मध्य एवं पश्चिम रेलवे की नाला सफाई में मुंबई मनपा के बह गए 30 करोड़!

गत 12 वर्षों में रेलवे के 116 नालों की सफाई में मुंबई मनपा ने खर्च किए ₹30 करोड़ से अधिक

मुंबई में मध्य रेलवे एवं पश्चिम रेलवे के नालों (कल्वर्ट्स) की उचित साफ-सफाई नहीं होने से मानसून की पहली ही बारिश में बुधवार, 9 मई को कुर्ला से लेकर सायन और माटुंगा के बीच रेल पटरियों पर बारिश का पानी जमा हुआ और मुंबई उपनगरीय रेल सेवा बुरी तरह प्रभावित हुई।

गनीमत यह रही कि कोविड के चलते लोकल ट्रेन सेवाएं फिलहाल केवल आवश्यक सेवाओं से जुड़े सरकारी और कुछ गैर सरकारी कर्मचारियों के लिए ही चलाई जा रही हैं। अन्यथा सामान्य कामकाज के दिनों की तरह अगर सभी लोकल सेवाएं चल रही होतीं, तो पीक ऑवर में लाखों उपनगरीय यात्रियों का बहुत बुरा हाल हो गया होता।

“पिछले 12 सालों में रेलवे के 116 नालों की साफ-सफाई पर 30 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए गए हैं। यह सफाई उचित तरीके से न होने के कारण 30 करोड़ रुपये पानी में बह गए।” यह आरोप आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने रेलवे और मुंबई महानगर पालिका पर लगाया है।

मुंबई में रेलवे के अंतर्गत आने वाले कल्वर्ट, जिनकी हर साल रेल प्रशासन द्वारा सफाई कराई जाती है और मुंबई मनपा द्वारा हर साल 3 से 4 करोड़ रुपये का भुगतान रेलवे को किया जाता है।

पिछले 12 साल में मुंबई मनपा से रेलवे को 30 करोड़ रुपये मिले हैं, लेकिन आज तक रेलवे की ओर से कोई ऑडिट नहीं हुआ, और न ही आजतक मुंबई महानगर पालिका द्वारा किए गए खर्च का रेलवे से कोई हिसाब मांगा गया।

मुंबई में रेल लाइनों के नीचे से गुजरने वाले कुल 116 नालों में से 53 मध्य रेलवे, 41 पश्चिम रेलवे और 22 हार्बर लाइन के अंतर्गत आते हैं।

वर्ष 2009-10 से 2017-18 तक के 9 सालों में मुंबई मनपा ने रेल प्रशासन को 23 करोड़ रुपये दिए थे। वर्ष 2018-19 में 5.67 करोड़ मनपा ने खर्च किए।

कुल मिलाकर, नालों की साफ-सफाई के मद में पिछले 12 वर्षों के दौरान मुंबई मनपा द्वारा कुल 30 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान रेलवे को किया गया है।

मुंबई महानगरपालिका ने इस साल मुंबई सीएसएमटी से लेकर मुलुंड तक रेल लाइनों के नीचे से निकलने वाले सभी नालों की साफ-सफाई महज 15 दिनों में पूरा करने का दावा किया है।

अनिल गलगली के अनुसार, हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई के लिए मुंबई मनपा रेलवे को भुगतान करती है, लेकिन नालों की सफाई का कोई ऑडिट नहीं होता है।

उन्होंने कहा कि कुर्ला और सायन के बीच पिछले कई वर्षों से रेल सेवाएं ठप होती हैं। अगर 31 मई तक नालों की सफाई का सर्वे कराया जाए, तो ऐसी स्थिति नहीं पैदा होगी।

अनिल गलगली ने कहा कि दोनों एजेंसियां इसके लिए ​​समान रूप से जिम्मेदार हैं। जनता को दोनों एजेंसियों द्वारा किए गए खर्च के बारे में सूचित किया जाना आवश्यक है। फिर चाहे वह रेलवे हो या मुंबई महानगरपालिका!

उन्होंने इस मद में हुए खर्च की पूरी जानकारी सार्वजनिक किए जाने की मांग की है।

#Anil_Galgali, RTI activist demanding accountal of money from BMC, CR & WR on #Culvert_Cleaning

#CentralRailway #WesternRailway #BMC #Culvert_Cleaning #IndianRailway





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रिटायरमेंट के बाद भी पंद्रह दिन तक ऑफिस आकर बैठते रहे पीसीएसओ, पूर्वोत्तर रेलवे

रिटायर हो चुके एस. एन. शाह को “कारण बताओ नोटिस” जारी की जाए। तत्पश्चात इस बात की जांच की जानी चाहिए कि 14-15 दिनों में उन्होंने ऑफिस में बैठकर क्या-क्या घालमेल किया?

विजय शंकर, ब्यूरो प्रमुख,गोरखपुर

यह अजब है कि कोई विभाग प्रमुख (पीएचओडी) रिटायर होने के बाद भी ऑफिस में बाकायदा बैठकर लगातार पंद्रह दिनों से काम कर रहा हो, अपने मातहत रहे अधिकारियों और कर्मचारियों को डांट-डपट रहा हो, हड़का रहा हो, मातहत अधिकारी की गाड़ी जबरन इस्तेमाल कर रहा हो, फिर भी उसके मातहतों को तो छोड़ो, उसके ऊपर समकक्ष अधिकारी भी इसे अनदेखा करें, यह बात कुछ हजम में नहीं होती!

यह करिश्मा साक्षात घटित हुआ है पूर्वोत्तर रेलवे मुख्यालय गोरखपुर में, जहां पीसीएसओ एस. एन. शाह 30 अप्रैल को सेवानिवृत्त होने के बाद भी अब तक लगातार और बाकायदा अपने चैंबर में आकर पूर्व रुतबे के साथ बैठ रहे हैं।

बताते हैं कि उन्होंने इसका बहाना अपने मातहत काम कर रहे लोगों को यह कहकर बताया कि “उन्होंने सोचा, जब तक नए सीएसओ की पोस्टिंग नहीं होती, तब तक वह खुद पेंडिंग काम निपटा दें!”

अब एसएंडटी कैडर के इस वरिष्ठ मूढ़ व्यक्ति की नजर से देखा जाए, तो इसका तात्पर्य यह है कि जब तक नए जीएम की पोस्टिंग नहीं हो, तब तक रिटायर हो चुके जीएम को आकर काम करते रहना चाहिए!

आश्चर्य की बात यह है कि दूसरे विभागों के समकक्ष विभाग प्रमुखों ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? यदि वह अपना बिरादरी भाव नहीं बिगाड़ना चाहते थे, तब भी उन्होंने यह बात जीएम के संज्ञान में लाना जरूरी क्यों नहीं समझा?

इसके अलावा पता चला है कि सीएसओ/एनईआर का अतिरिक्त कार्यभार मैकेनिकल डिपार्टमेंट के एक अधिकारी बी. एस. दोहरे को सौंपा गया है। यदि वह सीएसओ के चैंबर में नहीं भी बैठ रहे थे, तब भी उन्होंने शाह को वहां बैठने अथवा कार्यालय आने से मना क्यों नहीं किया?

दोहरे यदि शाह को टोककर उनसे बुरे नहीं बनना चाहते थे, तब भी रिटायरमेंट के बाद शाह के चैंबर में आकर बैठने की जानकारी से उन्होंने स्वयं महाप्रबंधक को अवगत क्यों नहीं कराया? जबकि अन्य विभाग प्रमुखों की अपेक्षा अतिरिक्त कार्यभारी होने से यह खुद उनकी पहली जिम्मेदारी थी?

जब “रेल समाचार” द्वारा यह विषय जीएम/पूर्वोत्तर रेलवे श्री वी. के. त्रिपाठी से मोबाइल पर बात करके उनके संज्ञान में लाया गया, तब वह भी आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने कहा कि “ऐसा कैसे हो सकता है, क्योंकि सीएसओ का अतिरिक्त कार्यभार मैकेनिकल अधिकारी बी. एस. दोहरे को सौंपा गया है। तथापि वह इस पर अभी तत्काल कार्यवाही कर रहे हैं।”

यह वास्तव में अत्यंत आश्चर्यजनक है कि एक रिटायर हो चुका अधिकारी लगातार पंद्रह दिनों से प्रतिदिन आकर पूर्ववत अपने चैंबर में बैठ रहा है। पूर्व की भांति कार्यालयीन सभी दैनंदिन कामकाज निपटा रहा है, तथापि न तो मातहत उसे कुछ कह रहे हैं और न ही उसके समकक्ष अधिकारी उसे कुछ बोल रहे हैं।

मातहतों को तो एक बार यह मानकर बख्शा जा सकता है कि शाह ने अब तक उनकी एसीआर नहीं लिखी है, हालांकि यह उनकी अक्षम्य कर्तव्यहीनता है, मगर समकक्ष अधिकारियों को इस कोताही के लिए कतई माफ नहीं किया जाना चाहिए।

चूंकि एस. एन. शाह रिटायर हो चुके हैं, व्यवस्था से बाहर हो चुके हैं, इसलिए अधिकारिक तौर पर अथवा अन्य किसी भी रूप में वह ऑफिस या चैंबर में बैठने के हकदार नहीं रह गए थे। तथापि उन्होंने जानबूझकर ऐसा किया।

अतः सर्वप्रथम उन्हें “कारण बताओ नोटिस” जारी की जानी चाहिए। तत्पश्चात इस बात की जांच की जानी चाहिए कि इन 14-15 दिनों में उन्होंने ऑफिस में बैठकर क्या-क्या घालमेल किया?





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रेलवे के अधिकारियों ने डेपुटेशन पर आकर मेट्रो में भी फैलाई गंदगी

If Sreedharan wasn’t favourable to Mangu Singh then the scenario of DMRC would have been different today!

Truck falls into caved road following heavy rainfall in Delhi

A truck falls in a caved-in part of a road near a metro construction site at Khaira More, following heavy rains, in Najafgarh area. According to police, information was received about the incident at around 1 am. Due to incessant rainfall Wednesday night, the road caved in and the rainwater entered inside many shops and buildings near the spot. “A truck fell into the caved portion of the road. But no injury or loss of life was reported,” a senior police officer said.

“A portion of the road along with the footpath at Khaira Road near the Dhansa Stand Metro Station caved in late Wednesday night after a drain burst in the area due to excess flow of continuous rain water. Adding that a truck fell in to the caved road.” the Delhi Metro Rail Corporation (DMRC) said in a statement on Thursday.

The incident has also caused partial damage to an adjacent building. There has been no casualty or injury and senior DMRC officials are at the site to supervise the repair work, it said.

“Repair work of the caved in portion is in progress and all efforts shall be made to complete the work at the earliest. DMRC is now filling below the road with additional concrete to avoid the recurrence of this problem in the future. The contractor firm working in this project is M/s Paras Railtech Pvt Ltd.” the DMRC stated.

चीनी कंपनी ने चार राज्यों का ट्रैफिक कैसे रोका? लोगों के घरों-मकानों को कैसे दरकाया? चीनी कंपनी ने लोगों की रोजी-रोटी और पानी कैसे बंद किया? दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार और मेट्रो रेल प्रशासन क्या कर रहा है? यह कुछ सवाल खैरा मोड़ नजफगढ़ दिल्ली के रहिवासी पूछ रहे हैं, जो पिछले दो सालों से मेट्रो रेल प्रशासन और चीनी कंपनी तथा उसके ठेकेदारों की मनमानी आजिज आ चुके हैं परंतु उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

देखें, “प्रेस नोट” चैनल की यह खबर

स्थानीय लोगों का कहना है कि जिसका डर था, वही हुआ, तीसरी बार दिल्ली के खैरा मोड़, नजफगढ़ में मेट्रो द्वारा निर्माणाधीन साइट गिर गई। ट्रैफिक बंद हो गया। मेट्रो के ठेकेदार और पीडब्ल्यूडी ने मिलकर यह कारनामा किया।

नजफगढ़ विकास मंच ने कल दिन में ही सूचित कर दिया था, परंतु मेट्रो के संबंधित ठेकेदार ने सिर्फ ट्विटर पर पीडब्ल्यूडी को सूचित करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली थी।

#हम_नहीं_सुधरेंगे वाली स्थिति है, क्योंकि इससे पहले भी इसी एरिया के एक गढ़्ढ़े में एक ट्रक धंस गया था, जिसकी भराई मेट्रो द्वारा सही तरीके से नहीं की गई थी और अब बुधवार, 19 मई को फिर एक ट्रक ऐसे ही गढ़्ढ़े में गिरकर चकनाचूर हो गया।

भ्रष्टाचार अब चरम सीमा पर है, रेलवे के अधिकारियों ने डेपुटेशन पर आकर मेट्रो में भी गंदगी फैला दी!

एक निजी ट्रैक निर्माण कंपनी को ठेका दिया गया। निर्माण कंपनी का मालिक रेलवे का ही एक पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर है, जिसके पुराने संबंध रेलवे से मेट्रो में प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारियों से पहले से ही हैं, जो कि मेट्रो में प्रमुख पदों पर कार्यरत हैं।

बताते हैं कि रेलवे का यह पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर रेलवे में रहते हुए भी ठेकेदारों के साथ मिलकर रेलवे की ठेकेदारी किया करता था और बाद में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर रेलवे और मेट्रो में ही ठेकेदार बन गया।

मेट्रो में सुपरवाइजर स्तर पर कार्यरत और नाम न उजागर करने की शर्त पर कुछ सीनियर सेक्शन इंजीनियरों ने बताया कि उक्त ठेकेदार अर्थात पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर की कंपनी को टेंडर के आवंटन में भी गड़बड़ी की गई है।

उन्होंने बताया कि ऐसी बहुत से आइटम्स का पेमेंट किया गया है जो कार्य हुआ ही नहीं है। इसकी पुष्टि मेट्रो में कार्य कर चुके कुछ अधिकारियों ने भी की है। उनका कहना था कि इस पूर्व डिप्टी चीफ इंजीनियर और इसकी कंपनी ने मेट्रो पर पूरी तरह कुंडली मारकर रखी है।

उन्होंने बताया कि इस पूर्व रेल अधिकारी ने अपनी दो नंबर की कमाई को एक नंबर करने के लिए ही स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर ठेकेदारी चालू किया है।

उनका कहना है कि निर्माण कार्यों में निर्धारित मात्रा से कम मात्रा में इसने हमेशा सीमेंट-सरिया डाली है और बोगस भुगतान करने में यह माहिर था। अब मेट्रो में वैसा ही करके बोगस भुगतान लेने लगा है। इसकी भूख बढ़ती जा रही है।

सवाल यह उठ रहा है कि सेटिंग हो पाएगी या नहीं? क्योंकि पीडब्ल्यूडी दिल्ली के अधिकारी भी तो डेपुटेशन पर दिल्ली मेट्रो में कार्य कर रहे हैं!

उधर दो-दो बार एक्सटेंशन पा चुके दिल्ली मेट्रो के एमडी अपनी पूरी अकड़ में हैं। परंतु जब उनके अधिकारी कोविड के दौरान टेंडर जारी कर सकते हैं, टेंडर अवार्ड कर सकते हैं, तो मार्च 2021 में ही उन्होंने कार्य क्यों नहीं पूरा किया? इस प्रश्न का जवाब देने के लिए कोई तैयार नहीं है।

अब सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या अधिकारीगण – मंत्री को दिग्भ्रमित कर पाएंगे? क्योंकि मंत्री जी यदि काम के लिए बोलते हैं तो अधिकारी कोविड-19 का बहाना बनाकर घर में बैठ जाते हैं और कोविड पीरियड में ही काम करने के लिए ठेकेदारों पर लट्ठ चलाते हैं ये अधिकारी।

Though Sridharan was a result oriented engineer, had he been able to be great by following all Govt’s rules & regulations?

A former general manager of Railways, who is not wish to disclose his name, writes – “Sreedharan is too big a man, that’s why I don’t want to criticize him openly in any group, but in my opinion he is a bit of a fake, like another mechanical engineer who was retired as CRB, (although fake is probably too strong a word for sreedharan, but right now nothing softer comes to my mind).

As long as he was in Railways including as Member Engineering (ME), nobody had heard anything exceptional about him except his restoration of Pamban bridge in 1963. Apart from that he was just like any other ordinary Board Member who completed his tenure and retired.

Then AM (CE) once told me, when I was posted in the Railway Board, that when Sreedharan joined as ME, he called a meeting of all Advisers, EDs and Directors of the Civil Engineering department. He was Director in Selection Grade at that time, so he also attended.

In that first meeting Sreedharan told them something to this effect (I may be incorrect about the exact wordings); “All of you are very good in your work and also competent, moreover your field experience is much more recent than mine. So I expect all of you will deal with all files at your level without finding it necessary to mark any file to me. However, if you feel that some particular file is tricky or complicated and needs my personal perusal or order then you can put up that file to me. However, in that case, I’ll also seriously consider transferring you out of the Railway Board.” He said that after that meeting, no one ever put up any file to ME.

I was flabbergasted. I asked him, how can a Board Member with his supposedly superior knowledge and undoubtedly more experience, absolve himself of the responsibility of guiding his juniors and teaching them? He laughed, and remarked, “देख लो Partner, reputation ऐसे ही बनती है।”

Sreedharan was appointed as MD/KRCL because of his close proximity to George Fernandes, the then Minister for Railways.

As MD/KRCL (also as MD/DMRC) he had a red coloured digital timer on his side table facing visitors which displayed, “xxx days to completion of yyy project”. The number of days displayed used to keep blinking to catch the visitor’s eye, and the number kept reducing by one every day.

Visitors to his office were terribly impressed with this system of monitoring whereby the MD was personally keeping track of each project on a day to day basis.

A junior officer, who was my Director had earlier worked under Sreedharan in KRCL, told me that every few months the red digital timer clock would be reset and the number of ‘days to completion of a particular project’ would be increased to adjust for the time over run! Since the same visitor rarely returned twice, and even if he did, he was unlikely to remember what he had seen earlier, none of them could catch on to this trick.

As MD/KRCL he changed the alignment of the line passing through Goa, thereby saddling KRCL with additional cost over run of around 200+ crores. As it was, KRCL project was financially unviable, he made it even more so; knowing fully well that he would have earned all kudos and departed, leaving his successors to face the music.

In KRCL, there were rumours of his having made money, although nothing was either proved or disproved. (An honest railway civil engineer is an impossibility, if you ask me.)

As ME, Sreedharan wrote copious pages of notings on file insisting that DMRC must have broad gauge for smooth interoperability. However, within a few years, as MD/DMRC he did a 1800 turn and went in for standard gauge. As a result of standard gauge, 100% of rolling stock had to be imported at huge cost and foreign exchange. (Taking cuts in swiss banks is easier if it is from an international supplier). 

My main grouse against Sreedharan is that as MD/DMRC he did not follow any of the Government rules and regulations regarding award of tender. Tenders were awarded to L-3 or even L-4 bypassing the lower ones by writing some English and justifying the same; (in Govt. you can justify anything on file by writing a lot of English).

During Man Mohan Singh’s time as PM, once CVC officials had gone to DMRC to pick up some files. Sreedharan refused to hand over any file. Then he went to PM and threatened to resign as MD unless written orders were personally issued by PM forbidding CVC or any other investigating agency from scrutinizing any tender file of DMRC. Under that resignation threat PM issued those written orders!!

This information is 100% authentic since it was told to me by an IRSEE officer, who was the Director under me in the Railway Board and subsequently took absorption in DMRC. He was a super outstanding officer and finally retired from DMRC as Director.

In the PSEB interview to select Sreedharan’s successor, the Board wanted to select the IRSEE director as MD, but Sreedharan pitched for Mangnu Singh, Director Civil and put his foot down refusing to sign the proceedings if Mangnu Singh wasn’t selected. That is how that outstanding IRSEE director lost out.

My point is, if Railway Officers also had the freedom to award tenders to L-3 or L-4 then they could also do wonders, possibly as much as if not more than what DMRC has achieved!

My then Sr.DEN (Hq.), who is presently posted as ADRM, told me during my departure as DRM, “sir, throughout our service we’ve always been told by all our seniors that if we wanted to deliver then we must break the rules. We will not be able to deliver successfully by following all rules. Here sir, during the past 2 years, I’ve seen you follow each and every rule and still you’ve been able to deliver much more than any officer I’ve worked under. That has completely changed my mindset permanently.”

In my entire service, I’ve never flouted any rule and whatever I’ve achieved has been by strictly following all rules and regulations. Had Sreedharan been able to do that I would have certainly termed him as Great?

