उपकृत हुए मालामाल, डीजी/आरपीएफ हुए बदनाम – RailSamachar

व्यवस्था में शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी को निष्पक्ष होना चाहिए

सुरेश त्रिपाठी

Arun Kumar, DG/RPF/Rlys

आरपीएफ के शीर्ष पद पर आरोप लगाना कुछ सालों से एक आम बात हो गई है। यह आरोप कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि इसके अधिकारी ही लगाते रहे हैं। यह आरोप कुछ भी हो सकते हैं, जैसे चाल-चलन, लॉबिंग, चारित्रिक व्यवहार, पक्षपात, भ्रष्टाचार, प्रांतवाद, जातिवाद, बिरादरीवाद इत्यादि। कुछ समय पहले एक महिला अधिकारी द्वारा भी बहुत गंभीर आरोप लगाए गए थे। न्याय की कोई उम्मीद अथवा कोई अन्य विकल्प नहीं होने पर उसने प्रतिनियुक्ति पर दूसरे उपक्रम में चले जाना ही अपने लिए सुरक्षित समझा था।

यह भी सच है कि आरपीएफ में केवल एक पद पुलिस का बचा है। अतः यह भी कोशिश होती रहती है कि इस पद पर भी कब्जा किया जाए। इसलिए इस पद को बदनाम भी किया जाता रहा है, लेकिन आईपीएस अधिकारी जानते हैं कि इन सब गतिविधियों को कैसे डील किया जाता है। वह भी “फूट डालो, राज करो” वाली अंग्रेजों की नीति अपनाते हैं।

शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी के लिए यह कतई उचित नहीं है कि कुछ को अपना “खास” बनाकर दूसरों को डराते रहा जाए। रेल के अन्य विभागों के अधिकारियों की ही तरह आरपीएफ में भी न तो सभी अधिकारी चोर हैं, न ही बेईमान। ये सत्य है कि कुछ आईआरपीएफएस अधिकारियों की छवि आज भी इमानदारों की है, जबकि कुछ भोग-विलास और बेईमानी में डूबे रहते हैं।

हालांकि वर्तमान डीजी/आरपीएफ द्वारा आरपीएफ की छवि सुधारने के लिए भी कुछ कार्य अवश्य किए गए हैं। इसके अलावा वह भी कमोबेश अपनी साफ-सुथरी छवि के कारण काफी हद तक प्रकाश में रहे, लेकिन ये भी सच है कि कुछ लोग उन पर तानाशाह और प्रांतवादी तथा केवल बिहार, खासकर पटना, दरभंगा इत्यादि के लोगों को उपकृत करने के आरोप लगाते रहे हैं।

इसमें भी कोई शक नहीं है कि वर्तमान डीजी/आरपीएफ ने रेलवे में अपने कार्यकाल के दौरान खूब मनमानी की है और यह भी सही है कि कुछ भ्रष्ट आरपीएफ अधिकारियों को उनका भरपूर प्रश्रय भी मिला, जबकि सर्वसामान्य आरपीएफ कर्मी उनकी इस उदारता से महरूम रहे हैं।

अब जब अगले महीने 30 जून को वह रिटायर होने जा रहे हैं, तब आरपीएफ के जोनल ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट (जेडटीआई), खड़गपुर जैसे अत्यंत विवादित मामले में पूरा घालमेल करने का भी आरोप उन पर लगाया जा रहा है। उनके द्वारा गठित जांच कमेटी की रिपोर्ट क्या रही? पीसीएससी/द.पू.रे. उक्त जांच से अछूते कैसे रह गए? उनकी महंगी कार खरीद (70 लाख की लैंड क्रूजर?) और उसमें प्रिंसिपल/जेडटीआई का कथित कंट्रीब्यूशन, जिसकी चर्चा हर आरपीएफ कर्मी की जबान पर है, जांच के दायरे में क्यों नहीं आया? पीसीएससी/जेडटीआई की पोस्टिंग से पहले – दिसंबर 2020 तक – जब जेडटीआई, पीसीएससी/द.पू.रे. के अधिकार क्षेत्र में था और लगभग हर महीने उन्होंने जेडटीआई का दौरा किया था, तब उन्हें भी जांच के घेरे में क्यों नहीं लिया गया?

