पूरी भारतीय रेल में अब तक हजारों रेलकर्मी हुए कोरोना का शिकार, झूठे आंकड़े देकर झूठ बोलते रहे सीईओ/रे.बो.

झूठ बोलने में रेलवे बोर्ड का कोई सानी नहीं, सुनीत शर्मा, चेयरमैन/सीईओ/रे.बो. ने तोड़े अकर्मण्यता और अनिर्णय के सारे रिकॉर्ड

सुरेश त्रिपाठी

कोरोना महामारी के दूसरे चरण में पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल 314 लोको पायलट्स की मृत्यु का आंकड़ा सामने आया है। हालांकि यह अविश्वसनीय संख्या है, क्योंकि मौत के समाचार जिस गति से चल रहे हैं, उनको देखकर इस आंकड़े पर कोई भी रनिंग स्टाफ भरोसा नहीं कर पा रहा है।

रनिंग स्टाफ के कई वरिष्ठ सुपरवाइजरों का कहना है कि “वास्तव में यह आंकड़ा इससे भी ज्यादा है।” वे कहते हैं, “हॉस्पिटल में कोविड से हुई मौत बताया जाता है, परंतु जब डाटा उनके कार्यालय में आता है तो वही डेथ किसी अन्य कारण से हुई बताई जाती है। यह अत्यंत अविश्वसनीय है।”

स्टेशन मास्टर कैडर में भी अब तक 150 से ज्यादा मौतें कोविड संक्रमण के चलते हो चुकी हैं। पूरा कैडर जब रेल प्रशासन की अनमनस्कता के प्रति आक्रोशित हुआ और उचित ध्यान नहीं दिए जाने पर ड्यूटी न करने की चेतावनी दी, तब प्रशासन को होश आया और उसने उनके साथ वर्चुअल मीटिंग करके समस्या का समाधान करने की पहल हुई।

टिकट चेकिंग, टिकट बुकिंग, पार्सल, लगेज, आरक्षण इत्यादि कैडर्स, जो लगातार पब्लिक के संपर्क में रहते हैं, में भी काफी रेलकर्मी कोरोना का शिकार हुए हैं, परंतु उनके अधिकृत आंकड़े अब तक सामने नहीं आए हैं। तथापि उनकी मौतों के दु:खद समाचार लगातार आते रहते हैं।

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इस महामारी के दूसरे चरण में, जब उम्र का कोई बंधन नहीं रह गया, हर आयु-वर्ग के बहुत सारे रेलकर्मी और अधिकारी काल-कवलित हुए हैं। परंतु ऐसा लगता है कि रेल प्रशासन ने उनकी मौतों को अब तक भी गंभीरता से नहीं लिया है, बल्कि देखने में यही आया है कि उनकी मौत के आंकड़े छिपाने में और व्यवस्था को दिग्भ्रमित करने में रेलवे बोर्ड की ज्यादा रुचि रही है।

चेयरमैन/सीईओ/रेलवे बोर्ड ने झूठ बोला

यदि ऐसा नहीं होता, तो ओपन प्रेस कॉन्फ्रेंस में चेयरमैन सीईओ रेलवे बोर्ड झूठ नहीं बोलते, झूठे आंकड़े प्रस्तुत नहीं करते, मांगे जाने पर भी वह रेलकर्मियों-अधिकारियों की मौत के आंकड़े देने से इंकार नहीं करते!

