आरक्षित रेल टिकटों की कालाबाजारी में पकड़े गए रेलकर्मियों को मंडल अधिकारियों का संरक्षण! – RailSamachar

बुकिंग क्लर्क नितिन दुमानिया द्वारा प्राप्त व्हाट्सएप संदेश के आधार पर तत्काल आरक्षित टिकटें निकालकर आरोपी ताहिर को भेजी जाती थीं तथा ताहिर टिकटों का पैसा कमीशन के साथ नितिन के बैंक खाते में जमा करवा दिया करता था!

पश्चिम रेलवे, भावनगर मंडल के वेरावल आरपीएफ द्वारा आरक्षित रेल टिकटों (जेसीआरटी) की कलाबाजारी में लिप्त पाए जाने पर रेल अधिनियम की धारा 143 के तहत अपराध संख्या 70/2021, दिनांक 28.04.21 को मामला दर्ज कर सासण रेलवे स्टेशन के बुकिंग क्लर्क संदीप अग्रावत, तलाला स्टेशन के बुकिंग क्लर्क मनीष श्रीवास्तव, विसावदर स्टेशन के बुकिंग क्लर्क नितिन भाई तथा दामनगर स्टेशन के डिप्टी एसएस शिव कृपाल पासवान को गिरफ्तार किया गया था। फिलहाल उक्त चारों आरोपी रेलकर्मी रेलवे कोर्ट द्वारा दी गई जमानत पर हैं।

बताते हैं कि 24 अप्रैल को सासण रेलवे स्टेशन पर आरक्षित तत्काल टिकटों की कालाबाजारी के संदर्भ में एक मुखबिर से प्राप्त गुप्त सूचना पर वेरावल आरपीएफ पोस्ट के उप निरीक्षक उदयभान सिंह ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति लेकर उनके मार्गदर्शन में सासण स्टेशन के यात्री आरक्षण केंद्र की एक बुकिंग विंडो विशेष पर छापा मारकर तीन तत्काल आरक्षित टिकट बरामद किए।

बरामद टिकटों का विवरण:

1. अहमदाबाद-लखनऊ, यात्री-4, मूल्य – ₹2880/-
2. सूरत-शाहगंज, यात्री-1, मूल्य – ₹2075/-
3. सूरत-मुजफ्फरपुर, यात्री-4, मूल्य – ₹3740/-

उपरोक्त तीनों आरक्षित तत्काल टिकट आरक्षण केंद्र, सासण के बुकिंग क्लर्क संदीप अग्रावत द्वारा निकाली गई थीं और टिकटों की उपरोक्त कीमत क्रमशः ₹8800, ₹3500, ₹8000 यात्रियों से लिया पाया गया। चूंकि मामला स्पष्टत: टिकटों की कालाबाजारी का था, अतः इसमें तत्काल सात लोगों की धड़पकड़ की गई।

गिरफ्तार आरोपियों का विवरण:

आरोपी नं.1: इरफान पुत्र सरफराज अंसारी, उम्र-38, धंधा-सिलाई काम, रहिवासी – रहीमभाई की चाली, मिल्लत नगर, मणिनगर, चारमीनार मस्जिद के पास, अहमदाबाद।

आरोपी नं.2: महबूब अली उर्फ गुड्डू पुत्र अब्दुल जब्बार अंसारी, उम्र-46, धंधा-छुटक मजूरी, रहिवासी – नागोरी की चाली, हंजर सिनेमा के सामने, अहमदाबाद।

आरोपी नं.3: फेजल उर्फ तोसिफ पुत्र हनीफभाई गोरी उम्र-28, धंधा-छुटक मजूरी, रहिवासी – साइगरा कोशलावाड़ी झोपड़पट्टी, वेरावल, जिला – गीर सोमनाथ।

आरोपी नं.4: संदीप पुत्र गिरीशभाई अग्रावत, उम्र 28, धंधा- नौकरी, रेलवे में बुकिंग क्लर्क, तैनाती-सासण रेलवे स्टेशन, रहिवासी – मेनबाजार सासण गीर, तालुका मेंदरणा, जिला – जूनागढ़।

आरोपी नं.5: मनीष कुमार पुत्र अदर कुमार श्रीवास्तव, धंधा – नौकरी, रेलवे में बुकिंग क्लर्क, तैनाती – तलाला रेलवे स्टेशन।

आरोपी नं.6: शिव कृपाल पासवान पुत्र जानकी पासवान, उम्र-39, पद- स्टेशन मास्टर, दामनगर रेलवे स्टेशन, रहिवासी – खादी कार्यालय मार्केटिंग यार्ड के सामने, दामनगर, जिला – अमरेली।

आरोपी नं.7: ताहिर अली पुत्र हसन अली, उम्र-28, धंधा – टाइल्स बिक्री, रहिवासी – धोबी शेरी गली, वोहरा मस्जिद के पास, सावर कुंडला, जिला – अमरेली।

लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि इसके बावजूद इन चारों रेल कर्मचारियों का निलंबन तो बहुत दूर की बात, केवल सासन गिर स्टेशन के बुकिंग क्लर्क संदीप अग्रावत को छोड़कर बाकी तीनों क्लर्क अपने-अपने स्टेशनों पर पूर्ववत नौकरी कर रहे हैैं।

रेल प्रशासन के इस रवैए को देखते हुए क्या यह नहीं माना जाना चाहिए कि मंडल के इनके वरिष्ठ रेल अधिकारी इन्हें अब भी खुला सपोर्ट कर रहे हैं और उनकी गलतियों तथा अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं? जबकि सबको इस मामले की जानकारी दी गई है और सभी को यह बहुत अच्छी तरह से ज्ञात है कि इस पूरे घटनाक्रम का मास्टर माइंड तलाला स्टेशन का बुकिंग क्लर्क मनीष श्रीवास्तव है।

विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि इस मामले में अभी और भी रेल कर्मचारी तथा बाहरी व्यक्ति वांछित हैं और उनकी गिरफ्तारी भी जल्दी ही हो सकती है। सूत्रों ने बताया कि आरपीएफ को इस बात के पक्के सबूत मिले हैं कि उक्त चारों रेल कर्मचारी सीधे अहमदाबाद और सूरत के अवैध टिकट एजेंटों के संपर्क में थे, जो इनके द्वारा बनाई गई टिकटों और कमीशन के पैसे सीधे या तो इन रेल कर्मचारियों के स्वयं के बैंक खातों में या इनकी पत्नियों के खातों में अथवा इनके जानने वाले बाहरी व्यक्तियों के खातों भेजते रहे हैं। सूत्रों ने बताया कि आरपीएफ द्वारा इस मामले की पूरी तरह से तह में जाकर जांच की जा रही है।

इस मामले में अभी तक 4 रेलकर्मियों के अतिरिक्त 4 बाहरी व्यक्ति/एजेंट, कुल 8 व्यक्तियों, को आरपीएफ वेरावल की टीम द्वारा गिरफ्तार किया गया है।

बुकिंग कलर्क नितिन दुमानिया तैनात-विसावदर रेलवे स्टेशन की टिकटों की कालाबाजारी करने और गिरफ्तारी के संबंध में आरपीएफ ने सम्मन जारी किया था।

दिनांक 28.04.2021 को आरपीएफ वेरावल पोस्ट पर रेलवे एक्ट की धारा 143 के तहत दर्ज अपराध संख्या 70/2021, दि. 28.04.2021 के मामले में अब तक रेलवे टिकटों की कालाबाजारी के आरोप में कुल सात आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके हैं। इसमें तीन रेल कर्मचारी भी शामिल हैं। दि. 13.06.2021 को आरोपी नं. 7 ताहिर अली को सम्मन के जरिए आरपीएफ द्वारा बुलाया गया था।

प्राप्त जानकारी के अनुसार पूछताछ के दौरान ताहिर अली ने स्वीकार किया कि वह विसावदर रेलवे स्टेशन पर तैनात बुकिंग क्लर्क नितिन दुमानिया से लागातार फोन पर एक दूसरे के संपर्क में रहता था। यह बात सीडीआर रिपोर्ट से भी प्रमाणित होती है तथा वह व्हाट्सएप के जरिए विसावदर रेलवे स्टेशन पर तैनात बुकिंग क्लर्क नितिन को तत्काल टिकट निकालने के बारे में संदेशों का आदान-प्रदान करता था, जिस पर बुकिंग क्लर्क नितिन के द्वारा प्राप्त संदेश के आधार पर तत्काल टिकट निकालकर आरोपी ताहिर को भेजी जाती थीं तथा ताहिर टिकटों का पैसा कमीशन के साथ नितिन के बैंक खाते में जमा करवा दिया करता था, जो नितिन के बैंक खाते में भी दिख रहा है और इस बात को – नितिन दुमानिया एवं ताहिर अली – दोनों आरोपियों द्वारा स्वीकार भी किया है ।

आरपीएफ द्वारा दि. 15-16.06.2021 को बुकिंग क्लर्क नितिन दुमानिया को सम्मन देकर वेरावल पोस्ट बुलाया गया तथा पूछताछ कर उनका बयान दर्ज किया गया, जिसमें उपरोक्त प्रकरण में उसकी संलिप्तता पाई गई है। तत्पश्चात उसको उपरोक्त प्रकरण में आरोपी नं. 8 बनाकर गिरफ्तार किया गया तथा दि. 17.06.2021 को रेलवे मजिस्ट्रेट, राजकोट के समक्ष पेश किया गया।

इस पूरे मामले की जांच और उपरोक्त सभी आरोपियों की गिरफ्तारी आरपीएफ वेरावल पोस्ट के उप निरीक्षक उदयभान सिंह, भावनगर मंडल, पश्चिम रेलवे द्वारा की गई है।

मामले के जानकारों का कहना है कि इतने बड़े घोटाले की जानकारी ऊपर के अधिकारियों को न हो, इस पर शायद ही किसी को विश्वास होगा। उनका यह भी कहना था कि आरपीएफ की इस कार्यवाही से लगता है अब आरक्षित रेल टिकटों की कालाबाजारी पर यथोचित अंकुश लग पाएगा।

तथापि उपरोक्त मामले में प्रमाण सहित लिप्त पाए गए चारों रेलकर्मियों को न तो आज तक निलंबित करके ड्यूटी से अलग किया गया है और न ही उनके विरुद्ध ऐसा कोई कारगर मैसेज दिया गया है कि भ्रष्टों को कुछ सबक मिले। इससे एक तरफ जहां भ्रष्ट रेलकर्मियों को भ्रष्टाचार करने की खुली छूट देकर संबंधित अधिकारियों द्वारा उनको पूरा सहयोग दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ आरक्षित टिकटों की कालाबाजारी के तार रेल में ऊपर तक जुड़े होने का यह पुख्ता संकेत भी है।

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कोच पोजीशन में रेल अधिकारी थोड़ी तो उपयोग करें अपनी बुद्धिमत्ता

रेलवे को है केवल अपनी कमाई की चिंता, यात्रियों की कोई परवाह नहीं

गुरुवार, दि. 17.06.2021 को ट्रेन नं.  01079 लोकमान्य तिलक टर्मिनस से गोरखपुर के लिए चली स्पेशल ट्रेन में ए-1 कोच के यात्री लगातार ट्रेन कंडक्टर को शिकायत कर रहे हैं कि उनके कोच के साथ जुड़े जनरल कोच के यात्री उनका टॉयलेट गंदा कर रहे हैं, अतः दोनों कोचों के बीच खुला वेस्टिबुल बंद कराया जाए, क्योंकि इसके चलते न केवल एसी ए-1 कोच में बदबू आ रही है, बल्कि उनकी शांति भी भंग हो रही है और रेल की यह कोच व्यवस्था बिल्कुल गलत है।

गुरुवार को ए-1 कोच के यात्रियों की कोई सुनवाई ऑन बोर्ड ट्रेन स्टाफ ने नहीं की। ट्रेन में चल रहा कैटरिंग वेंडिंग स्टाफ बार-बार उक्त वेस्टिबुल को खोलकर अपना धंधा करता रहा। यात्रियों के मना करने पर उनका प्रतियुत्तर होता है कि “तुम्हारी शांति और कोच में होने वाली गंदगी के लिए हम अपना धंधा नहीं छोड़ सकते!”

शुक्रवार, 18.06.2021 की सुबह जब ट्रेन ललितपुर के आसपास पहुंच रही थी, तब फिर वही परिदृश्य उपस्थित हो गया जब वेंडिंग स्टाफ वेस्टिबुल खुला छोड़कर अपना धंधा करने गया, तो जनरल कोच के यात्री ए-1 कोच के टॉयलेट का उपयोग करके दोनों टॉयलेट पूरी तरह से गंदे कर चुके थे। इससे आई बदबू के चलते ए-1 कोच के गेट से लगे पहले कूपे में बर्थ नंबर एक से छह में बैठे सभी यात्री बिफर उठे।

कोच कंडक्टर (भोपाल मंडल स्टाफ) को बुलाया गया। वह उल्टे यात्रियों को ही यह कहकर समझाने लगा कि “कोच को यहां इसलिए लगाया गया है, क्योंकि स्टाफ कम है और इतने ही स्टाफ को ज्यादा से ज्यादा कैश/केस बनाने का दबाव रहता है। केस तो जनरल कोच में ही मिलते हैं।” अब स्टाफ की इस बेचारगी पर यात्री क्या कहें, क्योंकि यह उनकी समस्या नहीं है। तथापि कंडक्टर ने जो भी समझाया वह विषय अथवा यात्री समस्या से अलग था।

बहरहाल, कंडक्टर ने यह कहकर यात्रियों को शांत किया कि अब उक्त वेस्टिबुल नहीं खोला जाएगा। तथापि उपरोक्त यात्रियों ने कंडक्टर को संबोधित करते हुए सोशल मीडिया पर रेल प्रशासन द्वारा की जाने वाली कोविड प्रोटोकॉल संबंधी बड़ी-बड़ी बातों का उल्लेख करके रेलवे की तमाम लानत-मलामत कर दी। यात्रियों ने यह भी कहा कि “इसी तरह की गतिविधियों के कारण रेलवे अपने स्थाई उपयोगकर्ताओं को गंवा रहा है। वह तो अब भविष्य में कभी रेल से यात्रा नहीं करेंगे।”

वास्तविकता यह है कि किसी भी ट्रेन में एसी कोचों को जनरल कोचों के साथ संलग्न नहीं किया जाता, और ऐसा लगभग अन्य सभी ट्रेनों में है भी, जिनमें सेकेंड एसी कोच के बाद थर्ड एसी, फिर स्लीपर, पैंट्री तथा बाकी कोचों की सीक्वेंस होती है। तथापि इस ट्रेन में एसी कोच, वह भी सेकेंड एसी कोच, को जनरल कोच के साथ अटैच किया गया है।

“अब यह बुद्धिमत्ता जिस किसी अधिकारी ने दर्शाई है, उसे पीयूष गोयल की जगह रेलमंत्री की कुर्सी पर बैठाया जाना चाहिए, क्योंकि पीयूष गोयल की अपेक्षा उक्त अधिकारी ज्यादा तत्परता से रेलवे को बरबाद करेगा!” यह कहना था उपरोक्त रेलयात्रियों का।

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इलेक्ट्रिक शेड में बदल रहा है झांसी डीजल शेड – RailSamachar

झांसी डीजल लोको शेड ने राष्ट्र की सेवा में दिए हैं 46 गौरवशाली वर्ष

प्रयागराज ब्यूरो: भारतीय रेल को विश्व की प्रमुख हरित रेल बनाने के मिशन में उत्तर मध्य रेलवे अपने पूरे परिक्षेत्र का विद्युतीकरण करने की ओर अग्रसर है। इसी परिप्रेक्ष्य में झांसी स्थित डीजल लोको शेड को इलेक्ट्रिक लोको शेड में परिवर्तित करने की परिकल्पना की गई है।

भारतीय रेल द्वारा विद्युतीकरण में वृद्धि के साथ, जितनी संख्या में विद्युत इंजनों का उत्पादन बढ़ाया जा रहा है, उतनी ही संख्या में डीजल इंजनों को सेवा से हटाया जा रहा है। यह स्वाभाविक रूप से डीजल लोको शेड को इलेक्ट्रिक शेड में बदलने की आवश्यकता पैदा हो रही है।

डीजल लोको शेड झांसी उत्तर मध्य रेलवे का एकमात्र प्रमुख डीजल लोको शेड है, जो मेल/एक्सप्रेस, यात्री, माल और शंटिंग सेवाओं की यातायात आवश्यकताओं को पूरा करता है। झांसी डीजल लोको शेड ने राष्ट्र की सेवा में 46 गौरवशाली वर्ष पूरे कर लिए हैं।

वर्तमान में यह शेड 28 डब्ल्यूएजी-7 इलेक्ट्रिक लोको के अलावा 74 एल्को लोको, 13 शंटिंग लोको और 32 एचएचपी लोको का रखरखाव करता है।

यहां एक 140 टन बीडी क्रेन, दुर्घटना राहत ट्रेन और झांसी में तैनात दुर्घटना राहत चिकित्सा वैन का अनुरक्षण भी किया जाता है। यह शेड रनिंग स्टाफ के लिए भी 100 प्रशिक्षुओं के लिए चार कक्षाओं और 80 बिस्तरों वाले छात्रावास के साथ एक कक्षा प्रशिक्षण प्रदान करता है।

डीजल से इलेक्ट्रिक में लोको शेड का रूपांतरण एक क्रमिक चरणबद्ध प्रक्रिया है, जिसकी शुरूआत पिछले साल जुलाई 2020 में पहले ही शुरू किया जा चुकी है। ओएचई परीक्षण सुविधा, परीक्षण शेड से ट्रिप शेड तक ओएचई बिछाने, पटरियों को ऊपर उठाने आदि जैसी अतिरिक्त सुविधाओं के प्रावधान के साथ तीन चरणों में रूपांतरण की योजना बनाई गई है।

परिकल्पना यह की गई है कि मार्च 2021 में 25 इलेक्ट्रिक इंजनों की तुलना में मार्च 2024 तक इस शेड की इलेक्ट्रिक लोको होल्डिंग क्षमता 100 तक बढ़ जाएगी। वर्तमान में डीजल इंजनों की होल्डिंग फ्रेट और कोचिंग सेवाओं के लिए क्रमशः 64 और 37 है, जो कि फ्रेट इंजनों के लिए घटकर 17 हो जाएगी। जबकि मार्च 2024 तक कोचिंग सेवाओं के लिए कोई डीजल लोकोमोटिव नहीं रहेगा। डीजल इंजन केवल शंटिंग के लिए और आपात स्थिति के लिए ही रहेंगे।

पीपीटी को एक वीडियो कांफ्रेंसिंग में प्रस्तुत करते हुए, उ.म.रे. के मुख्य मोटिव पावर इंजीनियर अनिल द्विवेदी ने बताया कि इस रूपांतरण अभ्यास की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह है कि लोको शेड के समग्र लेआउट में कोई बड़ा बदलाव नहीं हो रहा है और जनशक्ति का सर्वोत्तम उपयोग किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि शेड में अधिकांश कर्मचारी इलेक्ट्रिक और डीजल दोनों सेवाओं के लिए समान रहेंगे जिससे पूरी योजना में किफायत आएगी।

श्री द्विवेदी ने आगे बताया कि विद्युत इंजनों के अनुरक्षण हेतु पर्यवेक्षकों, टेक्नीशियनों एवं अन्य ग्रुप डी स्टाफ सहित मैनपावर की वर्तमान आवश्यकता को पहले ही प्रशिक्षित किया जा चुका है। इस प्रकार अगले तीन वर्षों के लिए किसी अतिरिक्त जनशक्ति की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से मौजूदा कर्मचारियों की क्षमता का निर्माण किया जा रहा है।

महाप्रबंधक/उ.म.रे. विनय कुमार त्रिपाठी ने कहा कि रेलवे को अधिक कुशल, आर्थिक और पर्यावरण के अनुकूल परिवहन साधन बनाने के लिए पूरी भारतीय रेल में एक एकीकृत योजना बनाई जा रही है। जैसे-जैसे एसी इंजनों की संख्या बढ़ेगी, हम इन लोकोमोटिव्स को त्वरित और सर्वोत्तम रखरखाव प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

वीडियो कांफ्रेंस में उ.म.रे. के अपर महाप्रबंधक रंजन यादव, प्रमुख मुख्य विद्युत अभियंता सतीश कोठारी, मंडल रेल प्रबंधक, झांसी संदीप माथुर सहित झाँसी मंडल के सभी संबंधित अधिकारी उपस्थित थे।

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अब जीएम पोस्टिंग में देरी से और ज्यादा होगी रेल मंत्रालय की किरकिरी

सरकार, मंत्री और सीआरबी जब व्यवस्था के हित की सोचकर कोई निर्णय लेंगे, तभी इसका कुछ भला हो पाएगा। तभी समय पर सही निर्णय और उस पर अमल सुनिश्चित हो पाएगा, तभी रेल का और देश का भी भला होगा, अन्यथा व्यवस्था का तिया-पांचा तो हो ही रहा है।

साढ़े आठ महीने (सितंबर 2020 से 12 जून 2021) बीत जाने के बाद अंततः जीएम पैनल फाइनल होकर शनिवार, 12 जून को रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) में आ गया। अप्रैल में डीपीसी और एसीसी से फाइनल होकर 23-24 मई से यह प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर के लिए पीएमओ में लंबित था।

जीएम पैनल जिस तरह सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि रेलकर्मी और अधिकारी इसके फाइनल होकर आने की प्रतीक्षा कितनी बेसब्री के साथ कर रहे थे।

अब यह सुनिश्चित किया जाए कि बिना कोई देरी किए, बिना किसी फेवर या बारगेनिंग के वैकेंसी सीक्वेंस के अनुसार जीएम की पोस्टिंग की जाएं, अन्यथा ज्ञापनबाजी की शुरूआत होगी, फिर ज्यादा देरी होगी और फिर रेलवे की फजीहत होगी!

इसके अलावा, 30 जून को खाली हो रही तीन जीएम पोस्टों को भी इसी पोस्टिंग प्रस्ताव में शामिल किया जाना चाहिए!

