आरक्षित रेल टिकटों की कालाबाजारी में पकड़े गए रेलकर्मियों को मंडल अधिकारियों का संरक्षण! – RailSamachar

बुकिंग क्लर्क नितिन दुमानिया द्वारा प्राप्त व्हाट्सएप संदेश के आधार पर तत्काल आरक्षित टिकटें निकालकर आरोपी ताहिर को भेजी जाती थीं तथा ताहिर टिकटों का पैसा कमीशन के साथ नितिन के बैंक खाते में जमा करवा दिया करता था!

पश्चिम रेलवे, भावनगर मंडल के वेरावल आरपीएफ द्वारा आरक्षित रेल टिकटों (जेसीआरटी) की कलाबाजारी में लिप्त पाए जाने पर रेल अधिनियम की धारा 143 के तहत अपराध संख्या 70/2021, दिनांक 28.04.21 को मामला दर्ज कर सासण रेलवे स्टेशन के बुकिंग क्लर्क संदीप अग्रावत, तलाला स्टेशन के बुकिंग क्लर्क मनीष श्रीवास्तव, विसावदर स्टेशन के बुकिंग क्लर्क नितिन भाई तथा दामनगर स्टेशन के डिप्टी एसएस शिव कृपाल पासवान को गिरफ्तार किया गया था। फिलहाल उक्त चारों आरोपी रेलकर्मी रेलवे कोर्ट द्वारा दी गई जमानत पर हैं।

बताते हैं कि 24 अप्रैल को सासण रेलवे स्टेशन पर आरक्षित तत्काल टिकटों की कालाबाजारी के संदर्भ में एक मुखबिर से प्राप्त गुप्त सूचना पर वेरावल आरपीएफ पोस्ट के उप निरीक्षक उदयभान सिंह ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति लेकर उनके मार्गदर्शन में सासण स्टेशन के यात्री आरक्षण केंद्र की एक बुकिंग विंडो विशेष पर छापा मारकर तीन तत्काल आरक्षित टिकट बरामद किए।

बरामद टिकटों का विवरण:

1. अहमदाबाद-लखनऊ, यात्री-4, मूल्य – ₹2880/-
2. सूरत-शाहगंज, यात्री-1, मूल्य – ₹2075/-
3. सूरत-मुजफ्फरपुर, यात्री-4, मूल्य – ₹3740/-

उपरोक्त तीनों आरक्षित तत्काल टिकट आरक्षण केंद्र, सासण के बुकिंग क्लर्क संदीप अग्रावत द्वारा निकाली गई थीं और टिकटों की उपरोक्त कीमत क्रमशः ₹8800, ₹3500, ₹8000 यात्रियों से लिया पाया गया। चूंकि मामला स्पष्टत: टिकटों की कालाबाजारी का था, अतः इसमें तत्काल सात लोगों की धड़पकड़ की गई।

गिरफ्तार आरोपियों का विवरण:

आरोपी नं.1: इरफान पुत्र सरफराज अंसारी, उम्र-38, धंधा-सिलाई काम, रहिवासी – रहीमभाई की चाली, मिल्लत नगर, मणिनगर, चारमीनार मस्जिद के पास, अहमदाबाद।

आरोपी नं.2: महबूब अली उर्फ गुड्डू पुत्र अब्दुल जब्बार अंसारी, उम्र-46, धंधा-छुटक मजूरी, रहिवासी – नागोरी की चाली, हंजर सिनेमा के सामने, अहमदाबाद।

आरोपी नं.3: फेजल उर्फ तोसिफ पुत्र हनीफभाई गोरी उम्र-28, धंधा-छुटक मजूरी, रहिवासी – साइगरा कोशलावाड़ी झोपड़पट्टी, वेरावल, जिला – गीर सोमनाथ।

आरोपी नं.4: संदीप पुत्र गिरीशभाई अग्रावत, उम्र 28, धंधा- नौकरी, रेलवे में बुकिंग क्लर्क, तैनाती-सासण रेलवे स्टेशन, रहिवासी – मेनबाजार सासण गीर, तालुका मेंदरणा, जिला – जूनागढ़।

आरोपी नं.5: मनीष कुमार पुत्र अदर कुमार श्रीवास्तव, धंधा – नौकरी, रेलवे में बुकिंग क्लर्क, तैनाती – तलाला रेलवे स्टेशन।

आरोपी नं.6: शिव कृपाल पासवान पुत्र जानकी पासवान, उम्र-39, पद- स्टेशन मास्टर, दामनगर रेलवे स्टेशन, रहिवासी – खादी कार्यालय मार्केटिंग यार्ड के सामने, दामनगर, जिला – अमरेली।

आरोपी नं.7: ताहिर अली पुत्र हसन अली, उम्र-28, धंधा – टाइल्स बिक्री, रहिवासी – धोबी शेरी गली, वोहरा मस्जिद के पास, सावर कुंडला, जिला – अमरेली।

लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि इसके बावजूद इन चारों रेल कर्मचारियों का निलंबन तो बहुत दूर की बात, केवल सासन गिर स्टेशन के बुकिंग क्लर्क संदीप अग्रावत को छोड़कर बाकी तीनों क्लर्क अपने-अपने स्टेशनों पर पूर्ववत नौकरी कर रहे हैैं।

रेल प्रशासन के इस रवैए को देखते हुए क्या यह नहीं माना जाना चाहिए कि मंडल के इनके वरिष्ठ रेल अधिकारी इन्हें अब भी खुला सपोर्ट कर रहे हैं और उनकी गलतियों तथा अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं? जबकि सबको इस मामले की जानकारी दी गई है और सभी को यह बहुत अच्छी तरह से ज्ञात है कि इस पूरे घटनाक्रम का मास्टर माइंड तलाला स्टेशन का बुकिंग क्लर्क मनीष श्रीवास्तव है।

विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि इस मामले में अभी और भी रेल कर्मचारी तथा बाहरी व्यक्ति वांछित हैं और उनकी गिरफ्तारी भी जल्दी ही हो सकती है। सूत्रों ने बताया कि आरपीएफ को इस बात के पक्के सबूत मिले हैं कि उक्त चारों रेल कर्मचारी सीधे अहमदाबाद और सूरत के अवैध टिकट एजेंटों के संपर्क में थे, जो इनके द्वारा बनाई गई टिकटों और कमीशन के पैसे सीधे या तो इन रेल कर्मचारियों के स्वयं के बैंक खातों में या इनकी पत्नियों के खातों में अथवा इनके जानने वाले बाहरी व्यक्तियों के खातों भेजते रहे हैं। सूत्रों ने बताया कि आरपीएफ द्वारा इस मामले की पूरी तरह से तह में जाकर जांच की जा रही है।

इस मामले में अभी तक 4 रेलकर्मियों के अतिरिक्त 4 बाहरी व्यक्ति/एजेंट, कुल 8 व्यक्तियों, को आरपीएफ वेरावल की टीम द्वारा गिरफ्तार किया गया है।

बुकिंग कलर्क नितिन दुमानिया तैनात-विसावदर रेलवे स्टेशन की टिकटों की कालाबाजारी करने और गिरफ्तारी के संबंध में आरपीएफ ने सम्मन जारी किया था।

दिनांक 28.04.2021 को आरपीएफ वेरावल पोस्ट पर रेलवे एक्ट की धारा 143 के तहत दर्ज अपराध संख्या 70/2021, दि. 28.04.2021 के मामले में अब तक रेलवे टिकटों की कालाबाजारी के आरोप में कुल सात आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके हैं। इसमें तीन रेल कर्मचारी भी शामिल हैं। दि. 13.06.2021 को आरोपी नं. 7 ताहिर अली को सम्मन के जरिए आरपीएफ द्वारा बुलाया गया था।

प्राप्त जानकारी के अनुसार पूछताछ के दौरान ताहिर अली ने स्वीकार किया कि वह विसावदर रेलवे स्टेशन पर तैनात बुकिंग क्लर्क नितिन दुमानिया से लागातार फोन पर एक दूसरे के संपर्क में रहता था। यह बात सीडीआर रिपोर्ट से भी प्रमाणित होती है तथा वह व्हाट्सएप के जरिए विसावदर रेलवे स्टेशन पर तैनात बुकिंग क्लर्क नितिन को तत्काल टिकट निकालने के बारे में संदेशों का आदान-प्रदान करता था, जिस पर बुकिंग क्लर्क नितिन के द्वारा प्राप्त संदेश के आधार पर तत्काल टिकट निकालकर आरोपी ताहिर को भेजी जाती थीं तथा ताहिर टिकटों का पैसा कमीशन के साथ नितिन के बैंक खाते में जमा करवा दिया करता था, जो नितिन के बैंक खाते में भी दिख रहा है और इस बात को – नितिन दुमानिया एवं ताहिर अली – दोनों आरोपियों द्वारा स्वीकार भी किया है ।

आरपीएफ द्वारा दि. 15-16.06.2021 को बुकिंग क्लर्क नितिन दुमानिया को सम्मन देकर वेरावल पोस्ट बुलाया गया तथा पूछताछ कर उनका बयान दर्ज किया गया, जिसमें उपरोक्त प्रकरण में उसकी संलिप्तता पाई गई है। तत्पश्चात उसको उपरोक्त प्रकरण में आरोपी नं. 8 बनाकर गिरफ्तार किया गया तथा दि. 17.06.2021 को रेलवे मजिस्ट्रेट, राजकोट के समक्ष पेश किया गया।

इस पूरे मामले की जांच और उपरोक्त सभी आरोपियों की गिरफ्तारी आरपीएफ वेरावल पोस्ट के उप निरीक्षक उदयभान सिंह, भावनगर मंडल, पश्चिम रेलवे द्वारा की गई है।