यदि ऐसा नहीं होता, तो वे मार्च 2020 से दिए गए आंकड़ों का औचित्य सिद्ध करते और जनवरी 2021 से अब तक हुई रेलकर्मियों-अधिकारियों की मौत के आंकड़े शेयर करते! जो कि दिन-प्रतिदिन के हिसाब से रेलवे बोर्ड में संकलित होते हैं।

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जोनल रेलों के विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 1 मई 2021 को पूरी भारतीय रेल में कोरोना से संक्रमित रेलकर्मियों की कुल संख्या 1,15,358 थी। जबकि उसी दिन कोविड से मृत्यु को प्राप्त हुए रेलकर्मियों की कुल संख्या 1695 थी। इस एक दिन में कोविड का शिकार हुए गैर रेलकर्मियों अर्थात रेलकर्मियों के परिजनों एवं रेल अस्पतालों में भर्ती अन्य लोगों की मौत का कुल आंकड़ा 2761 था।

इससे पहले 18 अप्रैल 2021 के दिन पूरी भारतीय रेल में कोरोना से संक्रमित रेलकर्मियों की कुल संख्या 83,180 थी। जबकि उस दिन कोविड से मृत्यु को प्राप्त हुए रेलकर्मियों की कुल संख्या 979 थी और इस एक दिन में कोविड का शिकार हुए गैर रेलकर्मियों अर्थात रेलकर्मियों के परिजनों एवं रेल अस्पतालों में भर्ती अन्य लोगों की मौत का कुल आंकड़ा 1814 था।

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इस प्रकार यह पूरी तरह स्पष्ट है कि 11 मई के आसपास और उससे पहले हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीईओ रेलवे बोर्ड ने प्रेस के सामने साफ-साफ झूठ बोला था।

यहां तक कि जो लोग उनके द्वारा दिए गए आंकड़ों पर सवाल पूछना चाहते थे, उन्हें कुछ भी कहकर साइड लाइन कर दिया गया, परंतु उन्हें मार्च 2020 से दिए गए आंकड़ों का कोई औचित्य नहीं समझाया गया।

जबकि उपरोक्त आंकड़ों से स्पष्ट है कि सीईओ/रेलवे बोर्ड द्वारा मार्च 2020 से 10 मई 2021 तक 13 महीने 10 दिन के लिए बताए गए कुल आंकड़ों से यहां एक दिन का ही आंकड़ा अधिक है।

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यदि ऐसा नहीं था, तो “रेल समाचार” द्वारा 10 मई 2021 को चेयरमैन सीईओ/रेलवे बोर्ड सुनीत शर्मा से जब यह पूछा गया कि –

1. कृपया श्री प्रदीप कुमार, पूर्व मेंबर स्टाफ, रेलवे बोर्ड और वर्तमान मेंबर कैट, जो कि एनआरसीएच में भर्ती हैं और वेंटिलेटर पर हैं, की हेल्थ पोजीशन की अपडेट देने की कृपा करें।

2. रेल अस्पतालों को अपग्रेड करने और रेलकर्मियों को उचित स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने के लिए रेल प्रशासन द्वारा अब तक क्या किया गया?

3. वर्तमान में कितने रेलकर्मी और अधिकारी पूरी भारतीय रेल में कोरोना संक्रमित हैं?

4. पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल कितने रेलकर्मी और अधिकारी कोरोना से काल कवलित हुए हैं? कृपया रेलवे वाइज संख्या देने की कृपा करें।

5. पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल कितने रेलकर्मियों और अधिकारियों का वैक्सीनेशन हो चुका है? कृपया रेलवे वाइज संख्या प्रदान करने की कृपा करें।

6. क्या रेलकर्मियों और अधिकारियों तथा उनके परिजनों को अलग से अथवा सीधे वैक्सीन मुहैया कराने की व्यवस्था नहीं की जा सकती? यदि हां, तो इसके लिए रेल मंत्रालय क्या उपाय कर रहा है? यदि नहीं, तो इसमें समस्या क्या है? कृपया बताने का प्रयास करें।

यह नहीं, 12 मई 2021 को, सीईओ रेलवे बोर्ड की प्रेस कॉन्फ्रेंस के एक दिन बाद भी उन्हें रिमाइंड करते हुए “रेल समाचार” द्वारा पूछा गया था कि –

Resp. Sharma ji, kindly share latest daily “ZONE WISE COVID PREPAREDNESS REPORT-2021” on Indian Railways.

