संवेदनशील पदों पर लंबे समय से बैठे हैं लेखाकर्मी – RailSamachar

फील्ड स्टाफ से ऑफिस स्टाफ की अदला-बदली करके भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जाए

एक ही कार्यालय में कुर्सियों की अदला-बदली करके स्टाफ को भ्रष्टाचार करने से रोकना अत्यंत मुश्किल है! निर्धारित समय पर आवधिक स्थानांतरण सुनिश्चित किए जाएं! इसमें रेल संगठनों के हस्तक्षेप को सरकारी काम में बाधा डालने के अपराध के समकक्ष माना जाए!

पश्चिम रेलवे के एफए एंड सीएओ (एस एंड सी) ऑफिस, चर्चगेट, मुंबई में अधिकांश लेखा स्टाफ लंबे समय से संवेदनशील पदों पर विराजमान है। जो लेखा कर्मचारी संवेदनशील पदों पर हैं, उनको 4 साल से भी ऊपर हो गए हैं।

इसमें कांट्रैक्टर्स के बिल पास करने और फाइनेंस सेक्शन में सारे प्रस्तावों की वेटिंग करने वाले कर्मचारी अपनी जगह पर लंबे समय से जमे हुए हैं।

इनके साथ ऑफिसर भी मिले हुए हैं। इसीलिए उनका निर्धारित समय पर आवधिक स्थानांतरण (पीरियोडिकल ट्रांसफर) नहीं किया जाता है। इसके अलावा जो एक्जीक्यूटिव ऑफिस में हैं, उनका भी यही हाल है।

बताते हैं कि पश्चिम रेलवे एकाउंट्स ऑफिस में भ्रष्टाचार इतना ज्यादा बढ़ गया है कि जिनके घरों में फेमिली के लोग कोरोना संक्रमित हैं, लेकिन वह ऑफिस में बिल पास करने आ जाते हैं। इसके लिए उन पर दबाव तो डाला ही जाता है, लेकिन इसमें कमीशन के लिए उनका भी हित जुड़ा होता है।

जानकारों का कहना है कि कांट्रैक्टर को अपने पेमेंट से मतलब होता है, चाहे जिसे कोरोना हो या न हो। इसके लिए वर्क्स एकाउंटेंट्स की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि बिल पास करवाने में उसकी मुख्य भूमिका होती है।

उनका कहना है कि इसी वजह से पश्चिम रेलवे के एकाउंट्स ऑफिस में भी कोरोना का कहर सतत जारी है। जानकारों का कहना है कि बीएमसी और रेल प्रशासन को ऐसी गतिविधियां करने वालों को अविलंब रोकना चाहिए।

उनका यह भी कहना है कि भ्रष्टाचार को रोकने के लिए न्यूनतम स्तर पर यही किया जा सकता है कि एक ही कार्यालय में कार्यरत कार्मिकों की आपस में कुर्सियां बदलने के बजाय फील्ड स्टाफ से ऑफिस स्टाफ की अदला-बदली की जानी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि सभी रेलों में जोनल एवं मंडल मुख्यालयों में कार्यरत सभी राजपत्रित एवं अराजपत्रित कर्मचारियों के आवधिक स्थानांतरण सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सीनियर डिप्टी जनरल मैनेजर एवं चीफ विजिलेंस ऑफीसर (एसडीजीएम/सीवीओ) की होती है, जो कि वे उचित तरीके से नहीं निभा पाते हैं, क्योंकि उन्हें रेल आवास आवंटित करने जैसे फालतू काम सौंपे गए हैं, जो कि कोई एडीजीएम स्तर का अधिकारी भी कर सकता है।

उन्होंने बताया कि “They work as they wish“ शीर्षक के अंतर्गत 1 मार्च 2021 को कानाफूसी.कॉम द्वारा प्रकाशित खबर का संज्ञान लेते हुए पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक आलोक कंसल ने उक्त विषय जांच और कार्रवाई के लिए विजिलेंस को सौंपा था, परंतु विजिलेंस ने अब तक उस पर क्या कदम उठाया, यह किसी को भी पता नहीं है।

उन्होंने कहा कि “जबकि सर्वप्रथम जिन लेखाकर्मियों का ट्रांसफर होने के बाद भी वे न सिर्फ पुराने पदों पर ही कार्यरत हैं, बल्कि दूसरों को आवंटित कार्य भी उन्होंने अपने खाते में जुड़वा लिया था, उन्हें तत्काल वहां से हटाने के बाद निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की जानी चाहिए थी। चूंकि विजिलेंस द्वारा ऐसा कुछ नहीं किया गया, इसलिए उक्त पदों पर बैठे लेखाकर्मी बदस्तूर भ्रष्टाचार और बिल पासिंग में लगे हुए हैं।

उन्होंने जीएम आलोक कंसल से अपेक्षा की है कि वे उपरोक्त विषय पर तुरंत संज्ञान लेकर यथाशीघ्र उचित कार्रवाई सुनिश्चित करें।

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रेलवे के अधिकारियों ने डेपुटेशन पर आकर मेट्रो में भी फैलाई गंदगी

If Sreedharan wasn’t favourable to Mangu Singh then the scenario of DMRC would have been different today!

Truck falls into caved road following heavy rainfall in Delhi

A truck falls in a caved-in part of a road near a metro construction site at Khaira More, following heavy rains, in Najafgarh area. According to police, information was received about the incident at around 1 am. Due to incessant rainfall Wednesday night, the road caved in and the rainwater entered inside many shops and buildings near the spot. “A truck fell into the caved portion of the road. But no injury or loss of life was reported,” a senior police officer said.

“A portion of the road along with the footpath at Khaira Road near the Dhansa Stand Metro Station caved in late Wednesday night after a drain burst in the area due to excess flow of continuous rain water. Adding that a truck fell in to the caved road.” the Delhi Metro Rail Corporation (DMRC) said in a statement on Thursday.

The incident has also caused partial damage to an adjacent building. There has been no casualty or injury and senior DMRC officials are at the site to supervise the repair work, it said.

“Repair work of the caved in portion is in progress and all efforts shall be made to complete the work at the earliest. DMRC is now filling below the road with additional concrete to avoid the recurrence of this problem in the future. The contractor firm working in this project is M/s Paras Railtech Pvt Ltd.” the DMRC stated.

चीनी कंपनी ने चार राज्यों का ट्रैफिक कैसे रोका? लोगों के घरों-मकानों को कैसे दरकाया? चीनी कंपनी ने लोगों की रोजी-रोटी और पानी कैसे बंद किया? दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार और मेट्रो रेल प्रशासन क्या कर रहा है? यह कुछ सवाल खैरा मोड़ नजफगढ़ दिल्ली के रहिवासी पूछ रहे हैं, जो पिछले दो सालों से मेट्रो रेल प्रशासन और चीनी कंपनी तथा उसके ठेकेदारों की मनमानी आजिज आ चुके हैं परंतु उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

देखें, “प्रेस नोट” चैनल की यह खबर

स्थानीय लोगों का कहना है कि जिसका डर था, वही हुआ, तीसरी बार दिल्ली के खैरा मोड़, नजफगढ़ में मेट्रो द्वारा निर्माणाधीन साइट गिर गई। ट्रैफिक बंद हो गया। मेट्रो के ठेकेदार और पीडब्ल्यूडी ने मिलकर यह कारनामा किया।

नजफगढ़ विकास मंच ने कल दिन में ही सूचित कर दिया था, परंतु मेट्रो के संबंधित ठेकेदार ने सिर्फ ट्विटर पर पीडब्ल्यूडी को सूचित करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली थी।

#हम_नहीं_सुधरेंगे वाली स्थिति है, क्योंकि इससे पहले भी इसी एरिया के एक गढ़्ढ़े में एक ट्रक धंस गया था, जिसकी भराई मेट्रो द्वारा सही तरीके से नहीं की गई थी और अब बुधवार, 19 मई को फिर एक ट्रक ऐसे ही गढ़्ढ़े में गिरकर चकनाचूर हो गया।

भ्रष्टाचार अब चरम सीमा पर है, रेलवे के अधिकारियों ने डेपुटेशन पर आकर मेट्रो में भी गंदगी फैला दी!

एक निजी ट्रैक निर्माण कंपनी को ठेका दिया गया। निर्माण कंपनी का मालिक रेलवे का ही एक पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर है, जिसके पुराने संबंध रेलवे से मेट्रो में प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारियों से पहले से ही हैं, जो कि मेट्रो में प्रमुख पदों पर कार्यरत हैं।

बताते हैं कि रेलवे का यह पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर रेलवे में रहते हुए भी ठेकेदारों के साथ मिलकर रेलवे की ठेकेदारी किया करता था और बाद में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर रेलवे और मेट्रो में ही ठेकेदार बन गया।

मेट्रो में सुपरवाइजर स्तर पर कार्यरत और नाम न उजागर करने की शर्त पर कुछ सीनियर सेक्शन इंजीनियरों ने बताया कि उक्त ठेकेदार अर्थात पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर की कंपनी को टेंडर के आवंटन में भी गड़बड़ी की गई है।

उन्होंने बताया कि ऐसी बहुत से आइटम्स का पेमेंट किया गया है जो कार्य हुआ ही नहीं है। इसकी पुष्टि मेट्रो में कार्य कर चुके कुछ अधिकारियों ने भी की है। उनका कहना था कि इस पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर और इसकी कंपनी ने मेट्रो पर पूरी तरह कुंडली मारकर रखी है।

उन्होंने बताया कि इस पूर्व रेल अधिकारी ने अपनी दो नंबर की कमाई को एक नंबर करने के लिए ही स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर ठेकेदारी चालू किया है।

उनका कहना है कि निर्माण कार्यों में निर्धारित मात्रा से कम मात्रा में इसने हमेशा सीमेंट-सरिया डाली है और बोगस भुगतान करने में यह माहिर था। अब मेट्रो में वैसा ही करके बोगस भुगतान लेने लगा है। इसकी भूख बढ़ती जा रही है।

सवाल यह उठ रहा है कि सेटिंग हो पाएगी या नहीं? क्योंकि पीडब्ल्यूडी दिल्ली के अधिकारी भी तो डेपुटेशन पर दिल्ली मेट्रो में कार्य कर रहे हैं!

उधर दो-दो बार एक्सटेंशन पा चुके दिल्ली मेट्रो के एमडी अपनी पूरी अकड़ में हैं। परंतु जब उनके अधिकारी कोविड के दौरान टेंडर जारी कर सकते हैं, टेंडर अवार्ड कर सकते हैं, तो मार्च 2021 में ही उन्होंने कार्य क्यों नहीं पूरा किया? इस प्रश्न का जवाब देने के लिए कोई तैयार नहीं है।

अब सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या अधिकारीगण – मंत्री को दिग्भ्रमित कर पाएंगे? क्योंकि मंत्री जी यदि काम के लिए बोलते हैं तो अधिकारी कोविड-19 का बहाना बनाकर घर में बैठ जाते हैं और कोविड पीरियड में ही काम करने के लिए ठेकेदारों पर लट्ठ चलाते हैं ये अधिकारी।

Though Sridharan was a result oriented engineer, had he been able to be great by following all Govt’s rules & regulations?

A former general manager of Railways, who is not wish to disclose his name, writes – “Sreedharan is too big a man, that’s why I don’t want to criticize him openly in any group, but in my opinion he is a bit of a fake, like another mechanical engineer who was retired as CRB, (although fake is probably too strong a word for sreedharan, but right now nothing softer comes to my mind).

As long as he was in Railways including as Member Engineering (ME), nobody had heard anything exceptional about him except his restoration of Pamban bridge in 1963. Apart from that he was just like any other ordinary Board Member who completed his tenure and retired.

Then AM (CE) once told me, when I was posted in the Railway Board, that when Sreedharan joined as ME, he called a meeting of all Advisers, EDs and Directors of the Civil Engineering department. He was Director in Selection Grade at that time, so he also attended.

In that first meeting Sreedharan told them something to this effect (I may be incorrect about the exact wordings); “All of you are very good in your work and also competent, moreover your field experience is much more recent than mine. So I expect all of you will deal with all files at your level without finding it necessary to mark any file to me. However, if you feel that some particular file is tricky or complicated and needs my personal perusal or order then you can put up that file to me. However, in that case, I’ll also seriously consider transferring you out of the Railway Board.” He said that after that meeting, no one ever put up any file to ME.

I was flabbergasted. I asked him, how can a Board Member with his supposedly superior knowledge and undoubtedly more experience, absolve himself of the responsibility of guiding his juniors and teaching them? He laughed, and remarked, “देख लो Partner, reputation ऐसे ही बनती है।”

Sreedharan was appointed as MD/KRCL because of his close proximity to George Fernandes, the then Minister for Railways.

As MD/KRCL (also as MD/DMRC) he had a red coloured digital timer on his side table facing visitors which displayed, “xxx days to completion of yyy project”. The number of days displayed used to keep blinking to catch the visitor’s eye, and the number kept reducing by one every day.

Visitors to his office were terribly impressed with this system of monitoring whereby the MD was personally keeping track of each project on a day to day basis.

A junior officer, who was my Director had earlier worked under Sreedharan in KRCL, told me that every few months the red digital timer clock would be reset and the number of ‘days to completion of a particular project’ would be increased to adjust for the time over run! Since the same visitor rarely returned twice, and even if he did, he was unlikely to remember what he had seen earlier, none of them could catch on to this trick.

As MD/KRCL he changed the alignment of the line passing through Goa, thereby saddling KRCL with additional cost over run of around 200+ crores. As it was, KRCL project was financially unviable, he made it even more so; knowing fully well that he would have earned all kudos and departed, leaving his successors to face the music.

In KRCL, there were rumours of his having made money, although nothing was either proved or disproved. (An honest railway civil engineer is an impossibility, if you ask me.)

As ME, Sreedharan wrote copious pages of notings on file insisting that DMRC must have broad gauge for smooth interoperability. However, within a few years, as MD/DMRC he did a 1800 turn and went in for standard gauge. As a result of standard gauge, 100% of rolling stock had to be imported at huge cost and foreign exchange. (Taking cuts in swiss banks is easier if it is from an international supplier). 

My main grouse against Sreedharan is that as MD/DMRC he did not follow any of the Government rules and regulations regarding award of tender. Tenders were awarded to L-3 or even L-4 bypassing the lower ones by writing some English and justifying the same; (in Govt. you can justify anything on file by writing a lot of English).

During Man Mohan Singh’s time as PM, once CVC officials had gone to DMRC to pick up some files. Sreedharan refused to hand over any file. Then he went to PM and threatened to resign as MD unless written orders were personally issued by PM forbidding CVC or any other investigating agency from scrutinizing any tender file of DMRC. Under that resignation threat PM issued those written orders!!

This information is 100% authentic since it was told to me by an IRSEE officer, who was the Director under me in the Railway Board and subsequently took absorption in DMRC. He was a super outstanding officer and finally retired from DMRC as Director.

In the PSEB interview to select Sreedharan’s successor, the Board wanted to select the IRSEE director as MD, but Sreedharan pitched for Mangnu Singh, Director Civil and put his foot down refusing to sign the proceedings if Mangnu Singh wasn’t selected. That is how that outstanding IRSEE director lost out.

My point is, if Railway Officers also had the freedom to award tenders to L-3 or L-4 then they could also do wonders, possibly as much as if not more than what DMRC has achieved!

My then Sr.DEN (Hq.), who is presently posted as ADRM, told me during my departure as DRM, “sir, throughout our service we’ve always been told by all our seniors that if we wanted to deliver then we must break the rules. We will not be able to deliver successfully by following all rules. Here sir, during the past 2 years, I’ve seen you follow each and every rule and still you’ve been able to deliver much more than any officer I’ve worked under. That has completely changed my mindset permanently.”

In my entire service, I’ve never flouted any rule and whatever I’ve achieved has been by strictly following all rules and regulations. Had Sreedharan been able to do that I would have certainly termed him as Great?

रिटायर्ड जीएम के उपरोक्त विचार बहुत स्पष्ट हैं। तथापि यहां श्रीधरन साहब की गरिमा को किसी भी तरह से डिग्रेड करने की कोई कोशिश नहीं की गई है। उन्होंने सिर्फ उनके काम करने के तौर-तरीकों का जिक्र किया है। उनको आए अनुभव का निष्कर्ष यह भी है कि श्रीधरन साहब भी पक्षपात और मनमानी से मुक्त नहीं थे। यदि ऐसा नहीं होता, तो आज दिल्ली मेट्रो का परिदृश्य कुछ अलग होता। यह भी कि यदि सारे स्थापित सरकारी रूल्स-रेगुलेशंस और दिशा-निर्देशों को दरकिनार करके काम करने और परिणाम देने की छूट दी जाए, तो वह कोई भी रेल अधिकारी दे सकता है।





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पूरी भारतीय रेल में अब तक हजारों रेलकर्मी हुए कोरोना का शिकार, झूठे आंकड़े देकर झूठ बोलते रहे सीईओ/रे.बो.

झूठ बोलने में रेलवे बोर्ड का कोई सानी नहीं, सुनीत शर्मा, चेयरमैन/सीईओ/रे.बो. ने तोड़े अकर्मण्यता और अनिर्णय के सारे रिकॉर्ड

सुरेश त्रिपाठी

कोरोना महामारी के दूसरे चरण में पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल 314 लोको पायलट्स की मृत्यु का आंकड़ा सामने आया है। हालांकि यह अविश्वसनीय संख्या है, क्योंकि मौत के समाचार जिस गति से चल रहे हैं, उनको देखकर इस आंकड़े पर कोई भी रनिंग स्टाफ भरोसा नहीं कर पा रहा है।

रनिंग स्टाफ के कई वरिष्ठ सुपरवाइजरों का कहना है कि “वास्तव में यह आंकड़ा इससे भी ज्यादा है।” वे कहते हैं, “हॉस्पिटल में कोविड से हुई मौत बताया जाता है, परंतु जब डाटा उनके कार्यालय में आता है तो वही डेथ किसी अन्य कारण से हुई बताई जाती है। यह अत्यंत अविश्वसनीय है।”

स्टेशन मास्टर कैडर में भी अब तक 150 से ज्यादा मौतें कोविड संक्रमण के चलते हो चुकी हैं। पूरा कैडर जब रेल प्रशासन की अनमनस्कता के प्रति आक्रोशित हुआ और उचित ध्यान नहीं दिए जाने पर ड्यूटी न करने की चेतावनी दी, तब प्रशासन को होश आया और उसने उनके साथ वर्चुअल मीटिंग करके समस्या का समाधान करने की पहल हुई।

टिकट चेकिंग, टिकट बुकिंग, पार्सल, लगेज, आरक्षण इत्यादि कैडर्स, जो लगातार पब्लिक के संपर्क में रहते हैं, में भी काफी रेलकर्मी कोरोना का शिकार हुए हैं, परंतु उनके अधिकृत आंकड़े अब तक सामने नहीं आए हैं। तथापि उनकी मौतों के दु:खद समाचार लगातार आते रहते हैं।

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इस महामारी के दूसरे चरण में, जब उम्र का कोई बंधन नहीं रह गया, हर आयु-वर्ग के बहुत सारे रेलकर्मी और अधिकारी काल-कवलित हुए हैं। परंतु ऐसा लगता है कि रेल प्रशासन ने उनकी मौतों को अब तक भी गंभीरता से नहीं लिया है, बल्कि देखने में यही आया है कि उनकी मौत के आंकड़े छिपाने में और व्यवस्था को दिग्भ्रमित करने में रेलवे बोर्ड की ज्यादा रुचि रही है।

चेयरमैन/सीईओ/रेलवे बोर्ड ने झूठ बोला

यदि ऐसा नहीं होता, तो ओपन प्रेस कॉन्फ्रेंस में चेयरमैन सीईओ रेलवे बोर्ड झूठ नहीं बोलते, झूठे आंकड़े प्रस्तुत नहीं करते, मांगे जाने पर भी वह रेलकर्मियों-अधिकारियों की मौत के आंकड़े देने से इंकार नहीं करते!