मामले के जानकारों का कहना है कि इतने बड़े घोटाले की जानकारी ऊपर के अधिकारियों को न हो, इस पर शायद ही किसी को विश्वास होगा। उनका यह भी कहना था कि आरपीएफ की इस कार्यवाही से लगता है अब आरक्षित रेल टिकटों की कालाबाजारी पर यथोचित अंकुश लग पाएगा।

तथापि उपरोक्त मामले में प्रमाण सहित लिप्त पाए गए चारों रेलकर्मियों को न तो आज तक निलंबित करके ड्यूटी से अलग किया गया है और न ही उनके विरुद्ध ऐसा कोई कारगर मैसेज दिया गया है कि भ्रष्टों को कुछ सबक मिले। इससे एक तरफ जहां भ्रष्ट रेलकर्मियों को भ्रष्टाचार करने की खुली छूट देकर संबंधित अधिकारियों द्वारा उनको पूरा सहयोग दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ आरक्षित टिकटों की कालाबाजारी के तार रेल में ऊपर तक जुड़े होने का यह पुख्ता संकेत भी है।

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अक्षम रेलकर्मियों के मरने के लिए लावारिस छोड़ देता है रेल प्रशासन – RailSamachar

मामलों को सालों-साल लटकाकर अक्षम रेलकर्मियों को मरने के लिए अकेला छोड़ देना अत्यंत अमानवीय कृत्य है!

खबर है कि मध्य रेलवे में मेडिकल इनवैलीडेशन के बहुत से मामले लंबे समय से पेंडिंग हैं। इसके लिए प्रिंसिपल सीएमडी, मध्य रेलवे द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है। यह पीसीएमडी की अकर्मण्यता है या लापरवाही? यह पूछ रहे हैं मेडिकली काम करने में अक्षम हो चुके रेलकर्मियों के तमाम परिजन।

बताते हैं कि पूरी भारतीय रेल में इस तरह के सैकड़ों-हजारों केस लंबित हैं। परिजनों के सामने उनके मरने की प्रतीक्षा करने के सिवा कोई विकल्प नहीं है।

उनका कहना है कि अपने एकमात्र कमाऊ व्यक्ति को मरते हुए देखना बहुत अमानवीय है, परंतु उनके सामने अन्य कोई विकल्प नहीं बचा है। आर्थिक रूप से भी ऐसे सभी परिवार बुरी तरह टूट चुके हैं।

इस मामले में जानकारों का कहना है कि रेल प्रशासन को वैसे भी संबंधित रेलकर्मी के किसी न किसी परिजन को अनुकंपा नियुक्ति देनी है। ऐसे में अगर लंबे समय से असाध्य बीमारियों के चलते कर्मचारी काम करने में अक्षम और अयोग्य हो चुका है, तो मेडिकली इनवैलीड सर्टिफाई करके और उसके किसी परिजन को अनुकंपा नियुक्ति देकर उसके परिवार को आर्थिक रूप से कंगाल होने से बचाया जा सकता है।

उनका कहना है कि जब उनको नियमानुसार अनुकंपा नियुक्ति देनी ही है, तो रेलकर्मी के मरने का इंतजार किए बिना भी यह काम बहुत आसानी से और मानवता के आधार पर समय रहते किया जाना चाहिए।

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बिहार चुनाव के मद्देनजर रेलकर्मियों की जान की कोई परवाह नहीं – RailSamachar

लॉकडाउन और बढ़ते संक्रमण के बावजूद टारगेट के नाम पर सामूहिक कार्य में झोंके जा रहे कर्मचारी

हाजीपुर : आगामी 8 अगस्त 2020 को विडियो कांफ्रेंसिंग के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बहुप्रतीक्षित कोशी ब्रिज का उदघाटन संपन्न होना है। इसके बाद इस रेलवे ब्रिज से ट्रेनों का संचालन प्रारम्भ हो जाएगा। इस तरह सरायगढ़ से निर्मली तक ट्रैक का आमान परिवर्तन का कार्य पूरा हो जाएगा।

लॉकडाउन में भी कमीशन कमाने की गजब की बेचैनी पूर्व मध्य रेलवे निर्माण संगठन के अधिकारियों में देखी जा रही है। राम नाम की लूट है, लूट सके सो लूट, अंतकाल पछताएगा जब प्राण जाएंगे छूट, वाली कहावत यहां पूरी तरह से चरितार्थ हो रही है।

पूर्व मध्य रेलवे में इसी तर्ज पर खूब निर्माण कार्य चल रहे हैं। आखिर बिहार में विधानसभा का चुनाव भी तो है। इसीलिए पुराने टेंडर प्रशासनिक आधार पर कैंसल करके नए टेंडर पुनः हाई रेट पर और वह भी प्रायोजित तौर पर दिए जा रहे हैं। इसके साथ ही एडवांस टेंडर का सिलसिला भी बदस्तूर जारी रखा गया है।

अधिकांश ऐसे मामलों में सीएओ/सी को भी बार-बार गुमराह किया जा रहा है और वे इस चौकड़ी के इस कदाचारपूर्ण तिकड़म को अभी तक समझने में नाकाम रहे हैं, जिससे इस झुंड के कुछ सीई/सी पूरी तरह मदमस्त हो रहे हैं।

