तीन दशक बाद भी कायम है विडंबनापूर्ण स्थिति – RailSamachar

वर्तमान समय में प्रत्येक केंद्रीय/रेल कर्मचारी का कम से कम एक करोड़ का सामूहिक बीमा होना चाहिए, ताकि उनकी समाजिक सुरक्षा का उद्देश्य वास्तव में पूरा हो सके!

1989 के दौर में CGEGIS की मद में केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन से ₹30 प्रति माह कटते थे और केंद्रीय/रेलकर्मियों को ₹30000 का सामूहिक बीमा मिला करता था।

तीन दशक बीत जाने के बाद आज 2021 में भी यही स्थिति लगातार बनी हुई है।

₹30000 तो महीने के बारहवें दिन से पहले ही खत्म हो जाते हैं। इस राशि से रेल कर्मचारियों के परिवारों की सामाजिक सुरक्षा सोचना कितना दयनीय है।

आज जहां एक तरफ ₹330 प्रति वर्ष के निवेश पर प्रधानमंत्री जीवन ज्योति योजना में 2 लाख का सामूहिक बीमा मिलता है, वहीं ₹360 के निवेश पर CGEGIS में ₹30000 की आर्थिक सुरक्षा। क्या विचित्र स्थिति है।

आज जब ढ़ेरों निजी और सरकारी बीमा कंपनियां बाजार में उपलब्ध हैं और रेलवे के लगभग 12 लाख कर्मचारी हैं, तो कोई भी बीमा कंपनी इतने बड़े समूह को बहुत कम प्रीमियम पर अच्छी बीमा राशि (Sum assured) का लाभ आसानी से दे सकती है।

और यदि CGEGIS की भांति सारे केंद्रीय कर्मचारियों का सामूहिक बीमा करवाया जाए, तो और भी कम प्रीमियम पर अधिक बीमा राशि का लाभ सभी रेल कर्मचारियों/केंद्रीय कर्मचारियों को मिल सकता है।

वर्तमान समय में प्रत्येक केंद्रीय कर्मचारी का कम से कम एक करोड़ का सामूहिक बीमा होना चाहिए, ताकि उनकी समाजिक सुरक्षा का उद्देश्य वास्तव में पूरा हो सके।

इस कदम से न केवल केंद्रीय कर्मचारी अपने परिवारों की सुरक्षा के प्रति आश्वस्त हो पाएंगे, बल्कि पारिवारिक सुरक्षा की मद पर व्यक्तिगत बीमा के मंहगे प्रीमियम की भी उनकी बचत हो सकती है।

ऐसा “रेल समाचार” का मानना है!

#CGEGIS #CentralGovernmentEmployees #IndianRailway #RailwayBoard #PMOIndia





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रिटायरमेंट के बाद भी पंद्रह दिन तक ऑफिस आकर बैठते रहे पीसीएसओ, पूर्वोत्तर रेलवे

रिटायर हो चुके एस. एन. शाह को “कारण बताओ नोटिस” जारी की जाए। तत्पश्चात इस बात की जांच की जानी चाहिए कि 14-15 दिनों में उन्होंने ऑफिस में बैठकर क्या-क्या घालमेल किया?

विजय शंकर, ब्यूरो प्रमुख,गोरखपुर

यह अजब है कि कोई विभाग प्रमुख (पीएचओडी) रिटायर होने के बाद भी ऑफिस में बाकायदा बैठकर लगातार पंद्रह दिनों से काम कर रहा हो, अपने मातहत रहे अधिकारियों और कर्मचारियों को डांट-डपट रहा हो, हड़का रहा हो, मातहत अधिकारी की गाड़ी जबरन इस्तेमाल कर रहा हो, फिर भी उसके मातहतों को तो छोड़ो, उसके ऊपर समकक्ष अधिकारी भी इसे अनदेखा करें, यह बात कुछ हजम में नहीं होती!

यह करिश्मा साक्षात घटित हुआ है पूर्वोत्तर रेलवे मुख्यालय गोरखपुर में, जहां पीसीएसओ एस. एन. शाह 30 अप्रैल को सेवानिवृत्त होने के बाद भी अब तक लगातार और बाकायदा अपने चैंबर में आकर पूर्व रुतबे के साथ बैठ रहे हैं।

बताते हैं कि उन्होंने इसका बहाना अपने मातहत काम कर रहे लोगों को यह कहकर बताया कि “उन्होंने सोचा, जब तक नए सीएसओ की पोस्टिंग नहीं होती, तब तक वह खुद पेंडिंग काम निपटा दें!”

अब एसएंडटी कैडर के इस वरिष्ठ मूढ़ व्यक्ति की नजर से देखा जाए, तो इसका तात्पर्य यह है कि जब तक नए जीएम की पोस्टिंग नहीं हो, तब तक रिटायर हो चुके जीएम को आकर काम करते रहना चाहिए!