यह अपेक्षा उन सभी वरिष्ठ अधिकारियों की है जो पिछले छह महीनों से अपनी पोस्टिंग की प्रतीक्षा कर रहे हैं और जिनका जीएम में काम करने का कार्यकाल पहले ही छह महीने कम हो चुका है, या जानबूझकर कम किया गया है।

फिलहाल क्रमवार खाली जीएम पद और वैकेंसी सीक्वेंस के अनुसार पोस्टिंग की प्रतीक्षा में वरिष्ठ अधिकारियों की स्थिति निम्नवत है –

1. पूर्व रेलवे                  – अरुण अरोरा
2. उत्तर मध्य रेलवे        – प्रमोद कुमार
3. आईसीएफ               – अतुल अग्रवाल
4. दक्षिण पश्चिम रेलवे   – संजीव किशोर
5. मध्य रेलवे                – ए. के. लाहोटी
6. दक्षिण पूर्व रेलवे        – अर्चना जोशी

इस महीने 30 जून को खाली हो रहे जीएम के तीन पद

1. जीएम/पूर्व मध्य रेलवे
2. डीजी/आरडीएसओ
3. जीएम/दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे

उपरोक्त तीनों पदों पर वैकेंसी सीक्वेंस के अनुसार जीएम पैनलिस्ट तीन वरिष्ठ अधिकारियों – अनुपम शर्मा, आलोक कुमार एवं विजय शर्मा – की जीएम पद पर पोस्टिंग का नंबर लगता है।

एडवांस में हो जीएम पैनल की प्लानिंग

अब आगे से यह भी सुनिश्चित किया जाए कि जीएम पैनल की तैयारी एडवांस में हो। अगर पैनल फाइनल करने की प्रक्रिया में छह-सात महीनों का समय लगता है, जो कि वास्तव में नहीं लगना चाहिए, तो कैलेंडर वर्ष 2022 के जीएम पैनल की तैयारी आज से ही शुरू कर दी जानी चाहिए।

डीआरएम की पोस्टिंग में देरी से भी असंतोष

इसके अलावा, यदि डीआरएम की भी पोस्टिंग में और ज्यादा विलंब होते देखकर पोस्टिंग की प्रतीक्षा कर रहे हताश अधिकारी कह रहे हैं कि यह इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि “रेल नेतृत्व विहीन है और शीर्ष पद पर बैठा अधिकारी उस पर बैठने के लायक नहीं है, उसे फौरन से पेश्तर रिप्लेस किए जाने की आवश्यकता है।”

बहुत पहले साबित हो चुकी थी अकर्मण्यता

हालांकि यह बात तो वर्ष 2018 में अनिर्णय, अकर्मण्यता, मानवीयता, सहृदयता और नेतृत्व गुणवत्ता इत्यादि को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा कराए गए सर्वे में पहले ही साबित हो चुकी थी, तथापि बलिहारी है भारत सरकार की कि जिसे अपरिमित टैलेंट्स से परिपूर्ण भारतीय रेल में शीर्ष पर बैठाने के लिए केवल वही मिलता है, जो उसे मौके पर सही सलाह देने में अक्षम होता है, जी-हजूरी करने में अव्वल होता है, और जो हुकुम का गुलाम होता है, जिसके लिए व्यवस्था के हित के बजाय मंत्री का या अपना हित सर्वोपरि होता है।

सरकार या मंत्री और सीआरबी जब व्यवस्था के हित की सोचकर कोई निर्णय लेंगे, तभी इसका कुछ भला हो पाएगा। तभी समय पर सही निर्णय और उस पर अमल सुनिश्चित हो पाएगा, तभी रेल का और देश का भी भला होगा, अन्यथा व्यवस्था का तिया-पांचा तो हो ही रहा है।

#PiyushGoyal #RailMinIndia #PMOIndia #IndianRailway #RailwayBoard #CEORlys #DoPTGoI





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आज तक नहीं किया गया कटरा में टीटीई रेस्ट हाउस का इंतजाम, इधर-उधर भटकने को मजबूर चेकिंग स्टाफ

डीआरएम ने निकाल दिया मौज-मस्ती में अपना कार्यकाल, हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं मुख्यालय के वाणिज्य अधिकारी

सुरेश त्रिपाठी

फिरोजपुर: श्री वैष्णव देवी कटरा रेलवे स्टेशन पर कोई टीटीई रेस्ट हाउस नहीं है। जबकि इस स्टेशन को बने हुए और चालू हुए कई वर्ष बीत चुके हैं।

भारतीय रेल के अधिकांश अधिकारियों का श्री वैष्णव देवी के दर्शन लाभ के लिए यहां अक्सर आना-जाना लगा रहता है। तथापि आज तक उनका ध्यान इस एक बड़ी समस्या और आवश्यक व्यवस्था की तरफ क्यों नहीं गया, यह आश्चर्य की बात है।

अधिकारियों ने अपने ठहरने के लगभग सभी आलीशान इंतजाम वहां किए हैं। मगर अर्निंग स्टाफ की कोई यथोचित व्यवस्था आज तक नहीं की गई है।

विभिन्न मंडलों से गाड़ियां लेकर कटरा आने वाले टीटीई के लिए ठहरने के जो इंतजाम किए गए हैं, वहां बेड होता है, तो बेडशीट नहीं होती, साफ-सफाई का कोई इंतजाम नहीं होता, और इतनी गर्मी में एसी तो बहुत दूर की बात है, कूलर तक का कोई इंतजाम नहीं है।

डीआरएम/फिरोजपुर ने अपना दो साल का कार्यकाल पूरी अय्याशी, मौज-मस्ती और मनमानी करते हुए निकाल दिया। इसके अलावा दो साल में यहां उन्होंने तीन सीनियर डीसीएम बदलवा दिया, जिससे कमर्शियल स्टाफ का कोई माई-बाप ही नहीं रहा, वह अपनी समस्या कहें तो किससे जाकर कहें!

स्टाफ का कहना है कि मंडल में कई फालतू और अनुपयोगी काम कराए गए, परंतु टीटीई के लिए जो आवश्यक और मानक कार्य किया जाना चाहिए था, वह नहीं कराया गया।

इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि आज जब कुछ ही गाड़ियां चल रही हैं और बहुत थोड़ा स्टाफ वहां पहुंचता है, जब उसके लिए ही व्यवस्था कम पड़ रही है, तो जब सभी गाड़ियां चलेंगी, और ज्यादा स्टाफ वहां पहुंचेगा, तब तो उसके सामने प्लेटफार्म पर डेरा डालने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं होगा।

इस सबके साथ उत्तर रेलवे मुख्यालय बड़ौदा हाउस में हाथ पर हाथ धरे बैठे संबंधित वाणिज्य अधिकारियों की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे न सिर्फ अर्निंग बटोरने के लिए ही वाणिज्य स्टाफ को झोंकें, बल्कि उनकी आवश्यकताओं और आवश्यक सुविधाओं का भी बंदोबस्त करने-कराने की पहल करें।

अब जहां तक बात आती है मान्यताप्राप्त संगठनों और उनके पदाधिकारियों की, जो कि खुद को रेलवे का तथाकथित स्टेकहोल्डर और रेलकर्मियों का ठेकेदार मानते हैं, वे अपनी आत्मा गिरवी रख चुके हैं। ऐसे में उनके बारे में कुछ न ही कहा जाए, तो शायद अच्छा है, क्योंकि मृत अथवा मृतप्राय लोगों के बारे में कुछ बुरा कहने की भारतीय परम्परा नहीं है!

#NorthernRailway #GMNRly #DRMFZR #IndianRailway #RailMinIndia #PiyushGoyal #RailwayBoard #RailwayAdministration





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मध्य एवं पश्चिम रेलवे की नाला सफाई में मुंबई मनपा के बह गए 30 करोड़!

गत 12 वर्षों में रेलवे के 116 नालों की सफाई में मुंबई मनपा ने खर्च किए ₹30 करोड़ से अधिक

मुंबई में मध्य रेलवे एवं पश्चिम रेलवे के नालों (कल्वर्ट्स) की उचित साफ-सफाई नहीं होने से मानसून की पहली ही बारिश में बुधवार, 9 मई को कुर्ला से लेकर सायन और माटुंगा के बीच रेल पटरियों पर बारिश का पानी जमा हुआ और मुंबई उपनगरीय रेल सेवा बुरी तरह प्रभावित हुई।

गनीमत यह रही कि कोविड के चलते लोकल ट्रेन सेवाएं फिलहाल केवल आवश्यक सेवाओं से जुड़े सरकारी और कुछ गैर सरकारी कर्मचारियों के लिए ही चलाई जा रही हैं। अन्यथा सामान्य कामकाज के दिनों की तरह अगर सभी लोकल सेवाएं चल रही होतीं, तो पीक ऑवर में लाखों उपनगरीय यात्रियों का बहुत बुरा हाल हो गया होता।

“पिछले 12 सालों में रेलवे के 116 नालों की साफ-सफाई पर 30 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए गए हैं। यह सफाई उचित तरीके से न होने के कारण 30 करोड़ रुपये पानी में बह गए।” यह आरोप आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने रेलवे और मुंबई महानगर पालिका पर लगाया है।

मुंबई में रेलवे के अंतर्गत आने वाले कल्वर्ट, जिनकी हर साल रेल प्रशासन द्वारा सफाई कराई जाती है और मुंबई मनपा द्वारा हर साल 3 से 4 करोड़ रुपये का भुगतान रेलवे को किया जाता है।

पिछले 12 साल में मुंबई मनपा से रेलवे को 30 करोड़ रुपये मिले हैं, लेकिन आज तक रेलवे की ओर से कोई ऑडिट नहीं हुआ, और न ही आजतक मुंबई महानगर पालिका द्वारा किए गए खर्च का रेलवे से कोई हिसाब मांगा गया।

मुंबई में रेल लाइनों के नीचे से गुजरने वाले कुल 116 नालों में से 53 मध्य रेलवे, 41 पश्चिम रेलवे और 22 हार्बर लाइन के अंतर्गत आते हैं।

वर्ष 2009-10 से 2017-18 तक के 9 सालों में मुंबई मनपा ने रेल प्रशासन को 23 करोड़ रुपये दिए थे। वर्ष 2018-19 में 5.67 करोड़ मनपा ने खर्च किए।

कुल मिलाकर, नालों की साफ-सफाई के मद में पिछले 12 वर्षों के दौरान मुंबई मनपा द्वारा कुल 30 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान रेलवे को किया गया है।

मुंबई महानगरपालिका ने इस साल मुंबई सीएसएमटी से लेकर मुलुंड तक रेल लाइनों के नीचे से निकलने वाले सभी नालों की साफ-सफाई महज 15 दिनों में पूरा करने का दावा किया है।

अनिल गलगली के अनुसार, हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई के लिए मुंबई मनपा रेलवे को भुगतान करती है, लेकिन नालों की सफाई का कोई ऑडिट नहीं होता है।

उन्होंने कहा कि कुर्ला और सायन के बीच पिछले कई वर्षों से रेल सेवाएं ठप होती हैं। अगर 31 मई तक नालों की सफाई का सर्वे कराया जाए, तो ऐसी स्थिति नहीं पैदा होगी।

अनिल गलगली ने कहा कि दोनों एजेंसियां इसके लिए ​​समान रूप से जिम्मेदार हैं। जनता को दोनों एजेंसियों द्वारा किए गए खर्च के बारे में सूचित किया जाना आवश्यक है। फिर चाहे वह रेलवे हो या मुंबई महानगरपालिका!

उन्होंने इस मद में हुए खर्च की पूरी जानकारी सार्वजनिक किए जाने की मांग की है।

#Anil_Galgali, RTI activist demanding accountal of money from BMC, CR & WR on #Culvert_Cleaning

#CentralRailway #WesternRailway #BMC #Culvert_Cleaning #IndianRailway





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यदि एक बार में महंगाई भत्ता देने में मुश्किलें आ रहीं हैं तो इसे किश्तों में भी दिया जा सकता है -शिवगोपाल मिश्रा

महंगाई भत्ता: थोड़ी लंबी हो सकती है केंद्रीय कर्मियों की प्रतीक्षा, डीए पर होने वाली समिति की बैठक एक बार फिर टली

केंद्रीय कर्मचारियों को 1 जुलाई, 2021 से महंगाई भत्ता (डीए) फिर से देने की घोषणा केंद्र सरकार ने की थी। सातवें वेतन आयोग से जुड़ी समस्याओं को लेकर नेशनल काउंसिल ऑफ ज्वाइंट कंसल्टेटिव मशीनरी (एनसी-जेसीएम) के पदाधिकारी और डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेंनिग (डीओपीटी) तथा वित्त मंत्रालय के अधिकारी लगातार संपर्क में बने हुए हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार मई के अंत में इन सभी संस्थाओं के बीच बातचीत होनी थी, लेकिन कोरोना के कारण अब यह बैठक जून के तीसरे सप्ताह में होने की संभावना है। बैठक टलने के बाद अब कर्मचारियों की प्रतीक्षा अब थोड़ी लंबी हो सकती है।

बताते हैं कि महंगाई भत्ते से जुड़ी समस्याओं को लेकर एनसी-जेसीएम के पदाधिकारी, डीओपीटी और वित्त मंत्रालय के अधिकारियों की बैठक 8 मई को भी होनी थी जो टल गई और उसके बाद मई अंत में बैठक का फैसला किया गया था। अब वह बैठक भी टल जाने से महंगाई भत्ते पर अंतिम निर्णय होने में और देर होने की आशंका है।

एनसी-जेसीएम स्टाफ साइड के सेक्रेटरी शिवगोपाल मिश्रा का कहना है कि कोरोना के मौजूदा हालात में महंगाई भत्ते पर बैठक टलने को नकारात्मक रूप में लेने की जरूरत नहीं है। उनका कहना है कि एनसी-जेसीएम स्टाफ साइड ने सरकार को यह सुझाव दिया है कि यदि एक बार में महंगाई भत्ता देने में मुश्किलें आ रहीं हैं तो इसे किश्तों में भी दिया जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार 1 जुलाई से महंगाई भत्ता दिया जाना था। इसमें पिछली तीन किश्तों – 01.01.2020, 01.07.2020, 01.01.2021 – का बकाया भी शामिल है। केंद्रीय कर्मचारियों के लिए यह मामला वर्तमान में सबसे बड़ी चर्चा का विषय है। किस्तों पर फिलहाल कोई निर्णय न होने का असर उनके एरियर पर भी पड़ेगा।

#NC_JCM #DearnessAllowance





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रेलवे के अधिकारियों ने डेपुटेशन पर आकर मेट्रो में भी फैलाई गंदगी

If Sreedharan wasn’t favourable to Mangu Singh then the scenario of DMRC would have been different today!

Truck falls into caved road following heavy rainfall in Delhi

A truck falls in a caved-in part of a road near a metro construction site at Khaira More, following heavy rains, in Najafgarh area. According to police, information was received about the incident at around 1 am. Due to incessant rainfall Wednesday night, the road caved in and the rainwater entered inside many shops and buildings near the spot. “A truck fell into the caved portion of the road. But no injury or loss of life was reported,” a senior police officer said.

“A portion of the road along with the footpath at Khaira Road near the Dhansa Stand Metro Station caved in late Wednesday night after a drain burst in the area due to excess flow of continuous rain water. Adding that a truck fell in to the caved road.” the Delhi Metro Rail Corporation (DMRC) said in a statement on Thursday.

The incident has also caused partial damage to an adjacent building. There has been no casualty or injury and senior DMRC officials are at the site to supervise the repair work, it said.

“Repair work of the caved in portion is in progress and all efforts shall be made to complete the work at the earliest. DMRC is now filling below the road with additional concrete to avoid the recurrence of this problem in the future. The contractor firm working in this project is M/s Paras Railtech Pvt Ltd.” the DMRC stated.

चीनी कंपनी ने चार राज्यों का ट्रैफिक कैसे रोका? लोगों के घरों-मकानों को कैसे दरकाया? चीनी कंपनी ने लोगों की रोजी-रोटी और पानी कैसे बंद किया? दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार और मेट्रो रेल प्रशासन क्या कर रहा है? यह कुछ सवाल खैरा मोड़ नजफगढ़ दिल्ली के रहिवासी पूछ रहे हैं, जो पिछले दो सालों से मेट्रो रेल प्रशासन और चीनी कंपनी तथा उसके ठेकेदारों की मनमानी आजिज आ चुके हैं परंतु उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

देखें, “प्रेस नोट” चैनल की यह खबर

स्थानीय लोगों का कहना है कि जिसका डर था, वही हुआ, तीसरी बार दिल्ली के खैरा मोड़, नजफगढ़ में मेट्रो द्वारा निर्माणाधीन साइट गिर गई। ट्रैफिक बंद हो गया। मेट्रो के ठेकेदार और पीडब्ल्यूडी ने मिलकर यह कारनामा किया।

नजफगढ़ विकास मंच ने कल दिन में ही सूचित कर दिया था, परंतु मेट्रो के संबंधित ठेकेदार ने सिर्फ ट्विटर पर पीडब्ल्यूडी को सूचित करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली थी।

#हम_नहीं_सुधरेंगे वाली स्थिति है, क्योंकि इससे पहले भी इसी एरिया के एक गढ़्ढ़े में एक ट्रक धंस गया था, जिसकी भराई मेट्रो द्वारा सही तरीके से नहीं की गई थी और अब बुधवार, 19 मई को फिर एक ट्रक ऐसे ही गढ़्ढ़े में गिरकर चकनाचूर हो गया।

भ्रष्टाचार अब चरम सीमा पर है, रेलवे के अधिकारियों ने डेपुटेशन पर आकर मेट्रो में भी गंदगी फैला दी!

एक निजी ट्रैक निर्माण कंपनी को ठेका दिया गया। निर्माण कंपनी का मालिक रेलवे का ही एक पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर है, जिसके पुराने संबंध रेलवे से मेट्रो में प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारियों से पहले से ही हैं, जो कि मेट्रो में प्रमुख पदों पर कार्यरत हैं।

बताते हैं कि रेलवे का यह पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर रेलवे में रहते हुए भी ठेकेदारों के साथ मिलकर रेलवे की ठेकेदारी किया करता था और बाद में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर रेलवे और मेट्रो में ही ठेकेदार बन गया।

मेट्रो में सुपरवाइजर स्तर पर कार्यरत और नाम न उजागर करने की शर्त पर कुछ सीनियर सेक्शन इंजीनियरों ने बताया कि उक्त ठेकेदार अर्थात पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर की कंपनी को टेंडर के आवंटन में भी गड़बड़ी की गई है।

उन्होंने बताया कि ऐसी बहुत से आइटम्स का पेमेंट किया गया है जो कार्य हुआ ही नहीं है। इसकी पुष्टि मेट्रो में कार्य कर चुके कुछ अधिकारियों ने भी की है। उनका कहना था कि इस पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर और इसकी कंपनी ने मेट्रो पर पूरी तरह कुंडली मारकर रखी है।

उन्होंने बताया कि इस पूर्व रेल अधिकारी ने अपनी दो नंबर की कमाई को एक नंबर करने के लिए ही स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर ठेकेदारी चालू किया है।

उनका कहना है कि निर्माण कार्यों में निर्धारित मात्रा से कम मात्रा में इसने हमेशा सीमेंट-सरिया डाली है और बोगस भुगतान करने में यह माहिर था। अब मेट्रो में वैसा ही करके बोगस भुगतान लेने लगा है। इसकी भूख बढ़ती जा रही है।

सवाल यह उठ रहा है कि सेटिंग हो पाएगी या नहीं? क्योंकि पीडब्ल्यूडी दिल्ली के अधिकारी भी तो डेपुटेशन पर दिल्ली मेट्रो में कार्य कर रहे हैं!

उधर दो-दो बार एक्सटेंशन पा चुके दिल्ली मेट्रो के एमडी अपनी पूरी अकड़ में हैं। परंतु जब उनके अधिकारी कोविड के दौरान टेंडर जारी कर सकते हैं, टेंडर अवार्ड कर सकते हैं, तो मार्च 2021 में ही उन्होंने कार्य क्यों नहीं पूरा किया? इस प्रश्न का जवाब देने के लिए कोई तैयार नहीं है।

अब सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या अधिकारीगण – मंत्री को दिग्भ्रमित कर पाएंगे? क्योंकि मंत्री जी यदि काम के लिए बोलते हैं तो अधिकारी कोविड-19 का बहाना बनाकर घर में बैठ जाते हैं और कोविड पीरियड में ही काम करने के लिए ठेकेदारों पर लट्ठ चलाते हैं ये अधिकारी।

Though Sridharan was a result oriented engineer, had he been able to be great by following all Govt’s rules & regulations?

A former general manager of Railways, who is not wish to disclose his name, writes – “Sreedharan is too big a man, that’s why I don’t want to criticize him openly in any group, but in my opinion he is a bit of a fake, like another mechanical engineer who was retired as CRB, (although fake is probably too strong a word for sreedharan, but right now nothing softer comes to my mind).

As long as he was in Railways including as Member Engineering (ME), nobody had heard anything exceptional about him except his restoration of Pamban bridge in 1963. Apart from that he was just like any other ordinary Board Member who completed his tenure and retired.

Then AM (CE) once told me, when I was posted in the Railway Board, that when Sreedharan joined as ME, he called a meeting of all Advisers, EDs and Directors of the Civil Engineering department. He was Director in Selection Grade at that time, so he also attended.

In that first meeting Sreedharan told them something to this effect (I may be incorrect about the exact wordings); “All of you are very good in your work and also competent, moreover your field experience is much more recent than mine. So I expect all of you will deal with all files at your level without finding it necessary to mark any file to me. However, if you feel that some particular file is tricky or complicated and needs my personal perusal or order then you can put up that file to me. However, in that case, I’ll also seriously consider transferring you out of the Railway Board.” He said that after that meeting, no one ever put up any file to ME.

I was flabbergasted. I asked him, how can a Board Member with his supposedly superior knowledge and undoubtedly more experience, absolve himself of the responsibility of guiding his juniors and teaching them? He laughed, and remarked, “देख लो Partner, reputation ऐसे ही बनती है।”

Sreedharan was appointed as MD/KRCL because of his close proximity to George Fernandes, the then Minister for Railways.

As MD/KRCL (also as MD/DMRC) he had a red coloured digital timer on his side table facing visitors which displayed, “xxx days to completion of yyy project”. The number of days displayed used to keep blinking to catch the visitor’s eye, and the number kept reducing by one every day.

Visitors to his office were terribly impressed with this system of monitoring whereby the MD was personally keeping track of each project on a day to day basis.

A junior officer, who was my Director had earlier worked under Sreedharan in KRCL, told me that every few months the red digital timer clock would be reset and the number of ‘days to completion of a particular project’ would be increased to adjust for the time over run! Since the same visitor rarely returned twice, and even if he did, he was unlikely to remember what he had seen earlier, none of them could catch on to this trick.

As MD/KRCL he changed the alignment of the line passing through Goa, thereby saddling KRCL with additional cost over run of around 200+ crores. As it was, KRCL project was financially unviable, he made it even more so; knowing fully well that he would have earned all kudos and departed, leaving his successors to face the music.

In KRCL, there were rumours of his having made money, although nothing was either proved or disproved. (An honest railway civil engineer is an impossibility, if you ask me.)

As ME, Sreedharan wrote copious pages of notings on file insisting that DMRC must have broad gauge for smooth interoperability. However, within a few years, as MD/DMRC he did a 1800 turn and went in for standard gauge. As a result of standard gauge, 100% of rolling stock had to be imported at huge cost and foreign exchange. (Taking cuts in swiss banks is easier if it is from an international supplier). 

My main grouse against Sreedharan is that as MD/DMRC he did not follow any of the Government rules and regulations regarding award of tender. Tenders were awarded to L-3 or even L-4 bypassing the lower ones by writing some English and justifying the same; (in Govt. you can justify anything on file by writing a lot of English).

During Man Mohan Singh’s time as PM, once CVC officials had gone to DMRC to pick up some files. Sreedharan refused to hand over any file. Then he went to PM and threatened to resign as MD unless written orders were personally issued by PM forbidding CVC or any other investigating agency from scrutinizing any tender file of DMRC. Under that resignation threat PM issued those written orders!!