उपरोक्त में से किसी भी तथ्य का कोई स्पष्टीकरण अथवा कोई जवाब अब तक चेयरमैन/सीईओ/रेलवे बोर्ड की तरफ से नहीं आया है।

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“जान है तो जहान है” के सिद्धांत पर जब रेल प्रशासन को अपनी वर्क फोर्स का जीवन बचाना चाहिए था, तब वह झूठ और फरेब का सहारा लेकर केवल ऑक्सीजन एक्सप्रेस चलाने के लिए अपनी पीठ थपथपा रहा है।

हालांकि जनता को भी उसके गंतव्य पर पहुंचाकर सेवा कार्य भी इस संकटकाल में जरूरी है। तथापि झूठ बोलना कतई जरूरी नहीं है। यह वैश्विक महामारी है, इस पर आदमी का कोई वश नहीं है। इसके लिए केवल सावधानियां ही बरती जा सकती हैं।

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अतः पब्लिक के संपर्क में आने वाले रेलकर्मियों को सुरक्षा उपकरणों की आपूर्ति सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके अलावा उम्र और किसी बीमारी से ग्रस्त कर्मचारियों को जनसंपर्क से दूर रखने की यथासंभव कोशिश करते हुए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

“रेल समाचार”, रेल प्रशासन की अकर्मण्यता के कारण अब तक अकाल काल-कवलित हुए सभी रेलकर्मियों को विनम्र श्रृद्धांजलि अर्पित करता है और संक्रमित हुए कर्मचारियों के शीध्र स्वस्थ होने की कामना करता है।

ट्रेन की गति से ढ़हा चांदनी रेलवे स्टेशन:





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सैकड़ों रेलकर्मी हो रहे हैं कोरोना संक्रमित, परंतु रेल प्रशासन को नहीं है उनके मरने-जीने की कोई परवाह!

मुंबई, दिल्ली और चेन्नई, तीनों महानगरों में कार्यरत रेलकर्मियों को है कोरोना संक्रमण का ज्यादा खतरा

सुरेश त्रिपाठी

यह सर्वविदित है कि मुंबई महानगर कोरोना वायरस की महामारी से बुरी तरह जूझ रहा है। दिन प्रति प्रतिदिन इसके मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। फिलहाल निकट भविष्य में इनके नियंत्रण की कोई उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है। तथापि मजबूरीवश राज्य सरकार को सीमित लॉकडाउन के चलते भी कामकाजी गतिविधियां शुरू करनी पड़ रही हैं। इस हेतु अब राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए उसके कहने और टिकट भाड़ा वहन करने पर सोमवार, 15 जून से मध्य एवं पश्चिम रेलवे को सीमित लोकल ट्रेनों की भी शुरुआत करनी पड़ी है।

यह सही है कि किसी महामारी अथवा किन्हीं विपरीत परिस्थितियों के कारण तमाम कामकाजी और व्यावसायिक गतिविधियां लंबे समय तक रोककर नहीं रखी जा सकतीं। तथापि फील्ड में बड़ी संख्या में कार्यरत अपने कर्मचारियों के लिए उनसे बचाव के हरसंभव उपाय अवश्य अपनाए जा सकते हैं, क्योंकि तमाम नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों ने तो अपने बचाव के सभी संभव उपाय कर लिए हैं, यही कारण है कि एकाध अपवाद को छोड़कर इनमें से कोई भी इस महामारी से ज्यादा प्रभावित होता नजर नहीं आया। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं है कि कर्मचारियों के मामले में राज्य सरकार और रेल प्रशासन दोनों प्राधिकारों द्वारा भारी कोताही बरती जा रही है।

Railway workers are waiting for workman special at platform without maintaining any physical distancing

अब जहां तक रेलकर्मियों की बात है, तो ऐसा लगता है जैसे कि उनका कोई माई-बाप ही नहीं रह गया है और उन्हें इस महामारी से निपटने तथा काम करने के लिए भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। भले ही रेलवे द्वारा इस महामारी से मरने और संक्रमित होने वाले रेलकर्मियों का एकीकृत आंकड़ा जारी नहीं किया जा रहा है, परंतु एक अनुमान के अनुसार रेलवे में कार्यरत सैकड़ों कर्मचारियों की मौत हो चुकी है। हर दिन दो-चार-दस की संख्या में ऐसी मौतें होने की खबरें किसी न किसी जोनल रेलवे से आ रही हैं। तथापि जोनो/मंडलों में इन असामयिक मौतों को लेकर कोई चिंता है, ऐसा नहीं लगता!