आश्चर्य की बात यह है कि दूसरे विभागों के समकक्ष विभाग प्रमुखों ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? यदि वह अपना बिरादरी भाव नहीं बिगाड़ना चाहते थे, तब भी उन्होंने यह बात जीएम के संज्ञान में लाना जरूरी क्यों नहीं समझा?

इसके अलावा पता चला है कि सीएसओ/एनईआर का अतिरिक्त कार्यभार मैकेनिकल डिपार्टमेंट के एक अधिकारी बी. एस. दोहरे को सौंपा गया है। यदि वह सीएसओ के चैंबर में नहीं भी बैठ रहे थे, तब भी उन्होंने शाह को वहां बैठने अथवा कार्यालय आने से मना क्यों नहीं किया?

दोहरे यदि शाह को टोककर उनसे बुरे नहीं बनना चाहते थे, तब भी रिटायरमेंट के बाद शाह के चैंबर में आकर बैठने की जानकारी से उन्होंने स्वयं महाप्रबंधक को अवगत क्यों नहीं कराया? जबकि अन्य विभाग प्रमुखों की अपेक्षा अतिरिक्त कार्यभारी होने से यह खुद उनकी पहली जिम्मेदारी थी?

जब “रेल समाचार” द्वारा यह विषय जीएम/पूर्वोत्तर रेलवे श्री वी. के. त्रिपाठी से मोबाइल पर बात करके उनके संज्ञान में लाया गया, तब वह भी आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने कहा कि “ऐसा कैसे हो सकता है, क्योंकि सीएसओ का अतिरिक्त कार्यभार मैकेनिकल अधिकारी बी. एस. दोहरे को सौंपा गया है। तथापि वह इस पर अभी तत्काल कार्यवाही कर रहे हैं।”

यह वास्तव में अत्यंत आश्चर्यजनक है कि एक रिटायर हो चुका अधिकारी लगातार पंद्रह दिनों से प्रतिदिन आकर पूर्ववत अपने चैंबर में बैठ रहा है। पूर्व की भांति कार्यालयीन सभी दैनंदिन कामकाज निपटा रहा है, तथापि न तो मातहत उसे कुछ कह रहे हैं और न ही उसके समकक्ष अधिकारी उसे कुछ बोल रहे हैं।

मातहतों को तो एक बार यह मानकर बख्शा जा सकता है कि शाह ने अब तक उनकी एसीआर नहीं लिखी है, हालांकि यह उनकी अक्षम्य कर्तव्यहीनता है, मगर समकक्ष अधिकारियों को इस कोताही के लिए कतई माफ नहीं किया जाना चाहिए।

चूंकि एस. एन. शाह रिटायर हो चुके हैं, व्यवस्था से बाहर हो चुके हैं, इसलिए अधिकारिक तौर पर अथवा अन्य किसी भी रूप में वह ऑफिस या चैंबर में बैठने के हकदार नहीं रह गए थे। तथापि उन्होंने जानबूझकर ऐसा किया।

अतः सर्वप्रथम उन्हें “कारण बताओ नोटिस” जारी की जानी चाहिए। तत्पश्चात इस बात की जांच की जानी चाहिए कि इन 14-15 दिनों में उन्होंने ऑफिस में बैठकर क्या-क्या घालमेल किया?





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डीआरएम के बाद जीएम पद की गरिमा को भी शर्मशार कर रहे आलोक कंसल !

जब तक चमचों/चाटुकारों की फौज को भी दंडित नहीं किया जाएगा, तब तक जीएम जैसे ताकतवर पद पर बैठे लोगों के बेलगाम संवेदनशून्य मानसिक विकार से उत्पन्न फूहड़ प्रदर्शनों का सिलसिला नहीं रुकेगा!

#AlokKansal, #GMWR & his wife #TanujaKansal

सुरेश त्रिपाठी

नाचने-गाने, रास रचाने और पत्नी की उंगलियों तथा इशारों पर नाचने, उठने-बैठने-चलने के लिए मशहूर पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक आलोक कंसल के कई रोमांटिक वीडियो पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहे हैं। अब यह तो सर्वज्ञात ही है कि रेलवे के ऐसे उच्च पदों पर बैठे आलोक कंसल जैसे कुछ महानुभावों की यह कथित रोमांटिक नौटंकी अथवा भौंड़ेपन का बेशर्म प्रदर्शन या तो ऑफीसर्स क्लब के फंड – जो अधिकारियों के कंट्रीब्यूशन से जमा होता है – से होता है, या फिर अन्य कदाचारी माध्यमों से इसका इंतजाम किया जाता है।