This information is 100% authentic since it was told to me by an IRSEE officer, who was the Director under me in the Railway Board and subsequently took absorption in DMRC. He was a super outstanding officer and finally retired from DMRC as Director.

In the PSEB interview to select Sreedharan’s successor, the Board wanted to select the IRSEE director as MD, but Sreedharan pitched for Mangnu Singh, Director Civil and put his foot down refusing to sign the proceedings if Mangnu Singh wasn’t selected. That is how that outstanding IRSEE director lost out.

My point is, if Railway Officers also had the freedom to award tenders to L-3 or L-4 then they could also do wonders, possibly as much as if not more than what DMRC has achieved!

My then Sr.DEN (Hq.), who is presently posted as ADRM, told me during my departure as DRM, “sir, throughout our service we’ve always been told by all our seniors that if we wanted to deliver then we must break the rules. We will not be able to deliver successfully by following all rules. Here sir, during the past 2 years, I’ve seen you follow each and every rule and still you’ve been able to deliver much more than any officer I’ve worked under. That has completely changed my mindset permanently.”

In my entire service, I’ve never flouted any rule and whatever I’ve achieved has been by strictly following all rules and regulations. Had Sreedharan been able to do that I would have certainly termed him as Great?

रिटायर्ड जीएम के उपरोक्त विचार बहुत स्पष्ट हैं। तथापि यहां श्रीधरन साहब की गरिमा को किसी भी तरह से डिग्रेड करने की कोई कोशिश नहीं की गई है। उन्होंने सिर्फ उनके काम करने के तौर-तरीकों का जिक्र किया है। उनको आए अनुभव का निष्कर्ष यह भी है कि श्रीधरन साहब भी पक्षपात और मनमानी से मुक्त नहीं थे। यदि ऐसा नहीं होता, तो आज दिल्ली मेट्रो का परिदृश्य कुछ अलग होता। यह भी कि यदि सारे स्थापित सरकारी रूल्स-रेगुलेशंस और दिशा-निर्देशों को दरकिनार करके काम करने और परिणाम देने की छूट दी जाए, तो वह कोई भी रेल अधिकारी दे सकता है।





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पूरी भारतीय रेल में अब तक हजारों रेलकर्मी हुए कोरोना का शिकार, झूठे आंकड़े देकर झूठ बोलते रहे सीईओ/रे.बो.

झूठ बोलने में रेलवे बोर्ड का कोई सानी नहीं, सुनीत शर्मा, चेयरमैन/सीईओ/रे.बो. ने तोड़े अकर्मण्यता और अनिर्णय के सारे रिकॉर्ड

सुरेश त्रिपाठी

कोरोना महामारी के दूसरे चरण में पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल 314 लोको पायलट्स की मृत्यु का आंकड़ा सामने आया है। हालांकि यह अविश्वसनीय संख्या है, क्योंकि मौत के समाचार जिस गति से चल रहे हैं, उनको देखकर इस आंकड़े पर कोई भी रनिंग स्टाफ भरोसा नहीं कर पा रहा है।

रनिंग स्टाफ के कई वरिष्ठ सुपरवाइजरों का कहना है कि “वास्तव में यह आंकड़ा इससे भी ज्यादा है।” वे कहते हैं, “हॉस्पिटल में कोविड से हुई मौत बताया जाता है, परंतु जब डाटा उनके कार्यालय में आता है तो वही डेथ किसी अन्य कारण से हुई बताई जाती है। यह अत्यंत अविश्वसनीय है।”

स्टेशन मास्टर कैडर में भी अब तक 150 से ज्यादा मौतें कोविड संक्रमण के चलते हो चुकी हैं। पूरा कैडर जब रेल प्रशासन की अनमनस्कता के प्रति आक्रोशित हुआ और उचित ध्यान नहीं दिए जाने पर ड्यूटी न करने की चेतावनी दी, तब प्रशासन को होश आया और उसने उनके साथ वर्चुअल मीटिंग करके समस्या का समाधान करने की पहल हुई।

टिकट चेकिंग, टिकट बुकिंग, पार्सल, लगेज, आरक्षण इत्यादि कैडर्स, जो लगातार पब्लिक के संपर्क में रहते हैं, में भी काफी रेलकर्मी कोरोना का शिकार हुए हैं, परंतु उनके अधिकृत आंकड़े अब तक सामने नहीं आए हैं। तथापि उनकी मौतों के दु:खद समाचार लगातार आते रहते हैं।

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इस महामारी के दूसरे चरण में, जब उम्र का कोई बंधन नहीं रह गया, हर आयु-वर्ग के बहुत सारे रेलकर्मी और अधिकारी काल-कवलित हुए हैं। परंतु ऐसा लगता है कि रेल प्रशासन ने उनकी मौतों को अब तक भी गंभीरता से नहीं लिया है, बल्कि देखने में यही आया है कि उनकी मौत के आंकड़े छिपाने में और व्यवस्था को दिग्भ्रमित करने में रेलवे बोर्ड की ज्यादा रुचि रही है।

चेयरमैन/सीईओ/रेलवे बोर्ड ने झूठ बोला

यदि ऐसा नहीं होता, तो ओपन प्रेस कॉन्फ्रेंस में चेयरमैन सीईओ रेलवे बोर्ड झूठ नहीं बोलते, झूठे आंकड़े प्रस्तुत नहीं करते, मांगे जाने पर भी वह रेलकर्मियों-अधिकारियों की मौत के आंकड़े देने से इंकार नहीं करते!

यदि ऐसा नहीं होता, तो वे मार्च 2020 से दिए गए आंकड़ों का औचित्य सिद्ध करते और जनवरी 2021 से अब तक हुई रेलकर्मियों-अधिकारियों की मौत के आंकड़े शेयर करते! जो कि दिन-प्रतिदिन के हिसाब से रेलवे बोर्ड में संकलित होते हैं।

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जोनल रेलों के विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 1 मई 2021 को पूरी भारतीय रेल में कोरोना से संक्रमित रेलकर्मियों की कुल संख्या 1,15,358 थी। जबकि उसी दिन कोविड से मृत्यु को प्राप्त हुए रेलकर्मियों की कुल संख्या 1695 थी। इस एक दिन में कोविड का शिकार हुए गैर रेलकर्मियों अर्थात रेलकर्मियों के परिजनों एवं रेल अस्पतालों में भर्ती अन्य लोगों की मौत का कुल आंकड़ा 2761 था।

इससे पहले 18 अप्रैल 2021 के दिन पूरी भारतीय रेल में कोरोना से संक्रमित रेलकर्मियों की कुल संख्या 83,180 थी। जबकि उस दिन कोविड से मृत्यु को प्राप्त हुए रेलकर्मियों की कुल संख्या 979 थी और इस एक दिन में कोविड का शिकार हुए गैर रेलकर्मियों अर्थात रेलकर्मियों के परिजनों एवं रेल अस्पतालों में भर्ती अन्य लोगों की मौत का कुल आंकड़ा 1814 था।

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इस प्रकार यह पूरी तरह स्पष्ट है कि 11 मई के आसपास और उससे पहले हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीईओ रेलवे बोर्ड ने प्रेस के सामने साफ-साफ झूठ बोला था।

यहां तक कि जो लोग उनके द्वारा दिए गए आंकड़ों पर सवाल पूछना चाहते थे, उन्हें कुछ भी कहकर साइड लाइन कर दिया गया, परंतु उन्हें मार्च 2020 से दिए गए आंकड़ों का कोई औचित्य नहीं समझाया गया।

जबकि उपरोक्त आंकड़ों से स्पष्ट है कि सीईओ/रेलवे बोर्ड द्वारा मार्च 2020 से 10 मई 2021 तक 13 महीने 10 दिन के लिए बताए गए कुल आंकड़ों से यहां एक दिन का ही आंकड़ा अधिक है।

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यदि ऐसा नहीं था, तो “रेल समाचार” द्वारा 10 मई 2021 को चेयरमैन सीईओ/रेलवे बोर्ड सुनीत शर्मा से जब यह पूछा गया कि –

1. कृपया श्री प्रदीप कुमार, पूर्व मेंबर स्टाफ, रेलवे बोर्ड और वर्तमान मेंबर कैट, जो कि एनआरसीएच में भर्ती हैं और वेंटिलेटर पर हैं, की हेल्थ पोजीशन की अपडेट देने की कृपा करें।

2. रेल अस्पतालों को अपग्रेड करने और रेलकर्मियों को उचित स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने के लिए रेल प्रशासन द्वारा अब तक क्या किया गया?

3. वर्तमान में कितने रेलकर्मी और अधिकारी पूरी भारतीय रेल में कोरोना संक्रमित हैं?

4. पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल कितने रेलकर्मी और अधिकारी कोरोना से काल कवलित हुए हैं? कृपया रेलवे वाइज संख्या देने की कृपा करें।

5. पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल कितने रेलकर्मियों और अधिकारियों का वैक्सीनेशन हो चुका है? कृपया रेलवे वाइज संख्या प्रदान करने की कृपा करें।

6. क्या रेलकर्मियों और अधिकारियों तथा उनके परिजनों को अलग से अथवा सीधे वैक्सीन मुहैया कराने की व्यवस्था नहीं की जा सकती? यदि हां, तो इसके लिए रेल मंत्रालय क्या उपाय कर रहा है? यदि नहीं, तो इसमें समस्या क्या है? कृपया बताने का प्रयास करें।

यह नहीं, 12 मई 2021 को, सीईओ रेलवे बोर्ड की प्रेस कॉन्फ्रेंस के एक दिन बाद भी उन्हें रिमाइंड करते हुए “रेल समाचार” द्वारा पूछा गया था कि –

Resp. Sharma ji, kindly share latest daily “ZONE WISE COVID PREPAREDNESS REPORT-2021” on Indian Railways.

उपरोक्त में से किसी भी तथ्य का कोई स्पष्टीकरण अथवा कोई जवाब अब तक चेयरमैन/सीईओ/रेलवे बोर्ड की तरफ से नहीं आया है।

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“जान है तो जहान है” के सिद्धांत पर जब रेल प्रशासन को अपनी वर्क फोर्स का जीवन बचाना चाहिए था, तब वह झूठ और फरेब का सहारा लेकर केवल ऑक्सीजन एक्सप्रेस चलाने के लिए अपनी पीठ थपथपा रहा है।

हालांकि जनता को भी उसके गंतव्य पर पहुंचाकर सेवा कार्य भी इस संकटकाल में जरूरी है। तथापि झूठ बोलना कतई जरूरी नहीं है। यह वैश्विक महामारी है, इस पर आदमी का कोई वश नहीं है। इसके लिए केवल सावधानियां ही बरती जा सकती हैं।

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अतः पब्लिक के संपर्क में आने वाले रेलकर्मियों को सुरक्षा उपकरणों की आपूर्ति सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके अलावा उम्र और किसी बीमारी से ग्रस्त कर्मचारियों को जनसंपर्क से दूर रखने की यथासंभव कोशिश करते हुए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

“रेल समाचार”, रेल प्रशासन की अकर्मण्यता के कारण अब तक अकाल काल-कवलित हुए सभी रेलकर्मियों को विनम्र श्रृद्धांजलि अर्पित करता है और संक्रमित हुए कर्मचारियों के शीध्र स्वस्थ होने की कामना करता है।

ट्रेन की गति से ढ़हा चांदनी रेलवे स्टेशन:





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जारी है उत्तर रेलवे निर्माण संगठन में बिड कैपेसिटी घोटाला

“आखिर कब तक चलेगा यह पिक एंड चूज का खेल? यह सब ऊपर बैठे बड़े लोगों (अधिकारियों) का खेल है, जो न केवल कर्मचारियों को, बल्कि ठेकेदारों को भी बेवकूफ बनाते हैं और अपनी जेबें भरते हैं।”

उत्तर रेलवे निर्माण संगठन में बिड कैपेसिटी का घोटाला आज भी लगातार चल रहा है। परंतु इस पर लगाम लगाने वाला कोई नहीं है, क्योंकि उत्तर रेलवे का जोनल विजिलेंस और रेलवे बोर्ड का सार्वभौमिक विजिलेंस दोनों गहरी नींद में सुला दिए गए हैं। फिर सीवीसी से ही क्या उम्मीद की जा सकती है।

पूर्व सीएओ/कंस्ट्रक्शन, उत्तर रेलवे बी. डी. गर्ग के समय में अथवा उनके द्वारा शुरू किया गया बिड कैपेसिटी का यह घोटाला आज भी उत्तर रेलवे में लगातार जारी है। अब तो उत्तर रेलवे निर्माण संगठन के अधिकारियों द्वारा इस घोटाले को यहां एक परंपरा के रूप में स्थापित कर दिया गया है।

सबको पता है कि 6 माह में काम नहीं हो सकता, फिर क्यों शॉर्ट टर्म टेंडर किया जा रहा है? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए उत्तर रेलवे निर्माण संगठन का कोई अधिकारी तैयार नहीं है।

सीपीआरओ को भी लगता है कि केवल दिल्ली के कुछ चुनिंदा पत्रकारों के ही फोन उठाने का निर्देश दिया गया है?

उल्लेखनीय है कि इसी तरह रोहतक-मेहम-हांसी नई रेल लाइन के निर्माण में हुए भारी भ्रष्टाचार और उसके विरुद्ध की गई ढ़ेरों लिखित शिकायतों के चलते मार्शल इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड का कांट्रैक्ट टर्मिनेट कर दिया गया था। तथापि दोषी अधिकारियों के विरुद्ध आजतक कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

अब इसी रोहतक-मेहम-हांसी लाइन की हांसी-तोशम रोड (स्टेट हाइवे-12) की क्रासिंग किमी. 68-110 पर रोड ओवर ब्रिज (आरओबी) का निर्माण करने का टेंडर सीएओ/सी/उ.रे. द्वारा जारी किया गया है।

जानकारों का कहना है कि यह टेंडर जारी करने से पहले कार्य की उचित समीक्षा भी नहीं की गई है।

इस टेंडर की विज्ञापित वैल्यू ₹2285068.10 है। इस टेंडर में भी उक्त आरओबी का निर्माण पूरा करने की अवधि छह महीने ही रखी गई है, जबकि यह निश्चित है कि छह महीनों में यह तो क्या, कोई भी ब्रिज (आरओबी) बनकर तैयार नहीं हो सकता। जबकि इसके साथ अन्य कई कार्य भी किए जाने हैं।

आखिर कब तक चलेगा यह पिक एंड चूज का खेल? यह कहना है उत्तर रेलवे निर्माण संगठन में कार्यरत कुछ फील्ड सुपरवाइजरों का। उनका कहना है कि “यह सब ऊपर बैठे बड़े लोगों (अधिकारियों) का खेल है, जो न केवल कर्मचारियों को, बल्कि ठेकेदारों को भी बेवकूफ बनाते हैं और अपनी जेबें भरते हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि “जो कोई इनसे फाइट करता है, उसे ये सब मिलकर बरबाद कर देते हैं।” वह कहते हैं कि वी. के. गुप्ता और बी. डी. गर्ग पर चूंकि कोई कार्रवाई नहीं हुई, इसलिए उनके द्वारा सेट किया गया भ्रष्टाचार का सिस्टम अब यहां परंपरा बन चुका है।

कर्मचारी और कांट्रैक्टर कहते हैं –

ऊपर तक मिले हैं कंस्ट्रक्शन अधिकारी!

जिन पर रिश्वतखोरी ने की हुई है सवारी!!

विशेष: टेंडर्स में “एडवरटाइज्ड वैल्यू” का कोई अर्थ नहीं निकलता। इन छद्म शब्दों का कोई औचित्य भी प्रमाणित नहीं होता। अतः इसे पहले की ही भांति “एस्टीमेटेड कास्ट” यानि “अनुमानित लागत” लिखा जाए और यह आंकड़ा, अंकों के साथ-साथ अक्षरों/शब्दों में भी लिखी जानी चाहिए!

#BidCapacity #NorthernRailway #GMNRly #Construction #IndianRailway #CVCIndia #Rohtak_Meham_Hansi #ROB #MIPL 





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भोपाल मंडल को जुलाई 2020 माह में 69.59% अधिक माल राजस्व की प्राप्ति – RailSamachar

रेलवे की माल परिवहन आय और रेलवे के माध्यम से माल लदान बढ़ाने के लिए भोपाल मंडल, पश्चिम मध्य रेलवे द्वारा लगातार प्रयास किया जा रहा है।

रेलवे बोर्ड के निर्देशानुसार भोपाल मंडल द्वारा व्यापारियों, व्यावसायियों, व्यापार/वाणिज्य संगठनों, फैक्ट्री मालिकों, माल उत्पादकों और मार्केटिंग कंपनियों से संपर्क कर रेलवे के जरिए माल परिवहन की संभावनाओं को तलाशकर अधिक से अधिक माल लदान के साथ पीस-मील माल लदान को भी रेलवे की तरफ आकर्षित करने का प्रयास किया जा रहा है।

इसी क्रम में बल्क माल लदान के साथ-साथ पीस-मील माल लदान के तहत जुलाई 2020 में भोपाल मंडल के विभिन्न माल गोदामों और साइडिंग्स से फर्टिलाइजर, पीओएल, रेलवे गुड्स, कंटेनर एवं खाद्यान्न आदि के कुल 255 रेक 0.65 मिलियन टन माल कुल 11966 वैगनों में लोड करके विभिन्न गंतव्य स्थानों को भेजा गया।

इससे भोपाल मंडल को जुलाई 2020 माह में 69.43 करोड़ रुपए की आय प्राप्त हुई है, जो कि गत वर्ष की समान अवधि में 148 रेक और 7633 वैगनों में लोड किए गए 0.40 मिलियन टन माल से प्राप्त कुल 40.94 करोड़ के राजस्व की अपेक्षा 69.59% अधिक है।

उल्लेखनीय है कि व्यापारियों, व्यावसायियों, व्यापार/वाणिज्य संगठनों, फैक्ट्री मालिकों, माल उत्पादकों और मार्केटिंग कंपनियों को रेलवे के जरिए माल लदान करने के अलावा पीस-मील माल लदान करने की भी सुविधा प्रदान की गई है। इससे फुटकर व्यापारियों को भी पर्याप्त लाभ मिलेगा।

“फुटकर व्यापारी यदि अपना माल सिर्फ दो-चार कंटेनरों में भेजना चाहते हैं, तो वे वैगन लोड रेट पर मालभाड़ा जमा करके अपने माल का लदान कर सकते हैं। इसके अलावा यदि वे ट्रेन लोड पर माल का परिवहन करना चाहते हैं, तो भी उन्हें मालभाड़ा प्रोत्साहन योजनाओं का लाभ मिलेगा।”

यह जानकारी जनसंपर्क विभाग, भोपाल मंडल द्वारा जारी एक विज्ञप्ति में दी गई है।





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चिनॉय सेठ, “जब खुद का घर शीशे का हो, तो दूसरों के घरों में पत्थर नहीं फेंका करते!”

सरकार के खर्चों और सरकारी विभागों में हो रहे भ्रष्टाचार पर सरकार का कोई अंकुश नहीं

सुरेश त्रिपाठी

रेलमंत्री पीयूष गोयल द्वारा रेल अधिकारियों-कर्मचारियों को मिल रही सुविधाओं की समीक्षा करने और री-एंगेज्ड कठपुतली चेयरमैन, रेलवे बोर्ड यानि “वीकेन यादव” द्वारा राममंदिर के शिलान्यास के दिन 5 अगस्त को रेल अधिकारियों के बंगला प्यून हटाने के बारे में दिए गए बचकाने संदेश/आदेश के बाद पूरी रेलवे वर्कफोर्स में नीचे से ऊपर तक बहुत कड़ी और जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई है। रेलमंत्री और सीआरबी के तमाम बचकाने निर्णयों को अब तक जैसे-तैसे झेल रहे रेलकर्मी-अधिकारी उनके इस एक निर्णय से अचानक हड़बड़ाकर उठ खड़े हुए हैं, क्योंकि यह निर्णय उनके परिवारों की सुरक्षा और उनकी गरिमा तथा स्वाभिमान को प्रभावित करने वाला है।

रेलमंत्री और सीआरबी के इस कुटिल एवं अनैतिक निर्णय के खिलाफ जहां सभी जोनल अधिकारी संगठनों द्वारा न सिर्फ उन्हें पूरे जस्टिफिकेशन के साथ ज्ञापन भेजे जा रहे हैं, बल्कि उन्होंने यह सुविधा जूनियर/सीनियर स्केल पर भी लागू करने की पुरजोर वकालत की है।

कार्मिक सुविधाओं में कटौती, भ्रष्टाचार पर कोई लगाम नहीं

एक तरफ जहां सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के डीए/आरए में पहले ही डेढ़ साल तक की पाबंदी लगा दी है, वहीं अब उनके वेतन और पेंशन पर भी 20% की कटौती किए जाने का ऐलान किया जा रहा है। इसके साथ ही मितव्ययिता और लागत खर्च में कटौती के नाम पर अन्य कई भत्तों में कटौती की घोषणा की जा चुकी है। जबकि सरकार के खर्चों और सरकारी विभागों में हो रहे भ्रष्टाचार पर सरकार का कोई अंकुश नहीं लग पा रहा है।

इसके अलावा अब रेल अधिकारियों और कर्मचारियों की तैयारी यह भी दिख रही है कि यदि रेलमंत्री नहीं मानते हैं और अपनी मनमानी करने पर अड़े रहते हैं, तो रेल मंत्रालय में उनके द्वारा लगाई गई उनकी वैयक्तिक फौज के कारनामों को भी उजागर करने का उन्होंने मन बना लिया गया है।

ऐसा लगता है कि मंत्री की इस निजी फौज द्वारा किए जा रहे घोर अपमान और मनमानी से अब ये सभी रेल अधिकारी बुरी तरह तंग आ चुके हैं। इसीलिए शायद वे ऐसे ही किसी मौके की तलाश में थे कि कब वे मंत्री और उनके निजी सहायकों की करतूतों का पर्दाफाश कर सकें।

“करो या मरो” की स्थिति ला खड़ी की रेलमंत्री ने!