लॉकडाउन में भी टारगेट समयावधि देकर अपने फील्ड में नियुक्त कर्मचारियों-अधिकारियों की कोरोना संक्रमण और प्रसार/महामारी समयावधियों में भी ड्यूटी लगाकर उन सभी के जीवन की आहुति दी जा रही है, जो न्यायोचित तो नहीं ही है, पर कर्मचारियों-अधिकारियों की भी अपनी-अपनी मजबूरियां हैं।

लॉकडाउन मतलब सब कुछ बंद, मगर कंस्ट्रक्शन अधिकारियों के लिए लॉकडाउन का मतलब कमाई का बड़ा अवसर है। उन्हें इस बात की न तो कोई चिंता है, और न ही कोई फिक्र कि इसके चलते फील्ड में कार्यरत और अधिक कर्मचारी-अधिकारी कोरोना संक्रमण की चपेट में आ सकते हैं। फिर भी समूह में मानव श्रम से निष्पादित होने वाले निर्माण कार्यो को अबिलंब बंद किए जाने पर पुनर्विचार करने की जरूरत उन्हें महसूस नहीं होती।

गरीब मजदूर-मातहत कर्मचारी-अधिकारी जो फील्ड ड्यूटी से संबंधित हैं, दोनों के संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार एवं उनके हितों की रक्षा के लिए यह सब कहां तक जायज है, यह देखने-सुनने वाला कोई नहीं है

जब ऑफिस में नियुक्त सभी अपने घरों में बैठकर काम कर रहे हैं और उन सभी को पूरा वेतन भुगतान भी किया जा रहा है, तब फील्ड स्टाफ को ही क्यों मरने के लिए झोंका जा रहा है? यह सवाल फील्ड में कार्यरत हर कर्मचारी और अधिकारी पूछ रहा है।

कोरोना संक्रमण की चपेट में महेन्द्रूघाट, पटना के सीएसटीई/कंस्ट्रक्शन ऑफिस के अधिकांश अधिकारी और कर्मचारी आए हैं। डिप्टी सीएसटीई बी. के. सिंह सहित इस कार्यालय के संपर्क में आने से अन्य विभागों के अधिकारी और कर्मचारी भी संक्रमित हुए हैं। आखिर यह सब लोग टारगेट के नाम पर लॉकडाउन में जबरन ड्यूटी करवाए जाने से ही तो संक्रमित हो रहे हैं।

कर्मचारियों का कहना है कि वास्तविकता तो यही है कि यदि सही से जांच की जाए, तो पूर्व मध्य रेलवे निर्माण संगठन से जुड़े अधिकांश अधिकारी और सुपरवाइजर संक्रमित हो चुके हैं और अब भयावहता की हद पार हो रही है।





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क्या रेलकर्मियों और उनके रहनुमाओं को सुनाई दे रहा है सरकारी रणनीति का ब्रम्हनाद!

रेल प्रशासन, कोरोनावायरस के भय को बहुत खूबी के साथ भुना रहा है, क्योंकि उसे मालूम है कि इस माहौल में रेलकर्मी किसी प्रकार के आंदोलन को चाहकर भी अंजाम नहीं दे सकेंगे, जबकि उनके संगठन पहले ही मौन अवस्था में हैं। कभी कर्मचारियों का वेतन काटा जा रहा है, तो कभी टीए देने से इंकार किया जा रहा है। डेढ़ साल का डीए/आरए तो सरकार पहले ही हड़प चुकी है, तथापि जब-तब सोशल मीडिया पर बोगस पोस्ट डालकर भ्रमित किया जा रहा है कि डीए/आरए देने के लिए सरकार तैयार हो गई है। जबकि प्रशासन की कुटिल नीतियां बदस्तूर जारी हैं।

Railway workers are waiting for workman special at platform without maintaining any physical distancing

इसी रणनीति के तहत रनिंग स्टाफ को जानबूझकर 20 से 32 घंटे रनिंग में रखा जा रहा है। यह स्थिति लगभग सभी मंडलों में है। कुछ मंडलों में हालांकि रनिंग रूम को आंशिक या पूर्ण रूप से बंद कर दिया गया है। काम के बाद फंसे कर्मचारियों के लिए नियमित रूप से टॉवर वैगन या कर्मचारी स्पेशल चलाई जा रही हैं, मगर उनमें फिजिकल डिस्टेंस का कोई ध्यान नहीं रखा जा रहा है।

रनिंग रूम में गार्ड, ड्राइवर, सहायक ड्राइवर, सामूहिक रूप से रहने को विवश हैं, जिससे उनमें कोरोना जैसी महामारी के संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है। कॉमन शौचालय, कॉमन स्नानघर, कॉमन खाने के बर्तन उनको कोरोना के संक्रमण का शिकार बना सकते हैं। रनिंग रूम में सेनेटाइजेशन की कोई उचित व्यवस्था नहीं की गई है। वहां जो लोको पायलट ठहरते हैं, उन्हें दूसरे की इस्तेमाल की गई मच्छरदानी और बिस्तर दिया जाता है।

