करते हुए लाइन बिछाकर सीआरएस अनुमोदन करवा लिया जाए?

सीएओ/कंस्ट्रक्शन, महाप्रबंधक और सीआरएस द्वारा नई लाइनों में रिवर्स कर्व का औचित्य कयों नहीं पूछा जा रहा है। इतनी बड़ी गड़बड़ी को आखिर जानबूझकर क्यों नजरंदाज किया जा रहा है? इन उच्चाधिकारियों द्वारा अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाने का आखिर क्या अर्थ लगाया जाए?

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रेलवे की जमीन उपलब्ध नहीं होने के नाम पर रिटेनिंग वॉल के निर्माण पर करोड़ों रुपए आखिर क्यों खर्च किए जा रहे हैं। जमीन का अधिग्रहण जिसने करवाया, उससे इसका औचित्य क्यों नहीं पूछा जाता? यदि जमीन के अधिग्रहण में किसी प्रकार की कोई त्रुटि हुई है तो उसके तुरंत संज्ञान में आने पर आवश्यक दूरी में पुनः जमीन का अधिग्रहण क्यों नहीं सुनिश्चित किया जाता?

इस प्रकार की गंभीर लापरवाहियों के लिए संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध अब तक कोई उचित कार्रवाई क्यों नहीं शुरू की जा सकी है?

आखिर इस तरह रेलवे राजस्व के अनावश्यक खर्च को रोकने के लिए सीएओ/कंस्ट्रक्शन, महाप्रबंधक और रेलवे बोर्ड ने अब तक क्या कारवाई सुनिश्चत की? यदि नहीं, तो आखिर किन प्रयोजनों से संबंधित अधिकारियों को यह छूट देकर रखी गई है?

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इस तरह के ऐसे बहुत से सवाल जिम्मेदार रेलकर्मियों द्वारा अक्सर उठाए जाते रहे हैं, परंतु ऐसा लगता है कि रेल प्रशासन को इस सब के बारे में कोई चिंता नहीं है।

ऐसे तमाम कार्य खासतौर पर उत्तर रेलवे, पूर्वोत्तर रेलवे, पूर्व मध्य रेलवे, दक्षिण पूर्व रेलवे और उत्तर मध्य रेलवे सहित लगभग सभी जोनल रेलों में बड़े पैमाने पर किए गए हैं और अभी भी किए जा रहे हैं।

यही नहीं, ऐसे गुणवत्ताविहीन कार्यों का ‘पेड’ सीआरएस निरीक्षण और अनुमोदन भी कराया गया है। प्रमाण के लिए पिछले कुछ महीनों के दौरान हुए ऐसे सीआरएस निरीक्षणों और अनुमोदनों की वस्तुस्थिति देखी जा सकती है।

एडवांस टेंडर, एडवांस स्टेशन स्थापनाओं और एडवांस खरीद तथा गुणवत्ताविहीन कार्यों जैसी तमाम भारी भ्रष्टाचारपूर्ण गतिविधियों को यदि नहीं रोका गया और इनकी भौतिक निगरानी सुनिश्चित नहीं की जाती है, तो निश्चित रूप से जल्दी ही रेलवे का दीवाला निकल जाएगा, क्योंकि यही वह गतिविधियां हैं जिनके माध्यम से अधिकांश सरकारी राजस्व संबंधित अधिकारियों की जेब में जा रहा है। और यह भी सही है कि कमोबेश इस सब में नीचे से लेकर ऊपर तक सभी शामिल हैं। क्रमशः








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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘मन की बात’ में की गई भारतीय रेल की सराहना

कोविद-19 महामारी के विरुद्ध जारी हैं भारतीय रेल के हरसंभव प्रयास

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार, 26 अप्रैल को प्रसारित ‘मन की बात’ कार्यक्रम में भारतीय रेल के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि देश के किसी भी हिस्से में आवश्यक वस्तुओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए रेलकर्मी लगातार काम कर रहे हैं। भारतीय रेल द्वारा लगभग 60 मार्गों पर 100 से अधिक पार्सल ट्रेनें चलाए जाने का उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया।