रिटायर्ड जीएम के उपरोक्त विचार बहुत स्पष्ट हैं। तथापि यहां श्रीधरन साहब की गरिमा को किसी भी तरह से डिग्रेड करने की कोई कोशिश नहीं की गई है। उन्होंने सिर्फ उनके काम करने के तौर-तरीकों का जिक्र किया है। उनको आए अनुभव का निष्कर्ष यह भी है कि श्रीधरन साहब भी पक्षपात और मनमानी से मुक्त नहीं थे। यदि ऐसा नहीं होता, तो आज दिल्ली मेट्रो का परिदृश्य कुछ अलग होता। यह भी कि यदि सारे स्थापित सरकारी रूल्स-रेगुलेशंस और दिशा-निर्देशों को दरकिनार करके काम करने और परिणाम देने की छूट दी जाए, तो वह कोई भी रेल अधिकारी दे सकता है।





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जारी है उत्तर रेलवे निर्माण संगठन में बिड कैपेसिटी घोटाला

“आखिर कब तक चलेगा यह पिक एंड चूज का खेल? यह सब ऊपर बैठे बड़े लोगों (अधिकारियों) का खेल है, जो न केवल कर्मचारियों को, बल्कि ठेकेदारों को भी बेवकूफ बनाते हैं और अपनी जेबें भरते हैं।”

उत्तर रेलवे निर्माण संगठन में बिड कैपेसिटी का घोटाला आज भी लगातार चल रहा है। परंतु इस पर लगाम लगाने वाला कोई नहीं है, क्योंकि उत्तर रेलवे का जोनल विजिलेंस और रेलवे बोर्ड का सार्वभौमिक विजिलेंस दोनों गहरी नींद में सुला दिए गए हैं। फिर सीवीसी से ही क्या उम्मीद की जा सकती है।

पूर्व सीएओ/कंस्ट्रक्शन, उत्तर रेलवे बी. डी. गर्ग के समय में अथवा उनके द्वारा शुरू किया गया बिड कैपेसिटी का यह घोटाला आज भी उत्तर रेलवे में लगातार जारी है। अब तो उत्तर रेलवे निर्माण संगठन के अधिकारियों द्वारा इस घोटाले को यहां एक परंपरा के रूप में स्थापित कर दिया गया है।

सबको पता है कि 6 माह में काम नहीं हो सकता, फिर क्यों शॉर्ट टर्म टेंडर किया जा रहा है? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए उत्तर रेलवे निर्माण संगठन का कोई अधिकारी तैयार नहीं है।

सीपीआरओ को भी लगता है कि केवल दिल्ली के कुछ चुनिंदा पत्रकारों के ही फोन उठाने का निर्देश दिया गया है?

उल्लेखनीय है कि इसी तरह रोहतक-मेहम-हांसी नई रेल लाइन के निर्माण में हुए भारी भ्रष्टाचार और उसके विरुद्ध की गई ढ़ेरों लिखित शिकायतों के चलते मार्शल इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड का कांट्रैक्ट टर्मिनेट कर दिया गया था। तथापि दोषी अधिकारियों के विरुद्ध आजतक कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

अब इसी रोहतक-मेहम-हांसी लाइन की हांसी-तोशम रोड (स्टेट हाइवे-12) की क्रासिंग किमी. 68-110 पर रोड ओवर ब्रिज (आरओबी) का निर्माण करने का टेंडर सीएओ/सी/उ.रे. द्वारा जारी किया गया है।

जानकारों का कहना है कि यह टेंडर जारी करने से पहले कार्य की उचित समीक्षा भी नहीं की गई है।

इस टेंडर की विज्ञापित वैल्यू ₹2285068.10 है। इस टेंडर में भी उक्त आरओबी का निर्माण पूरा करने की अवधि छह महीने ही रखी गई है, जबकि यह निश्चित है कि छह महीनों में यह तो क्या, कोई भी ब्रिज (आरओबी) बनकर तैयार नहीं हो सकता। जबकि इसके साथ अन्य कई कार्य भी किए जाने हैं।

आखिर कब तक चलेगा यह पिक एंड चूज का खेल? यह कहना है उत्तर रेलवे निर्माण संगठन में कार्यरत कुछ फील्ड सुपरवाइजरों का। उनका कहना है कि “यह सब ऊपर बैठे बड़े लोगों (अधिकारियों) का खेल है, जो न केवल कर्मचारियों को, बल्कि ठेकेदारों को भी बेवकूफ बनाते हैं और अपनी जेबें भरते हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि “जो कोई इनसे फाइट करता है, उसे ये सब मिलकर बरबाद कर देते हैं।” वह कहते हैं कि वी. के. गुप्ता और बी. डी. गर्ग पर चूंकि कोई कार्रवाई नहीं हुई, इसलिए उनके द्वारा सेट किया गया भ्रष्टाचार का सिस्टम अब यहां परंपरा बन चुका है।

कर्मचारी और कांट्रैक्टर कहते हैं –

ऊपर तक मिले हैं कंस्ट्रक्शन अधिकारी!

जिन पर रिश्वतखोरी ने की हुई है सवारी!!

विशेष: टेंडर्स में “एडवरटाइज्ड वैल्यू” का कोई अर्थ नहीं निकलता। इन छद्म शब्दों का कोई औचित्य भी प्रमाणित नहीं होता। अतः इसे पहले की ही भांति “एस्टीमेटेड कास्ट” यानि “अनुमानित लागत” लिखा जाए और यह आंकड़ा, अंकों के साथ-साथ अक्षरों/शब्दों में भी लिखी जानी चाहिए!

#BidCapacity #NorthernRailway #GMNRly #Construction #IndianRailway #CVCIndia #Rohtak_Meham_Hansi #ROB #MIPL 





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पूर्वोत्तर रेलवे द्वारा रेलवे बोर्ड के “केयर गिवर” संबंधी आदेश का उल्लंघन

जोनल अधिकारियों की मनमानी पर अविलंब अंकुश लगाए रेलवे बोर्ड!

गोरखपुर ब्यूरो : कोविड-19 महामारी के चलते रेलवे बोर्ड द्वारा रेल कर्मचारियों के स्थानांतरण पर लगाई गई रोक को पूर्वोत्तर रेलवे के सीएमएम/ई ने ताक पर रखते हुए कर्मचारियों का स्थानांतरण गोरखपुर डिपो से गोंडा डीजल डिपो करके एक कर्मचारी कृष्णानंद सिंह को 18 जुलाई को जबरन जॉइन भी करा दिया। इस स्थानांतरण से स्थानांतरण भत्ता भी देय होने से रेलवे पर अतिरिक्त भार भी पड़ा है।

सवाल यह उठता है कि यदि जोनल रेलों द्वारा बोर्ड के आदेशों और दिशा-निर्देशों का इसी तरह उल्लंघन किया जाता रहा, तो बोर्ड और उसके निर्देशों का औचित्य ही क्या रह जाएगा? ऐसा लगता है कि रेलवे बोर्ड की अनिश्चयात्मक स्थिति के चलते जोनल रेलों में कुछ अधिकारियों द्वारा मनमानी की जा रही है, जिस पर यदि समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो व्यवस्था में और अधिक अराजकता फैलने में ज्यादा देर नहीं लगेगी।

उपलब्ध कार्यालय आदेश से जाहिर है कि कोविड-19 महामारी के कारण आर्थिक संकट से गुजर रही रेलवे एवं कर्मचारियों की बीमारी से रोकथाम के लिए स्थानांतरणों पर बोर्ड द्वारा लगाई गई रोक के बावजूद सीएमएम/ई ने जानबूझकर आदेश का उल्लंघन कर अपनी मनमानी करते हुए 29 जून एवं 13 जुलाई को स्थानांतरण पत्र जारी करके तीन कर्मचारियों का स्थानांतरण गोरखपुर डिपो से गोंडा डीजल डिपो में किया है जो कि रेलवे बोर्ड के आदेश की खुली अवमानना है।

सीएमएम/ई/पूर्वोत्तर रेलवे ने आदेश सं. 20 को रेलवे बोर्ड के आदेश दि. 13.03.2020 का संज्ञान लिए बिना यूनियन के दबाव में निरस्त करते हुए ऐसे कर्मचारी का स्थानांतरण किया, जिसका भाई मानसिक विकलांग है और उक्त कर्मचारी ही उसका “केयर गिवर” है।

उल्लेखनीय है कि ऐसे कर्मचारियों का स्थानांतरण न किए जाने के संबंध में रेलवे बोर्ड द्वारा अलग से निर्देश जारी किया गया है। बोर्ड के उक्त निर्देश के साथ कर्मचारी ने जब सक्षम अधिकारी के समक्ष अपील दाखिल की तो उसकी इस अपील को भी रेलवे बोर्ड के आदेश का संज्ञान लिए बगैर निरस्त कर दिया गया।

कर्मचारियों का कहना है कि कोविड-19 महामारी के समय बोर्ड के दिशा-निर्देशों को दरकिनार करके स्थानांतरण करने वाले पूर्वोत्तर रेलवे के सीएमएम/ई ने कर्मचारी और राष्ट्र विरोधी कार्य किया है।

उनका यह भी आरोप है कि पहले आदेश के तहत स्थानांतरित किए गए दो कर्मचारियों को यूनियन ने मोटी राशि लेकर पिछली तारीख से पदाधिकारी बताकर उनको स्थानांतरण से बचाया, जबकि सीएमएम/ई ने जातिगत भेदभाव और पक्षपात तथा बोर्ड के आदेशों का उल्लंघन करते हुए “केयर गिवर कर्मचारी” तक का स्थानांतरण करने से गुरेज नहीं किया।

रेलवे बोर्ड और सक्षम जोनल अथॉरिटी द्वारा इस मामले का अविलंब संज्ञान लिया जाना चाहिए। 





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कोटा मंडल, पश्चिम मध्य रेलवे में लगातार जारी हैं गंभीर अनियमितताएं

बोर्ड की रोक के बावजूद किया जा रहा है नए पदों का सृजन

सुरेश त्रिपाठी

रेलमंत्री पीयूष गोयल के निर्देश पर रेलवे बोर्ड द्वारा सभी जोनल रेलों और उत्पादन इकाईयों को लागत खर्चों में कटौती करने संबंधी कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके बावजूद कुछ जोनों/मंडलों द्वारा बोर्ड के इन निर्देशों को तनिक भी तवज्जो नहीं दी जा रही है। इनमें से पश्चिम मध्य रेलवे का कोटा मंडल भी शामिल है। कार्मिक शाखा, कोटा मंडल द्वारा 10 जून 2020 को पत्र सं. ईसी/1025/34/1, भाग-4 तथा समसंख्यक पत्र दि. 15.07.2020 जारी करके वाणिज्य निरीक्षकों के 4 रिक्त पदों के स्थान पर 6 अतिरिक्त यानि 6 नए पदों के सृजन के साथ कुल 10 वाणिज्य निरीक्षकों का चमन किया जा रहा है। इसकी परीक्षा गुरुवार, 6 अगस्त को मंडल प्रबंधक कार्यालय, कोटा में रखी गई है।

उल्लेखनीय है कि रेलवे बोर्ड द्वारा 2 जुलाई को नए पद सृजन के संबंध में पत्र सं. ई(एमपीपी)/2018/1/1 (आरबीई 48/2020) जारी करके लागत खर्च में कमी करने के लिए संरक्षा को छोड़कर अगले आदेश तक कोई भी नया पद सृजित नहीं करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा वर्तमान पदों में 50% की कटौती करने के साथ ही उन पदों, जो पिछले दो वर्षों में सृजित किए गए हैं और उन पर अब तक भर्ती नहीं की गई है, को सरेंडर करने को भी कहा है।

रेलवे बोर्ड ने उपरोक्त संबंधी आदेश 19 जून 2020 को भी अपने पत्र सं. 2015/बी/235 में जारी किया था।

इस पत्र के पैरा-III (ए) के अनुसार आउटसोर्सिंग गतिविधियों, विशेष रूप से ओबीएचएस, लिनन प्रबंधन, स्टेशन क्लीनिंग, लिफ्ट/एस्केलेटर्स मैनिंग और स्टेशन एनाउंसमेंट इत्यादि की समीक्षा गंभीरता से करने का निर्देश देते हुए इन सब गतिविधियों पर हो रहे अमापक खर्च पर कड़ाई से अंकुश लगाने को कहा था।

रेलवे बोर्ड के उपरोक्त निर्देशों के उल्लंघन के अलावा कोटा मंडल की वाणिज्य शाखा में कुछ अन्य गंभीर अनियमितताएं भी उजागर हुई हैं, जिसमें रेलवे बोर्ड के जिन नीति निर्देशों को दरकिनार किया गया है, वह इस प्रकार हैं-

कोटा मंडल द्वारा विभिन्न स्टेशनों पर कैडर में स्वीकृत ग्रुप ‘डी’ सफाई कर्मचारियों के पदों को सरेंडर कर 6 वाणिज्य निरीक्षकों के पदों का सृजन किया गया, जिसका मुख्य कारण पूरे मंडल में स्टेशनों को क्लब करते हुए जोन बनाकर सभी स्टेशनों पर सफाई का कार्य ठेके पर कराने की योजना थी।

कार्मिक कार्यालय के पत्र सं ईसी/1025/34/1 भाग-iv, दि. 10.06.2020 के अंतर्गत 10 वाणिज्य निरीक्षकों (08 अनारक्षित, 01 एससी, 01 एसटी) के पदों की रिक्तियों (लेवल-6 पे-बैंड 9300-34800 + 4200) को भरने हेतु आवेदन मंगाए गए। अब इन पदों पर रिक्तियों को भरे जाने हेतु होने वाली लिखित परीक्षा दि. 06.08.2020, पत्र सं. ईसी/1025/34/1 भाग-४, दि. 15.07.2020 जारी की गयी है।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि रेलवे बोर्ड का पत्र सं. 2015-बी-235 दि. 19.06.2020 के पैरा-III (ए) के अनुसार “आउटसोर्सिंग गतिविधियों – विशेष रूप से ओबीएचएस, लिनन प्रबंधन, स्टेशन क्लीनिंग, लिफ्ट/एस्केलेटर्स मैनिंग और स्टेशन एनाउंसमेंट इत्यादि – की गंभीर रूप से समीक्षा जानी चाहिए और इस पर अंकुश लगाया जाना चाहिए” के आधार पर पूरे मंडल में स्टेशनों को क्लब करते हुए जोन बनाकर सभी स्टेशनों पर सफाई का कार्य ठेके पर देने के जो भी कॉन्ट्रैक्ट थे, वे सभी मंडल रेल प्रबंधक, कोटा द्वारा निरस्त कर दिए गए हैं।

इस हिसाब से जो ग्रुप ‘डी’ सफाई कर्मचारियों के पद सरेंडर किए गए थे, वे भी स्वत: रद्द होने चाहिए थे और जिन पदों को सरेंडर कर जो पद सृजित किए गए थे, वे भी स्वत: रद्द होने चाहिए थे। परंतु कोटा मंडल द्वारा ऐसा कुछ नहीं किया गया।

उपरोक्त नियम के अनुपालन में यथोचित कार्य न करके इन नियमों को ताक पर रखकर वाणिज्य निरीक्षकों के नए पदों के साथ रिक्तियों के लिए कथित रूप से निजी हित साधने हेतु यह परीक्षा करवाई जा रही है, जबकि उक्त नियमों के अनुपालन में पिछले दो सालों में सृजित किए पदों को भी सरेंडर किया जाना है।

बताते हैं कि इस कार्य हेतु फाइल चलाई भी गई परंतु नए सृजित वाणिज्य निरीक्षकों के पदों को डीसीएमआई मैन पावर प्लानिंग पर दबाव बनाकर और उससे लिखवाकर इन पदों को यथावत रखकर केवल कागजी कार्यवाही कर ली गई और इस पर पुनः वित्तीय सहमति लिया जाना उचित नहीं समझा गया तथा गंभीर अनियमितता को मूर्त रूप दिया जा रहा है।

कर्मचारियों का कहना है कि वास्तव में इन पदों के सृजन की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि प.म.रे. मुख्यालय जबलपुर द्वारा दिए गए आदेश में यह प्रावधान दिया गया है कि “यदि कोई पर्यवेक्षक के पद पर लेवल-7, पे-बैंड 9300-34800+4600 ग्रेड पे में हो और प्रशासन उसे अपनी आवश्यकता के अनुरूप वाणिज्य निरीक्षक के पद पर काम लेना चाहे, तो उस पर्यवेक्षक से वर्तमान रिक्ति पर वाणिज्य निरीक्षक का कार्य लिया जा सकता है। तथापि उस पर्यवेक्षक का कार्यकाल 5 वर्ष से अधिक का नहीं होगा।

कर्मचारियों का कहना है कि मुख्यालय का तत्संबंधी आदेश मंडल कार्मिक शाखा के पास अवश्य उपलब्ध होना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि इतनी लचीली पालिसी उपलब्ध होते हुए भी नए पदों के सृजन की आवश्यकता क्यों हो रही है? इसका सीधा मतलब यही निकल रहा है कि मनवांछित व्यक्ति को पदोन्नत करके मनवांछित लाभ कमाने के इरादे से इन सब नियमों को ताक में रखा जा रहा है।

कर्मचारियों ने बताया कि मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय का पत्र सं. ईसी/174/2 (मर्जर ऑफ सीसी/ईसीआरसी दि. 02.01.2019 के अंतर्गत मंडल के समस्त वाणिज्य कैडर, जिसमें बुकिंग, पार्सल, गुड्स, टिकट चेकिंग स्टाफ को मर्ज करने और री-पिन प्वाइंटिंग भी मनवांछित व्यक्ति को पद पर लाने और मनवांछित लाभ कमाने के इरादे से की गई है।

इसी के तहत जहां कोटा बुकिंग और पीआरएस में केवल दो पर्यवेक्षक (एक कैश और एक स्टोर्स) के पद सालों से थे, वहां पर 7-7 पद सृजित कर दिए, जबकि इनका न तो कोई औचित्य है और न ही आवश्यकता है, वहीं कई स्टेशनों पर पर्यवेक्षक के पदों की आवश्यकता है, वहां यह पद सृजित नहीं किये गए हैं।

उनका कहना है कि यदि नए पद सृजित करने ही थे, तो उससे पहले पैरा 6 में वर्णित प.म.रे. मुख्यालय के आदेश में दिए गए प्रावधान का विचार कर उसका लाभ उठाते हुए रेल राजस्व बचाया जा सकता था। परंतु ऐसा नहीं किया गया, क्योंकि फिर वही मनवांछित व्यक्ति को पद पर लाने और मनवांछित लाभ कमाने के इरादे से की जा कोशिश बाधित हो जाती।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि वर्तमान कोटा मंडल की वित्तीय शाखा द्वारा भी कार्मिक शाखा के उक्त 6 नए वाणिज्य निरीक्षकों के पदों के सृजन के औचित्य पर बिना कोई सवाल उठाए आंख मूंदकर वित्तीय सहमति दे दी गई। जबकि रेलवे बोर्ड के उपरोक्त दिशा-निर्देशों के अंतर्गत सफाई वालों के पदों के एवज में जो पद सृजित किए गए हैं, उनकी समीक्षात्मक जांच की जानी चाहिए थी, जो कि वित्तीय शाखा द्वारा नहीं की गई। यह घोर अनियमितता एवं सरासर रेलवे बोर्ड द्वारा जारी किए गए उपरोक्त निर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन है।

रेलवे बोर्ड के उक्त निर्देशों की अवेहलना का आलम यह है कि मंडल प्रशासन ने भी अपनी आंखें बंद कर ली हैं, क्योंकि ऐसा लगता है कि मंडल की कार्मिक, वाणिज्य, परिचालन, वित्त और अन्य शाखाओं में जो खुलेआम कदाचार चल रहा है उस पर मंडल प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं रह गया है।

उपरोक्त तमाम कदाचार की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए और इनकी उच्च स्तरीय जांच कराने के लिए कई कर्मचारियों ने महाप्रबंधक/प.म.रे. को एक ज्ञापन भी सौंपा है और उनसे मांग की है कि गुरुवार 6 अगस्त को होने जा रही परीक्षा को तुरंत रोका जाए।

इस ज्ञापन की प्रतियां उन्होंने वरिष्ठ उप महाप्रबंधक एवं मुख्य सतर्कता अधिकारी, प्रमुख मुख्य परिचालन प्रबंधक, प्रमुख मुख्य वाणिज्य प्रबंधक, प्रमुख मुख्य वित्तीय सलाहकार एवं मुख्य लेखाधिकारी, पमरे/जबलपुर को भी उचित कार्यवाही हेतु प्रेषित की हैं। क्रमशः 





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एलडीसीई की समस्त प्रक्रिया रेलवे बोर्ड द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर संयोजित की जाए

सिद्धांततः एलडीसीई में ऑब्जेक्टिव के बाद सब्जेक्टिव पेपर और इंटरव्यू भी होना चाहिए