क्रिया की प्रतिक्रिया होना प्राकृतिक सिद्धांत है। यह हमारा वैदिक साहित्य बहुत पहले से कहता आ रहा है और जिसे बाद में प्रतिपादित करके सर न्यूटन विज्ञान में अमर हो गए। और यह भी हर निकृष्ट से निकृष्ट और निकम्मे से भी निकम्मे आदमी, यहां तक कि कबीरदास कह गए हैं कि “मरी खाल की स्वांस सों, लौह भसम होई जाए” का जांचा-परखा सत्य है कि आदमी तब तक प्रतिक्रिया नहीं करता जब तक कि उसकी गरिमा और सम्मान को चोट नहीं लगती। और ये भी कि आदमी अपने तक तो बर्दाश्त करता है, पर जब बात उसके परिवार की सुरक्षा और इज्जत की आ जाती है, तब वह इसके विरुद्ध अपनी पूरी ताकत से प्रतिकार करने के लिए उठ खड़ा होता है। पिछले पांच-छह सालों से हर दिन अनाचार, अत्याचार, उत्पीड़न झेल रहे और अपमानित हो रहे रेल अधिकारियों और कर्मचारियों के सामने रेलमंत्री और सीआरबी ने अब “करो या मरो” की यही स्थिति लाकर खड़ी कर दी है।

रेलमंत्री ने “कमर के नीचे वार” किया

एक पूर्व मंत्री के साथ काफी समय तक काम कर चुके एक वरिष्ठ रेल अधिकारी ने रेलवे के वर्तमान निजाम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि एक समय था जब इन्हीं रेलकर्मियों-अधिकारियों की बदौलत रेलवे ने हर फील्ड में बड़े-बड़े कीर्तिमान स्थापित किए थे, क्योंकि इन्हें सक्षम नेतृत्व मिला था। उनका कहना है कि वर्तमान रेलमंत्री और उनके सलाहकार अब तक रेलवे में जो भी ऊटपटांग उठापटक कर रहे थे, उसका सीधा प्रभाव किसी व्यक्ति विशेष या रेल कर्मचारियों-अधिकारियों के परिवारों पर नहीं पड़ रहा था। पहली बार रेलमंत्री ने एक ऐसा बचकाना और द्वेषपूर्ण निर्णय लिया है, जो सीधे अधिकारियों और उनके परिवारों को हिट कर रहा है, इसे ही अंग्रेजी में “below the belt hit” (कमर के नीचे वार) करना कहा जाता है।

जरूरी था विभिन्न स्तर पर स्टेक होल्डर्स से विचार-विमर्श

उनका स्पष्ट मत है कि अवल्ल तो मंत्री को ऐसा करना ही नहीं चाहिए। अगर इनको कुछ करना ही था तो इस तरह के मामले में जल्दबाजी नहीं करते और सभी जोनों के अधिकारी संगठनों, हर आयु वर्ग के अधिकारियों तथा उनके विभिन्न ट्रेनिंग इंस्टिट्यूटस से भी विचार-विमर्श कर लेते, क्योंकि हम लोगों के समय भी और प्रायः सभी रेलमंत्रियों के समय टीएडीके और सैलून का मुद्दा कुछेक कारणों से जब तब आता रहा है, लेकिन हम लोगों ने यह देखा कि रेल अधिकारियों के काम की प्रकृति के हिसाब से यह व्यस्था जरूरी भी है और होनहार युवाओं को रेलवे को जॉइन करने का  सबसे बड़ा आकर्षण/इंसेंटिव भी।

वह आगे कहते हैं कि ऐसे में कोई भी परिपक्व मंत्री अपने मंत्रालय के अधिकारियों और कर्मचारियों की उपलब्ध सुविधाओं में अगर कोई इजाफा नहीं करता है, तो उनमें छेड़छाड़ भी नहीं करता और खासकर जो निर्णय सीधे व्यक्तिगत स्तर पर और परिवारों को प्रभावित करता हो, उसे तो मंत्री कतई नहीं छूता है।

नेतृत्व की अक्षमता और सैडिस्टिक मानसिकता में इंसानियत का अभाव

एनडीए सरकार के कार्यकाल में ही रहे एक अन्य रेलमंत्री के साथ जुड़े एक और वरिष्ठ रेल अधिकारी का यह स्पष्ट मानना था कि रेलवे के अधिकारियों और कर्मचारियों जैसी टारगेट ओरियंटेड वर्कफोर्स शायद ही किसी अन्य विभाग मंत्रालय में होगी। उन्होंने कहा कि यह भी सही है कि वस्तुत: लीडरशिप जैसी होगी, ऑर्गनाइजेशन अपना रिजल्ट भी वैसा ही देगा। आज रेलवे की जो दुर्व्यवस्था है उसका सीधा कारण सिर्फ और सिर्फ नेतृत्व की अक्षमता ही है।

कोई निर्णय कैसे अपने घोर समर्थकों को भी विरोधी बना सकता है, इसकी बानगी तब देखने को मिली, जब इलेक्ट्रिकल के ही एक वरिष्ठ अधिकारी इसके लिए सीआरबी पर ही फटते नजर आए। उनका कहना था कि कम से कम रेलवे में काम किए सीआरबी “वीकेन यादव” जैसे एक अधिकारी से ऐसी अपेक्षा नहीं थी। उन्होंने कहा कि यदि वीकेन यादव के मन में टीएडीके के मामले को लेकर कुछ चल रहा है, या मंत्री ने इस पर कुछ करने को उनसे कहा था, तब भी कोरोना जैसी संक्रामक महामारी के समय में उन्हें इतनी तो इंसानियत जरूर दिखानी चाहिए थी कि अधिकारियों को एक माह का एडवांस नोटिस दे देते कि “फिलहाल इसे 1 सितंबर या 1 अक्टूबर से रोका जाएगा, जब तक इस पर आगे कोई निर्णय न हो जाए।”

उनका कहना था कि तब कम से कम जिन अधिकारियों ने अपना टीएडीके सरेंडर कर दिया है और जिनके टीएडीके की बहाली की प्रक्रिया चल रही है, उन्हें यह मिल जाता (ध्यान रहे कि पूरी भारतीय रेल में ऐसे बहुत ज्यादा मामले नहीं होंगे) तथा कोरोना काल में उनका परिवार इस तरह की असहाय स्थिति में अपने को नहीं पाता। इसके अलावा जिनके टीएडीके का समय पूरा हो गया है और जो सरेंडरिंग की प्रक्रिया शुरू करने वाले थे, वे भी तब तक रुक जाते, जब तक इस पर कोई सर्वसम्मत निर्णय नहीं हो जाता।

उनका कहना था कि “लेकिन यहां तो सैडिस्टिक तरीके से यह धमकी दे दी गई कि 1 जुलाई से भी जिसकी बहाली हो गई है, उसका भी रिव्यू होगा।” उन्होंने कहा कि अपनी समर्पित वर्कफोर्स अथवा अपने सहयोगियों के साथ इससे बड़ा भद्दा मजाक और ज्यादाती क्या हो सकती है? वह भी तब, जब खुद पूरे सेवाकाल में उन्होंने इस सुविधा का भरपूर इस्तेमाल किया और अब भी कर रहे हैं!

कई अधिकारियों और कर्मचारियों का यह भी कहना है कि रेलमंत्री अपने किसी भावी लाभ को ध्यान में रखकर अपना एजेंडा पूरा करने और रेलवे को बदनाम करने के लिए पहले बहुत ही गंदे और ओछे तरीके से तोहमत लगाते हैं, और फिर जबरदस्ती उसके पीछे पड़ जाते हैं। ऐसा ओछापन आज तक शायद ही किसी रेलमंत्री ने दिखाया होगा।

पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़े वंचितों के बारे में भी सोचना होगा

उनका कहना है कि, “रेलमंत्री को पहले यह तो पता कर लेना चाहिए कि भले ही उनका कोई भी पूर्वाग्रह हो, लेकिन यह बहुत बड़ा सत्य है कि बंगला प्यून या टीएडीके के माध्यम से अधिकांश उन वंचित और आर्थिक, सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को एकमात्र सरकारी रोजगार का अवसर मिल पाता है, जो तबका सिर्फ और सिर्फ मेहनत के बूते पर ही जिंदा रहता है। जो सामाजिक तौर पर न तो किसी प्रतियोगी परीक्षा की दौड़ में आने वाले खर्च को वहन करने में सक्षम होता है और न ही मेहनत के अलावा उसका कोई मेरिट और जुगाड़ ही होता है। समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े ये लोग किसी भी पारंपरिक चयन प्रक्रिया के माध्यम से कोई भी सरकारी नौकरी कभी पा ही नहीं सकते।”

चाबुक और हिकारत से हांकने पर काम नहीं होता

उनका स्पष्ट मानना है कि “कायदे से यह सुविधा जूनियर और सीनियर स्केल अधिकारियों को भी मिलनी चाहिए, क्योंकि हर बेहतरीन ऑर्गनाइजेशन अपने कर्मचारियों को दिए गए इंसेंटिव से ही परखा और पहचाना जाता है। उसी से किसी कंपनी की आउटपुट निर्धारित होती है और कर्मचारी जब पूरी तरह से अपने मालिक में गार्जियन का भाव देखते हैं, तो अपना बेहतर देते हैं। टाटा ग्रुप इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। लेकिन जिस कंपनी  का मालिक चाबुक से और हिकारत से देखते हुए अपने कर्मचारियों अथवा मातहतों को हांकने की कोशिश करता है, वह जल्दी ही अपने पुरखों के द्वारा खड़ी की गई सम्पति का नाश कर देता है। वर्तमान रेलमंत्री शायद यही कर रहे हैं।”

यहां रेल मंत्रालय (रेल भवन) के गलियारों में चल रहे कई किस्सों में से एक मजेदार किस्सा एक अधिकारी ने शेयर किया –

“एक अन्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मजाक में एक सीरियस बात अपने साथ रुड़की में पढ़े एक रिटायर्ड बोर्ड मेंबर से एक बार कहा कि गनीमत है कि ये रेलमंत्री ही हैं, अगर ये रक्षामंत्री बन जाते, तो सबसे पहले सेना को खत्म कर देते और कहते चीनी आउटसोर्स एजेंसी से इनसे सस्ते में आदमी और हथियार दोनों डिप्लॉय हो जाएंगे। बाद में वह इसके फायदे भी गिना देंगे कि पहले तो कोई हिंदुस्तानी अब बॉर्डर पर मरेगा नहीं और दूसरे जहां एक मिलिट्री डिवीजन को मेनटेन करने पर 100 रुपए खर्च होते थे, वहां अब चाइनीज और चीनी एजेंसियां 30 रुपए में ही यह काम करेंगी। या फिर वे संभवतः यह भी बता देते कि “चीन अब इस आउटसोर्स के बदले उल्टे सरकार को भी 1000 रुपए हर महीने देने का ऑफर कर रहा है और इसी लागत विष्लेषण (कॉस्ट एनालिसिस) के आधार पर चीनी, पाकिस्तानी एजेंसियों और हिजबुल आदि को भी लेह, लद्दाख, कश्मीर, पंजाब, राजस्थान आदि बॉर्डर पर देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने का काम मिल जाएगा।” (बहुत से लोग तब तक इस नूतन प्रयोग की वाहवाही भी करेंगे, जब तक कि देश पर साक्षात चीन या पाकिस्तान का कब्जा न हो जाए।)

सुरक्षा के साथ खिलवाड़ साबित होगी कोई भी नई व्यवस्था

अब तक का यह अनुभव रहा है कि बीपी/टीएडीके माध्यम से आने वाले लोग कैटेगिरी चेंज होने पर जिस जिस विभाग में काम करते हैं, वे सबसे ज्यादा बेहतर, अनुशासित और कर्मठ मानव संसाधन सिद्ध हुए हैं। किसी और माध्यम से यह व्यवस्था थोपने पर यह न सिर्फ घातक सिद्ध हो सकती है, बल्कि अधिकारियों और उनके परिवारों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ भी होगा।

इसके कई उदाहरण मौजूद हैं। 2004 में इटारसी डीजल लोको शेड में तैनात रहे एक सीनियर डीएमई की घर में अकेली पत्नी की हत्या बंगला प्यून ने ही की थी। इसी प्रकार दक्षिण मध्य रेलवे की लालागुड़ा वर्कशॉप में पदस्थ रहे एक अधिकारी का परिवार बंगला प्यून की क्रूरता के चलते ही अकारण मौत के मुंह में समाकर बरबाद हो गया था।

इसी तरह जब तक रेलवे में रेल से जुड़े लोगों की बहाली होती रही अथवा ट्रेड अप्रेंटिस के माध्यम से स्किल्ड मानव संसाधन लाया जाता रहा, तब तक रेलवे का काम सुचारु रूप से चलता रहा। परंतु जब से यस व्यवस्था खत्म करके राजनीतिज्ञों के फायदे के लिए आरआरबी/आरआरसी जैसी भ्रष्टतम व्यवस्था के माध्यम से कथित पढ़े-लिखे लोगों को लाया जाने लगा, तब से उनसे काम लेना रेल अधिकारियों के लिए न सिर्फ एक बड़ा सिरदर्द साबित हुआ है, बल्कि रेलवे सहित रेलयात्रियों की भी संरक्षा और सुरक्षा हर स्तर पर प्रभावित हुई है।

जब वर्तमान व्यवस्था में, जहां सब कुछ जांच-परखकर किया जाता है, वहां जब अधिकारी और उनका परिवार सुरक्षित नहीं है, तब आरआरसी/आरआरबी जैसी महाभ्रष्ट व्यवस्था से आने वाले किसी अनजान, अज्ञात आदमी को रखे जाने पर क्या स्थिति हो सकती है, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

पहले आरआरसी से भर्ती लोगों से काम तो करवा लें रेलमंत्री

अधिकारियों का कहना है कि कुछेक विभागों, जिनमें सरप्लस मैनपावर है, उनके कुछ अधिकारियों को छोड़ कर बाकि सभी अधिकारियों की दिनचर्या सिर्फ एकमात्र टीएडीके के ऊपर ही निर्भर होती है। उनका कहना है कि रेलमंत्री पहले तो आरआरसी आदि से ट्रैकमैन, हेल्पर खलासी आदि के लिए बहाल हुए लोगों से ही व्यवस्थित काम करावा लें, वही बहुत होगा। इसके बाद ही आरआरसी, कांट्रेक्ट और आउटसोर्सिंग एजेंसियों से टीएडीके लगाने पर विचार करें! धीरे से उनका यह भी कहना है कि मंत्री जी शायद इसमें भी किसी पार्टी कार्यकर्ता या अपने सहयोगी को घुसाने की सुविचारित दीर्घावधि योजना की संभावना तलाश रहे हैं। जैसा कि उन्होंने ईएनएचएम आदि जैसी भ्रष्टाचार पैदा करने वाली कई अन्य नई योजनाओं को लागू करके किया है।

रेल परिवार के सामने “विलेन” बन गए मंत्री और सीआरबी

उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस एक निर्णय ने एक ही झटके में रेलमंत्री और सीआरबी “वीकेन यादव” को हर रेल अधिकारी के घर में “विलेन” के रूप में खड़ा कर दिया है। अब तक तो वे उन्हें वर्षों से स्थापित और सुचारू रूप से चल रही रेल व्यवस्था को सिर्फ तोड़ते-फोड़ते और बरबाद करते हुए ही देख रहे थे। उनको यह अंदाजा नहीं था कि रेलमंत्री और सीआरबी उनके घरों में घुसने की इस निम्नता अथवा अनैतिकता तक भी उतर सकते हैं!

जिनके घर शीशे के होते हैं, वह दूसरों के घरों में पत्थर नहीं फेंकते!

रेलवे बोर्ड के कई अति वरिष्ठ उच्च अधिकारी और हाल ही में बोर्ड से रिटायर हुए मेंबर्स, जिन्होंने काफी नजदीक से वर्तमान रेलमंत्री को देखा है और उनकी कार्यशैली को भली-भांति जानते हैं, का मानना है कि शायद इस घटना के कारण रेलमंत्री को ये सीख मिल जाए कि, “जिनके खुद के घर शीशे के होते हैं, उन्हें दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए।”

उनका कहना है कि, “क्योंकि यह मनुष्य की प्रकृति है कि वह तब तक सिर झुकाकर सब कुछ बर्दास्त करता है, जब तक वह देखता है कि उसका असर उसके परिवार, उसकी गरिमा या स्वाभिमान पर नहीं पड़ रहा, लेकिन जब इस सब पर असर पड़ने लगता है, तब छोटा से छोटा तथा कमजोर से कमजोर आदमी भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूरी ताकत से उसका प्रतिकार करता ही है।”

किसके लिए काम करती है मंत्री के साथ लगी फौज?

कई रेल अधिकारियों का कहना है कि अधिकांश रेल कर्मचारी और अधिकारी जो भी काम करते हैं, वह तो रेल के लिए और देश के लिए करते हैं। लेकिन रेलमंत्री तो सिर्फ अपने परिवार (कार्यकर्ताओं) के लिए ही काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि “भारत सरकार में ये पहले कॉर्पोरेट स्टाइल में काम करने वाले मंत्री हैं, जो सिर्फ रेल मंत्रालय में ही अपने 70 आदमियों की एक बड़ी फौज अपने साथ रखे हुए हैं, बाकी दो मंत्रालय और भी हैं उनके पास। हालांकि यह बात अलग है कि ये बहुत कुछ करते हुए दिखाई देते हैं, जिसमें रेलवे की स्थापित कार्यशैली और रेलकर्मियों एवं अधिकारियों को मिली सुविधाओं से सौतिया डाह के चलते उन्हें बदनाम करने की मात्रा ही ज्यादा रही है, पर जमीनी स्तर पर इनसे आज तक कुछ किया नहीं जा सका है।”

वह आगे कहते हैं कि, “स्पष्टतः रेलमंत्री के साथ लगी निजी लोगों की यह बड़ी फौज उनकी व्यक्तिगत पसंद के, व्यक्तिगत कारणों से और व्यक्तिगत तथा पारिवारिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही तो है। यह फौज रेल के लिए तो कतई काम नहीं कर रही और न ही देश के लिए कर रही है, तो आखिर अपनी इस फौज को किस महान कार्य पर लगा रखा है रेलमंत्री ने?” यह उनका सीधा सवाल है।

उनका कहना है कि अगर मंत्री के ही तर्कों का सहारा लिया जाए, तो रेलवे के 14 लाख लोगों में से रेलवे और देश के काम के लिए बड़ी आसानी से उपयुक्त और उपयोगी आदमी ढूंढे जा सकते हैं, इस सच्चाई के अलावा कि मंत्री आधिकारिक तौर पर अपनी पसंद से 5/6 लोगों को रख सकते हैं।

फेल होने की राह पर अग्रसर रेलमंत्री

यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि मंत्रियों और सांसदों में तब इस बात को लेकर कितनी नाराजगी थी, जब वैयक्तिक सहायक के रूप में प्रधानमंत्री ने कुछ मानक निर्धारित कर दिए थे और संघ से जुड़े लोगों को वरीयता दी जाने लगी थी। लेकिन फिर भी बाकी कौन होंगे, क्यों होंगे, कैसे होंगे, तब तुम घर पर उससे काम करवा सकोगे या साथ रखोगे, इसे प्रधानमंत्री ने रेलमंत्री के जैसी सैडिस्टिक मानसिकता से निर्देशित नहीं करवाया, क्योंकि यदि वे ऐसा करते तो शायद अब तक पार्टी में भयंकर विद्रोह हो गया होता और पार्टी खत्म होने के कगार पर कब की पहुंच गई होती। अधिकारियों का स्पष्ट मानना है कि अपने ऐसे ही सहायकों की वजह से इनके पहले वाले मंत्री फेल हुए थे और अब यह भी इसी वजह से उसी राह पर अग्रसर हैं।

आने वाले समय में सबसे कमजोर नब्ज साबित होगा रेल मंत्रालय

कई अधिकारियों और कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों का कहना है कि अभी तक तो दूसरे मंत्रालय के भ्रष्टचार की चर्चाएं होती थीं, लेकिन अब अगर कोई दूसरी सरकार आएगी, तो इस सरकार की सबसे कमजोर नब्ज रेल मंत्रालय ही होगा, क्योंकि जिस तुगलकी तरीके से इसको तहस-नहस किया जा रहा है, और जिस मनमाने तरीके से रेलवे को और इसकी गतिविधियों तथा संसाधनों को तोड़-मरोड़कर बेचा जा रहा है, वह स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा सुनियोजित घोटाला है, जिसकी सीधी मार इस देश की आम जनता पर पड़ेगी और फिर क्रमिक जांचों की शुरुआत रेल मंत्रालय से ही होगी।

कुछ अधिकारियों का यह भी कहना था कि इस सरकार को इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि तमाम दुश्वारियों के बावजूद भी अधिकांश लोग राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री मोदी के साथ खड़े हैं, लेकिन इस तरह के निर्णय से ये लोग बाध्य किए जा रहे हैं कि वे इस सरकार के विरुद्ध सिर्फ कुछ बोलें ही नहीं, बल्कि कुछ पुख्ता करें भी। और यही अथवा ऐसी ही कुछ अन्य साजिशें रेल मंत्रालय चला रहे लोगों द्वारा सरकार के खिलाफ की जा रही हैं। 

अंततः इस बात का ख्याल रेलमंत्री और सीआरबी को होना ही चाहिए कि “सब दिन होत न एक सामना!”

क्रमशः पढ़ें – “एक छत के नीचे कैसे चल रही है आरपीएफ में दोहरी व्यवस्था!”