काम नगण्य होने के बावजूद ऐसी महामारी की अवस्था में क्रू को रनिंग रूम में रखना सुरक्षित नहीं है। यह बात जानते हुए भी प्रशासन कोरोना संक्रमण को क्यों बढ़ावा दे रहा है, समझ से परे है। क्रू राउंड ट्रिप वर्किंग करने को तैयार है, फिर भी उन्हें जबरन रनिंग रूम में संक्रमित होने के लिए रखा जा रहा है। इस तरह जानबूझकर मौत के मुंह में ढ़केला जा रहा है।

कोरोना महामारी के कारण रनिंग रूम में रहना अत्यंत असुक्षित है। रेल प्रशासन संक्रमण से लापरवाह होकर कर्मी दल के लिए कोई उचित व्यवस्था नहीं कर रहा है, जिससे काम से मुक्त कर्मी आसानी से वापस अपने ठिकाने पर नहीं पहुंच पा रहा है।

सभी रनिंग रूम कोरोना के माहौल में पूर्णतः असुक्षित हैं। क्रू के संक्रमित होने की प्रबल संभावना और ऐसे माहौल में रहने से क्रू नॉर्मल नहीं रह सकता। यही कारण है कि किसी अनहोनी की आशंका से उनका ब्लड प्रेशर हमेशा बढ़ा हुआ रहता है।

रेलवे बोर्ड के आरबीई नं.37/2010, पत्रांक संख्या ई(एलएल)/2009/एचईआर/1 दि. 26.02.2010 तथा पत्रांक संख्या ई(एलएल)/2016/एचपीसी/7 दिनांक 23.11.2016 का उल्लंघन कर रनिंग स्टाफ/क्रू को कोरोना संक्रमण काल में जबरन हेडक्वार्टर से 72 से 90 घंटे बाहर रखा जा रहा है। ऐसे में जब कोई क्रू, कंट्रोल से बात करता है, उसे एक ही जवाब मिलता है, “आपको हेडक्वार्टर से निकले 72 घंटे नहीं हुआ है, आप अभी बाहर ही रहिए।” रनिंग स्टाफ की समस्याओं पर अधिकारियों का ध्यान आकृष्ट करने की उनकी सभी कोशिशें बेकार साबित हो रही हैं।

सामान्य तौर पर वर्तमान में कोचिंग गाड़ियों का मूवमेंट जो लॉकडाउन से पहले था उससे डेढ़ गुना ज्यादा मूवमेंट हो रहा है। कोविड के चक्कर में रनिंग स्टाफ एवं कोचिंग गाड़ियों का स्टेटस लॉस के साथ गाड़ियों का संचालन कराया जा रहा है।

रेल प्रशासन में जोनल एवं मंडल स्तर के अधिकारी नियमों का उल्लंघन करके रनिंग स्टाफ को उसके 30% वेतन से वंचित कर रहे हैं। गाड़ी न चलाने का निर्णय रेल प्रशासन ने सरकार के आदेश पर कोविड-19 महामारी को फैलने से रोकने के लिए लिया था। जहां सभी कर्मियों को उनका पूरा वेतन मिल रहा है, वहीं स्टाफ को पूरे वेतन से वंचित रखने का प्रयास जोनल एवं मंडल स्तर के अधिकारियों द्वारा किया गया है।

ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन का मानना है कि ऐसा नहीं है कि अधिकारियों को नियम मालूम नहीं हैं, परंतु उनके द्वारा प्रशासन की एक सोची-समझी रणनीति के अंतर्गत रनिंग स्टाफ को 30% वेतन से वंचित करने का जानबूझकर प्रयास किया गया है।

एसोसिएशन का कहना है कि अधिकारी अच्छी तरह से जानते हैं कि ये 30%, वेतन के रूप में परिभाषित है और स्टाफ जब नॉन-रनिंग कार्य की स्थिति में रहता है, या प्रशासन की नीति के अंतर्गत उसको जबरदस्ती घर बैठा दिया जाता है, उन सभी स्थितियों में स्टाफ को उसके 30% वेतन का भुगतान करना ही होता है और वह 30 दिनों के लिए बेसिक के 30% के हिसाब से देना होता है। यह राष्ट्रपति द्वारा आदेशित नियमों के आधार पर निर्धारित है।