सुरेश त्रिपाठी

“एलडीसीई में अब मनमाने तरीके से नहीं दे पाएंगे अंक” शीर्षक से “रेलसमाचार.कॉम” पर 24 जुलाई को प्रकाशित खबर पर बहुत सटीक और तीव्र प्रतिक्रिया कई विद्वान, वरिष्ठ और अनुभवी रेल अधिकारियों ने व्यक्त की है। इनमें कार्यरत एवं सेवानिवृत्त दोनों तरह के रेल अधिकारी शामिल हैं। उनकी सबसे पहली आशंका यह है कि एलडीसीई की यह जो नई गाइडलाइंस (पत्र सं. ई(जीपी)/2018/2/31, दि. 20 जुलाई 2020) रेलवे बोर्ड द्वारा जारी की गई हैं, उनके मद्देनजर किसी बड़े खेल की भावी तैयारी लग रही है, जो भविष्य में शायद ‘व्यापम’ से भी बड़ा घोटाला साबित हो सकती है। उनकी अनुभवी प्रतिक्रियाओं और विश्लेषणात्मक तथ्यों को रेल प्रशासन के समक्ष इस उद्देश्य से यहां प्रस्तुत किया जा रहा है कि इससे उसे अपनी विभागीय चयन प्रक्रिया को फुलप्रूफ बनाने में पर्याप्त मदद मिल सकती है।

रेलवे में ग्रुप ‘सी’ से ग्रुप ‘बी’ एक बहुत बड़ी छलांग होती है और यह जिम्मेदारी भी उतनी ही संवेदनशील होती है।राज्य सरकार या भारत सरकार के किसी भी विभाग में राजपत्रित अधिकारी बनाने के लिए सिर्फ “ऑब्जेक्टिव” से ही चयन प्रक्रिया पूरी नहीं की जाती है। आरआरबी, आरआरसी, एसएससी आदि ग्रुप ‘डी’ और ‘सी’ के सेलेक्शन होते हैं, उनके लिए तो यह ठीक हो सकती है, लेकिन राजपत्रित के लिए यह प्रक्रिया बिल्कुल भी उचित नहीं कही जा सकती। आरआरबी, आरआरसी आदि की ऑब्जेक्टिव आधारित चयन प्रक्रिया ज्यादा सहज (वल्नरेबल) होती है। आए दिन इसकी खबरें हम सुनते रहते हैं। इसमें संगठित और बड़े पैमाने पर अयोग्यों की नियुक्ति की आशंका होती है।

इसीलिए राजपत्रित स्तर की परीक्षाओं के लिए स्टेट पब्लिक सर्विस कमीशन और संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) का सिस्टम ज्यादा बेहतर और फुल प्रूफ माना जाता है, क्योंकि तीन स्तर पर मैनेज करना किसी के लिए भी अत्यंत मुश्किल होता है।

रेलवे बोर्ड में “राजपत्रित चयन बोर्ड” बनाया जाए

अब जहां तक बात रेलवे की आंतरिक विभागीय चयन परीक्षाओं की है, तो रेलवे की ऐसी सभी परीक्षाएं, अलग-अलग विभागों और जोनल स्तर पर न कराकर इसके लिए यूपीएससी की तर्ज पर राष्ट्रीय स्तर पर रेलवे बोर्ड में एक “राजपत्रित चयन बोर्ड” बनाकर कराई जानी चाहिए। इससे अलग-अलग जोनों की विभागीय चयन प्रक्रिया में जो विसंगतियां हैं, वह भी समाप्त हो जाएंगी। इसके अलावा नालायक, निकम्मे, जोड़-तोड़ करने, पैसे की बदौलत सिफारिश और पहुंच रखने वाले जो उम्मीदवार इन चयन प्रक्रियाओं में बार-बार बाधा डालते हैं, एक तरफ उनसे निपटा जा सकेगा, तो दूसरी तरफ इससे समय पर रेलवे को आवश्यक राजपत्रित अधिकारी उपलब्ध होने के साथ ही योग्य उम्मीदवारों का चयन भी सुनिश्चित हो सकता है।

इसीलिए तीन स्तरीय चयन प्रक्रिया – 1. ऑब्जेक्टिव 2. सब्जेक्टिव 3. इंटरव्यू – निश्चित रूप से होनी चाहिए और वह भी भारतीय रेल के स्तर पर। यह इसलिए भी जरूरी है, कयोंकि सिर्फ एक रेलवे ही पूरे देश में एकमात्र ऐसी संस्था है जिसमें कोई चतुर्थ श्रेणी में बहाल व्यक्ति अपनी जोड़तोड़ से मात्र 6-7 साल में तृतीय श्रेणी (ग्रुप ‘सी’) कर्मचारी बन जाता है और अगले 5 साल में वह राजपत्रित अधिकारी (ग्रुप ‘बी’) स्तर की विभागीय परीक्षा के लिए योग्य (एलिजिबल) हो जाता है।

सिर्फ रेलवे में चल रही अद्भुत व्यवस्था : खलासी को मिलता है ग्रुप ‘ए’ स्टेटस

यहां सबसे आश्चर्यजनक व्यवस्था यह भी है कि ग्रुप ‘बी’ में आने के 7-8 साल के अंदर उसे यूपीएससी से सीधी भर्ती अधिकारी – आईआरपीएस, आईआरटीएस, आईआरएसई, आईआरएएस इत्यादि – का दर्जा भी मिल जाता है। जबकि राज्यों में जो यूपीएससी के ही पैटर्न पर और उसी स्टैंडर्ड की परीक्षा से पीसीएस पास कर जो लोग सीधे ग्रुप ‘बी’ अधिकारी बनते हैं और एसडीएम, डीएसपी आदि में ज्वाइन करते हैं, उन्हें किसी भी राज्य में यूपीएससी से ग्रुप ‘ए’ का स्टेटस मिलने में कम से कम 20 साल का समय लगता है।

इस तरह से देखा जाए तो रेलवे बोर्ड द्वारा यह निर्णय भी या तो किसी पूर्व नियोजित और बहुत बड़ी साजिश के तहत लिया गया है, या फिर इसमें अपेक्षित संजीदगी के साथ रेल हित को ध्यान में रखकर पर्याप्त सोच-विचार नहीं किया गया है।

वर्तमान विभागीय चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव

अब जहां तक बात वर्तमान चयन प्रक्रिया में कमी की है, तो इसकी सबसे बड़ी कमी है यहां पूरी पारदर्शिता के साथ प्रश्न पत्र, परीक्षा हॉल की व्यवस्था, कॉपी चेक करने की गाइडलाइन, इंटरव्यू के मानक इत्यादि जानबूझकर स्पष्ट नहीं रखे गए हैं। इसके अलावा देश की सबसे बड़ी परीक्षाएं लेने वाली संस्थाओं – जैसे यूपीएससी, पीसीएस, सीबीएसई, स्टेट एग्जाम बोर्ड्स, यूनिवर्सिटी एग्जाम्स आदि – की परीक्षा प्रक्रियाओं को भी इसमें फॉलो नहीं किया जाता है। इसीलिए जब जो भी असफल और खुराफाती उम्मीदवार फेल होगा, वह पूरी प्रक्रिया को ही जब चाहे तब डिस्टर्ब कर देगा और किसी के भी ऊपर और कैसा भी आरोप लगा देगा।

सिर्फ ऐसी किसी परीक्षा में ही नहीं, बल्कि बाकी व्यवस्था में भी यह अत्यंत महत्वपूर्ण होता है कि पहले तो नियम और व्यवस्था-प्रक्रिया ऐसी बनाई जाए, जो कि पूरी तरह से स्पष्ट, पारदर्शी, बिना किसी विरोधाभास के ईमानदारी से फूल प्रूफ तैयार की गई हो। इसमें इस बात को भी अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए कि कोई व्यक्ति या उम्मीदवार इसको कहां-कहां और कैसे-कैसे बदनाम अथवा दुरुपयोग (मिस्यूज) कर सकता है।

चयन प्रक्रिया में शामिल लोगों को सेफगार्ड की जरूरत

इसके साथ ही रेल प्रशासन को अपनी व्यवस्था की चयन प्रक्रिया में शामिल लोगों को किसी भी तरह के परिवाद से बचाने अथवा सेफगार्ड करने के भी नियम स्पष्ट रखने चाहिए, जैसा कि यूपीएससी, पीसीएस, या अन्य परीक्षा बोर्डों में होता है। जैसे कि यह लगभग सभी लोगों को पता है कि आज की तारीख में असली खेल क्वेश्चन पेपर (प्रश्न पत्र) सेट करने वाला ही खेलता है। जो असल खेल होता है, वह यही है, जिसमें पहले से निर्धारित उम्मीदवार को पैसे के बदले या पैरवी के दबाव में क्वेश्चन बता दिया जाता है। चूंकि यह सबसे ‘सेफ’ है और सीबीआई के अलावा अन्य कोई, चाहे वह रेलवे विजिलेंस हो, या कोई विभागीय जांच समिति, इसे सिद्ध नहीं कर सकता। सीबीआई द्वारा भी सिद्ध करने के चांस बहुत ब्राइट नहीं होते हैं, इसीलिए धड़ल्ले से इसका ‘उपयोग’ होता है।

परीक्षा कक्ष में नकल अथवा अन्य प्रकार की जोड़-तोड़ या परीक्षा के बाद कॉपी में घालमेल की बात वह लोग करते हैं जिनको क्वेश्चंस नहीं मिले होते हैं और फेल हो जाते हैं। तभी वह अपनी भड़ास निकालने के लिए परीक्षा की हर स्तर की प्रक्रिया में भ्रष्टाचार, पक्षपात, विसंगति और गलतियां देखते हैं। हालांकि अपवाद स्वरूप कई बार कुछ योग्य उम्मीदवार भी इसकी बलि चढ़ जाते हैं।

एग्जाम पेपर में मेनिपुलेशन का ‘स्कोप’ नहीं बचा, तथापि…

वर्तमान में अत्यंत जोखिमपूर्ण स्थितियों को देखते हुए कोई निहायत ही बेवकूफ अधिकारी भी एग्जाम पेपर में ‘मेनिपुलेशन’ की बात नहीं सोचता होगा, न ऐसा करता होगा, और न ही अब इसका कोई ‘स्कोप’ बचा है कि कोई कॉपी में परीक्षा के बाद कुछ और लिख पाए, क्योंकि परीक्षा के तुरंत बाद और कॉपियां सीलबंद करने से पहले प्रत्येक कॉपी में हर प्रश्न के उत्तर के बाद के बचे ‘स्पेस’ को ‘क्रॉस’ कर दिया जाता है, जिससे बाद उसमें कोई एक लाइन भी न लिख पाए। सभी परीक्षा कक्षों के निरीक्षक और कोऑर्डिनेटर इस प्रक्रिया को सुनिश्चित करते हैं और “विजिलेंस कंप्लेंट माफिया” भी इससे बखूबी वाकिफ है। इसीलिए विजिलेंस का अनुभवी घाघ माफिया इंस्पेक्टर अपनी कंप्लेंट में अधिकारियों के ज्ञान के आधार पर परीक्षा कक्ष में नकल या जोड़तोड़ की बात भी जरूर लिखवाता है, जिससे कॉपी में जोड़-तोड़ की कहानी आगे बढ़ाई जा सके।

सर्वप्रथम तो कॉपियां जांचने में होने वाले विवाद और जोड़-तोड़ की संभावनाओं से सभी अधिकारी परिचित होते हैं और इसीलिए अधिकांश अधिकारी इस जांच प्रक्रिया का हिस्सा बनने से पहले दूर से ही अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। तथापि यदि जबरदस्ती यह जिम्मेदारी उन पर डाल भी दी गई, तो ज्यादातर सतर्क और समझदार अधिकारी एकलाइन से सभी उम्मीदवारों को ‘फेल’ करने में ही अपनी भलाई समझते हैं, क्योंकि तब न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी!

लेकिन वहीं कुछ अधिकारी ऐसे भी होते हैं, जो मजबूरी में मिली जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाते हुए कॉपी चेक करते हैं और बाद में उसका दुष्परिणाम भुगतते हैं। कई वरिष्ठ रेल अधिकारियों का कहना है कि ऐसे ही अधिकारी कंप्लेंट माफिया का शिकार बनते हैं, क्योंकि सब्जेक्टिव पेपर में मॉडल पेपर के अलावा कॉपी चेक करने वाला अधिकारी अपने अनुभव से, जानकारी से, हैंडराइटिंग से लेकर उत्तर की शैली आदि कई तथ्यों को ध्यान में रखकर मार्किंग करता है। और यह तो तय है कि हर दूसरे आदमी की मार्किंग तथा उसके द्वारा दिए गए नंबर किसी दूसरे अधिकारी से हमेशा/शार्त्तिया भिन्न होगा। इसीलिए इसी बात का ध्यान रखकर जितने भी एग्जाम बोर्ड और संस्थाए हैं, उन्होंने अपने नियम बहुत स्पष्ट बना रखे हैं।

उत्तर पुस्तिकाओं की पुनर्जांच और विजिलेंस कंप्लेंट माफिया

उत्तर पुस्तिका की पुनर्जांच (री-चेकिंग) में हर प्रश्न पर दिए गए नंबरों को जोड़कर देखा जाता है और यह भी देखा जाता है कि कहीं पर दिया गया नंबर जुड़ने से तो नहीं रह गया। यदि रह गया है, तो उसे जोड़कर परिणाम बता दिया जाता है। इसी प्रकार अगर किसी प्रश्न पर परीक्षक द्वारा नंबर देना छूट गया है, तो उसे ठीक करके परिणाम निकाल दिया जाता है।

कुछ परिस्थितियों में जहां पर परीक्षार्थी यह आरोप लगाता है या आशंका जताता है कि उसने लिखा बहुत था, लेकिन उस अनुपात में उसे नंबर नहीं दिए गए हैं। तब उस कॉपी की दुबारा चेकिंग दूसरे सक्षम व्यक्ति से कराई जाती है और उसमें परिणाम कुछ भी आए, चाहे नंबर पहले से भी कम हो जाएं, तो भी वह परिणाम फाइनल होता है। कायदे से रेलवे में भी यही प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए, लेकिन यहां “विजिलेंस कंप्लेंट माफिया” के गाइडेंस में वैसी ही जलेबियां बनाई जाती हैं, जैसी वे चाहते हैं। नियम, तार्किक विश्लेषण और इस संबंध में दूसरी जगहों पर अपनाई जा रही रीति-नीति इत्यादि उनके लिए कोई मायने नहीं रखती।

किसी भी नौकरी या शैक्षिक परीक्षा व्यवस्था में जिनको कॉपी चेक करने की जिम्मेदारी दी जाती है, वह उनकी प्रोफेशनल कैपेबिलिटी और सभी क्रेडेंसियल्स को देख कर ही दी जाती है और उनकी गरिमा (रेपुटेशन) तथा सम्मान की रक्षा भी की जाती है।

अधिकारियों की प्रोफेशनल इंटीग्रिटी और उनकी दुर्वस्था

रेलवे में भी खासकर कॉपी चेकिंग में महाप्रबंधक सभी ऑफिसर्स में जिसके क्रेडेंशियल सबसे अच्छे होते हैं और जिनकी प्रोफेशनल इंटीग्रिटी तथा कंपीटेंसी सबसे विश्वसनीय होती है, उसे ही तमाम फीडबैक और सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर नामित करते हैं। लेकिन रेलवे में विडंबना यह होती है कि जैसे ही कंप्लेंट माफिया और विजिलेंस में उसके स्लीपर सेल्स सक्रिय होते हैं, वही ईमानदार अधिकारी तुरंत संदिग्ध और अपराधी मान लिया जाता है और व्यवस्था की पूरी सोच ही विजिलैंस माफिया/कंप्लेंट माफिया के नैरेटिव के अनुसार सेट हो जाती है। फिर भले ही अन्ततः सत्य की जीत होती हो, लेकिन तब तक उस अधिकारी की मानहानि हो चुकी होती है और आगे के लिए उसे स्पष्ट सीख भी मिल जाती है कि या तो इन माफियाओं के अनुसार चलो या इनके रास्ते से हट जाओ, भले ही पूरा सिस्टम भाड़ में चला जाए।

ऐसी स्थिति में अधिकारी को इस बात का अहसास हो जाता है कि उसने पेपर चेक करके बहुत बड़ा पाप कर दिया, क्योंकि कंप्लेंट माफिया किसी भी स्तर पर उत्तर कर कंप्लेंट करता है और आरोप लगाता है, जिसमें लोगों को चटखारे लेने का कम से कम मौका तो मिल ही जाता है। इससे अधिकारी की सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ-साथ सहकर्मियों के बीच उसकी छवि भी प्रभावित होती है, क्योंकि केस सच है या झूठ, इसमें दूसरों की कोई रुचि नहीं होती, उनको तो मजा सिर्फ इतने से ही मिल जाता है कि सामने वाला उनसे ज्यादा नहीं तो कम से कम बराबर ही गिरा हुआ जरूर है।

इसके अलावा अधिकारी के परिवार पर उसके इस “ईमानदार एडवेंचर” के कारण क्या बीतती होगी, इतनी दूर तक भी कौन सोचता है! कुल मिलाकर इस तंत्र का ताना-बाना ऐसा बुना गया है कि ईमानदारी, निष्पक्षता, निर्भीकता, कर्मठता, योग्यता इत्यादि हमेशा हासिये पर रहें और बेईमानों, फरेबियों, अवसरवादी, निक्कमे, निकृष्ट तथा अयोग्य लोगों का ही वर्चस्व बना रहे।

“विजिलेंस संरक्षित और गाइडेड कंप्लेंट माफिया” का मकसद

रेलवे में स्थिति यह है कि यहां “विजिलेंस माफिया” अपनी मर्जी से कुछ भी लिखवा देता है और जांच करने वाला उसके गाइडेंस के हिसाब से तब तक जांच करता रहता है, जब तक कि “विजिलेंस संरक्षित कंप्लेंट माफिया” का मकसद पूरा नहीं हो जाता। वह कहेगा उक्त प्रश्न में 5 अंक मिलने चाहिए थे, 10 मिलने चाहिए थे, तो 5 की जगह 3 मिला या 10 की जगह 8 मिला, या फिर 5 की जगह 7 मिला, अथवा 10 की जगह 12 मिला। और फिर उसी की मानसिकता के प्रशासन में बैठे लोग उसी के हिसाब से मामले को देखने लगते हैं।

किसी परीक्षा में या प्रायः सभी परीक्षाओं में कई बार एक ही नंबर पर कितने लोग होते हैं और एक नंबर से ही कितने रैंक का अंतर हो जाता है, इसी पर संबंधित उम्मीदवार का पास-फेल होना निर्भर करता है। उसमें इस तरह की सोच और परिवाद को रेलवे की तरह डील करने पर तो न तो कभी किसी भी एग्जाम का रिजल्ट आ पाएगा और न ही कोई एग्जाम से संबंधित व्यक्ति या कॉपी चेक करने वाला अधिकारी बिना चार्जशीट के बच पाएगा।

रेलवे की जांच पद्धति अपनाने पर यूपीएससी जैसी परीक्षाओं में किसी नीचे की सर्विस पर 300 के रैंक वाला यह कह सकता है कि मेरे तक तो मार्किंग ठीक है, लेकिन मेरे से ऊपर जितने हैं, सबको पैसा लेकर ज्यादा नंबर दिया गया है, या क्वेश्चन पहले बता दिया गया था, अथवा पूरा एग्जाम हॉल बिक गया था, इसलिए मुझे आईएएस मिलना चाहिए। या फिर फेल होने वाला कोई भी उम्मीदवार इसी तरह से पूरे रिजल्ट को गलत ठहरा सकता है।

कंप्लेंट माफिया की कुंठित और भ्रष्ट मानसिकता

“कंप्लेंट माफिया की कुंठित और महाभ्रष्ट मानसिकता के लोगों का मकसद सिर्फ इतना ही होता है कि या तो लाइन उनसे शुरू हो, या फिर वे पूरी प्रक्रिया ही दूषित कर देंगे।” लेकिन रेलवे में ऐसी स्पष्ट व्यवस्था नहीं होने से “विजिलेंस संरक्षित और गाइडेड कंप्लेंट माफिया” यह खेल खूब खेलता है और कई बार पैनल भी कैंसल करवा लेता है। अधिकारियों को चार्जशीट मिलती है, सो अलग।