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कोटा मंडल, पश्चिम मध्य रेलवे में लगातार जारी हैं गंभीर अनियमितताएं

बोर्ड की रोक के बावजूद किया जा रहा है नए पदों का सृजन

सुरेश त्रिपाठी

रेलमंत्री पीयूष गोयल के निर्देश पर रेलवे बोर्ड द्वारा सभी जोनल रेलों और उत्पादन इकाईयों को लागत खर्चों में कटौती करने संबंधी कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके बावजूद कुछ जोनों/मंडलों द्वारा बोर्ड के इन निर्देशों को तनिक भी तवज्जो नहीं दी जा रही है। इनमें से पश्चिम मध्य रेलवे का कोटा मंडल भी शामिल है। कार्मिक शाखा, कोटा मंडल द्वारा 10 जून 2020 को पत्र सं. ईसी/1025/34/1, भाग-4 तथा समसंख्यक पत्र दि. 15.07.2020 जारी करके वाणिज्य निरीक्षकों के 4 रिक्त पदों के स्थान पर 6 अतिरिक्त यानि 6 नए पदों के सृजन के साथ कुल 10 वाणिज्य निरीक्षकों का चमन किया जा रहा है। इसकी परीक्षा गुरुवार, 6 अगस्त को मंडल प्रबंधक कार्यालय, कोटा में रखी गई है।

उल्लेखनीय है कि रेलवे बोर्ड द्वारा 2 जुलाई को नए पद सृजन के संबंध में पत्र सं. ई(एमपीपी)/2018/1/1 (आरबीई 48/2020) जारी करके लागत खर्च में कमी करने के लिए संरक्षा को छोड़कर अगले आदेश तक कोई भी नया पद सृजित नहीं करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा वर्तमान पदों में 50% की कटौती करने के साथ ही उन पदों, जो पिछले दो वर्षों में सृजित किए गए हैं और उन पर अब तक भर्ती नहीं की गई है, को सरेंडर करने को भी कहा है।

रेलवे बोर्ड ने उपरोक्त संबंधी आदेश 19 जून 2020 को भी अपने पत्र सं. 2015/बी/235 में जारी किया था।

इस पत्र के पैरा-III (ए) के अनुसार आउटसोर्सिंग गतिविधियों, विशेष रूप से ओबीएचएस, लिनन प्रबंधन, स्टेशन क्लीनिंग, लिफ्ट/एस्केलेटर्स मैनिंग और स्टेशन एनाउंसमेंट इत्यादि की समीक्षा गंभीरता से करने का निर्देश देते हुए इन सब गतिविधियों पर हो रहे अमापक खर्च पर कड़ाई से अंकुश लगाने को कहा था।

रेलवे बोर्ड के उपरोक्त निर्देशों के उल्लंघन के अलावा कोटा मंडल की वाणिज्य शाखा में कुछ अन्य गंभीर अनियमितताएं भी उजागर हुई हैं, जिसमें रेलवे बोर्ड के जिन नीति निर्देशों को दरकिनार किया गया है, वह इस प्रकार हैं-

कोटा मंडल द्वारा विभिन्न स्टेशनों पर कैडर में स्वीकृत ग्रुप ‘डी’ सफाई कर्मचारियों के पदों को सरेंडर कर 6 वाणिज्य निरीक्षकों के पदों का सृजन किया गया, जिसका मुख्य कारण पूरे मंडल में स्टेशनों को क्लब करते हुए जोन बनाकर सभी स्टेशनों पर सफाई का कार्य ठेके पर कराने की योजना थी।

कार्मिक कार्यालय के पत्र सं ईसी/1025/34/1 भाग-iv, दि. 10.06.2020 के अंतर्गत 10 वाणिज्य निरीक्षकों (08 अनारक्षित, 01 एससी, 01 एसटी) के पदों की रिक्तियों (लेवल-6 पे-बैंड 9300-34800 + 4200) को भरने हेतु आवेदन मंगाए गए। अब इन पदों पर रिक्तियों को भरे जाने हेतु होने वाली लिखित परीक्षा दि. 06.08.2020, पत्र सं. ईसी/1025/34/1 भाग-४, दि. 15.07.2020 जारी की गयी है।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि रेलवे बोर्ड का पत्र सं. 2015-बी-235 दि. 19.06.2020 के पैरा-III (ए) के अनुसार “आउटसोर्सिंग गतिविधियों – विशेष रूप से ओबीएचएस, लिनन प्रबंधन, स्टेशन क्लीनिंग, लिफ्ट/एस्केलेटर्स मैनिंग और स्टेशन एनाउंसमेंट इत्यादि – की गंभीर रूप से समीक्षा जानी चाहिए और इस पर अंकुश लगाया जाना चाहिए” के आधार पर पूरे मंडल में स्टेशनों को क्लब करते हुए जोन बनाकर सभी स्टेशनों पर सफाई का कार्य ठेके पर देने के जो भी कॉन्ट्रैक्ट थे, वे सभी मंडल रेल प्रबंधक, कोटा द्वारा निरस्त कर दिए गए हैं।

इस हिसाब से जो ग्रुप ‘डी’ सफाई कर्मचारियों के पद सरेंडर किए गए थे, वे भी स्वत: रद्द होने चाहिए थे और जिन पदों को सरेंडर कर जो पद सृजित किए गए थे, वे भी स्वत: रद्द होने चाहिए थे। परंतु कोटा मंडल द्वारा ऐसा कुछ नहीं किया गया।

उपरोक्त नियम के अनुपालन में यथोचित कार्य न करके इन नियमों को ताक पर रखकर वाणिज्य निरीक्षकों के नए पदों के साथ रिक्तियों के लिए कथित रूप से निजी हित साधने हेतु यह परीक्षा करवाई जा रही है, जबकि उक्त नियमों के अनुपालन में पिछले दो सालों में सृजित किए पदों को भी सरेंडर किया जाना है।

बताते हैं कि इस कार्य हेतु फाइल चलाई भी गई परंतु नए सृजित वाणिज्य निरीक्षकों के पदों को डीसीएमआई मैन पावर प्लानिंग पर दबाव बनाकर और उससे लिखवाकर इन पदों को यथावत रखकर केवल कागजी कार्यवाही कर ली गई और इस पर पुनः वित्तीय सहमति लिया जाना उचित नहीं समझा गया तथा गंभीर अनियमितता को मूर्त रूप दिया जा रहा है।

कर्मचारियों का कहना है कि वास्तव में इन पदों के सृजन की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि प.म.रे. मुख्यालय जबलपुर द्वारा दिए गए आदेश में यह प्रावधान दिया गया है कि “यदि कोई पर्यवेक्षक के पद पर लेवल-7, पे-बैंड 9300-34800+4600 ग्रेड पे में हो और प्रशासन उसे अपनी आवश्यकता के अनुरूप वाणिज्य निरीक्षक के पद पर काम लेना चाहे, तो उस पर्यवेक्षक से वर्तमान रिक्ति पर वाणिज्य निरीक्षक का कार्य लिया जा सकता है। तथापि उस पर्यवेक्षक का कार्यकाल 5 वर्ष से अधिक का नहीं होगा।

कर्मचारियों का कहना है कि मुख्यालय का तत्संबंधी आदेश मंडल कार्मिक शाखा के पास अवश्य उपलब्ध होना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि इतनी लचीली पालिसी उपलब्ध होते हुए भी नए पदों के सृजन की आवश्यकता क्यों हो रही है? इसका सीधा मतलब यही निकल रहा है कि मनवांछित व्यक्ति को पदोन्नत करके मनवांछित लाभ कमाने के इरादे से इन सब नियमों को ताक में रखा जा रहा है।

कर्मचारियों ने बताया कि मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय का पत्र सं. ईसी/174/2 (मर्जर ऑफ सीसी/ईसीआरसी दि. 02.01.2019 के अंतर्गत मंडल के समस्त वाणिज्य कैडर, जिसमें बुकिंग, पार्सल, गुड्स, टिकट चेकिंग स्टाफ को मर्ज करने और री-पिन प्वाइंटिंग भी मनवांछित व्यक्ति को पद पर लाने और मनवांछित लाभ कमाने के इरादे से की गई है।

इसी के तहत जहां कोटा बुकिंग और पीआरएस में केवल दो पर्यवेक्षक (एक कैश और एक स्टोर्स) के पद सालों से थे, वहां पर 7-7 पद सृजित कर दिए, जबकि इनका न तो कोई औचित्य है और न ही आवश्यकता है, वहीं कई स्टेशनों पर पर्यवेक्षक के पदों की आवश्यकता है, वहां यह पद सृजित नहीं किये गए हैं।

उनका कहना है कि यदि नए पद सृजित करने ही थे, तो उससे पहले पैरा 6 में वर्णित प.म.रे. मुख्यालय के आदेश में दिए गए प्रावधान का विचार कर उसका लाभ उठाते हुए रेल राजस्व बचाया जा सकता था। परंतु ऐसा नहीं किया गया, क्योंकि फिर वही मनवांछित व्यक्ति को पद पर लाने और मनवांछित लाभ कमाने के इरादे से की जा कोशिश बाधित हो जाती।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि वर्तमान कोटा मंडल की वित्तीय शाखा द्वारा भी कार्मिक शाखा के उक्त 6 नए वाणिज्य निरीक्षकों के पदों के सृजन के औचित्य पर बिना कोई सवाल उठाए आंख मूंदकर वित्तीय सहमति दे दी गई। जबकि रेलवे बोर्ड के उपरोक्त दिशा-निर्देशों के अंतर्गत सफाई वालों के पदों के एवज में जो पद सृजित किए गए हैं, उनकी समीक्षात्मक जांच की जानी चाहिए थी, जो कि वित्तीय शाखा द्वारा नहीं की गई। यह घोर अनियमितता एवं सरासर रेलवे बोर्ड द्वारा जारी किए गए उपरोक्त निर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन है।

रेलवे बोर्ड के उक्त निर्देशों की अवेहलना का आलम यह है कि मंडल प्रशासन ने भी अपनी आंखें बंद कर ली हैं, क्योंकि ऐसा लगता है कि मंडल की कार्मिक, वाणिज्य, परिचालन, वित्त और अन्य शाखाओं में जो खुलेआम कदाचार चल रहा है उस पर मंडल प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं रह गया है।

उपरोक्त तमाम कदाचार की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए और इनकी उच्च स्तरीय जांच कराने के लिए कई कर्मचारियों ने महाप्रबंधक/प.म.रे. को एक ज्ञापन भी सौंपा है और उनसे मांग की है कि गुरुवार 6 अगस्त को होने जा रही परीक्षा को तुरंत रोका जाए।

इस ज्ञापन की प्रतियां उन्होंने वरिष्ठ उप महाप्रबंधक एवं मुख्य सतर्कता अधिकारी, प्रमुख मुख्य परिचालन प्रबंधक, प्रमुख मुख्य वाणिज्य प्रबंधक, प्रमुख मुख्य वित्तीय सलाहकार एवं मुख्य लेखाधिकारी, पमरे/जबलपुर को भी उचित कार्यवाही हेतु प्रेषित की हैं। क्रमशः 





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उत्तर मध्य रेलवे मुख्‍यालय में क्षेत्रीय राजभाषा कार्यान्‍वयन समिति की बैठक संपन्‍न

सभी विभागों, मंडलों और कारखानों द्वारा ई-आफिस में उपलब्ध हिंदी में कार्य करने की सुविधा को विकल्प नहीं, बल्कि संकल्प के तौर पर प्रयोग किया जाए -महाप्रबंधक

प्रयागराज ब्यूरो : महाप्रबंधक/उत्‍तर मध्‍य रेलवे राजीव चौधरी की अध्‍यक्षता में क्षेत्रीय राजभाषा कार्यान्‍वयन समिति की बैठक संपन्‍न हुई। इस ऑनलाइन बैठक में शामिल अधिकारियों को संबोधित करते हुए महाप्रबंधक चौधरी ने कहा कि राजभाषा की परंपरागत बैठक और उसमें होने वाली प्रत्यक्ष चर्चाओं और विचार-विमर्श का विशिष्ट महत्व है, लेकिन कोरोना वैश्विक महामारी के कारण प्रत्यक्ष सामूहिक बैठकों और कार्य-पद्धतियों में जो बदलाव आया है, उससे कार्य-प्रणाली में भी महत्वपूर्ण बदलाव आएगा।

उन्‍होंने कहा कि उत्तर मध्य रेलवे ने इन अत्यंत विषम परिस्थितियों में पूरी मुस्तैदी, समर्पण और निष्ठा के साथ गाड़ियों के संचालन की गतिशीलता बनाए रखी है और हमारे रेलकर्मी कोरोना वायरस की इस महामारी के विरुद्ध योद्धा की भूमिका निभा रहे हैं। इस दौरान सभी वीडियो संदेश और निर्देश हिंदी में ही जारी किए हैं। चिकित्सा, जनसंपर्क एवं अन्य विभागों द्वारा कोविड-19 से बचाव और रोकथाम के लिए जारी पोस्टर, दिशानिर्देश और सूचनाएं हिंदी में तैयार की गईं हैं।

महाप्रबंधक ने कहा कि महामारी के दौरान कार्यालयों में ई-आफिस का प्रयोग किया जा रहा है। ई-आफिस में हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का विकल्प है। उन्होनें सभी विभागों, मंडलों और कारखानों को ई-आफिस में उपलब्ध हिंदी में कार्य करने की सुविधा का, विकल्प नहीं, बल्कि संकल्प के तौर पर प्रयोग करने के निर्देश दिए, साथ ही इसमें हिंदी के मानक यूनिकोड, मंगल फांट का ही प्रयोग करने का सुझाव दिया।

बैठक में भारतीय भाषा, संस्कृति और साहित्य के उन्नायक गोस्वामी तुलसीदास तथा उपन्यास एवं कहानी सम्राट प्रेमचंद की जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित साहित्यिक संगोष्ठी में अपने विचार व्यक्त करते हुए महाप्रबंधक राजीव चौधरी ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास और प्रेमचंद के साहित्य मानवता एवं उच्चादर्शों का संदेश देते हैं। ये दोनों ही महामानव ऐसे साहित्य सर्जक हैं, जिनकी रचनाएं कठिन और प्रतिकूल परिस्थितियों में उम्मीद की रोशनी दिखाती हैं तथा व्यक्ति और समाज का सम्यक पथ प्रदर्शन करती हैं। बैठक के प्रारंभ में महाप्रबंधक द्वारा गोस्‍वामी तुलसीदास और मुंशी प्रेमचंद के चित्र पर माल्‍यार्पण किया गया।

बैठक के प्रारंभ में मुख्‍य राजभाषा अधिकारी एवं प्रधान मुख्‍य वाणिज्‍य प्रबंधक महेन्‍द्र नाथ ओझा ने समिति को अवगत कराया कि प्रयागराज में आयोजित माघ मेला के दौरान मेला क्षेत्र में स्थित उत्‍तर मध्‍य रेलवे के शिविर में राजभाषा के प्रयोग-प्रसार तथा महात्‍मा गांधी के जीवन दर्शन एवं प्रेरक विचारों से संबंधित चित्र प्रदर्शनी लगाई गई। पिछली तिमाहियों में छह हिंदी कार्यशालाएं आयोजित की गईं और कंप्‍यूटर हिंदी कुंजीयन प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवधि के दौरान कई प्रसिद्ध साहित्‍यकारों की जयंतियों के अवसर पर साहित्यिक संगोष्ठियों का भी आयोजन किया गया।

मुख्‍य राजभाषा अधिकारी एम. एन. ओझा ने गोस्‍वामी तुलसीदास और मुंशी प्रेमचंद के साहित्‍य के महत्वपूर्ण पक्षों पर चर्चा करते हुए कहा कि गोस्‍वामी तुलसीदास भारतीय साहित्य के संरक्षक थे और उन्होने जन-जन के हदय में राष्ट्र गौरव एवं राष्ट्रीय अस्मिता की पावन भावना का संभरण किया। उन्होंने कहा कि तुलसीदास के रामराज्य में किसी भी प्रकार के दैहिक, दैविक एवं भौतिक संतापो और बाधाओं की व्‍याप्ति नहीं होती। रामराज्‍य की परिकल्‍पना नैतिक मूल्‍यों और सामाजिक मानदंडों से अनुप्राणित है।

ओझा ने कहा कि प्रेमचंद पहले वास्‍तविक कथा सम्राट हैं, क्‍योंकि इसके पूर्व तिलस्‍मी और ऐयारी प्रधान कथा साहित्‍य ही रचे जाते थे। प्रेमचंद का कथा साहित्‍य आदर्श से यथार्थ की ओर प्रस्‍थान का साहित्‍य है। प्रेमचंद का मानना था कि साहित्यिक सौंदर्य चेतना की कसौटी को बदलना चाहिए और साहित्‍यकारों को श्रम के स्‍वेद की महत्‍ता पर अपनी लेखनी चलानी चाहिए। ओझा के अनुसार तुलसीदास और प्रेमचंद दोनों का साहित्‍य अन्‍याय और अत्‍याचार के वि‍रुद्ध उठाई गई सशक्‍त आवाज है।

बैठक में अपर महाप्रबंधक रंजन यादव सहित सभी प्रधान विभाग प्रमुख, मंडलों के अपर मंडल रेल प्रबंधक, कारखानों के मुख्‍य कारखाना प्रबंधकों एवं अन्‍य सदस्‍य अधिकारियों ने वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से भाग लिया। सभी अधिकारियों ने अपने-अपने कार्यालयों में हो रही राजभाषा प्रगति से महाप्रबंधक को अवगत कराया। बैठक का संचालन वरिष्‍ठ राजभाषा अधिकारी चंद्रभूषण पांडेय ने किया तथा उप मुख्‍य राजभाषा अधिकारी शैलेंद्र कुमार सिंह ने धन्‍यवाद ज्ञापित किया।





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एलडीसीई में अब मनमाने तरीके से नहीं दे पाएंगे अंक – RailSamachar

गड़बड़ी होने पर सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी चयन समिति

आसानी से अब परीक्षा रद्द नहीं करा पाएंगे विजिलेंस माफिया

वाया विजिलेंस, ग्रुप ‘बी’ अधिकारी बनने का रास्ता भी अब हुआ कठिन

सुरेश त्रिपाठी

रेलवे बोर्ड ने सोमवार, 20 जुलाई 2020 को एक पत्र (सं. ई(जीपी)/2018/2/31) जारी करके सभी जोनल रेलों और उत्पादन इकाईयों को ग्रुप ‘सी’ से ग्रुप ‘बी’ में होने वाली पदोन्नतियों के लिए ली जाने वाली विभागीय परीक्षा (एलडीसीई) के सभी प्रश्नों को शत-प्रतिशत ऑब्जेक्टिव करने का आदेश दिया है।

अब ग्रुप ‘सी’ से ग्रुप ‘बी’ ऑफीसर की परीक्षा के सभी प्रश्न ऑब्जेक्टिव टाइप होंगे। बस निशान लगाते जाओ। इस प्रणाली के रेलवे को फिलहाल कई लाभ होंगे, जैसे-

अब विभाग प्रमुख (पीएचओडी) मेहनत से परीक्षा के प्रश्न पत्र तैयार करेंगे और जांचने वाले अधिकारी भी अब मनमाने तरीके से अंक नहीं दे पाएंगे, जैसा कि वे अब तक वर्णनात्मक प्रश्नों में कर पाते थे।

अब विजिलेंस वाले बिना वजह कोई केस नहीं बना पाएंगे, जैसा कि वे अब तक वर्णनात्मक उत्तरों को लेकर काॅपी जब्त कर पूरे के पूरे सेलेक्शन को खटाई में डाल दिया करते थे, वह भी महज इसलिए कि या तो उनकी “सेवा-पानी” नहीं हुई होती थी, या वे (डेपुटेशन पर आए विजिलेंस इंस्पेक्टर) फेल हो जाते थे, तो इस तरह पूरे सेलेक्शन को कैंसल कराने में कोई कसर न छोड़ते थे। फिर चाहे अधिकारियों के खिलाफ ही उन्हें विजिलेंस केस क्यों बनाने पड़ें हों।

प्रश्न पत्र अब तक संबंधित विभाग के पीएचओडी ही सेट करते रहे हैं। इस सर्कुलर के बाद से अब जीएम उत्तर पुस्तिकाएं जांचने के लिए जिस अधिकारी को नामित करेंगे, वह चयन समिति का सदस्य भी होना चाहिए।

अब ऐसा नहीं होगा कि पीसीपीओ ने पेपर सेट किया और अपने अधीनस्थ सीपीओ/एडमिन या सीपीओ/आईआर को पेपर जांचने पर लगा दिया। अब क्योंकि उसका चयन समिति का सदस्य होना अनिवार्य है, अत: वह जिम्मेदारी से पेपर जांचेगा और किसी भी गड़बड़ी के लिए वह स्वयं तथा सामूहिक रूप से चयन समिति के सभी सदस्य उत्तरदायी होंगे।

यह तो लगभग सर्वविदित है ही, और एक जांचा-परखा तथ्य भी, कि ग्रुप ‘सी’ से ग्रुप ‘बी’ में प्रमोशन के लिए काफी लेनदेन होता है और करीब 90% ग्रुप ‘बी’ प्रमोशन इसी आधार पर होते रहे हैं। उपरोक्त निर्देश जारी करके रेलवे बोर्ड द्वारा अब जो समुचित सुधार और व्यवस्था की गई है, उससे शायद विभागीय वरिष्ठ अधिकारियों के इस विभागीय भ्रष्टाचार पर कुछ लगाम लग सकती है।





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क्या कारण है कि सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे में ही बनते हैं!

आखिर रेलवे बोर्ड के आईआई ही ज्यादा भ्रष्ट, निरंकुश और उत्पाती क्यों होते हैं?

सुरेश त्रिपाठी

रेलवे बोर्ड विजिलेंस ने “आरबी गैंग” के तीनों इंवेस्टीगेशन इंस्पेक्टर (आईआई) को रेलवे बोर्ड से मुक्ति के समसंख्यक आदेश (पत्र सं. 2020/ईआरबी-2/20/1) उसी दिन शुक्रवार, 17 जुलाई 2020 को दोपहर बाद  जीएम/कार्मिक, उत्तर रेलवे के लिए जारी कर दिए गए थे। अब जो अधिकारी इन तीनों कुख्यात आईआई को रेलवे बोर्ड में बनाए रखने की अभी भी पैरवी कर रहे हैं, उनको या तो यह पता नहीं है कि फील्ड में इन्होंने अपने साथ ही उनका भी नाम चर्चित कर रखा है, या फिर उनकी भी कोई मजबूरी है!

क्या बात है कि रेलवे बोर्ड के आईआई ही इतने ज्यादा भ्रष्ट, निरंकुश और उत्पाती होते हैं? “बिना ऊपर की शह और इशारे के ये तो हो ही नहीं सकता है” (अपनी सफाई में तो ये लोग फील्ड में यही कहते फिरते हैं)। इसका कारण खोजने पर जबाब आसानी से मिल जाएगा।

बहरहाल शनिवार, 18 जुलाई को “देर आए, दुरुस्त आए!“ शीर्षक से इन तीनों आईआई को रेलवे बोर्ड विजिलेंस से निकाले जाने की खबर “रेलसमाचार.कॉम” में और रविवार, 19 जुलाई को “कानाफूसी.कॉम” में “रेलवे विजिलेंस का आंख खोल देने वाला सच“ शीर्षक से प्रकाशित होने के बाद से सैकड़ों-हजारों रेलकर्मियों, अधिकारियों, जिसमें रिटायर्ड भी शामिल हैं और साथ ही आईआई का एग्जाम दे चुके कैंडिडेट भी, ने सत्यता उजागर करने पर “रेलसमाचार” का धन्यवाद करते हुए पीईडी/विजिलेंस/रे.बो. के इस आवश्यक कदम की सराहना की है और हर विभाग के कर्मचारी तथा अधिकारी लगातार कई विजिलेंस इंस्पेक्टरों/अधिकारियों की पोल खोलने वाली तथ्यात्मक बातें विभिन्न माध्यमों से साझा कर रहे हैं।

रेलवे बोर्ड और रेलवे बोर्ड विजिलेंस में काम कर चुके कुछ लोगों का तो सबूत के साथ यह भी कहना है कि अगर पिछले कुछ सालों की विजिलेंस फाइलों और मामलों की गहराई से विस्तृत ऑडिट तथा गहन जांच कराई जाए, तो सरकार रेलवे विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन को बंद करना ही पसंद करेगी।

विजिलेंस की आड़ में अब तक जितने भी रेलकर्मियों तथा अधिकारियों के साथ भ्रष्ट और अनैतिक तरीके से अनाचार, अत्याचार, शोषण, उत्पीड़न हुआ है, उसे देखकर तो “आईएसआईएस” भी शर्मशार हो जाएगा और शायद विजिलेंस के इन इंस्पेक्टरों और अधिकारियों में अपने सबसे योग्यतम उम्मीदवार भी मिल जाएंगे।

यह अलग बात है कि सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे कर्मचारियों, अधिकारियों के ही खिलाफ होते हैं। देश के सारे मंत्रालय और सारे पीएसयू को मिलाकर भी सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे में ही बनते हैं। तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि रेलवे ही देश की सबसे भ्रष्टतम संस्था है?