यदि ऐसा नहीं होता, तो वे मार्च 2020 से दिए गए आंकड़ों का औचित्य सिद्ध करते और जनवरी 2021 से अब तक हुई रेलकर्मियों-अधिकारियों की मौत के आंकड़े शेयर करते! जो कि दिन-प्रतिदिन के हिसाब से रेलवे बोर्ड में संकलित होते हैं।

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जोनल रेलों के विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 1 मई 2021 को पूरी भारतीय रेल में कोरोना से संक्रमित रेलकर्मियों की कुल संख्या 1,15,358 थी। जबकि उसी दिन कोविड से मृत्यु को प्राप्त हुए रेलकर्मियों की कुल संख्या 1695 थी। इस एक दिन में कोविड का शिकार हुए गैर रेलकर्मियों अर्थात रेलकर्मियों के परिजनों एवं रेल अस्पतालों में भर्ती अन्य लोगों की मौत का कुल आंकड़ा 2761 था।

इससे पहले 18 अप्रैल 2021 के दिन पूरी भारतीय रेल में कोरोना से संक्रमित रेलकर्मियों की कुल संख्या 83,180 थी। जबकि उस दिन कोविड से मृत्यु को प्राप्त हुए रेलकर्मियों की कुल संख्या 979 थी और इस एक दिन में कोविड का शिकार हुए गैर रेलकर्मियों अर्थात रेलकर्मियों के परिजनों एवं रेल अस्पतालों में भर्ती अन्य लोगों की मौत का कुल आंकड़ा 1814 था।

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इस प्रकार यह पूरी तरह स्पष्ट है कि 11 मई के आसपास और उससे पहले हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीईओ रेलवे बोर्ड ने प्रेस के सामने साफ-साफ झूठ बोला था।

यहां तक कि जो लोग उनके द्वारा दिए गए आंकड़ों पर सवाल पूछना चाहते थे, उन्हें कुछ भी कहकर साइड लाइन कर दिया गया, परंतु उन्हें मार्च 2020 से दिए गए आंकड़ों का कोई औचित्य नहीं समझाया गया।

जबकि उपरोक्त आंकड़ों से स्पष्ट है कि सीईओ/रेलवे बोर्ड द्वारा मार्च 2020 से 10 मई 2021 तक 13 महीने 10 दिन के लिए बताए गए कुल आंकड़ों से यहां एक दिन का ही आंकड़ा अधिक है।

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यदि ऐसा नहीं था, तो “रेल समाचार” द्वारा 10 मई 2021 को चेयरमैन सीईओ/रेलवे बोर्ड सुनीत शर्मा से जब यह पूछा गया कि –

1. कृपया श्री प्रदीप कुमार, पूर्व मेंबर स्टाफ, रेलवे बोर्ड और वर्तमान मेंबर कैट, जो कि एनआरसीएच में भर्ती हैं और वेंटिलेटर पर हैं, की हेल्थ पोजीशन की अपडेट देने की कृपा करें।

2. रेल अस्पतालों को अपग्रेड करने और रेलकर्मियों को उचित स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने के लिए रेल प्रशासन द्वारा अब तक क्या किया गया?

3. वर्तमान में कितने रेलकर्मी और अधिकारी पूरी भारतीय रेल में कोरोना संक्रमित हैं?

4. पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल कितने रेलकर्मी और अधिकारी कोरोना से काल कवलित हुए हैं? कृपया रेलवे वाइज संख्या देने की कृपा करें।

5. पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल कितने रेलकर्मियों और अधिकारियों का वैक्सीनेशन हो चुका है? कृपया रेलवे वाइज संख्या प्रदान करने की कृपा करें।

6. क्या रेलकर्मियों और अधिकारियों तथा उनके परिजनों को अलग से अथवा सीधे वैक्सीन मुहैया कराने की व्यवस्था नहीं की जा सकती? यदि हां, तो इसके लिए रेल मंत्रालय क्या उपाय कर रहा है? यदि नहीं, तो इसमें समस्या क्या है? कृपया बताने का प्रयास करें।

यह नहीं, 12 मई 2021 को, सीईओ रेलवे बोर्ड की प्रेस कॉन्फ्रेंस के एक दिन बाद भी उन्हें रिमाइंड करते हुए “रेल समाचार” द्वारा पूछा गया था कि –

Resp. Sharma ji, kindly share latest daily “ZONE WISE COVID PREPAREDNESS REPORT-2021” on Indian Railways.

उपरोक्त में से किसी भी तथ्य का कोई स्पष्टीकरण अथवा कोई जवाब अब तक चेयरमैन/सीईओ/रेलवे बोर्ड की तरफ से नहीं आया है।

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“जान है तो जहान है” के सिद्धांत पर जब रेल प्रशासन को अपनी वर्क फोर्स का जीवन बचाना चाहिए था, तब वह झूठ और फरेब का सहारा लेकर केवल ऑक्सीजन एक्सप्रेस चलाने के लिए अपनी पीठ थपथपा रहा है।

हालांकि जनता को भी उसके गंतव्य पर पहुंचाकर सेवा कार्य भी इस संकटकाल में जरूरी है। तथापि झूठ बोलना कतई जरूरी नहीं है। यह वैश्विक महामारी है, इस पर आदमी का कोई वश नहीं है। इसके लिए केवल सावधानियां ही बरती जा सकती हैं।

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अतः पब्लिक के संपर्क में आने वाले रेलकर्मियों को सुरक्षा उपकरणों की आपूर्ति सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके अलावा उम्र और किसी बीमारी से ग्रस्त कर्मचारियों को जनसंपर्क से दूर रखने की यथासंभव कोशिश करते हुए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

“रेल समाचार”, रेल प्रशासन की अकर्मण्यता के कारण अब तक अकाल काल-कवलित हुए सभी रेलकर्मियों को विनम्र श्रृद्धांजलि अर्पित करता है और संक्रमित हुए कर्मचारियों के शीध्र स्वस्थ होने की कामना करता है।

ट्रेन की गति से ढ़हा चांदनी रेलवे स्टेशन:





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एलडीसीई की समस्त प्रक्रिया रेलवे बोर्ड द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर संयोजित की जाए

सिद्धांततः एलडीसीई में ऑब्जेक्टिव के बाद सब्जेक्टिव पेपर और इंटरव्यू भी होना चाहिए

सुरेश त्रिपाठी

“एलडीसीई में अब मनमाने तरीके से नहीं दे पाएंगे अंक” शीर्षक से “रेलसमाचार.कॉम” पर 24 जुलाई को प्रकाशित खबर पर बहुत सटीक और तीव्र प्रतिक्रिया कई विद्वान, वरिष्ठ और अनुभवी रेल अधिकारियों ने व्यक्त की है। इनमें कार्यरत एवं सेवानिवृत्त दोनों तरह के रेल अधिकारी शामिल हैं। उनकी सबसे पहली आशंका यह है कि एलडीसीई की यह जो नई गाइडलाइंस (पत्र सं. ई(जीपी)/2018/2/31, दि. 20 जुलाई 2020) रेलवे बोर्ड द्वारा जारी की गई हैं, उनके मद्देनजर किसी बड़े खेल की भावी तैयारी लग रही है, जो भविष्य में शायद ‘व्यापम’ से भी बड़ा घोटाला साबित हो सकती है। उनकी अनुभवी प्रतिक्रियाओं और विश्लेषणात्मक तथ्यों को रेल प्रशासन के समक्ष इस उद्देश्य से यहां प्रस्तुत किया जा रहा है कि इससे उसे अपनी विभागीय चयन प्रक्रिया को फुलप्रूफ बनाने में पर्याप्त मदद मिल सकती है।

रेलवे में ग्रुप ‘सी’ से ग्रुप ‘बी’ एक बहुत बड़ी छलांग होती है और यह जिम्मेदारी भी उतनी ही संवेदनशील होती है।राज्य सरकार या भारत सरकार के किसी भी विभाग में राजपत्रित अधिकारी बनाने के लिए सिर्फ “ऑब्जेक्टिव” से ही चयन प्रक्रिया पूरी नहीं की जाती है। आरआरबी, आरआरसी, एसएससी आदि ग्रुप ‘डी’ और ‘सी’ के सेलेक्शन होते हैं, उनके लिए तो यह ठीक हो सकती है, लेकिन राजपत्रित के लिए यह प्रक्रिया बिल्कुल भी उचित नहीं कही जा सकती। आरआरबी, आरआरसी आदि की ऑब्जेक्टिव आधारित चयन प्रक्रिया ज्यादा सहज (वल्नरेबल) होती है। आए दिन इसकी खबरें हम सुनते रहते हैं। इसमें संगठित और बड़े पैमाने पर अयोग्यों की नियुक्ति की आशंका होती है।

इसीलिए राजपत्रित स्तर की परीक्षाओं के लिए स्टेट पब्लिक सर्विस कमीशन और संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) का सिस्टम ज्यादा बेहतर और फुल प्रूफ माना जाता है, क्योंकि तीन स्तर पर मैनेज करना किसी के लिए भी अत्यंत मुश्किल होता है।

रेलवे बोर्ड में “राजपत्रित चयन बोर्ड” बनाया जाए

अब जहां तक बात रेलवे की आंतरिक विभागीय चयन परीक्षाओं की है, तो रेलवे की ऐसी सभी परीक्षाएं, अलग-अलग विभागों और जोनल स्तर पर न कराकर इसके लिए यूपीएससी की तर्ज पर राष्ट्रीय स्तर पर रेलवे बोर्ड में एक “राजपत्रित चयन बोर्ड” बनाकर कराई जानी चाहिए। इससे अलग-अलग जोनों की विभागीय चयन प्रक्रिया में जो विसंगतियां हैं, वह भी समाप्त हो जाएंगी। इसके अलावा नालायक, निकम्मे, जोड़-तोड़ करने, पैसे की बदौलत सिफारिश और पहुंच रखने वाले जो उम्मीदवार इन चयन प्रक्रियाओं में बार-बार बाधा डालते हैं, एक तरफ उनसे निपटा जा सकेगा, तो दूसरी तरफ इससे समय पर रेलवे को आवश्यक राजपत्रित अधिकारी उपलब्ध होने के साथ ही योग्य उम्मीदवारों का चयन भी सुनिश्चित हो सकता है।

इसीलिए तीन स्तरीय चयन प्रक्रिया – 1. ऑब्जेक्टिव 2. सब्जेक्टिव 3. इंटरव्यू – निश्चित रूप से होनी चाहिए और वह भी भारतीय रेल के स्तर पर। यह इसलिए भी जरूरी है, कयोंकि सिर्फ एक रेलवे ही पूरे देश में एकमात्र ऐसी संस्था है जिसमें कोई चतुर्थ श्रेणी में बहाल व्यक्ति अपनी जोड़तोड़ से मात्र 6-7 साल में तृतीय श्रेणी (ग्रुप ‘सी’) कर्मचारी बन जाता है और अगले 5 साल में वह राजपत्रित अधिकारी (ग्रुप ‘बी’) स्तर की विभागीय परीक्षा के लिए योग्य (एलिजिबल) हो जाता है।

सिर्फ रेलवे में चल रही अद्भुत व्यवस्था : खलासी को मिलता है ग्रुप ‘ए’ स्टेटस

यहां सबसे आश्चर्यजनक व्यवस्था यह भी है कि ग्रुप ‘बी’ में आने के 7-8 साल के अंदर उसे यूपीएससी से सीधी भर्ती अधिकारी – आईआरपीएस, आईआरटीएस, आईआरएसई, आईआरएएस इत्यादि – का दर्जा भी मिल जाता है। जबकि राज्यों में जो यूपीएससी के ही पैटर्न पर और उसी स्टैंडर्ड की परीक्षा से पीसीएस पास कर जो लोग सीधे ग्रुप ‘बी’ अधिकारी बनते हैं और एसडीएम, डीएसपी आदि में ज्वाइन करते हैं, उन्हें किसी भी राज्य में यूपीएससी से ग्रुप ‘ए’ का स्टेटस मिलने में कम से कम 20 साल का समय लगता है।

इस तरह से देखा जाए तो रेलवे बोर्ड द्वारा यह निर्णय भी या तो किसी पूर्व नियोजित और बहुत बड़ी साजिश के तहत लिया गया है, या फिर इसमें अपेक्षित संजीदगी के साथ रेल हित को ध्यान में रखकर पर्याप्त सोच-विचार नहीं किया गया है।

वर्तमान विभागीय चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव

अब जहां तक बात वर्तमान चयन प्रक्रिया में कमी की है, तो इसकी सबसे बड़ी कमी है यहां पूरी पारदर्शिता के साथ प्रश्न पत्र, परीक्षा हॉल की व्यवस्था, कॉपी चेक करने की गाइडलाइन, इंटरव्यू के मानक इत्यादि जानबूझकर स्पष्ट नहीं रखे गए हैं। इसके अलावा देश की सबसे बड़ी परीक्षाएं लेने वाली संस्थाओं – जैसे यूपीएससी, पीसीएस, सीबीएसई, स्टेट एग्जाम बोर्ड्स, यूनिवर्सिटी एग्जाम्स आदि – की परीक्षा प्रक्रियाओं को भी इसमें फॉलो नहीं किया जाता है। इसीलिए जब जो भी असफल और खुराफाती उम्मीदवार फेल होगा, वह पूरी प्रक्रिया को ही जब चाहे तब डिस्टर्ब कर देगा और किसी के भी ऊपर और कैसा भी आरोप लगा देगा।

सिर्फ ऐसी किसी परीक्षा में ही नहीं, बल्कि बाकी व्यवस्था में भी यह अत्यंत महत्वपूर्ण होता है कि पहले तो नियम और व्यवस्था-प्रक्रिया ऐसी बनाई जाए, जो कि पूरी तरह से स्पष्ट, पारदर्शी, बिना किसी विरोधाभास के ईमानदारी से फूल प्रूफ तैयार की गई हो। इसमें इस बात को भी अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए कि कोई व्यक्ति या उम्मीदवार इसको कहां-कहां और कैसे-कैसे बदनाम अथवा दुरुपयोग (मिस्यूज) कर सकता है।

चयन प्रक्रिया में शामिल लोगों को सेफगार्ड की जरूरत

इसके साथ ही रेल प्रशासन को अपनी व्यवस्था की चयन प्रक्रिया में शामिल लोगों को किसी भी तरह के परिवाद से बचाने अथवा सेफगार्ड करने के भी नियम स्पष्ट रखने चाहिए, जैसा कि यूपीएससी, पीसीएस, या अन्य परीक्षा बोर्डों में होता है। जैसे कि यह लगभग सभी लोगों को पता है कि आज की तारीख में असली खेल क्वेश्चन पेपर (प्रश्न पत्र) सेट करने वाला ही खेलता है। जो असल खेल होता है, वह यही है, जिसमें पहले से निर्धारित उम्मीदवार को पैसे के बदले या पैरवी के दबाव में क्वेश्चन बता दिया जाता है। चूंकि यह सबसे ‘सेफ’ है और सीबीआई के अलावा अन्य कोई, चाहे वह रेलवे विजिलेंस हो, या कोई विभागीय जांच समिति, इसे सिद्ध नहीं कर सकता। सीबीआई द्वारा भी सिद्ध करने के चांस बहुत ब्राइट नहीं होते हैं, इसीलिए धड़ल्ले से इसका ‘उपयोग’ होता है।

परीक्षा कक्ष में नकल अथवा अन्य प्रकार की जोड़-तोड़ या परीक्षा के बाद कॉपी में घालमेल की बात वह लोग करते हैं जिनको क्वेश्चंस नहीं मिले होते हैं और फेल हो जाते हैं। तभी वह अपनी भड़ास निकालने के लिए परीक्षा की हर स्तर की प्रक्रिया में भ्रष्टाचार, पक्षपात, विसंगति और गलतियां देखते हैं। हालांकि अपवाद स्वरूप कई बार कुछ योग्य उम्मीदवार भी इसकी बलि चढ़ जाते हैं।

एग्जाम पेपर में मेनिपुलेशन का ‘स्कोप’ नहीं बचा, तथापि…

वर्तमान में अत्यंत जोखिमपूर्ण स्थितियों को देखते हुए कोई निहायत ही बेवकूफ अधिकारी भी एग्जाम पेपर में ‘मेनिपुलेशन’ की बात नहीं सोचता होगा, न ऐसा करता होगा, और न ही अब इसका कोई ‘स्कोप’ बचा है कि कोई कॉपी में परीक्षा के बाद कुछ और लिख पाए, क्योंकि परीक्षा के तुरंत बाद और कॉपियां सीलबंद करने से पहले प्रत्येक कॉपी में हर प्रश्न के उत्तर के बाद के बचे ‘स्पेस’ को ‘क्रॉस’ कर दिया जाता है, जिससे बाद उसमें कोई एक लाइन भी न लिख पाए। सभी परीक्षा कक्षों के निरीक्षक और कोऑर्डिनेटर इस प्रक्रिया को सुनिश्चित करते हैं और “विजिलेंस कंप्लेंट माफिया” भी इससे बखूबी वाकिफ है। इसीलिए विजिलेंस का अनुभवी घाघ माफिया इंस्पेक्टर अपनी कंप्लेंट में अधिकारियों के ज्ञान के आधार पर परीक्षा कक्ष में नकल या जोड़तोड़ की बात भी जरूर लिखवाता है, जिससे कॉपी में जोड़-तोड़ की कहानी आगे बढ़ाई जा सके।

सर्वप्रथम तो कॉपियां जांचने में होने वाले विवाद और जोड़-तोड़ की संभावनाओं से सभी अधिकारी परिचित होते हैं और इसीलिए अधिकांश अधिकारी इस जांच प्रक्रिया का हिस्सा बनने से पहले दूर से ही अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। तथापि यदि जबरदस्ती यह जिम्मेदारी उन पर डाल भी दी गई, तो ज्यादातर सतर्क और समझदार अधिकारी एकलाइन से सभी उम्मीदवारों को ‘फेल’ करने में ही अपनी भलाई समझते हैं, क्योंकि तब न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी!

लेकिन वहीं कुछ अधिकारी ऐसे भी होते हैं, जो मजबूरी में मिली जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाते हुए कॉपी चेक करते हैं और बाद में उसका दुष्परिणाम भुगतते हैं। कई वरिष्ठ रेल अधिकारियों का कहना है कि ऐसे ही अधिकारी कंप्लेंट माफिया का शिकार बनते हैं, क्योंकि सब्जेक्टिव पेपर में मॉडल पेपर के अलावा कॉपी चेक करने वाला अधिकारी अपने अनुभव से, जानकारी से, हैंडराइटिंग से लेकर उत्तर की शैली आदि कई तथ्यों को ध्यान में रखकर मार्किंग करता है। और यह तो तय है कि हर दूसरे आदमी की मार्किंग तथा उसके द्वारा दिए गए नंबर किसी दूसरे अधिकारी से हमेशा/शार्त्तिया भिन्न होगा। इसीलिए इसी बात का ध्यान रखकर जितने भी एग्जाम बोर्ड और संस्थाए हैं, उन्होंने अपने नियम बहुत स्पष्ट बना रखे हैं।

उत्तर पुस्तिकाओं की पुनर्जांच और विजिलेंस कंप्लेंट माफिया

उत्तर पुस्तिका की पुनर्जांच (री-चेकिंग) में हर प्रश्न पर दिए गए नंबरों को जोड़कर देखा जाता है और यह भी देखा जाता है कि कहीं पर दिया गया नंबर जुड़ने से तो नहीं रह गया। यदि रह गया है, तो उसे जोड़कर परिणाम बता दिया जाता है। इसी प्रकार अगर किसी प्रश्न पर परीक्षक द्वारा नंबर देना छूट गया है, तो उसे ठीक करके परिणाम निकाल दिया जाता है।

कुछ परिस्थितियों में जहां पर परीक्षार्थी यह आरोप लगाता है या आशंका जताता है कि उसने लिखा बहुत था, लेकिन उस अनुपात में उसे नंबर नहीं दिए गए हैं। तब उस कॉपी की दुबारा चेकिंग दूसरे सक्षम व्यक्ति से कराई जाती है और उसमें परिणाम कुछ भी आए, चाहे नंबर पहले से भी कम हो जाएं, तो भी वह परिणाम फाइनल होता है। कायदे से रेलवे में भी यही प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए, लेकिन यहां “विजिलेंस कंप्लेंट माफिया” के गाइडेंस में वैसी ही जलेबियां बनाई जाती हैं, जैसी वे चाहते हैं। नियम, तार्किक विश्लेषण और इस संबंध में दूसरी जगहों पर अपनाई जा रही रीति-नीति इत्यादि उनके लिए कोई मायने नहीं रखती।

किसी भी नौकरी या शैक्षिक परीक्षा व्यवस्था में जिनको कॉपी चेक करने की जिम्मेदारी दी जाती है, वह उनकी प्रोफेशनल कैपेबिलिटी और सभी क्रेडेंसियल्स को देख कर ही दी जाती है और उनकी गरिमा (रेपुटेशन) तथा सम्मान की रक्षा भी की जाती है।

अधिकारियों की प्रोफेशनल इंटीग्रिटी और उनकी दुर्वस्था

रेलवे में भी खासकर कॉपी चेकिंग में महाप्रबंधक सभी ऑफिसर्स में जिसके क्रेडेंशियल सबसे अच्छे होते हैं और जिनकी प्रोफेशनल इंटीग्रिटी तथा कंपीटेंसी सबसे विश्वसनीय होती है, उसे ही तमाम फीडबैक और सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर नामित करते हैं। लेकिन रेलवे में विडंबना यह होती है कि जैसे ही कंप्लेंट माफिया और विजिलेंस में उसके स्लीपर सेल्स सक्रिय होते हैं, वही ईमानदार अधिकारी तुरंत संदिग्ध और अपराधी मान लिया जाता है और व्यवस्था की पूरी सोच ही विजिलैंस माफिया/कंप्लेंट माफिया के नैरेटिव के अनुसार सेट हो जाती है। फिर भले ही अन्ततः सत्य की जीत होती हो, लेकिन तब तक उस अधिकारी की मानहानि हो चुकी होती है और आगे के लिए उसे स्पष्ट सीख भी मिल जाती है कि या तो इन माफियाओं के अनुसार चलो या इनके रास्ते से हट जाओ, भले ही पूरा सिस्टम भाड़ में चला जाए।

