अनजान हैं रेलमंत्री और सीआरबी या.. – RailSamachar

रेलवे को बदनाम करने के पीछे क्या है रेलमंत्री और सीआरबी का उद्देश्य?

सुरेश त्रिपाठी

एडहॉक रेलमंत्री की मनमानी अथवा रेलवे एवं रेलकार्मिकों के साथ उनके द्वारा किया जा रहा सौतेला व्यवहार और री-एंगेज्ड सीआरबी की अनभिज्ञता या हुक्म के गुलामों जैसी कार्यशैली के चलते रेल अधिकारियों की वर्षों से चली आ रही एकमात्र आवश्यक एवं निहायत जरूरी सुविधा – टेलीफोन सहायक कम डाक खलासी (टीएडीके) – पर रेलमंत्री/रेल प्रशासन के साथ हो रहे अनावश्यक तथा गैरजरूरी विवाद को रेलवे को बदनाम करने की एक नई कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।

इस अनावश्यक विवाद के चलते – जिसे फुल बोर्ड द्वारा तत्काल हल किया जा सकता था – न सिर्फ सभी रेल अधिकारी बुरी तरह उद्विग्न और हतोत्साहित हुए हैं, बल्कि अब वह सब इस मुद्दे पर एकजुट भी हो चुके हैं और कुछेक पूर्वाग्रहियों को छोड़कर सभी रेलकर्मी भी उनके साथ हो गए हैं, क्योंकि रेलमंत्री और सीआरबी ने अपनी उच्छ्रंखल एवं अनभिज्ञतापूर्ण कार्यशैली से रेलवे की इस पूरी वर्कफोर्स को बहुत बुरी तरह से निराश किया है। इसी के परिणामस्वरूप अधिकारियों के सभी जोनल संगठनों ने तत्काल अपने ज्ञापन रेलमंत्री और सीआरबी को प्रेषित किया है, जिसका जवाब अब दोनों से देते नहीं बन रहा है।

सीआरबी “वीकेन यादव” – जिन्होंने ज्यादातर समय रेलवे से बाहर रहकर भी इस सुविधा का भरपूर उपयोग किया – और वह भी जो आज सेमी-जूडीसियल पद पर बैठकर इस पर सवाल उठा रहे हैं – ने भी रेलवे में रहते हुए जिंदगी भर इसका भरपूर लाभ/लुत्फ उठाया – उनसे यह सवाल पूछा जाना जरूरी है कि रेलवे से रिटायर होते ही उन्हें अचानक वह बोधिवृक्ष कहां मिल गया, जिसके नीचे पहुंचते ही उन्हें यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि यह सुविधा अनावश्यक या लक्जरी है? उन्हें रेलवे में रहते और अब मास्टरी झाड़ते यह ज्ञान क्यों नहीं मिला कि रेलवे में दोहरी व्यवस्था भी चल रही है? क्या उससे इन सब – रेलमंत्री, सीआरबी और तथाकथित सेमी-जूडीसियल मेंबर – को इसलिए भय है कि वह आईपीएस से संबंधित है और आईपीएस जब चाहे तब उनकी जड़ें खोद सकता है, अतः उसकी किसी बात पर कोई सवाल नहीं उठाना है?

रेलमंत्री और सीआरबी देखें आरपीएफ मैनुअल

सीआरबी और रेलमंत्री को शायद ये नहीं पता है कि उन्हीं के मातहत आरपीएफ में इंस्पेक्टर (आईपीएफ) से लेकर हर ऑफिसर को ऑफीसियली सिक्योरिटी – ऐडी/फॉलोअर, हमराह – रखने का प्रावधान है, जो हर वक्त उसके साथ रहता है और उसके ऑफीसियल जूरिस्डिक्शन में जो काम है वह टीएडीके के काम के ही समान रखा गया है या उससे मिलता-जुलता है। इसके साथ ही उसे व्यक्तिगत सुरक्षा से भी जोड़ दिया गया है।

रेलमंत्री और सीआरबी कृपया देखें आरपीएफ मैनुअल, 1987 का रूल नंबर 271.2 और 271.3, जो सिक्योरिटी ऐडी के एंटाइटलमेंट और ड्यूटी लिस्ट को डिफाइन करता है। लेकिन हकीकत में यह सिक्योरिटी ऐडी, टीएडीके ही है और टीएडीके की तरह ही काम करता है।