इस महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित रेलवे का फील्ड स्टाफ हो रहा है, जिनमें टीटीई, लोको पायलट्स, गार्ड्स, ट्रैक मेनटेनर, सिग्नल मेनटेनर, कमर्शियल एवं ट्रैफिक स्टाफ प्रमुख रूप से शामिल है। इसके अलावा ऑफिस स्टाफ भी इसलिए प्रभावित हो रहा है, क्योंकि वहां भी काम करते हुए फिजिकल डिस्टेंसिंग नियमों का पर्याप्त रूप से पालन करना संभव नहीं हो पा रहा है, क्योंकि निर्देशित 20% स्टाफ के बजाय लगभग पूरे ऑफिस स्टाफ को जबरन ड्यूटी पर बुलाया जा रहा है। इस सब के लिए अधिकारियों की प्रशासनिक एवं अनुशासनिक दादागीरी और मनमानी भी जिम्मेदार है।

उदाहरण स्वरुप पश्चिम रेलवे के वसई स्टेशन पर पिछले हफ्ते चार रेलकर्मियों को कोरोना संक्रमित पाया गया था। इसके लिए उन्हें इलाज हेतु भेजने के बाद पता चला कि उन चारों के संपर्क में करीब 45-46 जो अन्य रेलकर्मी भी आए थे, उन्हें नियमानुसार 14 दिन के लिए होम कोरेंटीन की एडवाइस की गई थी और पूरा वसई स्टेशन बंद कर दिया गया था। परंतु अभी उनका यह निर्धारित पीरियड पूरा भी नहीं हुआ था कि राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए सोमवार, 15 जून से लोकल शुरू होते ही उन सभी को फौरन ड्यूटी पर पहुंचने का आदेश मुंबई सेंट्रल मंडल के संबंधित वाणिज्य अधिकारी द्वारा दनदना दिया गया।

इसी तरह पश्चिम रेलवे के ही सूरत रेलवे स्टेशन पर एक चीफ टिकट इंस्पेक्टर (सीटीआई) के 2 जून को कोरोना पॉजिटिव, जिसकी जांच रिपोर्ट 12 जून को मिली, पाए जाने के बाद वहां के 21-22 स्टाफ को होम कोरेंटीन किया गया था। इनमें दो एडीआरएम और एक डीसीएम जैसे बड़े अधिकारी भी शामिल थे। यह सभी लोग उक्त सीटीआई के संपर्क में आए थे। इसी प्रकार उधना रेलवे स्टेशन पर भी एक बुकिंग क्लर्क को पॉजिटिव पाए जाने पर वहां के स्टेशन स्टाफ को भी आइसोलेट किया गया।

वसई और सूरत के मामलों में मंडल अधिकारियों द्वारा बरती गई लापरवाही तथा मनमानी का विरोध दोनों यूनियनों (डब्ल्यूआरएमएस/डब्ल्यूआरईयू) के मंडल एवं मुख्यालय पदाधिकारियों द्वारा किया गया है, परंतु उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई, क्योंकि किसी की भी नहीं सुनने का जैसा रवैया केंद्र सरकार ने अपना रखा है, वैसा ही रवैया केंद्र सरकार के अधिकारियों ने भी लंबे समय से अपनाया हुआ है। नतीजा यह है कि कोई भी कितना ही चिल्लाता रहे, किसी की कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