ऐसी स्थिति में अधिकारी को इस बात का अहसास हो जाता है कि उसने पेपर चेक करके बहुत बड़ा पाप कर दिया, क्योंकि कंप्लेंट माफिया किसी भी स्तर पर उत्तर कर कंप्लेंट करता है और आरोप लगाता है, जिसमें लोगों को चटखारे लेने का कम से कम मौका तो मिल ही जाता है। इससे अधिकारी की सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ-साथ सहकर्मियों के बीच उसकी छवि भी प्रभावित होती है, क्योंकि केस सच है या झूठ, इसमें दूसरों की कोई रुचि नहीं होती, उनको तो मजा सिर्फ इतने से ही मिल जाता है कि सामने वाला उनसे ज्यादा नहीं तो कम से कम बराबर ही गिरा हुआ जरूर है।

इसके अलावा अधिकारी के परिवार पर उसके इस “ईमानदार एडवेंचर” के कारण क्या बीतती होगी, इतनी दूर तक भी कौन सोचता है! कुल मिलाकर इस तंत्र का ताना-बाना ऐसा बुना गया है कि ईमानदारी, निष्पक्षता, निर्भीकता, कर्मठता, योग्यता इत्यादि हमेशा हासिये पर रहें और बेईमानों, फरेबियों, अवसरवादी, निक्कमे, निकृष्ट तथा अयोग्य लोगों का ही वर्चस्व बना रहे।

“विजिलेंस संरक्षित और गाइडेड कंप्लेंट माफिया” का मकसद

रेलवे में स्थिति यह है कि यहां “विजिलेंस माफिया” अपनी मर्जी से कुछ भी लिखवा देता है और जांच करने वाला उसके गाइडेंस के हिसाब से तब तक जांच करता रहता है, जब तक कि “विजिलेंस संरक्षित कंप्लेंट माफिया” का मकसद पूरा नहीं हो जाता। वह कहेगा उक्त प्रश्न में 5 अंक मिलने चाहिए थे, 10 मिलने चाहिए थे, तो 5 की जगह 3 मिला या 10 की जगह 8 मिला, या फिर 5 की जगह 7 मिला, अथवा 10 की जगह 12 मिला। और फिर उसी की मानसिकता के प्रशासन में बैठे लोग उसी के हिसाब से मामले को देखने लगते हैं।

किसी परीक्षा में या प्रायः सभी परीक्षाओं में कई बार एक ही नंबर पर कितने लोग होते हैं और एक नंबर से ही कितने रैंक का अंतर हो जाता है, इसी पर संबंधित उम्मीदवार का पास-फेल होना निर्भर करता है। उसमें इस तरह की सोच और परिवाद को रेलवे की तरह डील करने पर तो न तो कभी किसी भी एग्जाम का रिजल्ट आ पाएगा और न ही कोई एग्जाम से संबंधित व्यक्ति या कॉपी चेक करने वाला अधिकारी बिना चार्जशीट के बच पाएगा।

रेलवे की जांच पद्धति अपनाने पर यूपीएससी जैसी परीक्षाओं में किसी नीचे की सर्विस पर 300 के रैंक वाला यह कह सकता है कि मेरे तक तो मार्किंग ठीक है, लेकिन मेरे से ऊपर जितने हैं, सबको पैसा लेकर ज्यादा नंबर दिया गया है, या क्वेश्चन पहले बता दिया गया था, अथवा पूरा एग्जाम हॉल बिक गया था, इसलिए मुझे आईएएस मिलना चाहिए। या फिर फेल होने वाला कोई भी उम्मीदवार इसी तरह से पूरे रिजल्ट को गलत ठहरा सकता है।

कंप्लेंट माफिया की कुंठित और भ्रष्ट मानसिकता

“कंप्लेंट माफिया की कुंठित और महाभ्रष्ट मानसिकता के लोगों का मकसद सिर्फ इतना ही होता है कि या तो लाइन उनसे शुरू हो, या फिर वे पूरी प्रक्रिया ही दूषित कर देंगे।” लेकिन रेलवे में ऐसी स्पष्ट व्यवस्था नहीं होने से “विजिलेंस संरक्षित और गाइडेड कंप्लेंट माफिया” यह खेल खूब खेलता है और कई बार पैनल भी कैंसल करवा लेता है। अधिकारियों को चार्जशीट मिलती है, सो अलग।

इस पर कार्मिक एवं अन्य विभागों के कई अनुभवी वरिष्ठ अधिकारियों का यह कहना है कि कोई भी अधिकारी अपनी नौकरी जोखिम में डालकर कुछ पैसों के लालच में अथवा किसी के दवाब में आकर पेपर में कुछ नहीं कर सकता है। उनका यह भी कहना है कि अगर कोई अधिकारी पैसा ही कमाना चाहे, तो उसके पास इसके कई सुरक्षित स्रोत और अवसर होते हैं। अधिकारियों का यह भी कहना है कि एग्जाम को फुलप्रूफ बनाने का एक तरीका यह भी हो सकता है – जिसे कई एग्जाम बोर्ड खासकर यूपीएससी फॉलो करता है – सब्जेक्टिव पेपर का मॉडरेशन। रेलवे के एग्जाम में इसे ऐसे किया जा सकता है कि एक अधिकारी के एक पेपर चेक करने के बाद कोई दूसरा अधिकारी भी उसी पेपर को पुनः चेक करे और फिर दोनों के मॉडरेशन से जो नंबर फाइनल किया जाएगा, वही अंतिम परिणाम का आधार होना चाहिए।

निश्चित है हर दूसरे अधिकारी की चेकिंग/मार्किंग में अंतर

इन विद्वान और अनुभवी अधिकारियो का कहना है कि भले ही पेपर चेक करने वाले जिन अधिकारियों की मनगढ़ंत कंप्लेंट हुई हो, अगर उसी पेपर को डीआरएम, जीएम, एसडीजीएम, पीईडी/विजिलेंस, सीआरबी या खुद रेलमंत्री अथवा सीवीसी भी चेक करेंगे, तो सबकी मार्किंग अलग-अलग ही होगी और सब पर भी “कंप्लेंट माफिया” पैसा लेकर बढ़िया से बढ़िया मेनिपुलेशन की कंप्लेंट कर सकता है और रेल प्रशासन यदि अपनी रेलवे विजिलेंस की कार्यशैली तथा परम्परा का निर्वहन करेगा, तो उस कंप्लेंट के आधार पर इन सभी को निश्चित रूप से मेजर पेनाल्टी चार्जशीट मिल ही जाएगी।

इन वरिष्ठ अधिकारियों का दावा है कि यदि उनकी इस बात पर भरोसा न हो, तो इसको उपरोक्त में से कोई भी अथॉरिटी कभी भी आजमाकर देख सकती है।

मन-मुताबिक न होने पर होती है “स्ट्रक्चर्ड कंप्लेंटबाजी”

यह बात भी सही है कि जब भी किसी विभागीय परीक्षा में विजिलेंस इंस्पेक्टर कंडीडेट होते हैं, तो उन एग्जाम्स में संबसे ज्यादा परीक्षा समिति के सदस्यों पर ये हर तरफ से दबाब डलवाते हैं और इनके मन का नहीं होने पर सबसे ज्यादा ‘स्ट्रक्चर्ड कंप्लेंटबाजी’ भी उन्हीं सदस्यों के खिलाफ होती है। 

दूसरी तरफ रिटायरमेंट के करीब पहुंचे अधिकारियों को क्वेश्चन पेपर सेट करने और विभागीय चयन की प्रक्रिया से तुरंत रोका जाना चाहिए, क्योंकि इसमें कुछेक मामलों में इसकी संभावना रहती है कि पैसे के लोभ में कुछ क्वेश्चन कुछेक चुनिंदा लोगों, जिनसे डील हो गई हो, को बेच दिया जाए, या फिर उस अधिकारी के सीधेपन और अपने सचिवालय पर अतिविश्वास तथा निर्भरता के चलते उसके सचिवालय के कॉन्फिडेंसियल स्टॉफ और सेक्रेटरी, जो क्वेश्चन पेपर टाइप/प्रिंट करते हैं, क्वेश्चंस को बेच दें। इसके एक नहीं, सैकड़ों उदाहरण खुद रेलवे बोर्ड के संज्ञान में पहले से ही हैं। अतः सेवाकाल के अंतिम वर्ष में और रिटायरमेंट के करीब पहुंचने वाले विभाग प्रमुखों को इस चयन प्रक्रिया से सर्वथा विलग किया जाए, इससे उनका ही भला होगा।

आमतौर पर जितने घाघ कंडीडेट होते हैं, वे परीक्षा की संभावना के आधार पर एक साल पहले से ही विभाग प्रमुख (पीएचओडी) के सेक्रेटरी और गोपनीय मामले देखने/डील करने वालों तथा टाइपिंग करने वालों की प्रदक्षिणा करने लगते हैं और अंततः उन्हें अपने चक्कर में ले ही लेते हैं।

आज की तारीख में यही सबसे सुरक्षित और एकमात्र तरीका है रेलवे की आंतरिक विभागीय परीक्षाओं में भ्रष्टाचार करने का और अयोग्य कंडीडेट्स को फायदा पहुचाने का। और हकीकत में बाकी तथ्य तो  सब सिर्फ पानी पर लाठी पीटने जैसे ही हैं।





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विजिलेंस माफिया द्वारा खड़े किए वॉलंटियर्स के चलते वेंटीलेटर पर गई भारतीय रेल

कैंसर की तरह देश की पूरी व्यवस्था में फैला हुआ है कंप्लेंट माफिया का बड़ा तंत्र !

सरकार ही जाने कि आज तक उसकी भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था के कितने उद्देश्य पूरे हुए?

सुरेश त्रिपाठी

रेलवे बोर्ड विजिलेंस से निकाले गए तीनों आईआई (इंवेस्टीगेशन इंस्पेक्टर) “देर आए, दुरुस्त आए“ और “क्या कारण है कि सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे में ही बनते हैं“ शीर्षक से प्रकाशित पिछली दो किस्तों में उजागर हुई अपनी करतूतों से इतने विचलित हुए हैं, अथवा रेलवे विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन विचलित हुआ है, कि अब और ज्यादा उनके कुकर्म उजागर न हों, इसके लिए वे विभिन्न माध्यमों से हम पर दबाव बना रहे हैं। इसके लिए वे अपने मीडिया सहित भिन्न-भिन्न स्रोतों-संपर्कों का इस्तेमाल कर रहे हैं, क्योंकि इससे उनके रेलवे बोर्ड में बने रहने अथवा किसी रेलवे पीएसयू में एडजस्ट होने पर ही नहीं, बल्कि उनके संरक्षकों के हितों पर भी खतरा मंडराता नजर आ रहा है।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि निष्कासित किए गए इन तीनों आईआई की कुत्सित करतूतों को तब उजागर किया जा सका है, जब डायरेक्टर विजिलेंस (पुलिस), रेलवे बोर्ड ने महीनों तक फील्ड में की जा रही इनकी कारगुजारियों पर दिल्ली पुलिस के सहयोग से लगातार नजर रखी थी। उनकी ही पुख्ता सबूतों के साथ सब्मिट की गई रिपोर्ट के आधार पर इन तीनों को अब और ज्यादा रेलवे बोर्ड विजिलेंस में बनाए रख पाना ट्रैफिक विजिलेंस के अधिकारियों के लिए आसान नहीं रह गया था। परिणामस्वरूप इन्हें तुरंत बाहर किया गया है। तथापि अब निर्लज्ज विजिलेंस अथवा उसकी नाक का सवाल न बनाकर उक्त रिपोर्ट के आधार पर इन तीनों को मेजर पेनाल्टी चार्जशीट भी पकड़ाने के साथ ही इन्हें इनके पैरेंट कैडर/रेलवे में भेजा जाना चाहिए, तभी इनके द्वारा सताए गए, उत्पीड़ित किए गए रेलकर्मियों और अधिकारियों के साथ समुचित न्याय हो पाएगा।

अब आगे..

सारे पीडब्ल्यूआई, एसएसई, टीटीई और जनसामान्य यानि यात्रियों के सीधे संपर्क में काम करने वाला स्टॉफ चोर नहीं होता, और न ही उनके एडीईएन, सीनियर डीईएन, एडीएमई, सीनियर डीएमई, एडीईई, सीनियर डीईई, एएसटीई, सीनियर डीएसटीई, एसीएम, सीनियर डीसीएम, एओएम, सीनियर डीओएम, एडीएफएम, सीनियर डीएफएम आदि भी हमेशा गलत नहीं होते। यह सभी मंडल अधिकारी जिन परिस्थितियों में और जिन मुश्किलों का सामना करते हुए काम कर रहे होते हैं, उसी से रेलवे का अस्तित्व इतनी अंधेरगर्दी के बाद भी अब तक बचा हुआ है।

यही वे लोग हैं, जो अपने जीवन का अधिकांश समय अपने परिवार को न देकर, यहां तक कि अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान न रखकर दधीचि की तरह रेलवे को चलाते रहे हैं। इनका प्रयास होता है कि उनका यह क्षण बिना किसी अनहोनी के गुजर जाए और रेलवे को जो आय आनी है, आ जाए। इनके लिए बीता हुआ क्षण संतोषजनक स्मृति से ज्यादा कुछ नहीं होता और उस क्षण इनके कर्तव्य की सार्थकता उसी में होती है। यही प्रमाण है इनकी ईमानदारी का, मेहनत का, निष्ठा का और अपने काम के प्रति समर्पण का भी।

लेकिन यह बहुत ही आसान काम है, उनके काम में ऐब निकलना। वैसे भी किसी चीज का पोस्टमार्टम करना बहुत ही आसान काम होता है। यह ऐसा काम है, जिसमें न संवेदना होती है, न जिम्मेदारी जिंदा करने की, न काम के परिणाम के दायित्व की! और कहना कि ऐसा करता, ऐसे करता, इस समय में करता, इतने समय में करता, आदि आदि, तो सही होता या ज्यादा सही होता और यह जानबूझकर इसने गलत मोटिव से किया है। अतः इस पर तो केस बनता है और फिर केस बना दिया जाता है।

विजिलेंस में, पहला- या तो खेले-खेलाए लोग आते हैं, या फिर, दूसरा- वे लोग आते हैं, जिनको फील्ड में काम का कोई बहुआयामी और लंबा अनुभव न के बराबर होता है। लेकिन पहला आते-आते अपना बाजार शुरू कर देता है, जबकि दूसरा पहले से स्थापित माफिया इंस्पेक्टर्स और सिस्टम के हाथ में खेलने लगता है और फिर ये इतना खेलते हैं कि कुछ समय में ही पहले वाले को भी पीछे छोड़ देते हैं।

टीटीई, जो ट्रेन में ड्यूटी के दौरान स्टॉफ शॉर्टेज के चलते 6/7 कोच मैन्ड करता है, उसको पता होता है कि वह कितना कठिन काम कर रहा है और एक पूरे कोच को ठीक से चेक करने में कम से कम 45 मिनट से एक घंटा लगेगा ही। फिर जब तक वह दूसरे-तीसरे कोच में जाएगा, तब तक किसी स्टेशन पर कोई भी आदमी उसके किसी भी कोच में चढ़ सकता है। हम सब जानते हैं कि यह सामान्य घटनाक्रम है, जिसको रोकना किसी के वश में नहीं है। जब तक कि प्रत्येक कोच टीटीई द्वारा मैन्ड न किए जाएं।

लेकिन वही टीटीई जब विजिलेंस में जाता है और जब उसे विजिलेंस का पानी लग जाता है, तब वह भी अपने जैसे ही दूसरे टीटीई की इसी कथित कोताही पर धड़ाधड़ केस बनाता है, यह कहकर कि “तुम्हारे द्वारा मैन्ड किए जा रहे कोच में इतने आदमी बिना रिजर्वेशन के या बिना टिकट के कैसे मिल गए?” अब वह (टीटीई से ही आईआई/विजिलेंस बना) कोच मैन कर रहे बेचारे टीटीई को या तो केस बनाने की धमकी देकर धन दोहन करेगा या फिर केस बनाएगा। दोनों ही गलत हैं। लेकिन यही विजिलेंस है।और वह भी रेलवे की।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। केस बनने के बाद उस टीटीई की नारकीय जिंदगी शुरू होती है। वह अब दस जगह पर रोएगा, गिड़गिड़ाएगा, अपनी बेगुनाही की दलील देगा और दस जगह पर पैसा भी खर्च करेगा। लाख रहम कर, सब जानकर अनुशासनिक अधिकारी (डीए) भी विजिलेंस के डर से उसे कोई न कोई दंड दे ही देता है, वरना यही विजिलेंस माफिया खुद या किसी से कंप्लेंट करवा देता है कि पैसा लेकर डीए ने माफ कर दिया। तब डीए साहेब की परिक्रमा शुरू हो जाती है।

अब उस टीटीई के कैरियर पर धब्बा भी लग गया। कुछ समय बाद उसके परिवार वालों को और उसे खुद भी यह लगने लगता है कि वह बहुत बड़ा अपराधी और चोर है। इसके बाद वह सीख जाता है कि ईमानदारी से काम करोगे, तो फंसोगे और जब फंसोगे तो यह पैसा ही काम आता है। जितना पैसा होगा, उतना ही ज्यादा चांस अपने को ईमानदार साबित करने का होता है और जितने ठन ठन गोपाल रहोगे, उतने ही बड़े नकारे और बेईमान साबित कर दिए जाओगे। इसलिए पैसा जितना कमा सकते हो, कमा लो, क्योंकि यही पैसा बोलता है और जैसा चाहोगे वैसा ही यही बुलवाता भी है।

इस प्रकार रेलवे विजिलेंस के भ्रष्टाचार और स्वस्थ आर्गेनाइजेशन के निर्माण हेतु कदम-कदम पर एक-एक नया वॉलंटियर खड़ा करता रहता है और अपने महान उद्देश्य को सार्थक करते हुए अपना कारवां लगातार बढ़ाता चलता है। इन्होंने अब इतने वॉलंटियर्स खड़े कर दिए हैं कि जिसके चलते भारतीय रेल ही वेंटीलेटर पर चली गई है। अब वही टीटीई विजिलेंस माफिया का नया वॉलंटियर बन जाता है और अब ट्रेन पर चढ़ने से पहले उसे विजिलेंस टीम के मूवमेंट का पूरा डिटेल पता होता है। अब अगर उसको अपने किसी सहयोगी/प्रतिद्वंद्वी टीटीई को निपटाना होता है, तो वह उसकी भी सेटिंग कर लेता है कि उसको कैसे फंसाना है तथा कब और कहां उसे चेक करवाना है? 

अगर साहेब लोगों का मूवमेंट उसकी ट्रेन में है, तो फिर या तो उनकी मांग के अनुसार बंदोबस्त रखेगा या फिर ऑन द स्पॉट उनके टेस्ट के अनुरूप चीजों की व्यवस्था करेगा। अब से पहले वह अपनी जानकारी में एक भी अवैध यात्री को अपने कोच में नहीं चढ़ने देता था, या  लड़कर भी पेनाल्टी के साथ उसकी टिकट बनाता ही था। अब वह हर ट्रिप में जब तक कम से कम 10 हजार नहीं कमा लेता है, अपनी ईमानदारी को कोसता रहता है। अब तो जो यात्री टिकट बनाने की जिद्द भी करता है, उसको कुछ डिस्काउंट कर सधे हुए चार्टेर्ड एकाउंटेंट की तरह समझा देता है कि टिकट बनाने में उसका कितना नुकसान है।

अब तो विजिलेंस टीम को ट्रेन से उतरने से पहले इतना देकर मुट्ठी गरम कर देता है कि जितनी उसके हफ्ते भर की सैलरी होती है, यह कहते हुए कि साहब यह तो सब आप लोगों की ही कृपा है। उसकी इस ईमानदारी, निश्छलता और सेवाभाव से भावविह्वल होते हुए विजिलेंस टीम स्टेशन पर उतरकर अपने अगले “भ्रष्टाचार उन्मूलन अभियान” की ओर बढ़ जाती है। अब वही टीटीई ट्रेन में भरपूर कमाई करने के साथ-साथ विजिलेंस केस में फंसे दूसरे स्टॉफ से दलाली करके भी कमाने लगता है।

विजिलेंस से पाला पड़ने के बाद इसी तरह की ईमानदारी की सीख फील्ड में कार्यरत लगभग सभी कर्मचारियों को मिलती है और इसी तरह से भ्रष्टाचार को खत्म करने की उनकी जिजीविषा बलवती होती जाती है। तकरीबन यही कहानी हर विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों के साथ कभी न कभी घटित होती है।

पहला, मेरा मानना है कि विजिलेंस की जगह रेलवे और अन्य मंत्रालयों में भी एक विभाग ऐसा बनाया जाए, जिसका काम विजिलेंस से ठीक उल्टा हो, जिसमें जैसे विजिलेंस (सतर्कता) में खोज-खोजकर केस बनाए जाते हैं, उस नए विभाग (समर्थता-क्षमता की खोज, पहचान और असलियत को समझने वाला विभाग) द्वारा पुरस्कार देने के लिए खोज-खोजकर ईमानदारी से सभी कर्मचारी और अधिकारी के काम का भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से निष्पक्ष ऑडिट करे, जो या तो आउट ऑफ टर्न प्रमोशन के रूप में हो या इंक्रीमेंट के रूप में। जिस कार्यसंस्कृति को आप बढ़ावा देना चाहते हों, उसी को इसका सबसे बड़ा क्राइटेरिया रखा जाना चाहिए।

जैसे अगर विश्वस्तरीय कार्य गुणवत्ता, अथवा विश्वस्तरीय से भी बेहतर कार्य, समय से या कम समय में, कम लागत पर कार्य, बिना गुणवत्ता पर समझौता किए पूरा करना, नए ट्रैफिक लाकर या इन्नोवेटिव तरीके से आय बढ़ाने पर, सेवा क्षेत्र में मानक स्वरूप नए तरह का कार्य करने पर, तकनीकी में दूरगामी सकारात्मक नया काम करने जैसे कार्यों को क्राइटेरिया रखा जाए। इसके लिए आउट ऑफ टर्न प्रमोशन, इंक्रीमेंट, मनचाहे शहर में पोस्टिंग, आउट ऑफ टर्न मकान अलॉटमेंट का प्रावधान या स्वेच्छा से परिवार नॉन-डिपेंडेंट (जैसे पैरेंट्स) में से किसी को भी अपने अधिकार में से एक या दो पास देने का प्रावधान, रिटायरमेंट के बाद अपनी पसंद के शहर में 2/3/4/5 साल के लिए रेलवे आवास में रहने की सुविधा आदि जैसे कुछ छोटे-बड़े ऐसे प्रावधान हों, जिन्हें कार्य के अनुसार और कार्य के रिकॅग्निशन के तौर पर दिया जाना चाहिए। इस रीति से अपने आप स्वस्थ और राष्ट्रहित वाली सकारात्मक कार्यसंस्कृति कुछ सालों में विकसित हो सकती है।

जब 10 रुपये का डिकॉय करके नियमानुसार किसी को नौकरी से तो निकाला जा सकता है और उसके साथ कई जिंदगियों को भी सड़क पर लाया जा सकता है, तो फिर ऐसा नियम क्यों नहीं बनाया जा सकता, जिससे अच्छा काम करने पर सब में उत्साह भरने के लिए और एक नई कार्यसंस्कृति को विकासोन्मुख तथा राष्ट्रहित में उपयोग करने के लिए उपरोक्त पुरस्कार रेलकर्मी और अधिकारी को देने का प्रावधान भी तो किया जा सकता है!