सेवा के लक्ष्य के साथ, भारतीय रेल सभी मोर्चों पर कोविद-19 महामारी के विरुद्ध संघर्ष में हरसंभव तरीके से अपना योगदान दे रही है। रेल कोरोना योद्धा न केवल निरंतर मालगाड़ियों और पार्सल ट्रेनों का संचालन सुनिश्चित कर रहे हैं, बल्कि कई नवाचारों, शारीरिक दूरी बनाए रखने की कोशिशों सहित स्वच्छता प्रयासों के साथ कोविद-19 से भी लड़ रहे हैं।

भारतीय रेल के कुछ उल्लेखनीय प्रयास

•  मालगाड़ियों और पार्सल ट्रेनों  की औसत गति में निरंतर सुधार हो रहा है। जहां पार्सल  ट्रेनों  के लिए 75 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की औसत गति को बनाई रखी जा रही है, वहीं मालगाड़ी की औसत गति भी अबतक की सर्वश्रेष्ठ 50 किलोमीटर प्रति घंटा  की रफ्तार तक पहुंच रही है।

•  25 अप्रैल, 2020 तक कुल 245 समयसारिणी बद्ध पार्सल ट्रेनों का संचालन किया गया है, जिसमें से 212 ट्रेनें निर्धारित समय सरिणी के साथ चलीं और इसके साथ 86.5% की समग्र समयपालनता बनाए रखी गई। लॉकडाउन के दौरान उत्तर मध्य रेलवे ने आवश्यक वस्तुओं के लगभग 140 टन पार्सल ट्रैफ़िक बुक किए हैं।

•  उत्तर मध्य रेलवे ने अब तक अप्रैल में 32 लॉंग हॉल (दो माल गाड़ियों को एक साथ जोड़ कर) गाड़ियों का परिचालन किया है जिससे सेक्शन के थ्रूपुट में वृद्धि हुई है।

•  उत्तर मध्य रेलवे की विभिन्न इकाइयों द्वारा अबतक लगभग 1.5 लाख रीयूज़ेबल फेस कवर और 8000 लीटर सैनिटाइजर का उत्पादन किया गया है।

•  लॉकडाउन के दौरान उत्तर मध्य रेलवे द्वारा अब तक लगभग 75000 जरूरतमंद व्यक्तियों को पकाया हुआ भोजन प्रदान किया गया है। इसके अलावा पोर्टरों, सफाई कर्मचारियों, दिहाडी मजदूरों आदि को भी राशन वितरित किया गया है।

•  उत्तर मध्य रेल द्वारा मेडिकल कर्मियों के लिए पीपीई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कवरऑल भी बनाया जा रहा है और झांसी कारखाने तथा प्रयागराज  डिवीजन द्वारा क्रमशः 750 और 400 सहित अब तक कुल 1150 कवरआल तैयार हो चुके हैं। उत्तर मध्य रेल  ने अपने फ्रंटलाइन कोरोना योद्धाओं को संक्रमण से बचाने के लिए करीब 10000 कवरआल  बनाने की योजना बनाई है।

•  अब तक उत्तर मध्य रेल के लगभग 105000 रेल कर्मचारियों और उनके परिवार के सदस्यों के मोबाइल फोन पर आरोग्य सेतु ऐप डाउनलोड हो चुके हैं।








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कोविद-19 महामारी के दौरान भारतीय रेल द्वारा माल परिवहन हेतु घोषित की कई प्रोत्साहन योजनाएं

कोविद-19 महामारी को ध्यान में रखते हुए, भारतीय रेल ने माल ग्राहकों को प्रोत्साहन देने की घोषणा की है। इन प्रोत्साहनों से देश के निर्यात को बढ़ावा मिलने से  अर्थव्यवस्था को सहायता  मिलेगी। इन प्रयासों से माल ग्राहकों को भौतिक रूप से शेड में जाने के स्थान पर इलेक्ट्रॉनिक रूप से सामानों के लिए अपनी मांगों को पंजीकृत करने की सुविधा मिल सकेगी और इस प्रकार यह अधिक सुविधाजनक, तेज और पारदर्शी प्रक्रिया बनेगी।

डेमरेजव्हार्फेज और अन्य  शुल्कों  से छूट

कोविड महामारी के मद्देनजर, रेलवे बोर्ड ने निर्णय लिया है कि माल / पार्सल यातायात में फोर्स मेज्यूर  के तहत डेमरेज, व्हार्फेज, स्टैकिंग, स्टैबलिंग चार्ज नहीं लगेंगे। इसी तरह कंटेनर ट्रैफिक के लिए भी डिटेंशन चार्ज  और ग्राउंड  यूसेज चार्ज भी नहीं लागू होगा। ये दिशानिर्देश 22.03.2020 से 03.05.2020 तक लागू हैं।

