मध्य एवं पश्चिम रेलवे की नाला सफाई में मुंबई मनपा के बह गए 30 करोड़!

गत 12 वर्षों में रेलवे के 116 नालों की सफाई में मुंबई मनपा ने खर्च किए ₹30 करोड़ से अधिक

मुंबई में मध्य रेलवे एवं पश्चिम रेलवे के नालों (कल्वर्ट्स) की उचित साफ-सफाई नहीं होने से मानसून की पहली ही बारिश में बुधवार, 9 मई को कुर्ला से लेकर सायन और माटुंगा के बीच रेल पटरियों पर बारिश का पानी जमा हुआ और मुंबई उपनगरीय रेल सेवा बुरी तरह प्रभावित हुई।

गनीमत यह रही कि कोविड के चलते लोकल ट्रेन सेवाएं फिलहाल केवल आवश्यक सेवाओं से जुड़े सरकारी और कुछ गैर सरकारी कर्मचारियों के लिए ही चलाई जा रही हैं। अन्यथा सामान्य कामकाज के दिनों की तरह अगर सभी लोकल सेवाएं चल रही होतीं, तो पीक ऑवर में लाखों उपनगरीय यात्रियों का बहुत बुरा हाल हो गया होता।

“पिछले 12 सालों में रेलवे के 116 नालों की साफ-सफाई पर 30 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए गए हैं। यह सफाई उचित तरीके से न होने के कारण 30 करोड़ रुपये पानी में बह गए।” यह आरोप आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने रेलवे और मुंबई महानगर पालिका पर लगाया है।

मुंबई में रेलवे के अंतर्गत आने वाले कल्वर्ट, जिनकी हर साल रेल प्रशासन द्वारा सफाई कराई जाती है और मुंबई मनपा द्वारा हर साल 3 से 4 करोड़ रुपये का भुगतान रेलवे को किया जाता है।

पिछले 12 साल में मुंबई मनपा से रेलवे को 30 करोड़ रुपये मिले हैं, लेकिन आज तक रेलवे की ओर से कोई ऑडिट नहीं हुआ, और न ही आजतक मुंबई महानगर पालिका द्वारा किए गए खर्च का रेलवे से कोई हिसाब मांगा गया।

मुंबई में रेल लाइनों के नीचे से गुजरने वाले कुल 116 नालों में से 53 मध्य रेलवे, 41 पश्चिम रेलवे और 22 हार्बर लाइन के अंतर्गत आते हैं।

वर्ष 2009-10 से 2017-18 तक के 9 सालों में मुंबई मनपा ने रेल प्रशासन को 23 करोड़ रुपये दिए थे। वर्ष 2018-19 में 5.67 करोड़ मनपा ने खर्च किए।

कुल मिलाकर, नालों की साफ-सफाई के मद में पिछले 12 वर्षों के दौरान मुंबई मनपा द्वारा कुल 30 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान रेलवे को किया गया है।

मुंबई महानगरपालिका ने इस साल मुंबई सीएसएमटी से लेकर मुलुंड तक रेल लाइनों के नीचे से निकलने वाले सभी नालों की साफ-सफाई महज 15 दिनों में पूरा करने का दावा किया है।

अनिल गलगली के अनुसार, हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई के लिए मुंबई मनपा रेलवे को भुगतान करती है, लेकिन नालों की सफाई का कोई ऑडिट नहीं होता है।

उन्होंने कहा कि कुर्ला और सायन के बीच पिछले कई वर्षों से रेल सेवाएं ठप होती हैं। अगर 31 मई तक नालों की सफाई का सर्वे कराया जाए, तो ऐसी स्थिति नहीं पैदा होगी।

अनिल गलगली ने कहा कि दोनों एजेंसियां इसके लिए ​​समान रूप से जिम्मेदार हैं। जनता को दोनों एजेंसियों द्वारा किए गए खर्च के बारे में सूचित किया जाना आवश्यक है। फिर चाहे वह रेलवे हो या मुंबई महानगरपालिका!