आरपीएफ में इस सुविधा का एंटाइटलमेंट इंस्पेक्टर (आईपीएफ) लेवल से ही प्राप्त होना शुरू हो जाता है। एक आईपीएफ, जिसे कंपनी कमांडर भी कहा जाता है, वह अपने साथ अधिकृत रूप से एक ऑफिस ऐडी रखने के लिए अधिकृत (एंटाइटल्ड) है।

वस्तुत: किसको है सिक्योरिटी ऐडी रखने का अधिकार

जबकि वस्तुतः सिक्योरिटी ऐडी की आवश्यकता तो दुर्गम और जोखिम भरी परिस्थितियों में रेल का परिचालन, संरक्षा, आमदनी और रख-रखाव से जुड़े  लोगों को है और इनको सिक्योरिटी ऐडी या वैयक्तिक सहायक की आधिकारिक एंटाइटलमेंट होनी चाहिए, जैसे – जान जोखिम में डालकर रेल को चलाने वाले पीडब्ल्यूआई (एसएसई)/पीवे/वर्क्स/सिग्नल/टेली, इलेक्ट्रिकल, टीआई आदि और पैसा कमाकर देने वाले सीजीएस, सीपीएस, सीएमआई, सीटीआई इत्यादि। जबकि इसके उलट ये बेचारे अगर बीमार होने पर भी किसी रेलकर्मी से अपना कोई काम कराते विजिलेंस की पकड़ में आ गए तो सीधे मैनपावर के दुरुपयोग के चार्ज में इन्हें मेजर पेनाल्टी मिलना तय होता है।

और फिर सुपरवाइजर ही क्यों, कोई जूनियर या सीनियर स्केल तो छोड़िए, दूसरे किसी भी विभाग के अधिकारी, फिर चाहे वह किसी भी लेवल का हो, अगर टीएडीके के अलावा किसी और से अपना ब्रीफकेस भी उठवा लेता है, तो चूंकि वह आईपीएफ के बराबर भी ऑफीसियली एक ऐडी रखने के लिए अधिकृत नहीं है, तो फिर उस अपराध के लिए उसके खिलाफ कंप्लेंटबाजी भी हो सकती है, यूनियनें भी इसे मुद्दा भी बना सकती हैं और शिकायत पर विजिलेंस तो इसे ऑफीसियल पोजीशन के दुरुपयोग का केस बनाता ही है।

रेलवे की सबसे बड़ी विडंबना यह रही है कि जो काम करने वाले और पैसा कमाकर देने वाले डिपार्टमेंट हैं, उन्हें सबसे ज्यादा आपसी रंजिश और खींच-तान में एक-दूसरे को बदनाम करने तथा नीचा दिखाने में अपनी एनर्जी जाया करते देखा जाता है। जबकि 10% मामलों को छोड़कर 90% मामलों में सभी लोगों ने ईमानदारी से रेल हित को ध्यान में रखकर काम किया। लेकिन कुछेक सभी डिपार्टमेंट में मौजूद 10% नकारात्मक, दंभी, अति महत्वाकांक्षी, तिकड़मबाज, भ्रष्ट लोगों का नैरेटिव इतना प्रभावी हुआ कि 90% ईमानदार और रेल हित को सर्वोपरि मानकर काम करने वाले लोगों के काम पर पानी फिर गया।

इतना ही नहीं, एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में ये सभी फ्रंटलाइन डिपार्टमेंट दूसरे-तीसरे की जरूरी सुविधाएं काटते गए या कटवाते गए। इन लोगों ने अपनी सारी ऊर्जा इसी में लगा दी, जिसकी परिणति आज रेल में मचा घोर विभागवाद यानि डिपार्टमेंटलिज्म है। हर मामले में अपनी स्थिति सबसे ज्यादा सुदृढ़ करने में चुपचाप इसका सबसे बेहतर फायदा, मंत्री के अलावा, आरपीएफ जैसे डिपार्टमेंट ने उठाया है।