फ्रेट फारवर्डर्सआयरन एंड स्टीलआयरन ओर और नमक के ट्रैफिक के मामले में इलेक्ट्रॉनिक रजिस्ट्रेशन ऑफ डिमांड (e-RD) और इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन रेलवे रिसिप्ट  (eT-RR) सुविधा का विस्तार

मांग का इलेक्ट्रॉनिक पंजीकरण (ई-आरडी) ग्राहकों को भौतिक रूप से माल शेड जाने के बजाय इलेक्ट्रॉनिक रूप से माल की अपनी मांगों को पंजीकृत करने की सुविधा प्रदान करता है। यह सरल, सुविधाजनक, त्वरित और पारदर्शी है।

रेलवे रसीद (ईटी-आरआर) का इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन, पेपरलेस ट्रांजेक्शन सिस्टम से एक कदम आगे है, जिसमें रेलवे रसीद भी उत्पन्न की जाती है और एफओआईएस के माध्यम से ग्राहक को इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रेषित की जाती है, और यहां तक कि माल की डिलीवरी भी ईटी-आरआर के ई-सरेंडर के माध्यम से दी जाती है। इससे ग्राहक को मांग पंजीकरण, माल की डिलीवरी लेने के लिएऔर आरआर/चालान प्राप्त करने के लिए माल शेड जाने आवश्यकता समाप्त हो जाती है।

रेलवे रसीद (आरआर) के बिना माल प्राप्त करना

जहां तक संभव हो, ग्राहकों  को ईटी-आरआर का विकल्प चुनने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि माल की डिलीवरी  लेने के लिए ओरिजिनल पेपर आरआर को गंतव्य बिंदुओं तक नहीं ले जाना पड़े। हालांकि कागज आरआर के मामले में भी, कंसाइनर (पार्टी भेजने वाली पार्टी) मूल स्टेशन पर नाम, पदनाम, आधार, पैन, जीएसटीआईएन जैसे कंसाइनर/रिसीवर का विवरण प्रदान करेगा जिसे वाणिज्यि कंट्रोल के माध्यम से गंतव्य तक पहुंचाया जाएगा। टीएमएस में इन विवरणों के सत्यापन के बाद डिलीवरी दी जाएगी और इसके लिए इंडेमिनिटी नोट जमा करना, जिसमें यह कहा गया होगा कि कोई भी दावा उनकी जिम्मेदारी होगी और आरआर की स्कैन/फोटोकॉपी होगी। ये दिशानिर्देश 03.05.2020 तक मान्य हैं।

कंटेनर यातायात को प्रोत्साहित करने के लिए नीतिगत उपाय

क.  खाली कंटेनरों और खाली फ्लैट की आवाजाही के लिए हॉलेज चार्जों को लागू ना करना:- कोविड-19  के कारण लॉकडाउन के मद्देनजर, रेलवे बोर्ड ने निर्णय लिया है कि 24.03.2020 से 30.04.2020 तक खाली कंटेनरों और खाली फ्लैट वैगनों की आवाजाही के लिए कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा। इससे न केवल भार्तीय रेल बल्कि निर्यात में वृद्धि से  अर्थव्यवस्था को बढ़ावा भी देने की उम्मीद है।

ख. कंटेनर ट्रैफिक की सहायता के लिए चार्ज में हब और स्पोक प्रणाली के तहत छूट:- कंटेनरों को रेलवे टेलीस्कोपिक दर का लाभ देता है, जिसमें बीच में एक ब्रेक / ट्रांजिट प्वाइंट के साथ ट्रैफिक प्रारंभिक स्थान से गंतव्य तक पहुंचाया जाता है। इसे हब एंड स्पोक सिस्टम कहा जाता है। मौजूदा दिशा-निर्देशों के तहत, पारगमन बिंदु के बीच का ब्रेक पांच दिनों तक सीमित है। कोरोना वायरस के प्रभाव के फलस्वरूप आईसीडी पर कार्गो की निकासी में देरी को ध्यान में रखते हुए रेलवे बोर्ड ने दिनांक 16.04.2020 से 30.05.2020 तक टेलीस्कोपिक लाभ प्राप्त करने के लिए सीमा को पांच दिनों से बढ़ा कर पंद्रह दिनों तक करने का निर्णय लिया है।