इसमें से कुछ सुविधाएं अभी भी दूसरे रूप में दी जा रही हैं, लेकिन उनका जो क्राइटेरिया है, वह जुगाड़, कार्टेल, चमचागीरी, भ्रष्टाचार, जात-पात, पैसा, लूट-खसोट और माफिया नियंत्रित है। नकारात्मक कार्यसंस्कृति के जितने भी अवयव हैं, वह अभी सभी प्रोत्साहन के, पुरस्कार के, रिकॅग्निशन के क्राइटेरिया हैं और विजिलेंस इसका पहला पहरुआ है।

दूसरा, मेरा मानना है कि एक ईमानदार समाज ही ईमानदार व्यवस्था को डिजर्व करता है। अगर कोई नागरिक अपनी नीयत और ध्येय में ईमानदार है, तो वह पहचान छुपाकर कोई बात या कंप्लेंट कतई नहीं करेगा।

यह मनुष्य की प्रकृति है कि जब उसे किसी पर घात करना होता है, तभी वह क्षद्म रूप अपनाता है। जो निडर होता है, वह छुपकर बात नहीं करता, बल्कि पहचान गलत बताकर या छिपाकर बात वही करता है, जिसमें खुद कोई कमी होती है, खोट होती है, जो अवसरवादी और घातकी होता है, क्योंकि जो वास्तव में डरा होता है, वह कुछ करता ही नहीं है, चूंकि उसे बखूबी पता होता है कि अंततः छुपता कुछ भी नहीं है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज सरकारी तंत्र में जो लोग विजिलेंस या इस तरह की अन्य एजेंसियों से संरक्षित (पैट्रोनाइज) नहीं हैं, वे काम न करना, निर्णय न लेना, अधिकार संपन्न न्याय न करना, सबसे सुरक्षित रास्ता मानते हैं, क्योंकि कंप्लेंट माफिया का बड़ा तंत्र कैंसर की तरह इस देश की पूरी व्यवस्था में फैला हुआ है।

ब्लैकमेलिंग और धन उगाही का इससे ज्यादा सम्मानित और आसान रास्ता और कोई नहीं है। इसमें कानून के बड़े-बड़े कथित जानकारों से लेकर छोटे स्तर के शातिर और अपराधिक दिमाग के लोग शामिल हैं। वे खुद परिवाद और आरटीआई की कमाई खाते हैं और इसके लिए एक बड़ा विजिलेंस जैसा डिपार्टमेंट भी उनके ही काम को आगे बढ़ाने के लिए सरकार ने खोल रखा है। सरकार ही जाने कि इससे आज तक उसकी भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था के कितने उद्देश्य पूरे हुए?

सुनने, पढ़ने, देखने और अनुभव में देश के हर नागरिक को तो यही लगता है कि 1947 के बाद और इन संस्थाओं की स्थापना के बाद से इस देश में कोई एक चीज “दिन दूनी रात चौगुनी” बढ़ी है, तो वह सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार, कदाचार और इसके उप-उत्पाद (बाई प्रोडक्ट्स) इत्यादि हैं।

फिर भी अगर सरकार इतना प्रावधान कर दे कि यदि परिवाद गलत साबित हुआ, तो परिवादकर्ता को उतनी ही कड़ी सजा दी जाएगी, जितनी परिवाद सत्य सिद्ध होने पर कर्मचारी/अधिकारी को दी जाती, तो बहुत हद तक विजिलेंस और सीबीआई जैसी संस्थाओं के समय, संसाधन और शक्ति का दुरुपयोग होने से बच जाता तथा देश के लाखों ईमानदार कर्मठ सरकारी कर्मचारी और अधिकारी निर्भीक होकर काम कर पाते। क्रमशः





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रेलवे बोर्ड के आदेश ताक पर ! – RailSamachar

संपूर्ण विषय पर समावेशक आदेश जारी करने में रेलवे बोर्ड भी करता है कोताही

सुरेश त्रिपाठी

रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) द्वारा कोविड-19 सुरक्षा और अनावश्यक स्टाफ कॉस्ट को कम करने के उद्देश्य से जोनल रेलों/उत्पादन इकाईयों के स्तर पर री-एंगेज्ड स्टाफ को हटाने में की जा रही हीलाहवाली को देखते हुए 10 जुलाई 2020 को एक पत्र {सं. ई(एनजी)2/2007/आरसी-4/कोर/1(पीटी.)} जारी करके स्पष्ट आदेश जारी किया गया था कि अपवाद स्वरूप किसी रेयर मामले में, वह भी सिर्फ सेफ्टी से संबंधित यदि अत्यंत आवश्यक हो तो ही किसी को छोड़कर, बाकी सभी ग्रुप ‘सी’ री-एंगेज्ड स्टाफ की सेवाएं तुरंत प्रभाव से समाप्त कर दी जाएं। लेकिन एक बार फिर कुछ जोनों/मंडलों द्वारा रेलवे बोर्ड के इस आदेश को ताक पर रख दिया गया है।

नियमों और रेलवे बोर्ड के दिशा-निर्देशों को खासतौर पर दरकिनार करने के लिए मशहूर कुछ जोनल रेलों में फिर यही खेल किया गया है, जहां कुछ री-एंगेज स्टाफ को तो कार्य मुक्त कर दिया गया, परंतु वहीं कुछ लोगों को मुक्त न करके किसी न किसी बहाने उनकी कथित सेवाएं जारी रखी जा रही हैं।

उपरोक्त पत्र में रेलवे बोर्ड ने सिर्फ ग्रुप ‘सी’ के री-एंगेज्ड स्टाफ को हटाने की बात कही है। परंतु इसमें ग्रुप ‘बी’ स्तर पर री-एंगेज्ड किए गए अधिकारियों के संबंध में कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिया है। जबकि कुछ जोनल रेलों द्वारा इन री-एंगेज्ड अधिकारियों की तथाकथित सेवाएं लगातार जारी रखी गई हैं और उन्हें पिछले लगभग चार माह से जारी लॉकडाउन में बैठे-बिठाए वेतन भुगतान किया जा रहा है। क्या इस तरह होती कास्ट कटिंग (मितव्यता)?

संबंधित जोनों/मंडलों के इस भेदभाव और पक्षपातपूर्ण व्यवहार का प्रभावित री-एंगेज स्टाफ विरोध कर रहा है और कोर्ट में जाने की संभावना तलाश रहा है। इन सभी का कहना है कि यदि सुरक्षा की दृष्टि से उनकी सेवाएं टर्मिनेट की गई हैं, तो बाकी स्टाफ की सेवाएं क्यों नहीं समाप्त की गईं? क्या वह लोग रेलवे बोर्ड के निर्देश के अनुसार आवश्यक सेफ्टी कैटेगरी में आते हैं?

प्राप्त जानकारी के अनुसार न सिर्फ रेलवे बोर्ड को, बल्कि जोनल प्रधान कार्यालयों को भी इस मामले में अंधेरे में रखकर कुछ मंडलों द्वारा दिग्भ्रमित किया जा रहा है। यहीं सिस्टम की खामी उजागर हो जाती है।

एक तरफ बोर्ड के आदेश के अनुपालन में कोताही की जा रही है, तो दूसरी तरफ रेलवे बोर्ड सहित जोनल मुख्यालयों को भी गुमराह किया जा रहा है। क्या जोनल अथवा मंडल अधिकारियों को रेल मंत्रालय, महाप्रबंधक और डीआरएम का तनिक भी भय नहीं रह गया है, जो उनके आदेशों पर भी छल-कपट करके उन्हें दिग्भ्रमित कर रहे हैं?

क्या रेल प्रशासन इसका खुलासा करेगा कि जिन री-एंगेज्ड लोगों की सेवाएं समाप्त नहीं की गई हैं, वह कौन सी सेफ्टी कैटेगरी में आते हैं?

अब जहां तक टर्मिनेट किए गए री-एंगेज्ड स्टाफ की बात है, तो उनमें प्रशासन द्वारा किए गए इस भेदभाव और पक्षपात के कारण भारी रोष व्याप्त है। प्रशासन की इस भेदभावपूर्ण नीति को लेकर वह मामले को पीएमओ और कोर्ट तक ले जाने की बात कह रहे हैं। उनका कहना है कि जब बात सुरक्षा की है, तब सभी री-एंगेज्ड स्टाफ को हटाया जाना चाहिए, लेकिन भेदभावपूर्ण नीति के कारण अब वे इस मामले को उच्च स्तर पर ले जाएंगे।

प्रश्न ये उठता है कि क्या रेलवे बोर्ड द्वारा दिए गए निर्देशों को कोई मंडल अथवा जोन अपने मन-मुताबिक बदल सकता है या उसमें कोई हेर-फेर कर सकता है?

कोरोना महामारी के फैलने के कारण वर्तमान में वैसे भी ट्रेन संचालन मात्र 10 प्रतिशत ही हो रहा है और निकट भविष्य में फुल कैपेसिटी से सभी ट्रेनों का संचालन हो पाना फिलहाल मुश्किल ही लग रहा है। इसलिए इस समय अनावश्यक खर्चों पर रोक लगाते हुए किसी भी विभाग में किसी भी स्तर पर री-एंगेज्ड स्टाफ रहना ही नहीं चाहिए। रेलवे बोर्ड को इस विषय पर स्पष्ट निर्देश जारी करना चाहिए।





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निचले स्तर की समस्याओं पर रेल प्रशासन का कोई ध्यान नहीं

कोई सुनने वाला नहीं, कहीं नहीं हो रही है सामान्य कर्मचारी की सुनवाई

रेलवे में जो भी रोटेशनल ट्रांसफर होते हैं, यह एक सच्चाई है कि उन पर सही तरीके से अमल नहीं हो रहा है। जो भी साधारण कर्मचारी हैं, उन्हें तुरंत ट्रांसफर पर रिलीव कर दिया जाता है और जो कर्मचारी अफसर का चहेता या यूनियनों का पदाधिकारी होता है, उसे रिलीव नहीं किया जाता।

जिस जगह कर्मचारी का ट्रांसफर होता है, उस जगह की पोस्ट को 6 महीने के लिए वहीं ट्रांसफर कर दिया जाता है, जहां यूनियन का पदाधिकारी चाहता है, या वहां जिस जगह उसको भेजा जाता है।

इसके अलावा 6-8 महीने बाद या एक साल बाद जब भी पुरानी जगह पर कोई वैकेंसी होती है, तब पुनः उस पदाधिकारी को वहां एडजस्ट कर दिया जाता है। यह खेल सभी मंडलों और जोनों में पूरी शिद्दत के साथ खेला जाता है।

लेकिन जब बारी साधारण कर्मचारी की आती है, फिर वह चाहे कितनी भी परेशानी बताए, उसकी कोई नहीं सुनता, न ब्रांच अफसर न ही डीआरएम, और न ही कोई यूनियन पदाधिकारी ! इसी तरह के हर मंडल में लगभग 300-800 मामले होंगे, जिनका ट्रांसफर हुआ और आज तक वह नई जगह नहीं गए या नहीं भेजे गए।

इसी प्रकार जो भी कमाऊ पूत होते हैं, उनके लिए भी कह दिया जाता है कि उनका ट्रांसफर कर दिया गया है परंतु वास्तविकता में उसे उसी जगह दूसरी टेबल दे दी जाती है, और वह बदस्तूर वहीं काम करता रहता है।

रेलवे की छोटी डिस्पेंसरियों में कोई भी विशेषज्ञ डॉक्टर, जो हफ्ते में एक बार आया करते थे, जैसे फिजिशियन, ईएनटी, आई स्पेशलिस्ट, गाइनो, अब सब को छोटी डिस्पेंसरियों में भेजा जाना बंद कर दिया गया है।

अगर कर्मचारी खुद किसी प्राइवेट हॉस्पिटल को दिखाए और वह दवा रेलवे से लेना चाहे, तो उसे उक्त दवाईयां देने से मना कर दिया जाता है। लेकिन यही यदि किसी अफसर या यूनियन नेता की बात हो, तो तुरंत लोकल खरीद करके दे दी जाती है।

जबकि सामान्य बीमार कर्मचारी को प्राइवेट हॉस्पिटल में रेफर करने में भी भारी आनाकानी की जाती है। नीचे स्तर पर इन तमाम समस्याओं को देखने वाला कोई नहीं है। आखिर सामान्य रेल कर्मचारी कहां जाए, उसकी सुनने वाला कौन है?

निचले स्तर पर ऐसी अनगिनत समस्याएं हैं, परंतु रेल प्रशासन का ध्यान निचले स्तर पर नहीं जा रहा है। रही बात मान्यताप्राप्त रेल संगठनों की, तो उन्हें अपनी सुख-सुविधाओं के सिवा बाकी कुछ नजर नहीं आता।





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अब तय है रेलवे के ट्रैक पर प्राइवेट ट्रेन ऑपरेशन – RailSamachar

मान्यताप्राप्त रेल संगठनों को धिक्कार रहे हैं ठगा सा महसूस करते रेल कर्मचारी

कभी “देश नहीं बिकने दूंगा” की बात कहने वाले आज वास्तव में “देश बेचने” पर उतर आए हैं!

सुरेश त्रिपाठी

हम बीते 6 सालों से बुलेट ट्रेन चलाने और न जाने क्या-क्या बातें सुनते रहे हैं..

जिस तरह पहले रेल सेवाएं बंद की गईं, और सिर्फ गुड्स ट्रेनों का परिचालन जारी रखा गया, फिर अपनों को फायदा पहुंचाने के लिए कथित जरूरी सामानों की आपूर्ति के नाम पर धीरे से स्पेशल पार्सल ट्रेनों की शुरुआत कर दी गई।

इसके बाद जब व्यवस्था की नाकामी के चलते बड़ी संख्या में मजदूरों, श्रमिकों का सड़कों पर निकलकर अपने गांव जाने के लिए पैदल मार्च शुरू हो गया, तब श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के नाम पर भी कुछ चुनिंदा रूटों पर ट्रेनें चलाई गईं।

इसमें भी व्यवस्था की नाकामी और नीति-नियंताओं का निकम्मापन उजागर हुआ तथा जानबूझकर इस श्रमिक स्पेशल ट्रेनों को भटकाया गया, जिससे रेलवे की बदनामी हो और सरकार यह साबित करने के लिए कह सके कि रेलवे की वर्तमान व्यवस्था नाकाम हो चुकी है, अतः कुछ चुनिंदा मार्गों पर निजी क्षेत्र को रेल परिचालन का जिम्मा सौंपा जा रहा है।

कोरोना संकट के नाम पर भारतीय रेल की सामान्य सेवाएं बंद करके प्राइवेट पार्टियों को ट्रेन ऑपरेशन के लिए आमंत्रित करने का इससे बेहतर मौका सरकार को नहीं मिल सकता था।

सरकार कोरोना काल का भरपूर इस्तेमाल कर रही है, क्योंकि उसे पता है कि इस मौके पर कोई यूनियन अथवा संगठन विरोध के लिए मैदान में नहीं उतरेगा।

इसके अलावा, सभी विपक्षी राजनीतिक दल मरणासन्न पड़े हुए हैं, जिससे देश में एक बड़ा राजनीतिक शून्य पैदा हो गया है। सरकार इसका भरपूर लाभ उठा रही है।

इसके साथ ही राजनीतिक विपक्ष की अनुपस्थिति में विपक्षी दलों की भूमिका निभाने वाली मीडिया और देश के कुछ प्रमुख प्रतिष्ठित वरिष्ठ पत्रकारों को या तो डरा-धमकाकर स्वान बना दिया गया है, या फिर अपना जरखरीद गुलाम बना लिया गया है।

देश की वर्तमान स्थिति ऐसी है कि लोग अब अपनी इज्जत बचाए रखने और अनावश्यक बेइज्जती से बचने के लिए सच बोलने, कहने और लिखने में भारी संकोच कर रहे हैं।

सरकार के पक्षधर कुछ लोगों को छोड़कर बाकी ज्यादातर लोग सच लिखने और बोलने से बच रहे हैं। यह सही है कि लोग डरे हुए हैं।

जो कुछ लोग लिखने, बोलने और कहने का दुस्साहस कर भी रहे हैं, उन्हें बेवजह पुलिसिया कार्रवाई, कानूनी और अदालती पचड़ों में लपेटकर परेशान किया जा रहा है। इसीलिए उनमें एक तरह का भय समा गया है।

उपरोक्त तमाम स्थिति सरकार को पूरी तरह से सूट कर रही है। इसीलिए सरकार खुलकर खेल रही है और वह सब कुछ बेचने या लुटाने अथवा निजी क्षेत्र को सौंपकर लूटने पर उतारू है, जिसे उसने नहीं बनाया है।

हर दस-पंद्रह दिन में सरकार द्वारा एक नया जुमला देशवासियों को परोस दिया जाता है। कभी देश पांच ट्रिलियन इकोनॉमी की बात होती है, तो कभी कोरोना को एक अवसर के रूप में देखने की बात कही जाती है, तो कभी आत्मनिर्भर बनाया जाता है। कभी “देश नहीं बिकने दूंगा” की बात कहने वाले आज वास्तव में देश बेचने पर उतर आए हैं।

सरकार के वादों, सरकार के जुमलों और सरकार के इवेंट मैनेजमेंट की दास्तान या फेहरिस्त “हरि अनंत हरि कथा अनंता” जैसी हो चुकी है, जिसमें पूरा देश कसमसा रहा है। एक नया जुमला ईजाद करके अथवा एक नई इवेंट खड़ी करके हर बड़े मुद्दे से पूरे देश का ध्यान भटका दिया जाता है।

अब जहां तक रेलवे के मान्यताप्राप्त संगठनों की बात है, तो वे तो पहले से ही मरणासन्न स्थिति में पहुंच चुके हैं। उन्होंने सरकार के सामने पूरी तरह से घुटने टेक दिए हैं। चिट्ठी लिखने, ज्ञापन सौंपने और फोटो खिंचवाने से ज्यादा वह कुछ करने की स्थिति में नहीं रह गए हैं।

“धिक्कार है मान्यताप्राप्त रेल संगठनों को, जिन्होंने पिछले कुछ सालों से रेलकर्मियों को न सिर्फ गुमराह करके रखा, बल्कि रेलवे में अपनों को भर्ती कराने के एवज में रेल परिवार को बंधक बनाकर सरकार के सामने घुटने टेक दिए हैं!” यह कहना है तमाम रेलकर्मियों का।

लखनऊ से दिल्ली के बीच चली पहली निजी ट्रेन ‘तेजस एक्सप्रेस’ के विरोध के अवसर पर उत्तर रेलवे के ऑफिसर्स रेस्ट हाउस में चेयरमैन, रेलवे बोर्ड वी. के. यादव के साथ ट्रेनों के निजीकरण पर चर्चा करते हुए एआईआरएफ के महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा, नरमू के महामंत्री के. एल. गुप्ता एवं अन्य पदाधिकारीगण

सरकार के इस कदम से अब रेलवे की सभी उत्पादन इकाइयों के भी हजारों कर्मचारी अपने भविष्य को असुरक्षित होते हुए देखकर बुरी तरह चिंतित हो गए हैं। उनका कहना है कि “जब मान्यताप्राप्त यूनियनें रेल परिचालन का निजीकरण नहीं रोक पा रही हैं, तो उत्पादन इकाइयों का निगमीकरण और निजीकरण होने से कैसे रोक पाएंगी!”