रेलवे में आलोक कंसल जैसे महानुभावों की कोई कमी नहीं है। पहले भी कभी नहीं रही – अरुणेंद्र कुमार जैसे बीवी के गुलाम पहले भी रह चुके हैं – अभी भी है – कंसल के ही कैडर बिरादर उत्तर रेलवे की एक मजबूत कमाऊ पोस्ट पर आज भी मौजूद हैं – ऐसे सैंकड़ों उदाहरण हैं और ऐसा भी नहीं है कि इसमें किसी एक कैडर विशेष का ही एकाधिकार रहा हो। सभी कैडर में “आलोक कंसल” विद्यमान रहे हैं। इसी का परिणाम की आज रेलवे की लुटिया डूब रही है। फिर भी इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा।

आलोक कंसल जैसे दरिद्र मानसिकता के लोगों को न पद की गरिमा का ख्याल है, न ही रेलवे की बदहाल होती जा रही आर्थिक स्थिति का। इन्हें तो पद पर रहते हुए सिर्फ अपनी जेबें भरने और जी-भरकर मौज-मस्ती करने की ही फिक्र रहती है। पद की गरिमा और रेलवे की हालत गई चूल्हे भाड़ में, क्योंकि इन्हें बखूबी मालूम होता है कि पद से हटने और रिटायर होने के बाद अपने खर्च पर यह मौज-मस्ती नहीं हो पाएगी, और रेलवे में फिर कोई कुत्ता भी इन्हें नहीं पूछेगा!

यह भी सबको पता है कि डीआरएम/नागपुर/द.पू.म.रे. रहते हुए कंसल वहां भी रेलवे के काम को तरजीह देने के बजाय इसी तरह के रास-रंग में डूबे रहते थे। तब भी कुछ अधिकारियों ने इन्हें पद की गरिमा का हवाला दिया था। उन्होंने उस समय जिस बात की आशंका व्यक्त की थी, आज जीएम पद पर आसीन होकर कंसल उसे ही बखूबी अंजाम दे रहे हैं।

भीषण खतौली दुर्घटना के बाद इन्हें सीटीई/उ.रे. के पद से तत्काल शिफ्ट करके किसी फालतू जगह डालने के बजाए पूर्व मध्य रेलवे कंस्ट्रक्शन में डाला गया था, वहां भी इन्होंने कमीशनखोरी में कोई कसर नहीं छोड़ी थी और कुछ समय बाद ही पुनः उत्तर रेलवे वापस पहुंचने में कामयाब रहे थे। जहां से अब मंत्री की पसंद से उनके जूरिस्डिक्शन में पदस्थ होकर तन-मन-धन से पूरी सेवा करने में जुटे हैं।

रेलमंत्री यदि बोर्ड मेंबर्स और कुछ ईडी’ज की ही दिनचर्या देख लें, जिनके बंगलों में न सिर्फ बोर्ड की कैंटीन से खाना सप्लाई होता है, बल्कि वह छह-सात सौ रुपए प्रति बोतल का इंपोर्टेड पानी पीते रहे हैं। वह तो भला हो फाइनेंस विभाग का, जिसने इनके तमाम दबावों को दरकिनार करते हुए हाल ही में इनकी ये लक्जरियस नक्शेबाजी पर रोक लगा दी।

रेलमंत्री को जहां भ्रष्टाचार और निकम्मेपन पर अपना ध्यान केंद्रित करके ऐसी अय्याशियों पर हो रहे फालतू खर्चों पर नियंत्रण और निकम्मों-नचनियों को घर भेजना चाहिए था, वहां वह बेकार और अनावश्यक मुद्दों पर न सिर्फ अपना कीमती समय जाया कर रहे हैं, बल्कि अपनी क्षणिक कार्य-प्रणाली से रेलवे की बदनामी सहित सरकार की छवि को भी धूमिल होने से नहीं बचा पा रहे हैं।

रेलमंत्री जी! आलोक कंसल जैसे महान प्रतिभासंपन्न जीएम्स (महाप्रबंधकों) से भरा पड़ा है आपका रेल महकमा। अब लगे हाथ आलोक कंसल साहब को भी सीआरबी बनने का मौका दे ही दीजिए। क्योंकि आपके रेल महकमे में योग्य अधिकारी हाशिये पर और निराशा के माहौल में ढ़केल दिए गए हैं, जबकि कंसल जैसे विकृत रास-रंग में डूबे खड़की बूढ़े जिस ऑर्गनाइजेशन की पतवार संभालेंगे, उसका तो ईश्वर ही मालिक होगा।

अब जब सिर्फ ईएसई (#ESE) से ही आईआरएमएस (#IRMS) का सेलेक्शन करने का राग छेड़ दिया गया है, तो अब आपके पास ऐसी नचनिया प्रतिभाओं की शायद ही कोई कमी रह जाएगी। कई वरिष्ठ रेल अधिकारियों का कहना है कि अगर रेलमंत्री और सीआरबी में थोड़ी सी भी शर्मोहया और नैतिकता बची है, तो इस संवेदनहीन फूहड़ नचनिया को तुरंत निलंबित करते हुए अविलंब जीएम पद से हटाने का प्रशासनिक साहस दिखाया जाए।