केवल हफ्ते भर के लिए ही प्रिंसिपल (कमांडेंट) और उसके कथित वसूली इंस्पेक्टर को दक्षिण पूर्व रेलवे मुख्यालय में अटैच करने का औचित्य क्या था? जब कैडेट्स को यह पता हो कि कमांडेंट और उसका कथित दलाल जेडटीआई में फिर वापस आने वाले हैं, तब वह जांच कमेटी के सामने सच कैसे बोलेंगे? फिर से उन दोनों को जेडटीसी में ही क्यों बहाल किया गया? इसका औचित्य क्या है? केवल जेडटीआई के लिए पीसीएससी जैसे नए उच्च पद के सृजन का औचित्य क्या है? क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि आरपीएफ में अधिकारी इफरात हो गए हैं? ऐसे कई महत्वपूर्ण प्रश्न अनुत्तरित तो हैं ही, बल्कि शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी की ईमानदारी, गरिमा और नीयत पर भी सवाल खड़े करते हैं।

डीजी/आरपीएफ पर यह भी आरोप सही है कि उन्होंने प्रिंसिपल को पूरा प्रश्रय दिया, अन्यथा प्रिंसिपल को 28 दिन की ट्रेनिंग को 45 दिन करने का अधिकार नहीं था। यह सेंक्शन तो डीजी/आरपीएफ के अप्रूवल से ही मिला, क्योंकि यह अप्रूवल देने का अधिकार जोनल पीसीएससी को भी नहीं है। वर्दी में, मेस में, मंदिर के चंदे में, रेत, बालू, पेड़ों की लकड़ी की बिक्री में, छुट्टी में, सिक में, आउटडोर ट्रेनिंग में, इत्यादि जेडटीआई की लगभग सभी मदों में जमकर लूट-खसोट और भ्रष्टाचार हुआ। जांच कमेटी के समक्ष एएसआई बैच के करीब सभी कर्मियों ने खुलकर इस सबका बयान भी किया था।

जहां यह माना जा रहा था कि इस गंभीर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर प्रिंसिपल और उसके बिचौलिए की मुअत्तली तय है, वहीं जांच कमेटी की रिपोर्ट पर डीजी/आरपीएफ ने लीपापोती करते हुए दोनों को जेडटीआई में ही पुनः बहाल कर दिया। इससे यह संदेश गया कि बिना डीजी महोदय की सहमति के कुछ नहीं होता। शायद यही वजह थी कि नए एसआई की पासिंग आउट परेड में सलामी लेने जाना डीजी महोदय ने जरूरी नहीं समझा, जबकि पीने-पिलाने के ऐसे किसी सुअवसर को वह फेमिली सहित कभी हाथ से जाने नहीं देते?

बताते हैं कि पूर्व प्रिंसिपल में भयानक चारित्रिक दोष था। वह सिर्फ रंगरेलियां मनाने में ही व्यस्त रहता था और कभी-कभार अथवा जब किसी उच्च अधिकारी की विजिट होती थी, तब ही वह जेडटीआई में आया करता था। भले ही उसके समय में भ्रष्टाचार इतनी ऊंचाई पर नहीं पहुंचा था, तथापि भ्रष्टाचार की सारी व्यवस्थाएं उसी के कार्यकाल में स्थापित हुई थीं। जेडटीआई के यह सब कारनामे यदि डीजी महोदय को पता नहीं चले, तो इसका मतलब यह है कि उनकी पूरी इंटेलिजेंस फेल और निकम्मी है।