अब भी समय है, सभी सरकारी कर्मचारी संगठित होकर सरकार की वादाखिलाफी का विरोध और यूनियनों का संपूर्ण बहिष्कार करें!





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लॉकडाउन के दौरान प्रगति पर हैं महत्वपूर्ण विकास कार्य – RailSamachar

पूरा हुआ भटनी-औंड़िहार रेलखंड पर 125 रूट किमी का विद्युतीकरण

गोरखपुर ब्यूरो : कोविड-19 के चलते लागू देशव्यापी लाॅकडाउन एवं कोरोना संक्रमण के इस कठिन समय का सदुपयोग करत हुए पूर्वोत्तर रेलवे द्वारा कई महत्वपूर्ण विकास के कार्य सम्पादित किए जा रहे है। इसी क्रम में वाराणसी मंडल के भटनी-औंड़िहार रेलखंड पर 125 रूट किमी के विद्युतीकरण का चुनौतीपूर्ण कार्य पूरा करके 18 जून, 2020 को भटनी-किड़िहरापुर के बीच तथा 19 जून, 2020 को औड़िहार-इन्दारा के मध्य इलेक्ट्रिक इंजन ट्रायल सम्पन्न हुआ।

विद्युतीकृत इन दोनों रेलखंडों का शीघ्र ही रेल संरक्षा आयुक्त द्वारा निरीक्षण किया जाएगा। इस खंड के विद्युतीकरण से अब गोरखपुर से वाराणसी के मध्य एक बड़ा हिस्सा अब विद्युतीकृत रेलखंडों से जुड़ जाएगा, जिससे अन्य लाभों के अतिरिक्त गाड़ियों के समय-पालन में भी अपेक्षित सुधार होगा।

ऊर्जा संरक्षण को लेकर रेल प्रशासन अत्यंत सजग है। इसी क्रम में पूर्वोत्तर रेलवे ने पिछले वर्ष 540 रूट किमी. रेलवे ट्रैक के विद्युतीकरण का कार्य पूरा किया था। विगत कुछ वर्षों में पूर्वोत्तर रेलवे पर विद्युतीकरण के कार्य में अच्छी प्रगति हुई है।

वर्ष 2016-17 में 159.20 रूट किमी., 2017-18 में 167.14 रूट किमी. एवं 2018-19 में 431.23 रूट किमी. रेलखंड का विद्युतीकरण कार्य पूरा हुआ था। उल्लेखनीय है कि विद्युतीकरण से जहां पर्यावरण को लाभ पहुंचता है, ध्वनि प्रदूषण से मुक्ति मिलती है, वहीं डीजल पर निर्भरता समाप्त होगी, जिससे ईंधन खर्च में कमी आएगी तथा आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।

इस रेलखंड के अतिरिक्त अन्य खंडों पर भी विद्युतीकरण का कार्य लगभग पूरा कर लिया गया है। लखनऊ मंडल के गोंडा-सुभागपुर खंड (11 रूट किमी.) पर भी 19 जून, 2020 को इलेक्ट्रिक इंजन का ट्रायल सम्पन्न हुआ।

इज्जतनगर मंडल पर कासगंज-बरेली खंड (108 रूट किमी.) के विद्युतीकरण का कार्य भी लगभग पूरा हो गया है। इन खंडों पर शीघ्र ही रेल संरक्षा आयुक्त द्वारा निरीक्षण किया जाएगा। इन तीनों खंडों के विद्युतीकरण के बाद पूर्वोत्तर रेलवे पर कुल 1967 रूट किमी. रेलपथ विद्युतीकृत हो जाएगा।



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डीआरएम/फिरोजपुर पर कदाचार के गंभीर आरोप – RailSamachar

यदि रेलवे विजिलेंस सुशुप्तावस्था में न होता, तो एसओपी, प्लेसमेंट कमेटी और ब्रांच अधिकारियों के अधिकारों का अतिक्रमण करने से पहले उच्च अधिकारी सौ बार सोचते!

सुरेश त्रिपाठी

डीआरएम/फिरोजपुर राजेश अग्रवाल की कुछ गतिविधियों को लेकर मंडल के कर्मचारियों में भारी असंतोष देखने में आया है। उनके बारे में पिछले काफी समय से सोशल मीडिया पर कई प्रकार की पोस्ट डाली गई हैं, जिनमें डीआरएम के विरुद्ध कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। उन पर यह भी आरोप लगाया गया कि करीब एक साल से बिना किसी सूचना के अनुपस्थित रहने वाले एक महाकदाचारी कर्मी को न सिर्फ पुनः ड्यूटी पर ले लिया, बल्कि उसे उसकी मनचाही जगह पोस्टिंग भी दे दी, जिसके लिए उन्होंने पांच लाख रुपए कमाए!

इसके लिए डीआरएम ने ब्रांच अधिकारी के अधिकारों का अतिक्रमण करने के साथ ही एसओपी एवं प्लेसमेंट कमेटी को भी बाईपास किया। डीआरएम पर अपने मातहत ब्रांच अफसरों के अधिकारों का अतिक्रमण करने और स्टाफ के कुछ ऐसे ट्रांसफर करने के आरोप रेलकर्मियों द्वारा लगाए गए हैं, जो अत्यंत विवादास्पद रहे हैं। उन पर यह भी आरोप है कि मंडल में ऐसे तमाम कर्मचारी लंबे समय से एक ही जगह पदस्थ हैं, जिन्हें भ्रष्ट यूनियन नेताओं का पूरा संरक्षण प्राप्त है, डीआरएम के चलते कोई भी ब्रांच अफसर ऐसे महाभ्रष्ट और कदाचारी कर्मचारियों के खिलाफ चाहकर भी कोई कदम नहीं उठा पा रहा है।

उदाहरण स्वरूप डीआरएम पर आरोप है कि पूछताछ एवं आरक्षण क्लर्कों (ईसीआरसी) के ट्रांसफर में तमाम नियम-निर्देश हवा में उड़ाकर अथवा कचरे के डिब्बे में फेंक कर डीआरएम/फिरोजपुर ने मोटा माल कमाया। इसके कुछ उदाहरण भी दिए गए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार सीनियर डीसीएम/फिरोजपुर जब 4 फरवरी 2020 को पैटर्निटी लीव पर गए थे, उसके ठीक अगले दिन यानि 5 फरवरी 2020 को डीआरएम ने डीसीएम और एपीओ को अपने चेंबर में बुलाकर आदेश दिया कि तत्काल आज के आज ट्रांसफर लिस्ट तैयार की जाए।

इसके लिए मॉडल एसओपी के प्रावधान के अनुसार उक्त ट्रांसफर/पोस्टिंग की फाइल प्लेसमेंट कमेटी को भी नहीं भेजी गई। यही नहीं, ईसीआरसी कैडर के यह ट्रांसफर करके डीआरएम ने मॉडल एसओपी के उस प्रावधान का भी उल्लघंन किया, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि “डीआरएम/जेएजी अफसर को पूरा अधिकार (फुल पॉवर) होने के बावजूद, सभी ट्रांसफर प्लेसमेंट कमेटी की अनुशंसा/सिफारिश के अनुसार ही किए जाएंगे!”

“The Model SOP which require that even if the DRM or JAG officer has full powers, the transfers of the staff and officers are to be done as per the recommendation of the Placement Committee.”

आरोप है कि इन्हीं ट्रांसफर (पत्र सं.918-E/10/XVIII/2017/PIA, dtd. 06.02.2020) में डीआरएम/फिरोजपुर ने मोटा माल बनाया और उनके इसी कृत्य के बाद सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ पोस्टें डाली जाने लगीं।

उल्लेखनीय है कि यह यह सभी ट्रांसफर/पोस्टिंग जहां की तहां की गई और सबको मनचाही जगह प्राप्त हुई। जबकि 11 रिजर्वेशन सुपरवाइजर (आरएस-2) में से सिर्फ एक (राजकुमार) को छोड़कर, पुरुषोत्तम सिंह सहित बाकी सभी 10 लोगों को उनकी खुद की “रिक्वेस्ट” पर मनचाही पोस्टिंग मिल गई।

इसीलिए आरोपों में दम नजर आ रहा है। यूनियनें ने भी इस पोस्टिंग आर्डर पर अपना ठप्पा लगाकर इसका पर्याप्त श्रेय लूटने से पीछे नहीं रहीं, क्योंकि इस लूट में उनकी भी उसी तरह समान भागीदारी रही है, जिस तरह उनके संरक्षण में हर डिपो में लंबे समय से पदस्थ लोगों के माध्यम से रेल की लूट को अंजाम दिया जा रहा है।

इनमें से एक विशेष मामला अत्यंत विवादास्पद रेलकर्मी पुरुषोत्तम सिंह का है। वर्ष 2018 में उसके खिलाफ प्रशासन को मिली कदाचार की ढ़ेरों शिकायतों के बाद उसका ट्रांसफर प्रशासनिक आधार पर जम्मू से गुरदासपुर किया गया था। इसके अलावा वह जम्मू में पिछले 24 साल से लगातार पदस्थ था और भ्रष्ट यूनियन नेताओं से लेकर बड़ौदा हाउस में बैठे कुछ उच्च पदस्थ वाणिज्य अधिकारियों सहित राजनीतिक रूप से भी बहुत पहुंचा हुआ था। इसके अलावा वह कुछ गैरकानूनी व्यावसायिक गतिविधियों के लिए भी बदनाम था।

सीबीआई/जम्मू ने भी पुरुषोत्तम सिंह के विरुद्ध आय से अधिक संपत्ति रखने का मामला दर्ज किया था। इस सब के चलते उसने गुरदासपुर में ड्यूटी ज्वाइन नहीं की और यह कहकर खुले तौर पर रेल प्रशासन को चैलेंज किया कि “रेलवे में अब तक कोई माई का लाल पैदा नहीं हुआ जो उसे जम्मू एरिया से हटा सके!”

इसके बाद से वह लगातार लगभग एक साल तक ड्यूटी से नदारद रहा। इस बीच उसने न तो गुरदासपुर में ज्वाइन किया, और न ही प्रशासन को अपनी अनुपस्थिति के बारे में कोई सूचना देने की उसने जरूरत महसूस की। परिणामस्वरूप प्रशासन ने उसे रेलसेवा से बर्खास्त (रिमूव) कर दिया था।

परंतु अपीलेट अथॉरिटी (डीआरएम/फिरोजपुर) ने बिना उसकी किसी पृष्ठभूमि पर कोई विचार किए एक झटके में उसकी अपील स्वीकार कर ली और उसे ड्यूटी पर बहाल कर दिया, तथा उसकी पुरानी जगह जम्मू के नजदीक कटरा स्टेशन पर पदस्थ कर दिया। उसने तत्काल वहां जाकर ज्वाइन भी कर लिया। आरोप है कि अपने बचाव के लिए डीआरएम ने रीढ़हीन सीनियर डीपीओ से भी फाइल पर यह सिफारिश लिखा ली कि “संबंधित कर्मचारी को ड्यूटी पर लेने और कटरा में पोस्ट करने में कोई अड़चन नहीं है!”

अब पुरुषोत्तम सिंह को यह भी दावा करते हुए कुछ कर्मचारियों ने सुना है कि वह छह महीने के अंदर जम्मू में अपनी पोस्टिंग करवाकर दिखाएगा। इसीलिए यह चर्चा हो रही है कि उसने कटरा स्टेशन पर पोस्टिंग के लिए ही डीआरएम को पांच लाख रुपए दिए थे?

यहां तक कि अब यह भी कहा जा रहा है कि डीसीएम पर बहुत अधिक दबाव डाला गया, जबकि उसने फाइल पर यह बात दर्ज कर दी थी कि पुरुषोत्तम सिंह के ट्रांसफर पर विचार नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसका ट्रांसफर प्रशासनिक आधार पर गुरदासपुर किया गया था।

इसके अलावा, पुरुषोत्तम सिंह के खिलाफ विभागीय अनुशासनिक जांच (डीएंडएआर इंक्वायरी) अभी भी लंबित है। परंतु इसके बावजूद डीआरएम/फिरोजपुर, कटरा में उसकी पोस्टिंग के लिए अत्यंत उतावले थे, “क्योंकि पैसा बोल रहा था!” यह कहना है मंडल के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों का।

सामान्यतः, ऐसे विवादास्पद मामले प्रशासनिक क्लीयरेंस के लिए निश्चित तौर पर वाणिज्य विभाग या उस संबंधित विभागीय अधिकारी के पास भेजे जाते हैं, जो ट्रांसफर करता है, परंतु आरोप है कि चूंकि सीनियर डीपीओ, फिरोजपुर की इस पूरे मामले में डीआरएम के साथ पूरी मिलीभगत चल रही थी, इसीलिए उन्होंने फाइल पर यह रिमार्क दे दिया कि “संबंधित कर्मचारी (पुरुषोत्तम सिंह) को कटरा में पदस्थ करने में कोई प्रशासनिक अड़चन नहीं है।” जबकि सामान्यतः सीनियर डीपीओ यह क्लीयरेंस नहीं दे सकता है।

यह है पुरुषोत्तम सिंह का कच्चा चिट्ठा:-

Details of Purushottam Singh background

सीबीआई ने पुरुषोत्तम सिंह के विरुद्ध आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज किया था। इस मामले में उन्हें मेजर पेनाल्टी चार्जशीट (एसएफ-5) दी गई है और इसकी जांच उत्तर रेलवे विजिलेंस द्वारा की जा रही है।

CBI letter against Purshottam Singh

वह इस मामले में लगभग एक साल तक ड्यूटी से गायब रहे हैं। बताते हैं कि इसीलिए वह जांच से भागने और इसे लंबित करने की कोशिश में लगा हुआ है। ऐसी स्थिति के बावजूद डीआरएम ने उसे जम्मू के पास ही कटरा में पोस्टिंग दे दी। उस पूरे क्षेत्र में उसके प्रभाव को देखते हुए यह कहा जा रहा है कि वह अपने केस से संबंधित रिकार्ड और सबूत नष्ट करने में सफल हो सकता है, क्योंकि अब तो उसे मंडल के सर्वोच्च अधिकारी (डीआरएम) का भी वरदहस्त प्राप्त है।

Westage of Railway Revenue at Firozpur Division

उपरोक्त तमाम प्रकरण पर डीआरएम/फिरोजपुर राजेश अग्रवाल से जब उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो उनका स्पष्ट कहना था कि उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया है जो नियम के विपरीत हो। उनका कहना था कि किसी काम को अनावश्यक रूप से लंबे समय तक टालना उनके स्वभाव में नहीं है। उन्होंने वही किया, जो न्यायोचित था। उन्होंने कहा कि किसी स्टाफ के प्रति किसी अधिकारी का पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिए।

SOP which provides that any transfer can only be made by placement committee

इस पर जब उनसे यह पूछा गया कि पुरुषोत्तम सिंह के मामले में किसी अधिकारी का कोई पूर्वाग्रह कैसे हो सकता है, जबकि उसमें दो अधिकारियों ने निर्णय लिया था, एक ने ट्रांसफर किया तो दूसरे ने रिमूवल का निर्णय लिया था। कर्मचारी लंबे समय से अनुपस्थित था, उसने निर्धारित स्टेशन पर ज्वाइन नहीं किया, फिर उन्होंने बिना किसी पृष्ठभूमि की जांच किए कैसे उसे पुरानी जगह के नजदीक पदस्थ कर दिया? मॉडल एसओपी के प्रावधान का उल्लघंन और प्लेसमेंट कमेटी सहित ब्रांच अफसर के अधिकारों का भी आपने अतिक्रमण किया?

इस पर डीआरएम राजेश अग्रवाल का कहना था कि मंडल के सभी अधिकार डीआरएम में निहित हैं और जब ब्रांच अफसर नहीं हो अथवा वह काम नहीं कर रहा हो, तो डीआरएम यानि मंडल के सर्वोच्च अधिकारी को निर्णय लेना ही पड़ता है। इस पर जब उनसे यह कहा गया कि आरोप है आपने यह निर्णय पैसे के लेनदेन के आधार पर लिया, तो उनका कहना था कि ऐसे आरोपों का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि किसी को कोई आरोप लगाने या ऐसी चर्चा करने से रोका नहीं जा सकता।

श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में यात्रियों की सुविधा और व्यवस्था के लिए लगाए गए तंबू तनिक से अंधड़ में उड़ गए

बहरहाल, सच्चाई जो भी हो, यह पूरा प्रकरण गंभीर जांच का विषय तो है ही, साथ में यह भी कहना पड़ेगा कि यदि रेलवे विजिलेंस सुशुप्तावस्था में न होता अथवा मुर्दा न पड़ा होता, तो इस तरह के मामले ही न होते या फिर एसओपी, प्लेसमेंट कमेटी और ब्रांच अधिकारियों के अधिकारों का अतिक्रमण करने से पहले उच्च अधिकारी सौ बार सोचते! उल्लेखनीय है कि यही सब कदाचार उत्तर रेलवे के अंबाला और दिल्ली मंडल सहित कई अन्य मंडलों में भी खुलेआम हो रहा है, तथापि रेलवे विजिलेंस और रेल प्रशासन चौतरफा रामराज्य मानकर निश्चिंत है। क्रमशः








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अति आवश्यक होने पर ही यात्रा करें! – RailSamachar

भारतीय रेल द्वारा देश भर में प्रतिदिन कई श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही हैं, ताकि श्रमिकों की अपने घरों तक पहुंच सुनिश्चित की जा सके। यह देखा जा रहा है कि कुछ ऐसे लोग भी श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में यात्रा कर रहे हैं, जो पहले से ही ऐसी बीमारियों से पीड़ित हैं जिनसे कोविड-19 महामारी के दौरान उनके स्वास्थ्य को खतरा बढ़ जाता है। यात्रा के दौरान पूर्वग्रसित बीमारियों से लोगों की मृत्यु होने के कुछ दुर्भाग्यपूर्ण मामले भी सामने आए हैं।

ऐसे पूर्व बीमारीग्रस्त लोगों की सुरक्षा हेतु रेल मंत्रालय, केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश क्र. 40-3/2020-DM -l(A) दि.17.05.2020 के तहत, अपील करता है कि पूर्व बीमारीग्रस्त (जैसे उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, कर्करोग, कम प्रतिरक्षा) वाले व्यक्ति, गर्भवती महिलाएं, 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चे एवं 65 वर्ष से ऊपर के बुजुर्ग अपने स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए, जब तक अत्यंत आवश्यक न हो, रेल यात्रा करने से बचें।

रेल मंत्रालय ने इस अपील में यह भी कहा है कि “हम समझ सकते हैं कि देश के कई नागरिक इस समय यात्रा करना चाहते हैं एवं उनको निर्बाध रूप से रेल सेवा मिलती रहे, इस हेतु भारतीय रेल और इसके सभी कर्मी चौबीसों घंटे, सातों दिन कार्य कर रहे हैं। परंतु यात्रियों की सुरक्षा हमारी सबसे पहली प्राथमिकता है।”

“इसके लिए सभी नागरिकों का यथोचित सहयोग अपेक्षित है। किसी भी कठिनाई या आकस्मिक समस्या होने पर नजदीकी रेलकर्मी से संपर्क करने में हिचकिचाएं नहीं। भारतीय रेल आपकी सेवा में हमेशा की तरह तत्पर है।”

(हेल्प लाइन नंबर – 139 & 138)








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जब हम कोरोना से लड़ते हुए देश सेवा में लगे थे, तब सरकार हमारी पीठ पर खंजर घोंप रही थी -शिवगोपाल मिश्रा

यह समय चुनौतीपूर्ण है, इसलिए हमें कोरोना से डरकर नहीं, लड़कर यूनियन का काम करना होगा -महामंत्री

एनआरएमयू, लखनऊ मंडल की समीक्षा बैठक संपन्न

नई दिल्ली: नार्दर्न रेलवे मेंस यूनियन, लखनऊ मंडल की समीक्षा बैठक शनिवार, 30 मई को संपन्न हुई। बैठक में महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने कहा कि ये वक्त चुनौतीपूर्ण है, इसलिए हमें कोरोना से डरकर नहीं, लड़कर यूनियन का काम करना होगा। उन्होंने कहा कि ये सही है कि कोरोना के चलते चौतरफा दहशत का माहौल है। फिर ये जल्दी खत्म होने वाला भी नहीं है। ऐसे में हम सब घर तो नहीं बैठ सकते है। परंतु सावधानी के साथ अपना काम भी करना है और यूनियन की गतिविधियों को भी जारी रखना है।

वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए लखनऊ मंडल की समीक्षा बैठक में महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने सभी मामलों पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि लॉकडाउन के बावजूद रेलकर्मचारी पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ ट्रेनों का संचालन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन से जब पूरा देश ठप हो गया, लोग घरों में बैठ रह गए, तब देशवासियों की चिंता रेलकर्मियों ने की, क्योंकि अगर इस दहशत के माहौल में मालगाडियों और पार्सल ट्रेनों का संचालन न होता, तो कई राज्यों में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति ठप हो जाती।