बावजूद इसके रेल प्रशासन जानबूझकर स्टाफ को 30% वेतन का भुगतान नहीं कर रहा है और ऐसा करके अपनी स्टाफ विरोधी नीति प्रदर्शित कर रहा है। जबकि सभी कर्मचारियों को उनका वेतन महंगाई भत्ता, मकान किराया भत्ता, टीपीटीजी इत्यादि का भुगतान किया जा रहा है।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि रेलवे बोर्ड द्वारा सिर्फ एनएचए, टीए और छुट्टी भुगतान तथा सीईए का भुगतान संबंधित थोड़े समय के लिए रोकने का आदेश दिया गया था। परंतु स्टाफ के पूर्ण वेतन, डीए, मकान किराया भत्ता, एडीशनल रनिंग अलाउंस, पूर्ण रनिंग एलाउंस, जिसका रेल प्रशासन को पूरा भुगतान करना था, बिना किसी आदेश के नियम विरुद्ध मंडल स्तर पर संबंधित अधिकारियों द्वारा गैरकानूनी तरीके से उसके पूर्ण वेतन से वंचित किया जा रहा है, जो कि पेमेंट ऑफ वेजेज ऐक्ट के नियमों का सीधा उल्लंघन है।

ऐसी स्थिति में स्टाफ ने अपनी बात उचित स्तर पर और सही तरीके रखने का भी प्रयास किया। इसके बावजूद यदि रेल अधिकारी अपनी स्टाफ विरोधी नीति को जारी रखते हैं, तब यह जरूरी है कि समस्त स्टाफ को इसका विरोध करने की रणनीति के तहत एकजुट होकर फील्ड में उतरना होगा। यह कहना है लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन का।

इसके अलावा एसोसिएशन द्वारा अन्य कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर रेल कर्मचारियों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की जा रही है। जैसे कि यात्री गाड़ियों की बुकिंग केवल आईआरसीटीसी के माध्यम से की जा रही है। इससे कमर्शियल स्टाफ पर गाज गिरने के सीधे संकेत मिल रहे हैं। स्टाफ का 4200 से ऊपर का मामला अब खतरे की घंटी लग रहा है।

मल्टी स्किलिंग की रणनीति पर भी इसी उद्देश्य से अमल करने की तैयारी है। ईओटीटी लगाकर गार्ड के पदों का पत्ता साफ करने की तैयारी की जा रही है। स्टेशन मास्टर एवं सिग्नल मेनटेनर पोस्ट मिक्स करके दुर्घटनाओं की लगाम लॉकिंग तोड़ने का फार्मूला लाया जा रहा है।

अलग-अलग जिलों और राज्यों से आने वाले लोगों को आने के बाद क्वारेंटीन किया जा रहा है, पर रेलकर्मियों को ‘क्वारेंटीन का वैक्सीन’ समझकर काम लिया जा रहा है।

10/30/50 प्रतिशत स्टाफ से यानि कम से कम स्टाफ से काम करवाने का बहाना बनाकर कम स्टाफ से काम चलाने की भावी रणनीति की टेस्टिंग चल रही है।

कारखानों में वास्तविक रेल कार्य से हटाकर अन्य कार्यों में स्टाफ का इस्तेमाल करके और उसकी तारीफों के पुल बांधकर कम स्टाफ में रेल कार्य की टेस्टिंग की जा रही है और स्टाफ इस तारीफ की अफीम की पिनक में मस्त है।

ऑपरेटिंग रेश्यो बहुत ज्यादा बताया जा रहा है। रेलवे ने केवल मालगाड़ियां चलाकर अधिक मुनाफा कमाया है। कम यात्रियों के साथ आईआरसीटीसी के माध्यम से गाड़ी का ऑपरेटिंग खर्च लेकर गाड़ी संचालन कई बड़े सवाल खड़े कर रहा है।

कार्य न कराकर स्टाफ को घर में रुकने की बात कहकर बैक डोर से उसके भत्तों पर कैंची चलाई जा रही है। इसी रणनीति के तहत कर्मचारियों को अप्रैल महीने के टीए का भुगतान करने से मना कर दिया गया है और मान्यता प्राप्त श्रमिक संगठन सिर्फ एक पत्र लिखकर चुप बैठे हैं।

देखें, सोशल मीडिया पर झूठ कैसे फैलाया जाता है: दि. 12.05.2020 को ये पत्र एनएफआईआर के महामंत्री डॉ एम राघवैया ने प्रधानमंत्री द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ के मेगा पैकेज का हवाला देते हुए केंद्रीय कर्मचारियों को डीए देने के संदर्भ में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण को लिखा था, जिसे भक्तों ने सरकार द्वारा डीए कटौती वापस लिए जाने और 1 जनवरी 2020 से डीए लागू करने की घोषणा के रूप में प्रचारित कर दिया।

रेल प्रशासन और सरकार का शायद यह मानना है कि जब चीन अधिक रेल किलोमीटर मात्र सात लाख स्टाफ से मेनटेन करता है, तब भारत में 12 लाख 17 हजार स्टाफ की क्या जरूरत है, जबकि यहां चीन से काफी कम किलोमीटर रेल है।

रेल कर्मचारियों को कोरोना वारियर्स केवल नाम के लिए कहा जा रहा है, मगर 50 लाख का बीमा कवर नहीं दिया जा रहा है। सरकारी कर्मचारियों को कामचोर कहने वाले अभी भी गाहे-बगाहे शगूफा छोड़ रहे हैं।