इस पर कार्मिक एवं अन्य विभागों के कई अनुभवी वरिष्ठ अधिकारियों का यह कहना है कि कोई भी अधिकारी अपनी नौकरी जोखिम में डालकर कुछ पैसों के लालच में अथवा किसी के दवाब में आकर पेपर में कुछ नहीं कर सकता है। उनका यह भी कहना है कि अगर कोई अधिकारी पैसा ही कमाना चाहे, तो उसके पास इसके कई सुरक्षित स्रोत और अवसर होते हैं। अधिकारियों का यह भी कहना है कि एग्जाम को फुलप्रूफ बनाने का एक तरीका यह भी हो सकता है – जिसे कई एग्जाम बोर्ड खासकर यूपीएससी फॉलो करता है – सब्जेक्टिव पेपर का मॉडरेशन। रेलवे के एग्जाम में इसे ऐसे किया जा सकता है कि एक अधिकारी के एक पेपर चेक करने के बाद कोई दूसरा अधिकारी भी उसी पेपर को पुनः चेक करे और फिर दोनों के मॉडरेशन से जो नंबर फाइनल किया जाएगा, वही अंतिम परिणाम का आधार होना चाहिए।

निश्चित है हर दूसरे अधिकारी की चेकिंग/मार्किंग में अंतर

इन विद्वान और अनुभवी अधिकारियो का कहना है कि भले ही पेपर चेक करने वाले जिन अधिकारियों की मनगढ़ंत कंप्लेंट हुई हो, अगर उसी पेपर को डीआरएम, जीएम, एसडीजीएम, पीईडी/विजिलेंस, सीआरबी या खुद रेलमंत्री अथवा सीवीसी भी चेक करेंगे, तो सबकी मार्किंग अलग-अलग ही होगी और सब पर भी “कंप्लेंट माफिया” पैसा लेकर बढ़िया से बढ़िया मेनिपुलेशन की कंप्लेंट कर सकता है और रेल प्रशासन यदि अपनी रेलवे विजिलेंस की कार्यशैली तथा परम्परा का निर्वहन करेगा, तो उस कंप्लेंट के आधार पर इन सभी को निश्चित रूप से मेजर पेनाल्टी चार्जशीट मिल ही जाएगी।

इन वरिष्ठ अधिकारियों का दावा है कि यदि उनकी इस बात पर भरोसा न हो, तो इसको उपरोक्त में से कोई भी अथॉरिटी कभी भी आजमाकर देख सकती है।

मन-मुताबिक न होने पर होती है “स्ट्रक्चर्ड कंप्लेंटबाजी”

यह बात भी सही है कि जब भी किसी विभागीय परीक्षा में विजिलेंस इंस्पेक्टर कंडीडेट होते हैं, तो उन एग्जाम्स में संबसे ज्यादा परीक्षा समिति के सदस्यों पर ये हर तरफ से दबाब डलवाते हैं और इनके मन का नहीं होने पर सबसे ज्यादा ‘स्ट्रक्चर्ड कंप्लेंटबाजी’ भी उन्हीं सदस्यों के खिलाफ होती है। 

दूसरी तरफ रिटायरमेंट के करीब पहुंचे अधिकारियों को क्वेश्चन पेपर सेट करने और विभागीय चयन की प्रक्रिया से तुरंत रोका जाना चाहिए, क्योंकि इसमें कुछेक मामलों में इसकी संभावना रहती है कि पैसे के लोभ में कुछ क्वेश्चन कुछेक चुनिंदा लोगों, जिनसे डील हो गई हो, को बेच दिया जाए, या फिर उस अधिकारी के सीधेपन और अपने सचिवालय पर अतिविश्वास तथा निर्भरता के चलते उसके सचिवालय के कॉन्फिडेंसियल स्टॉफ और सेक्रेटरी, जो क्वेश्चन पेपर टाइप/प्रिंट करते हैं, क्वेश्चंस को बेच दें। इसके एक नहीं, सैकड़ों उदाहरण खुद रेलवे बोर्ड के संज्ञान में पहले से ही हैं। अतः सेवाकाल के अंतिम वर्ष में और रिटायरमेंट के करीब पहुंचने वाले विभाग प्रमुखों को इस चयन प्रक्रिया से सर्वथा विलग किया जाए, इससे उनका ही भला होगा।

आमतौर पर जितने घाघ कंडीडेट होते हैं, वे परीक्षा की संभावना के आधार पर एक साल पहले से ही विभाग प्रमुख (पीएचओडी) के सेक्रेटरी और गोपनीय मामले देखने/डील करने वालों तथा टाइपिंग करने वालों की प्रदक्षिणा करने लगते हैं और अंततः उन्हें अपने चक्कर में ले ही लेते हैं।

आज की तारीख में यही सबसे सुरक्षित और एकमात्र तरीका है रेलवे की आंतरिक विभागीय परीक्षाओं में भ्रष्टाचार करने का और अयोग्य कंडीडेट्स को फायदा पहुचाने का। और हकीकत में बाकी तथ्य तो  सब सिर्फ पानी पर लाठी पीटने जैसे ही हैं।





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विडंबना और विसंगति के मारे रेलवे के जनसंपर्क अधिकारी बेचारे!

भारतीय रेल के जनसंपर्क अधिकारियों की दुर्दशा पर एक नजर

सुरेश त्रिपाठी

भारतीय रेल आज जिस ऊंचाई पर है, आए दिन जिसका सोशल मीडिया तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बहुत सारा प्रचार-प्रसार होता है, इसके पीछे रेलवे में कार्यरत जनसंपर्क अधिकारियों की लगन और मेहनत का बहुत बड़ा योगदान है। रेलमंत्री तथा रेल मंत्रालय के सोशल एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर प्रचार-प्रसार से सभी अच्छी तरह वाकिफ हैं, जिसे बहुत सराहा जाता है। विशेषकर प्रधानमंत्री द्वारा भी इन सभी की तारीफ की गई है।

यह सब रेलवे के जनसंपर्क अधिकारियों की देन है, जो कि अपना पूरा समय और जीवन भर रेलवे के लिए काम करते हैं तथा पूरी नौकरी के दरम्यान अपना घर-परिवार सब कुछ भूलकर भारतीय रेल के लिए प्रचार माध्यम पर दिन-रात कार्यरत रहते हैं। परंतु उन्हें अत्यंत मानसिक पीड़ाओं एवं जिल्लतों का सामना करना पड़ता है। यह बात मीडिया सहित शायद रेल प्रशासन और रेलमंत्री के संज्ञान में नहीं है।

जनसंपर्क अधिकारी, जो कि ग्रुप ‘बी’ में आते हैं, भारतीय रेल के अधिकारी होने के बाबजूद रेलवे ने आज तक इनके लिए कुछ नहीं किया। विडंबना यह है कि आज तक इन अधिकारियों का एक कैडर भी नहीं बनाया जा सका है, जिससे कि उन्हें नौकरी के दौरान यथोचित पदोन्नति मिल पाती। सब जानते हैं कि रेलवे में सभी विभागों के अधिकारियों का अपना कैडर है, यहां तक कि राजभाषा एवं आईटी विभाग के ग्रुप ‘बी’ अधिकारी भी 15 से 17 सालों में, उप मुख्य राजभाषा अधिकारी तथा सीनियर ईडीपीएम तक बन रहे हैं।

अधिकांश जनसंपर्क अधिकारी, जिन्होंने 20 से 22 वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया है, उन्हें अभी तक ग्रुप ‘ए’ का दर्जा तक नसीब नहीं हो पाया है। जब उन्हें ग्रुप ‘ए’ ही नहीं मिल पाता, तो प्रमोशन मिलने का सवाल ही पैदा नहीं होता। इसीलिए कोई भी जनसंपर्क अधिकारी, मुख्य जनसंपर्क अधिकारी नहीं बन पाता। सिर्फ कुछ गिने-चुने लोगों को सीनियर स्केल में, वह भी एडहॉक, पदोन्नति मिल पाई है।

वहीं इसके विपरीत भारतीय रेल के सभी जोनों तथा उत्पादन इकाईयों के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी, जिनका जनसंपर्क से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं, जैसे कि ट्रैफिक सर्विस, स्टोर्स सर्विस, इलेक्ट्रिकल एवं मैकेनिकल सर्विस के अधिकारियों को मुख्य जनसंपर्क अधिकारी में पदस्थापित किया जाता है और उनके हिसाब से रेलवे का जनसंपर्क विभाग कार्य करता है।

यहां यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह अधिकारी जिसने कभी भी जर्नलिज्म, मास मीडिया एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं पढ़ी, वह उन जनसंपर्क अधिकारीयों को, जिन्होंने यह सब पढ़ा-कढ़ा होता है और इसकी डिप्लोमा-डिग्री भी ली हुई होती है, उन्हें वे जनसंपर्क का पाठ पढ़ाते हैं और निर्देश देते हुए कहते हैं कि “आप लोगों को कुछ नहीं आता! जो हम बोल रहे हैं, वही करिए!” इससे रेलवे के जनसंपर्क विभाग और अधिकारियों का मनोबल रसातल में चला जाता है।

इन विषम परिस्थितियों में भी जनसंपर्क अधिकारी  निष्काम भाव से रेलवे की छवि बनाता है और अपना काम यथासंभव सुचारू रूप से करने का प्रयास करता रहता है। माना कि कुछ जनसंपर्क अधिकारी आजकल के सोशल मीडिया प्रचार के आदी नहीं हैं, लेकिन वे इन सभी को पूरी तरह से सीख कर आधुनिक प्रजन्म के टूल्स अपनाते हुए रात-दिन लगे हुए हैं।

लेकिन जब कोई काम बिगड़ता है, अथवा जाने-अनजाने कहीं कोई गलती होती है, तो इन्हीं जनसंपर्क अधिकारियों को बोला जाता है कि “डैमेज कंट्रोल करो।” वाह, क्या नियम-कानून है रेलवे का। जब अच्छा होता है, तो मुख्य जनसंपर्क अधिकारी अच्छा और काबिल है! और अगर बिगड़ता है या कुछ खराब होता है, तो जनसंपर्क अधिकारी नालायक एवं निकम्मा है। इससे यह उजागर होता है कि रेलवे में जनसंपर्क विभाग कैसे कार्यरत है।

यहां एक उदाहरण देखें, हाल ही में एक मंडल में पहली श्रमिक स्पेशल ट्रेन के संचालन की योजना बनी। इसके लिए जो प्रेस विज्ञप्ति तैयार की गई उसमें संबंधित जोन के जीएम और मंडल के डीआरएम सहित सभी संबंधित ब्रांच अधिकारियों के योगदान और प्रयासों को समाहित किया गया। इस विज्ञप्ति को संबंधित ग्रुप ‘ए’ ब्रांच अधिकारी ने ‘ओके’ भी कर दिया।

जब यह विज्ञप्ति प्रेस को भेजी जाने वाली थी, तभी किसी चापलूस रेलकर्मी ने उक्त मंडल के एक प्रभावशाली नेता, जो कि सरकार में उच्च सम्मानित पद पर हैं और उस समय वह उक्त मंडल स्थित अपने आवास पर भी नहीं, बल्कि दिल्ली में थे, जिनका उक्त ट्रेन के चलने से दूर-दूर तक कोई प्रयास या सरोकार नहीं था, के कार्यालय को वह विज्ञप्ति फारवर्ड कर दी। नेता जी के कार्यालय से तुरंत डीआरएम और जीएम को फोन आ गया कि उनके नाम और योगदान का उल्लेख किए बिना ऐसी विज्ञप्ति जिसने बनाने की हिम्मत की है, उसे तुरंत निलंबित करके मेजर पेनाल्टी चार्जशीट दी जाए।

अब सभी अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। वह ग्रुप ‘ए’ अधिकारी महाशय, जिन्होंने उक्त विज्ञप्ति को ‘ओके’ किया था, अपनी बात से फौरन मुकर गए और सारा दोष विज्ञप्ति बनाने वाले जनसंपर्क कर्मचारी पर मढ़ दिया। परिणामस्वरूप उक्त कर्मचारी को मेजर पेनाल्टी चार्जशीट देने का आदेश हो गया और इसकी फीडबैक नेता जी के कार्यालय को देकर अपनी-अपनी खाल बचाई गई। रीढ़विहीन रेल प्रशासन का यह एक छोटा सा उदाहरण है, जबकि ऐसी रीढ़हीनता के ऐसे सैकड़ों-हजारों उदाहरण रेलवे में भरे पड़े हैं।

अब अगर रेलवे बोर्ड की ही बात करें, तो अन्य विभागों के ग्रुप ‘ए’ अधिकारी ही जनसंपर्क का पूरा कार्य देख रहे हैं। बोर्ड में इंफर्मेशन सर्विस के रिटायर्ड अधिकारियों को रखा गया है, जिससे कि उनकी कुछ न कुछ रोजी-रोटी चलती रहे। भारतीय रेल की जोनल रेलों तथा उत्पादन इकाईयों में पहले से ही जनसंपर्क विभाग है तथा बड़ी सरलता एवं सहजता से प्रचार-प्रसार का कार्य हो रहा है। उनके यहां से रोज-रोज प्रेस विज्ञप्ति तथा अन्य प्रचार का कार्य जोर-शोर से चलता रहता है।

परंतु रेलवे बोर्ड के अकुशल मीडिया मैनेजरों द्वारा सभी जोनल एवं उत्पादन इकाईयों के जनसंपर्क अधिकारियों को निर्देश दिए जाते हैं कि वे उनके द्वारा बताए गए तरीकों पर प्रचार करें तथा अपनी डेली रिपोर्ट भेजें, जिसे वे मंत्रीजी को पेश करेंगे। सोशल मीडिया पर रोज टविट् और रीट्विट् करने को कहा जाता है। लेकिन यह सब वह रेलवे बोर्ड से नहीं कर सकते। मतलब यह कि काम दूसरे लोग करें और रेलवे बोर्ड में बैठकर यह तथाकथित मीडिया मैनेजर उसका क्रेडिट लेते रहें। रेलवे बोर्ड में मीडिया मैनेजर बनकर ऐसे लोग प्राइवेट एजेंसीज द्वारा काम चलाकर अपना नाम कमा रहे हैं। उनका रेलवे की छवि और प्रचार-प्रसार से कोई लेना-देना नहीं है। सिर्फ एजेंसियों को देखना है कि किससे कितना फायदा होगा, बस उसी से काम करवाना है।

बिगड़ा हुआ है रेलवे बोर्ड जनसंपर्क का पूरा तंत्र

जनसंपर्क अधिकारियों ने अपनी पदोन्नति के लिए क्या नहीं किया। कैट में केस किया, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक गए। वहां से सभी निर्णय उनके पक्ष में भी आए। परंतु रेलवे बोर्ड के अधिकारियों और तथाकथित मीडिया मैनेजरों को यह बात बर्दास्त नहीं हुई। कुछ जनसंपर्क अधिकारियों को किसी न किसी बहाने इसके लिए दंडित भी किया गया कि उन्होंने केस क्यों किया। कुछ को प्रमोशन दिया, परंतु चार्ज लेने नहीं दिया गया। उनके रिटायरमेंट का इंतजार किया गया।

कुछ वर्ष पहले सारे जनसंपर्क अधिकारियों को ट्रैफिक सर्विस के साथ मर्ज किया गया था। इसके लिए रेलवे बोर्ड स्तर पर तत्कालीन एएम/कमर्शियल आर. डी. शर्मा की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन भी किया गया था। इस कमेटी ने मर्जर की सभी मॉडेलिटीज और सेलेक्शन प्रोसेस भी तैयार करके अपनी रिपोर्ट मर्जर के पक्ष में दाखिल की थी। परंतु ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों के जोनल संगठनों से ही शिकायत करवाकर इसके केंद्रीय संगठन द्वारा इस मर्जर को रुकवा दिया गया, जिसमें इसके होनहार अध्यक्ष एवं महामंत्री की देन से सभी विभागों के ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों के लिए प्रमोशन के लिए संग्राम होता है। परंतु जनसंपर्क अधिकारियों के लिए नहीं।

विडंबना यह है कि जो ग्रुप ‘सी’ कर्मचारी 1998 में ग्रुप ‘बी’ अधिकारी बने थे, वह आज की तारीख में सेलेक्शन ग्रेड के ग्रुप ‘ए’ अधिकारी बने हुए हैं। ट्रैफिक वालों को 15/18 सालों में, स्टोर्स वालों को 16/17 सालों में, एकाउंट्स वालों को 18 सालों में, इलेक्ट्रिकल वालों को 15 सालों में तथा मैकेनिकल वालों को 15 सालों में ग्रुप ‘ए’ मिल जाता है। रेलवे में यह कितनी बड़ी विडंबना और विसंगति है कि जहां खलासी/हेल्पर से चतुर्थ श्रेणी में भर्ती हुआ कोई कर्मचारी अपने पैसे और पहुंच के बल पर देखते-देखते सेलेक्शन ग्रेड और सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड (एसएजी) तक पहुंच जाता है, वहीं जनसंपर्क अधिकारियों को बीस-पच्चीस सालों तक सीनियर स्केल तक भी नसीब नहीं हो पाता!

यदि देखा जाए तो रेलवे में लगभग 50/60 ही ग्रुप ‘बी’ के जनसंपर्क अधिकारी होंगे। पीयूष गोयल के रेलमंत्री बनकर आने के बाद से रेलवे की कार्य प्रणाली में काफी बदलाव हुए हैं। एक ओर कैडर रिस्ट्रक्चरिंग की बात हो रही है, तो दूसरी ओर सभी अधिकारियों और कर्मचारियों के हित के लिए रेलवे में मूलभूत परिवर्तन किए जा रहे हैं। लेकिन रेलवे बोर्ड में बैठे महानुभाव लोग सिर्फ जनसंपर्क अधिकारियों का शोषण कर रहे हैं और बदले में पूरे के पूरे जनसंपर्क अधिकारियों की जमात को एक सिरे से खत्म करने की जुगत भिड़ा रहे हैं।

इसका मूलभूत कारण यह समझ में आता है कि कैडर रिस्ट्रक्चरिंग होने के बाद से नीचे के अधिकारियों के पद कम हो गए और ऊपर के अधिकारियों के पद ज्यादा बना लिए गए हैं। ऊपर में अधिकारियों के पास कोई काम नहीं होता, सिर्फ पद होता है। इसीलिए उनको दूसरों का काम करने की चाहत जागती है। ऐसे अधिकारी, जो अपने कैडर में किसी काम के लायक नहीं रहते, उन्हें दूसरे के काम ज्यादा लुभावने लगते हैं। ऐसे में बड़े अधिकारियों की सिफारिश पर अपने लिए मुख्य जनसंपर्क अधिकारी का पद प्राप्त करते हैं और मीडिया में रहने के लिए पहले से कार्यरत जनसंपर्क अधिकारियों का शोषण करने में जुट जाते हैं।

यही हाल रेलवे बोर्ड का भी है। दिल्ली में स्टूल-पोस्टिंग तक लेने के लिए और किसी भी पद पर कार्य करने की तैयारी दर्शाकर सिफारिश कराई जाती है। इसीलिए मक्खियां मारते बैठे हैं 5/6 साल से कुछ लोग। कुछ तो रिटायरमेंट के बाद भी बकायदा अपनी रोटी सेंक रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि उनको रेलवे बोर्ड में बैठकर उन्हें सिर्फ अपना ही उल्लू सीधा करना है। वर्षों से शोषित-पीड़ित जनसंपर्क अधिकारियों के कैरियर और भविष्य की उन्हें कोई चिंता नहीं है।

जोनल रेलों में सभी मुख्य जनसंपर्क अधिकारी तथा उत्पादन इकाईयों में कार्यरत जनसंपर्क अधिकारी, उप महाप्रबंधक या महाप्रबंधक के सचिव, जो कि डिफेक्टो मुख्य जनसंपर्क अधिकारी ही होते हैं, ये सब मिलकर बोर्ड में बैठे मीडिया मैनेजरों के साथ मुख्य धारा से जुड़े रहते हैं और रेलवे के विचार को प्रवक्ता के हिसाब से मीडिया में संप्रेषित करते हैं। इससे वे मीडिया में लगातार बने रहते हैं। शायद यही आकर्षण उन्हें मुख्य जनसंपर्क अधिकारी बनने के लिए प्रेरित करता है।

उपरोक्त तमाम तथ्यों से यह पता चलता है कि इन्हीं सब कारणों से भारतीय रेल में कार्यरत ग्रुप ‘बी’ जनसंपर्क अधिकारियों में भारी रोष व्याप्त है, जिनको उनका वाजिब हक आज तक नहीं दिया गया है। भारतीय रेल में कार्यरत सभी अधिकारियों में अगर कोई सबसे उपेक्षित, शोषित और पीड़ित वर्ग है, तो वह जनसंपर्क अधिकारी का है, जो गिनती में बमुश्किल 50 या 60 ही होंगे। परंतु पूरी भारतीय रेल के प्रचार-प्रसार की बागडोर को बखूबी संभाले हुए हैं। मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (ग्रुप ‘ए’) तो भिन्न कैडर से और भिन्न प्रकार से आते हैं तथा दो-तीन वर्षों में चले जाते हैं। परंतु जनसंपर्क अधिकारी जोनल रेलों तथा उत्पादन इकाईयों में जनसंपर्क का कार्य लगातार निभाते रहते हैं।