माल परिवहन के लिए छूट

रेलवे के पास ऐसे ग्राहकों के लिए ऐसे परिवहन उत्पाद / योजनाएँ हैं जो मानक लंबाई की रेक, दो आरंभिक प्वाइंट से प्रारंभ होने वाली रेक, दो गंतव्यों वाली रेक आदि की बुकिंग करना चाहते हैं।

ऑपरेटिंग ऑप्टिमाइजेशन की दृष्टि से दूरी प्रतिबंध आदि के साथ ये सभी छूट मालग्राहकों के लिए उपलब्ध है। कोविड लॉकडाउन के दौरान निम्नलिखित सुविधाएं प्रदान की गई हैं :-

क. मिनी रेक के लिए दूरी प्रतिबंध 600 किमी था, जिसे इंट्रा ज़ोनल ट्रैफ़िक के लिए 1000 किलोमीटर तक बढ़ाया गया था। अब इंटर जोनल और इंट्रा जोनल ट्रैफिक दोनों के लिए एक समान 1500 किलोमीटर की अनुमति दे दी गई है।

ख. इसी तरह, दो प्वाइंटों से प्रारंभ होने वाले रेकों के लिए एक दूरी का प्रतिबंध है जिसके तहत लीन सीज़न में दो लोडिंग पॉइंट पर 200 किमी से अधिक और पीक सीज़न 400 किमी से अधिक दूरी नही होनी चाहिए। यह व्यवस्था रेक के इष्टतम उपयोग सुनिश्चित करने के लिए है। पर अभी बिना किसी सीज़न के बंधन के, 500 किमी तक के लोडिंग पॉइंट के  दूरी प्रतिबंध की छूट दी गई है।

ग. इसके अलावा, ट्रेन लोड के लाभ के लिए निर्धारित संख्या में वैगनों को लोड किया जाना आवश्यक है अन्यथा यदि लोडेड वैगनों की संख्या इस संख्या से कम है तो बुकिंग वैगन-लोड दरों में की जाती हैं, जो थोड़ी अधिक होती हैं।

इस प्रावधान में भी बीसीएनएचएल वैगनों के संबंध में छूट दी गई है, ये एक प्रकार के कवर्ड वैगन हैं जिनको मुख्य रूप से बैग्ड कन्साइनमेंट जैसे खाद्यान्न, कृषि उपज अर्थात प्याज आदि के लिए उपयोग किया  जाता  हैं। आवश्यक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के दृष्टिगत उनके लदान को प्रोत्साहित करने के लिए इन में अब ट्रेन लोड के लाभ के लिए पहले की न्यूनतम संख्या 57 के स्थान पर अब 42 वैगनों को लोड किए जाने की छूट दी गई है।

पैरा 5 में ये सभी छूट 30.09.2020 तक मान्य हैं।








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अधिकारियों द्वारा जारी है रेल सेवाओं के विलय का पुरजोर विरोध

कैडर मर्जर का रेल संचालन और यात्री संरक्षा/सुरक्षा पर पड़ेगा बुरा प्रभाव

मर्जर का फैसला रेल अधिकारियों की सहमति से लिया गया है, यह सरासर झूठ है

भारतीय रेल की आठ संगठित सेवाओं के मर्जर के खिलाफ रेलवे की तीन सिविल सर्विसेस के अधिकारियों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। इन अधिकारियों का कहना है कि यह फैसला एकतरफा लिया गया है और इसमें सबकी सहमति शामिल नहीं है। उनका कहना है कि इससे रेल संचालन पर बुरा असर पड़ेगा और यात्री संरक्षा/सुरक्षा भी बुरी तरह प्रभावित होगी।

उल्लेखनीय है कि रेलमंत्री ने बिना किसी सलाह-मशवरे के रेलवे में सर्विस मर्जर का बड़ा फैसला लिया है, लेकिन रेलवे के अधिकारी इस फैसले से सहमत नहीं हैं और इसीलिए वे इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं। रेलवे के 13 जोन और 60 डिविजन के सिविल सर्विस अधिकारियों ने 250 पेज का ज्ञापन प्रधानमंत्री सहित रेलमंत्री और रेलवे बोर्ड को सौंपा है। इसमें कहा गया है कि सरकार का यह फैसला एकतरफा है और इस फैसले से यात्री संरक्षा और ट्रेनों के संचालन पर बुरा असर पड़ेगा।