उन्होंने कहा कि रेलकर्मचारियों ने मालगाड़ियों, पार्सल ट्रेनों का संचालन कर अनाज, फल, सब्जी, दूध की ही आपूर्ति को नहीं, बल्कि अन्य जरूरी सामानों की भी किसी राज्य में कमी नहीं होने दी। जब राज्य सरकारें मजदूरों को उनके घर पहुंचाने में नाकाम साबित हुईं, तो फिर किसी तरह की चिंता किए बगैर हजारों ट्रेनों के जरिए 50 लाख से ज्यादा मजदूरों को उनके घर रेलकर्मियों ने ही पहुंचाया।

महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि जब हम कोरोना से लड़ते हुए देश की सेवा कर रहे थे, तब हमारी सरकार हमारी पीठ थपथपाने के बजाय हमारी पीठ पर हमला कर रही थी। उस दौरान सरकार श्रमिक विरोधी काम करते हुए कर्मचारियों को मिल रही सुविधाओं में कटौती करने की साजिश में जुट गई। उन्होंने कहा कि एक तरफ तो रेलकर्मचारियों ने बिना मांगे पीएम केयर फंड में 151 करोड़ रुपये का योगदान दिया, तो दूसरी तरफ सरकार ने हमारी पीठ पर खंजर घोंपा। वह हमसे कहते तो हम कुछ और भी मदद करते, लेकिन ऐसा न करके सरकार ने डीए फ्रीज करने का एकतरफा फैसला सुना दिया।

उन्होंने कहा कि एआईआरएफ और एनआरएमयू का इतिहास है कि हमने कभी किसी भी सरकार की मनमानी नहीं चलने दी। हमने कर्मचारी हितों के साथ कभी समझौता नहीं किया। इसलिए इस मामले पर फेडरेशन ने अपना रुख साफ कर दिया कि सरकार की ये चालबाजी हमें मंजूर नहीं है।

महामंत्री ने कहा कि फिलहाल तो डीए को फ्रीज करने का मामला हो, या  फिर पदों को खत्म करने की बात हो, पुरानी पेंशन की बहाली समेत अन्य दूसरे मुद्दों पर एनआरएमयू और फेडरेशन लगातार सरकार के संपर्क में रहकर अपना विरोध जताती रही है। जब देखा गया कि इस सबके बाद भी सरकार का रवैया कर्मचारियों के खिलाफ ही है, तो एआईआरएफ की स्टैंडिग कमेटी की बैठक में संघर्ष का निर्णय लिया गया।

उन्होंने कहा कि इसी क्रम में एक से छह जून तक तो हम राष्ट्रीय स्तर पर जनजागरण करेंगे और आठ जून को काला दिवस मनाने के लिए काली पट्टी बांधकर काम करेंगे। इसके बाद भी अगर हमारी बात नहीं सुनी जाती है, तो आगे की रणनीति पर विचार किया जाएगा।

उन्होंने दोहराया कि अगर सरकार को बैकफुट पर लाना है, तो हमें निचले स्तर पर गर्मी पैदा करनी होगी। इसके बिना काम चलने वाला नहीं है। महामंत्री ने कहा कि इन हालात में हमें कोरोना से डरकर घर नहीं बैठ जाना है, बल्कि कोरोना से भी लड़कर सरकार का भी मुकाबला करने को तैयार रहना है।

महामंत्री ने संगठन की समीक्षा बैठक में लखनऊ मंडल की तारीफ की और कहा कि मेंबरशिप का मामला हो या फिर केंद्र से निर्धारित किए गए कार्यक्रम हों, हर मामले में लखनऊ मंडल का प्रदर्शन बेहतर रहा है। उन्होंने युवाओं को संगठित करने पर जोर दिया। संगठन में दो शाखाओं के चुनाव भी होने हैं, लिहाजा सभी शाखा सचिव अपना  इलेक्टोरल तैयार कर केंद्र को भेज दें, ताकि आगे की कार्रवाई की जा सके।

केंद्रीय अध्यक्ष एस. के. त्यागी ने लखनऊ मंडल के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि अभी तो देख रहा हूं कि कोरोना का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, इसलिए सावधानी  बरतनी होगी, क्योंकि  इसकी चपेट में कुछ रेलकर्मचारी भी आ गए हैं, लिहाजा रेल भवन ही नहीं बड़ौदा हाउस को भी बंद करना पड़ा है। उन्होंने कहा कि रेलकर्मियों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। सरकार ने हमें कोरोना वारियर्स तो माना, लेकिन दूसरे विभागों की तरह हमें किसी तरह की सहूलियत नहीं दी। इससे रेल कर्मचारियों में रोष होना स्वाभाविक है। आने वाला समय काफी चुनौतीपूर्ण है, इसलिए हमें काम के साथ अपनी सुरक्षा का भी पूरा ख्याल खुद ही रखना होगा।

केंद्रीय उपाध्यक्ष प्रवीना सिंह ने कहा कि लखनऊ मंडल विपरीत हालात में भी अच्छी मेंबरशिप की है। इसके लिए पूरी टीम बधाई की पात्र है। उन्होंने कहा कि मंडल  में महिला संयोजक के रिटायर होने के बाद ये पद रिक्त है, इस पर अगर जल्दी नियुक्ति हो जाए तो महिलाओं को संगठित करने में और सुविधा होगी।

नेशनल यूथ कन्वीनर प्रीति सिंह ने मंडल में युवाओं के बीच हुए कार्यों पर चर्चा की। इस कांफ्रेंस को केंद्रीय उपाध्यक्ष एस. यू. शाह, कोषाध्यक्ष जोनल यूथ कन्वीनर मनोज श्रीवास्तव ने भी संबोधित किया।

मंडल अध्यक्ष राजेश सिंह ने कहा कि ये सही है कि कोरोना की वजह से हमारे संगठन के कार्यों पर थोड़ा असर पड़ा, लेकिन जब हम सब ने देखा कि महामंत्री खुद इतनी देर तक काम कर रहे हैं, रोज आफिस आ रहे हैं, तो अपने लोगों ने भी संगठन के काम में कोई कोताही नहीं की और अपना प्रदर्शन बेहतर किया। उन्होंने कहा कि हमारी तैयारी है और जल्दी शाखास्तर पर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए कार्यक्रम को आगे बढ़ाया जाएगा।

मंडल मंत्री आर. के. पांडेय ने संगठन के कार्यों की विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि कोरोना के दौरान हमारे साथियों ने तमाम सामाजिक कार्यों में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। हम लोगों ने भूखे मजदूरों को श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में खाने के पैकेट का वितरण किया, लगेज पोर्टरों की मुश्किल घड़ी में मदद की गई। ऐप बेस्ट ट्रांसपोर्टर्स को भी राहत सामग्री का वितरण किया गया।

उन्होंने कहा कि इस दौरान कुछ रेलकर्मियों की भी कुछ समस्याएं रहीं, उनका भी समाधान किया गया। कई मसलों में केंद्रीय नेतृत्व से भी काफी मदद मिली, जिससे हम ये सब कर पाने में कामयाब हुए। उन्होंने आश्वस्त किया एक से छह जून के बीच जनजागरण अभियान के तहत हमारी तैयारी पूरी है और हम बेहतर प्रदर्शन करेंगे। इसके  अलावा आठ जून को हर कर्मचारी काली पट्टी जरूर बांधेगा, इसकी तैयारी की जा चुकी है।

कांफ्रेंस में सेवानिवृत्त हो रहे सहायक मंडलमंत्री घनश्याम पांडेय के कार्यों की भी सराहना की गई। इस दौरान मीटिंग को मुख्य रूप से राकेश कनौजिया, सुधीर तिवारी, एस. के. सिंह, रंजन सिह, संजय श्रीवास्तव, सुनिल सिंह, धीरेन्द्र सिंह, बिंदा प्रसाद, राकेश कुमार पांडेय, मदन गोपाल मिश्रा, राजकुमार, हीरा लाल और अजय श्रीवास्तव ने भी संबोधित किया।

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जरूरत है हर मुद्दे पर सरकार से सवाल करने की! – RailSamachar

लग्घी से पानी पिलाने से किसी की प्यास नहीं बुझती, आज जरूरत है कि सरकार किसी की भी हो, जहां जैसी जरूरत हो, वहां उससे वैसा सवाल किया जाए!

तो सवाल यह है कि जब बीस लाख करोड़ के पैकेज से भारत को “आत्मनिर्भर” बनाने कि बात की जा सकती है, तो कुछ सौ करोड़ खर्च करके राष्ट्रीय महामार्गों पर पैदल चलते लाखों लोगों को उनके घर क्यों नहीं पहुंचाया जा सकता?

तो सवाल है कि जब यह भीड़ ही नहीं रहेगी, तो आप किसके दम पर “आत्मनिर्भर भारत” बनाएंगे?

आप भूल रहें हैं कि यही वह भीड़ है, जिसने दिल्ली को दिल्ली बनाया। मुंबई को चमकाया और सूरत की सूरत सुधारी है।

इन्हीं के दम पर फैक्ट्री हैं, धंधे हैं, मॉल और पब हैं। आप इन्हीं के दम पर नेता हैं और इन्हीं के दम पर आपकी राजनीति है, पत्रकार हैं, बुद्धिजीवी हैं और हम लेखक हैं।

यही वह भीड़ है, जिसकी मेहनत और जिसके सीने से निकलने वाले पसीने के दम पर आपकी पांच ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी का सपना खड़ा हुआ है।

यही वह भीड़ है, जो थाली बजाती है, दीये जलाती है और ठीक आठ बजे टीवी खोलकर आपका इंतजार करती है। लेकिन आप तो मुंह में गमछा बांधकर कुछ दिन से “मेरा भाषण ही तेरा राशन है” वाली मुद्रा में हैं।

इधर भीड़ खाली पेट बीस लाख करोड़ के जीरो गिनते हुए सोच रही है कि आत्मनिर्भर भारत के विज्ञापन में वो कहां खड़ी होगी। पैदल चलते लोगों की थकी आंखें जानना चाहती हैं कि देश और राज्यों का ये कौन सा तंत्र है, जो अपने नागरिकों को उनके घर नहीं पहुंचा सकता?

क्या इतने संसाधन विहीन थे हम? शायद नहीं। इसलिए माफ करें प्रधानमंत्री जी, आप “लग्घी से पानी पिलाने” की बात करते हैं!

अब इस देश का तंत्र जनता को लग्गी से पानी पिला रहा है। जिनको तत्काल खाना और पानी चाहिए, उन्हें आत्मनिर्भर और लोकल से वोकल का मंत्र देकर बीस लाख करोड़ के जीरो गिनवा रहा है।

लेकिन दिक्कत है कि मुझे ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए थी। मुझे डरना चाहिए था, क्योंकि अब मुझे भी सर्टिफिकेट दे दिया जाएगा। कहा जाएगा कि तुम क्या जानो देश कैसे चलता है ?

मैं भी जानता हूं कि कमरे में बैठकर बातें करना दुनिया का सबसे आसान काम है। लेकिन इस सवाल से कैसे मुंह मोड़ लूं कि जब बीस लाख करोड़ खर्च करके इकोनॉमी बचाई जा सकती है, तो कुछ सौ करोड़ खर्च करके इन इकोनॉमी बचाने वालों को क्यों नहीं बचाया जा सकता!

लेकिन मैं देख रहा हूं, इस देश के बौद्धिक चलन को! यहां सवाल करने वाले हाशिये पर ढ़केल दिए जातें हैं और सवाल से समर्थन और विरोध करने वाले मजे में रहते हैं।

मुझे यकीन हो गया है कि अब यहां दो ही किस्म के लोग बचे रहेंगे.. या तो वो आंख मूंदकर किसी के समर्थन में खड़े होने वाले होंगे या आंख मूंदकर किसी के विरोध में। या तो वो किसी को भगवान मानते हैं, या किसी को शैतान। लेकिन न जाने क्यों, मुझे अब इन दोनों अतियों से चिढ़ होने लगी है।

यही कारण है कि मेरे जैसे आदमी ने लिखना कम कर दिया। और ये देखकर हैरान रह गया कि यहां मोदी की आलोचना करने पर भीड़ से निकला एक भक्त किसी को वामपंथी और कांग्रेसी ठहरा देता है।

अगर आपने उलटकर राजमाता और उनके युवराज से या फिर बाबूजी की राजनीतिक विरासत ढ़ो रहे राजकुमारों से सवाल कर दिया तो एक कथित सेक्युलर बुद्धिजीवी आपको “भक्त” का सर्टिफिकेट लाल कागज पर जारी कर देता है।

वहीं आपने गलती से भी यदि वामपंथियो की बौद्धिक बेईमनियों को आईना दिखा दिया, तब तो आप इस तथाकथित समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं।

यही कारण है कि मैंने मान लिया है कि यहां संतुलन बनाए रखना मुश्किल है। सत्य एक भ्रम है। निरपेक्षता एक ढोंग है और संवेदना एक बाजार है।

एक बुद्धिजीवी अपने हिस्से का सामान लेकर, बाजार में जब तक घूमता रहता है, तब तक वो प्रासंगिक बना रहता है, वरना गायब हो जाता है।

मुझे यकीन हो गया है कि मेरे जैसे लोग शायद नहीं पढ़े जाएंगे, क्योंकि अब वो हर वक्त किसी का गुणगान या विरोध करने की कला में शायद माहिर नहीं हो पाएंगे।

तथापि इतना तो तय है कि हम प्रासंगिक बने रहें या नहीं, साहित्यकार कहे जाएंगे या नहीं, लेकिन जब भी देश के हाशिये पर खड़े आम आदमी के ऊपर संकट आएगा, तब न हम किसी सत्ता के साथ खड़े रहेंगे, न ही किसी विपक्ष के साथ।

हम अटैची पर अपनी संतान को लेकर रोड पर घसीटने वाली मां के साथ ही खड़े रहेंगे। हम उन हाथों के साथ खड़े रहेंगे, जिन हाथों को थामने वाला कोई बचा नहीं है।

हम उन आंखों के साथ खड़े रहेंगे, जो पानी की खाली बोतलों और भोजन के बिखरे पैकेटों को टुकुर-टुकुर देखकर अपनी किस्मत को कोस रही हैं।

हम उन पैरों के साथ खड़े रहेंगे, जो अपने मरे हुए सपने को लेकर वक्त की कठिन चढ़ाईयां चढ़ रहे हैं। हम तय करेंगे कि भूख के साहित्य और मजबूरी की कविता को लाचारी के छंदों में लपेटकर कभी न बेचें।

हम पहले आईना देखेंगे और फिर दूसरों को दिखाएंगे, क्योंकि सत्तर सालों से इस देश में अंधे ही आईने बेचते आएं हैं और हम इन आईनों में अपनी मन-पसंद छवियां देखते आए हैं। इस महामारी में अब इस चलन को खारिज करने की जरूरत है। इसको सिरे से नकारने की जरूरत है।

आज जरूरत है कि सरकार किसी की हो, जहां जैसी जरूरत हो, वहां उससे वैसा सवाल किया जाए। काम अच्छा हो तो तारीफ की जाए और गलत हो तो झट से विरोध किया जाए। मन करे तो सलाह भी दी जाए।

क्योंकि जरूरी नहीं है कि आप अपने कमरे में इस लेख को पढ़ते हुए बचे रहेंगे। ये भयानक दौर है। किसी का भी कोई भरोसा नहीं है। कल को आप भी अपने भूखे बच्चे को लेकर इस पैदल चलती मजबूर भीड़ का हिस्सा हो सकते हैं। आप भी भूख-प्यास से चिल्ला सकते हैं।

और तब.. तब शायद आपको सोचकर अफसोस होगा कि इस अंध विरोध और अंध समर्थन की परम्परा ने सत्तर सालों से इस देश की जनता के साथ सबसे बड़ा धोखा किया है।

*लेखक अतुल कुमार राय एक वरिष्ठ साहित्यकार हैं।








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सीपीडी/आरई/दानापुर पर अति-मेहरबान रेलवे बोर्ड ! – RailSamachar

क्या भारतीय रेल में अभय कुमार चौधरी के जितना काबिल अधिकारी अब कोई बचा ही नहीं?

सीपीडी/आरई/दानापुर अभय कुमार चौधरी पर पूर्व मेंबर ट्रैक्शन घनश्याम सिंह के रिटायर होने के एक साल बाद भी रेलवे बोर्ड आखिर क्यों मेहरबान है। यह बात किसी की भी समझ से परे है। घनश्याम सिंह, जिनका नाम उनकी भ्रष्ट कार्य-प्रणाली के चलते साथी विद्युत अधिकारियों ने “घमासान सिंह” रख दिया था, ने ही मेंबर ट्रैक्शन बनते ही अपने चहेते अभय कुमार चौधरी को सीपीडी/आरई/दानापुर बनाया था।

इतना ही नहीं घमासान सिंह ने अपने कार्यकाल में अक्टूबर 2018 से सीपीडी/आरई/हावड़ा का कुछ हिस्सा सीपीडी/आरई/दानापुर को ट्रांसफर कर दिया था। फरवरी 2019 में जब सीपीडी/आरई/हावड़ा का ट्रांसफर हो गया, तब घमासान सिंह ने सीपीडी/आरई/दानापुर को सीपीडी/आरई/हावड़ा का पूरा चार्ज सौंप दिया। जो अभी तक चल रहा है। जबकि घनश्याम सिंह का रिटायरमेंट हुए इसी माह एक साल होने जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि चीफ प्रोजेक्ट डायरेक्टर/रेलवे इलेक्ट्रीफिकेशन (सीपीडी/आरई) दानापुर अभय कुमार चौधरी को घमासान सिंह का लगातार वरदहस्त प्राप्त रहा है। विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि इन दोनों की सेटिंग इतनी जबरदस्त है कि अभी भी आरई दानापुर का अच्छा खासा धन उगाही का हिस्सा घमासान सिंह को पहुंच रहा है! तथापि, रेलवे बोर्ड, रेलवे विजिलेंस और कोर मुख्यालय/प्रयागराज के दिमाग़ में अब तक उन्हें हटाने का ख्याल भी नहीं आ रहा है।

आज जबकि सीपीडी/आरई/हावड़ा के अधीन लगभग 1000 टीकेएम से अधिक का इलेक्ट्रीफिकेशन का काम चल रहा है, जो कि सीपीडी/आरई/दानापुर के कार्यक्षेत्र से ज्यादा है। फिर भी सीपीडी/आराई/हावड़ा की जगह किसी भी इलेक्ट्रिकल ऑफीसर की पोस्टिंग नहीं की जा रही है। जैसे कि अभय कुमार चौधरी के जितना काबिल अधिकारी भारतीय रेल में अब कोई बचा ही नहीं है।

सूत्रों का कहना है कि अभय कुमार चौधरी को रेलवे बोर्ड विजिलेंस का भी वरदहस्त प्राप्त है। इसीलिए वह ओपन लाइन द्वारा किए गए ज़्यादातर काम के टेंडर अपने चहेते कांट्रेक्टर को अवार्ड करते हैं और कथित फाल्स बिलिंग कर करोड़ों रुपये का आपस में ठेकेदार के साथ मिलकर बंदरबांट कर रहे हैं। सीपीडी/आरई/हावड़ा के सभी टेंडर भी सीपीडी/आरई/दानापुर यानि अभय कुमार चौधरी द्वारा ही पटना में बैठकर किए जा रहे हैं।

यही वजह है कि शायद करोड़ों के खेल में रेलवे बोर्ड और विजिलेंस को भी मोटा माल पहुंच रहा होगा? इसीलिए सीपीडी/दानापुर अभय कुमार चौधरी को हटाने की बात तो दूर रही, उसे पिछले 18-20 महीनों से सीपीडी/आरई/हावड़ा की पोस्ट का अतिरिक्त प्रभार देकर और उसे खाली रखकर लुकिंग ऑफ्टर अरेंजमेंट से काम चलाया जा रहा है, जबकि बतौर सीपीडी/दानापुर अभय कुमार चौधरी का कार्यकाल भी पूरा हो चुका है।

अब होना यह चाहिए कि अभय कुमार चौधरी को अविलंब सीपीडी/दानापुर की पोस्ट से ट्रांसफर करके उनके अधीन हुए अब तक सभी कार्यों और उनके द्वारा पटना के विभिन्न मॉल्स में खरीदी गई दूकानों सहित उनकी समस्त चल-अचल संपत्तियों की सीबीआई जांच कर करोड़ों के घोटाले को उजागर कर उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिए। इसके साथ ही सीपीडी/आरई/हावड़ा के पद पर किसी अन्य सक्षम अधिकारी की पोस्टिंग अविलंब होनी चाहिए। क्रमशः

बेशर्मों को सींग और पूंछ नहीं होती!

