विडंबना और विसंगति के मारे रेलवे के जनसंपर्क अधिकारी बेचारे!

भारतीय रेल के जनसंपर्क अधिकारियों की दुर्दशा पर एक नजर

सुरेश त्रिपाठी

भारतीय रेल आज जिस ऊंचाई पर है, आए दिन जिसका सोशल मीडिया तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बहुत सारा प्रचार-प्रसार होता है, इसके पीछे रेलवे में कार्यरत जनसंपर्क अधिकारियों की लगन और मेहनत का बहुत बड़ा योगदान है। रेलमंत्री तथा रेल मंत्रालय के सोशल एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर प्रचार-प्रसार से सभी अच्छी तरह वाकिफ हैं, जिसे बहुत सराहा जाता है। विशेषकर प्रधानमंत्री द्वारा भी इन सभी की तारीफ की गई है।

यह सब रेलवे के जनसंपर्क अधिकारियों की देन है, जो कि अपना पूरा समय और जीवन भर रेलवे के लिए काम करते हैं तथा पूरी नौकरी के दरम्यान अपना घर-परिवार सब कुछ भूलकर भारतीय रेल के लिए प्रचार माध्यम पर दिन-रात कार्यरत रहते हैं। परंतु उन्हें अत्यंत मानसिक पीड़ाओं एवं जिल्लतों का सामना करना पड़ता है। यह बात मीडिया सहित शायद रेल प्रशासन और रेलमंत्री के संज्ञान में नहीं है।

जनसंपर्क अधिकारी, जो कि ग्रुप ‘बी’ में आते हैं, भारतीय रेल के अधिकारी होने के बाबजूद रेलवे ने आज तक इनके लिए कुछ नहीं किया। विडंबना यह है कि आज तक इन अधिकारियों का एक कैडर भी नहीं बनाया जा सका है, जिससे कि उन्हें नौकरी के दौरान यथोचित पदोन्नति मिल पाती। सब जानते हैं कि रेलवे में सभी विभागों के अधिकारियों का अपना कैडर है, यहां तक कि राजभाषा एवं आईटी विभाग के ग्रुप ‘बी’ अधिकारी भी 15 से 17 सालों में, उप मुख्य राजभाषा अधिकारी तथा सीनियर ईडीपीएम तक बन रहे हैं।

अधिकांश जनसंपर्क अधिकारी, जिन्होंने 20 से 22 वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया है, उन्हें अभी तक ग्रुप ‘ए’ का दर्जा तक नसीब नहीं हो पाया है। जब उन्हें ग्रुप ‘ए’ ही नहीं मिल पाता, तो प्रमोशन मिलने का सवाल ही पैदा नहीं होता। इसीलिए कोई भी जनसंपर्क अधिकारी, मुख्य जनसंपर्क अधिकारी नहीं बन पाता। सिर्फ कुछ गिने-चुने लोगों को सीनियर स्केल में, वह भी एडहॉक, पदोन्नति मिल पाई है।

वहीं इसके विपरीत भारतीय रेल के सभी जोनों तथा उत्पादन इकाईयों के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी, जिनका जनसंपर्क से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं, जैसे कि ट्रैफिक सर्विस, स्टोर्स सर्विस, इलेक्ट्रिकल एवं मैकेनिकल सर्विस के अधिकारियों को मुख्य जनसंपर्क अधिकारी में पदस्थापित किया जाता है और उनके हिसाब से रेलवे का जनसंपर्क विभाग कार्य करता है।

यहां यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह अधिकारी जिसने कभी भी जर्नलिज्म, मास मीडिया एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं पढ़ी, वह उन जनसंपर्क अधिकारीयों को, जिन्होंने यह सब पढ़ा-कढ़ा होता है और इसकी डिप्लोमा-डिग्री भी ली हुई होती है, उन्हें वे जनसंपर्क का पाठ पढ़ाते हैं और निर्देश देते हुए कहते हैं कि “आप लोगों को कुछ नहीं आता! जो हम बोल रहे हैं, वही करिए!” इससे रेलवे के जनसंपर्क विभाग और अधिकारियों का मनोबल रसातल में चला जाता है।

इन विषम परिस्थितियों में भी जनसंपर्क अधिकारी  निष्काम भाव से रेलवे की छवि बनाता है और अपना काम यथासंभव सुचारू रूप से करने का प्रयास करता रहता है। माना कि कुछ जनसंपर्क अधिकारी आजकल के सोशल मीडिया प्रचार के आदी नहीं हैं, लेकिन वे इन सभी को पूरी तरह से सीख कर आधुनिक प्रजन्म के टूल्स अपनाते हुए रात-दिन लगे हुए हैं।