रेल मंत्रालय ने आठ सर्विस कैडरों को एक साथ मर्ज करने का फैसला किया है। मंजूरी के लिए इसे कैबिनेट और प्रधानमंत्री के पास भी भेजा गया है। रेलवे ने प्रेस विज्ञप्ति जारी करके घोषणा की थी जिसमें कहा गया था कि मर्जर का फैसला रेलवे के अधिकारियों की सहमति से लिया गया है, जबकि यह सरासर झूठ है। तथापि इसमें बताया गया था कि 7-8 दिसंबर 2019 को अधिकारियों के साथ ‘परिवर्तन संगोष्ठी’ का आयोजन किया गया था।

अधिकारियों का दावा है कि परिवर्तन संगोष्ठी में 12 ग्रुप बनाए गए थे जिनका हेड जनरल मैनेजर को बनाया गया था और यह फैसला सिविल सर्विस अधिकारियों को नजरअंदाज करने तथा इंजिनियरिंग सर्विस के अधिकारियों को तवज्जो देने के लिए किया गया था।

उनका कहना है कि सभी जनरल मैनेजर इंजिनियरिंग सर्विस के हैं। इन अधिकारियों का कहना है कि बैठक में केवल जीएम (जनरल मैनेजर) ही अपनी बात रख सकते थे। ऐसे में जनरल मैनेजर की व्यक्तिगत राय को पूरे ग्रुप की राय बताया गया, जो कि गलत है, क्योंकि एक जीएम की व्यक्तिगत राय को सभी कैडर अधिकारियों की राय नहीं माना जा सकता है।

इसमें कहा गया है कि जब इस फैसले में आम सहमति शामिल नहीं है तो यह तरीका लोकतांत्रिक कैसे हो गया? एक रेल अधिकारी का कहना था कि ज्ञापन में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि रेलवे का यह फैसला यात्री संरक्षा और सुरक्षा के साथ समझौता साबित हो सकता है।

अधिकारी ने बताया कि मंत्रालय पहले ही आश्वस्त कर चुका है कि सिविल सर्विस के जरिए आने वाले अधिकारियों के अधिकारों को सुरक्षित रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि अधिकारयों से ईमेल के माध्यम से भी सुझाव देने की अपील की गई है और 900 से ज्यादा सुझाव अब तक मिले भी हैं।

ज्ञातव्य है कि रेल मंत्रालय ने मकैनिकल, इलेक्ट्रिकल, स्टोर्स, पर्सनल, ट्रैफिक, सिविल इंजिनियरिंग, सिग्नल एंड टेलिकॉम और एकाउंट्स सर्विस कैडर को मिलाकर एक सर्विस ‘इंडियन रेलवे मैनेजमेंट सर्विस’ बनाने का निर्णय किया गया है। फिलहाल आरपीएफ और मेडिकल को इससे अलग रखा गया है। 








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‘समस्त ब्राह्मण सेवा समाज, कल्याण’ द्वारा साड़ी भेंट कर किया गया समाज की महिलाओं का सम्मान

समाजसेवी डॉ ब्रजेंद्र सारस्वत, करुणाशंकर शुक्ल और विद्या प्रसारक विजय उपाध्याय की रही गरिमापूर्ण उपस्थित

कल्याण : समस्त ब्राह्मण सेवा समाज, कल्याण के तत्वावधान में सुप्रसिद्ध समाजसेवी और जाने-माने हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ ब्रजेंद्र सारस्वत (एमडी/मेडिसिन, हार्ट, लंग्स, अस्थमा विशेषज्ञ) के सहयोग से गुरुकृपा हॉस्पिटल प्रांगण, बिड़ला कालेज रोड, कल्याण में रविवार, 12 जनवरी को मकर संक्रांति के उपलक्ष्य में  एक समाजोपयोगी कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर डॉ ब्रजेंद्र सारस्वत के हाथों समाज की 30 बुजुर्ग महिलाओं का साड़ी भेंट करके उनका सम्मान किया गया।