देखें, घनश्याम सिंह उर्फ घमासान सिंह द्वारा अपनी वाहवाही के लिए बनाया गया वीडियो, जबकि वह अपनी पूरी रेलसेवा के दौरान भ्रष्टाचार के लिए पूरी भारतीय रेल में न सिर्फ अत्यंत विवादास्पद रहे, बल्कि बदनाम होकर रिटायर हुए और अभी भी न सिर्फ जम्मू-दिल्ली के सीबीआई दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, बल्कि क्वालिटी इंजीनियरिंग द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में दायर किए गए एक मुकदमें का सामना भी उन्हें करना पड़ रहा है।








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तीव्र, सुरक्षित ट्रेन संचालन हेतु सिग्नलिंग क्षेत्र के आधुनिक विकास पर वेब संगोष्ठी का आयोजन

नई दिल्ली-हावड़ा और नई दिल्ली-मुंबई ट्रंक रूट पर रोलआउट से पहले पायलट प्रोजेक्ट के रूप में  झाँसी-बीना सहित भारतीय रेल के 4 खंडों में आधुनिक ‘यूरोपीय ट्रेन नियंत्रण प्रणाली लेवल-2’ का किया जाएगा कार्यांवयन

कोविड-19 संबंधित लॉकडाउन के दृष्टिगत भारतीय रेलवे द्वारा प्रशिक्षण, सेमिनार, बैठक, कॉन्फ्रेंस आदि आयोजनों के लिए नियमित रूप से ऑनलाइन प्लेटफार्मों का प्रयोग किया जा रहा है। विभिन्न विभागों द्वारा आयोजित वेब सेमिनार कर्मचारियों के बीच विशेष रूप से लोकप्रिय हो रहे हैं, क्योंकि ऐसे इंटरएक्टिव सत्रों के माध्यम से उन्हें विषय के विशेषज्ञों से सीखने का अवसर मिलता है।

उत्तर मध्य रेलवे संकेत एवं दूरसंचार विभाग इस तरह के वेब-आधारित सेमिनार के आयोजन में अग्रणी रहा है। इसी क्रम में यूरोपीय ट्रेन नियंत्रण प्रणाली (ईटीसीएस) लेवल-2 पर 9वें वेब सेमिनार का आयोजन किया गया। यूरोपीय ट्रेन नियंत्रण प्रणाली एक संरक्षायुक्त, कुशल और तेज परिवहन वाली आधुनिक सिग्नलिंग प्रणाली है।

महाप्रबंधक उत्तर मध्य रेलवे एवं उत्तर रेलवे राजीव चौधरी की अध्यक्षता में उत्तर मध्य रेलवे के लगभग 100 अधिकारियों ने इस वेबिनार में रेलटेल और यूरोप स्थित इस आधुनिक सिग्नलिंग प्रणाली के विशेषज्ञों के साथ भाग लिया। स्वीडन से इस क्षेत्र के विशेषज्ञ थॉमस जानसन ने ट्रेन कंट्रोल सिस्टम की नवीनतम तकनीक पर और इस आधुनिक सिग्नलिंग के पायलट प्रोजेक्ट के बारे में भी प्रस्तुतिकरण किया।

ज्ञातव्य है कि उत्तर मध्य रेलवे में झांसी मंडल का झांसी-बीना खंड ईटीसीएस लेवल-2 परियोजना के लिए पायलट प्रोजेक्ट हेतु चिन्हित स्वर्णिम चतुर्भुज मार्गों पर स्थित भारतीय रेल के नागपुर-बडनेरा (मध्य रेलवे), रेनिगुट्टा-येरगुट्टा (दक्षिण मध्य रेलवे) और विजयग्राम-पलासा (पूर्व तटीय रेलवे) सहित चार खंडों में से एक है। यह कार्य नई सिग्नलिंग प्रणाली यानी ईटीसीएस एल-2 को नई दिल्ली-हावड़ा और नई दिल्ली-मुंबई ट्रंक मार्गों पर लागू करने के लिए आवश्यक अनुभव प्राप्त करने और आवश्यक सुधारों को शामिल करने में मदद करेगा।

‘यूरोपीय ट्रेन नियंत्रण प्रणाली एल-2’ नामक यह आधुनिक सिग्नलिंग मूल रूप से एक रेडियो आधारित, निरंतर स्वचालित ट्रेन सुरक्षा प्रणाली है, जो सिग्नल पासिंग एट डैंजर (स्पेड) एवं ओवर स्पीडिंग की संभावना के उन्मूलन द्वारा ट्रेन कोलीजन की किसी भी संभावना को भी समाप्त करती है।

इस प्रणाली द्वारा केंद्रीकृत नियंत्रण और स्वचालित ट्रेन नियंत्रण प्रणाली के माध्यम से कंजेस्टेड ट्रंक मार्गों पर लाइन क्षमता में सुधार भी होगा। इससे थ्रू-पुट क्षमता भी बढ़गी, अर्थात संबंधित रेलखंड में अधिक ट्रेनें चल सकेंगी।

यूरोपीय ट्रेन नियंत्रण प्रणाली लेवल-2 के साथ ही, आधुनिक एलटीई आधारित (4जी) संचार व्यवस्था भी ट्रेन पर उपलब्ध होगी, जिसके माध्यम से यात्रियों की सुरक्षा के लिए डिब्बों में लगाए गए ऑनबोर्ड सीसीटीवी कैमरे की निगरानी सीधे कंट्रोल रूम से की जा सकेगी।

इस आधुनिक सिग्नलिंग प्रणाली में लोकोमोटिव और ट्रेनसेट, ट्रैकसाइड उपकरण और रेडियो ब्लॉक केंद्र में लगे ऑन-बोर्ड उपकरण शामिल होंगे, जो मोबाइल ट्रेन रेडियो संचार के माध्यम से ट्रेनों से लगातार जुड़े रहेंगे।

रेडियो ब्लॉक केंद्र इस प्रणाली के केंद्र के रूप में काम करता है, जो खंड में 200 किमी की दूरी पर रहेंगे। इसमें वे-साइड स्टेशनों के सभी इंटरलॉकिंग डेटा उपलब्ध होंगे, जो प्रत्येक खंड और स्टेशन की क्षमता पर विचार करते हुए निरंतर संचार के माध्यम से दो ट्रेनों के बीच सुरक्षित दूरी बनाए रखेंगे।

वेबिनार की शुरुआत में प्रमुख मुख्य संकेत एवं दूरसंचार इंजीनियर, उत्तर मध्य रेलवे अरुण कुमार ने महाप्रबंधक राजीव चौधरी का स्वागत किया। उत्तर मध्य रेलवे के मुख्य सिग्नल इंजीनियर नीरज यादव ने प्रतिभागियों को उत्तर मध्य रेलवे द्वारा आयोजित सेमिनार के संबंध में जानकारी दी। अरुण कुमार सक्सेना, सलाहकार सिग्नल रेलटेल और संदीप माथुर, मंडल रेल प्रबंधक, झांसी ने भी इस वेबिनार में भाग लिया।

प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए महाप्रबंधक राजीव चौधरी ने कहा कि इस तरह के सेमिनार हमारे कर्मचारियों में इस आधुनिक सिग्नलिंग प्रणाली की बेहतर समझ बनाने में मदद करेंगे। उन्होंने रेलवे में किए जा रहे नवीनतम तकनीक के प्रयोग के संबंध में कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि रेल कर्मचारियों की आधुनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आत्मनिर्भर बनाया जा सके।

श्री चौधरी ने यह भी कहा कि भारतीय परिस्थितियों के अनुसार इस आधुनिक सिग्नलिंग प्रणाली को भारतीय रेल की आवश्यकता के अनुरूप विकसित किया जाए, जिससे इस प्रणाली से रेल संचालन में अपेक्षित लाभ मिल सके।








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परिचालन दक्षता में सुधार के लिए 21 विषयों पर काम कर रही भारतीय रेल

कोविड-19 लॉकडाउन के बाद रेल परिचालन, अनुरक्षण, निर्माण और अन्य संबंधित गतिविधियों के लिए योजना तैयार करने हेतु बनी समिति का नोडल अधिकारी महाप्रबंधक, उत्तर मध्य रेलवे/उत्तर रेलवे राजीव चौधरी को बनाया गया है

Rajeev Choudhary, GM/NCR-NR

रेल मंत्रालय ने भारतीय रेल की परिचालन दक्षता में सुधार करने के लिए 21 विषयों की पहचान की है। इस संबंध में प्रत्येक विषय के लिए एक नोडल अधिकारी और रेलवे बोर्ड के एक समन्वय अधिकारी सहित विभाग प्रमुखों, कार्यकारी निदेशकों, महाप्रबंधकों सहित वरीष्ठ अधिकारियों की समितियों का गठन किया गया है।

ये समितियां लॉकडाउन अवधि के दौरान विभिन्न डिजिटल प्लेटफार्मों का उपयोग करके बैठक, चर्चा आदि के माध्यम से विचार-विमर्श करेंगी और समन्वय अधिकारी के माध्यम से अपनी रिपोर्ट रेल मंत्रालय को प्रस्तुत करेंगी। राष्ट्रीय ट्रांसपोर्टर की परिचालन दक्षता में सुधार के लिए भारतीय रेल द्वारा पहचाने गए विषय, जिनकी विभिन्न समितियों द्वारा समीक्षा की जाएगी, निम्नवत हैं:

  नई दिल्ली-हावड़ा, नई दिल्ली-चेन्नई, नई दिल्ली- मुंबई, हावड़ा- मुंबई और चेन्नई-हावड़ा खंडों पर  ट्रेनों का ज़ीरो बेस्ड समय सारणीकरण।

•  भारतीय रेलवे के केंद्रीय प्रशिक्षण संस्थानों द्वारा मैनुअलों की समीक्षा और अद्यतीकरण।

•  सेक्शनों और टर्मिनलों पर कंजेशन को कम करने के लिए टाइमलाईन और रोड मैप के साथ महत्वपूर्ण कार्यों की पहचान करना।

  सेक्शन और लूप लाइनों में गति बढ़ाने के लिए वैधानिक सीआरएस निरीक्षण के लिए आवश्यक विभिन्न दस्तावेजों की समीक्षा और प्रोसेसिंग।

•  रेल संचालन और अनुरक्षण में बचत करने और दक्षता लाने के लिए सामग्रियों की खपत की समीक्षा।

•  फिजिकल फ़ाइल मूवमेंट से बचने और साथ ही कार्य कुशलता लाने के लिए भारतीय रेल की सभी इकाइयों में ई-ऑफिस का कार्यान्वयन ।

•  लोकोमोटिव, कोच, वैगन्, सिग्नलिंग गियर आदि जैसे विभिन्न परिसंपत्तियों के अनुरक्षण अवधि  की समीक्षा और दुनिया भर के सर्वोत्तम  मापदंडों के साथ तुलना।

•  तकनीकी प्रगति के दृष्टिगत  विभिन्न रेल परिसंपत्तियों के कोडल लाइफ़ और रिप्लेसमेंट मानकों की समीक्षा।

•  दक्षता और पारदर्शिता में सुधार के लिए कॉन्ट्रैक्टों के तहत निष्पादित कार्यों के आंकलन के लिए ऑनलाइन मेज़रमेंट बुक की शुरुआत करना।

•  परिवहन के लिए नई वस्तुओं की पहचान करने और रेल के माध्यम से परिवहन में बढ़ोत्तरी के लिए व्यावसायिक अध्ययन।

•  अधिक से अधिक रेल प्रतिष्ठानों जैसे कारखानों, अस्पतालों, कोचिंग डिपो, पिटलाइन, लोडिंग पॉइंट, डिपो, स्टेशन, कार्यालयों, ट्रैक्शन सबस्टेशन, रिले रूम आदि को सीसीटीवी निगरानी के तहत लाना।

•  रेल की भूमि आदि के संबंध में रेलवे अधिनियम का अध्ययन और सुझाव।

•  डीएफसी परियोजना के पूरा होने के दृष्टिगत   वैगन, कोच और लोकोमोटिव आदि आवश्यकताओं की समीक्षा।

•  ट्रैक्शन और गैर-ट्रैक्शन ऊर्जा / ईंधन बिल में कमी लाने के उपायों संबंध में।

•  रेल के वविभिन्न रेलवे क्षेत्रों में डेटा एनालिटिक्स, आर्टीफीशियल इंटैलिजेंस जैसी तकनीक का उपयोग ।

•  व्यय कम करने और आय में सुधार करने के उपाय।

•  ऑन बोर्ड हाउसकीपिंग गतिविधि की व्यापक समीक्षा ।

•  कर्मचारियों की मल्टी स्किलिंग और नए क्षेत्र में री- स्किलिंग करना।

•  ट्रेन संचालन के लिए एंड ऑफ ट्रेन टेलीमिट्री और अन्य प्रौद्योगिकियों का प्रयोग ।

  •  मालगाड़ियों की गति को बढ़ाकर माल और यात्री गाड़ियों के बीच की गति के अंतर को कम करना।
  • कोविड -19 लॉकडाउन के बाद भारतीय रेल पर संचालन अनुरक्षण, निर्माण और विनिर्माण गतिविधियों के लिए की कार्य योजना – यह मद कोविड -19 लॉकडाउन के बाद भारतीय रेल के लिए सबसे महत्वपूर्ण है और इस पर विचार एवं कार्यान्वयन उत्तर मध्य रेलवे, पूर्व तटीय रेलवे, मध्य रेल, इंटीग्रेटेड कोच फैक्ट्री के महाप्रबंधकों की समिति द्वारा किया जा रहा है और उत्तर मध्य रेलवे तथा उत्तर रेलवे के महाप्रबंधक श्री राजीव चौधरी इस समिति के नोडल अधिकारी हैं।







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सरकार अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे -डॉ एम राघवैया, महामंत्री/एनएफआईआर – RailSamachar

जनवरी 2020 से 30 जून, 2021 तक की अवधि के लिए डीए/डीआर का भुगतान नहीं किया जाना अनुचित

सरकार का यह निर्णय महामारी रोकने में राष्ट्रीय प्रतिबद्धता के साथ काम कर रहे केंद्रीय कर्मचारियों के उत्साह को ध्वस्त कर देगा

नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन रेलवेमेन (एनएफआईआर) के राष्ट्रीय महासचिव डॉ एम राघवैया ने केंद्र सरकार से केंद्रीय कर्मचारियों के महंगाई भत्ते और महंगाई राहत भत्ते पर रोक लगाने के फैसले पर फिर से विचार करने की अपील की है।

जुलाई 2021 तक केंद्रीय कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (डीए) और महंगाई राहत (डीआर) पर डेढ़ साल के लिए रोक लगाने के केंद्र सरकार के मनमाने फैसले पर एनएफआईआर ने आश्चर्य व्यक्त किया है। फेडरेशन के महामंत्री डॉ राघवैया का कहना है कि जनवरी 2020 से 30 जून, 2021 तक की अवधि के लिए डीए/डीआर का भुगतान नहीं किया जाना अनुचित है, क्योंकि यह निर्णय कोविद -19 महामारी के प्रसार को रोकने के लिए लॉकडाउन पीरियड में राष्ट्रीय प्रतिबद्धता के साथ काम कर रहे केंद्रीय कर्मचारियों के उत्साह को ध्वस्त कर देगा। 

उन्होंने कहा कि इतनी लंबी अवधि के लिए केंद्र सरकार के पेंशनर्स को मंहगाई राहत का अवमूल्यन और जुलाई 2021 तक 18 महीने की अवधि के लिए भुगतान से वंचित करना वरिष्ठ नागरिकों के साथ बहुत अनुचित और कठोर व्यवहार करने वाला निर्णय है।

एनएफआईआर के महासचिव डॉ एम राघवैया ने कहा कि सभी रैंकों के लगभग 13 लाख रेल कर्मचारी फील्ड में काम कर रहे हैं। कई प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं और कोरोना वायरस के संक्रमण के जोखिम को कम कर रहे हैं। रेलवे की संपत्ति को बनाए रखते हुए मालगाड़ियां, पार्सल स्पेशल और अन्य विशेष ट्रेनों को निर्बाध रूप से चला रहे हैं। केंद्र सरकार का दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय रेल कर्मचारियों को विशेष रूप से और सामान्य रूप से केंद्र सरकार के सभी कर्मचारियों के उत्साह को ध्वस्त कर देगा।

उन्होंने कहा कि रेलवे के कर्मचारियों के साथ-साथ केंद्रीय कर्मचारियों ने भी पीएम केयर्स फंड में एक दिन के वेतन का योगदान दिया है। सेंट्रल गवर्नमेंट पेंशनर्स 18 महीने की राहत राशि के लिए पर्याप्त रूप से संपन्न नहीं हैं।

एनएफआईआर के महासचिव डॉ राघवैया ने प्रधानमंत्री से पुनः अपील की है कि कोरोना महामारी की रोकथाम के लिए लगातार जूझ रहे केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को महंगाई भत्ते के बकाया और महंगाई राहत का भुगतान सुनिश्चित करने के लिए सरकार के निर्णय पर पुनर्विचार किया जाए।








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ताक पर प्रधानमंत्री का लॉकडाउन – RailSamachar

प्रधानमंत्री से ज्यादा दूरदर्शी और होशियार हैं भारतीय रेल के अधिकारी!

Suresh Tripathi

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शिता को दुनिया के अनेकों देश सराह रहे हैं, बस यह सराहना रास नहीं आ रही है तो भारत के कुछ धार्मिक ठेकेदारों को या फिर भारतीय रेल के अधिकारियों को। जिस तरह इस देश का हर आदमी अपने-आपको सर्वज्ञ और दूसरों से अधिक ज्ञानी मानता है, ठीक उसी तरह भारतीय रेल का हर अधिकारी अपने को प्रधानमंत्री से ज्यादा होशियार और हुनरमंद समझता है। शायद यही वजह है कि वह प्रधानमंत्री के लॉकडाउन को ताक पर रख उनके निर्देशों का उल्लंघन करने पर तुला हुआ है।

केंद्र द्वारा बार-बार निर्देश जारी किए जा रहे हैं कि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हर हाल में सुनिश्चित किया जाए। 14 अप्रैल तक के लॉकडाउन का सख्ती से पालन किया जाए। सारा देश लॉकडॉउन तोड़ने वालों पर लानतें भेज रहा है, मिलिट्री बुलाने की बात हो रही है, पर रेल अधिकारी इन सबसे बेखबर इस कठिन समय में भी रेलकर्मियों को न केवल भेड़-बकरियों की तरह कार्य करने को मजबूर कर रहे हैं, बल्कि प्रधानमंत्री के सद्प्रयासों पर भी पानी फेर रहे हैं।

रविवार, 5 अप्रैल को मुंबई मंडल, मध्य रेलवे के मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) ने सामान्य तौर पर केवल इतना संदेश दिया था कि “हमारे पास दो-दो चैलेंज हैं। एक तो कोरोना का लॉकडाउन, जिसका पालन करना है, दूसरा यह कि आने वाले मानसून की भी तैयारी करनी है।”

इसका बेजा अर्थ निकालते हुए मंडल अधिकारियों ने मानो एक मिनट भी गंवाए बिना रेलकर्मियों को इस महामारी की भट्ठी में झोंकना चालू कर दिया। जहां एक तरफ लगभग सारे रेल अधिकारी आराम से घर बैठकर या सुरक्षित जगह पर रहकर व्हाट्सएप पर निरंतर निर्देश दे-देकर लॉकडाउन की ऐसी-तैसी करने में लगे हैं।

वहीं दूसरी तरफ स्टाफ शटल में चलने वाला आरपीएफ कर्मी कोरोना पॉजिटिव पाया गया। जाने कितना स्टाफ, जो शटल में चल रहा है, कॉरोना पॉजिटिव हो गया होगा? आज यानि सोमवार, 6 अप्रैल को कुर्ला में 8-10 ट्रैकमैन एक-दूसरे से चिपककर ट्रैक मेंटीनेंस करते हुए देखे गए।

इस तरह से इंजीनियरिंग विभाग के रेलकर्मियों को न जाने कितनी जगह सामूहिक काम में लगाया हुआ है। संभव है कि कुछ समय बाद अधिकारियों को यह सुना जाए कि “लॉकडाउन में सभी रेलकर्मी घर पर थे। अतः कोई काम नहीं किया जा सका, अब बारिश आने वाली है, अतः मनमाने दाम पर कांट्रैक्ट वर्क कराना पड़ा है।”

जबकि वह काम पूरी तसल्ली से विभागीय कर्मचारियों द्वारा कराए जा रहे हैं और रेलकर्मी एवं उनके परिवारों की जान की बाजी अपने निहित स्वार्थ के लिए लगाई जा रही है। यहां तक कि फील्ड वर्किंग का अनुभव रखने वाले दोनों मान्यताप्राप्त संगठनों के पदाधिकारियों की फीडबैक को दरकिनार करके उनका कहना भी नहीं माना जा रहा है। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।

कागज पर न जाने कितने किराए के वाहन दौड़ रहे हैं, लेकिन जब स्टाफ को लाने-लेजाने की जरूरत होती है, तो वह सब कभी खराब हो जाते हैं, कभी उनका पेट्रोल खत्म हो जाता है, कभी अन्य स्टाफ को लेने गया होता है, इत्यादि का बहाना बनाया जाता है। जहां लगभग हर अधिकारी को किराए पर वाहन उपलब्ध कराया गया है, वहीं इस संकटकाल में भी आवश्यक स्टाफ को लाने-ले जाने के लिए मात्र एक-दो वाहन से ही काम चलाया जा रहा है।

जितने वाहन किराए पर लिए गए हैं, वास्तव में वे इस लॉकडाउन पीरियड में किस उपयोग में हैं, यह किसी को पता नहीं है। जब हर अधिकारी फुर्सत में घर बैठा है, तो मंडल और मुख्यालय में तैनात पचासों वाहन कहां दूध देने जा रहे हैं? घर पर गाड़ी खड़ी करके उसका किराया और चालक की तनख्वाह दी जा रही है। जबकि फील्ड में आधी-अधूरी गाड़ियां चलाकर कर्तव्यनिष्ठा की मिसालें पेश की जा रही हैं।

One more incident happened in TRD Karjat depot, Mumbai dIvision, Central Railway on 6th Aprol’20. Khalasi Kiran Thorve electrocuted by 25 KV supply while working at KJT TSS. Shocked to expected in lock down period. Suffered with electric shock and burns and admitted in Panacea Hospital, Panvel.