उन्होंने इस मद में हुए खर्च की पूरी जानकारी सार्वजनिक किए जाने की मांग की है।

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कोटा मंडल, पश्चिम मध्य रेलवे में लगातार जारी हैं गंभीर अनियमितताएं

बोर्ड की रोक के बावजूद किया जा रहा है नए पदों का सृजन

सुरेश त्रिपाठी

रेलमंत्री पीयूष गोयल के निर्देश पर रेलवे बोर्ड द्वारा सभी जोनल रेलों और उत्पादन इकाईयों को लागत खर्चों में कटौती करने संबंधी कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके बावजूद कुछ जोनों/मंडलों द्वारा बोर्ड के इन निर्देशों को तनिक भी तवज्जो नहीं दी जा रही है। इनमें से पश्चिम मध्य रेलवे का कोटा मंडल भी शामिल है। कार्मिक शाखा, कोटा मंडल द्वारा 10 जून 2020 को पत्र सं. ईसी/1025/34/1, भाग-4 तथा समसंख्यक पत्र दि. 15.07.2020 जारी करके वाणिज्य निरीक्षकों के 4 रिक्त पदों के स्थान पर 6 अतिरिक्त यानि 6 नए पदों के सृजन के साथ कुल 10 वाणिज्य निरीक्षकों का चमन किया जा रहा है। इसकी परीक्षा गुरुवार, 6 अगस्त को मंडल प्रबंधक कार्यालय, कोटा में रखी गई है।

उल्लेखनीय है कि रेलवे बोर्ड द्वारा 2 जुलाई को नए पद सृजन के संबंध में पत्र सं. ई(एमपीपी)/2018/1/1 (आरबीई 48/2020) जारी करके लागत खर्च में कमी करने के लिए संरक्षा को छोड़कर अगले आदेश तक कोई भी नया पद सृजित नहीं करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा वर्तमान पदों में 50% की कटौती करने के साथ ही उन पदों, जो पिछले दो वर्षों में सृजित किए गए हैं और उन पर अब तक भर्ती नहीं की गई है, को सरेंडर करने को भी कहा है।

रेलवे बोर्ड ने उपरोक्त संबंधी आदेश 19 जून 2020 को भी अपने पत्र सं. 2015/बी/235 में जारी किया था।

इस पत्र के पैरा-III (ए) के अनुसार आउटसोर्सिंग गतिविधियों, विशेष रूप से ओबीएचएस, लिनन प्रबंधन, स्टेशन क्लीनिंग, लिफ्ट/एस्केलेटर्स मैनिंग और स्टेशन एनाउंसमेंट इत्यादि की समीक्षा गंभीरता से करने का निर्देश देते हुए इन सब गतिविधियों पर हो रहे अमापक खर्च पर कड़ाई से अंकुश लगाने को कहा था।

रेलवे बोर्ड के उपरोक्त निर्देशों के उल्लंघन के अलावा कोटा मंडल की वाणिज्य शाखा में कुछ अन्य गंभीर अनियमितताएं भी उजागर हुई हैं, जिसमें रेलवे बोर्ड के जिन नीति निर्देशों को दरकिनार किया गया है, वह इस प्रकार हैं-

कोटा मंडल द्वारा विभिन्न स्टेशनों पर कैडर में स्वीकृत ग्रुप ‘डी’ सफाई कर्मचारियों के पदों को सरेंडर कर 6 वाणिज्य निरीक्षकों के पदों का सृजन किया गया, जिसका मुख्य कारण पूरे मंडल में स्टेशनों को क्लब करते हुए जोन बनाकर सभी स्टेशनों पर सफाई का कार्य ठेके पर कराने की योजना थी।

कार्मिक कार्यालय के पत्र सं ईसी/1025/34/1 भाग-iv, दि. 10.06.2020 के अंतर्गत 10 वाणिज्य निरीक्षकों (08 अनारक्षित, 01 एससी, 01 एसटी) के पदों की रिक्तियों (लेवल-6 पे-बैंड 9300-34800 + 4200) को भरने हेतु आवेदन मंगाए गए। अब इन पदों पर रिक्तियों को भरे जाने हेतु होने वाली लिखित परीक्षा दि. 06.08.2020, पत्र सं. ईसी/1025/34/1 भाग-४, दि. 15.07.2020 जारी की गयी है।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि रेलवे बोर्ड का पत्र सं. 2015-बी-235 दि. 19.06.2020 के पैरा-III (ए) के अनुसार “आउटसोर्सिंग गतिविधियों – विशेष रूप से ओबीएचएस, लिनन प्रबंधन, स्टेशन क्लीनिंग, लिफ्ट/एस्केलेटर्स मैनिंग और स्टेशन एनाउंसमेंट इत्यादि – की गंभीर रूप से समीक्षा जानी चाहिए और इस पर अंकुश लगाया जाना चाहिए” के आधार पर पूरे मंडल में स्टेशनों को क्लब करते हुए जोन बनाकर सभी स्टेशनों पर सफाई का कार्य ठेके पर देने के जो भी कॉन्ट्रैक्ट थे, वे सभी मंडल रेल प्रबंधक, कोटा द्वारा निरस्त कर दिए गए हैं।