भारत सरकार द्वारा अपनी इसी रणनीति के तहत श्रम कानूनों को सस्पेंड किया जा रहा है। मात्र 300 रुपये में दिहाड़ी वाले ठेका कर्मचारी रखने के सिस्टम को तो पहले ही मंजूरी दे दी गई थी। परंतु इस सबके प्रति कहीं कोई सक्रिय हलचल नजर नहीं आ रही है।

इसी रणनीति के तहत रेलवे बोर्ड द्वारा मंगलवार, 12 मई 2020 को एक नोटिफिकेशन (सं. ई(जी)/2020/मिस्लेनि./05) निकालकर इंडियन रेलवे स्टैब्लिशमेंट कोड (आईआरईसी) के अपडेशन के नाम पर इंडियन रेलवे स्टैब्लिशमेंट मैनुअल (आईआरईएम) के कुछ महत्वपूर्ण प्रावधानों को आपस में मर्ज करने का निर्णय चुपचाप ले लिया गया। इसे रेलवे की आठ ग्रुप ‘ए’ संगठित सेवाओं के मर्जर की भी छुपी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

इन और ऐसे तमाम तथ्यों का जो मतलब निकलता है वह मतलब अवश्य निकाला जाना चाहिए, क्योंकि रोम-रोम में जब कम्पन होता है, तो बह्मनाद भी तेज सुनाई देता है। परंतु क्या सरकारी कर्मचारियों और उनके रहनुमाओं को भी यह नाद सुनाई दे रहा है?

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अस्तित्व बचाना है तो रेल संगठनों और रेलकर्मियों को स्वत:स्फूर्त खड़ा होना होगा

नेताओं को निजी हित में सार्वजनिक संपत्तियों को बांटने की प्रवृत्ति से बाज आना चाहिए

यदि रेलवे को अधिक उपयोगी और उत्पादनकारी बनाना है, तो सबसे पहले रेलमंत्री उसे बनाया जाना चाहिए, जिसे रेलवे का पर्याप्त ज्ञान भी हो और वह सीधे जनता से चुनकर आया हो, जिससे जनता की सामान्य जरूरतों का उसे भान हो, जैसे स्वास्थ्य मंत्री या विदेश मंत्री को अपने अपने विभागों की जानकारी है।

ट्रेनों को प्राइवेट आपरेटरों से चलाना यदि इतना ही आवश्यक लगता है, तो सरकार को चाहिए कि वह उन्हें कोई एक ऐसा यात्री रूट दे दे, जिस पर वह अपना पूरा इंफ्रास्ट्राक्चर तैयार करके चलाएं, तभी सरकार की नीति और आपरेटर की कार्यक्षमता का सही आकलन किया जा सकेगा।

रेलवे का ट्रैक जो पहले से ही ‘ए’-‘बी’ इत्यादि भागों में बंटा हुआ है, जिसमें अधिकतम गतिसीमा भी पहले से ही 130/160 किमी. निर्धारित है, ऐसे में यह कहना कि अमुक गाड़ी को इस गति से चलाया जायेगा, केवल देश को तथा जनता को बेवकूफ बनाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

इससे तो यह पता चलता है कि या तो मंत्री जी को कुछ पता नहीं है, अथवा उनके अधिकारी उन्हें बेफकूफ बनाने या दिग्भ्रमित करने में सफल हैं, तथा मंत्री जी की इसमें कुछ स्वार्थसिद्धि हो रही है? अतः मंत्री ऐसा हो, जो न सिर्फ ईमानदार हो, बल्कि कर्तव्यनिष्ठ और दूरदृष्टि वाला भी हो। और जिसने अपने जीवन में देश के लिए कुछ खास किया हो तथा उसके अंदर भविष्य में भी कुछ विशेष कर गुजरने की इच्छाशक्ति हो।

यदि सरकार ईमानदारी से रेलवे का उद्धार करना चाहती है, तो उसे अधिकारियों की संख्या को कंट्रोल करना चाहिए और नीचे स्तर पर कार्य करने वाले कर्मचारियों की संख्या को पूर्व मानकों के अनुरूप पुनर्स्थापित करना चाहिए। ठेके पर मजदूरों की नियुक्ति, ठेकेदारों से अमापक काम करवाने, रिटायर्ड कर्मियों का रिएंगेजमेंट, स्थाई कर्मचारियों की छंटनी, सरकारी संस्थानों/विभागों/सेवाओं आदि का निजीकरण इत्यादि से देश में बढ़ती बेरोजगारी की समस्या का समाधान नहीं होने वाला है।

तेजस एक्सप्रेस को चलाने में कुछ विसंगतियां प्रतीत होती हैं, जैसे कि जमीन हमारी, ट्रैक हमारा, स्टेशन हमारे, उन पर स्टाफ हमारा, अनुरक्षण हमारा, गार्ड और ड्राइवर भी हमारे, मगर किराया तय करेगा निजी आपरेटर, यह कहां की, किस तरह की समझदारी और कैसी व्यापारिक नीति है? गंतव्य पर पहुंचने में एक-दो घंटे की देरी पर यात्रियों को 100-200 रुपये का मुआवजा देकर सरकार जन-सामान्य को भिखारी की तरह लाइन में खड़ा करके आखिर कौन सा आदर्श उपस्थित करना चाह रही है?