उनका कहना है कि जहां पूरे देश में कोरोनावायरस से हर गली-मोहल्ले में मातम पसरा हुआ है, और मुंबई महानगर इस मामले में भयानक दौर से गुजर रहा है, वहां इस नचनिया जीएम की ही रेलवे के कई कर्मचारी कोरोना के शिकार होकर अकाल काल-कलवित हो चुके हैं और यह जीएम पद की गरिमा को भूलकर तथा बेशर्म होकर “सावन की झड़ी” का राग अलापते हुए रास-रंग में डूबकर वीडियो बनवाने में लगा हुआ है।

एक यूनियन पदाधिकारी का कहना था कि जहां एक तरफ रेल कर्मचारियों के घरों/परिवारों में मातम, मायूसी और डर का माहौल है, हजारों कर्मचारी कोरोना संक्रमित हो चुके हैं, जबकि सैकड़ों रेलकर्मियों की मौत हो चुकी है, वहां ये जीएम “रोम के नीरो” से भी दस कदम आगे निकलकर अपनी भौंड़ी ऐय्याशी का निर्लज्ज और संवेदनशून्य तकनीकी कौशल का प्रदर्शन कर रहे हैं।

कई अधिकारियों और यूनियन पदाधिकारियों ने रेलमंत्री से सीधी मांग करते हुए कहा कि इनको तत्काल निलंबित करने के बाद इनकी कम से कम ब्रांच अफसर (बीओ) लेवल से भी जांच हो, तब इनके सामने कुबेर भी शायद छोटे पड़ जाएंगे।

उनका कहना था कि पूरे रेल महकमे में ये पति-पत्नी दोनों ही कुख्यात हैं। इनकी पत्नी के नाम से तो कई आईओडब्ल्यू/पीडब्ल्यूआई और डिप्टी लेवल तक के अफसरों की रूह कांपती है। कितने ही कर्मचारी इतने अपमानित हुए हैं कि उनके सामने आत्महत्या करने या नौकरी छोड़ने तक की नौबत आ गई। यदि यकीन न हो तो उत्तर रेलवे सहित ये जहां-जहां रहे हैं, वहां-वहां के इनके मातहतों से इस बात का वेरिफिकेशन करा लिया जाए।

#TanijaKansal wife of #AlokKansal, #GMWR

यह बात बिल्कुल सही है कि ऐसे एक नहीं कई अफसर रेल में भरे पड़े हैं, जो आने वाले समय में निश्चित तौर पर जीएम, सीआरबी मैटीरियल हैं, जिनकी एकमात्र प्रतिभा सिर्फ उनकी “एज प्रोफाइल” है। इसी प्रोफाइल के चलते आज बोर्ड मेंबर और सीआरबी बने बैठे लोग मौके पर मंत्री को उचित बात बताने के बजाय घिघिया रहे हैं।

इसीलिए ऐसे अफसरों को उनके मातहत शुरू से ही जीएम, बोर्ड मेंबर तथा सीआरबी के नजरिये से देखते हैं। यही कारण है कि मातहतों की यह फौज भविष्य के डर से इनके सारे आसुरी कृत्यों को नपुंसकों की तरह अथवा न चाहते हुए भी मजबूरी वश बर्दाश्त करती रहती है।

लेकिन कुछ अधिकारियों का कहना है कि कंसल से दुःखी पूरे जोन के अधिकारी यह जानते हैं कि इनका कोई कुछ नहीं करेगा, क्योकि यह रेलमंत्री की पसंद से ही पश्चिम रेलवे में जीएम बनकर आए हैं और मंत्री जी को यह हर तरह से खुश रखते हैं!

यह भी सर्वज्ञात है कि इसी शासनकाल में सुशासन बाबू और रेलमंत्री के जीरो टॉलरेंस की ये स्थिति थी कि डीआरएम के डिवीजनल इंस्पेक्शन के दौरान जब डीआरएम ने भरी गर्मी में टेंट के नीचे लंच कर लिया था, तो डीआरएम (रांची) का तबादला इसे ऐय्याशी मानते हुए कर दिया गया था और उनको चार्जशीट देने की भी तैयारी थी। इसी तरह के कई और उदाहरण भी देखने में आए थे।

ऐसे में यदि कंसल के मामले में रेलमंत्री कार्रवाही नहीं करते हैं, तो न सिर्फ यह कोरोना संक्रमण से लड़ रहे और मर रहे सैकड़ों रेल कर्मचारियों और अधिकारियों के जख्मों पर नमक रगड़ने जैसा होगा, बल्कि देश में कोरोना से सबसे बुरी तरह प्रभावित महाराष्ट्र और मुंबई की जनता का भी यह घोर अपमान होगा।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को भी इसका संज्ञान लेना चाहिए और अगर उन्हें रेलमंत्री की तरह यह रचनात्मक प्रतिभा लगे, तो फिर उन्हें अपने “मन की बात” कार्यक्रम में इसकी प्रेरणास्प्रद चर्चा जरूर करनी चाहिए। तब हो सकता है कि इससे देश के करोड़ों बेरोजगार युवाओं को अपनी आर्थिक बदहाली को भुलाने में कुछ मदद हो सके।