जो लोग रेलवे फील्ड में काम करते हैं और फील्ड में काम करने का लंबा अनुभव रखते हैं, और जो लोग अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण 40-40 साल अपना अमूल्य योगदान देकर रेलवे से रिटायर हो चुके हैं, उनका कहना है कि “ऐसा बिल्कुल नहीं है। वस्तुतः विजिलेंस के लिए वहीं केस होता है, जहां भ्रष्टचार का स्पष्ट मामला हो और जहां उद्देश्य (इंटेंशन) भी स्पष्ट हो। क्योंकि फील्ड में कार्य बहुत सी चीजों पर निर्भर करता है और टाइम फैक्टर बहुत महत्वपूर्ण होता है। अतः फील्ड कर्मचारी, अधिकारी भले ही निर्धारित पॉलिसी का शब्दशः अनुपालन न करें, लेकिन वे रेल हित से कोई समझौता नहीं करते हैं।”

वैसे भी यह एक सर्वज्ञात तथ्य है कि सबसे बड़ा खेल पॉलिसी बनाने में ही होता है, जिस पर किसी विजिलेंस वाले ने रेलवे में अब तक शायद ही कभी कोई केस बनाया होगा। कुछ विभागों में पालिसी बनाई ही इस तरह से जाती है कि रामचरितमानस की चौपाई की तरह उसका कोई भी अपने बुद्धिविलास से किसी भी तरह की व्याख्या कर सकता है, खासकर वाणिज्य, कार्मिक और लेखा विभाग की पॉलिसियां इस बात का उदाहरण हैं।

ऐसे में यदि हरिश्चंद्र भी रेलवे विभाग में काम कर रहे होंगे, तो बहुत अच्छे से कोई इसी माफिया तंत्र के अनुभव का फायदा उठाकर कंप्लेंट कर देगा, तब उनको भी अपनी नौकरी बचाने के लाले पड़ जाएंगे। यही कारण है कि रेलवे में सिर्फ वही कर्मचारी-अधिकारी विजिलेंस केस में ज्यादा फंसते हैं, जो ज्यादा तेजतर्रार और रिजल्ट ओरिएंटेड तथा ईमानदार मनसा वाले होते हैं, जिन्हें दुनियादारी कम, अपना काम ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है।

क्या कोई बता सकता है कि आज तक रेलवे में महाघाघ लोग कभी विजिलेंस के द्वारा पकड़े गए हैं? जिनके लिए काम नहीं, दाम ज्यादा महत्वपूर्ण रहा है, क्या विजिलेंस ने कभी उनको पकड़ा है? अथवा उन पर हाथ डालने की कभी हिमाकत की है? यदि ऐसा कोई घाघ पकड़ा गया है, तो उसे बाहरी एजेंसी (सीबीआई) ने ही पकड़ा है, लेकिन उसमें भी अधिकांश लोग बचकर निकल जाते हैं और जो सीधा रहता है, वही पिसता है। कारण इसके कई हैं, लेकिन एक सबसे बड़ा कारण विजिलेंस में महाघाघ और महाभ्रष्ट इंस्पेक्टरों और अधिकारियों का वर्चस्व होना है। यही है रेलवे विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन की असलियत।

दूसरे मंत्रालयों में यदि सीधे-सीधे करप्शन का मामला नहीं होता है, तो वहां केस नहीं बनता, और न ही जलेबी जैसा घुमाया जाता है। लेकिन रेलवे में महाभ्रष्टों ने अपने को ईमानदार साबित करने का सबसे आसान रास्ता चुना है – दूसरे को बेईमान और भ्रष्ट साबित करने का!

यहां सीधा गणित है, जो जितनी ज्यादा संख्या में दूसरे को बेईमान बताएगा, वह यहां उतना ही बड़ा और ज्यादा ईमानदार माना जाएगा। अपनी खोट छिपाने के लिए और अपने अस्तित्व को न्यायोचित ठहराने के लिए वर्षों से रेलवे विजिलेंस यही कर रहा है।

एक बार यह समीक्षा हो जाए कि विजिलेंस की कार्यवाही से अब तक कितने भ्रष्ट कर्मचारी सही हुए हैं, अथवा सही रास्ते पर आ गए हैं और कितने ईमानदार तथा काम को वरीयता देने वाले कर्मचारियों/अधिकारियों का मनोबल बढ़ा है, विजिलेंस कार्यवाही के बाद कार्य की गति और गुणवत्ता दोनों बढ़ गई है, तब स्थिति एकदम स्पष्ट हो जाएगी। क्योंकि अगर भ्रष्ट आदमी पर कार्यवाही होगी और ईमानदार तथा काम को प्रधानता देने वाले उत्पीड़ित नहीं किए जाएंगे, तो रेलवे ऑर्गेनाइजेशन में काम की गति और गुणवत्ता अपने आप बहुत बढ़ जाएगी।

लेकिन क्या कोई रेल अधिकारी या कर्मचारी यह दावे के साथ कह सकता है कि उसे ये दोनों चीजें रेलवे में कहीं नजर आ रही हैं? जबकि यहां ईमानदार और काम करने वाले या तो हासिये पर डाल दिए गए हैं और पूरी तरह से हतोत्साहित हैं, या फिर किसी परेशानी में पड़ने के भय से उन्होंने निर्णय लेना ही छोड़ दिया है। और यह सब रेलवे विजिलेंस की देन है।

क्या किसी को पता है कि सीबीआई जिन अधिकारियों और कर्मचारियों को लाखों-करोड़ों की घूस लेते रंगेहाथ पकड़ती है, उनके ऊपर विजिलेंस ने क्या कभी कोई केस किया हुआ होता है? उनमें से किसी का भी नाम क्या “एग्रीड लिस्ट” अथवा “सीक्रेट लिस्ट” में भी डाला है? या किसी विजिलेंस वाले को, जो कार्यकाल के बीच में ही हटाया गया हो, क्या उसको इन दोनों लिस्टों में से किसी एक में आज तक कभी डाला गया है? इन सब सवालों का जबाब न में ही मिलेगा।

विजिलेंस माफिया और विभागों के बड़े माफिया मिलकर “एग्रीड लिस्ट” का इस्तेमाल कैसे ईमानदार या इनकी आंख में खटकने वाले अथवा इनके रास्ते के रोड़े बनने वाले कर्मचारी, अधिकारी को निपटाने में करते हैं? और “एग्रीड लिस्ट” को ये माफिया कैसे ब्रह्मास्त्र के रूप में इस्तेमाल करता है? जब ये माफिया हर तरह से प्रयास करके भी किसी ईमानदार कर्मचारी या अधिकारी को फंसाने में कामयाब नहीं हो पाता है, तब क्या करता है! इस पर विस्तार से आगे लिखा जाएगा। क्रमशः





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रास्ते में ऑक्सीजन खत्म होने से भायखला रेलवे अस्पताल पहूंचकर जूनियर क्रू कंट्रोलर की मौत

जूनियर सीसी की असामयिक मौत के लिए सीधे जिम्मेदार हैं कल्याण रेलवे अस्पताल के कार्यकारी सीएमएस और एसीएमएस-कोविड नोडल ऑफ़िसर

मुंबई : कल्याण रेलवे अस्पताल और अराजकता-मनमानी का चोली-दामन का संबंध रहा है, इस बात से कल्याण और आसपास रहने वाले लगभग दस हजार रेलकर्मी बखूबी वाकिफ हैं। इसी अराजकता और मनमानी के चलते एंबुलेंस में बिना जांचे-परखे रखे गए ऑक्सीजन सिलेंडर के रास्ते में खत्म हो जाने से एक जूनियर क्रू-कंट्रोलर की असमय मौत हो गई और कहीं कोई हलचल नहीं हुई। यही वजह है कि कल्याण रेलवे अस्पताल के कुछ डॉक्टरों की मनमानी और सनक लगातार बढ़ती जा रही है। क्रू-कंट्रोलर की इस असामयिक मौत पर सभी रेलकर्मियों में भारी आक्रोश है। मान्यताप्राप्त ज़ोनल रेल संगठन एनआरएमयू, सीआरएमएस, मध्य रेलवे एससी-एसटी रेलकर्मचारी संगठन और मध्य रेलवे ओबीसी रेलकर्मचारी संगठन ने अपने बोर्ड लगाकर मेडिकल विभाग की इस अक्षम्य लापरवाही पर रेल प्रशासन से अपना विरोध प्रकट किया है।

वर्तमान में कल्याण रेलवे अस्पताल के सीएमएस और एसीएमएस का चार्ज संभाल रहे दोनों डॉक्टर महातुनकमिजाज न सिर्फ माने जाते हैं, बल्कि वह वास्तव में ऐसे हैं भी! यह कहना है तमाम रेलकर्मियों का। उनका कहना है कि कल्याण रेलवे अस्पताल की एसीएमएस एवं कोविड की नोडल ऑफिसर की सनक वर्तमान में सातवें आसमान पर है। सुबह से शाम तक अकारण भोंकते रहना, पेशेंट्स को, उनके परिवार वालों को, संकट की घड़ी में मरहम लगाने के बजाय सबके सामने जी-भरकर कोसना, बेइज्जत करने वाला उनका व्यवहार अस्पताल को बूचड़खाने में तब्दील कर रहा है।

रेलकर्मियों का कहना है कि इन डॉक्टर साहिबा का मानना है कि वह जो सोचती हैं, केवल वही सही होता है। वह जो चाहती हैं, वैसा ही हर डॉक्टर, अस्पताल कर्मी, यूनियन पदाधिकारी और अधिकारी भी वैसा ही सोचें, समझें और करें भी। अस्पताल में जब डॉक्टर महोदया चलती हैं, या ऐसा कहना चाहिए कि विचरण करती हैं, तो वहां भर्ती मरीजों अथवा दवा लेने आए रेलकर्मियों की आंखों के सामने फिल्मों में विलेन की एंट्री जैसे अनेकों दृश्य घूम जाते हैं। इनके चीखते-चिल्लाते रहने से अस्पताल की शांति तो भंग होती ही है, बल्कि मरीज और उनके रिश्तेदार तनावग्रस्त हो जाते हैं, पर रेलकर्मी या उनके पारिवारिक सदस्य होने के नाते वह कुछ कह नहीं पाते। इसी बात का यह अहंमन्य डॉक्टर साहिबा तो भरपूर फायदा उठाती ही हैं, बल्कि अस्पताल के अन्य डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ भी इसी बात का भरपूर दोहन करता है।

उनका कहना है कि आए दिन कल्याण रेलवे अस्पताल के मेडिकल स्टोर में अनेकों जरूरी दवाओं का अभाव रहता है। हार्ट जैसी गंभीर बीमारियों में भी अनेकों चालू कंपनियों की, हर बार बदल-बदलकर तथा अलग-अलग पोटेंसी की दवाएं देना यहां की विशेषता है। रेलकर्मियों के मरने-जीने की इनको कतई कोई परवाह नहीं होती। जबकि दबंग यूनियन पदाधिकारियों और अधिकारियों को न सिर्फ ब्रांडेड कंपनी की हर दवा लोकल परचेज (एलपी) करके मुहैया कराई जाती है, बल्कि उनके सामने भीगी बिल्ली बनकर उनकी चापलूसी भी होती है।

उन्होंने बताया कि असामाजिक तत्वों से अस्पताल की सुरक्षा के लिए प्राइवेट सिक्योरिटी लगाई गई है, परंतु उसका भरपूर उपयोग यहां मरीजों और उनके पारिवारिक सदस्यों तथा अस्पताल आने वाले अन्य रेलकर्मियों को बेइज्जत करने और उनमें खौफ फैलाने के लिए ज्यादा किया जा रहा है। रेलकर्मियों का आरोप है कि उद्दंड सिक्योरिटी वाले अहंमन्य एसीएमएस के इशारे पर अस्पताल आने वालों के साथ ऐसी अभद्रता करते हैं जैसे कि उन्हें अस्पताल आने वाला हर रेलकर्मी असामाजिक तत्व नजर आता है, उनका यह दुर्व्यवहार और उनके द्वारा की जाने वाली अनावश्यक पूछताछ तथा टोका-टाकी कई बार असहनीय हो जाती है।

उन्होंने कहा कि अब कुछ महीनों से कोविड नामक ऐसा अवसर मिल गया है कि उसके नाम पर अस्पताल में दूसरे सारे इलाज, ऑपरेशन तथा अन्य गतिविधियां बंद पड़ी हैं। यहां कई महीनों से ओटी बंद है। आंखों के ऑपरेशन के लिए रेलकर्मी भटक रहे हैं। मोतियाबिंद के कारण मेडिकल में अटके लोग चुपचाप बाहर से अपना पैसा खर्च कर ऑपरेशन करवा रहे हैं, तब यहां के डॉक्टर उनको फिट कर रहे हैं। पर किसी के दिमाग में यह नहीं आ रहा है कि कर्मचारी को अपने पैसे से बाहर ऑपरेशन न करवाना पड़े, इसका कोई उपाय निकाला जाए।

कर्मचारी कहते हैं कि यहां पागलों जैसा काम चल रहा है, जैसे कि यह कोई मेंटल हॉस्पिटल हो। वास्तविक बीमारी का आदमी इधर-उधर भटक रहा है। यदि कोई हिम्मत करके अस्पताल पहुंच भी गया, तो पहले दो-तीन दिन उसकी कोविड के नाम पर ऐसी दुर्गति होती है कि बिना कोविड के ही उसके प्राण हलक में आ जाते हैं। सस्पेक्टेड कोविड मानकर 12-15 घंटे कल्याण में, फिर पांच से आठ संक्रमित मरीजों के साथ एक ही एंबुलेंस द्वारा मुंबई सेंट्रल स्थित पश्चिम रेलवे के जगजीवन राम अस्पताल (जेआरएच) के लिए भेज दिया जाता है। जहां दो-तीन घंटे एंबुलेंस में ही मरीजों को बैठे रहना पड़ता है।

दो-तीन घंटे बाद उन्हें बताया जाता है कि जेआरएच में बेड उपलब्ध नहीं है, इसलिए अब उनको मध्य रेलवे के भायखला रेलवे अस्पताल भेजा जा रहा है। फिर काफी इंतजार के बाद जैसे-तैसे उनको वार्ड में भर्ती किया जाता है और तब कोविड टेस्ट होता है। दो दिन बाद कोविड की रिपोर्ट यदि नेगेटिव आती है, तब फिर उस कर्मचारी को कल्याण रेलवे अस्पताल भगा दिया जाता है। इस तरह तीन-चार दिन तक एक बीमार आदमी (कर्मचारी) की जानवरों से भी बुरी फजीहत कोविड के नाम पर ही होती रहती है। इससे मरीज उसकी वास्तविक बीमारी ही भूल जाता है। ऐसी में कसाई के यहां बंधे बकरे जैसी हालत के चलते कर्मचारी किसी तरह अपनी जान छुड़ाकर भाग खड़ा होता है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार कल्याण रेलवे अस्पताल के 44 नंबर वार्ड में कोविड पॉजिटिव के लिए 5 बेड रखे गए हैं। वहां कभी कोई सफाई कर्मी ही नहीं रहता। पेशेंट के पारिवारिक सदस्य भी उपस्थित नहीं रह सकते, क्योंकि एसीएमएस किसी कटखनी बिल्ली जैसी गुर्राती रहती हैं। ऐसे में वहां भर्ती मरीज की कितनी फजीहत होती होगी, इसका अंदाजा कोई भी लगा सकता है।

अस्पताल के 44 नंबर वार्ड तक पहुंचने का रास्ता कोविड पेशेंट, मेडिसिन काउंटर, सिक-फिट काउंटर तथा लैब से होकर गुजरता है। अस्पताल में अन्य पेशेंट के साथ कोविड पेशेंट आने के कारण अस्पतालकर्मी भी संक्रमित होते जा रहे हैं। परंतु अस्पताल की एसीएमएस उर्फ नोडल ऑफिसर की सनक के चलते इसका ठोस उपाय उपलब्ध होने के बाद भी नहीं किया जा रहा है।

जानकारों के अनुसार यदि फ्लू ओपीडी, इंस्टीट्यूट के बैडमिंटन हॉल में बना दी जाए तो पेशेंट्स को अस्पताल के बाहर सड़क पर खुले आसमान के नीचे धूप बारिश में नहीं खड़ा होना पड़ेगा बल्कि वह पूर्ववत सीधे अस्पताल में जा पाएंगे। फ्लू ग्रस्त कर्मचारी बैडमिंटन हॉल में आकर आराम से बैठ सकता है। डॉक्टर के देखने के बाद यदि शंका है तो वहीं पर संबंधित दवा देकर उसे सीएचआई ऑफिस की तरफ से पीछे बने दरवाजे से ऑडिटोरियम में भेजा जा सकता है। इसके लिए अस्पताल के दूसरे माले पर स्थित 28 बेड के क्वारंटाइन वार्ड को तत्काल बंदकर ऑडिटोरियम तथा सर्जिकल वार्ड को कोविड वार्ड बना देना चाहिए जिससे कोविड पेशंट अस्पताल में रहकर भी सभी से अलग रह सकेंगे तथा अन्यत्र संक्रमण फैलने से रोका जा सकेगा।

परंतु यह सीधा तरीका सीएमएस कल्याण के दिमाग में नहीं आ रहा है। जबकि नोडल ऑफिसर की मनमानी के चलते यह सारी परेशानी हो रही है तथा बेसिर-पैर के कार्यों में कोविड फंड का गलत इस्तेमाल और दुरुपयोग हो रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि चूंकि यह रेलवे अस्पताल है, और मरीज भी रेल कर्मचारी अथवा उनके पारिवारिक सदस्य ही होते हैं, इसके चलते यहां सब कुछ सहन किया जा रहा है। उनकी इस सहनशीलता के चलते ही यहां के कुछ सनकी डॉक्टरों का सनकीपन बढ़ता जा रहा है। इनको मंडल चिकित्सालय में रखना रेलकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।

शुक्रवार, 10 जुलाई को कल्याण अप यार्ड में कार्यरत रहे जूनियर क्रू कंट्रोलर ओमप्रकाश सिंह, कोविड संक्रमित रेलकर्मी, ऑक्सीजन की कमी के चलते रेलवे अस्पताल में एडमिट हुआ था। 11 जुलाई को उसका कोविड सैंपल लिया गया तथा 12 जुलाई को उसे पॉजिटिव पाया गया था। अब 12 जुलाई की सुबह 11 बजे रिपोर्ट आने से लेकर 13 जुलाई को दोपहर बाद करीब 3 बजे तक ऑक्सीजन की कमी के पेशेंट को क्यों प्रतीक्षा में रखा गया? उसको 12 जुलाई को सुबह 11 बजे रिपोर्ट मिलने के तुरंत बाद जेआरएच या भायखला अस्पताल क्यों नहीं भेजा गया? यह तो अस्पताल की सनकी नोडल अधिकारी ही बता सकती हैं। जबकि 12 जुलाई को 5 पेशेंट जेआरएच भेजे गए थे, जो कि उससे बहुत कम खतरे में थे। तथापि यदि उसे इतना ही खतरा महसूस हो रहा था तो रेलवे से संबद्ध कल्याण के किसी प्राइवेट अस्पताल में उसे क्यों नहीं रेफर किया गया?

बताते हैं कि 13 जुलाई को दोपहर बाद जब इस पेशेंट को ऑक्सीजन के साथ, एक ही एंबुलेंस में छह लोगों को ठूंसकर, इस ऑक्सीजन लगे मरीज को भी बैठाकर, (क्योंकि एंबुलेंस में छह लोगों के बैठने के बाद किसी मरीज के लेटने की जगह ही नहीं रह सकती) भायखला के लिए रवाना किया गया था। मुलुंड तक पहुंचते-पहुंचते यानि मात्र 35 मिनट बाद ही ऑक्सीजन खत्म हो गई, तब दूसरे सभी पेशेंट, जो खुद पॉजिटिव थे, घबराकर सिलेंडर हिलाकर ऑक्सीजन निकालने का प्रयास करते रहे, और एंबुलेंस चालक 100 से भी अधिक की स्पीड से गाड़ी भगाकर बहुत जोखिमपूर्ण ड्राइविंग करते हुए शाम 4 बजे भायखला अस्पताल पहुंचा था। तब तक पेशेंट की हालत बेहद नाजुक हो चुकी थी, और सभी उपायों के बावजूद शाम 5.15 बजे यह रेलकर्मी असमय काल कवलित हो गया।

यह न सिर्फ अत्यंत अमानवीय कृत्य है, बल्कि डॉक्टरी पेशे को भी बहुत ज़्यादा शर्मशार करने वाला है? ऑक्सीजन आधा घंटे में ही कैसे खत्म हो गई? ऐसा ऑक्सीजन सिलेंडर एंबुलेंस में रखा ही क्यों गया? क्या उक्त रेलकर्मी से कोई जातीय दुश्मनी थी? नोडल ऑफिसर की मनमर्जी, खौफ तथा उनके द्वारा की जाने वाली बेइज्जती के चलते अस्पताल के कर्मचारी भी किंकर्तव्यविमूढ़ होते जा रहे हैं। जो कर्मी जिंदगी-मौत से जूझ रहा था, उसको बिना लेटे अन्य 5 लोगों की भीड़ में ठूंसकर भेजना क्या सही निर्णय था? इसकी उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए, वरना ऐसे अमानवीय कृत्य और भी अधिक होने लगेंगे, और आए दिन रेलकर्मियों की जान ऐसे डॉक्टरों और अस्पताल कर्मियों की लापरवाही से जाती रहेगी।





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निजीकरण के आईने में भारतीय रेल और आत्मनिर्भर भारत ! – RailSamachar

यह कैसा गणतंत्र है, जो शासन-प्रशासन की ऐसी बीमारियां – भ्रष्टाचार, जातिवाद, क्षेत्रवाद – खत्म करने के बजाय और बढ़ा रहा है! यदि वह इतना निकम्मा है, तो बाजार, निजीकरण अपना रास्ता तो खोजेगा ही!

आजादी के बाद जैसे-जैसे “भ्रष्टाचार” बढ़ता गया, वैसे-वैसे इस “केक” में हिस्सेदारी का हक भी, क्योंकि नैतिकता राजा से शुरू होती है, रंक से नहीं! इसलिए उसी अनुपात में सरकारी विभाग विनाश की तरफ बढ़ते गए और लगातार बढ़ रहे हैं!

Prempal Sharma

रेल की खबरें भी मीडिया में टीआरपी बढ़ाने का अच्छा नुस्खा है। एक्सीडेंट हो, किराए में पैसे दो पैसे की वृद्धि हो, भर्ती का कोई प्रश्न हो या निजीकरण की छोटी-मोटी अफवाह। मीडिया की आंखों में चमक आ जाती है। इसमें कोई आश्चर्य की बात भी नहीं। वर्षों से हम सुनते भी आ रहे हैं कि रेलवे भारत की लाइफ लाइन है, धमनी हैं.. आदि आदि और इतनी बड़ी इतनी तेज कि इतनी बड़ी आबादी के लिए सबसे जरूरी और विश्वसनीय यातायात का साधन है। विकास का मानदंड भी।

लेकिन अफसोस इस बात का कि हम लगातार गिरावट की तरफ बढ़ रहे हैं। पिछले वर्ष ऑपरेटिंग रेश्यो 98% रहा है, यानि ₹98 खर्च करने पर औसतन 100 रुपए की कमाई। हाथी जैसी विशालकाय, संसाधनों के बावजूद मात्र ₹2 की बचत से आप रेलवे को कैसे आधुनिक बनाएंगे? कैसे चीन-जापान की तरह भारतीय रेल 200-300 किलोमीटर प्रति घंटा चलेगी? नई पटरियां, नया विस्तार कैसे होगा? यह प्रश्न आजादी के बाद से ही दूसरे अनेक मसलों की तरह अनुत्तरित हैं!