लेकिन जब कोई काम बिगड़ता है, अथवा जाने-अनजाने कहीं कोई गलती होती है, तो इन्हीं जनसंपर्क अधिकारियों को बोला जाता है कि “डैमेज कंट्रोल करो।” वाह, क्या नियम-कानून है रेलवे का। जब अच्छा होता है, तो मुख्य जनसंपर्क अधिकारी अच्छा और काबिल है! और अगर बिगड़ता है या कुछ खराब होता है, तो जनसंपर्क अधिकारी नालायक एवं निकम्मा है। इससे यह उजागर होता है कि रेलवे में जनसंपर्क विभाग कैसे कार्यरत है।

यहां एक उदाहरण देखें, हाल ही में एक मंडल में पहली श्रमिक स्पेशल ट्रेन के संचालन की योजना बनी। इसके लिए जो प्रेस विज्ञप्ति तैयार की गई उसमें संबंधित जोन के जीएम और मंडल के डीआरएम सहित सभी संबंधित ब्रांच अधिकारियों के योगदान और प्रयासों को समाहित किया गया। इस विज्ञप्ति को संबंधित ग्रुप ‘ए’ ब्रांच अधिकारी ने ‘ओके’ भी कर दिया।

जब यह विज्ञप्ति प्रेस को भेजी जाने वाली थी, तभी किसी चापलूस रेलकर्मी ने उक्त मंडल के एक प्रभावशाली नेता, जो कि सरकार में उच्च सम्मानित पद पर हैं और उस समय वह उक्त मंडल स्थित अपने आवास पर भी नहीं, बल्कि दिल्ली में थे, जिनका उक्त ट्रेन के चलने से दूर-दूर तक कोई प्रयास या सरोकार नहीं था, के कार्यालय को वह विज्ञप्ति फारवर्ड कर दी। नेता जी के कार्यालय से तुरंत डीआरएम और जीएम को फोन आ गया कि उनके नाम और योगदान का उल्लेख किए बिना ऐसी विज्ञप्ति जिसने बनाने की हिम्मत की है, उसे तुरंत निलंबित करके मेजर पेनाल्टी चार्जशीट दी जाए।

अब सभी अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। वह ग्रुप ‘ए’ अधिकारी महाशय, जिन्होंने उक्त विज्ञप्ति को ‘ओके’ किया था, अपनी बात से फौरन मुकर गए और सारा दोष विज्ञप्ति बनाने वाले जनसंपर्क कर्मचारी पर मढ़ दिया। परिणामस्वरूप उक्त कर्मचारी को मेजर पेनाल्टी चार्जशीट देने का आदेश हो गया और इसकी फीडबैक नेता जी के कार्यालय को देकर अपनी-अपनी खाल बचाई गई। रीढ़विहीन रेल प्रशासन का यह एक छोटा सा उदाहरण है, जबकि ऐसी रीढ़हीनता के ऐसे सैकड़ों-हजारों उदाहरण रेलवे में भरे पड़े हैं।

अब अगर रेलवे बोर्ड की ही बात करें, तो अन्य विभागों के ग्रुप ‘ए’ अधिकारी ही जनसंपर्क का पूरा कार्य देख रहे हैं। बोर्ड में इंफर्मेशन सर्विस के रिटायर्ड अधिकारियों को रखा गया है, जिससे कि उनकी कुछ न कुछ रोजी-रोटी चलती रहे। भारतीय रेल की जोनल रेलों तथा उत्पादन इकाईयों में पहले से ही जनसंपर्क विभाग है तथा बड़ी सरलता एवं सहजता से प्रचार-प्रसार का कार्य हो रहा है। उनके यहां से रोज-रोज प्रेस विज्ञप्ति तथा अन्य प्रचार का कार्य जोर-शोर से चलता रहता है।