#TanujaKansal wife of #AlokKansal, #GMWR

इसमें सिर्फ जीएम/पश्चिम रेलवे ही नहीं, जब तक उनके चमचों और चाटुकारों की फौज को भी दंडित नहीं किया जाएगा – जो जीएम्स के इस तरह के ऊल-जलूल कार्यों में बढ़-चढ़कर अपना योगदान देते हैं – तब तक जीएम जैसे ताकतवर पद पर बैठे लोगों के बेलगाम संवेदनशून्य मानसिक विकार से उत्पन्न फूहड़ प्रदर्शनों का सिलसिला नहीं रुकेगा।

कई अफसर और उनकी पत्नियां अपना काम और घर द्वार छोड़कर जीएम की चमचागीरी में कॉस्टिंग डायरेक्टर, क्रिएटिव डायरेक्टर, प्रोडक्शन मैनेजर, फ्लोर मैनेजर, सिनेमॅटोग्राफर आदि का ही काम करते-करते अपने को बहुत बड़ा फिल्म प्रोफेशनल समझने लगते हैं और बिना रेल का कोई काम किए, फील्ड में बिना पसीना बहाए, पूरे सेवाकाल में रेलवे की सारी सुख-सुविधाएं भोगते रहते हैं। कई तो यही सब करते-करते कब खुद डीआरएम, जीएम और सीआरबी बन जाते हैं, और बने भी हैं, पर किसी को इसका आजतक अहसास नहीं हुआ।

#TanijaKansal wife of #AlokKansal, #GMWR

इसमें कैमरा, साज-सज्जा आदि का प्रबंध करने वाले, ऑफीसर्स क्लबों के सेक्रेटरी, जीएम के सेक्रेटरी, महिला समितियों की सदस्य विभिन्न अधिकारियों की पत्नियों आदि की भी पहचान कर उन्हें कहीं किसी दूरस्थ रेलवे में भेजने से ही बहुसंख्यक ईमानदार, मेहनतकश, बिना माई-बाप के अधिकारियों-कर्मचारियों में एक सही संदेश जाएगा।





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सचिव, बैद, गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस ! – RailSamachar

पीएमओ और कुछ केंद्रीय मंत्रालयों के जिन मंत्रियों/अफसरों ने प्रधानमंत्री को निजी स्वार्थवश सेवा विस्तार की सलाह दी है, उसे उन पर ही लागू करना उचित होगा, क्योंकि कोरोना महामारी से निपटने में उनका कोई प्रत्यक्ष योगदान नहीं है!

सुरेश त्रिपाठी

भारत सहित पूरा विश्व कोरोनावायरस (कोविद-19) की महामारी से पिछले कुछ महीनों से लगातार जूझ रहा है। हर देश अपने-अपने तरीकों से इससे निपटने में और अपने नागरिकों को सुरक्षित रखने में लगा हुआ है। भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इस मुहिम को संभाल रहे हैं। वह लगातार सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से संपर्क कर रहे हैं और मीडिया के विभिन्न मंचों से नागरिकों को भी जरूरी एहतियात बरतने की अपील कर रहे हैं। उनके अब तक के प्रयासों का ही नतीजा है कि भारत में यह महामारी विकराल रूप धारण नहीं सकी है।

ऐसे समय में उच्च पदस्थ सूत्रों के हवाले से खबर मिली है कि सरकार को अगले तीन महीने अथवा इस महामारी के खत्म होने तक कुछ सचिवों को सेवा विस्तार देने की सलाह कुछ सरकारी बाबुओं ने दी है।

यदि यह खबर सही है, तो सबसे पहली बात यह है कि सलाह काफी हद तक उचित है और इसके अनुसार उन सरकारी कर्मियों को सेवा विस्तार अवश्य दिया जाना चाहिए, जो लगातार इस महामारी की रोकथाम, मरीजों की देखभाल, कानून-व्यवस्था को संभालने और जीवन आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति जैसी आवश्यक सेवाओं में जी-जान से जुटे हुए हैं।

दूसरी बात यह कि उन सरकारी बाबुओं को सेवा विस्तार देने की कोई आवश्यकता नहीं है, जो सिर्फ पीएमओ या मंत्रियों के इर्द-गिर्द घूमकर अथवा उनसे चिपके रहकर इस आपत्तिकाल में भी समस्त सुख-सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं। और ऐसा समझा जाता है कि ऐसे ही सरकारी बाबुओं ने अपने निजी स्वार्थवश सरकार को उपरोक्त सलाह सरकाई है।