कोर ऐक्टिविटी से जुड़े विभाग भले ही लड़ें-मरें, एक दूसरे को नीचा दिखाएं, लेकिन उनकी मजबूरी है कि वह अपना काम नहीं छोड़ सकते। छोड़ेंगे तो उनके घर का ही नहीं, देश के घरों का चूल्हा जलना बंद हो जाएगा। एक तरफ जहां ये लोग एक-दूसरे की उपलब्धि को मान्य (रिकग्नाइज) करने की जगह एक-दूसरे को खत्म करने की हद तक नीचा और अनावश्यक दिखाने के लिए नए-नए तरीके प्रयोग कर रहे थे, तो वहीं दूसरी तरफ जो नॉन-कोर एक्टीविटी और बैक एंड सपोर्ट देने वाले विभागों ने बिना काम किए इन फ्रंटलाइन विभागों के अच्छे कामों का श्रेय कैसे लिया जाता है, उस आर्ट में महारत हासिल कर ली। इस दौर में इन्होंने अपनी विघ्न पैदा करने की प्रतिघाती शक्ति (nuisance value) और सुविधा भी खुब बढ़ाई। यही वह फाल्ट लाइन है, जा किसी विजनरी रेलमंत्री को पकड़नी चाहिए थी, जिसमें रेल के सारे मर्ज की दवा छुपी थी। परंतु दुर्भाग्यवश रेलमंत्री की प्राथमिकताएं रेल का सुदृढ़ीकरण करना नहीं, बल्कि इसका बंटाधार करने वाली साबित हो रही हैं।

रेलमंत्री को चाहिए था कि कोर/फ्रंटलाइन विभागों के 90% ईमानदार, मेहनतकश तथा हाशिये पर चले गए लोगों और उनके काम को मान्यता देते, आवश्यक एवं उत्पादक जगहों पर उनको दायित्व सौंपते, रेल के मुख्य ऑब्जेक्टिव्स और गोल्स के हिसाब से परिणाम देने वाले डिपार्टमेंट्स को नीति निर्धारण में वरीयता, महत्त्व और इनसेंटिव प्रदान करते, तब शायद “टका सेर खाजा, टका सेर भाजा” वाली रेलवे की वर्तमान स्थिति नहीं होती।

यही नहीं, सिर्फ इतना करने से ही आज भी भारतीय रेल और इसके कर्मचारी-अधिकारी इतनी कूव्वत तो रखते हैं कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था को अकेले चमका दें। लेकिन दुर्भाग्य है कि इस देश को और रेल को ऐसा नेतृत्व इस दौर में भी नहीं मिल सका।

डीआरएम/जीएम को भी नहीं है आरपीएफ के अदने अधिकारी जैसा अधिकार

अब आईए एएससी पर एक नजर डालते हैं। एक एएससी ऑफीसियली दो वैयक्तिक सहायक (पर्सनल ऐडी) रखने के लिए अधिकृत है और ये विशेषाधिकार बाकी गर्दभों/खच्चरों की तरह काम करने वाले रेलवे के अन्य सभी ग्रेड के सिविल, मैकेनिकल, ट्रैफिक, पर्सनल, एकाउंट्स आदि विभागीय अधिकारियों और डॉक्टरों के पास तो नहीं ही है, डीआरएम, जीएम और सीआरबी एवं रेलमंत्री के पास भी यह विशेषाधिकार नहीं है।

डीआरएम, जीएम और सीआरबी के पास भी आरपीएफ के जो एक दो लोग होते हैं, वह कमांडेंट/पीसीएससी के “प्लेजर/डिस्प्लेजर” पर ही रहते हैं, क्योंकि इसमें चॉइस न डीआरएम की चलती है, न जीएम की, न सीआरबी की और न ही रेलमंत्री की ही चल पाती है। यह बात अलग है कि इनकी चापलूसी में डीएससी/सीनियर डीएससी और पीसीएससी अलग से कुछ सिपाही अवश्य तैनात कर देते हैं, आखिर उनसे “एक्सीलेंट” एसीआर जो लिखवानी होती है! कई कमांडेंट, पीसीएससी साहेब, जिसको अपनी गुप्तचरी लायक ठीक समझते हैं, उसी को डीआरएम/जीएम के साथ लगाते हैं और फिर इन लोगों के मूवमेंट की पल-पल की खबर भी रखते हैं।