उम्मीद की जाती है कि रेलमंत्री एवं अध्यक्ष, रेलवे बोर्ड, अपना कुछ कीमती समय निकालकर रेलवे में कार्यरत जनसंपर्क अधिकारियों की फजीहत को थोड़ा समझेंगे और इस भारी विसंगति का निवारण करने का यथोचित प्रयास करेंगे। 





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उत्तर मध्य रेलवे मुख्‍यालय में क्षेत्रीय राजभाषा कार्यान्‍वयन समिति की बैठक संपन्‍न

सभी विभागों, मंडलों और कारखानों द्वारा ई-आफिस में उपलब्ध हिंदी में कार्य करने की सुविधा को विकल्प नहीं, बल्कि संकल्प के तौर पर प्रयोग किया जाए -महाप्रबंधक

प्रयागराज ब्यूरो : महाप्रबंधक/उत्‍तर मध्‍य रेलवे राजीव चौधरी की अध्‍यक्षता में क्षेत्रीय राजभाषा कार्यान्‍वयन समिति की बैठक संपन्‍न हुई। इस ऑनलाइन बैठक में शामिल अधिकारियों को संबोधित करते हुए महाप्रबंधक चौधरी ने कहा कि राजभाषा की परंपरागत बैठक और उसमें होने वाली प्रत्यक्ष चर्चाओं और विचार-विमर्श का विशिष्ट महत्व है, लेकिन कोरोना वैश्विक महामारी के कारण प्रत्यक्ष सामूहिक बैठकों और कार्य-पद्धतियों में जो बदलाव आया है, उससे कार्य-प्रणाली में भी महत्वपूर्ण बदलाव आएगा।

उन्‍होंने कहा कि उत्तर मध्य रेलवे ने इन अत्यंत विषम परिस्थितियों में पूरी मुस्तैदी, समर्पण और निष्ठा के साथ गाड़ियों के संचालन की गतिशीलता बनाए रखी है और हमारे रेलकर्मी कोरोना वायरस की इस महामारी के विरुद्ध योद्धा की भूमिका निभा रहे हैं। इस दौरान सभी वीडियो संदेश और निर्देश हिंदी में ही जारी किए हैं। चिकित्सा, जनसंपर्क एवं अन्य विभागों द्वारा कोविड-19 से बचाव और रोकथाम के लिए जारी पोस्टर, दिशानिर्देश और सूचनाएं हिंदी में तैयार की गईं हैं।

महाप्रबंधक ने कहा कि महामारी के दौरान कार्यालयों में ई-आफिस का प्रयोग किया जा रहा है। ई-आफिस में हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का विकल्प है। उन्होनें सभी विभागों, मंडलों और कारखानों को ई-आफिस में उपलब्ध हिंदी में कार्य करने की सुविधा का, विकल्प नहीं, बल्कि संकल्प के तौर पर प्रयोग करने के निर्देश दिए, साथ ही इसमें हिंदी के मानक यूनिकोड, मंगल फांट का ही प्रयोग करने का सुझाव दिया।

बैठक में भारतीय भाषा, संस्कृति और साहित्य के उन्नायक गोस्वामी तुलसीदास तथा उपन्यास एवं कहानी सम्राट प्रेमचंद की जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित साहित्यिक संगोष्ठी में अपने विचार व्यक्त करते हुए महाप्रबंधक राजीव चौधरी ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास और प्रेमचंद के साहित्य मानवता एवं उच्चादर्शों का संदेश देते हैं। ये दोनों ही महामानव ऐसे साहित्य सर्जक हैं, जिनकी रचनाएं कठिन और प्रतिकूल परिस्थितियों में उम्मीद की रोशनी दिखाती हैं तथा व्यक्ति और समाज का सम्यक पथ प्रदर्शन करती हैं। बैठक के प्रारंभ में महाप्रबंधक द्वारा गोस्‍वामी तुलसीदास और मुंशी प्रेमचंद के चित्र पर माल्‍यार्पण किया गया।

बैठक के प्रारंभ में मुख्‍य राजभाषा अधिकारी एवं प्रधान मुख्‍य वाणिज्‍य प्रबंधक महेन्‍द्र नाथ ओझा ने समिति को अवगत कराया कि प्रयागराज में आयोजित माघ मेला के दौरान मेला क्षेत्र में स्थित उत्‍तर मध्‍य रेलवे के शिविर में राजभाषा के प्रयोग-प्रसार तथा महात्‍मा गांधी के जीवन दर्शन एवं प्रेरक विचारों से संबंधित चित्र प्रदर्शनी लगाई गई। पिछली तिमाहियों में छह हिंदी कार्यशालाएं आयोजित की गईं और कंप्‍यूटर हिंदी कुंजीयन प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवधि के दौरान कई प्रसिद्ध साहित्‍यकारों की जयंतियों के अवसर पर साहित्यिक संगोष्ठियों का भी आयोजन किया गया।

मुख्‍य राजभाषा अधिकारी एम. एन. ओझा ने गोस्‍वामी तुलसीदास और मुंशी प्रेमचंद के साहित्‍य के महत्वपूर्ण पक्षों पर चर्चा करते हुए कहा कि गोस्‍वामी तुलसीदास भारतीय साहित्य के संरक्षक थे और उन्होने जन-जन के हदय में राष्ट्र गौरव एवं राष्ट्रीय अस्मिता की पावन भावना का संभरण किया। उन्होंने कहा कि तुलसीदास के रामराज्य में किसी भी प्रकार के दैहिक, दैविक एवं भौतिक संतापो और बाधाओं की व्‍याप्ति नहीं होती। रामराज्‍य की परिकल्‍पना नैतिक मूल्‍यों और सामाजिक मानदंडों से अनुप्राणित है।

ओझा ने कहा कि प्रेमचंद पहले वास्‍तविक कथा सम्राट हैं, क्‍योंकि इसके पूर्व तिलस्‍मी और ऐयारी प्रधान कथा साहित्‍य ही रचे जाते थे। प्रेमचंद का कथा साहित्‍य आदर्श से यथार्थ की ओर प्रस्‍थान का साहित्‍य है। प्रेमचंद का मानना था कि साहित्यिक सौंदर्य चेतना की कसौटी को बदलना चाहिए और साहित्‍यकारों को श्रम के स्‍वेद की महत्‍ता पर अपनी लेखनी चलानी चाहिए। ओझा के अनुसार तुलसीदास और प्रेमचंद दोनों का साहित्‍य अन्‍याय और अत्‍याचार के वि‍रुद्ध उठाई गई सशक्‍त आवाज है।

बैठक में अपर महाप्रबंधक रंजन यादव सहित सभी प्रधान विभाग प्रमुख, मंडलों के अपर मंडल रेल प्रबंधक, कारखानों के मुख्‍य कारखाना प्रबंधकों एवं अन्‍य सदस्‍य अधिकारियों ने वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से भाग लिया। सभी अधिकारियों ने अपने-अपने कार्यालयों में हो रही राजभाषा प्रगति से महाप्रबंधक को अवगत कराया। बैठक का संचालन वरिष्‍ठ राजभाषा अधिकारी चंद्रभूषण पांडेय ने किया तथा उप मुख्‍य राजभाषा अधिकारी शैलेंद्र कुमार सिंह ने धन्‍यवाद ज्ञापित किया।





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रेलवे बोर्ड के आदेश ताक पर ! – RailSamachar

संपूर्ण विषय पर समावेशक आदेश जारी करने में रेलवे बोर्ड भी करता है कोताही

सुरेश त्रिपाठी

रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) द्वारा कोविड-19 सुरक्षा और अनावश्यक स्टाफ कॉस्ट को कम करने के उद्देश्य से जोनल रेलों/उत्पादन इकाईयों के स्तर पर री-एंगेज्ड स्टाफ को हटाने में की जा रही हीलाहवाली को देखते हुए 10 जुलाई 2020 को एक पत्र {सं. ई(एनजी)2/2007/आरसी-4/कोर/1(पीटी.)} जारी करके स्पष्ट आदेश जारी किया गया था कि अपवाद स्वरूप किसी रेयर मामले में, वह भी सिर्फ सेफ्टी से संबंधित यदि अत्यंत आवश्यक हो तो ही किसी को छोड़कर, बाकी सभी ग्रुप ‘सी’ री-एंगेज्ड स्टाफ की सेवाएं तुरंत प्रभाव से समाप्त कर दी जाएं। लेकिन एक बार फिर कुछ जोनों/मंडलों द्वारा रेलवे बोर्ड के इस आदेश को ताक पर रख दिया गया है।

नियमों और रेलवे बोर्ड के दिशा-निर्देशों को खासतौर पर दरकिनार करने के लिए मशहूर कुछ जोनल रेलों में फिर यही खेल किया गया है, जहां कुछ री-एंगेज स्टाफ को तो कार्य मुक्त कर दिया गया, परंतु वहीं कुछ लोगों को मुक्त न करके किसी न किसी बहाने उनकी कथित सेवाएं जारी रखी जा रही हैं।

उपरोक्त पत्र में रेलवे बोर्ड ने सिर्फ ग्रुप ‘सी’ के री-एंगेज्ड स्टाफ को हटाने की बात कही है। परंतु इसमें ग्रुप ‘बी’ स्तर पर री-एंगेज्ड किए गए अधिकारियों के संबंध में कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिया है। जबकि कुछ जोनल रेलों द्वारा इन री-एंगेज्ड अधिकारियों की तथाकथित सेवाएं लगातार जारी रखी गई हैं और उन्हें पिछले लगभग चार माह से जारी लॉकडाउन में बैठे-बिठाए वेतन भुगतान किया जा रहा है। क्या इस तरह होती कास्ट कटिंग (मितव्यता)?

संबंधित जोनों/मंडलों के इस भेदभाव और पक्षपातपूर्ण व्यवहार का प्रभावित री-एंगेज स्टाफ विरोध कर रहा है और कोर्ट में जाने की संभावना तलाश रहा है। इन सभी का कहना है कि यदि सुरक्षा की दृष्टि से उनकी सेवाएं टर्मिनेट की गई हैं, तो बाकी स्टाफ की सेवाएं क्यों नहीं समाप्त की गईं? क्या वह लोग रेलवे बोर्ड के निर्देश के अनुसार आवश्यक सेफ्टी कैटेगरी में आते हैं?

प्राप्त जानकारी के अनुसार न सिर्फ रेलवे बोर्ड को, बल्कि जोनल प्रधान कार्यालयों को भी इस मामले में अंधेरे में रखकर कुछ मंडलों द्वारा दिग्भ्रमित किया जा रहा है। यहीं सिस्टम की खामी उजागर हो जाती है।

एक तरफ बोर्ड के आदेश के अनुपालन में कोताही की जा रही है, तो दूसरी तरफ रेलवे बोर्ड सहित जोनल मुख्यालयों को भी गुमराह किया जा रहा है। क्या जोनल अथवा मंडल अधिकारियों को रेल मंत्रालय, महाप्रबंधक और डीआरएम का तनिक भी भय नहीं रह गया है, जो उनके आदेशों पर भी छल-कपट करके उन्हें दिग्भ्रमित कर रहे हैं?

क्या रेल प्रशासन इसका खुलासा करेगा कि जिन री-एंगेज्ड लोगों की सेवाएं समाप्त नहीं की गई हैं, वह कौन सी सेफ्टी कैटेगरी में आते हैं?

अब जहां तक टर्मिनेट किए गए री-एंगेज्ड स्टाफ की बात है, तो उनमें प्रशासन द्वारा किए गए इस भेदभाव और पक्षपात के कारण भारी रोष व्याप्त है। प्रशासन की इस भेदभावपूर्ण नीति को लेकर वह मामले को पीएमओ और कोर्ट तक ले जाने की बात कह रहे हैं। उनका कहना है कि जब बात सुरक्षा की है, तब सभी री-एंगेज्ड स्टाफ को हटाया जाना चाहिए, लेकिन भेदभावपूर्ण नीति के कारण अब वे इस मामले को उच्च स्तर पर ले जाएंगे।

प्रश्न ये उठता है कि क्या रेलवे बोर्ड द्वारा दिए गए निर्देशों को कोई मंडल अथवा जोन अपने मन-मुताबिक बदल सकता है या उसमें कोई हेर-फेर कर सकता है?

कोरोना महामारी के फैलने के कारण वर्तमान में वैसे भी ट्रेन संचालन मात्र 10 प्रतिशत ही हो रहा है और निकट भविष्य में फुल कैपेसिटी से सभी ट्रेनों का संचालन हो पाना फिलहाल मुश्किल ही लग रहा है। इसलिए इस समय अनावश्यक खर्चों पर रोक लगाते हुए किसी भी विभाग में किसी भी स्तर पर री-एंगेज्ड स्टाफ रहना ही नहीं चाहिए। रेलवे बोर्ड को इस विषय पर स्पष्ट निर्देश जारी करना चाहिए।





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क्या कारण है कि सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे में ही बनते हैं!

आखिर रेलवे बोर्ड के आईआई ही ज्यादा भ्रष्ट, निरंकुश और उत्पाती क्यों होते हैं?

सुरेश त्रिपाठी

रेलवे बोर्ड विजिलेंस ने “आरबी गैंग” के तीनों इंवेस्टीगेशन इंस्पेक्टर (आईआई) को रेलवे बोर्ड से मुक्ति के समसंख्यक आदेश (पत्र सं. 2020/ईआरबी-2/20/1) उसी दिन शुक्रवार, 17 जुलाई 2020 को दोपहर बाद  जीएम/कार्मिक, उत्तर रेलवे के लिए जारी कर दिए गए थे। अब जो अधिकारी इन तीनों कुख्यात आईआई को रेलवे बोर्ड में बनाए रखने की अभी भी पैरवी कर रहे हैं, उनको या तो यह पता नहीं है कि फील्ड में इन्होंने अपने साथ ही उनका भी नाम चर्चित कर रखा है, या फिर उनकी भी कोई मजबूरी है!

क्या बात है कि रेलवे बोर्ड के आईआई ही इतने ज्यादा भ्रष्ट, निरंकुश और उत्पाती होते हैं? “बिना ऊपर की शह और इशारे के ये तो हो ही नहीं सकता है” (अपनी सफाई में तो ये लोग फील्ड में यही कहते फिरते हैं)। इसका कारण खोजने पर जबाब आसानी से मिल जाएगा।

बहरहाल शनिवार, 18 जुलाई को “देर आए, दुरुस्त आए!“ शीर्षक से इन तीनों आईआई को रेलवे बोर्ड विजिलेंस से निकाले जाने की खबर “रेलसमाचार.कॉम” में और रविवार, 19 जुलाई को “कानाफूसी.कॉम” में “रेलवे विजिलेंस का आंख खोल देने वाला सच“ शीर्षक से प्रकाशित होने के बाद से सैकड़ों-हजारों रेलकर्मियों, अधिकारियों, जिसमें रिटायर्ड भी शामिल हैं और साथ ही आईआई का एग्जाम दे चुके कैंडिडेट भी, ने सत्यता उजागर करने पर “रेलसमाचार” का धन्यवाद करते हुए पीईडी/विजिलेंस/रे.बो. के इस आवश्यक कदम की सराहना की है और हर विभाग के कर्मचारी तथा अधिकारी लगातार कई विजिलेंस इंस्पेक्टरों/अधिकारियों की पोल खोलने वाली तथ्यात्मक बातें विभिन्न माध्यमों से साझा कर रहे हैं।

रेलवे बोर्ड और रेलवे बोर्ड विजिलेंस में काम कर चुके कुछ लोगों का तो सबूत के साथ यह भी कहना है कि अगर पिछले कुछ सालों की विजिलेंस फाइलों और मामलों की गहराई से विस्तृत ऑडिट तथा गहन जांच कराई जाए, तो सरकार रेलवे विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन को बंद करना ही पसंद करेगी।

विजिलेंस की आड़ में अब तक जितने भी रेलकर्मियों तथा अधिकारियों के साथ भ्रष्ट और अनैतिक तरीके से अनाचार, अत्याचार, शोषण, उत्पीड़न हुआ है, उसे देखकर तो “आईएसआईएस” भी शर्मशार हो जाएगा और शायद विजिलेंस के इन इंस्पेक्टरों और अधिकारियों में अपने सबसे योग्यतम उम्मीदवार भी मिल जाएंगे।

यह अलग बात है कि सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे कर्मचारियों, अधिकारियों के ही खिलाफ होते हैं। देश के सारे मंत्रालय और सारे पीएसयू को मिलाकर भी सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे में ही बनते हैं। तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि रेलवे ही देश की सबसे भ्रष्टतम संस्था है?

जो लोग रेलवे फील्ड में काम करते हैं और फील्ड में काम करने का लंबा अनुभव रखते हैं, और जो लोग अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण 40-40 साल अपना अमूल्य योगदान देकर रेलवे से रिटायर हो चुके हैं, उनका कहना है कि “ऐसा बिल्कुल नहीं है। वस्तुतः विजिलेंस के लिए वहीं केस होता है, जहां भ्रष्टचार का स्पष्ट मामला हो और जहां उद्देश्य (इंटेंशन) भी स्पष्ट हो। क्योंकि फील्ड में कार्य बहुत सी चीजों पर निर्भर करता है और टाइम फैक्टर बहुत महत्वपूर्ण होता है। अतः फील्ड कर्मचारी, अधिकारी भले ही निर्धारित पॉलिसी का शब्दशः अनुपालन न करें, लेकिन वे रेल हित से कोई समझौता नहीं करते हैं।”

वैसे भी यह एक सर्वज्ञात तथ्य है कि सबसे बड़ा खेल पॉलिसी बनाने में ही होता है, जिस पर किसी विजिलेंस वाले ने रेलवे में अब तक शायद ही कभी कोई केस बनाया होगा। कुछ विभागों में पालिसी बनाई ही इस तरह से जाती है कि रामचरितमानस की चौपाई की तरह उसका कोई भी अपने बुद्धिविलास से किसी भी तरह की व्याख्या कर सकता है, खासकर वाणिज्य, कार्मिक और लेखा विभाग की पॉलिसियां इस बात का उदाहरण हैं।

ऐसे में यदि हरिश्चंद्र भी रेलवे विभाग में काम कर रहे होंगे, तो बहुत अच्छे से कोई इसी माफिया तंत्र के अनुभव का फायदा उठाकर कंप्लेंट कर देगा, तब उनको भी अपनी नौकरी बचाने के लाले पड़ जाएंगे। यही कारण है कि रेलवे में सिर्फ वही कर्मचारी-अधिकारी विजिलेंस केस में ज्यादा फंसते हैं, जो ज्यादा तेजतर्रार और रिजल्ट ओरिएंटेड तथा ईमानदार मनसा वाले होते हैं, जिन्हें दुनियादारी कम, अपना काम ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है।

क्या कोई बता सकता है कि आज तक रेलवे में महाघाघ लोग कभी विजिलेंस के द्वारा पकड़े गए हैं? जिनके लिए काम नहीं, दाम ज्यादा महत्वपूर्ण रहा है, क्या विजिलेंस ने कभी उनको पकड़ा है? अथवा उन पर हाथ डालने की कभी हिमाकत की है? यदि ऐसा कोई घाघ पकड़ा गया है, तो उसे बाहरी एजेंसी (सीबीआई) ने ही पकड़ा है, लेकिन उसमें भी अधिकांश लोग बचकर निकल जाते हैं और जो सीधा रहता है, वही पिसता है। कारण इसके कई हैं, लेकिन एक सबसे बड़ा कारण विजिलेंस में महाघाघ और महाभ्रष्ट इंस्पेक्टरों और अधिकारियों का वर्चस्व होना है। यही है रेलवे विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन की असलियत।

दूसरे मंत्रालयों में यदि सीधे-सीधे करप्शन का मामला नहीं होता है, तो वहां केस नहीं बनता, और न ही जलेबी जैसा घुमाया जाता है। लेकिन रेलवे में महाभ्रष्टों ने अपने को ईमानदार साबित करने का सबसे आसान रास्ता चुना है – दूसरे को बेईमान और भ्रष्ट साबित करने का!