वर्तमान में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण तीन सरकारी सेवाएं हैं – रेलवे, मेडिकल और पुलिस। इन्हीं तीनों सेवाओं के अधिकारी और कर्मचारी तमाम असुविधाजनक स्थिति का सामना करते हुए भी फील्ड में अपनी वास्तविक ड्यूटी पर डटे हुए हैं। यदि किसी को न्यूनतम सेवा विस्तार देने की जरूरत है, तो वह इन्हीं तीनों सेवाओं के कर्मियों को दिया जाना उचित होगा।

रेल अधिकारी और कर्मचारी रात-दिन मालगाड़ियों और पार्सल स्पेशल ट्रेनों का संचालन करके देश भर में जीवन आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बनाए रखने में लगे हुए हैं। पावर हाउसों को कोयला पहुंचा रहे हैं, जिससे घरों में बंद देश के नागरिकों को बिजली मिल पा रही है। पानी की आपूर्ति हो रही है। दवाईयां और खाद्यान्न मिल पा रहा है।

रेलवे के फील्ड कर्मचारी लगातार ट्रैक, ब्रिज, सिग्नल, ओएचई दुरुस्त करने में लगे हुए हैं। लॉकडाउन में भी रेल संपत्तियों और कारखानों की सुरक्षा में तैनात हैं, जहां रोलिंग स्टॉक की मरम्मत हो पा रही है। अपनी जान की परवाह न करते हुए वेंटीलेटर, मास्क और सेनिटाइजर बनाकर मेडिकल स्टाफ सहित सर्वसामान्य नागरिकों तथा रेलकर्मियों की मदद करने में लगे हुए हैं। पीसीएमई/उ रे ने तो रेलवे में इन सब जरूरी वस्तुओं के निर्माण/उत्पादन का लाइसेंस भी संबंधित सक्षम विभागों से प्राप्त कर लिया है। 

कुछ खास वर्ग के मरीजों के भयावह असहयोग और इस पर हो रही राजनीति तथा कुछ शिकवा-शिकायतों के बावजूद मेडिकल फील्ड में डॉक्टर, नर्सिंग और पैरामेडिकल स्टाफ लगातार कोरोनावायरस की रोकथाम हेतु लोगों की सेवा में लगा हुआ है।

इसी तरह पुलिस के जवान और अफसर भीषण गर्मी तथा कई असुविधाजनक स्थितियों के होते हुए भी अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद हैं। उन्हें भी कुछ उद्दंड टाइप नागरिकों के असहयोग से मजबूर होकर कई बार कड़े कदम उठाने पड़ रहे हैं। पर कुल मिलाकर उन्होंने स्थिति को नियंत्रण में रखा हुआ है।

इनमें नगरपालिकाओं और नगरपरिषदों के सफाई कर्मचारियों को भी गिना जाना चाहिए, क्योंकि उनकी बदौलत अस्पतालों और कोरंटीन सेंटरों की साफ-सफाई सुनिश्चित हो पा रही है। यह आवश्यक सेवाओं में भी है।

ऐसे में पीएमओ और कुछ केंद्रीय मंत्रालयों के जिन अफसरों और मंत्रियों ने निजी स्वार्थवश सेवा-विस्तार की सलाह दी है, उसे उन पर ही लागू किया जाना उचित होगा, क्योंकि इस महामारी से निपटने में उनका कोई प्रत्यक्ष योगदान नहीं है। इनमें से रेलवे बोर्ड अध्यक्ष (सीआरबी) और रेलमंत्री प्रमुख हैं। सीआरबी वैसे भी प्रशासनिक निर्णय लेने और रेल संचालन-व्यवस्थापन में अपने एक साल के असली कार्यकाल में फेल साबित हुए थे और यही तथ्य उनकी पुनर्नियुक्ति के पिछले चार महीनों में भी सही साबित हुआ है। उन्हें खामखां एक साल की पुनर्नियुक्ति देकर पीएमओ को भी अब पछतावा ही हो रहा होगा।

जबकि रेलमंत्री को प्रधानमंत्री की चापलूसी करने से ही फुर्सत नहीं है। ऐसा लगता है कि उनको इसके सिवा और कुछ आता ही नहीं है। उन्होंने जब से यह पद संभाला है, तब से अब तक उनका प्रत्येक निर्णय विवादग्रस्त ही रहा है। वह न सिर्फ रेलमंत्री के तौर पर फेल हैं, बल्कि उन्होंने अब तक जो भी मंत्री पद संभाला, उसमें भी फेल रहे हैं। रेकार्ड्स इस बात के गवाह हैं। सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री की वाहवाही में सबसे आगे रेलमंत्री हैं, जैसे कि इससे जरूरी उनके पास अन्य कोई काम ही नहीं है। इतिहास में भारतीय रेल का सबसे अधिक बंटाधार करने वाले और सर्वाधिक अलोकप्रिय रेलमंत्रियों में उनकी गिनती होने वाली है।

इस संदर्भ में गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरित मानस – सुंदर कांड – में एक सर्वकालिक सीख देते हुए कहते हैं-