इसके अलावा दक्षिण रेलवे, उत्तर रेलवे की स्थिति भी काफी डरावनी है। पिछले हफ्ते दक्षिण रेलवे के पेरंबूर, चेन्नई स्थित प्रमुख रेलवे अस्पताल में एक साथ बीस रेलकर्मियों की मौत की खबर स्थानीय अंग्रेजी दैनिक में प्रकाशित हुई थी। इसी तरह उत्तर रेलवे मुख्यालय बड़ौदा हाउस और भारतीय रेल के मुख्यालय “रेल भवन” में भी कई अधिकारी और कर्मचारी इस महामारी से प्रभावित हो चुके हैं। उत्तर रेलवे के सेंट्रल हॉस्पिटल की दुर्गति, कोविद केसेस की जांचों में कमीशनखोरी और एमडी को जनरल प्रैक्टिस में भेजे जाने के बाद पुनः उसी पद पर उनकी पुनर्नियुक्ति में रेल प्रशासन की पूरी मनमानी भी सामने आ चुकी है।

अन्य जोनल रेलों में भी उपरोक्त से स्थिति अलग नहीं है। मगर मुंबई, दिल्ली और चेन्नई में जो हालत चल रही है, उसको देखते हुए इन तीनों महानगरों में कार्यरत अधिकांश रेलकर्मियों को संक्रमण का खतरा ज्यादा है। अतः यदि सेफ और सिक्योर वर्किंग सुनिश्चित करनी है, तो रेल प्रशासन को अपने कर्मचारियों के लिए इस महामारी से बचाव के पर्याप्त इंतजाम करने के साथ ही केंद्रीय गृहमंत्रालय द्वारा जारी की गई नियमावली का अक्षरशः पालन करवाना भी सुनिश्चित करना होगा।

Chief Typist of SrDOM/G office, Mumbai Division, Central Railway, B. R. Damse expired on Monday, 15th June morning at Kalyan Railway hospital. He was admitted in Kalyan Railway Hospital on Sunday, 14th June of breathlessness. As per Doctors of Kalyan Railway Hospital, a case of suspected Covid. As per sources, he last attended office on 5/6/2020. Entire SrDOM office is being fully sanitised on Monday. The Office was Last sanitised on 12/6/2020.

“It is come to know that a vacant building, behind building no.8 is handed over to BMC for covid-19 patients, if it is true we all have to protest against it, to save containment of our Mazgaon Railway colony”, this message viral on social media on Saturday-Sunday in between employee and officers who resides at Mazgoan Railway colony.








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बिना दिखावे के मानव सेवा में लगा एक रेलकर्मी – RailSamachar

मनुष्यता की मिसाल कायम कर रहे हैं सुरेंद्र शर्मा और उनके सहयोगी

समस्त ब्राह्मण सेवा समाज कल्याण (सामाजिक संस्था) के सचिव श्री सुरेंद्र शर्मा, इस लॉकडाउन पीरियड में, जब मनुष्य तो क्या, पशु-पक्षी भी भूख-प्यास से इधर-उधर भटक रहे हैं, तब बिना किसी दिखावे के लगातार मानव सेवा में लगे हुए हैं।

श्री शर्मा मध्य रेलवे, मुंबई मंडल में मुख्य लोको निरीक्षक के पद पर कार्यरत हैं। स्वयं की दो बार एंजियोप्लास्टी हो जाने के बावजूद भी वह कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन की इस भीषण आपदा में असहाय और जरूरतमंद लोगों की दुर्दशा के बारे में सोचकर स्वयं को घर में रोक न सके।

श्री शर्मा के अनुसार उनके पास दो विकल्प थे, पहला यह कि इस क्षेत्र में कार्यरत किसी संस्था को अपनी ओर से ₹1100 या ₹2100 देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाए, या फिर मेरे जैसे अनेकों लोग आत्मिक रूप से गरीबों का दुख महसूस कर रहे होंगे, परंतु अकेला चना कैसे भाड़ फोड़ सकता है, यह सोचकर और अपने दिल को तसल्ली देकर चुपचाप बैठे रहा जाए।