इस हिसाब से जो ग्रुप ‘डी’ सफाई कर्मचारियों के पद सरेंडर किए गए थे, वे भी स्वत: रद्द होने चाहिए थे और जिन पदों को सरेंडर कर जो पद सृजित किए गए थे, वे भी स्वत: रद्द होने चाहिए थे। परंतु कोटा मंडल द्वारा ऐसा कुछ नहीं किया गया।

उपरोक्त नियम के अनुपालन में यथोचित कार्य न करके इन नियमों को ताक पर रखकर वाणिज्य निरीक्षकों के नए पदों के साथ रिक्तियों के लिए कथित रूप से निजी हित साधने हेतु यह परीक्षा करवाई जा रही है, जबकि उक्त नियमों के अनुपालन में पिछले दो सालों में सृजित किए पदों को भी सरेंडर किया जाना है।

बताते हैं कि इस कार्य हेतु फाइल चलाई भी गई परंतु नए सृजित वाणिज्य निरीक्षकों के पदों को डीसीएमआई मैन पावर प्लानिंग पर दबाव बनाकर और उससे लिखवाकर इन पदों को यथावत रखकर केवल कागजी कार्यवाही कर ली गई और इस पर पुनः वित्तीय सहमति लिया जाना उचित नहीं समझा गया तथा गंभीर अनियमितता को मूर्त रूप दिया जा रहा है।

कर्मचारियों का कहना है कि वास्तव में इन पदों के सृजन की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि प.म.रे. मुख्यालय जबलपुर द्वारा दिए गए आदेश में यह प्रावधान दिया गया है कि “यदि कोई पर्यवेक्षक के पद पर लेवल-7, पे-बैंड 9300-34800+4600 ग्रेड पे में हो और प्रशासन उसे अपनी आवश्यकता के अनुरूप वाणिज्य निरीक्षक के पद पर काम लेना चाहे, तो उस पर्यवेक्षक से वर्तमान रिक्ति पर वाणिज्य निरीक्षक का कार्य लिया जा सकता है। तथापि उस पर्यवेक्षक का कार्यकाल 5 वर्ष से अधिक का नहीं होगा।

कर्मचारियों का कहना है कि मुख्यालय का तत्संबंधी आदेश मंडल कार्मिक शाखा के पास अवश्य उपलब्ध होना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि इतनी लचीली पालिसी उपलब्ध होते हुए भी नए पदों के सृजन की आवश्यकता क्यों हो रही है? इसका सीधा मतलब यही निकल रहा है कि मनवांछित व्यक्ति को पदोन्नत करके मनवांछित लाभ कमाने के इरादे से इन सब नियमों को ताक में रखा जा रहा है।

कर्मचारियों ने बताया कि मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय का पत्र सं. ईसी/174/2 (मर्जर ऑफ सीसी/ईसीआरसी दि. 02.01.2019 के अंतर्गत मंडल के समस्त वाणिज्य कैडर, जिसमें बुकिंग, पार्सल, गुड्स, टिकट चेकिंग स्टाफ को मर्ज करने और री-पिन प्वाइंटिंग भी मनवांछित व्यक्ति को पद पर लाने और मनवांछित लाभ कमाने के इरादे से की गई है।

इसी के तहत जहां कोटा बुकिंग और पीआरएस में केवल दो पर्यवेक्षक (एक कैश और एक स्टोर्स) के पद सालों से थे, वहां पर 7-7 पद सृजित कर दिए, जबकि इनका न तो कोई औचित्य है और न ही आवश्यकता है, वहीं कई स्टेशनों पर पर्यवेक्षक के पदों की आवश्यकता है, वहां यह पद सृजित नहीं किये गए हैं।