परंतु रेलवे बोर्ड के अकुशल मीडिया मैनेजरों द्वारा सभी जोनल एवं उत्पादन इकाईयों के जनसंपर्क अधिकारियों को निर्देश दिए जाते हैं कि वे उनके द्वारा बताए गए तरीकों पर प्रचार करें तथा अपनी डेली रिपोर्ट भेजें, जिसे वे मंत्रीजी को पेश करेंगे। सोशल मीडिया पर रोज टविट् और रीट्विट् करने को कहा जाता है। लेकिन यह सब वह रेलवे बोर्ड से नहीं कर सकते। मतलब यह कि काम दूसरे लोग करें और रेलवे बोर्ड में बैठकर यह तथाकथित मीडिया मैनेजर उसका क्रेडिट लेते रहें। रेलवे बोर्ड में मीडिया मैनेजर बनकर ऐसे लोग प्राइवेट एजेंसीज द्वारा काम चलाकर अपना नाम कमा रहे हैं। उनका रेलवे की छवि और प्रचार-प्रसार से कोई लेना-देना नहीं है। सिर्फ एजेंसियों को देखना है कि किससे कितना फायदा होगा, बस उसी से काम करवाना है।

बिगड़ा हुआ है रेलवे बोर्ड जनसंपर्क का पूरा तंत्र

जनसंपर्क अधिकारियों ने अपनी पदोन्नति के लिए क्या नहीं किया। कैट में केस किया, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक गए। वहां से सभी निर्णय उनके पक्ष में भी आए। परंतु रेलवे बोर्ड के अधिकारियों और तथाकथित मीडिया मैनेजरों को यह बात बर्दास्त नहीं हुई। कुछ जनसंपर्क अधिकारियों को किसी न किसी बहाने इसके लिए दंडित भी किया गया कि उन्होंने केस क्यों किया। कुछ को प्रमोशन दिया, परंतु चार्ज लेने नहीं दिया गया। उनके रिटायरमेंट का इंतजार किया गया।

कुछ वर्ष पहले सारे जनसंपर्क अधिकारियों को ट्रैफिक सर्विस के साथ मर्ज किया गया था। इसके लिए रेलवे बोर्ड स्तर पर तत्कालीन एएम/कमर्शियल आर. डी. शर्मा की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन भी किया गया था। इस कमेटी ने मर्जर की सभी मॉडेलिटीज और सेलेक्शन प्रोसेस भी तैयार करके अपनी रिपोर्ट मर्जर के पक्ष में दाखिल की थी। परंतु ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों के जोनल संगठनों से ही शिकायत करवाकर इसके केंद्रीय संगठन द्वारा इस मर्जर को रुकवा दिया गया, जिसमें इसके होनहार अध्यक्ष एवं महामंत्री की देन से सभी विभागों के ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों के लिए प्रमोशन के लिए संग्राम होता है। परंतु जनसंपर्क अधिकारियों के लिए नहीं।

विडंबना यह है कि जो ग्रुप ‘सी’ कर्मचारी 1998 में ग्रुप ‘बी’ अधिकारी बने थे, वह आज की तारीख में सेलेक्शन ग्रेड के ग्रुप ‘ए’ अधिकारी बने हुए हैं। ट्रैफिक वालों को 15/18 सालों में, स्टोर्स वालों को 16/17 सालों में, एकाउंट्स वालों को 18 सालों में, इलेक्ट्रिकल वालों को 15 सालों में तथा मैकेनिकल वालों को 15 सालों में ग्रुप ‘ए’ मिल जाता है। रेलवे में यह कितनी बड़ी विडंबना और विसंगति है कि जहां खलासी/हेल्पर से चतुर्थ श्रेणी में भर्ती हुआ कोई कर्मचारी अपने पैसे और पहुंच के बल पर देखते-देखते सेलेक्शन ग्रेड और सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड (एसएजी) तक पहुंच जाता है, वहीं जनसंपर्क अधिकारियों को बीस-पच्चीस सालों तक सीनियर स्केल तक भी नसीब नहीं हो पाता!

यदि देखा जाए तो रेलवे में लगभग 50/60 ही ग्रुप ‘बी’ के जनसंपर्क अधिकारी होंगे। पीयूष गोयल के रेलमंत्री बनकर आने के बाद से रेलवे की कार्य प्रणाली में काफी बदलाव हुए हैं। एक ओर कैडर रिस्ट्रक्चरिंग की बात हो रही है, तो दूसरी ओर सभी अधिकारियों और कर्मचारियों के हित के लिए रेलवे में मूलभूत परिवर्तन किए जा रहे हैं। लेकिन रेलवे बोर्ड में बैठे महानुभाव लोग सिर्फ जनसंपर्क अधिकारियों का शोषण कर रहे हैं और बदले में पूरे के पूरे जनसंपर्क अधिकारियों की जमात को एक सिरे से खत्म करने की जुगत भिड़ा रहे हैं।