रेलवे की सभी उत्पादन इकाईयों का एक साथ निगमीकरण करने के बहाने निजीकरण करने के बजाय सरकार किसी एक उत्पादन इकाई को ट्रायल आधार पर किसी कमर्शियल अनुभवी प्राइवेट सेक्टर को देकर पहले निजी क्षेत्र की क्षमता का आकलन करे और उसमें राजनीतिक दखलंदाजी रोककर उनके हिसाब से चलाए। ऐसा करने से भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी, उत्पादन की गुणवत्ता उच्चकोटि की होगी तथा उत्पादन भी अधिक होगा।

सरकार को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आजादी के बाद से देश के विकास में सर्वाधिक योगदान देने वाले सभी बड़े संस्थान सार्वजनिक क्षेत्र के संरक्षण में ही खड़े हो पाए हैं। इस दौरान निजी क्षेत्र सिर्फ अपना मुनाफा कमाने में लगा था।

सिर्फ रेलवे में ही नहीं, बल्कि सभी सरकारी विभागों में शिलान्यास और उद्घाटन की प्रथा पूरी तरह समाप्त होनी चाहिए। इससे जनता की गाढ़ी कमाई से जमा सार्वजनिक राजस्व की बरबादी तो होती ही है, बल्कि इसका कोई लाभ जनता को नहीं मिलता। ऐसे लगभग सभी समारोह सिर्फ नेताओं की वाहवाही के कर्मकांड बनकर रह गए हैं। रेलवे में पहले राजनीतिक हस्तक्षेप शून्य के बराबर था। परंतु पिछले करीब 15-20 सालों में यह बहुत ज्यादा बढ़ गया है। इस कारण से भ्रष्टाचार भी बढ़ता जा रहा है। इसका नतीजा रेलवे की बरबादी के रूप में सामने है।

सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि रेलवे सिर्फ एक परिवहन माध्यम ही नहीं है, बल्कि यह इस देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ के साथ ही सामाजिक और सांस्कृतिक समरसता की एक महत्वपूर्ण नब्ज भी है, जिसे निजी क्षेत्र को सौंपकर कुछ खास हासिल नहीं होगा। विश्व के किसी भी देश में रेलवे का निजीकरण उस देश और उसकी जनता के लिए आजतक फायदेमंद साबित नहीं हुआ है।

यह भी याद रखना चाहिए कि अटलबिहारी बाजपेई सरकार द्वारा वर्ष 2003-04 में रेलवे के जोनों की संख्या बढ़ाना भी रेलवे के लिए नुकसानदेह ही साबित हुआ है। इसके लिए जो हजारों करोड़ रुपये बरबाद किए गए, उस फंड का इस्तेमाल रेलवे की अतिरिक्त क्षमता बढ़ाने में बखूबी किया जा सकता था। अतः राजनीतिक दलों और नेताओं को देश को तोड़ने और सार्वजनिक संपत्तियों का अपने-अपने हितों के अनुरूप बांटने तथा अपनी-अपनी राजनीतिक रियासतें बनाने की प्रवृत्ति से समय रहते बाज आना चाहिए।

अब जहां तक रेलवे के मान्यताप्राप्त संगठनों की बात है, तो उन पर से अधिकांश रेलकर्मियों का भरोसा उठ चुका है। सब खेमेबाजी और कौटुंबिक (कैटेगराइज) हितों की आपसी लड़ाई में गुत्थमगुत्था हैं। उनके ढ़ुलमुल नेतृत्व और नीतियों के चलते उन्हें कहीं न कहीं सरकार द्वारा बड़ी चालाकी से अलग-थलग भी किया गया है, जिससे उन पर कार्मिकों का विश्वास डगमगाया है। शायद यही कारण है कि वह सरकार के साथ कोई बड़ी लड़ाई लड़ने अथवा निर्णायक आंदोलन छेड़ने से हिचकिचा रहे हैं। यदि ऐसा नहीं है तो अब तक वह ऐसे किसी निर्णायक आंदोलन की रूपरेखा लेकर सामने क्यों नहीं आ पाए हैं?

हालांकि इसके लिए सिर्फ मान्यताप्राप्त संगठन ही अकेले दोषी नहीं हैं, बल्कि करीब 12 लाख रेलकर्मी भी दोषी हैं, क्योंकि रेलवे की बरबादी और सरकार की निजीकरण की नीति के खिलाफ उनकी तरफ से भी ऐसा कोई स्वत: स्फूर्त आंदोलन उठ खड़ा नहीं हुआ, जैसा कि बिहार के सासाराम में करीब तीन लाख छात्रों ने कर दिखाया। अभी भी समय है, रेलवे के मान्यताप्राप्त संगठनों और रेलकर्मियों को यदि अपना अस्तित्व बचाए रखना है, तो उन्हें स्वत: स्फूर्त उठ खड़ा होना चाहिए!








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