क्या कारण है कि सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे में ही बनते हैं!

आखिर रेलवे बोर्ड के आईआई ही ज्यादा भ्रष्ट, निरंकुश और उत्पाती क्यों होते हैं?

सुरेश त्रिपाठी

रेलवे बोर्ड विजिलेंस ने “आरबी गैंग” के तीनों इंवेस्टीगेशन इंस्पेक्टर (आईआई) को रेलवे बोर्ड से मुक्ति के समसंख्यक आदेश (पत्र सं. 2020/ईआरबी-2/20/1) उसी दिन शुक्रवार, 17 जुलाई 2020 को दोपहर बाद  जीएम/कार्मिक, उत्तर रेलवे के लिए जारी कर दिए गए थे। अब जो अधिकारी इन तीनों कुख्यात आईआई को रेलवे बोर्ड में बनाए रखने की अभी भी पैरवी कर रहे हैं, उनको या तो यह पता नहीं है कि फील्ड में इन्होंने अपने साथ ही उनका भी नाम चर्चित कर रखा है, या फिर उनकी भी कोई मजबूरी है!

क्या बात है कि रेलवे बोर्ड के आईआई ही इतने ज्यादा भ्रष्ट, निरंकुश और उत्पाती होते हैं? “बिना ऊपर की शह और इशारे के ये तो हो ही नहीं सकता है” (अपनी सफाई में तो ये लोग फील्ड में यही कहते फिरते हैं)। इसका कारण खोजने पर जबाब आसानी से मिल जाएगा।

बहरहाल शनिवार, 18 जुलाई को “देर आए, दुरुस्त आए!“ शीर्षक से इन तीनों आईआई को रेलवे बोर्ड विजिलेंस से निकाले जाने की खबर “रेलसमाचार.कॉम” में और रविवार, 19 जुलाई को “कानाफूसी.कॉम” में “रेलवे विजिलेंस का आंख खोल देने वाला सच“ शीर्षक से प्रकाशित होने के बाद से सैकड़ों-हजारों रेलकर्मियों, अधिकारियों, जिसमें रिटायर्ड भी शामिल हैं और साथ ही आईआई का एग्जाम दे चुके कैंडिडेट भी, ने सत्यता उजागर करने पर “रेलसमाचार” का धन्यवाद करते हुए पीईडी/विजिलेंस/रे.बो. के इस आवश्यक कदम की सराहना की है और हर विभाग के कर्मचारी तथा अधिकारी लगातार कई विजिलेंस इंस्पेक्टरों/अधिकारियों की पोल खोलने वाली तथ्यात्मक बातें विभिन्न माध्यमों से साझा कर रहे हैं।

रेलवे बोर्ड और रेलवे बोर्ड विजिलेंस में काम कर चुके कुछ लोगों का तो सबूत के साथ यह भी कहना है कि अगर पिछले कुछ सालों की विजिलेंस फाइलों और मामलों की गहराई से विस्तृत ऑडिट तथा गहन जांच कराई जाए, तो सरकार रेलवे विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन को बंद करना ही पसंद करेगी।

विजिलेंस की आड़ में अब तक जितने भी रेलकर्मियों तथा अधिकारियों के साथ भ्रष्ट और अनैतिक तरीके से अनाचार, अत्याचार, शोषण, उत्पीड़न हुआ है, उसे देखकर तो “आईएसआईएस” भी शर्मशार हो जाएगा और शायद विजिलेंस के इन इंस्पेक्टरों और अधिकारियों में अपने सबसे योग्यतम उम्मीदवार भी मिल जाएंगे।

यह अलग बात है कि सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे कर्मचारियों, अधिकारियों के ही खिलाफ होते हैं। देश के सारे मंत्रालय और सारे पीएसयू को मिलाकर भी सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे में ही बनते हैं। तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि रेलवे ही देश की सबसे भ्रष्टतम संस्था है?

जो लोग रेलवे फील्ड में काम करते हैं और फील्ड में काम करने का लंबा अनुभव रखते हैं, और जो लोग अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण 40-40 साल अपना अमूल्य योगदान देकर रेलवे से रिटायर हो चुके हैं, उनका कहना है कि “ऐसा बिल्कुल नहीं है। वस्तुतः विजिलेंस के लिए वहीं केस होता है, जहां भ्रष्टचार का स्पष्ट मामला हो और जहां उद्देश्य (इंटेंशन) भी स्पष्ट हो। क्योंकि फील्ड में कार्य बहुत सी चीजों पर निर्भर करता है और टाइम फैक्टर बहुत महत्वपूर्ण होता है। अतः फील्ड कर्मचारी, अधिकारी भले ही निर्धारित पॉलिसी का शब्दशः अनुपालन न करें, लेकिन वे रेल हित से कोई समझौता नहीं करते हैं।”

वैसे भी यह एक सर्वज्ञात तथ्य है कि सबसे बड़ा खेल पॉलिसी बनाने में ही होता है, जिस पर किसी विजिलेंस वाले ने रेलवे में अब तक शायद ही कभी कोई केस बनाया होगा। कुछ विभागों में पालिसी बनाई ही इस तरह से जाती है कि रामचरितमानस की चौपाई की तरह उसका कोई भी अपने बुद्धिविलास से किसी भी तरह की व्याख्या कर सकता है, खासकर वाणिज्य, कार्मिक और लेखा विभाग की पॉलिसियां इस बात का उदाहरण हैं।