आरपीएफ अधिकारियों के लगातार बढ़ते सिक्योरिटी ऐडी

व्यक्तिगत सिक्योरिटी ऐडी की आधिकारिक तौर पर स्वीकृत संख्या हर ग्रेड के साथ आरपीएफ में लगातार बढ़ती जाती है। वर्ष 2004 में डीजी/आरपीएफ द्वारा जारी निर्देशानुसार एसजी/एसएजी ग्रेड के आरपीएफ अधिकारी ऑफीसियली 3 सिक्योरिटी ऐडी रखेगा और एडीशनल डीजी/आरपीएफ के पास 4 सिक्योरिटी ऐडी रहेंगे। ये अधिकृत आदेश है कि इतने आदमी व्यक्तिगत सहायक के तौर पर इनके पास रहेंगे, भले ही इनका नाम कोई और दे दिया जाए।

फाइनेंशियल कंकरेंस का अता-पता नहीं

यहां एक बात दीगर की है कि बात-बात पर दो-दो पैसे की चीज में खुरपेंच करने वाले रेलवे के एकाउंट्स विभाग ने इसको अपनी सहमति दी है कि नहीं, यह इस निर्देश में उल्लेखित नहीं है, क्योंकि बोर्ड और फाइनेंस ने सहमति अगर नहीं दी है, तो सवाल यह उठता है कि इतना बड़ा फाइनेंशियल इंप्लीकेशन का मामला स्वयंभू तरीके से कैसे चल रहा है? और तब फिर ऑडिट एवं विजिलेंस जैसे हाथी डिपार्टमेंट क्या कर रहे हैं? इसके अलावा यदि पूरे बोर्ड और फाइनेंस ने इसे पारित किया है, तो फिर वह टीएडीके के मामले पर चुप्पी क्यों साधे हुए हैं?

तब रेल अधिकारियों को भी कोई आपत्ति नहीं होगी!

यहां तो अभी सिर्फ टीएडीके पर ही वर्तमान यथास्थिति अभी तक चल रहे नियमों के अनुसार ही बनाए रखने की मांग है, जिसमें अधिकारी अपनी पसंद से अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा का ध्यान रख किसी जरूरतमंद को ही रोजगार देता है। अगर सीआरबी और मंत्री इसमें अपना “सैडिस्टिक प्लेजर” लेंगे और यदि वह यह कहते हैं कि आरपीएफ में लोग सिक्योरिटी ऐडी चयन प्रक्रिया से चुने गए लोगों में से ही रखते हैं, तब रेल अधिकारियों को भी शायद कोई आपत्ति नहीं होगी अगर आरपीएफ की तर्ज पर उनके सुपरवाइजरों से लेकर एचएजी+ अधिकारियों को भी हू-ब-हू उतने ही आदमियों की सुविधा मिले और तब भले ही वह आरपीएफ के सिक्योरिटी ऐडी के अलावा कुछ भी कहे जाएं।

बिना उत्पादक जिम्मेदारी और स्पष्ट जवाबदेही के ज्यादा सुविधा

यहां रेलमंत्री और सीआरबी को यह भी पता होना चाहिए कि आरपीएफ अपनी चयन प्रक्रिया खुद बनाती भी है और इंप्लीमेंट भी खुद ही करती है। इसलिए उन्हें अपनी आवश्यकताओं के अनुसार जैसा स्टॉफ चाहिए होता है, वे वैसा ही स्टाफ ले लेते हैं। आरआरसी और आरआरबी जैसा नहीं कि ट्रैकमैन, गेटमैन, पॉइंट्समैन आदि के लिए भी बीटेक/एमटेक और टीटीई, पीडब्ल्यूआई आदि के लिए भी एमटेक, पीएचडी लिए जा रहे हैैं, जो न ट्रैकमैन का ही काम कर पाते हैं और न टीटीई या इंजीनियर का!

इस तरह सुविधा और संसाधन के मामले में आरपीएफ आज की तारीख में आईपीएस और आईएएस से भी बहुत आगे है और वह भी बिना किसी प्रोडक्टिव रेस्पांसिबिलिटी (जिम्मेदारी) और स्पष्ट एकाउंटेबिलिटी (जबाबदेही) के!