एक दंभ जरूर है कि हम कर्मचारियों की संख्या में दुनिया के सबसे बड़े नियोक्ता हैं। सबसे ज्यादा रोजगार देते हैं। तो क्या रेल सिर्फ रोजगार के लिए ही बनी है?

1 जुलाई 2020 को यह घोषणा हुई कि 109 मार्गों पर प्राइवेट कंपनियां रेल चलाएंगी, सिर्फ ड्राइवर रेलवे का होगा बाकी डिब्बे, मेंटेनेंस सब कुछ प्राइवेट हाथों में, रेल विभाग को यह प्राइवेट कंपनियां कुछ किराया देंगी।

अगले दिन 2 जुलाई को रेल मंत्रालय से एक और आदेश निकला, कि इस बीच जो भी रेलवे में रिक्तियां हैं, वह अभी नहीं भरी जाएंगी, उनमें कटौती की जाएगी। सिर्फ सेफ्टी पदों को छोड़कर। बस हो गया तूफान खड़ा।

विपक्ष के नेताओं से लेकर रेल कर्मचारियों के रोष की बातें मीडिया चलाता रहा। गुस्सा आना स्वाभाविक है, विशेषकर मौजूदा कोरोना काल में जब रेलवे ने सारी  विपरीत परिस्थितियों के बावजूद देश में न कहीं दवाओं की कमी होने दी, न किसी माल की। और जब जरूरत हुई तो आनन-फानन में 5000 श्रमिक गाड़ियां चलाकर लगभग एक करोड़ श्रमिकों को उनके घर पहुंचाया।

यह आसान काम नहीं था। जब पूरा देश कई महीने से बंद था, तब रेल कर्मचारी फील्ड में लगातार अपने काम पर जुटे हुए थे। रेल पुलों, कोचों, पटरियों के रखरखाव जैसे काफी समय से लंबित काम भी इसी बीच पूरे किए गए। मेरी नजरों में डॉक्टर, नर्स और सिविल प्रशासन के साथ-साथ रेल कर्मचारियों को भी कोरोना योद्धा में शामिल किया जाना चाहिए था, देर अब भी नहीं हुई।

लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ कि एक दिन पहले जिस रेल मंत्रालय ने रेलवे में शत-प्रतिशत पंक्चुअलिटी उर्फ समयपालन का रिकॉर्ड रेलवे के इतिहास में बनाया और उसकी घोषणा की, उसके अगले ही दिन निजी रेलवे की इजाजत भी ताबड़तोड़ दे डाली। यानी एक गाल पर प्यार की थपकी तो दूसरे पर तड़ातड़ तमाचे। वास्तविक जरूरत तो इस समय की यह है कि आने वाले दिनों की चुनौतियों को देखते हुए रेल कर्मचारियों की तारीफ कर उनमें और ज्यादा उर्जा भरी जाए, विशेषकर आत्मनिर्भर भारत बनाने की घोषणाओं के बरक्स।

कोरोना विपत्ति के पूरे दौर में पक्ष-विपक्ष दोनों यह महसूस कर रहे हैं कि सरकारी तंत्र ही ऐसी चुनौतियों से सबसे सक्षम ढ़ंग से निपट सकता है, चाहे वह स्वास्थ्य सुविधाएं हों, या सरहदों पर मंडराती चीन-पाकिस्तान की चुनौतियां। ऐसे में तो रेल जैसे विभाग को और अधिक चुस्त-दुरुस्त, मजबूत और विस्तार करने की जरूरत है।

लेकिन क्या यह चुस्त-दुरुस्त सिर्फ निजीकरण से ही संभव है? क्या सरकार के मौजूदा ढ़ांचे में कोई संभावना ही नहीं बची? अभी 6 महीने पहले ही रेलवे के ढ़ांचे में कुछ बुनियादी परिवर्तन की शुरुआत हुई है, जैसे रेलवे बोर्ड में आठ सदस्यों की जगह सिर्फ चार रहेंगे और इंजीनियरिंग तथा सिविल सेवाओं को मिलाकर भी एक रेलवे मैनेजमेंट सर्विस बनाने की योजना है। तीन साल पहले रेल बजट को भी मुख्य बजट में शामिल करके एक बड़ा कदम उठाया था। और भी हलचलें जारी हैं, लेकिन उनकी दिशा अभी भी धुंधली और अस्पष्ट है।

ऐसी स्थितियों में कर्मचारियों का मनोबल और कमजोर होता है, जबकि देश की जरूरतों को देखते हुए उसे और मजबूत करने की जरूरत है। इस बात को भी कोई स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि पूरे तंत्र की सिर्फ 5% रेल में यह शुरुआत की जा रही है और कि इससे रेलवे को फायदा होगा और देश की जनता यानि यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी। विश्व स्तरीय। या कम समय में यात्रा कर सकेंगे और यह केवल निजीकरण के रास्ते से ही संभव है।

इस मोड़ पर रेलवे के कुछ हिस्से को प्राइवेट हाथों में देने के निर्णय से, भूतपूर्व ही सही एक रेल कर्मचारी होने के नाते फिलहाल निजीकरण पर मेरी भी पूरी असहमति है। हालांकि अभी सिर्फ प्रतिवेदन मंगाए गए हैं, लेकिन अच्छा हो कि निजी कंपनियों की तरफ देखने से पहले रेलवे के प्रशासनिक ढांचे की कमियों को ही दूर किया जाए। मेरी असहमति विपक्ष के उन कच्चे पक्के राजनीतिक नेताओं से भी है जो अचानक ही बरसाती मेंढ़कों की तरह टर्रा रहे हैं।

रेलवे में निजीकरण का यह पहला कदम नहीं है। यूपीए एक-दो के दौरान बिहार में जो कई रेलवे कारखाने खोले गए, वे सब इसी पीपीपी मॉडल के थे। और भी कई कदमों की शुरुआत उन्हीं दिनों हुई थी। यहां तक कि कांग्रेस के प्रधानमंत्री नरसिंह राव जिनका जन्म शताब्दी वर्ष भी अभी पिछले ही हफ्ते शुरू हुआ था और उनकी तारीफ में सबसे बड़ा कशीदा यही कसा जाता है कि देश उदारीकरण और निजीकरण के रास्ते की शुरुआत उन्होंने की। जिसकी वजह से आज देश कई क्षेत्रों में कुछ कुछ आधुनिक और आत्मनिर्भर हुआ है। इसलिए तमाम राजनेताओं की बातें यकीन के लायक भी नहीं है। एक तरफ आत्मनिर्भर भारत की बात और दूसरी तरफ यह निजी कंपनियां, जो सब कुछ बाहर से मंगाकर यहां जोड़-तोड़ करती हैं और मुनाफा कमाती हैं।

आईए, रेल मंत्रालय के एक कल्याणकारी विभाग रेलवे के स्कूलों की प्रयोगशाला से रेलवे में निजीकरण को समझने की कोशिश करते हैं। विशेषकर उनके लिए जो किसी न किसी पार्टी के साथ नाली-नाभि-नालबद्ध हैं और आडंबर में जीने के आदी हो चुके हैं।

किसी समय पूरे देश में रेलवे के 800 स्कूल थे। रेल कर्मचारियों की बस्तियों के बीच। खुले मैदान, अच्छी इमारतें, अच्छे शिक्षक। लाल बहादुर शास्त्री से लेकर अनेकों वैज्ञानिक इंजीनियर इन्हीं स्कूलों में पढ़े थे। अंग्रेज अपने उपनिवेश का शोषण करना जानते थे तो कल्याणकारी योजनाएं भी बनाते थे। अपने मातहत कर्मचारियों के लिए स्कूल इसीलिए खोले कि उनके बच्चों को बिना किसी चिंता के पढ़ने-लिखने आगे बढ़ने की सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हों। यहां तक कि रेल अफसरों के लिए मसूरी की पहाड़ियों में एक आलीशान रेजिडेंशियल ओक ग्रोव स्कूल भी 1888 में स्थापित किया। अपने कर्मचारियों की अगली पीढ़ियों के खातिर।

आज रेलवे में 8000 से ज्यादा तोप अधिकारी हैं। मेरा प्रश्न है कितने अधिकारियों ने ओक ग्रोव स्कूल में अपने बच्चों को भेजा है? यहां तक कि रेलवे के निचले स्तर के कर्मचारी भी अपने बच्चों को रेलवे के स्कूल में नहीं भेज रहे? पिछले 30 वर्षों में यह गिरावट बहुत तेजी से आई है जिन रेल अधिकारियों की सांस रेलवे के निजीकरण से फुल रही है, रेलवे की यूनियनें उतनी ही आराम तलब हो चुकी हैं, क्या उन्होंने ब्रिटिश विरासत की इस कल्याणकारी योजना यानि स्कूलों के बंद होने पर कोई मजबूत आवाज उठाई? क्या कभी किसी उच्च अधिकारी ने इन स्कूलों में जाकर शिक्षकों और स्कूल की परेशानियां सुनी? रेलमंत्री पुरस्कार कुछ समय पहले हर वर्ष 400-500 तक दिए जाते रहे हैं। क्या कभी किसी स्कूल शिक्षक या उनके प्राचार्य को दिया गया?

मैंने कुछ दिन रेलवे स्कूलों के प्रशासन को नजदीक से देखा है। वर्ष 2013 से 15 तक वाराणसी के डीएलडब्ल्यू स्कूल में कई विषयों के पोस्ट ग्रेजुएट टीचर (पीजीटी) के पद वर्षों तक खाली थे। वहीं के कई ट्रेंड ग्रेजुएट टीचर (टीजीटी) को प्रमोट किया जाना था। कारण पूछा, तो पता लगा कि पेपर कौन बनाए? कैसे बनाएं? उत्तर रेलवे में बरेली का एकमात्र रेलवे स्कूल बचा है। लंबी-चौड़ी जमीन है, क्या कभी उत्तर रेलवे के किसी अधिकारी ने उसकी बेहतरी के बारे में सोचा? यह चंद उदाहरण हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब यानि समूची हिंदी पट्टी में मुश्किल से कोई रेलवे स्कूल जिंदा बचा है। दो-चार हैं भी, तो वे भी मौत के कगार पर।

उन्हीं दिनों के बोर्ड एक सदस्य से जब इनकी बेहतरी के लिए कुछ अनुरोध किया, तो उनका जवाब था कि सरकारी स्कूल या रेलवे के स्कूलों में अब कौन पढ़ाता है? और हमें इनको तुरंत बंद कर देना चाहिए! आनन-फानन में ऐसी कमेटी भी बना दी जाती है, जो बॉस के मुंह को ताकते हुए तुरंत ऐसी सिफारिश भी करते हैं और बस संदेश पूरे देश को चला गया कि रेलवे के स्कूलों को बंद किया जाए। आश्चर्य यूनियनें भी चुप्पी साधे रहीं।

अभी 2 जुलाई को जो रिक्तियों को न भरने का फैसला किया गया तो कुछ रेलवे ने अगले ही दिन इस ढंग से दोहराया कि बचे-खुचे रेलवे स्कूलों में शिक्षकों की संख्या 50% कम कर दी जाए। आप सब की सूचना के लिए बता दें कि रेलवे के बचे-खुचे कुछ स्कूलों में पहले से ही 50% पद खाली पड़े हैं। उन्हें न भरने की कसम खा ली है। जैसे-तैसे काम चलाया जा रहा है। दक्षिण पूर्व रेलवे में रेलवे के स्कूल बहुत अच्छे चल रहे थे। यानि कि उनमें बच्चों के दाखिले की मारामारी थी। लेकिन धीरे-धीरे वहां भी बच्चे आने इसलिए कम हो गए, कयोंकि पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं।

संतरागाछी स्कूल में 2009 से 11वीं 12वीं के लिए बायोलॉजी का शिक्षक नहीं था और कई वर्षों से रसायन शास्त्र का भी नहीं। लेकिन क्या कभी उच्च अधिकारी ने वहां जाकर उनकी खबर ली? यदि जाते भी हैं तो वे स्कूल के वार्षिक समारोह में गुलदस्ता लेने और अपनी आत्मकथा के कुछ अंश बांटने!

मैं इन सब अधिकारियों की निष्ठा, विद्वता की तारीफ करता हूं लेकिन जब शिक्षा में निजीकरण हो, तो आप चुप लगाए रहते हैं और जब अपनी सेवाओं में कटौती हो, तो आप पूरे देश को जगाना चाहते हैं। यह बात गले नहीं उतरती दोस्तों!

मेरे आकलन के अनुसार देश के पूर्वी भाग यानि पश्चिम बंगाल में खड़कपुर, कोलकाता, आसाम, छत्तीसगढ़ के बिलासपुर, भिलाई, जैसी जगहों में अभी भी रेलकर्मी रेलवे के स्कूलों को ही प्राथमिकता देते हैं। मुंबई के कल्याण रेलवे स्कूल ने भी अपनी प्रतिष्ठा कायम रखी है, जहां पिछले कुछ वर्षों में कल्याण रेलवे स्कूल के बच्चे न सिर्फ आईआईटी और मेडिकल में भी चुने गए हैं, बल्कि अन्य स्कूलों से नाम वापस लेकर इसमें दाखिले की लाइन में खड़े हुए हैं।

साउथ ईस्टर्न रेलवे के संतरागाछी, खड़कपुर रेलवे स्कूल से भी पिछले वर्षों में नीट परीक्षा के तहत सरकारी मेडिकल कॉलेजों में रेल कर्मचारियों के बच्चे चुने गए हैं। यानि पर्याप्त संभावनाएं हैं रेलवे स्कूलों में, बशर्ते रेल प्रशासन इन स्कूलों की तरफ कभी ध्यान भी तो दे।

हाल ही में कोरोना संक्रमित समय में मुंबई के कल्याण रेलवे स्कूल ने आगे बढ़कर तुरंत बच्चों की मदद लेकर हजारों की संख्या में मास्क बनाए, सैकड़ों लीटर सैनिटाइजर आदि तैयार करके रेल प्रशासन और रेलकर्मियों को उपलब्ध कराया। जब भी पदों की कटौती की बात होती है या जमीन बेचने की, तो सबसे पहले रेल प्रशासन का ध्यान रेलवे स्कूलों की तरफ ही जाता है।

अब धीरे-धीरे वह सरकारी अस्पतालों की तरफ भी बढ़ रहा है। जबकि कोरोना की विपत्ति में इन दोनों विभागों का सबसे अच्छा इस्तेमाल रेल और देश के हित में हुआ है और आगे भी हो सकता है।

रेलवे के अफसरों के जब भी ट्रांसफर आर्डर होते हैं, उनकी एक वास्तविक चिंता अपने बच्चों की शिक्षा और पढ़ाई के लिए होती है। वे साफ कहते हैं कि हाजीपुर में अच्छे स्कूल नहीं हैं, न सोनपुर में, न गोरखपुर में, इसीलिए उन्हें दिल्ली चाहिए या फिर मुंबई, कोलकाता। काश, वे कभी यह भी सोच पाते कि बच्चों की चिंता खलासी, कार ड्राइवर या दूसरे फील्ड कर्मचारियों की भी तो होती है?

अंग्रेजों ने इन स्कूलों को प्राथमिकता इसीलिए तो दी थी कि वे एक समान शिक्षा पा सकें और चिंतामुक्त होकर रेलवे में पूरी निष्ठा से अपना योगदान दे सकें।

मौजूदा उच्च अधिकारियों के सपने में भी कर्मचारियों के कल्याण की ऐसी बातें नहीं आतीं, वरना बोर्ड के सदस्य ऐसा नहीं कहते कि रेलवे के स्कूल बंद कर दिए जाएं। वैसे इमानदारी से ही यह उनके मुंह से निकला, क्योंकि उन्हें अब इतनी मोटी तनख्वाह मिलने लगी है और इतने ज्यादा भत्ते कि उस पैसे से वे बहुत मजे से दिल्ली के  संस्कृति, मॉडर्न, डीपीएस या अशोका, जिंदल जैसे महंगे स्कूलों – यूनिवर्सिटी में अपने बच्चों को पढ़ा सकते हैं और फिर सीधे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर।

इन अमीरों में सवर्ण, दलित, सारा क्रीमी लेयर शामिल है। उन्हें अंग्रेजी चाहिए और निजी स्कूल। अपनी सरकारी यात्राओं के लिए भी उन्हें रेल नहीं चाहिए। वे प्राइवेट एयरलाइंस से जाना पसंद करते हैं। भले ही किराया कितना भी हो, क्योंकि उसमें नाश्ता अच्छा मिलता है। लेकिन अपनी नौकरी सरकारी ही चाहिए।

अपने कैडर का एक भी पद इधर-उधर होने से उनकी आत्मा हिलने लगती है। उन्हें तुरंत संविधान याद आता है। रोस्टर का एक-एक पॉइंट याद आ जाता है। सारे काम छोड़कर वकीलों की तलाश में जुट जाते हैं। कोर्ट कचहरी में मुकदमेबाजी होती है।

लेकिन इन बेचारे नौकरशाहों को क्यों दोष दिया जाए, यह तो उन सपेरों की धुन पर नाचते हैं। विपक्ष के एक नौजवान मगर पूर्व नेता ने निजीकरण के विरोध में वक्तव्य देने से पहले काश यह सोचा होता कि 10 साल तक उनकी पार्टी के जो प्रधानमंत्री रहे वे निजीकरण के सबसे बड़े पहरुए हैं। नरसिंह राव तो नाम के ही प्रधानमंत्री थे, उदारीकरण और निजीकरण की इबारत तो उन्हीं ने लिखी थी। और वे भले भी इतने हैं कि कभी उसे छुपाते भी नहीं।

तो रेलवे में यह सब शुरुआत उन्हीं दिनों पूरी रफ्तार से हो गई थी। रेलवे स्कूल सबसे कमजोर कड़ी थे, इसलिए वे लगभग 80% बंद हो चुके हैं। क्या स्कूलों के बंद होने पर आपने मीडिया की तरफ से कभी कोई बेचैनी सुनी?क्योंकि देश अमीर और गरीब में बंट चुका है। जो अमीर हैं उनके लिए अंग्रेजी और निजी स्कूल! गरीब के बच्चे के लिए सरकारी स्कूल कुछ दिन और उसके बाद वह भी रास्ता बंद।

सरकार और सरकारी स्कूलों के डूबने की कहानी लगभग एक सी ही है और वह है सरकारी नौकरी को एक ऐसे स्वादिष्ट खुशबूदार केक की तरह देखना, जिसमें सिर्फ खाने को हिस्सा चाहिए, करने को नहीं। आजादी के बाद जैसे-जैसे भ्रष्टाचार बढ़ता गया, वैसे-वैसे इस केक में हिस्सेदारी का हक भी, क्योंकि नैतिकता राजा से शुरू होती है, रंक से नहीं। इसलिए उसी अनुपात में सरकारी विभाग विनाश की तरफ बढ़ते गए और लगातार बढ़ रहे हैं।

आज हर जाति के हर विभाग में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संगठन मौजूद हैं, उनके दर्जनों प्रेसिडेंट, महासचिव, सचिव और सैकड़ों-हजारों की संख्या में अन्य पदाधिकारी हैं। काम करने के लिए किसी को जगह मिले न मिले, उनको उसी दफ्तर में अलग कमरा चाहिए नेतागिरी के लिए। यह तथाकथित राष्ट्रीय संगठनों के अलावा हैं। राष्ट्रीय यूनियन राष्ट्रीय नेताओं के इशारों पर चलती है।

रोजमर्रा के ट्रांसफर, विभागों के बंटवारे में प्रशासन की इमानदारी, पारदर्शिता किसी खूंटी पर टंगी रहती है। धीरे-धीरे एक नौजवान सरकारी दुर्ग में प्रवेश करने के कुछ ही वर्षों में किसी जाति या संगठन का सदस्य बनकर रह जाता है। भाड़ में गया उसका संविधान पढ़ना और नैतिकता की शपथ लेना।

इस तरह या तो कमीशनखोर बनिए या कमीशनवॉज। लोकनायक भवन आदि में बैठे कमीशन में दौड़ने की क्षमता रखिए। ये सब कमीशन संविधान की दुहाई देते हैं, इसीलिए संवैधानिक तरीके से “कमीशन” करते हैं हैं। यदि उनकी मर्जी से आपने ट्रांसफर/पोस्टिंग नहीं की, उनकी झूठी शिकायत पर किसी को दंड नहीं दिया, तो वह रोज आपको लोकनायक भवन की सीढ़ियों पर खड़ा रखेंगे।

प्रशासन की रीढ़ इतनी कमजोर हो चुकी है कि वह कोई नैतिक स्टैंड ले ही नहीं पाता। ऐसे में क्या तो हम चीन से मुकाबला करेंगे और कौन सी विश्वस्तरीय आत्मनिर्भर रेल चलाएंगे?

रोस्टर के झगड़े और मुकदमे वादियों में कैट-हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट में हजारों केस भरे पड़े हैं। हर पक्ष जर्रा जर्रा इसका जिम्मेदार है। फिर से जर्मन कवि बर्टोल्ड ब्रेस्ट के शब्दों में – “वे सब भी जिम्मेदार हैं जो यह सब देखते हुए चुप रहते हैं।” यह कैसा गणतंत्र है, जो शासन-प्रशासन की ऐसी बीमारियां – भ्रष्टाचार, जातिवाद, क्षेत्रवाद – खत्म करने के बजाय और बढ़ा रहा है और यदि वह इतना निकम्मा है, तो बाजार, निजीकरण अपना रास्ता तो खोजेगा ही!

आप सब ने उस जर्मन कवि की कविता भी पढ़ी होगी जो उसने हिटलरशाही के दौर में लिखी थी –

पहले उन्होंने कम्युनिस्टों को मारा/ मैं चुप रहा/ क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था/ फिर उन्होंने सोशलिस्टों को घेरा/ मैं तब भी चुप रहा/ क्योंकि मैं सोशलिस्ट नहीं था/ अंत में मुझे घेर लिया गया/ लेकिन तब तक/ देखने वाला भी आस-पास कोई नहीं था !

रेलवे भी देश का हिस्सा है। जब निजीकरण की बाढ़ इतनी आगे बढ़ चुकी हो जिसमें बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, पासपोर्ट, पैन कार्ड, सिक्योरिटी गार्ड इत्यादि पूरी तरह आ चुके हों, तो रेलवे में भी बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी? रेलमंत्री जी! बीमारी कुछ है, इलाज आप कुछ दूसरा कर रहे हैं! वक्त के साथ प्रशासनिक नीतियों को बदलिए, भ्रष्टाचार को रोकिए, जातिवाद, लालफीताशाही, निकम्मेपन पर लगाम लगाईए! रेल वह कीमती विरासत है, जो देश को आत्मनिर्भर भारत के रास्ते पर सबसे तेजी से लेकर जा सकती है!