यहां सीधा गणित है, जो जितनी ज्यादा संख्या में दूसरे को बेईमान बताएगा, वह यहां उतना ही बड़ा और ज्यादा ईमानदार माना जाएगा। अपनी खोट छिपाने के लिए और अपने अस्तित्व को न्यायोचित ठहराने के लिए वर्षों से रेलवे विजिलेंस यही कर रहा है।

एक बार यह समीक्षा हो जाए कि विजिलेंस की कार्यवाही से अब तक कितने भ्रष्ट कर्मचारी सही हुए हैं, अथवा सही रास्ते पर आ गए हैं और कितने ईमानदार तथा काम को वरीयता देने वाले कर्मचारियों/अधिकारियों का मनोबल बढ़ा है, विजिलेंस कार्यवाही के बाद कार्य की गति और गुणवत्ता दोनों बढ़ गई है, तब स्थिति एकदम स्पष्ट हो जाएगी। क्योंकि अगर भ्रष्ट आदमी पर कार्यवाही होगी और ईमानदार तथा काम को प्रधानता देने वाले उत्पीड़ित नहीं किए जाएंगे, तो रेलवे ऑर्गेनाइजेशन में काम की गति और गुणवत्ता अपने आप बहुत बढ़ जाएगी।

लेकिन क्या कोई रेल अधिकारी या कर्मचारी यह दावे के साथ कह सकता है कि उसे ये दोनों चीजें रेलवे में कहीं नजर आ रही हैं? जबकि यहां ईमानदार और काम करने वाले या तो हासिये पर डाल दिए गए हैं और पूरी तरह से हतोत्साहित हैं, या फिर किसी परेशानी में पड़ने के भय से उन्होंने निर्णय लेना ही छोड़ दिया है। और यह सब रेलवे विजिलेंस की देन है।

क्या किसी को पता है कि सीबीआई जिन अधिकारियों और कर्मचारियों को लाखों-करोड़ों की घूस लेते रंगेहाथ पकड़ती है, उनके ऊपर विजिलेंस ने क्या कभी कोई केस किया हुआ होता है? उनमें से किसी का भी नाम क्या “एग्रीड लिस्ट” अथवा “सीक्रेट लिस्ट” में भी डाला है? या किसी विजिलेंस वाले को, जो कार्यकाल के बीच में ही हटाया गया हो, क्या उसको इन दोनों लिस्टों में से किसी एक में आज तक कभी डाला गया है? इन सब सवालों का जबाब न में ही मिलेगा।

विजिलेंस माफिया और विभागों के बड़े माफिया मिलकर “एग्रीड लिस्ट” का इस्तेमाल कैसे ईमानदार या इनकी आंख में खटकने वाले अथवा इनके रास्ते के रोड़े बनने वाले कर्मचारी, अधिकारी को निपटाने में करते हैं? और “एग्रीड लिस्ट” को ये माफिया कैसे ब्रह्मास्त्र के रूप में इस्तेमाल करता है? जब ये माफिया हर तरह से प्रयास करके भी किसी ईमानदार कर्मचारी या अधिकारी को फंसाने में कामयाब नहीं हो पाता है, तब क्या करता है! इस पर विस्तार से आगे लिखा जाएगा। क्रमशः





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रास्ते में ऑक्सीजन खत्म होने से भायखला रेलवे अस्पताल पहूंचकर जूनियर क्रू कंट्रोलर की मौत

जूनियर सीसी की असामयिक मौत के लिए सीधे जिम्मेदार हैं कल्याण रेलवे अस्पताल के कार्यकारी सीएमएस और एसीएमएस-कोविड नोडल ऑफ़िसर

मुंबई : कल्याण रेलवे अस्पताल और अराजकता-मनमानी का चोली-दामन का संबंध रहा है, इस बात से कल्याण और आसपास रहने वाले लगभग दस हजार रेलकर्मी बखूबी वाकिफ हैं। इसी अराजकता और मनमानी के चलते एंबुलेंस में बिना जांचे-परखे रखे गए ऑक्सीजन सिलेंडर के रास्ते में खत्म हो जाने से एक जूनियर क्रू-कंट्रोलर की असमय मौत हो गई और कहीं कोई हलचल नहीं हुई। यही वजह है कि कल्याण रेलवे अस्पताल के कुछ डॉक्टरों की मनमानी और सनक लगातार बढ़ती जा रही है। क्रू-कंट्रोलर की इस असामयिक मौत पर सभी रेलकर्मियों में भारी आक्रोश है। मान्यताप्राप्त ज़ोनल रेल संगठन एनआरएमयू, सीआरएमएस, मध्य रेलवे एससी-एसटी रेलकर्मचारी संगठन और मध्य रेलवे ओबीसी रेलकर्मचारी संगठन ने अपने बोर्ड लगाकर मेडिकल विभाग की इस अक्षम्य लापरवाही पर रेल प्रशासन से अपना विरोध प्रकट किया है।

वर्तमान में कल्याण रेलवे अस्पताल के सीएमएस और एसीएमएस का चार्ज संभाल रहे दोनों डॉक्टर महातुनकमिजाज न सिर्फ माने जाते हैं, बल्कि वह वास्तव में ऐसे हैं भी! यह कहना है तमाम रेलकर्मियों का। उनका कहना है कि कल्याण रेलवे अस्पताल की एसीएमएस एवं कोविड की नोडल ऑफिसर की सनक वर्तमान में सातवें आसमान पर है। सुबह से शाम तक अकारण भोंकते रहना, पेशेंट्स को, उनके परिवार वालों को, संकट की घड़ी में मरहम लगाने के बजाय सबके सामने जी-भरकर कोसना, बेइज्जत करने वाला उनका व्यवहार अस्पताल को बूचड़खाने में तब्दील कर रहा है।

रेलकर्मियों का कहना है कि इन डॉक्टर साहिबा का मानना है कि वह जो सोचती हैं, केवल वही सही होता है। वह जो चाहती हैं, वैसा ही हर डॉक्टर, अस्पताल कर्मी, यूनियन पदाधिकारी और अधिकारी भी वैसा ही सोचें, समझें और करें भी। अस्पताल में जब डॉक्टर महोदया चलती हैं, या ऐसा कहना चाहिए कि विचरण करती हैं, तो वहां भर्ती मरीजों अथवा दवा लेने आए रेलकर्मियों की आंखों के सामने फिल्मों में विलेन की एंट्री जैसे अनेकों दृश्य घूम जाते हैं। इनके चीखते-चिल्लाते रहने से अस्पताल की शांति तो भंग होती ही है, बल्कि मरीज और उनके रिश्तेदार तनावग्रस्त हो जाते हैं, पर रेलकर्मी या उनके पारिवारिक सदस्य होने के नाते वह कुछ कह नहीं पाते। इसी बात का यह अहंमन्य डॉक्टर साहिबा तो भरपूर फायदा उठाती ही हैं, बल्कि अस्पताल के अन्य डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ भी इसी बात का भरपूर दोहन करता है।

उनका कहना है कि आए दिन कल्याण रेलवे अस्पताल के मेडिकल स्टोर में अनेकों जरूरी दवाओं का अभाव रहता है। हार्ट जैसी गंभीर बीमारियों में भी अनेकों चालू कंपनियों की, हर बार बदल-बदलकर तथा अलग-अलग पोटेंसी की दवाएं देना यहां की विशेषता है। रेलकर्मियों के मरने-जीने की इनको कतई कोई परवाह नहीं होती। जबकि दबंग यूनियन पदाधिकारियों और अधिकारियों को न सिर्फ ब्रांडेड कंपनी की हर दवा लोकल परचेज (एलपी) करके मुहैया कराई जाती है, बल्कि उनके सामने भीगी बिल्ली बनकर उनकी चापलूसी भी होती है।

उन्होंने बताया कि असामाजिक तत्वों से अस्पताल की सुरक्षा के लिए प्राइवेट सिक्योरिटी लगाई गई है, परंतु उसका भरपूर उपयोग यहां मरीजों और उनके पारिवारिक सदस्यों तथा अस्पताल आने वाले अन्य रेलकर्मियों को बेइज्जत करने और उनमें खौफ फैलाने के लिए ज्यादा किया जा रहा है। रेलकर्मियों का आरोप है कि उद्दंड सिक्योरिटी वाले अहंमन्य एसीएमएस के इशारे पर अस्पताल आने वालों के साथ ऐसी अभद्रता करते हैं जैसे कि उन्हें अस्पताल आने वाला हर रेलकर्मी असामाजिक तत्व नजर आता है, उनका यह दुर्व्यवहार और उनके द्वारा की जाने वाली अनावश्यक पूछताछ तथा टोका-टाकी कई बार असहनीय हो जाती है।

उन्होंने कहा कि अब कुछ महीनों से कोविड नामक ऐसा अवसर मिल गया है कि उसके नाम पर अस्पताल में दूसरे सारे इलाज, ऑपरेशन तथा अन्य गतिविधियां बंद पड़ी हैं। यहां कई महीनों से ओटी बंद है। आंखों के ऑपरेशन के लिए रेलकर्मी भटक रहे हैं। मोतियाबिंद के कारण मेडिकल में अटके लोग चुपचाप बाहर से अपना पैसा खर्च कर ऑपरेशन करवा रहे हैं, तब यहां के डॉक्टर उनको फिट कर रहे हैं। पर किसी के दिमाग में यह नहीं आ रहा है कि कर्मचारी को अपने पैसे से बाहर ऑपरेशन न करवाना पड़े, इसका कोई उपाय निकाला जाए।

कर्मचारी कहते हैं कि यहां पागलों जैसा काम चल रहा है, जैसे कि यह कोई मेंटल हॉस्पिटल हो। वास्तविक बीमारी का आदमी इधर-उधर भटक रहा है। यदि कोई हिम्मत करके अस्पताल पहुंच भी गया, तो पहले दो-तीन दिन उसकी कोविड के नाम पर ऐसी दुर्गति होती है कि बिना कोविड के ही उसके प्राण हलक में आ जाते हैं। सस्पेक्टेड कोविड मानकर 12-15 घंटे कल्याण में, फिर पांच से आठ संक्रमित मरीजों के साथ एक ही एंबुलेंस द्वारा मुंबई सेंट्रल स्थित पश्चिम रेलवे के जगजीवन राम अस्पताल (जेआरएच) के लिए भेज दिया जाता है। जहां दो-तीन घंटे एंबुलेंस में ही मरीजों को बैठे रहना पड़ता है।

दो-तीन घंटे बाद उन्हें बताया जाता है कि जेआरएच में बेड उपलब्ध नहीं है, इसलिए अब उनको मध्य रेलवे के भायखला रेलवे अस्पताल भेजा जा रहा है। फिर काफी इंतजार के बाद जैसे-तैसे उनको वार्ड में भर्ती किया जाता है और तब कोविड टेस्ट होता है। दो दिन बाद कोविड की रिपोर्ट यदि नेगेटिव आती है, तब फिर उस कर्मचारी को कल्याण रेलवे अस्पताल भगा दिया जाता है। इस तरह तीन-चार दिन तक एक बीमार आदमी (कर्मचारी) की जानवरों से भी बुरी फजीहत कोविड के नाम पर ही होती रहती है। इससे मरीज उसकी वास्तविक बीमारी ही भूल जाता है। ऐसी में कसाई के यहां बंधे बकरे जैसी हालत के चलते कर्मचारी किसी तरह अपनी जान छुड़ाकर भाग खड़ा होता है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार कल्याण रेलवे अस्पताल के 44 नंबर वार्ड में कोविड पॉजिटिव के लिए 5 बेड रखे गए हैं। वहां कभी कोई सफाई कर्मी ही नहीं रहता। पेशेंट के पारिवारिक सदस्य भी उपस्थित नहीं रह सकते, क्योंकि एसीएमएस किसी कटखनी बिल्ली जैसी गुर्राती रहती हैं। ऐसे में वहां भर्ती मरीज की कितनी फजीहत होती होगी, इसका अंदाजा कोई भी लगा सकता है।

अस्पताल के 44 नंबर वार्ड तक पहुंचने का रास्ता कोविड पेशेंट, मेडिसिन काउंटर, सिक-फिट काउंटर तथा लैब से होकर गुजरता है। अस्पताल में अन्य पेशेंट के साथ कोविड पेशेंट आने के कारण अस्पतालकर्मी भी संक्रमित होते जा रहे हैं। परंतु अस्पताल की एसीएमएस उर्फ नोडल ऑफिसर की सनक के चलते इसका ठोस उपाय उपलब्ध होने के बाद भी नहीं किया जा रहा है।

जानकारों के अनुसार यदि फ्लू ओपीडी, इंस्टीट्यूट के बैडमिंटन हॉल में बना दी जाए तो पेशेंट्स को अस्पताल के बाहर सड़क पर खुले आसमान के नीचे धूप बारिश में नहीं खड़ा होना पड़ेगा बल्कि वह पूर्ववत सीधे अस्पताल में जा पाएंगे। फ्लू ग्रस्त कर्मचारी बैडमिंटन हॉल में आकर आराम से बैठ सकता है। डॉक्टर के देखने के बाद यदि शंका है तो वहीं पर संबंधित दवा देकर उसे सीएचआई ऑफिस की तरफ से पीछे बने दरवाजे से ऑडिटोरियम में भेजा जा सकता है। इसके लिए अस्पताल के दूसरे माले पर स्थित 28 बेड के क्वारंटाइन वार्ड को तत्काल बंदकर ऑडिटोरियम तथा सर्जिकल वार्ड को कोविड वार्ड बना देना चाहिए जिससे कोविड पेशंट अस्पताल में रहकर भी सभी से अलग रह सकेंगे तथा अन्यत्र संक्रमण फैलने से रोका जा सकेगा।

परंतु यह सीधा तरीका सीएमएस कल्याण के दिमाग में नहीं आ रहा है। जबकि नोडल ऑफिसर की मनमानी के चलते यह सारी परेशानी हो रही है तथा बेसिर-पैर के कार्यों में कोविड फंड का गलत इस्तेमाल और दुरुपयोग हो रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि चूंकि यह रेलवे अस्पताल है, और मरीज भी रेल कर्मचारी अथवा उनके पारिवारिक सदस्य ही होते हैं, इसके चलते यहां सब कुछ सहन किया जा रहा है। उनकी इस सहनशीलता के चलते ही यहां के कुछ सनकी डॉक्टरों का सनकीपन बढ़ता जा रहा है। इनको मंडल चिकित्सालय में रखना रेलकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।

शुक्रवार, 10 जुलाई को कल्याण अप यार्ड में कार्यरत रहे जूनियर क्रू कंट्रोलर ओमप्रकाश सिंह, कोविड संक्रमित रेलकर्मी, ऑक्सीजन की कमी के चलते रेलवे अस्पताल में एडमिट हुआ था। 11 जुलाई को उसका कोविड सैंपल लिया गया तथा 12 जुलाई को उसे पॉजिटिव पाया गया था। अब 12 जुलाई की सुबह 11 बजे रिपोर्ट आने से लेकर 13 जुलाई को दोपहर बाद करीब 3 बजे तक ऑक्सीजन की कमी के पेशेंट को क्यों प्रतीक्षा में रखा गया? उसको 12 जुलाई को सुबह 11 बजे रिपोर्ट मिलने के तुरंत बाद जेआरएच या भायखला अस्पताल क्यों नहीं भेजा गया? यह तो अस्पताल की सनकी नोडल अधिकारी ही बता सकती हैं। जबकि 12 जुलाई को 5 पेशेंट जेआरएच भेजे गए थे, जो कि उससे बहुत कम खतरे में थे। तथापि यदि उसे इतना ही खतरा महसूस हो रहा था तो रेलवे से संबद्ध कल्याण के किसी प्राइवेट अस्पताल में उसे क्यों नहीं रेफर किया गया?

बताते हैं कि 13 जुलाई को दोपहर बाद जब इस पेशेंट को ऑक्सीजन के साथ, एक ही एंबुलेंस में छह लोगों को ठूंसकर, इस ऑक्सीजन लगे मरीज को भी बैठाकर, (क्योंकि एंबुलेंस में छह लोगों के बैठने के बाद किसी मरीज के लेटने की जगह ही नहीं रह सकती) भायखला के लिए रवाना किया गया था। मुलुंड तक पहुंचते-पहुंचते यानि मात्र 35 मिनट बाद ही ऑक्सीजन खत्म हो गई, तब दूसरे सभी पेशेंट, जो खुद पॉजिटिव थे, घबराकर सिलेंडर हिलाकर ऑक्सीजन निकालने का प्रयास करते रहे, और एंबुलेंस चालक 100 से भी अधिक की स्पीड से गाड़ी भगाकर बहुत जोखिमपूर्ण ड्राइविंग करते हुए शाम 4 बजे भायखला अस्पताल पहुंचा था। तब तक पेशेंट की हालत बेहद नाजुक हो चुकी थी, और सभी उपायों के बावजूद शाम 5.15 बजे यह रेलकर्मी असमय काल कवलित हो गया।

यह न सिर्फ अत्यंत अमानवीय कृत्य है, बल्कि डॉक्टरी पेशे को भी बहुत ज़्यादा शर्मशार करने वाला है? ऑक्सीजन आधा घंटे में ही कैसे खत्म हो गई? ऐसा ऑक्सीजन सिलेंडर एंबुलेंस में रखा ही क्यों गया? क्या उक्त रेलकर्मी से कोई जातीय दुश्मनी थी? नोडल ऑफिसर की मनमर्जी, खौफ तथा उनके द्वारा की जाने वाली बेइज्जती के चलते अस्पताल के कर्मचारी भी किंकर्तव्यविमूढ़ होते जा रहे हैं। जो कर्मी जिंदगी-मौत से जूझ रहा था, उसको बिना लेटे अन्य 5 लोगों की भीड़ में ठूंसकर भेजना क्या सही निर्णय था? इसकी उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए, वरना ऐसे अमानवीय कृत्य और भी अधिक होने लगेंगे, और आए दिन रेलकर्मियों की जान ऐसे डॉक्टरों और अस्पताल कर्मियों की लापरवाही से जाती रहेगी।





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इस तरह होगी रेलवे की प्रगति! – RailSamachar

इस कथित प्रगति में मंडल/जोन से लेकर रेलवे बोर्ड तक का है इन्वाल्वमेंट

‘वेस्टेड इंटरेस्ट’ में लोडिंग पार्टियों को मुहैया कराई जाती हैं अतिरिक्त सुविधाएं

अतिरिक्त ट्रैफिक लाने और अतिरिक्त रेवेन्यू कमाने की आड़ में हो रहा निजी हितसाधन का गोरखधंधा!