इस समाजोपयोगी कार्य में कान्यकुब्ज मंडल मुंबई के ट्रस्टी और समाजसेवी करुणाशंकर शुक्ल, सुप्रसिद्ध आयडियल शिक्षा संस्था के प्रमुख, समाजसेवी एवं विद्या प्रसारक विजय उपाध्याय, समस्त ब्राह्मण सेवा समाज के सचिव सुरेंद्र शर्मा, पत्रकार गंगाधर तिवारी, रेल समाचार के संपादक सुरेश त्रिपाठी, विनोद कुमार शर्मा इत्यादि ने डॉ सारस्वत का सहयोग किया।

करीब दस साल पहले रेलवे से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर समाज की सेवा में लग गए डॉ सारस्वत ने इस मौके पर समस्त ब्राह्मण सेवा समाज के ऐसे समाजोपयोगी कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि समाज के उत्थान के लिए समाज के सक्षम लोगों को आगे आना चाहिए। उन्होंने बड़ी संख्या में उपस्थित महिलाओं का सम्मान करते हुए कहा कि समाज में महिलाओं की उन्नति से ही समाज का व्यापक भला हो सकता है। डॉ सारस्वत ने कहा कि हमें महिलाओं को बढ़ावा देने और उनकी उन्नति पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए संस्था के सचिव सुरेंद्र शर्मा ने उपस्थित महिलाओं को संबोधित करते हुए उनसे अनुरोध किया कि वे सब भरे-पूरे परिवार का हिस्सा हैं, ऐसे में वह अपने बच्चों और नाती-पोतों को वैदिक संस्कार प्रदान करें, इससे हमारे बच्चों की बौध्दिक उन्नति तो होगी ही, बल्कि इसके साथ ही इन सामाजिक एवं पारिवारिक संस्कारों के चलते एक स्वस्थ समाज की स्थापना करने में भी उनका यह प्रयास बहुत कारगर साबित होगा।

कान्यकुब्ज मंडल, मुंबई के वरिष्ठ ट्रस्टी एवं समाजसेवी करुणाशंकर शुक्ल ने इस अवसर पर महिलाओं और समाज का मार्गदर्शन किया और डॉ सारस्वत द्वारा कही गई बातों का समर्थन किया।

आयडियल शिक्षा संस्था के प्रमुख एवं समाजसेवी विजय उपाध्याय ने अपनी अति-व्यस्त दिनचर्या से थोड़ा सा वक्त निकालकर और इस महत्वपूर्ण मौके पर उपस्थित होकर कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई। उन्होंने संस्था द्वारा किए जा रहे कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि समाज हित में और समाज के काम के लिए वह हमेशा खड़े हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे मौकों पर न सिर्फ एक-दूसरे से मिलना होता है, बल्कि यह भी पता चलता है कि हम समाज के लिए और क्या-क्या कर सकते हैं।

उन्होंने अपने स्वभाव और प्रोफेशन के अनुरूप उपस्थित सभी सम्मानित महिलाओं से यही निवेदन किया कि वे अपने बच्चों की उचित देखभाल और शिक्षा का अवश्य ध्यान रखें। उन्होंने महिलाओं से खासतौर पर बच्चियों की शिक्षा और स्वावलंबन पर विशेष ध्यान देने का अनुरोध किया और पुनः इस बात को दोहराया कि वे समाज के हित में हमेशा तत्पर हैं।

कान्यकुब्ज मंडल, कल्याण की सक्रिय कर्ताधर्ता और समाजसेवी श्रीमती प्रभा तिवारी ने उपस्थित महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा कि हमें ब्राह्मण-ब्राह्मण में भेद को मिटाना चाहिए और पीछे का सब कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़कर आपस में बिना किसी भेदभाव के हमें अपने संबंधों को मजबूत करना चाहिए, तभी एक सुदृढ़ समाज का निर्माण होगा। उन्होंने कहा कि संस्कार और सेवा देना ही हमारी संस्कृति रही है, इसे हमें आगे बढ़ाना है। उनके इस सुझाव का सभी उपस्थित लोगों ने स्वागत किया। इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार गंगाधर तिवारी ने भी महिलाओं का मार्गदर्शन किया।