“टके सेर खाजा, टके सेर भाजा, अंधेर नगरी चौपट राजा”

टीएडीके पर जारी इस नए फरमान से दुःखी और हतोत्साहित रेल के कई ऑफिसर और कर्मचारी कहते सुने जा सकते हैं कि “हम कमाकर दे रहे हैं और काम कर रहे हैं क्या इन्हीं लोगों को सुविधा देने के लिए, जबकि हमारी स्थिति भिखारी जैसी बन गई है। यहां तो वास्तव में – टके सेर खाजा, टके सेर भाजा, अंधेर नगरी चौपट राजा – वाली कहावत ही चरितार्थ हो रही है।”

वह कहते हैं कि, “धुंधकारी साहब (रेलमंत्री) को न जाने रेल के अन्य विभागों के उन बेचारे ऑफिसर्स से कौन सी दुश्मनी है, जो दधीचि की तरह रेल को सींचते, बढ़ाते ला रहे हैं और जो इनके मनमानी राज में भी जैसे-तैसे इसे जिंदा रखने की जद्दोजहद में लगे हैं – और शायद यही उनकी नाराजगी का कारण है – आज इनको रेलमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, तो इन्हीं फ्रंटलाइन डिपार्टमेंटट्स के चलते, लेकिन रेलमंत्री के इस तरह के बर्ताव से और प्रयास से तो लगता नहीं है कि भविष्य में इनके जैसे किसी और को मंत्री कहलाने का भी सौभाग्य मिल पाएगा।”

“घास खाए गदहा, और मार खाए जुलाहा”

सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस सरकार में “घास खाए गदहा और मार खाए जुलाहा” और “सब धान 22 पसेरी” की नीति अपनाने वाले मंत्री हों और मंत्री अपनी गरिमा भूलकर, अपने को सबसे ज्ञानी समझकर और आंखें बंद करके जब अपने लोगों को रौंदना शुरू करता है – जिनको उससे गार्जियन जैसे व्यवहार की अपेक्षा होती है – तब या तो सबकी “आह” उसे ले डूबती है या फिर विद्रोह होता है, और ये दोनों चीजें किसी भी अंधे-दंभी अस्तित्व को जलाकर राख कर देने की ताकत रखती हैं।

सभी विभागों के अधिकारियों से ज्यादा हैं अकेले आरपीएफ अधिकारियों की सुविधाएं

अब अगर आईपीएफ/आरपीएफ से शुरू करके डीजी/आरपीएफ तक को आधिकारिक तौर पर मिल रहे सिक्योरिटी ऐडी, फॉलोअर और हमराह के नंबर जोड़े जाएं, तो ये मुख्यधारा के सभी विभागों के अधिकारियों को मिल रहे कुल टीएडीके से ज्यादा ही होंगे। जबकि यहां देखने वाली बात यह भी है कि डीजी/आरपीएफ की इस मामले में कोई लिमिट निर्धारित नहीं है, वह जितने चाहे उतने बल सदस्यों को अपनी सेवा में लगा सकता है।

जबकि यहीं रेलमंत्री का मंत्री पद जस्टिफाई करने वाले विभागों के बड़े से बड़े अधिकारी, जो 24 घंटा अपनी नौकरी, अपने स्वास्थ्य और परिवार को दांव पर रखकर और उनकी गालियां तथा अपशब्द सुनकर भी काम करता रहता है, वह उनके ही आईपीएफ से सुविधा में बराबरी नहीं कर सकता है। जबकि सुविधाओं के मामले में डीएससी, सीनियर डीएससी, डिप्टी सीएससी, सीएससी, पीसीएससी, डीजी/आरपीएफ तो उनकी अपेक्षा बहुत बड़ी हस्तियां हैं।

हमारा मकसद यहां यह बताने या जस्टीफाई करने का कतई नहीं है कि अगर किसी की एक आंख फूटी है, तो दूसरे की दोनों फोड़ दी जाएं। हमारा मकसद रेलमंत्री को सिर्फ हकीकत से रू-ब-रू कराना है और जिसकी एक ही आंख है उसके और रेलमंत्री के भी सर्वाइवल के लिए उसकी बची एक आंख न फोड़ी जाए, रेल हित में उनको सिर्फ यही आगाह कराना है।