इसका मूलभूत कारण यह समझ में आता है कि कैडर रिस्ट्रक्चरिंग होने के बाद से नीचे के अधिकारियों के पद कम हो गए और ऊपर के अधिकारियों के पद ज्यादा बना लिए गए हैं। ऊपर में अधिकारियों के पास कोई काम नहीं होता, सिर्फ पद होता है। इसीलिए उनको दूसरों का काम करने की चाहत जागती है। ऐसे अधिकारी, जो अपने कैडर में किसी काम के लायक नहीं रहते, उन्हें दूसरे के काम ज्यादा लुभावने लगते हैं। ऐसे में बड़े अधिकारियों की सिफारिश पर अपने लिए मुख्य जनसंपर्क अधिकारी का पद प्राप्त करते हैं और मीडिया में रहने के लिए पहले से कार्यरत जनसंपर्क अधिकारियों का शोषण करने में जुट जाते हैं।

यही हाल रेलवे बोर्ड का भी है। दिल्ली में स्टूल-पोस्टिंग तक लेने के लिए और किसी भी पद पर कार्य करने की तैयारी दर्शाकर सिफारिश कराई जाती है। इसीलिए मक्खियां मारते बैठे हैं 5/6 साल से कुछ लोग। कुछ तो रिटायरमेंट के बाद भी बकायदा अपनी रोटी सेंक रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि उनको रेलवे बोर्ड में बैठकर उन्हें सिर्फ अपना ही उल्लू सीधा करना है। वर्षों से शोषित-पीड़ित जनसंपर्क अधिकारियों के कैरियर और भविष्य की उन्हें कोई चिंता नहीं है।

जोनल रेलों में सभी मुख्य जनसंपर्क अधिकारी तथा उत्पादन इकाईयों में कार्यरत जनसंपर्क अधिकारी, उप महाप्रबंधक या महाप्रबंधक के सचिव, जो कि डिफेक्टो मुख्य जनसंपर्क अधिकारी ही होते हैं, ये सब मिलकर बोर्ड में बैठे मीडिया मैनेजरों के साथ मुख्य धारा से जुड़े रहते हैं और रेलवे के विचार को प्रवक्ता के हिसाब से मीडिया में संप्रेषित करते हैं। इससे वे मीडिया में लगातार बने रहते हैं। शायद यही आकर्षण उन्हें मुख्य जनसंपर्क अधिकारी बनने के लिए प्रेरित करता है।

उपरोक्त तमाम तथ्यों से यह पता चलता है कि इन्हीं सब कारणों से भारतीय रेल में कार्यरत ग्रुप ‘बी’ जनसंपर्क अधिकारियों में भारी रोष व्याप्त है, जिनको उनका वाजिब हक आज तक नहीं दिया गया है। भारतीय रेल में कार्यरत सभी अधिकारियों में अगर कोई सबसे उपेक्षित, शोषित और पीड़ित वर्ग है, तो वह जनसंपर्क अधिकारी का है, जो गिनती में बमुश्किल 50 या 60 ही होंगे। परंतु पूरी भारतीय रेल के प्रचार-प्रसार की बागडोर को बखूबी संभाले हुए हैं। मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (ग्रुप ‘ए’) तो भिन्न कैडर से और भिन्न प्रकार से आते हैं तथा दो-तीन वर्षों में चले जाते हैं। परंतु जनसंपर्क अधिकारी जोनल रेलों तथा उत्पादन इकाईयों में जनसंपर्क का कार्य लगातार निभाते रहते हैं।

उम्मीद की जाती है कि रेलमंत्री एवं अध्यक्ष, रेलवे बोर्ड, अपना कुछ कीमती समय निकालकर रेलवे में कार्यरत जनसंपर्क अधिकारियों की फजीहत को थोड़ा समझेंगे और इस भारी विसंगति का निवारण करने का यथोचित प्रयास करेंगे। 





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“मेरा भारत महान” – RailSamachar

डाॅ. रवीन्द्र कुमार

अमेरिकन एयरलाइन्स में प्रति विमान 128 कर्मचारी हैं और मेरे भारत महान की महान एयरलाइन्स में प्रति विमान कुल 588 कर्मचारी। एक से बढ़कर एक महान भारतीय कर्मचारी। मंत्री महोदय ने यह खुलासा किया है। इस खुलासे को अखबारों ने चटखारे ले लेकर मुख पृष्ठ पर छापा। इसमें ताज़्ज़ुब कैसा!