इस मौके पर मकर संक्रांति के उपलक्ष्य में सभी महिलाओं को हल्दी-कुमकुम लगाकर उचित सत्कार किया गया और तिल-गुड़ देकर उनका पूरा साल मीठा-मीठा (अच्छा-अच्छा) जाने और सपरिवार सुखी-संपन्न रहने की कामना की गई।

इस समाजोपयोगी कार्यक्रम को सफल बनाने में श्रीमती राजलक्ष्मी शर्मा, श्रीमती प्रभा तिवारी, श्रीमती मालती अवस्थी, श्रीमती कांति दुबे, श्रीमती अनिता दुबे, श्रीमती प्रभा शर्मा, श्रीमती ऊषा पांडेय एवं श्रीमती लक्ष्मी शुक्ला आदि महिलाओं सहित सुरेश त्रिपाठी, विनोद कुमार शर्मा, घनश्याम आर. पांडेय, एच. एस. शर्मा, हरिशंकर अवस्थी और सुरेंद्र शर्मा (बबलू) इत्यादि सहयोगियों का विशेष योगदान रहा। कार्यक्रम के समापन पर सुरेंद्र (बबलू) शर्मा के सौजन्य से सभी उपस्थितों को अल्पाहार के बाद ससम्मान विदा किया गया। 








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आईआरसीटीसी के अधिकृत एजेंटों द्वारा ई-टिकट पर निर्धारित राशि से अधिक वसूली

जेडआरयूसीसी सदस्यों ने आवश्यक कार्यवाही हेतु जीएम एवं आईआरसीटीसी को लिखा पत्र

अहमदाबाद : क्षेत्रीय रेल उपयोगकर्ता परामर्शदात्री समिति, पश्चिम रेलवे के सदस्य योगेश मिश्रा एवं किंजन पटेल ने महाप्रबंधक, पश्चिम रेलवे और चीफ ग्रुप मैनेजर (सीजीएम) आईआरसीटीसी, पश्चिम जोन को एक पत्र लिखकर कहा है कि अहमदाबाद मंडल के अंतर्गत दहेगाम स्टेशन के करीब स्थित दहेगाम गांव में आस्था टूर एंड ट्रेवल्स नामक संस्था को आईआरसीटीसी की ई-टिकट बनाने की एजेंसी प्रदान की गई है, वह यात्रियों से निर्धारित शुल्क, रेलवे की टिकट का प्रिंट देने के लिए प्रति व्यक्ति ₹300 अतिरिक्त राशि की वसूली की जाती है।

सदस्यों का कहना है कि एजेंसी का यह कृत्य पूरी तरह से असंवैधानिक है,  यात्रियों का शोषण है और यह रेल टिकटों की खुलेआम कालाबाजारी है।

उन्होंने लिखा है कि इस तरह के अनधिकृत कार्य को रोकने के लिए तुरंत उचित कार्रवाई की जाए  एवं अधिकृत एजेंटों की नियमित जांच की जाए,  कि यात्रियों से अधिक राशि की वसूली न करें। सतर्कता विभाग को सूचित किया जाए कि इन एजेंटों पर तुरंत कार्यवाही करें।

उन्होंने पत्र में उदाहरण देते हुए बताया है कि हम आपको आस्था टूर एंड ट्रेवल्स का टिकट हमारे माननीय सदस्य ने स्वयं ही क्रय किया है, जो हम आप को सबूत के लिए बता सकते हैं। इस टिकट पर प्रति व्यक्ति ₹300 अतिरिक्त, टिकट पर लिखी कीमत से अधिक राशि ली गई है, जो यह प्रमाणित करता है।

उनका कहना है कि यदि जेडआरयूसीसी सदस्य से स्वयं उसके टिकट के पर इस तरह से अधिक धनराशि वह ले रहे हैं, तो जाहिर है कि अन्य व्यक्तियों से भी ₹300 से ₹500 अतिरिक्त लेते ही होंगे, जो कि रेलवे अधिनियम के तहत पूरी तरह अनधिकृत कार्य है।

इस कार्य के लिए इस संस्था पर तो कार्यवाही की जाए,  परंतु आईआरसीटीसी के द्वारा मान्य अन्य एजेंसियों की भी नियमित जांच की जाए और उन पर कड़ी कार्यवाही की जाए, जिससे कि रेलवे की छवि, एजेंट लोग जो खराब कर रहे हैं, इसे धूमिल होने से बचाया जा सके। 








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