सचिव, बैद, गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।

राज, धर्म, तनु तीनि कर होइ बेगिहिं नास।।37।।

अर्थात – “मंत्री, वैद्य और गुरु यदि ये तीन भय, लाभ या स्वार्थवश मीठा बोलते हैं, राज (शासन) हित की बात न कहकर चापलूसी करते हैं (ठकुरसुहाती कहने लगते हैं), तो राज्य, शरीर और धर्म, इन तीनों का नाश होने में समय नहीं लगता।”

अब यह प्रधानमंत्री पर निर्भर करता है कि वह गोस्वामी तुलसीदास जी की सीख पर अमल करते हैं या वर्तमान सीआरबी जैसे चापलूसी और जी-हजूरी करने वाले सचिवों-मंत्रियों की बात मानकर एक बार फिर देश के प्रबुद्ध नागरिकों को निराश करते हैं! तथापि वह जो भी निर्णय लें, वह सेलेक्टिव, यानि कुछ मुंहलगे नियर-डियर अफसरों तक सीमित न रहकर उपरोक्त आवश्यक सेवाओं से जुड़े सरकारी कर्मियों-अधिकारियों तक व्यापक रूप से होना चाहिए। ऐसा न सिर्फ प्रबुद्धजनों का मानना है, बल्कि वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों का भी यही सुझाव है।

इति शुभम्








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लॉकडाउन खत्म होने के बाद रेलवे स्टेशनों पर उमड़ने वाली प्रचंड भीड़ पर विचार करे रेल प्रशासन

नियम का उल्लंघन करने वाले यात्रियों पर #रेलवे_ऐक्ट के बजाय #आईपीसी के तहत कार्रवाई हो

जैसा कि अब सभी जानते हैं कि #कम्प्लीट_लॉकडाउन के चलते भारतीय रेल द्वारा न सिर्फ यात्री ट्रेनों का संचालन 14 अप्रैल तक पूरी तरह बंद कर दिया गया है, बल्कि 14 अप्रैल, 24 बजे तक सभी प्रकार की रेल टिकटों की बुकिंग भी बंद कर दी गई है। हो सकता है इस बंद को आगे भी बढ़ाया जाए। परंतु एक बात तो तय है कि इस लॉकडाउन के बाद जब भी रेल सेवा बहाल होगी, इस पर यात्रियों का भारी दबाव आएगा।

ज्ञातव्य है कि पूरे समर सीजन की #एडवांस_बुकिंग के साथ #वेटिंग_लिस्ट में भी यात्री टिकटों की भारी संख्या पहले ही बुक की जा चुकी है। यदि बिना किसी तैयारी के रेल सेवाएं बहाल की गईं, तो #रेलसेवा बंद करके देश ने जो भी मजबूत स्थिति कायम की होगी, वह कुछ ही दिनों में प्रचंड भीड़ की वजह से गंवा दी जाएगी।

हम सब ने देखा ही है कि कैसे-कैसे लापरवाह तथा मूर्ख हमारे बीच हैं, जो किसी की परवाह किए बिना बीमारी को अपने साथ लेकर यात्राएं करते रहे और बीमारी यहां से वहां फैलती रही। ऐसे में रेल सेवाएं बहाल करने से पहले रेलवे को पर्याप्त तैयारियां करनी चाहिए, जिससे कोई विषम स्थिति पैदा न हो।

इसके लिए जरूरी होगा कि रेलवे द्वारा लंबी दूरी की गाड़ियों में वर्तमान प्रतिक्षासूची के यात्रियों की सभी टिकटों को स्वतः रद्द कर दिया जाए और केवल उन्हीं यात्रियों को यात्रा की अनुमति दी जाए, जिनके पास कन्फर्म टिकट तथा डॉक्टर का प्रमाण पत्र हो, जिसमें यह प्रमाणित हो कि वे #COVID19 निगेटिव हैं।

इसके साथ ही कुछ समय के लिए एसी3 तथा स्लीपर क्लास की मिडिल बर्थ की बुकिंग को भी निरस्त करना उचित होगा, जो कि #सोशल_डिस्टेंसिंग बनाने में बाधक है। लंबी दूरी की गाड़ियों में #अनारक्षित टिकटों की बुकिंग भी इस दौरान बंद कर देनी चाहिए, जिसके माध्यम से #आरक्षित डिब्बों के यात्रियों की सुरक्षा औ संरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है।

इसके अलावा यात्री ट्रेनों में चलने वाला ऑन बोर्ड टिकट चेकिंग स्टाफ, एसी मैकेनिक, पैंट्रीकार वेंडर्स इत्यादि भी इस खतरे से अछूते नही रहेंगे। इसलिए क्यों न इस लॉक डाउन के खाली समय में इन तैयारियों को सुनिश्चित करने का एक अभियान शुरू किया जाए।