अमरीका में तो बंदे हैं ही नहीं और ‘मेरा भारत महान’ इस मामले में हीरो नंबर वन है। भला अमरीका क्या खा के हम एक सौ बत्तीस करोड़ भारतीयों का मुक़ाबला करेगा! अमरीका में सब काम ऑटोमेटिक है। हमारे देश में ऑटोमेटिक चीजें चलाने, बंद करने, और उनके रख-रखाव, निगरानी करने को भी ढ़ेर सारे लोग रखने पड़ते हैं।

सरकारी मकान में बल्ब बदलने को भी तीन आदमी एकसाथ जाते हैं। एक रौब-दाब वाला सुपरवाइजर। एक बल्ब का झोला पकड़े रहता है और तीसरा सीढ़ी उठाकर चलता है। तो ये ठाठ हैं। अब क्या अमरीका वाले ऐसे ठाठ कर सकते हैं! वो तो ये ‘एफोर्ड’ ही नहीं कर सकते।

कहते हैं वहां के डिपार्टमेंटल स्टोर्स में भी सैल्फ सर्विस है। हमारे यहां सरकारी सुपर बज़ार में भी सैल्फ सर्विस रखी थी। मगर हिंदुस्तानियों ने उसका गलत मतलब निकाल लिया। उसके चलते इतनी सैल्फ सर्विस की, कि तमाम सुपर बाजार को अपने घर ही ले गए. सुपर बाजार वाले नारा ही ऐसा देते थे ‘सुपर बाज़ार – अपना बाजार’!

सुपर बाजार नुकसान में जाते-जाते तबाह हो गए। अब सरकार उनका निजीकरण करेगी। सुपर बाजार वाले जो न जाने कब से उसका निजीकरण करे बैठे थे, अब इसका विरोध कर रहे हैं।

विरोध तो पर्यटन विकास निगम वाले भी कर रहे हैं कि निजीकरण करना ठीक नहीं। फिर उनके ‘विकास’ का क्या होगा! उनके एक होटल में सरकारी अमला है पांच सौ का, और गेस्ट हैं पांच। यानि कि पर गेस्ट सौ कर्मचारी अतिथि की सेवा में रहते हैं। हों भी क्यों न! भारत में अतिथि सेवा की एक दीर्घ परम्परा जो है – अतिथि देवो भव! ये बात अमरीका वाले सौ जनम में भी नहीं समझ सकते। वो तो बस पीठ पर अपना सामान लादे-लादे भिखारियों की तरह दुनिया घूमते-फिरते हैं।

136 तरह के तेल-शैम्पू और 256 तरह के साबुन बापरने के बाद जो ‘मिस यूनिवर्स’ और ‘मिस वर्ल्ड’ निखर कर आ रही हैं, उनसे जो मार्किट चलनी थी, सो चल ली। अब किसी दिन लेटेस्ट एड आएगा कि मैं पेप्सी से नहाती हूं या फिर कोकाकोला से सिर धोती हूं। इससे न केवल बाल रेशमी, घने मुलायम रहते हैं, बल्कि ताजगी भी पहुंचती है. ठंडा-ठंडा यानि कोकाकोला!

बहुराष्ट्रीय कम्पन्यां जल्द ही हवा और पानी पर अपना कब्जा कर लेंगी। पानी पर तो एक तरह से कर ही लिया है। छोटी बोतल, मीडियम बोतल, बड़ा जार के बाद अब छोटी-छोटी दो घूंट पानी वाले सेशै भी मार्किट में उतरेंगे, ताकि झोंपड़-पट्टी वाले भी आठ आने में ये ‘मिनरल वाटर’ पी सकें। साफ पानी पर उनका भी तो कुछ हक बनता है।

जिस तरह पानी के बड़े-बड़े जार की सप्लाई दफ्तरों में होती है, उसी तरह ऑक्सीजन के सिलेंडर घर-घर जाया करेंगे। कुकिंग गैस के सिलेंडर के साथ हरे-हरे रंग के बायो-फ्रेंडली क्यूट से ब्रीदिंग सिलेंडर। घर भर के लिए महीने भर का ऑक्सीजन का कोटा। पड़ोसनें एक-दूसरे से कहेंगी “बहन ! एक सिलेंडर स्पेयर में पड़ा है क्या?” बच्चों के लिए छोटे-छोटे स्वीट से मिनी सिलेंडर चलेंगे, जिसे वो वॉकमैन की तरह लटकाए-लटकाए फिरेंगे।