अपवाद हर जगह होते हैं, परंतु वास्तविकता का अवलोकन किया जाए

भले ही टीएडीके के मामले में रेलमंत्री को निर्णय लेने में साल भर लगता, लेकिन अगर वास्तव में रेलमंत्री यह अहसास करना चाहते हैं कि उनका कौन सा विभाग कितनी मौज ले रहा है, कितनी सुविधा उठा रहा है, तो कभी-कभी परिवार का मुखिया होने के नाते सभी विभागों के सभी स्तर के अधिकारियों के घर औचक चाय पर पहुंच जाएं और उनके परिवार से उतनी देर ही वार्तालाप कर लें। यह काम वह सीआरबी एवं बोर्ड मेंबर्स के बंगलों से शुरू करें और जीएम से होते हुए असिस्टेंट स्केल तक पहुंच जाएं। मेरा विश्वास है कि ऐसा करने से या इस तरकीब से रेलमंत्री का सिर्फ पूर्वाग्रह ही खत्म नहीं होगा, बल्कि वह इससे गौरवान्वित ही होंगे कि वह ऐसे परिवार के मुखिया हैं, और उनको ग्लानि तब होगी अपनी सोच पर तथा इनको देखकर कि क्या वह इन्हें ही सुविधाभोगी समझ रहे थे?  

अपवाद हर जगह होते हैं, यहां भी हैं, लेकिन रेलमंत्री को यह यहां ज्यादा इसलिए लगते हैं, क्योंकि जो अपवाद हैं, और जो भ्रष्ट, शातिर, धूर्त, चापलूस, तिकड़मी और घोर अवसरवादी हैं, वही लोग महत्वपूर्ण पदों पर यहां ज्यादा विराजमान हैं और इसीलिए रेलमंत्री के इर्दगिर्द वही लोग ज्यादा हैं, चाहे रेलवे बोर्ड हो, चाहे उनका… इसके अलावा, रेलमंत्री इस व्यवस्था को इसलिए भी ढ़ंग से नहीं समझ पा रहे हैं, क्योंकि एक तो वह जनता द्वारा कभी चुनकर नहीं आए हैं, दूसरे उनके साथ समझदार सलाहकारों के बजाय नासमझ और चापलूस लोग लगे हुए हैं।

क्या ऐसे ही सुरक्षित रह पाएगी देश की संवैधानिक व्यवस्था?

यह रेल संगठन इतनी विसंगतियों के बाद भी कैसे चल रहा है, इस पर यदि रेलमंत्री ज्यादा धयान देते, तो अभी तक रेल की लौह पटरी को वह स्वर्ण पटरी में बदल चुके होते और काम करने वाले भी उत्साह से लबरेज होते। लेकिन अब तो उनके सर्वज्ञानी कार्य-व्यवहार के चलते वर्तमान पटरियां ही बच जाएं, वही बड़ी बात होगी! रही बात काम करने वालों में उत्साह की, तो रेलमंत्री ने 5 अगस्त को उसमें बची-खुची प्राणअग्नि को भी बुझा डालने का प्रयास शुरू कर दिया है। लेकिन उनको यह नेक सलाह है कि उसकी #राख से बचिएगा! क्योंकि जब संसद से पारित और पुनर्स्थापित वैधानिक व्यवस्था पर आईपीएस को हटाने के कानून पर अमल करने की बात आती है, तब तो आप यह कहकर भाग खड़े होते हैं कि “उनकी बात मत करो, वह तो हमको ही हटा देंगे!” क्या ऐसे ही चलती रहेगी और सुरक्षित रह पाएगी इस देश की संवैधानिक व्यवस्था? क्रमशः 





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दुर्घटना या साजिश !! – RailSamachar

रेल पटरी पर 16 लोग कट कर मर गए। हर कोई कहता है कि वे सब रेल पटरी पर सो रहे थे? क्या वास्तव में यही सच है? क्या इस पर आंख मूंदकर विश्वास किया जा सकता है?