सुरेश त्रिपाठी

रेलवे में बरबादी का यह आलम है कि कहीं कोई नियम और नीति का पालन नहीं हो रहा, बल्कि यदि यह कहा जाए कि पिछले कुछ सालों से रेलवे में न कोई नीति है, न ही कोई नियम, और न ही उनका कोई पालन करवाने वाला है। रेलवे बोर्ड से नीति-नियम यानि दिशा-निर्देश तो जरूर जारी किए जाते हैं, परंतु उनका उपयोग अथवा पालन करने के बजाय कहीं न कहीं उन्हें निजी हित साधने से जोड़ लिया जाता है। इसमें कहीं निजी पार्टियों के पक्ष में कभी राजनीतिक दबाव काम करते हैं, तो कहीं खुद कुछ रेल अधिकारियों के अपने निजी हित जुड़े होते हैं। यह सब रेलवे के लिए अतिरिक्त ट्रैफिक लाने और अतिरिक्त रेलवे रेवेन्यू कमाने की आड़ में किया जाता है। इसके लिए रेलवे बोर्ड द्वारा पूर्व निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना भी जरूरी नहीं समझा जाता है। शिकायत होने और पूछे जाने पर बचकाने कुतर्क देकर बरगलाने की कोशिश की जाती है, जिससे कदाचार का सिलसिला लगातार जारी है और इस पर कहीं रत्ती भर भी लगाम नहीं लग पाई है।

इसी क्रम में कोटा मंडल, पश्चिम मध्य रेलवे का एक मामला सामने आया है। कोटा मंडल ने भरतपुर रेलवे स्टेशन पर वन टाइम रेक प्लेसमेंट में क्लिंकर ट्रैफिक हैंडलिंग के लिए एक प्रस्ताव बनाकर पश्चिम मध्य रेलवे मुख्यालय जबलपुर को भेजा। मुख्यालय की अनुमति मिल गई। परंतु तभी भरतपुर स्टेशन पर ओएचई की समस्या बताकर उक्त क्लिंकर अनलोडिंग-लोडिंग को पास की सिमको साइडिंग में शिफ्ट कर दिया गया। जहां वन टाइम रेक प्लेसमेंट के बजाय दो बार में रेक प्लेस करना पड़ रहा है। इस बारे मुख्यालय को कुछ नहीं बताया गया। इसके लिए न सिर्फ पार्टी को समय ज्यादा दिया गया, बल्कि एक इंजन भी जाया हो रहा है। इसके अलावा कोटा मंडल द्वारा रेलवे बोर्ड के 16 अप्रैल 2018 के सर्कुलर (नं. 2015/ईएनएचएम/15/01) में दिए गए प्रावधानों का पालन करते हुए राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (आरपीसीबी) से प्रदूषण नियंत्रण की पूर्व अनुमति लेना जरूरी नहीं समझा गया।

कोटा मंडल द्वारा उपरोक्त प्रक्रिया मुख्यालय को बिना बताए अथवा बिना विश्वास में लिए ही स्वत: शुरू कर दी गई। यह सब तीन-चार महीनों तक चलता रहा। इसी दरम्यान वहां चित्तौड़गढ़ से आने वाले क्लिंकर की अनलोडिंग-लोडिंग से होने वाले भारी प्रदूषण से स्थानीय लोग परेशान होने लगे। इसके परिणामस्वरूप भरतपुर के एक स्थानीय निवासी तेजप्रताप सिंह ने अपने वकील यशपाल सिंह के माध्यम से डीआरएम/कोटा को एक कानूनी नोटिस भेजकर भरतपुर ओल्ड गुड्स शेड में क्लिंकर की अनलोडिंग-लोडिंग से हो रहे भयंकर प्रदूषण और उससे स्थानीय लोगों को होने वाली अस्थमा जैसी कई बीमारियों एवं परेशानियों का उल्लेख करते हुए प्रदूषण नियंत्रण के लिए आवश्यक और बोर्ड द्वारा निर्धारित प्रक्रिया अपनाने की मांग की और तब तक के लिए क्लिंकर की अनलोडिंग-लोडिंग प्रक्रिया बंद करने को भी कहा। 28 फरवरी 2020 की यह कानूनी नोटिस डीआरएम/कोटा, प्रिंसिपल सेक्रेटरी/एनवायरमेंट, जयपुर, चेयरमैन/आरपीसीबी, जयपुर, मेंबर सेक्रेटरी/आरपीसीबी, जयपुर, क्षेत्रीय कार्यालय/आरपीसीबी, भरतपुर, सीनियर डीओएम एवं सीनियर डीसीएम/कोटा और पीसीसीएम तथा पीसीओएम, पश्चिम मध्य रेलवे मुख्यालय, जबलपुर को भी भेजी गई थी।

उपरोक्त कानूनी नोटिस मिलने के बाद प.म.रे. मुख्यालय के कान खड़े हुए। तब पता चला कि मुख्यालय को अंधेरे में रखकर कोटा मंडल ने क्लिंकर अनलोडिंग को न सिर्फ  भरतपुर स्टेशन से शिफ्ट करके सिमको साइडिंग में भेज दिया, बल्कि पार्टी को दो पार्ट में रेक प्लेसमेंट की सुविधा भी दे दी। इस तरह न सिर्फ रेलवे को भारी नुकसान हो रहा है, बल्कि मुख्यालय को दिग्भ्रमित भी किया गया है। इसके साथ ही 9 घंटे की जगह 14 घंटे का समय भी पार्टी को दिया जा रहा है। इसके लिए पार्टी से कोई वारफेज/डेमरेज भी वसूल नहीं किया जा रहा, बल्कि एक अतिरिक्त इंजन भी रेलवे के खाते से पार्टी के लिए रेक लाने-लेजाने के लिए उपलब्ध कराया गया है।

उधर डीआरएम/कोटा ने प्राप्त कानूनी नोटिस को रेलवे के वकील शैलेश प्रकाश शर्मा को भेजकर कानूनी सलाह मांगी। रेलवे के वकील शर्मा ने डीआरएम को रेलवे बोर्ड के दिशा-निर्देशों और सभी प्रावधानों का अध्ययन करने के बाद 6 अप्रैल 2020 को अपनी कानूनी सलाह देते हुए स्पष्ट लिखा है कि रेलवे बोर्ड की गाइडलाइंस का पालन नहीं किया गया। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का अनापत्ति प्रमाण-पत्र नहीं लिया गया। इससे मामला यदि कोर्ट में गया तो रेलवे का हित बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। अतः सारी प्रक्रिया पूरी होने तक क्लिंकर अनलोडिंग-लोडिंग की गतिविधि को अस्थाई रूप से तुरंत रोक दिया जाना चाहिए-

देखें, यहां प्रस्तुत है रेलवे के स्टैंडिंग काउंसेल की कानूनी सलाह-

The directives issued by Railway Board are very pertinent and recommendations of the committee already taken note of and accepted by the Railway Board had to issueance of directions in the letter dated 16.04.2018.

It is very much necessary and pertinent to maintain that for any activity of unloading of clinker etc.  Air Pollution, if taking place at any goods shed of the Railway siding, it is expected by the authorities to adher to the instructions given by the Railway Board as mentioned hearinabove.

In the event of protective/preventive and effective measures not taken by the concerned Railway authorities gross violation of the different Acts related to preventing pollution is taking place.

It is evident that when directives have been issued by the Railway Board they are to be strictly adhered to, failing which the unloading of such material leading to any type of pollution could be stopped immediately by the orders passed by learned National Green Tribunal if any application is submitted before it.

Since the entire world is concerned about the pollution and Govt. of India is also taking steps for reducing, minimise pollution and Railway Board had already issued directions on 16.04.2018, it would be the interest of Large Public that the directions are immediately adhered to and implemented on urgent basis, failing which the stopping of unloading of clinker etc. would be adversely affecting of Railway’s interest. It is also necessary that appropriate measures and directions for implementing the Railway Board directives be issued to concerned authorities to various divisions.

The aforesaid opinion be taken into consideration on urgend basis and appreciate measures be taken at the earliest in regards to implementation of Railway Board’s directives and requisites from the pollution control department, so that interest of Railways which is our prime consideration is well protected and if deemed appropriate decision of temporary suspension of the activity concern be taken by the authorities.

प्राप्त जानकारी के अनुसार आरपीसीबी से प्रदूषण नियंत्रण का अनापत्ति प्रमाण-पत्र कोटा मंडल को अब तक नहीं मिला है। पूर्व सीनियर डीसीएम/कोटा, जो अब भोपाल मंडल में सीनियर डीसीएम बनकर आ गए हैं, ने बताया कि हालांकि इसके लिए आवेदन किया गया है, परंतु उनके चार्ज छोड़ने तक यह नहीं मिला था। तथापि वकील की सलाह पर अमल करते हुए डीआरएम/कोटा ने मुख्यालय को पत्र लिखकर (पत्र सं. सी-180/2/पार्ट-2/1/बीटीई, दि.16.04.2020) भेज दिया कि फिलहाल सिमको साइडिंग, भरतपुर में क्लिंकर लोडिंग-अनलोडिंग की अनुमति को स्थगित कर दिया जाए। डीआरएम/कोटा का यह पत्र मिलने के बाद मुख्यालय (पीसीसीएम/पीसीओएम) ने 30 अप्रैल 2020 को यह अनुमति रद्द करते हुए एडवांस रेट्स नोटिफिकेशन (एआरएन) 52/2020 जारी कर दिया।

उल्लेखनीय है कि 30 अप्रैल 2020 को ही पीसीसीएम और पीसीओएम दोनों ही सेवानिवृत्त हो गए। इसके अगले ही दिन 1 मई 2020 को वकील की सलाह को दरकिनार करते हुए बिना कोई प्रक्रिया पूरी किए और डीआरएम/कोटा को बताए बिना ही एजीएम को अंधेरे में रखकर तथा उनसे अप्रूवल लेकर भरतपुर में क्लिंकर अनलोडिंग जारी रखने की पुनः अनुमति देते हुए एआरएन नं. 56/2020 जारी कर दिया गया। समझने वाली बात यह है कि मात्र चौबीस घंटे के अंदर पूरा चक्र इतनी तेजी से घूमा कि एआरएन फौरन जारी हो गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार एजीएम के अप्रूवल के लिए जो नोट प्रस्तुत किया गया उसमें ईडी/टीटी/एफ/रे.बो. के हवाले से स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि “मेंबर ट्रैफिक चाहते हैं कि यह अनुमति तुरंत जारी की जाए!”

सोचने वाली बात यह है कि कोई पार्टी इतनी महत्वपूर्ण कैसे हो सकती है कि उसके लिए न सिर्फ रेलवे के वकील की सलाह को दरकिनार कर दिया, बल्कि रेलवे बोर्ड के उन समस्त दिशा-निर्देशों को भी उठाकर ताक पर रख दिया गया, जिन्हें खुद मेंबर ट्रैफिक की स्वीकृति और सहमति से जारी किया गया है। जो रेलवे बोर्ड, जोनल रेलों द्वारा मांगे जाने पर एक-एक स्पष्टीकरण जारी करने में महीनों-सालों का समय लगाता है, उसी के द्वारा एक पार्टी को चौबीस घंटे से भी कम समय में इस तेजी के साथ ओब्लाइज किया जाता है कि जैसे उसके न रहने से रेलवे का पूरा भट्ठा बैठ जाएगा! जाहिर है कि ऐसे मामलों में रेलवे का हित कम और बोर्ड के अधिकारियों का निजी हित ज्यादा जुड़ा होता है। यह जरूरी नहीं है कि इस सब में बोर्ड मेंबर भी शामिल हो! और यह सब होता है रेलवे के लिए अतिरिक्त ट्रैफिक लाने और अतिरिक्त रेवेन्यू कमाने की आड़ में!

अब सवाल यह उठता है कि रेलवे बोर्ड की 16 अप्रैल 2018 की जो गाइडलाइंस एमआरएस और एमटी के अप्रूवल से जारी की गई हैं, उसमें दिए गए सभी प्रावधानों को क्लिंकर अनलोडिंग की अनुमति देने से पहले कोटा मंडल द्वारा पूरा क्यों नहीं किया गया और इस सारी प्रक्रिया को मुख्यालय द्वारा सुनिश्चित करने की जहमत क्यों नहीं उठाई गई? अगले ही दिन नया एआरएन जारी करने का अप्रूवल देने से पहले पूरे मामले का अध्ययन और डीआरएम/कोटा से बात क्यों नहीं की गई? हड़बड़ी में लिए जा रहे अप्रूवल के पीछे संबंधितों का “वेस्टेड इंटरेस्ट” क्यों नहीं दिखाई दिया? पिछले 6-7 महीनों से वहां जो प्रदूषण फैला, और रेक प्लेसमेंट के मामले में मुख्यालय को गुमराह किया गया, इस सबके लिए जिम्मेदार कौन है?

भरतपुर के एक अन्य वकील अभिषेक कुमार ने भी इस सबके बाद 13 मई 2020 को जीएम/प.म.रे. सहित एसडीजीएम, पीसीसीएम और पीसीओएम को एक विस्तृत पत्र लिखा, उसका भी आजतक कोई संज्ञान नहीं लिया गया। यहां तक कि यह पत्र आजतक जीएम के संज्ञान में नहीं आने दिया गया है। इस बारे में अभिषेक कुमार का कहना था कि रेलवे में सब मनमानी कामकाज चल रहा है, कोई सुनने वाला नहीं, उन्होंने तो अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझकर ही जीएम को पत्र लिखा था, अब अगर सरकार ही ध्यान नहीं दे रही, तब क्या किया जा सकता है?

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि चित्तौड़गढ़ से भरतपुर आने में भरतपुर से लगभग 70 किमी पहले एक निजी साइडिंग (पीएफटी) है, जिसके पास हर प्रकार की क्लीयरेंस है, तथापि संबंधित पार्टी वहां अपना रेक ले जाकर अनलोड करने के बजाय सत्तर किलोमीटर आगे भरतपुर लेकर आने वाली पार्टी का क्या स्वार्थ हो सकता है? जानकारों का कहना है कि 70-75 किमी आगे आने के पीछे पार्टी का फायदा यह है कि पीएफटी में उसे हर तरह के चार्जेज देने पड़ते, जबकि यहां रेलवे में उसका हर तरह से फायदा ही फायदा हो रहा है, और एक टाइम का पास कराकर दो टाइम में रेक प्लेसमेंट, अतिरिक्त इंजन तथा अधिक समय मिलने के साथ-साथ किसी प्रकार का चार्ज और वारफेज/डेमरेज भी नहीं चुकाना पड़ रहा है। तथापि संबंधित अधिकारियों द्वारा इससे यह कहकर इंकार किया गया कि यह तो पार्टी की अपनी च्वाइस है कि वह अपना रेक/माल कहां ले जाए, वे किसी पार्टी को रेलवे में आने से मना नहीं कर सकते!

इस पूरे मामले में पश्चिम मध्य रेलवे के जीएम और सभी संबंधित अधिकारियों से उनका पक्ष लिया गया। वर्तमान पीसीसीएम और पीसीओएम ने चूंकि हाल ही में पदभार संभाला है, अतः उन्होंने इस मामले की फिलहाल उन्हें कोई जानकारी न होने की बात कही। सीएफटीएम ने हालांकि ईडी/टीटी/एफ/रे.बो. के जबानी जमा खर्च को कागज पर उतार कर स्वयं को काफी सुरक्षित कर लिया है। तथापि दो बार के रेक प्लेसमेंट, अतिरिक्त समय, अतिरिक्त इंजन और वारफेज/डेयरेज इत्यादि की जिम्मेदारी से संबंधित कमर्शियल/ट्रैफिक अधिकारी खुद को पाक-साफ नहीं कह सकते। एजीएम की अनभिज्ञता इससे जाहिर होती है कि जब उन्होंने यह कहा कि उसी दिन आउट गोइंग यानि रिटायर हो रहे अधिकारी द्वारा एआरएन रद्द किया गया था, इसलिए उसे पुनः तत्काल अगले दिन जारी किया गया। जीएम ने कहा कि हालांकि उनको भेजी गई शिकायत उनके संज्ञान में नहीं आई है, फिर भी वह पूरे मामले का अवश्य संज्ञान लेंगे।

नोट: इस मामले से संबंधित सभी डॉक्युमेंट्स ‘रेलसमाचार’ के पास मौजूद हैं।





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रेलवे बोर्ड ने हल कर लिया आईआरएमएस का मुद्दा – RailSamachar

सिविल सेवा अधिकारियों के हर बैच को मिलेगी दो-दो साल की वरिष्ठता

सुरेश त्रिपाठी

रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) ने इंडियन रेलवे मैनेजमेंट सर्विस (आईआरएमएस) की एकीकृत नई रेलसेवा शुरू करने का मामला लगभग हल कर लिया है। यह जानकारी रेलवे बोर्ड के हमारे विश्वसनीय सूत्रों ने दी है। सूत्रों का कहना है कि इंडियन रेलवे ट्रैफिक सर्विस (आईआरटीएस) कैडर, जो आईआरएमएस का सबसे ज्यादा मुखर विरोध कर रहा था, के अब तक के सभी बैंचों को दो-दो साल की वरिष्ठता (सीनियरिटी) दी जाएगी। इस निर्णय से ट्रैफिक कैडर लगभग संतुष्ट है।

तथापि सूत्रों का कहना है कि सिविल सर्विस के बाकी दो कैडर, इंडियन रेलवे पर्सनल सर्विस (आईआरपीएस) और इंडियन रेलवे एकाउंट्स सर्विस (आईआरएएस), जो ट्रैफिक सर्विस के साथ ही आईआरएमएस के मुखर विरोध में समान रूप से शामिल थे, को भी समान रूप से दो-दो साल की वरिष्ठता देने का निर्णय लिया गया है।

उल्लेखनीय है कि आईआरएमएस स्थापित करने की इसी योजना के तहत जनवरी में खाली हुई मेंबर रोलिंग स्टॉक (एमआरएस) और जून में खाली हुई मेंबर इंजीनियरिंग (एमई) की दोनों पोस्टें नहीं भरी गई हैं। जबकि इनसे पहले खाली हुई मेंबर स्टाफ की पोस्ट को खत्म करके डीजी/पर्सनल को अपेक्स ग्रेड दे दिया गया था। जबकि एफसी/रेलवेज की पोस्ट भी फिलहाल खाली रखी गई है। एएम/फाइनेंस का मामले में रेलवे बोर्ड द्वारा भेजे गए प्रस्ताव को फिलहाल एसीसी से मंजूरी मिलने का इंतजार है।

इस योजना के तहत अब आने वाले समय में मेंबर ट्रैक्शन (एमटीआर) की पोस्ट भी संभवतः स्क्रैप होगी और एमटीआर एवं एमआरएस की दोनों पोस्टों को मिलाकर एक नई पोस्ट “मेंबर रोलिंग स्टॉक एंड ट्रैक्शन” बनेगी। इसी तरह मेंबर इंजीनियरिंग के बजाय मेंबर इंफ्रास्ट्रक्चर और मेंबर ट्रैफिक का नया नाम मेंबर ट्रांसपोर्टेशन एंड बिजनेस डेवलपमेंट होगा।

इन तीन मेंबर्स के अलावा चेयरमैन, रेलवे बोर्ड (सीआरबी) और फाइनेंस कमिश्नर (एफसी) को मिलाकर कुल पांच मेंबर्स का रेलवे बोर्ड होगा। सूत्रों का कहना है कि मेंबर मैटीरियल मैनेजमेंट और मेंबर एसएंडटी की दोनों पोस्ट भी स्क्रैप होकर डीजी/पर्सनल की तर्ज पर डीजी/स्टोर्स और डीजी/एसएंडटी हो जाएंगी, तथापि पहले की तरह यह तीनों डीजी, “पार्ट ऑफ रेलवे बोर्ड” नहीं होंगे।

सूत्रों का कहना है कि कैडर मर्जर के मामले को लेकर जब मीडिया में भारी हंगामा मचा हुआ था और सिविल सेवा के तीनों कैडर हर मंच से इसका न सिर्फ भारी विरोध कर रहे थे, बल्कि सांसदों-मंत्रियों सहित पीएमओ को ज्ञापन देकर इसके हानि-लाभ समझा रहे थे, तब पीएमओ द्वारा रेलमंत्री से इस बारे में न सिर्फ कड़ी पूछताछ की गई थी, बल्कि मामले का तत्काल उचित समाधान करने का निर्देश भी दिया गया था।

सूत्रों ने बताया कि इसी के बाद रेलमंत्री ने अक्षम सीआरबी की लंबी क्लास लेकर सिविल सेवा के तीनों कैडर्स को दो-दो साल का वेटेज देकर मामले को फौरन हल करने का निर्देश दिया। इसी के साथ नई स्थिति के अनुसार जीएम और डीआरएम पैनल भी तुरंत तैयार करने को कहा है। उल्लेखनीय है कि डीओपीटी के निर्देशानुसार जीएम पैनल कैलेंडर इयर के लिए बनाए जाने हेतु छह महीने पूर्व, सितंबर 2019 में ही इसलिए खत्म कर दिया गया था कि जिससे नए कैलेंडर इयर 2020 के लिए 31 दिसंबर 2019 से पहले नया जीएम पैनल तैयार कर लिया जाए।

परंतु अक्षम सीआरबी और अक्षम सेक्रेटरी/रे.बो. के चलते आज लगभग एक साल पूरा होने जा रहा है, मगर नया जीएम पैनल उपलब्ध नहीं है, बल्कि अब चौथी-पांचवीं बार पुनः उसे नए सिरे से बनाना पड़ रहा है। इसके चलते कई वरिष्ठ अधिकारियों का पूरा कैरियर खराब हो चुका है। कई वरिष्ठ अधिकारियों, जिनमें से कुछ रिटायर हो चुके हैं और कुछ रिटायर होने के कगार पर आ चुके हैं, का मानना है कि उनका कैरियर खराब करने के लिए सीआरबी और सेक्रेटरी तो निश्चित रूप से जिम्मेदार हैं, मगर रेलमंत्री भी इसलिए जिम्मेदार हैं, क्योंकि उनकी कोई नीति और मन:स्थिति स्थिर नहीं है, जिससे रेलवे का भला होने के बजाय बुरा ज्यादा हो रहा है। 





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अब तय है रेलवे के ट्रैक पर प्राइवेट ट्रेन ऑपरेशन – RailSamachar

मान्यताप्राप्त रेल संगठनों को धिक्कार रहे हैं ठगा सा महसूस करते रेल कर्मचारी

कभी “देश नहीं बिकने दूंगा” की बात कहने वाले आज वास्तव में “देश बेचने” पर उतर आए हैं!

सुरेश त्रिपाठी

हम बीते 6 सालों से बुलेट ट्रेन चलाने और न जाने क्या-क्या बातें सुनते रहे हैं..