तथापि दोनों विकल्पों को छोड़कर श्री शर्मा ने व्हाट्सएप पर एक छोटी सी अपील बनाकर डाली। उसका यह असर हुआ कि ब्राह्मण वर्ग के साथ-साथ उनके सहकर्मियों ने भी इंसानियत में सहयोग का हाथ बढ़ाया और उन्हें इसका पर्याप्त रेस्पॉन्स मिला। इस तरह 44 लोगों ने अलग-अलग तरह से सहयोग दिया। किसी ने खाद्य सामग्री दी, तो किसी ने पैसा दिया।

अब प्रश्न यह था कि इसका वितरण कैसे किया जाए। यदि पकाकर बांटते हैं, तो बनाने वाला, उससे संबंधित सामग्री, अन्य साधन, जगह कहां निश्चित हो, आदि की कई समस्याएं थीं। लॉकडाउन पीरियड में सोशल डिस्टेंस का पालन करना भी जरूरी है। मैनपावर कैसे जुटाएं! ट्रांसपोर्टेशन की व्यवस्था कैसे होगी, आदि आदि अनेकों विचार कौंध रहे थे।

चूंकि सुरेंद्र शर्मा अधिक से अधिक पैसों का सामान जुटाकर जरूरतमंदों तक पहुंचाने का विचार लेकर चल रहे थे। अतः मजदूरी, ट्रांसपोर्टेशन आदि में अपने थोड़े से फंड का बड़ा हिस्सा गंवाना नहीं चाहते थे। ऐसी स्थिति में सूझबूझ के साथ सही व्यक्ति तक सहायता पहुंचे, इस विचार से उन्हें सबसे पारदर्शी और सही जगह कल्याण गुरुद्वारा ही लगी।

गुरुद्वारे के माध्यम से ही कल्याण डोंबिवली महानगर पालिका द्वारा भी हर दिन दोपहर और शाम को करीब 1200 खाने के पैकेट जरूरतमंदों तक पहुंचाए जा रहे हैं। गुरुद्वारे से ही सीधे तौर पर जाने कितने लोग खाना ले जा रहे हैं। अनेकों सेवादार रात-दिन सेवा में लगे हैं। पेट भर स्वादिष्ट खाना हर जरूरतमंद तक खुशी-खुशी और उत्साहपूर्वक पहुंचाने की तमन्ना लेकर वहां एक पूरी टीम लगातार काम कर रही है।

ऐसे में सुरेंद्र शर्मा ने भी कल्याण गुरुद्वारा का चयन कर वहीं अपनी सेवाएं देना शुरू कर दिया। साथीगण राशन और पैसे से मदद कर रहे थे। इस तरह से शर्मा द्वारा 27 मार्च, 1 अप्रैल, 9 अप्रैल, 12 अप्रैल, 18 अप्रैल, और 20 अप्रैल 2020 को, इस तरह धीरे-धीरे 1835 किलो आटा, दाल, चावल, चीनी, गेहूं, तेल, मसाले आदि का सहर्ष सहयोग दिया गया।

इसके साथ ही ठेठ आदिवासी गांव, फलेगांव आदिवासी पाड़ा तथा रूंदा गांव तथा अनाथ आश्रम में जरूरतमंदों का सहयोग कर आत्मिक संतुष्टि हासिल की। इसके अलावा उन्होंने लीला पुरुषोत्तम गौशाला कल्याण की गायों के लिए चारे की व्यवस्था भी करवाई।

कल्याण गुरुद्वारे के सेवादार सरदार श्री मनिंदर सिंह जी, सरदार श्री राजू सिंह जी और श्री गुरुद्वारा प्रबंधन द्वारा सुरेंद्र शर्मा को हरसंभव सहयोग प्राप्त हुआ तथा श्री गुरुद्वारा प्रबंधन द्वारा उनका पर्याप्त उत्साहवर्धन भी किया गया।

श्री शर्मा की इस सद्भावना यात्रा में उनके सभी सम्मानित सहयोगी, उनके परिवारिक सदस्य, कान्यकुब्ज मंडल मुंबई के ट्रस्टी एवं समाजसेवी श्री करुणा शंकर शुक्ला, समाजसेवी श्री राधेश्याम अवस्थी आदि सहायक सिद्ध हुए।

सुरेंद्र शर्मा ने बार-बार मानव सेवा की इच्छा रखते हुए अपने सभी सहयोगियों का आभार व्यक्त किया है.