उनका कहना है कि यदि नए पद सृजित करने ही थे, तो उससे पहले पैरा 6 में वर्णित प.म.रे. मुख्यालय के आदेश में दिए गए प्रावधान का विचार कर उसका लाभ उठाते हुए रेल राजस्व बचाया जा सकता था। परंतु ऐसा नहीं किया गया, क्योंकि फिर वही मनवांछित व्यक्ति को पद पर लाने और मनवांछित लाभ कमाने के इरादे से की जा कोशिश बाधित हो जाती।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि वर्तमान कोटा मंडल की वित्तीय शाखा द्वारा भी कार्मिक शाखा के उक्त 6 नए वाणिज्य निरीक्षकों के पदों के सृजन के औचित्य पर बिना कोई सवाल उठाए आंख मूंदकर वित्तीय सहमति दे दी गई। जबकि रेलवे बोर्ड के उपरोक्त दिशा-निर्देशों के अंतर्गत सफाई वालों के पदों के एवज में जो पद सृजित किए गए हैं, उनकी समीक्षात्मक जांच की जानी चाहिए थी, जो कि वित्तीय शाखा द्वारा नहीं की गई। यह घोर अनियमितता एवं सरासर रेलवे बोर्ड द्वारा जारी किए गए उपरोक्त निर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन है।

रेलवे बोर्ड के उक्त निर्देशों की अवेहलना का आलम यह है कि मंडल प्रशासन ने भी अपनी आंखें बंद कर ली हैं, क्योंकि ऐसा लगता है कि मंडल की कार्मिक, वाणिज्य, परिचालन, वित्त और अन्य शाखाओं में जो खुलेआम कदाचार चल रहा है उस पर मंडल प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं रह गया है।

उपरोक्त तमाम कदाचार की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए और इनकी उच्च स्तरीय जांच कराने के लिए कई कर्मचारियों ने महाप्रबंधक/प.म.रे. को एक ज्ञापन भी सौंपा है और उनसे मांग की है कि गुरुवार 6 अगस्त को होने जा रही परीक्षा को तुरंत रोका जाए।

इस ज्ञापन की प्रतियां उन्होंने वरिष्ठ उप महाप्रबंधक एवं मुख्य सतर्कता अधिकारी, प्रमुख मुख्य परिचालन प्रबंधक, प्रमुख मुख्य वाणिज्य प्रबंधक, प्रमुख मुख्य वित्तीय सलाहकार एवं मुख्य लेखाधिकारी, पमरे/जबलपुर को भी उचित कार्यवाही हेतु प्रेषित की हैं। क्रमशः 





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उत्तर मध्य रेलवे मुख्‍यालय में क्षेत्रीय राजभाषा कार्यान्‍वयन समिति की बैठक संपन्‍न

सभी विभागों, मंडलों और कारखानों द्वारा ई-आफिस में उपलब्ध हिंदी में कार्य करने की सुविधा को विकल्प नहीं, बल्कि संकल्प के तौर पर प्रयोग किया जाए -महाप्रबंधक

प्रयागराज ब्यूरो : महाप्रबंधक/उत्‍तर मध्‍य रेलवे राजीव चौधरी की अध्‍यक्षता में क्षेत्रीय राजभाषा कार्यान्‍वयन समिति की बैठक संपन्‍न हुई। इस ऑनलाइन बैठक में शामिल अधिकारियों को संबोधित करते हुए महाप्रबंधक चौधरी ने कहा कि राजभाषा की परंपरागत बैठक और उसमें होने वाली प्रत्यक्ष चर्चाओं और विचार-विमर्श का विशिष्ट महत्व है, लेकिन कोरोना वैश्विक महामारी के कारण प्रत्यक्ष सामूहिक बैठकों और कार्य-पद्धतियों में जो बदलाव आया है, उससे कार्य-प्रणाली में भी महत्वपूर्ण बदलाव आएगा।

उन्‍होंने कहा कि उत्तर मध्य रेलवे ने इन अत्यंत विषम परिस्थितियों में पूरी मुस्तैदी, समर्पण और निष्ठा के साथ गाड़ियों के संचालन की गतिशीलता बनाए रखी है और हमारे रेलकर्मी कोरोना वायरस की इस महामारी के विरुद्ध योद्धा की भूमिका निभा रहे हैं। इस दौरान सभी वीडियो संदेश और निर्देश हिंदी में ही जारी किए हैं। चिकित्सा, जनसंपर्क एवं अन्य विभागों द्वारा कोविड-19 से बचाव और रोकथाम के लिए जारी पोस्टर, दिशानिर्देश और सूचनाएं हिंदी में तैयार की गईं हैं।

महाप्रबंधक ने कहा कि महामारी के दौरान कार्यालयों में ई-आफिस का प्रयोग किया जा रहा है। ई-आफिस में हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का विकल्प है। उन्होनें सभी विभागों, मंडलों और कारखानों को ई-आफिस में उपलब्ध हिंदी में कार्य करने की सुविधा का, विकल्प नहीं, बल्कि संकल्प के तौर पर प्रयोग करने के निर्देश दिए, साथ ही इसमें हिंदी के मानक यूनिकोड, मंगल फांट का ही प्रयोग करने का सुझाव दिया।