इन दिनों “स्वदेशी” नारे का क्या हुआ? अब सुनाई नहीं पड़ता। दरअसल स्वदेशी की आड़ में इतनी विदेशी कंपनियां आ गई हैं कि बस कुछ मत पूछो। कौन सा क्षेत्र है जिसमें वो नहीं घुसी हुईं।पैन-पेंसिल, कच्छा-बनियान, जूते-चप्पल, साबुन-तेल आदि। जल्द ही अब वो कुल्हड़, पत्तल, छप्पर, भूसा, गन्ने का रस, गुड़ सब का उत्पादन करने लगेंगी।

लोग शान से बताया करेंगे कि फलां की शादी में स्वीडन के कुल्हड़ में चाय मिली थी। हमने अपनी बिटिया की शादी में जापान से पत्तलें मँगवाई थीं। हमारी गाय, भूसा सिर्फ “मेड इन जर्मनी” ही खाती है। ऐसा दूध देती है कि एक लोटा पीते ही हम लोग फर्राटेदार जर्मन बोलने लगते हैं। दुनियां इसी का नाम है। पहले देश का मंडलीकरण हो रहा था। फिर कमंडलीकरण और अब भूमंडलीकरण हो रहा है। आप पानी गंगा का नहीं वोल्गा का पियें। वो भी 120/- फी गिलास। गुड़ आप यूपी का नहीं यूके का खायें और इतरायें “हाऊ स्वीट यार”।

अब तो भिखारी भी ट्रेफिक सिग्नल पर एक-दूसरे से मोबाइल पर बात करते हैं। ”ये जो नीले रंग की गाड़ी आयेली है, उसे जाने दे भिडू, उससे माँगने का नहीं, अपुन लियेला है”।

पहले फिल्मों में एक-आध रील भी विदेश की होती थी तो जोर-शोर से प्रचार किया जाता था। ‘एराउंड द वर्ल्ड’ का विज्ञापन मुझे याद है – “राजकपूर ने 8 डॉलर में दुनिया देखी आप सवा रुपये में देखिये”। अब विज्ञापन और सीरियलों की शूटिंग भी विदेश में होती है। अब सीरियलों की भली चलाई। सभी सीरियल्स के नाम, कहानी, पात्र, घर सब एक से, और वही एक से लिपे-पुते चेहरे, रोना-धोना।

आने वाले कुछ सीरियल्स के नाम ये भी हो सकते हैं-

“ननद भी कभी भाभी बनेगी”

“भांजी भी किसी की मामी है”

“मैंने प्यार किया मिस यूनिवर्स से”

“हम आपकी सोसायटी में रहते हैं”

“देश में गई होगी बिजली सप्लाई”

“हाय दैया, हाय राम”

राम से याद पड़ते हैं गांधी, गांधीवाद और रामजन्म भूमि विवाद, पर वो किस्सा फिर कभी।

#DrRavindraKumar, रिटायर्ड #IRPS, सुप्रसिद्ध साहित्यकार और व्यंग्यकार हैं।








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एक श्रेष्ठ व्यंग्य संग्रह ‘मेरा इनाम वापस लो’ – RailSamachar

‘मेरा इनाम वापस लो’ प्रतिष्ठित व्यंग्यकार लेखक और बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. रवीन्द्र कुमार का यह मात्र एक व्यंग्य संग्रह ही नहीं है, वरन हमारे समाज, देश, दुनिया, संस्कारों, पीढ़ियों के व्यवहारगत परिवर्तन का एक विस्तृत आलोकन भी है, जिसमें यह सोचना पड़ता है कि क्या कोई महत्वपूर्ण विषय छूटा भी है? मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों का जैसा जीवंत, रोचक चित्रण इस संग्रह की व्यंग्य रचनाओं में है, उससे डॉ. रवीन्द्र कुमार की समाजिक जीवन के प्रति गहरी एवं पैनी दृष्टि सभी लेखों में दृष्टिगोचर होती है।

साहित्य की विधाओं में गद्य लेखन कठिन माना गया है। ‘गद्य कवीनां निकंष वदंति’ के अनुसार गद्य लेखन में लेखक की प्रतिभा का आकलन बेहतर तरीके से हो सकता है। गद्य लेखन में, व्यंग्य-लेखन तुलनात्मक रूप से अधिक चुनौती भरा है। डॉ. रवीन्द्र कुमार के विषय हमारे आसपास बिखरे पड़े हैं, वे उन पर पैनी नजर रखते हुए समाज को आगाह भी करते हैं।