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हावड़ा पार्सल/गुड्स में बीसों साल से जमे हुए हैं कुछ खास रेलकर्मी

मंडल के प्रत्येक वाणिज्य अधिकारी को होती है 50 हजार से 5 लाख की अवैध कमाई

सीवीसी/विजिलेंस के सभी डायरेक्टिव ताक पर, भ्रष्ट स्टाफ को प्राप्त है अधिकारियों का संरक्षण

कोलकाता : हावड़ा पार्सल, दांकुनी गुड्स, पाकुर गुड्स, बर्दवान पार्सल, भद्रेश्वर गुड्स, श्रीरामपुर पार्सल, बाली गुड्स, त्रिवेणी गुड्स। पूर्व रेलवे, हावड़ा मंडल के इन सभी महत्वपूर्ण पार्सल/गुड्स डिपो में करीब 20-25 सालों से कुछ विशेष लोगों की पोस्टिंग है, जो कुछ संबंधित वाणिज्य अधिकारियों की जरूरतों और हितों का पूरा ख्याल रखने की महारत रखते हैं।

इनमें से कुछ नाम और उनकी खास विशेषताएं इस प्रकार हैं-

1. सुभाष चौधरी, ईआर मेंस कांग्रेस से संबंधित हैं। हावड़ा टिकट बुकिंग में बीएस1 हैं। पार्सल में 25 रहे हैं। वहां भी सिर्फ साइन किए, काम कभी नहीं किया, आज भी नहीं कर रहे हैं। सिर्फ पैसा उगाही करना ही इनका प्रमुख काम है।

2. संजीव गुप्ता, अभी सीएस1/हावड़ा पार्सल में पदस्थ हैं, पहले बीएस1 रहे हैं। यह भी ईआर मेंस यूनियन से संबंधित हैं। यह काउंटर पर कभी काम नहीं करते, यह पैसा नहीं लेते हैं, मगर इजी वर्किंग को ही प्रीफर करते हैं।

3. सुमन बोस, पार्सल शेड नं.3 में पदस्थ हैं, सीपीसी यानि चीफ पार्सल क्लर्क हैं। 18 साल से एक ही सीट पर काम कर रहे हैं। पहले माल बुकिंग में थे और अब डिस्पैचिंग में हैं। डिस्पैच में कभी विजिलेंस केस होने का डर नहीं रहता है। इसलिए यह हमेशा सेफ साइड पोस्टिंग में रहने वाले खास प्राणी हैं। हावड़ा पार्सल का यह सबसे मलाईदार शेड है। यह मोस्ट सेंसिटिव पोस्ट है। फिर भी यह यहां पिछले 18 सालों से जमे हुए हैं।

4. अजय कुमार, सीएस1 हैं, नौकरी में आने से लेकर अब तक पार्सल में ही पदस्थ हैं। कर्मचारियों द्वारा इन्हें हावड़ा मंडल सहित संपूर्ण पूर्व रेलवे पार्सल का माफिया बताया गया है। यह विभागीय प्रमुख को साधकर पूरे जोनल पार्सल कंट्रोल करते हैं। कर्मचारियों ने बताया कि यह इतने पावरफुल हैं कि इन्होंने पदोन्नति से पहले वर्तमान सीसीएम/पीएम की पोस्टिंग सीनियर डीसीएम, हावड़ा के पद पर करवाई थी, जिनकी कमजोरी पैसा और शबाब दोनों रही हैं। इसी संदर्भ में उनकी पत्नी की शिकायत पर उन्हें हावड़ा से हटाया गया था।