#रेलकर्मी भी अपने-अपने स्तर पर विभिन्न माध्यमों से अपने #सुझाव रेल प्रशासन तक पहुंचाएं कि लॉकडाउन खत्म होने और रेल सेवा बहाल होने पर प्रचंड भीड़ की स्थिति से निपटने के लिए कौन-कौन से तरीके कारगर साबित हो सकते हैं।

जितनी बड़ी संख्या में रेलकर्मियों के ये बहुमूल्य सुझाव #रेल_प्रशासन तक पहुंचेंगे, उन पर अमल भी उतनी ही तत्परता से सुनिश्चित किया जा सकेगा।

उन्हें अपनी बात किसी भी प्रकार से रेल प्रशासन तक पहुचानी है कि रेल सेवाएं बहाल होने से पहले #वेटिंग टिकट या बिना कन्फर्म बर्थ/सीट की यात्रा को बिना किसी शर्त पूरी तरह अवैध घोषित कर दिया जाए।

इसके साथ ही नियम का उल्लंघन करने वाले यात्रियों पर #रेलवे_ऐक्ट के बजाय #आईपीसी के तहत कार्रवाई हो, यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए, क्योंकि बिना खौफ या डर के हम भारतीय किसी नियम-कानून का पालन करना अपनी शान के विपरीत समझते हैं।

अतः यह आवश्यक है कि न सिर्फ उपरोक्त कुछ सुझावों पर विचार किया जाए, बल्कि #लॉकडाउन के इस खाली समय में रेल प्रशासन द्वारा लॉकडाउन खत्म होने के बाद #रेलवे_स्टेशनों पर उमड़ने वाली प्रचंड भीड़ को नियंत्रित करने की तैयारियां भी अभी से सुनिश्चित कर ली जाएं।








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पश्चिमी देशों की सरकारें रेलवे के निजीकरण के बाद राष्ट्रीयकरण में जुटी, भारत में भी सरकार रेलवे के निजीकरण को लेकर दोबारा विचार करें – क. शिव गोपाल मिश्र

काडर मर्जर संबंधी सरकार के निर्णय ने रेलवे यूनियनों को एकजुट होने के लिए मजबूर कर दिया है। अभी तक निजीकरण और निगमीकरण के प्रयासों पर हल्का-फुल्का विरोध जताती आई ये यूनियनें अब सरकार के विरुद्ध बड़े आंदोलन तथा चक्काजाम की रूपरेखा बनाने में जुट गई हैं। यूनियनों ने आंदोलन में आम जनता का भी सहयोग लेने का निर्णय लिया है।

एआइआरएफ ने निजीकरण और निगमीकरण के विरुद्ध सरकार को किया आगाह

रेलवे की सबसे बड़ी यूनियन ऑल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन (एआइआरएफ) ने एक बयान जारी कर सुधारों के नाम पर रेलवे के निजीकरण और निगमीकरण के प्रयासों के विरुद्ध सरकार को आगाह किया है। एआइआरएफ के महासचिव शिवगोपाल मिश्रा ने कहा है कि भारतीय रेल 165 वर्षो से जनता की सेवा कर रही है। इस दौरान रेलवे ने कई चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया है। मौजूदा सरकार नित नए प्रयोगों के जरिये इस सुस्थापित ढांचे को तोड़ने में जुटी है। इससे रेलवे का कोई भला तो होगा नहीं, लेकिन वह गहरे संकट में जरूर फंस जाएगा। इस संकट का जल्द हल निकलना भी मुश्किल होगा।

विश्व के जिन देशों ने रेलवे का निजीकरण किया, उन्हें पुन: राष्ट्रीयकरण के लिए विवश होना पड़ा

विश्व के जिन देशों ने रेलवे का निजीकरण किया, उन्हें पुन: राष्ट्रीयकरण के लिए विवश होना पड़ा। ब्रिटेन ने वर्ष 1989 में रेलवे का निजीकरण किया, लेकिन अब वहां व्यवस्था को बरकरार रखने के लिए सरकार को पांच-छह गुना ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। अर्जेटीना को भी दुर्घटनाओं में बढ़ोतरी के बाद वर्ष 2015 में रेलवे का फिर से राष्ट्रीयकरण करना पड़ा। न्यूजीलैंड ने वर्ष 1980 में रेलवे का निजीकरण किया, लेकिन भारी घाटे के बाद वर्ष 2008 में पुन: राष्ट्रीयकरण को मजबूर होना पड़ा। यही स्थिति आस्ट्रेलिया में भी देखी गई, जहां ‘गिव अवर ट्रैक बैक’ आंदोलन के बाद सरकार ने रेलवे को फिर से अपने हाथों में लिया है।विश्व के जिन देशों ने रेलवे का निजीकरण किया उन्हें पुन राष्ट्रीयकरण के लिए विवश होना पड़ा। सरकार नित नए प्रयोगों के जरिये रेलवे ढांचे को तोड़ने में जुटी है।





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