विषयों का ऐसा विस्तृत फ़लक उनके लेखों/रचनाओं/व्यंग्य में है, जिनकी बानगी यत्र-तत्र-सर्वत्र मिलेगी। प्रशासन, क्रिकेट, राजनीति, सरकारें, राजभाषा, भ्रष्टाचार, साक्षात्कार, फारेन रिटर्न, शिक्षा नीति, वेतन आयोग, सरकारी कार्यालय, अंग्रेज़ियत, भाषा नीति, जीवन शैली आदि आदि सभी क्षेत्रों पर माइक्रोस्कोपिक विश्लेषण इस संग्रह में सुलभ है। “बिन चमचा सब सून” में कार्यालयों में चमचागीरी पर पैनी दृष्टि डाली गई है।

“…चमचागीरी एक महत्वपूर्ण कला है… नौकरी के दौरान कदम-कदम पर आपको चमचों और उनकी कला से दो-चार होना पड़ता है। दफ्तरों में विदाई समारोह बड़े जोर-शोर से आयोजित किए जाते हैं। आपका विदाई समारोह हो तो भाषण सुनकर आपको वाकई लाग्ने लगता है कि आप कितने महान हैं और ये लोग अब कैसे जिएंगे? घबराएँ नहीं…. अपने अफसर की बदली या विदाई के समय चमचों की दशा बहुत दयनीय हो जाती है। यद्यपि तजुर्बेकार चमचे ऐसे भौतिक परिवर्तनों से घबराया नहीं करते।” (पृष्ठ 49)

सरकारी ज़मीन हड़पने वालों पर लेखक की दृष्टि जाती है – “ये पार्क शहर की सुरक्षा, समाज की सुरक्षा के लिए खतरा हैं। रात-बिरात अपराध, दिन में चरस-गाँजा, असामाजिक तत्व ही इसका प्रयोग करते पाये गए हैं। शाम ढलते-ढलते ज़रूर कभी-कभार वृद्ध लोग और सास-बहू सीरियल की सासें मजमा जमा लेती हैं…. कोई काम-धाम है या नहीं। भला हो आपका आपने ये पार्क घेर लिए।” (पृष्ठ 189)

अभी हाल में अवकाश प्राप्त हुए सरकारी सेवकों का चित्रण रोचक बन पड़ा है “अब आप समाचार पत्र पढ़ते नहीं हैं, बल्कि पूरा का पूरा चाट लेते हैं। एक-एक विज्ञापन तक पढ़ डालते हैं। आज शाम को क्या पकेगा? इस विषय पर आप सेमीनार तक कर सकते हैं। कहीं कोई समारोह हो, फंक्शन हो, आप सदैव जाने को तत्पर रहते हैं। वो बात दीगर है कि जबसे पता लगा है कि आप रिटायर हो गए हैं… इन्वीटेशन भी बहुत कम हो गए हैं।” (पृष्ठ 144)

इस व्यंग्य संग्रह के नाम वाली व्यंग्य रचना पुरस्कारों के वापस करने का रोचक और चुटीला चित्रण करती है। “आजकल इनाम लौटाने की होड़ लगी हुई है। मैंने भी सोचा मेरे पास भी एक दो इनाम हैं, भले साहित्य के न सही। दरअसल मेरे इनाम आलू दौड़ और तीन टांग दौड़ के हैं, स्कूल के टाइम के। आखिरकार इनाम तो इनाम हैं और उन्हें वापस करने में मुझे वैसी ही गरिमा और प्रतिष्ठा का एहसास कराना सरकार का कर्तव्य है जैसा कि वह अन्य साहित्यिक रचयिताओं को करा रही है। प्राइम टाइम में इस पर बहस होनी चाहिए। मैं चाहता हूँ कि पात्रा हों या गोस्वामी, रवीश हों या अभिज्ञान, सब दो-चार दिन गला फाड़-फाड़कर मेरा ही ज़िक्र करें।” (पृष्ठ 270)