बताते हैं कि इनके पहले वाले सीनियर डीसीएम की पोस्टिंग भी अजय कुमार ने ही करवाई थी। अजय कुमार को हावड़ा पार्सल से कुछ समय के लिए तब हटाया गया, जब उनके खिलाफ एक बड़ा विजिलेंस केस हुआ था। इनकी कैश हैंडलिंग करीब 10 साल से बंद है। आज भी इनकी पोस्टिंग पार्सल एकाउंट में है, मगर हावड़ा पार्सल शेड नं.3 में इंचार्ज के तौर पर काम कर रहे हैं। वहां इनसे सभी स्टाफ इससे इसलिए डरता है, क्योंकि यही सब कुछ तय करते हैं कि किसको कितना पैसा पहुंचाना है। यह पीएस/पीसीसीएम अजय राय, जो पहले बुकिंग/आरक्षण क्लर्क थे और बाद में एसीएम में पदोन्नत होकर अधिकारी बन गए, अजय कुमार के लंगोटिया यार हैं।

5. जॉय बल्लभ भी यहां काफी समय से पदस्थ हैं, सीपीसी हैं। एक विजिलेंस केस होने के बाद इनका ट्रांसफर हावड़ा बुकिंग से तारकेश्वर बुकिंग में हुआ था। फिर वापस वहां से जुगाड़ लगाकर जल्दी ही हावड़ा पार्सल में आ गए। दुबारा जब विजिलेंस केस हुआ, तब इनको हावड़ा बुकिंग में भेजा गया था, मगर आज तक यह न वहां गए और न ही संबंधित अधिकारियों ने इनके ट्रांसफर आर्डर पर अमल करवाने की जरूरत समझी। जबकि अन्य लोगों का आर्डर उसी दिन या 2-3 दिन में लागू करवाया जाता है। तथापि जॉय बल्लभ महोदय का आर्डर आज तक नहीं लागू हुआ।

बताते हैं कि इस शेड से एसीएम/कोचिंग, एसीएम/गुड्स, डीसीएम और सीनियर डीसीएम आदि सबका न सिर्फ खास ख्याल रखा जाता है, बल्कि सबका हिस्सा भी उनके ओहदे के अनुसार समय पर पहुंचाया जाता है।

कर्मचारियों का कहना है कि सिर्फ हावड़ा पार्सल से डीसीएम को कुछ नहीं मिलता। बाकी सब जगह से मिलता है। कर्मचारियों के अनुसार एसीएम/कोचिंग और एसीएम/गुड्स में से प्रत्येक को हावड़ा पार्सल से प्रतिमाह 40-50 रुपये मिल जाते हैं, जबकि हावड़ा पार्सल को छोड़कर बाकी सभी जगह से डीसीएम को कुल मिलाकर एक लाख की आमदनी प्रतिमाह हो जाती है। वहीं सीनियर डीसीएम को सब जगह से कुल मिलाकर प्रतिमाह लगभग पांच लाख रुपये मिलते हैं।

हावड़ा मंडल के उपरोक्त पांचों महान पार्सल कर्मियों के खौफ से आतंकित और उत्पीड़ित कुछ रेलकर्मियों का यह भी कहना था कि यदि कोई उच्च वाणिज्य अधिकारी किसी आपातकालीन स्थिति में इनसे कभी यह फरमाइश कर दे कि एक घंटे में 50 लाख रुपये की जरूरत है, तो यह लोग उससे पहले ही यह रकम उस तक पहुंचा देने की पूरी क्षमता रखते हैं। यही नहीं, इन्होंने इसी की बदौलत करोड़ों की संपत्ति अर्जित की है। यदि इनकी अर्जित संपत्तियों की सीबीआई जांच करवाई जाए, तो सबकी कलई खुलकर सामने आ जाएगी।








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