हालांकि शीर्ष पद पर इस तरह के आरोप लगना सामान्य बात समझी जाती है, लेकिन कोशिश यह होनी चाहिए कि शीर्ष पद पर कोई आरोप न लगने पाएं। पद की गरिमा को बनाए रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है। वह जिन लोगों से घिरे हैं, उनकी ही बातें सत्य हैं, ये सोच सही नहीं है। यदि ऐसा नहीं होता, तो फिरोजपुर कांड, एनएफ रेलवे भ्रष्टाचार कांड, ट्रांसफर-पोस्टिंग में कथित पक्षपात इत्यादि कांडों में निष्पक्ष जांच एवं कार्रवाई होती, तो शीर्ष पद पर भरोसा कायम होता और उसकी निष्पक्षता पर जवानों को गर्व की अनुभूति भी होती।

ट्रांसफर में केवल अपने खास लोगों पर दया-माया दिखाना, अन्य को पूरी बेरहमी से घर से बेघर करना, प्रमोशन देते समय न्याय का ध्यान न रखना, छोटी-छोटी बातों से चिढ़ जाना, जिद करना, भय दिखाना, इत्यादि बड़े या शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी को शोभा नहीं देता।

डीजी/आरपीएफ के पद पर आईपीएस अधिकारी का ही रहना भी क्यों जरूरी है? इसके लिए तर्क दिया जाता है कि इससे सभी राज्यों के डीजीपी से तालमेल करने और कानून-व्यवस्था को संभालने में आसानी होती है। हालांकि यह अर्धसत्य है, क्योंकि जो भी उस अथॉरिटी पर रहता है, वह राज्यों के डीजीपी के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए सक्षम और अधिकृत होता है। तथापि जो भी आईपीएस – आरपीएफ के इस शीर्ष पद पर आता है, उसे अपना “ग्रन्थ” अलग से लिखना जरूरी क्यों लगता है? जबकि यह कतई आवश्यक नहीं है।

राज्यों के डीजीपी भी ऐसा वहां कुछ नहीं करते, वह अपने निवर्तमान डीजीपी की बनाई व्यवस्था को ही अपने मुताबिक छोटे-मोटे सुधार करके आगे बढ़ाते हैं। लेकिन आरपीएफ जैसी दूसरों की मोहताज और लावारिस फोर्स में उनके द्वारा अपनी सारी काबिलियत दर्शाने-लागू करने का जिदपूर्ण प्रयास अनुचित ही नहीं, बल्कि अनावश्यक होता है।

यहां तो उनके सामने रेलमंत्री भी चुप रहते हैं। यहां फेमिली वेलफेयर को तो भूल ही जाएं, यहां तो पति-पत्नी नौकरी कर रहे अलग अलग जोन में, बच्चे बीमारी से पीड़ित हैं, तथापि 10-15 का जो ब्रम्हास्त्र है, इसके चलते कितनों ने तो नौकरी तक ही छोड़ दी। कितने ही लोग बीमारी से पीड़ित हैं या उनके बच्चे बिलख रहे हैं, लेकिन 10-15 की कुटिल नीति से उन्हें मुक्ति नहीं मिल सकी।

अवसरवादियों, चाटुकारों से हमेशा घिरे रहने के कारण शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी को कुछ दिखता ही नहीं है। उनके घेरे के चलते उन्हें कुछ दिखना संभव भी नहीं है। ये भी सर्वविदित है कि दिल्ली में रहने के लिए लगभग सभी आईपीएस इस पद पर जोड़-तोड़ करके और राजनीतिक सिफारिशों के चलते ही आते हैं। फिर दूसरों द्वारा इस तरह की सिफारिश लाने पर उन पर कार्रवाई का अस्त्र क्यों चलाया जाता है?

शीर्ष पद पर आसीन अधिकारी को पद की गरिमा और गंभीरता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक होता है। मातहत स्टाफ का मॉरल ऊंचा रखना और व्यवस्था पर उनका भरोसा कायम रखना ज्यादा जरूरी होता है। यह केवल कल्याणकारी कार्यों से ही संभव हो सकता है, जो कि शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी को करना चाहिए।

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