बैठक में भारतीय भाषा, संस्कृति और साहित्य के उन्नायक गोस्वामी तुलसीदास तथा उपन्यास एवं कहानी सम्राट प्रेमचंद की जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित साहित्यिक संगोष्ठी में अपने विचार व्यक्त करते हुए महाप्रबंधक राजीव चौधरी ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास और प्रेमचंद के साहित्य मानवता एवं उच्चादर्शों का संदेश देते हैं। ये दोनों ही महामानव ऐसे साहित्य सर्जक हैं, जिनकी रचनाएं कठिन और प्रतिकूल परिस्थितियों में उम्मीद की रोशनी दिखाती हैं तथा व्यक्ति और समाज का सम्यक पथ प्रदर्शन करती हैं। बैठक के प्रारंभ में महाप्रबंधक द्वारा गोस्‍वामी तुलसीदास और मुंशी प्रेमचंद के चित्र पर माल्‍यार्पण किया गया।

बैठक के प्रारंभ में मुख्‍य राजभाषा अधिकारी एवं प्रधान मुख्‍य वाणिज्‍य प्रबंधक महेन्‍द्र नाथ ओझा ने समिति को अवगत कराया कि प्रयागराज में आयोजित माघ मेला के दौरान मेला क्षेत्र में स्थित उत्‍तर मध्‍य रेलवे के शिविर में राजभाषा के प्रयोग-प्रसार तथा महात्‍मा गांधी के जीवन दर्शन एवं प्रेरक विचारों से संबंधित चित्र प्रदर्शनी लगाई गई। पिछली तिमाहियों में छह हिंदी कार्यशालाएं आयोजित की गईं और कंप्‍यूटर हिंदी कुंजीयन प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवधि के दौरान कई प्रसिद्ध साहित्‍यकारों की जयंतियों के अवसर पर साहित्यिक संगोष्ठियों का भी आयोजन किया गया।

मुख्‍य राजभाषा अधिकारी एम. एन. ओझा ने गोस्‍वामी तुलसीदास और मुंशी प्रेमचंद के साहित्‍य के महत्वपूर्ण पक्षों पर चर्चा करते हुए कहा कि गोस्‍वामी तुलसीदास भारतीय साहित्य के संरक्षक थे और उन्होने जन-जन के हदय में राष्ट्र गौरव एवं राष्ट्रीय अस्मिता की पावन भावना का संभरण किया। उन्होंने कहा कि तुलसीदास के रामराज्य में किसी भी प्रकार के दैहिक, दैविक एवं भौतिक संतापो और बाधाओं की व्‍याप्ति नहीं होती। रामराज्‍य की परिकल्‍पना नैतिक मूल्‍यों और सामाजिक मानदंडों से अनुप्राणित है।

ओझा ने कहा कि प्रेमचंद पहले वास्‍तविक कथा सम्राट हैं, क्‍योंकि इसके पूर्व तिलस्‍मी और ऐयारी प्रधान कथा साहित्‍य ही रचे जाते थे। प्रेमचंद का कथा साहित्‍य आदर्श से यथार्थ की ओर प्रस्‍थान का साहित्‍य है। प्रेमचंद का मानना था कि साहित्यिक सौंदर्य चेतना की कसौटी को बदलना चाहिए और साहित्‍यकारों को श्रम के स्‍वेद की महत्‍ता पर अपनी लेखनी चलानी चाहिए। ओझा के अनुसार तुलसीदास और प्रेमचंद दोनों का साहित्‍य अन्‍याय और अत्‍याचार के वि‍रुद्ध उठाई गई सशक्‍त आवाज है।

बैठक में अपर महाप्रबंधक रंजन यादव सहित सभी प्रधान विभाग प्रमुख, मंडलों के अपर मंडल रेल प्रबंधक, कारखानों के मुख्‍य कारखाना प्रबंधकों एवं अन्‍य सदस्‍य अधिकारियों ने वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से भाग लिया। सभी अधिकारियों ने अपने-अपने कार्यालयों में हो रही राजभाषा प्रगति से महाप्रबंधक को अवगत कराया। बैठक का संचालन वरिष्‍ठ राजभाषा अधिकारी चंद्रभूषण पांडेय ने किया तथा उप मुख्‍य राजभाषा अधिकारी शैलेंद्र कुमार सिंह ने धन्‍यवाद ज्ञापित किया।





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