 #प्रेमपालशर्मा, पूर्व संयुक्त सचिव, रेल मंत्रालय

संपर्क: 99713 99046

ईमेल: ppsharmarly@gmail.com

वेबसाइट: www.prempalsharma.com





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ट्रेनों के परिचालन में प्लेटफार्मों की विसंगति से यात्रियों को भारी असुविधा – RailSamachar

प्लेटफार्म नं. 1 और प्लेटफार्म नं. 6-7 को छोड़कर सीधे प्लेटफार्म नं. 8-9 पर यात्रियों को भेजा जाना, यह किसी विशेष प्रयोजन के तहत किया गया प्रतीत होता है, जबकि यहां सामान्य सुविधा नियमों का पालन करना जरूरी नहीं समझा गया

अहमदाबाद : पश्चिम रेलवे का अहमदाबाद रेलवे स्टेशन एक अत्यंत व्यस्त और भारी भीड़ वाला स्टेशन है। कम ट्रेनों के चलते भी इस रेलवे स्टेशन पर काफी भीड़ हो जाती है। स्टेशन का प्लेटफार्म-4 फिलहाल दुरुस्तीकरण के लिए बंद किया गया है। तथापि उस पर भी गाड़ियां ले ली जा रही हैं। इससे यात्रियों की आवाजाही में परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा प्लेटफार्म-1 और 6-7 को खाली रखकर सीधे प्लेटफार्म 8-9 पर यात्रियों को भेजना उन्हें और ज्यादा परेशानी में डालने जैसा है। स्टेशन पर ट्रेन ऑपरेशन की इस विसंगति को लेकर जेडआरयूसीसी/प.रे. के सदस्य योगेश मिश्रा, किंजन पटेल और शैलेश उपाध्याय ने सोमवार, 29 जून को रेल प्रशासन का ध्यान यात्रियों की परेशानी की ओर आकर्षित करते हुए एक ज्ञापन सौंपा है।

ज्ञापन के अनुसार अहमदाबाद मंडल से वर्तमान में 100 जोड़ी ट्रेनों में से 10 जोड़ी ट्रेनों को अहमदाबाद स्टेशन से चलाया जा रहा है। जबकि एक पासिंग ट्रेन भी है। इस प्रकार कुल 11 जोड़ी ट्रेनों का आवागमन अहमदाबाद स्टेशन पर होता है। अहमदाबाद स्टेशन पर कुल 12 प्लेटफार्म थे। परंतु बुलेट ट्रेन एवं मेट्रो का निर्माण कार्य चलने के कारण प्लेटफार्म नं. 10, 11 और 12 को पूरी तरह बंद कर दिया गया है।

इस प्रकार अहमदाबाद रेलवे स्टेशन के पूर्वी छोर (प्लेटफार्म-12 की तरफ) से आवागमन का पूरा मार्ग अवरुद्ध हो चुका है। अब वहां से किसी भी व्यक्ति का किसी भी प्रकार से आवागमन नहीं हो सकता। अतः 22 मार्च से जनता कर्फ्यू और 24 मार्च से लॉकडाउन के बाद नियमित यात्री ट्रेनों का संचालन बंद किया गया था।

यह स्थिति है अहमदाबाद स्टेशन के प्लेटफार्म नं. 8-9 की, जिस पर अभी निर्माण कार्य प्रगति पर है। फिर भी इस पर ट्रेन का परिचालन 29 जून शुरू कर दिया गया है। नीचे का यह वीडियो इस बात का साक्ष्य है। आखिर प्लेटफार्म नं. 6-7 पर परिचालन क्यों नही किया जा सकता? इसकी जवाबदेही किसकी है? यात्रियों की समस्या के विषय में लापरवाही क्यों और कब तक?

Taking train on under construction platform at #Ahmedabad station by Ahmedabad Division Operating authorities

1 मई से श्रमिक ट्रेनें चालू हुईं तथा 1 जून 2020 से स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही हैं। इसमें अहमदाबाद स्टेशन से 10 ट्रेनें चल रही हैं। वर्तमान में अहमदाबाद स्टेशन पर 1 से 8 तक कुल 8 प्लेटफार्म उपलब्ध हैं। इन प्लेटफॉर्मों पर ट्रेनों का कम से कम आवागमन होने के कारण वर्तमान में 1 जून से प्लेटफार्म नं. 1, 3, 4 और 5, यानि कुल 4 प्लेटफार्मों से ट्रेनों का परिचालन ऑपरेटिंग डिपार्टमेंट द्वारा किया जा रहा है।

परंतु 29 जून से प्लेटफार्म नं. 4 की मरम्मत हेतु 38 दिन का ब्लाक लिया गया है, जिसके कारण प्लेटफार्म नं. 4 से चलने वाली गाड़ियों को अन्य प्लेटफार्मों पर डायवर्ट किया जाना है। 1 जून से अहमदाबाद स्टेशन से चलने वाली विशेष ट्रेन नं. 02947 अहमदाबाद-पटना, ट्रेन नं. 09019 अहमदाबाद-गोरखपुर स्पेशल ट्रेन, प्लेटफार्म नंबर 1 से चलनी थी। जबकि प्लेटफार्म-3 से 02915 अहमदाबाद-दिल्ली, 09165 अहमदाबाद-दरभंगा, 09167 अहमदाबाद-वाराणसी ट्रेन चलाई जा रही थी।

इसी प्रकार ट्रेन नं. 02479 जोधपुर-बांद्रा टर्मिनस की पासिंग प्लेटफार्म-3 से कराई जा रही थी। प्लेटफार्म-4 से ट्रेन नं. 02917 अहमदाबाद-निजामुद्दीन चलाई जा रही थी। ट्रेन नं. 02480 बांद्रा टर्मिनस-जोधपुर की पासिंग हो रही थी। जबकि प्लेटफार्म-5 से ट्रेन नं. 02833 अहमदाबाद-हावड़ा, 02934 अहमदाबाद मुंबई सेंट्रल, 02957 अहमदाबाद-नई दिल्ली, 09083 अहमदाबाद-मुजफ्फरपुर स्पेशल ट्रेन चलाई जा रही है।

परंतु 28 दिन के परिचालन के बाद प्लेटफार्म-4 के दुरुस्तीकरण के लिए ब्लॉक लेने पर यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए सिर्फ प्लेटफार्म-4 की ट्रेनों को अन्य प्लेटफार्मों पर डायवर्ट करके उन्हें वहां से ऑपरेट किया जाना चाहिए था। इसके बजाय अहमदाबाद मंडल के ऑपरेटिंग विभाग द्वारा प्लेटफार्म-1 से सिर्फ बांद्रा टर्मिनस-जोधपुर ट्रेन 02480 पास की जा रही है।

जबकि प्लेटफार्म-3 से ट्रेन नं. 02947 अहमदाबाद-पटना, और ट्रेन नं. 02917 अहमदाबाद-निजामुद्दीन ही चलाई जा रही है। प्लेटफार्म-4 को ब्लॉक कर दिया गया है। प्लेटफार्म-5 से ट्रेन नं. 02833 अहमदाबाद-हावड़ा एक्सप्रेस, 02934 अहमदाबाद-मुंबई सेंट्रल, 02957 अहमदाबाद-नई दिल्ली ट्रेनें चलाई जा रही है। प्लेटफार्म नं. 5-6-7 से एक भी ट्रेन को ऑपरेट न करके किन कारणों से प्लेटफार्म-8/9 से गाड़ियों का परिचालन किए जाने का निर्णय लिया गया, यह समझ से परे है।

प्लेटफार्म-8 से 29 जून को ट्रेन नं.09083 अहमदाबाद मुजफ्फरपुर, ट्रेन नं.02915 अहमदाबाद-दिल्ली, ट्रेन नं. 02479 जोधपुर-बांद्रा टर्मिनस की पासिंग कराई गई। जबकि प्लेटफार्म-9 से ट्रेन नं.09165 अहमदाबाद दरभंगा, ट्रेन नं.09167 अहमदाबाद-वाराणसी, ट्रेन नं. 09014 अहमदाबाद-गोरखपुर एक्सप्रेस ट्रेन चलाई गई। प्लेटफार्म-12 की तरफ से आवागमन का संपूर्ण मार्ग बंद होने के कारण प्लेटफार्म उस तरफ से किसी भी प्रकार से आवागमन नहीं हो सकता है।

वर्तमान में सुरक्षा के दृष्टिकोण से एवं सोशल डिस्टेंसिंग का पालन और थर्मल स्कैनिंग करते हुए, सैनिटाइजर मार्ग से गुजरकर यात्रियों को प्लेटफार्म पर प्रवेश दिया जा रहा है। जो अहमदाबाद मंडल का सराहनीय कार्य है। अहमदाबाद स्टेशन पर  मात्र प्लेटफार्म-1 की तरफ से ही आवागमन का मार्ग प्रशस्त किया गया है। ऐसी स्थिति में प्लेटफार्म-1 से एस्केलेटर (स्वचालित सीढ़ियों) अथवा एफओबी सीढ़ियां चढ़कर यात्रियों को नजदीकी प्लेटफार्म पर पहुंचने की सुविधाजनक व्यवस्था की जानी चाहिए।

यह एक साधारण नियम है, उस साधारण नियमों को भी ऑपरेटिंग विभाग ने ताक पर रखकर प्लेटफार्म-1 से मात्र एक ट्रेन, वह भी जो सिर्फ पासिंग है, का परिचालन जारी रखा गया है। प्लेटफार्म-3 से मात्र 2 ट्रेनों का आवागमन जारी रखने का निर्देश दिया गया है। जबकि प्लेटफार्म-5 से 3 ट्रेनों का परिचालन किया जा रहा है। वहीं प्लेटफार्म-8 से 2 ट्रेनें एवं प्लेटफार्म-9 से 3 ट्रेनों का परिचालन हो रहा है।

अब प्रश्न यह खड़ा होता है कि प्लेटफार्म नं. 1, 3, 5 के बाद प्लेटफार्म नं. 6 और 7 से परिचालन का कार्य किन कारणों से नहीं कराया जा रहा है? आखिर यात्रियों को एक प्लेटफार्म और आगे जाने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है? और किन कारणों से यात्री प्लेटफार्म नं. 6-7 पर न उतरकर, प्लेटफार्म नं. 8-9 पर कयों जाएं? यात्री को इसके लिए 50-100 कदम अतिरिक्त चलना पड़ेगा। यात्रियों को कम से कम दूरी तक चलाकर प्लेटफार्म पर उतारा जा सके, ऐसी सुविधाजनक व्यवस्था की जानी चाहिए।

फोटो परिचय: अहमदाबाद स्टेशन के प्लेटफार्म नं. 8-9 पर निर्माण कार्य चल रहा है। यह सोमवार, 29 जून की तस्वीर है। फिर भी इस प्लेटफार्म पर ट्रेन का परिचालन किया गया। जबकि प्लेटफार्म नं. 6-7 खाली पड़े हैं, उन पर परिचालन नहीं किया जा रहा, रेल प्रशासन से यह सवाल है जेडआरयूसीसी/प.रे. के सदस्यों का!

यदि सामान्य मानवीय दृष्टिकोण से भी देखा जाए तो भी 30-35 किग्रा वजन लिए हुए व्यक्ति को कम से कम दूरी तक पैदल चलकर पहुंचने की व्यवस्था करनी चाहिए। इसको ध्यान में रखकर प्लेटफार्म नं.1 और प्लेटफार्म नं. 6-7 को छोड़कर सीधे प्लेटफार्म नं. 8-9 पर यात्रियों को भेजा जाना, यह किसी विशेष प्रयोजन के तहत किया गया प्रतीत होता है, जबकि यहां सामान्य सुविधा नियमों का पालन करना जरूरी नहीं समझा गया। वह भी तब जब प्लेटफार्म-12 की तरफ से आवागमन का कोई भी मार्ग उपलब्ध नहीं है।

यात्रियों को प्लेटफार्म-1 से प्रवेश देकर, प्लेटफार्म-8 में पहुंचने की बजाय अगर प्लेटफार्म नं. 6-7 पर उतारा जाए तो यह उनके लिए न सिर्फ काफी सुविधाजनक होगा, बल्कि उनका समय और वजन लेकर चलने का उनका परिश्रम कुछ कम हो सकता है। गस तथ्य पर विचार किया जाना चाहिए।

उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में लेते हुए इस विषय पर विचार करने और यात्रियों को होने वाली मुश्किलों को कम करने का प्रयास करने हेतु उचित कार्यवाही किए जाने का यह ज्ञापन क्षेत्रीय रेल उपभोगकर्ता परामर्शदात्री समिति, पश्चिम रेलवे के सदस्य योगेश मिश्रा ने महाप्रबंधक/प.रे. आलोक कंसल, प्रमुख मुख्य परिचालन प्रबंधक/परे. शैलेंद्र कुमार और डीआरएम/अहमदाबाद दीपक कुमार को भेजा है।



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कोविड वार्ड में नर्सों/पैरामेडिकल स्टाफ की ड्यूटी लगाने में भेदभाव – RailSamachar

फर्जी बीमारी के बहाने बनाकर कोविड ड्यूटी से बच रहे हैं डिपार्टमेंटल इंचार्ज, उनकी बीवियां और कामचोर यूनियन नेता?

नई दिल्ली: उत्तर रेलवे केंद्रीय चिकित्सालय (एनआरसीएच) में जहां एक तरफ कोविड मरीजों की संख्या और मौतें बढ़ती जा रही हैैं, तो दूसरी तरफ अस्पताल की अहमन्य सहायक नर्सिंग अधिकारी (एएनओ) की मनमानी और कोविड वार्ड में नर्सों की ड्यूटी लगाने में पक्षपात तथा अन्य पैरामेडिकल स्टाफ के साथ उनका भेदभाव भी लगातार बढ़ता जा रहा है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार इस रेलवे हॉस्पिटल ने दिल्ली सरकार को 200 बेड मुहैया करवाए हैं। फिलहाल 100 बेड पर मरीजों को भरती किया जा रहा है और उन सबमें नर्सिंग स्टाफ तीन शिफ्टों में काम कर रहा है। स्टाफ का कहना है कि “यह तीन शिफ्टें भी ‘रेलसमाचार’ में खबर प्रकाशित होने के बाद बनाई गई हैं, जबकि इससे पहले यहां वार्ड में नर्सों से पूरे 12 घंटे की ड्यूटी एएनओ द्वारा करवाई जा रही थी और स्टाफ को 12 घंटे लगातार पीपीई किट पहनकर काम करना/रहना पड़ता था।”

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उन्होंने बताया कि तीन शिफ्ट में काम करने के लिए 60 से ज्यादा नर्सिंग स्टाफ 24 घंटे में लगता है तथा साथ में इतना ही स्टाफ कोरंटीन में रह रहा होता है। इस वजह से अस्पताल में नर्सिंग स्टाफ की ड्यूटी जल्दी-जल्दी रिपीट हो रही है। स्टाफ का स्पष्ट आरोप है कि अस्पताल की एएनओ (सहायक नर्सिंग अधिकारी) द्वारा कुछ खास लोगों को कोरोना की ड्यूटी करने से बचाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि इन खास लोगों में यूनियन के कुछ तथाकथित पदाधिकारी और कुछ डिपार्टमेंटल इंचार्ज एवं उनकी बीवियां भी शामिल हैं।

उनका कहना है कि यह कुछ खास लोग, जो काम कम, यूनियनबाजी ज्यादा करते हैं, अक्सर अपने फायदे के लिए इस अधिकारी को अपने मन-मुताबिक इस्तेमाल करते हैं और अपनी मर्जी से हांकते रहते हैं। उन्होंने बताया कि “यहां एक चीफ नर्सिंग सुपरिंटेंडेंट हैं, जो कि एक यूनियन के कथित पदाधिकारी भी हैं, वह आजकल अपनी बिना डायग्नोस बीमारी के कागजात लेकर अस्पताल में घूमते हुए देखे जा रहे हैं और साथ में चेलेंज भी कर रहे हैं कि हिम्मत है तो कोई हमारी ड्यूटी लगवाकर तो दिखाए! हम तो किसी भी डॉक्टर से लिखवा लेंगे कि हम बीमार हैं और कोविड ड्यूटी नहीं कर सकते हैं।”

स्टाफ का कहना था कि यह बहुत संभव है कि कोई दब्बू डॉक्टर इनका मददगार हो जाएगा, और इन्हें कोई फर्जी बीमारी लिखकर दे देगा, ऐसा पहले भी यहां होता रहा है क्योंकि ये लोग सारा दिन सिर्फ डॉक्टरों के आगे-पीछे ही मंडराते रहते हैं और अपनी बेशर्म खींसें निपोरते हुए भी उन पर यूनियनबाजी की धौंस जमाते रहते हैं।

स्टाफ का साफ कहना है कि एएनओ द्वारा ऐसे निठल्ले लोगों को पहले भी सपोर्ट किया जाता रहा है। सामान्यतः इन निठल्ले लोगों को हॉस्पिटल में काम कम, ठलुआगीरी (दलाली और कामचोरी) ज्यादा करते देखा जा सकता है। उनका कहना है कि यह लोग सिर्फ अपने फायदे के लिए काम करते रहे हैं। जहां सामान्य नर्सेस अथवा स्टाफ को महीने-पंद्रह दिन की भी सीसीएल आसानी से नहीं मिलती है, वहीं ये तथाकथित कुछ स्पेशल लोग 6-6 महीनों की सीसीएल एकसाथ लेकर कोरोना काल में भी घर पर आराम फरमा रहे थे और अब जब ड्यूटी पर आ गए तो यहां भी अपनी जुगाड़ का लाभ उठाकर कोविड वार्ड में ड्यूटी करने से बच रहे हैं।

स्टाफ का कहना है कि वहीं सामान्य दिनों में अस्पताल में अच्छे वार्ड की इंचार्जशिप और मलाईदार पद पर ड्यूटी लेने के लिए ये लोग यूनियन और फेडरेशन के बड़े पदाधिकारियों की भी सिफारिश लगाने से पीछे नहीं रहते। इन सिफारिशों के चलते एमडी/सीएमडी भी दबाव बनाकर इन कथित कामचोर यूनियन नेताओं की ड्यूटी लगवाते हैं। जबकि बाकी स्टाफ को दोहरी-तिहरी ड्यूटी करने के लिए भी मजबूर किया जा रहा है। यह तो जग-जाहिर है कि ये कामचोर कथित यूनियनबाज पहले भी अपने मन-मुताबिक ड्यूटी(?) करते रहे हैं। इसके अलावा यह भी जग-जाहिर है कि रेलवे हेल्थ सर्विसेज का सत्यानाश करने में इन कामचोर यूनियशबाजों का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

इसी तरह स्टाफ ने बताया कि ऑफिस में बैठे कुछ लोग भी अपनी नर्सेस बीवियों की कोविड वार्ड में ड्यूटी लगने से बचा रहे हैं, जबकि अब तक जितने भी इनाम-इकराम रहे हैं, चाहे वह एमडी अवार्ड हो या सीएमडी, अथवा जीएम अवार्ड्स, बिना कोई काम किए सबसे ज्यादा अवार्ड इन्हीं लोगों ने हड़पे हैं। अच्छी जगह या मलाईदार ड्यूटी के लिए ये सब अपनी पहुंच और पावर का इस्तेमाल करते रहे हैं। इन कामचोर कदाचारियों को बचाने के लिए ही अस्पताल की एएनओ भी इन यूनियनबाजों को सपोर्ट करती रही है।

स्टाफ का कहना था कि पावर और पहुंच वाले ये लोग आराम से अपने घर-परिवार के साथ रहते हैं, जबकि 150 से ज्यादा स्टाफ दिल्ली के बाहर से आता है और उनके परिवार दूसरे राज्य में हैं। उन्हें अपने बच्चों से मिले हुए भी पांच महीने से ज्यादा हो गए हैं, तथापि वे अपने परिवार से मिलने नहीं जा पा रहे हैं। बार-बार ड्यूटी लगाकर इनकी जिंदगी और स्वास्थ्य दोनों को खतरे में डाला जा रहा है। जबकि यूनियन नेता और कुछ डिपार्टमेंटल इंचार्ज तथा ऑफिस में काम करने वाले स्टाफ की बीवियों को कोरोना में ड्यूटी लगाने से बचाने के लिए पूरा प्रशासन लगा हुआ है।

स्टाफ का कहना है कि कोरोना में भी कमाई का अवसर तलाश रहे इन लोगों की मदद यहां के कुछ डॉक्टर भी कर रहे हैं, क्योंकि सुनने में आ रहा है कि एएनओ ने इन कामचोरों को सलाह दी है कि अगर किसी डॉक्टर से लिखवाकर दे देंगे, तो उनको ड्यूटी से बचाया जा सकता है। इसलिए आजकल ये तथाकथित वीआईपी लोग डॉक्टरों के आस-पास चक्कर लगाते हुए दिख रहे हैं। एएनओ द्वारा खुद भी जिस तरह इन लोगों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है उससे बाकी नर्सिंग स्टाफ में भारी रोष व्याप्त है।

जहां इस मुसीबत की घड़ी में सभी स्टाफ का मॉरल बढ़ाने के लिए इन तथाकथित यूनियन नेताओं और डिपार्टमेंट के लोगों को आगे आना चाहिए, वहीं ये लोग काम करने वाले स्टाफ का मॉरल डाउन करने में लगे हुए हैं। स्टाफ से बात करने पर उसकी मन:स्थिति का पता चलता है कि अगर इन वीआईपी लोगों की भी ड्यूटी नहीं लगाई गई अथवा इन लोगों ने ड्यूटी नहीं की और सभी से समान ड्यूटी नहीं कराई गई तो बाकी स्टाफ भी ड्यूटी करने से मना कर सकता है।

स्टाफ का कहना है कि इस स्थिति में कोरोना के इस विकट संकट के समय एक बड़ा बवाल खड़ा हो सकता है और उस सब के लिए एएनओ एवं उसके कुछ खास चहेते लोगों के साथ ही वीआईपी बनने वाले कामचोर यूनियनबाज भी जिम्मेदार होंगे, क्योंकि अब तक तो बाकी स्टाफ अपने परिवार से महीनों दूर रहकर भी अपनी ड्यूटी पूरी ईमानदारी से कर रहा है और एक सच्चे कोरोना योध्दा की भूमिका निभा रहा है, जबकि ये कुछ लोग नर्सिंग की जिम्मेदारियों से भाग कर नर्सिंग सेवा को बदनाम करने के साथ ही कामचोरी कर रहे हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ उचित करवाई की जानी चाहिए। ये लोग देश पर आई इस विपदा की घड़ी में भी कमाई का अवसर ढ़ूंढ़ने और सिर्फ अपनी जान बचाने में लगे हुए हैं, जबकि उनकी इस कामचोरी के चलते बाकी स्टाफ की जान को मुसीबत में डाला जा रहा है।

रेल प्रशासन को भी समय रहते इस मामले का अविलंब संज्ञान लेना चाहिए और इस पर उचित कार्यवाही करने सहित समान रूप से सबकी ड्यूटी लगाने पर तुरंत ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि समस्त स्टाफ को आवश्यक आराम के साथ ही अपने घर-परिवार से मिलने का समान मौका मिल सके। इसके साथ ही एएनओ को अन्यत्र ट्रांसफर करने का पुख्ता इंतजाम किया जाए, तब तक के लिए उसे सख्ती के साथ ताकीद किया जाना चाहिए कि वह सभी स्टाफ के साथ समान व्यवहार करे और सबकी ड्यूटी बिना किसी भेदभाव के उसके पद के मुताबिक लगाई जाए। इसके अलावा कामचोर और कदाचारी यूनियन नेताओं की धींगामुश्ती पर अविलंब लगाम लगाई जाए। क्रमशः



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