मिलावटखोरी तथा नकली सामानों की समस्या लेखक को विचलित करती है, “नकली से निजात नहीं। मिलावटी दूध से, नकली चाय से आपका दिन शुरू होता है। नकली मिर्च-मसालों में बना नकली अंडों के नाश्ते को खाने के बाद आप मिलावटी पेट्रोल के अपने वाहन में दफ्तर पहुँचते हैं। नकली टूथपेस्ट, नकली साबुन से धुले-धुलाये, मिलावटी अन्न-दाल खाकर आप बीमार पड़े, डॉक्टर के पास भागे जाते हैं। आपकी किस्मत से डॉक्टर अगर नकली नहीं है, तो दवाई जरूर नकली है। यहाँ तक कि इन सबसे तंग आकर अगर आप आत्महत्या भी करना चाहें, तो उतना आसान नहीं है। रस्सी टूट सकती है। (आपके वजन से नहीं, नकली है इसलिए) जहर खाकर भी आप बच सकते हैं। …तो देखिये, नकली का कितना बोलबाला है। नकली मेकअप, आभूषण पहनकर आधुनिकायेँ अच्छी-अच्छी सुंदरियों को भी मात दे देती हैं। ब्यूटी पार्लर तो नकली की नींव पर ही खड़े हैं। विग, भवें, नाखून, बोलो जी क्या-क्या खरीदोगे। …तरक्की करते-करते अब तो हम उस स्टेज पर आ गए हैं कि एक दिन पड़ोसी के बड़े ज़ोर से पेट में दर्द हुआ, बार-बार बाथरूम को दौड़े जाते थे, पता चला कि उन्होने कहीं से एक गिलास शुद्ध दूध पी लिया था और तभी से तबीयत खराब हो गई, आखिर शरीर को आदत जो न थी।” (पृष्ठ 25)

व्यंग्य की विधा में भी ललित लेख, लिखने में डॉ. रवीन्द्र कुमार समर्थ हैं। उसमें व्यंग्य का तड़का उसे और भी आनंदवर्धक बना देता है। लेखक निंदा पर लिखते हैं, “निंदा का हमारे देश में ऐतिहासिक महत्व है। हमारे ऋषि-मुनि भी कह गए हैं, “निंदक नियरे राखिए…” पर निंदा रस सभी रसों में सर्वोपरि है। आप कह सकते हैं कि निंदा रस सभी रसों का राजा है। निंदा ने यह पदवी, श्रंगार रस को पदच्युत करके हासिल की है। निंदा से बड़ा आत्मिक संतोष मिलता है और दोनों के मनो-मस्तिष्क में स्फूर्ति सी छा जाती है। दोनों यानि कि करने वाले और सुनने वाले दोनों के। वह भी बिना हींग फिटकरी के। दो निंदक जहां इकट्ठे हो जाएँ, वहाँ तो समझो दीवाली जैसे पटाखे फूटने लगते हैं। प्राय: भारत में जिस प्रकार सभी धर्मों के अनुयायी पाये जाते हैं, उसी प्रकार के निंदनीय से निंदनीय निंदक प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। फिर भी प्रमुखत: पड़ोसी-निंदक, रिश्तेदार निंदक, बॉस निंदक आपको सभी मौसमों और प्रदेशों में मिलेंगे।” (पृष्ठ 284)

“मुहावरे इक्कीसवीं सदी में“ में कुछ प्रचलित मुहावरों— ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता’, ‘एकता में शक्ति’, ‘नाच न जाने आँगन टेढ़ा’, ‘आज नकद कल उधार’, ‘सस्ता रोये बार-बार महंगा रोये एक बार’ और ‘नेकी कर कुएं में डाल’ पर आज के जीवन और सोच का रोचक एवं पैना चित्रण है।

साहित्य की आयुधशाला में व्यंग्य एक खंजर, गुप्ती, पनडुब्बी की मिसाइल जैसी होती है, जो बिना स्पष्टत: बताए सही जगह पर वार करती है। डॉ. रवीन्द्र कुमार निश्चित रूप से इन आयुधों के प्रयोग में प्रवीण हैं।

कहते हैं ‘काव्यशास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम’ परंतु व्यंग्यशास्त्र के प्रयोगधर्मी डॉ. रवीन्द्र कुमार के व्यंग्य संग्रह ‘मेरा इनाम वापस लो’ की एक बार शुरू करने के बाद आप बिना पूरा पढ़े, उसे छोड़ नहीं सकते। यह लेखक की रचना की उत्कृष्ट सफलता का प्रतीक है।

– ओमप्रकाश मिश्र

पूर्व रेल अधिकारी एवं पूर्व प्राध्यापक, अर्थशास्त्र, इलाहाबाद विश्वविद्यालय 

66, इरवो संगम वाटिका, देव प्रयागम, झलवा, प्रयागराज, उ.प्र. पिन 211015,   मो.7376582525

‘मेरा इनाम वापस लो’

लेखक: डॉ. रवीन्द्र कुमार, Rtd. IRPS

समन्वय प्रकाशन, गाजियाबाद

वर्ष 2019, प्रथम संस्कारण

पृष्ठ 368, मूल्य छ्ह सौ रुपये।








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