ऐसे में यदि हरिश्चंद्र भी रेलवे विभाग में काम कर रहे होंगे, तो बहुत अच्छे से कोई इसी माफिया तंत्र के अनुभव का फायदा उठाकर कंप्लेंट कर देगा, तब उनको भी अपनी नौकरी बचाने के लाले पड़ जाएंगे। यही कारण है कि रेलवे में सिर्फ वही कर्मचारी-अधिकारी विजिलेंस केस में ज्यादा फंसते हैं, जो ज्यादा तेजतर्रार और रिजल्ट ओरिएंटेड तथा ईमानदार मनसा वाले होते हैं, जिन्हें दुनियादारी कम, अपना काम ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है।

क्या कोई बता सकता है कि आज तक रेलवे में महाघाघ लोग कभी विजिलेंस के द्वारा पकड़े गए हैं? जिनके लिए काम नहीं, दाम ज्यादा महत्वपूर्ण रहा है, क्या विजिलेंस ने कभी उनको पकड़ा है? अथवा उन पर हाथ डालने की कभी हिमाकत की है? यदि ऐसा कोई घाघ पकड़ा गया है, तो उसे बाहरी एजेंसी (सीबीआई) ने ही पकड़ा है, लेकिन उसमें भी अधिकांश लोग बचकर निकल जाते हैं और जो सीधा रहता है, वही पिसता है। कारण इसके कई हैं, लेकिन एक सबसे बड़ा कारण विजिलेंस में महाघाघ और महाभ्रष्ट इंस्पेक्टरों और अधिकारियों का वर्चस्व होना है। यही है रेलवे विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन की असलियत।

दूसरे मंत्रालयों में यदि सीधे-सीधे करप्शन का मामला नहीं होता है, तो वहां केस नहीं बनता, और न ही जलेबी जैसा घुमाया जाता है। लेकिन रेलवे में महाभ्रष्टों ने अपने को ईमानदार साबित करने का सबसे आसान रास्ता चुना है – दूसरे को बेईमान और भ्रष्ट साबित करने का!

यहां सीधा गणित है, जो जितनी ज्यादा संख्या में दूसरे को बेईमान बताएगा, वह यहां उतना ही बड़ा और ज्यादा ईमानदार माना जाएगा। अपनी खोट छिपाने के लिए और अपने अस्तित्व को न्यायोचित ठहराने के लिए वर्षों से रेलवे विजिलेंस यही कर रहा है।

एक बार यह समीक्षा हो जाए कि विजिलेंस की कार्यवाही से अब तक कितने भ्रष्ट कर्मचारी सही हुए हैं, अथवा सही रास्ते पर आ गए हैं और कितने ईमानदार तथा काम को वरीयता देने वाले कर्मचारियों/अधिकारियों का मनोबल बढ़ा है, विजिलेंस कार्यवाही के बाद कार्य की गति और गुणवत्ता दोनों बढ़ गई है, तब स्थिति एकदम स्पष्ट हो जाएगी। क्योंकि अगर भ्रष्ट आदमी पर कार्यवाही होगी और ईमानदार तथा काम को प्रधानता देने वाले उत्पीड़ित नहीं किए जाएंगे, तो रेलवे ऑर्गेनाइजेशन में काम की गति और गुणवत्ता अपने आप बहुत बढ़ जाएगी।

लेकिन क्या कोई रेल अधिकारी या कर्मचारी यह दावे के साथ कह सकता है कि उसे ये दोनों चीजें रेलवे में कहीं नजर आ रही हैं? जबकि यहां ईमानदार और काम करने वाले या तो हासिये पर डाल दिए गए हैं और पूरी तरह से हतोत्साहित हैं, या फिर किसी परेशानी में पड़ने के भय से उन्होंने निर्णय लेना ही छोड़ दिया है। और यह सब रेलवे विजिलेंस की देन है।

क्या किसी को पता है कि सीबीआई जिन अधिकारियों और कर्मचारियों को लाखों-करोड़ों की घूस लेते रंगेहाथ पकड़ती है, उनके ऊपर विजिलेंस ने क्या कभी कोई केस किया हुआ होता है? उनमें से किसी का भी नाम क्या “एग्रीड लिस्ट” अथवा “सीक्रेट लिस्ट” में भी डाला है? या किसी विजिलेंस वाले को, जो कार्यकाल के बीच में ही हटाया गया हो, क्या उसको इन दोनों लिस्टों में से किसी एक में आज तक कभी डाला गया है? इन सब सवालों का जबाब न में ही मिलेगा।

विजिलेंस माफिया और विभागों के बड़े माफिया मिलकर “एग्रीड लिस्ट” का इस्तेमाल कैसे ईमानदार या इनकी आंख में खटकने वाले अथवा इनके रास्ते के रोड़े बनने वाले कर्मचारी, अधिकारी को निपटाने में करते हैं? और “एग्रीड लिस्ट” को ये माफिया कैसे ब्रह्मास्त्र के रूप में इस्तेमाल करता है? जब ये माफिया हर तरह से प्रयास करके भी किसी ईमानदार कर्मचारी या अधिकारी को फंसाने में कामयाब नहीं हो पाता है, तब क्या करता है! इस पर विस्तार से आगे लिखा जाएगा। क्रमशः





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