आखिर यह गिरावट कहां जाकर खत्म होगी? केवल राष्ट्र का खून चूसना ही क्या हमारा लक्ष्य रह गया है? आज 6 अप्रैल को कर्जत में ट्रैक्शन सब-स्टेशन पर आधे-अधूरे स्टाफ से काम करवाया जा रहा था। इसमें एक स्टाफ 25 किलो वॉट की चालू लाइन के संपर्क में आ गया और अब अपनी जिंदगी-मौत के बीच जूझ रहा है। उसका परिवार मातम मना रहा है, पर किसी को उसकी सुधि नहीं है।

उधर मध्य रेलवे की ही एक महिला कर्मी को कोरोना सस्पेक्ट पाए जाने पर कल्याण रेलवे अस्पताल से घाटकोपर के कस्तूरबा अस्पताल, फिर मुंबई सेंट्रल स्थित पश्चिम रेलवे के जगजीवन राम अस्पताल, वहां से फिर भायखला रेलवे अस्पताल तथा पुनः जेआरएच तक दौड़ाया गया। कहीं किसी की कोई जिम्मेदारी तय नहीं।

एक महिला डॉक्टर अपने कोरोना सस्पेक्टेड पति को लाकर भायखला अस्पताल में भर्ती कर देती है, यूनियन द्वारा उसकी बैक हिस्ट्री निकालने की बात कही जाती है, तो उसे पहले ही टेस्ट में निगेटिव बताकर डिस्चार्ज कर दिया जाता है। जबकि बताते हैं कि दोनों डॉक्टर दंपति लॉकडाउन शुरू होने के दिन ही दिल्ली घूमकर लौटे थे।

अब सीनियर डीएसटीई/एनई ने मंगलवार, 7 अप्रैल से एसएंडटी के शत-प्रतिशत वर्कर्स को काम पर आने का आदेश दिया है। इस आदेश में हर सेक्शन में सिग्नल पोस्ट बदलने का फरमान है। जंक्शन बॉक्स तथा सभी पॉइंट्स की मोटरों का मेंटेनेंस करना है, आदि-आदि।

जबकि इनमें से एक भी काम अकेले व्यक्ति का नहीं है, यह सारे काम सामूहिक रूप से ही किए जा सकते हैं। काम चाहे ओवरहेड इक्विपमेंट्स (ओएचई) का हो, ट्रैक मेंटीनेंस का हो, या सिग्नल मेंटीनेंस का हो, यह सभी कार्य करने के लिए एकसाथ पूरी गैंग की आवश्यकता पड़ती है।

मुंबई में बारिश 7-8 जून या 12 जून से पहले आने की कोई संभावना नहीं होती, कई बार यह जून के अंत तक भी जरूर खिंच जाती है। ऐसे में जब 14 अप्रैल के बाद हरेक रेलकर्मी को अपनी ड्यूटी पर अनिवार्यतः आना ही है, तब क्या रेल अधिकारी 14 अप्रैल तक लॉकडाउन खत्म होने की प्रतीक्षा नहीं कर सकते हैं?

जबकि 14 अप्रैल के बाद भी कम से कम पौने दो महीने का पर्याप्त समय मेंटीनेंस के लिए मिलता है। और यदि वह यह कहें कि वे लॉकडाउन ओपन होने के पूर्व की तैयारी कर रहे हैं, तो जब गाड़ियां चलीं ही नहीं, तो कहीं कुछ बिगड़ा कैसे? जबकि ऐसी हर असेट का फॉर्मल चेक, मात्र एक वर्कर द्वारा भी किया और कराया जा सकता है।

इसी तरह गुड्स लाबियों में कथित अत्यावश्यक वस्तुओं की ढुलाई के नाम पर कुछ खास उद्योगपतियों का माल आधी कीमत पर ढ़ोकर रेलवे को करोड़ों का चूना लगाया जा रहा है। इसके लिए आवश्यकता से अधिक रनिंग स्टाफ को बुलाकर लॉबी में अनावश्यक भीड़ लगाई जा रही है।

घंटों तक रनिंग स्टाफ को गुड्स लॉबी में निठल्ला बैठाया जा रहा है। परंतु मंडल और मुख्यालय के होशियार परिचालन अधिकारियों द्वारा अगले 24 घंटे में कितनी मालगाड़ियां कहां से कहां तक चलेंगी, इतनी सी प्लानिंग नहीं हो पा रही है?

जबकि मात्र गाड़ी में माल चढ़ाने और उतारने का ही समय लगना है, वह भी निश्चित होता है, लाइन क्लियर की तो कोई परेशानी ही नहीं है, सारा मैदान साफ पड़ा है। तो फिर स्टाफ 12 से 18 घंटे कार्य कैसे कर रहा है? और वह भी ऐसी स्थिति में जबकि स्टाफ को एक चाय भी नसीब नहीं हो रही हो।

स्टाफ से लेकर सुपरवाइजर तक से संपूर्ण दक्षता की उम्मीद रखने वाले यह रेल अधिकारी आज एक परसेंट चलने वाली गाड़ियों को भी सही तरह से मैनेज नहीं कर पा रहे हैं। यह उनका नकारापन कहें या लॉकडाउन में सब के सब क्वॉरंटीन हो गए हैं? बस सिर्फ स्टॉफ को कीड़े-मकोड़ों की तरह काम करने के लिए लगा रखा है।

बहरहाल, जो भी हो, जिस तरह सारी दुनिया कुछ जिद्दी धर्मावलंबियों पर हजारों लानतें भेज रही है, ऐसा न हो कि इन लानतों के लिए रेल अधिकारी उनसे भी आगे निकल जाएं? अतः उनसे रेलकर्मियों का अनुरोध है कि ईश्वर के लिए प्रधानमंत्री का कहना मानें और उसको अक्षरशः अमल में भी लाएं। यही राष्ट्र हित में होगा और यही समाज के हित में भी होगा।

#SocialDistencing in the total bay on the #CentralRailway in #Lockdown period

रेलकर्मियों द्वारा सोशल मीडिया में डाला गया मैसेज

साथियो, देखिए किस तरह से सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जी उड़ाई जा रही है।

साथियो, आज कुर्ला में पॉइंट नं. 101-बी इंड (डाउन थ्रू लाइन) पर यूनिमेट मशीन से पैकिंग का कार्य हुआ।

आप इन तस्वीरों से खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि कितना सोशल डिस्टेंसिंग मेनटेन किया जा रहा है।

कर्मचारी तो मजबूर है, काम तो करना ही है, क्योंकि ऊपर से साहब का आर्डर है, और काम भी ऐसा है कि अकेले एक व्यक्ति कर ही नहीं सकता, उसे मिलकर ही करना पड़ेगा।

अधिकारीगण खुद को तो सुरक्षित रखे हुए हैं, और ग्रुप-सी एवं ग्रुप-डी रेल कर्मचारियो को दूरी बनाकर रखने, सोशल डिस्टेंसिंग मेनटेन करते हुए, यूनिमेट मशीन का कार्य पूरा करने के लिए दबाव डाल रहे हैं।

अब आप खुद ही देखिए और बताइए कि कैसे सोशल डिस्टेंसिंग मेनटेन करके काम किया जा सकता है।

यदि एक स्लीपर को शिफ्ट करना है, या पॉइंट की राडिंग खोलकर अलग करना है, तो एक व्यक्ति यह सब कैसे कर सकता है।

इससे स्पष्ट है कि एसएंडटी और पी-वे स्टाफ को इस कोरोना (#COVID19) जैसी महामारी-बीमारी में रेलकर्मियों को मरने के लिए ढ़केला जा रहा है।

अधिकारियों से अनुरोध है कि कृपया ऐसा न करें, रेलकर्मियों का भी परिवार है, उनके भरोसे भी कई लोग जिंदगी जी रहे हैं, उनका क्या होगा, अगर इन्हें कुछ हो गया, तो ईश्वर न करे, ऐसा कुछ हो।

Point packing work going on at km 65/200-300 uper bat khbv







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यात्री ट्रेनें नहीं चल रही हैं, ऐसे मार्जिन में केबल मेगरिंग कराने पर अधिकारियों का जोर

केबल मेगरिंग करने का नया फरमान, रिले रूम के वायरस ग्रस्त होने पर कैसे बचेगी रेलकर्मियों की जान !

अब तक एसएंडटी कर्मचारियों को इंजीनियरिंग विभाग के कर्मचारियों के साथ रेल बदलने, ट्रैक मशीन से पैकिंग करने के कार्य में लगाया गया था परंतु अब एक और नया फरमान जारी कर दिया गया है। इस नए आदेश में केबल मेगरिंग कराने के निर्देश दिये गये हैं।

जब कर्मचारियों का कहना है कि समस्या काम करने की नहीं, बल्कि काम करने की जगह को लेकर है, क्योंकि केबल मेगरिंग कराने के लिए रिले रूम जिस पर दो लाॅक होते हैं, जिनकी एक चाभी एसएंडटी विभाग के पास तथा दूसरी चाभी स्टेशन मास्टर के पास होती है।

स्टेशन मास्टर चाभी तभी देते हैं, जब एसएंडटी विभाग का जेई या एसएसई स्तर का निरीक्षक चाभी मांगने के लिए कंट्रोल से पीएन लेता है और स्टेशन मास्टर को कंट्रोल चाभी देने के लिए अनुमति देता है।

यानि रिले रूम पूरी तरह से बंद और सुरक्षित होता है। अतः रिले रूम को खोले बगैर केबल मेगरिंग करना संभव नहीं है।

जबकि रिले रूम के अंदर सिग्नल की सारी सर्किट तथा हजारों-लाखों की संख्या में सिग्नलिंग तारों का गुच्छा सिग्नलिंग उपकरणों को चलाने के लिए लगा होता है।

अब प्रश्न यह है कि क्या एक बंद और सुरक्षित कमरे को इस कोविद-19 महामारी के समय खोलकर उसे भी असुरक्षित नहीं किया जा रहा है और क्या इस प्रकार के रिले रूम को सैनेटाइज किया जाना संभव है जहाँ हजारों-लाखों की संख्या में सिगनलिंग तारों का गुच्छा तथा सिगनलिंग सिस्टम मौजूद हो?

एसएंडटी कर्मियों का आग्रह है कि आखिर अधिकारियों को कर्मचारियों की सुध क्यों नहीं हो रही है? उनका कहना है कि जब प्रधानमंत्री खुद देश के हर नागरिक को ‘घर पर रहिये और केवल घर पर रहिये’ के लिए निवेदन कर रहे हैं, तो क्या हमारे अधिकारी अपने मातहत कर्मचारियों को ‘घर पर रहिये और केवल घर पर रहिये’ के लिए प्रेरित नहीं कर सकते हैं?

उन्होंने कहा कि अभी हाल ही में चेयरमैन, रेलवे बोर्ड ने भी सभी अधिकारियों को केवल मालगाड़ियों के लिए आवश्यक स्टाफ को ही ड्यूटी पर लगाने का निर्देश दिया है, वह भी रोटेशन में। परंतु ब्रांच अधिकारियों, खासतौर पर एसएंडटी तथा इंजीनियरिंग विभाग के अधिकारियों को ट्रेनें कम चल रही हैं, तो काम करने के लिए अच्छा मार्जिन दिख रहा है, इसीलिए वह सामान्य दिनों से भी ज्यादा काम करवा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि कहने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल रखा जा रहा है, परंतु इंजीनियरिंग तथा एसएंडटी विभाग का प्रत्येक काम रिस्क एवं हार्डशिप के बिना संभव ही नहीं है, ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग तो मात्र एक छलावा है। ऐसी परिस्थितियों में कई रेलकर्मी कोरोना महामारी के चपेट में आ रहे हैं, जिसका एक बेहतरीन उदाहरण पश्चिम रेलवे के मुंबई सेंट्रल मंडल के नंदुरबार सेक्शन में आ चुका है, जहां संदिग्ध मामले पाए जाने पर तीन ट्रैकमैनों को होम क्वारंटाइन किया गया है।

उन्होंने कहा कि जो लोको पायलट ट्रेन चलाते हैं, उनको भी ब्रेथ एनालाईजर टेस्ट तथा बायोमैट्रिक उपकरणों से छुट दी गई है, परंतु कुछ लाॅबियों में यह अभी मान्य नहीं किया जा रहा है और कहा जा रहा है कि उनके पास मंडल कार्यालय से अभी तक कोई निर्देश प्राप्त नहीं हुए हैं। अब जबकि अभी हाल ही में पालनपुर में एक लोको पायलट को कोरोना से संक्रमित पाया गया था, तब भी रेल प्रशासन के आदेशों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। 

सवाल यह है कि आखिर इस वैश्विक कोरोना महामारी से इन रेल कर्मचारियों को कौन बचाएगा और इसके लिए जिम्मेदार किसे ठहराया जाएगा?

“हम बचेंगे, तो देश बचेगा”

एसएंडटी कर्मचारियों के एक व्हाट्सऐप ग्रुप में डाला गया मैसेज भी कानाफूसी.कॉम को प्राप्त हुआ है। इसमें कहा गया था कि – “जबकि भारत सरकार एवं देश के प्रधानमंत्री खुद बार-बार सभी नागरिकों से ‘घर में ही रहें और केवल घर में ही रहें’ की अपील कर रहे हैं, ऐसी स्थिति में घर से बाहर निकलना मौत के मुँह में जाने के बराबर ही नहीं, बल्कि पूरे भारत को मौत के मुँह डालने के बराबर माना जा रहा है। ऐसी विकट परिस्थिति में हम रेल कर्मचारियों के ऊपर विशेष जिम्मेदारियां आ जाती हैं। परंतु हमारी जिम्मेदारियों की आड़ में हमारा शोषण किया जाना उचित नहीं है। हम कर्मचारी भी आप अधिकारियों के परिवार के एक सदस्य की तरह ही हैं और हमसे काम लेना आपकी जवाबदारी है, परंतु इसे किसी भी अधिकारी को अपने इगो पर नहीं लेना चाहिए। और जहां तक संभव हो, हम सभी को एक-दूसरे की भावनाओं को तथा समस्याओं को इससे भी ज्यादा हमारे घर से बाहर निकलने के डर को महसूस करना चाहिए। अगर बात केवल हम कर्मचारियों की होती, तो कोई बात नहीं थी, परंतु यह महामारी हमारे परिवार को ही नहीं, पूरे देश को महामारी के दलदल में डाल रही है। हमारी एक गलती न जाने किस-किस को लील जाए। आज किसी भी प्रकार किसी से हुई एक छोटी सी गलती भी बहुत बड़ी गलती बन सकती है। अतः आप सभी से हाथ जोड़ कर नम्र निवेदन है कि आप सभी के हाथों में हमारी ही नहीं, बल्कि हमारे पूरे परिवार के साथ-साथ हमारे समाज की जिंदगियां भी हैं। मेरे इस अनुरोध पर आप सभी एक बार पुनर्विचार करें तथा शिफ्ट ड्यूटी में कार्यरत कर्मचारियों के दर्द को समझने की कोशिश करें, जब गाड़ियां चल नहीं रही हैं, तो शिफ्ट ड्यूटी में कर्मचारियों की संख्या कम की जानी चाहिए, उन्हें अल्टर्नेट दिन में बुलाया जाना चाहिए तथा जनरल ड्यूटी में भी किसी भी प्रकार का नया काम नहीं किया जाना चाहिए। जहां तक संभव हो, हमें इस वक्त केवल और केवल इमरजेंसी कार्यों का संपादन ही करना चाहिए। इस महामारी से बचेंगे, तो बहुत सारे काम कर लेंगे। हम बचेंगे तो देश बचेगा।”

Lifted Lc 67  both the booms air

Replaced point no 13A and 11B today at KKLR yard

A boom 90, 90 89

B boom  90,94 96

Planned special work on Barabhum Station – spot vedio

https://youtu.be/dp2Kk_gsNYg

New and special works are going on in Godiwada section, Vijayawada division, South Central Railway

https://twitter.com/irstmu/status/1244405020109361152?s=08








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लॉकडाउन खत्म होने के बाद रेलवे स्टेशनों पर उमड़ने वाली प्रचंड भीड़ पर विचार करे रेल प्रशासन

नियम का उल्लंघन करने वाले यात्रियों पर #रेलवे_ऐक्ट के बजाय #आईपीसी के तहत कार्रवाई हो

जैसा कि अब सभी जानते हैं कि #कम्प्लीट_लॉकडाउन के चलते भारतीय रेल द्वारा न सिर्फ यात्री ट्रेनों का संचालन 14 अप्रैल तक पूरी तरह बंद कर दिया गया है, बल्कि 14 अप्रैल, 24 बजे तक सभी प्रकार की रेल टिकटों की बुकिंग भी बंद कर दी गई है। हो सकता है इस बंद को आगे भी बढ़ाया जाए। परंतु एक बात तो तय है कि इस लॉकडाउन के बाद जब भी रेल सेवा बहाल होगी, इस पर यात्रियों का भारी दबाव आएगा।

ज्ञातव्य है कि पूरे समर सीजन की #एडवांस_बुकिंग के साथ #वेटिंग_लिस्ट में भी यात्री टिकटों की भारी संख्या पहले ही बुक की जा चुकी है। यदि बिना किसी तैयारी के रेल सेवाएं बहाल की गईं, तो #रेलसेवा बंद करके देश ने जो भी मजबूत स्थिति कायम की होगी, वह कुछ ही दिनों में प्रचंड भीड़ की वजह से गंवा दी जाएगी।

हम सब ने देखा ही है कि कैसे-कैसे लापरवाह तथा मूर्ख हमारे बीच हैं, जो किसी की परवाह किए बिना बीमारी को अपने साथ लेकर यात्राएं करते रहे और बीमारी यहां से वहां फैलती रही। ऐसे में रेल सेवाएं बहाल करने से पहले रेलवे को पर्याप्त तैयारियां करनी चाहिए, जिससे कोई विषम स्थिति पैदा न हो।

इसके लिए जरूरी होगा कि रेलवे द्वारा लंबी दूरी की गाड़ियों में वर्तमान प्रतिक्षासूची के यात्रियों की सभी टिकटों को स्वतः रद्द कर दिया जाए और केवल उन्हीं यात्रियों को यात्रा की अनुमति दी जाए, जिनके पास कन्फर्म टिकट तथा डॉक्टर का प्रमाण पत्र हो, जिसमें यह प्रमाणित हो कि वे #COVID19 निगेटिव हैं।

इसके साथ ही कुछ समय के लिए एसी3 तथा स्लीपर क्लास की मिडिल बर्थ की बुकिंग को भी निरस्त करना उचित होगा, जो कि #सोशल_डिस्टेंसिंग बनाने में बाधक है। लंबी दूरी की गाड़ियों में #अनारक्षित टिकटों की बुकिंग भी इस दौरान बंद कर देनी चाहिए, जिसके माध्यम से #आरक्षित डिब्बों के यात्रियों की सुरक्षा औ संरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है।

इसके अलावा यात्री ट्रेनों में चलने वाला ऑन बोर्ड टिकट चेकिंग स्टाफ, एसी मैकेनिक, पैंट्रीकार वेंडर्स इत्यादि भी इस खतरे से अछूते नही रहेंगे। इसलिए क्यों न इस लॉक डाउन के खाली समय में इन तैयारियों को सुनिश्चित करने का एक अभियान शुरू किया जाए।

#रेलकर्मी भी अपने-अपने स्तर पर विभिन्न माध्यमों से अपने #सुझाव रेल प्रशासन तक पहुंचाएं कि लॉकडाउन खत्म होने और रेल सेवा बहाल होने पर प्रचंड भीड़ की स्थिति से निपटने के लिए कौन-कौन से तरीके कारगर साबित हो सकते हैं।

जितनी बड़ी संख्या में रेलकर्मियों के ये बहुमूल्य सुझाव #रेल_प्रशासन तक पहुंचेंगे, उन पर अमल भी उतनी ही तत्परता से सुनिश्चित किया जा सकेगा।

उन्हें अपनी बात किसी भी प्रकार से रेल प्रशासन तक पहुचानी है कि रेल सेवाएं बहाल होने से पहले #वेटिंग टिकट या बिना कन्फर्म बर्थ/सीट की यात्रा को बिना किसी शर्त पूरी तरह अवैध घोषित कर दिया जाए।

इसके साथ ही नियम का उल्लंघन करने वाले यात्रियों पर #रेलवे_ऐक्ट के बजाय #आईपीसी के तहत कार्रवाई हो, यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए, क्योंकि बिना खौफ या डर के हम भारतीय किसी नियम-कानून का पालन करना अपनी शान के विपरीत समझते हैं।

अतः यह आवश्यक है कि न सिर्फ उपरोक्त कुछ सुझावों पर विचार किया जाए, बल्कि #लॉकडाउन के इस खाली समय में रेल प्रशासन द्वारा लॉकडाउन खत्म होने के बाद #रेलवे_स्टेशनों पर उमड़ने वाली प्रचंड भीड़ को नियंत्रित करने की तैयारियां भी अभी से सुनिश्चित कर ली जाएं।








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