रेलवे ट्रैक को मैंने बहुत नजदीक से देखा है। सालों तक रेलवे ट्रैक पर चला हूं। कभी पैदल तो कभी ट्रॉली से उस पर चलता रहा हूं। मैं खुद एक ट्रैक इंजीनियर था। अपनी आंखों के सामने कई लोगों को रनओवर होते देखा है। अपने स्टाफ को कटते हुए देखा है।

किंतु जब से औरंगाबाद की यह दर्दनाक घटना सुनी है, सारे सवालों का मैं जवाब नहीं ढूंढ पा रहा हूं।

माना कि वे अभागे मजदूर सुबह के लगभग चार बजे रेल लाइन पर पैदल चल रहे थे।

ट्रेन ड्राइवर ने कई बार हॉर्न बजाया। परंतु उनको सुनाई नहीं दिया। किंतु 4 बजे अंधेरा होता है। हॉर्न नहीं भी सुना, पर ट्रेन के इंजन की हेडलाइट इतनी तेज होती है कि सीधे ट्रैक पर 10 किमी दूर से दिख जाती है। और जहां तक मेरी जानकारी है, उस जगह ट्रैक एकदम सीधा था। वहां न कोई कर्व था और न कोई ढलान थी।

तो फिर क्या 16 के 16 मजदूरों को ट्रेन के तीखे हॉर्न के साथ-साथ इंजन की हेडलाइट भी नहीं दिखाई दी? ऐसा कैसे हो सकता है? ये कैसा मजाक है?

दूसरी संभावना कि मजदूर थककर ट्रैक पर ही सो गए थे। 50 एमएम से लेकर 64-65 एमएम के मोटे और नुकीले पत्थरों पर कुछ देर के लिए बैठकर सुस्ताया तो जरूर जा सकता है, पर उनके ऊपर सोया तो कदापि नहीं जा सकता। वह भी इतनी गहरी नींद में, कभी नहीं।

यहां बता दूं कि जब पटरी पर ट्रेन 100 किमी की स्पीड में दौड़ती है, तो ट्रेन के चलने से पटरी में इतनी जोर से वाइब्रेसन (कंपन) होते हैं कि 5-6 किमी दूर तक रेल पटरी कंपकंपाती रहती है। चर्र-चर्र चरमराहट की तीखी आवाज आती है, सो अलग।

तो यदि मान भी लिया जाए कि 16 मजदूर थक-हारकर रेल पटरी पर ही सो गए थे, तो क्या इनमें से एक को भी ये तेज कंपन और चर्र-चर्र की कर्कश आवाज जगा न सकी? ये कैसा मजाक है? इस पर भला कैसे भरोसा किया जा सकता है!

दुर्घटना स्थल से खींचे गए फोटो बता रहे हैं कि ट्रैक के किनारे एकदम समतल जमीन थी, तो उस समतल जमीन को छोड़कर भला ट्रैक के नुकीले पत्थरों पर कोई क्यों सोएगा? ये कैसे हो सकता है?

कुछ मजदूर जो ट्रैक पर नहीं सोकर, जमीन पर सो रहे थे, वो बता रहे हैं कि ट्रेन के हॉर्न से उनकी आंख खुल गई और उन्होंने उन 16 मजदूरों को उठने के लिए आवाज दी थी, पर वे नहीं उठे!

इस थ्योरी पर कौन भरोसा करेगा कि हॉर्न की आवाज से इन तीन-चार मजदूरों की तो आंख खुल गई, पर उन 16 में से किसी एक की भी नींद नहीं टूटी। न हॉर्न से, न लाइट से, न पटरी के तीव्र कंपन से और न ही पटरियों की कर्कश चरमराहट से !!

https://images.app.goo.gl/mAjvRFCsGP6BSDZw7

फोटुओं में ट्रैक के बीचो-बीच मजदूरों की रोटियां बिखरी पड़ी हुई दिखाई दे रही हैं ! ये तो वाकई गजब है, बहतै गजब है भाई !!

काहे ते कि ट्रेन की 100 किमी की तूफानी स्पीड। वह स्पीड जिसमें ट्रैक की गिट्टियां भी उछलकर कई मीटर दूर जाकर गिरती हैं। वहीं उन मजदूरों की रोटियां सलीके से ट्रैक के बीचो-बीच रखी हुई हैं। वह न तूफानी हवा में उड़ीं, न बिखरीं। एक ही जगह रखी हुई हैं !!

इस तथ्य के मद्देनजर इस कथित हादसे पर आसानी से कौन भरोसा कर लेगा भाई!?

कहीं ये कोई बहुत गहरी साजिश तो नहीं है? कहीं यह नफरत की राजनीति तो नहीं है? ये मेरा शक है क्योंकि महाराष्ट्र आज साजिशों का एक बड़ा गढ़ बना हुआ है।

*एक ट्रैक इंजीनियर की डायरी के सौजन्य से!








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