जिस तरह पहले रेल सेवाएं बंद की गईं, और सिर्फ गुड्स ट्रेनों का परिचालन जारी रखा गया, फिर अपनों को फायदा पहुंचाने के लिए कथित जरूरी सामानों की आपूर्ति के नाम पर धीरे से स्पेशल पार्सल ट्रेनों की शुरुआत कर दी गई।

इसके बाद जब व्यवस्था की नाकामी के चलते बड़ी संख्या में मजदूरों, श्रमिकों का सड़कों पर निकलकर अपने गांव जाने के लिए पैदल मार्च शुरू हो गया, तब श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के नाम पर भी कुछ चुनिंदा रूटों पर ट्रेनें चलाई गईं।

इसमें भी व्यवस्था की नाकामी और नीति-नियंताओं का निकम्मापन उजागर हुआ तथा जानबूझकर इस श्रमिक स्पेशल ट्रेनों को भटकाया गया, जिससे रेलवे की बदनामी हो और सरकार यह साबित करने के लिए कह सके कि रेलवे की वर्तमान व्यवस्था नाकाम हो चुकी है, अतः कुछ चुनिंदा मार्गों पर निजी क्षेत्र को रेल परिचालन का जिम्मा सौंपा जा रहा है।

कोरोना संकट के नाम पर भारतीय रेल की सामान्य सेवाएं बंद करके प्राइवेट पार्टियों को ट्रेन ऑपरेशन के लिए आमंत्रित करने का इससे बेहतर मौका सरकार को नहीं मिल सकता था।

सरकार कोरोना काल का भरपूर इस्तेमाल कर रही है, क्योंकि उसे पता है कि इस मौके पर कोई यूनियन अथवा संगठन विरोध के लिए मैदान में नहीं उतरेगा।

इसके अलावा, सभी विपक्षी राजनीतिक दल मरणासन्न पड़े हुए हैं, जिससे देश में एक बड़ा राजनीतिक शून्य पैदा हो गया है। सरकार इसका भरपूर लाभ उठा रही है।

इसके साथ ही राजनीतिक विपक्ष की अनुपस्थिति में विपक्षी दलों की भूमिका निभाने वाली मीडिया और देश के कुछ प्रमुख प्रतिष्ठित वरिष्ठ पत्रकारों को या तो डरा-धमकाकर स्वान बना दिया गया है, या फिर अपना जरखरीद गुलाम बना लिया गया है।

देश की वर्तमान स्थिति ऐसी है कि लोग अब अपनी इज्जत बचाए रखने और अनावश्यक बेइज्जती से बचने के लिए सच बोलने, कहने और लिखने में भारी संकोच कर रहे हैं।

सरकार के पक्षधर कुछ लोगों को छोड़कर बाकी ज्यादातर लोग सच लिखने और बोलने से बच रहे हैं। यह सही है कि लोग डरे हुए हैं।

जो कुछ लोग लिखने, बोलने और कहने का दुस्साहस कर भी रहे हैं, उन्हें बेवजह पुलिसिया कार्रवाई, कानूनी और अदालती पचड़ों में लपेटकर परेशान किया जा रहा है। इसीलिए उनमें एक तरह का भय समा गया है।

उपरोक्त तमाम स्थिति सरकार को पूरी तरह से सूट कर रही है। इसीलिए सरकार खुलकर खेल रही है और वह सब कुछ बेचने या लुटाने अथवा निजी क्षेत्र को सौंपकर लूटने पर उतारू है, जिसे उसने नहीं बनाया है।

हर दस-पंद्रह दिन में सरकार द्वारा एक नया जुमला देशवासियों को परोस दिया जाता है। कभी देश पांच ट्रिलियन इकोनॉमी की बात होती है, तो कभी कोरोना को एक अवसर के रूप में देखने की बात कही जाती है, तो कभी आत्मनिर्भर बनाया जाता है। कभी “देश नहीं बिकने दूंगा” की बात कहने वाले आज वास्तव में देश बेचने पर उतर आए हैं।

सरकार के वादों, सरकार के जुमलों और सरकार के इवेंट मैनेजमेंट की दास्तान या फेहरिस्त “हरि अनंत हरि कथा अनंता” जैसी हो चुकी है, जिसमें पूरा देश कसमसा रहा है। एक नया जुमला ईजाद करके अथवा एक नई इवेंट खड़ी करके हर बड़े मुद्दे से पूरे देश का ध्यान भटका दिया जाता है।

अब जहां तक रेलवे के मान्यताप्राप्त संगठनों की बात है, तो वे तो पहले से ही मरणासन्न स्थिति में पहुंच चुके हैं। उन्होंने सरकार के सामने पूरी तरह से घुटने टेक दिए हैं। चिट्ठी लिखने, ज्ञापन सौंपने और फोटो खिंचवाने से ज्यादा वह कुछ करने की स्थिति में नहीं रह गए हैं।

“धिक्कार है मान्यताप्राप्त रेल संगठनों को, जिन्होंने पिछले कुछ सालों से रेलकर्मियों को न सिर्फ गुमराह करके रखा, बल्कि रेलवे में अपनों को भर्ती कराने के एवज में रेल परिवार को बंधक बनाकर सरकार के सामने घुटने टेक दिए हैं!” यह कहना है तमाम रेलकर्मियों का।

लखनऊ से दिल्ली के बीच चली पहली निजी ट्रेन ‘तेजस एक्सप्रेस’ के विरोध के अवसर पर उत्तर रेलवे के ऑफिसर्स रेस्ट हाउस में चेयरमैन, रेलवे बोर्ड वी. के. यादव के साथ ट्रेनों के निजीकरण पर चर्चा करते हुए एआईआरएफ के महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा, नरमू के महामंत्री के. एल. गुप्ता एवं अन्य पदाधिकारीगण

सरकार के इस कदम से अब रेलवे की सभी उत्पादन इकाइयों के भी हजारों कर्मचारी अपने भविष्य को असुरक्षित होते हुए देखकर बुरी तरह चिंतित हो गए हैं। उनका कहना है कि “जब मान्यताप्राप्त यूनियनें रेल परिचालन का निजीकरण नहीं रोक पा रही हैं, तो उत्पादन इकाइयों का निगमीकरण और निजीकरण होने से कैसे रोक पाएंगी!”

अब भी समय है, सभी सरकारी कर्मचारी संगठित होकर सरकार की वादाखिलाफी का विरोध और यूनियनों का संपूर्ण बहिष्कार करें!





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पश्चिम रेलवे के राजकोट और भावनगर मंडल का विद्युत कर्षण के क्षेत्र में प्रवेश

पालनपुर से बोटाड तक विद्युतीकृत पथ पर पहली डबल स्टैक कंटेनर ट्रेन का सफल परिचालन

पश्चिम रेलवे द्वारा वित्तीय वर्ष 2019-20 के दौरान 664 रूट किमी के उच्चतम विद्युतीकरण का कीर्तिमान

भारतीय रेल के शत-प्रतिशत विद्युतीकरण की मुहिम के साथ कदमताल करते हुए पश्चिम रेलवे ने वित्तीय वर्ष 2019-20 के दौरान 664 रूट किमी के उच्चतम विद्युतीकरण लक्ष्य को प्राप्त करके अपनी उपलब्धियों की श्रृंखला में एक और महत्वपूर्ण कीर्तिमान जोड़ा है।

इसमें अहमदाबाद-पालनपुर, अहमदाबाद-वीरमगाम, वीरमगाम-मेहसाणा, सुरेंद्रनगर-बोटाड-ढोला और सुरेंद्रनगर- ध्रांगध्रा रेलखंड शामिल हैं।

बुधवार, 10 जून, 2020 को, पश्चिम रेलवे ने राजकोट और भावनगर मंडलों में पालनपुर से बोटाड तक अपनी पहली इलेक्ट्रिक डबल स्टैक कंटेनर ट्रेन का परिचालन किया, जिसके फलस्वरूप इन दोनों मंडलों का  इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन के मानचित्र पर ऐतिहासिक पदार्पण हो गया है।

फोटो कैप्शन: नए विद्युतीकृत सुरेंद्रनगर-बोटाड सेक्शन पर पहली डबल स्टैक कंटेनर ट्रेन चलाने के लिए तैयार चालक दल और ट्रेन का एक दृश्य

महाप्रबंधक/परे आलोक कंसल ने पश्चिम रेलवे की इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त की है तथा पश्चिम रेलवे के प्रधान मुख्य विद्युत अभियंता संजीव भूटानी और उनके अधिकारियों एवं कर्मचारियों की संबंधित टीम के अलावा इस सराहनीय उपलब्धि में सक्रिय योगदान देने वाले अन्य सभी विभागों का अभिनंदन किया गया।

पश्चिम रेलवे के मुख्य जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार, पश्चिम रेलवे की विभिन्न बुनियादी ढ़ांचागत परियोजनाओं, विशेष रूप से विद्युतीकरण के लक्ष्यों को समय पर पूरा करने के लिए निरंतर उच्चस्तरीय मॉनिटरिंग के साथ बहुस्तरीय प्रोत्साहन सुनिश्चित किया जा रहा है।

उपरोक्त उपलब्धि वर्तमान वित्तीय वर्ष 2020-21 के दौरान पालनपुर से दिल्ली के लिए पिपावाव बंदरगाह से डबल स्टैक कंटेनरों को ले जाने के लिए पिपावाव बंदरगाह तक रेल मार्ग के विद्युतीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

पश्चिम रेलवे ने मार्च, 2020 के दौरान सुरेंद्रनगर-बोटाड रेलखंड का विद्युतीकरण पूरा कर लिया था। इसके लिए सीआरएस की मंजूरी भी मिल गई थी। तथापि देशव्यापी तालाबंदी (लॉकडाउन) के कारण, इस मार्ग में इलेक्ट्रिक ट्रेन शुरू करने के लिए संसाधन जुटाने में भारी अड़चन आ गई थी।

पश्चिम रेलवे और रेल विद्युतीकरण की अहमदाबाद इकाई की राजकोट और भावनगर मंडलों की टीमों ने लॉकडाउन अवधि के दौरान लगातार कड़ी मेहनत कर इन मंडल मुख्यालयों में टीपीसी संगठनों की स्थापना की और सुरेंद्रनगर एवं बोटाड में एक-एक डिपो स्थापित किया।

इस ऐतिहासिक उपलब्धि में  विशेष रूप से शामिल टीम आरई/अहमदाबाद के अलावा डिवीजनल टीमों में इलेक्ट्रिकल/टीआरडी, सिग्नल एवं टेलीकॉम, ऑपरेटिंग, मैकेनिकल तथा कार्मिक विभाग सहित अन्य सभी टीमों को उनके योगदान के लिए रेल प्रशासन की तरफ से बधाई दी गई है।

विज्ञप्ति में बताया गया है कि विद्युतीकृत क्षेत्र में डबल स्टैक कंटेनरों को सफलतापूर्वक चलाने के लिए पश्चिम रेलवे सभी जोनल रेलों के बीच ऐसी पहली जोनल रेलवे है, जिसके अंतर्गत 7.57 मीटर की ऊॅंचाई वाले ओएचई से संपर्क तार की ऊॅंचाई प्रदान की गई है, जो दुनिया में अपनी तरह की पहली उपलब्धि है।

विद्युत कर्षण की शुरूआत के साथ, जो प्रदूषणमुक्त और परिवहन का ऊर्जा कुशल साधन है, पश्चिम रेलवे को ईंधन खर्च पर प्रति वर्ष लगभग 100 करोड़ रुपये की बचत होने की उम्मीद है।

इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन पर 1000 GTKM ले जाने के लिए 4.5 यूनिट इलेक्ट्रिक ऊर्जा की खपत होती है, जिसकी कीमत 25 रुपये तक होती है, जबकि 2 लीटर हाई स्पीड डीजल की लागत लगभग 150 रुपये होती है, जो  डीजल ट्रैक्शन द्वारा समान लोड ले जाने के लिए अनुमानित लागत है।

उम्मीद है कि भारतीय रेल के विभिन्न खंडों के विद्युतीकरण से ईंधन के खर्च में पर्याप्त बचत होगी। इसके अलावा, विद्युतीकरण से ट्रेनों की गतिशील बनाने में मदद मिलेगी। इससे सेक्शन में अधिक ट्रेनों को चलाने के लिए लाइन क्षमता में भी पर्याप्त वृद्धि होने की उम्मीद है।








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रेलयात्री, रेलवे का ग्राहक है, ग्राहक को भगवान का दर्जा प्राप्त है, उसका यथोचित सम्मान करें -महात्मा गांधी

“आपकी यात्रा सुरक्षित और सुखद हो” संदेश के साथ कानपुर सेंट्रल स्टेशन से हो रही यात्रियों की विदाई

Welcome initiative by DyCTM Kanpur to Passengers

कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन से नई दिल्ली को जाने वाली गाड़ी संख्या 02451 श्रमशक्ति विशेष सुपरफास्ट ट्रेन के यात्रियों को “आपकी यात्रा सुरक्षित एवं सुखद हो” का संदेश देते हुए गाड़ी के प्लेटफॉर्म को छोड़ते हुए प्रतिदिन इसी तरह गर्मजोशी के साथ वाणिज्य विभाग और रेल सुरक्षा बल के कर्मचारियों द्वारा यात्रियों को विदा किया जा रहा है।

कोविड-19 के मद्देनजर यात्रियों को भयमुक्त और सुरक्षित यात्रा का संदेश देने की इस अनोखी पहल का विचार हिमांशु शेखर उपाध्याय, उप मुख्य यातायात प्रबंधक, उ.म.रे, कानपुर का है, जिसे साकार करने के लिए वह स्वयं गाड़ी जाने समय स्टेशन पर मौजूद रहते हैं।

डिप्टी सीटीएम/कानपुर की इस अनोखी पहल की सराहना रेल मंत्रालय, मंडल रेल प्रबंधक, प्रयागराज और सबसे अहम यात्रियों द्वारा भी की गई है।

कोरोना महामारी के संकट काल में श्री उपाध्याय की भूमिका कानपुर क्षेत्र के रेलकर्मियों में अभिभावक की तरह रही है और लगभग सभी लोगों के स्वास्थ्य, राशन सामग्री की उपलब्धता इत्यादि को स्वयं के स्तर से पूर्ण करने का उनका प्रयास अभी भी लगातार जारी है। इसके अलावा स्थानीय सिविल प्रशासन से भी उनका समन्वय काफी बेहतर है, जिससे रेल प्रशासन और सिविल प्रशासन के बीच सहयोग बना हुआ है और काम करना आसान हो रहा है।

रेलयात्री, रेलवे का ग्राहक है, ग्राहक भगवान होता है, उसका यथोचित सम्मान किया जाए!

प्रबंधन को कुछ नया सृजन करते रहना चाहिए, मातहतों को नए-नए विचार देते रहना चाहिए। इससे उनका उत्साह और मनोबल दोनों बना रहता है। प्रबंधन का मान्य फंडा तो यही है कि “मातहतों के सीधे संपर्क में रहकर, उनकी कामकाज संबंधी समस्याओं को सरल कर, सुलझाकर, उनके दुख-सुख में शामिल होकर और उनके साथ ही स्थानीय सिविल प्रशासन से भी सार्थक समन्वय स्थापित करके जितना बेहतर आउटपुट हासिल किया जा सकता है, उतना डंडा चलाकर अथवा सिर्फ आदेश देकर कभी नहीं किया जा सकता।”

डिप्टी सीटीएम/कानपुर हिमांशु शेखर उपाध्याय न सिर्फ यही कर रहे हैं, बल्कि उनका विचार कहीं न कहीं गांधी जी के विचार से भी प्रेरित है, जो कि आज भी कई रेलवे स्टेशनों पर लगा देखा जा सकता है। परंतु भारतीय रेल में इसका उल्टा होते देखा जा रहा है। कहते हैं कि जिस चीज की अधिकता होती है, उसकी कद्र कम हो जाती है। भारतीय रेल में यात्रियों के साथ यही तो हो रहा है, क्योंकि रेलवे को वह इफरात में उपलब्ध हैं। रेलवे को निजी बस चालकों की तरह उन्हें ढ़ूंढ़ने, चौराहे पर आवाज लगाने नहीं जाना पड़ता। माल ढुलाई के मामले में इसी सोच ने रेलवे का भारी नुकसान किया।

दूसरी तरफ रेलवे में नरपतसिंह जैसे कुछ खुंदकी भी हैं, जो सिर्फ अपने अहं की संतुष्टि के लिए न सिर्फ मातहतों का उत्पीड़न करने में आत्मिक संतोष पाते हैं, बल्कि पद के घमंड में उन्हें अपनी हैसियत का भी विस्मरण हो जाता है। ऐसे बहुत नाम हमारे संज्ञान में हैं, पर फिलहाल यह एक ही पर्याप्त है। वैसे अनुभव में तो यही आया है कि कुछ अपवादों को छोड़कर कमोबेश सभी लूटने की अपनी-अपनी जुगाड़ में रहते हैं। इसमें नीचे से ऊपर तक सभी शामिल हैं। यदि यह कहा जाए कि बाड़ ही खेत खा रही है, तो रेलवे के मामले में शायद यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। तथापि हिमांशु शेखर उपाध्याय जैसे कुछ लोग अभी भी उम्मीद बनाए हुए हैं, जिससे वास्तव में यह व्यवस्था चल पा रही है।








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रेलवे के निर्माण संगठनों द्वारा कब किया जाएगा गुणवत्तापूर्ण निर्माण कार्य!

एडवांस टेंडर, एडवांस स्टेशन स्थापनाओं, एडवांस खरीद और गुणवत्ताविहीन कार्यों जैसी तमाम भारी भ्रष्टाचारपूर्ण गतिविधियों को अविलंब रोका जाना चाहिए

सुरेश त्रिपाठी

रेलवे के निर्माण संगठनों द्वारा कब गुणवत्तापूर्ण निर्माण कार्य किया जाएगा, यह सवाल इन निर्माण संगठनों के ही फील्ड में कार्यरत अब लगभग सभी कर्मचारियों द्वारा उठाया जाने लगा है। उनका कहना है कि निर्माण संगठन के अधीन गुणवत्तापूर्ण तरीके से निर्माणाधीन नई लाइनों का निर्माण कब देखने को मिलेगा?

आखिर कब वह दिन आएंगे कि सीना ठोंक कर कहा जा सकेगा कि सीआरएस के निरीक्षणों के लिए नई लाइनें प्रस्तुत हैं। आखिर ऐसी गुणवत्तापूर्ण कार्यपद्धति को भौतिक रूप में कौन सीएओ अपने आउटपुट में दर्ज करवाएगा? और कौन महाप्रबंधक या मेंबर इंजीनियरिंग रेलवे बोर्ड इन्हेें ऐसे कार्यों के लिए विवश कर सकेंगे? यह सब देखने के लिए हम  फीलड कर्मचारियों को बड़ी बेसब्री से इंतजार है। यह उद्गार हैं रेलकर्मियों के!

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उनका बार-बार यही सवाल है कि आखिर निर्धारित मानक के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण निर्माण कार्य क्यों नहीं किया जा रहा है! नई लाइनों में रिवर्स कर्व डालने का आखिर क्या औचित्य है? आधा-अधूरा निर्माण कार्य करके “पेड सीआरएस निरीक्षण और अनुमोदन” से आखिर किसका हितसाधन पूरा हो रहा है। यह गंभीर जांच का विषय है।

आखिर लाइन बिछाने के लिए बनाए गए फार्मेशन में मिट्टी की क्वालिटी के साथ ही ब्लैंकेटिंग की क्वालिटी और उसके कम्पैक्शन की जांच और साथ ही वास्तविक एलाइनमेंट, जो ‘एल’ सेक्शन में प्रस्तावित होता है, उसके अनुरूप कार्य क्यों नहीं किया जाता है। इसकी जबाबदेही आखिर कब तय की जाएगी?

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जहां सीधी लाइन या सर्कुलर कर्व प्रस्तावित होता है, वहां उक्त लोकेशन पर रिवर्स कर्व डालने का आखिर औचित्य क्यों नहीं पूछा जाता है? आखिर क्यों लूट की छूट देकर रखी गई है कि जैसे-तैसे छोटे-बड़े पुलों के फार्मेशन का निर्माण करते हुए लाइन बिछाकर सीआरएस अनुमोदन करवा लिया जाए?

सीएओ/कंस्ट्रक्शन, महाप्रबंधक और सीआरएस द्वारा नई लाइनों में रिवर्स कर्व का औचित्य कयों नहीं पूछा जा रहा है। इतनी बड़ी गड़बड़ी को आखिर जानबूझकर क्यों नजरंदाज किया जा रहा है? इन उच्चाधिकारियों द्वारा अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाने का आखिर क्या अर्थ लगाया जाए?

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रेलवे की जमीन उपलब्ध नहीं होने के नाम पर रिटेनिंग वॉल के निर्माण पर करोड़ों रुपए आखिर क्यों खर्च किए जा रहे हैं। जमीन का अधिग्रहण जिसने करवाया, उससे इसका औचित्य क्यों नहीं पूछा जाता? यदि जमीन के अधिग्रहण में किसी प्रकार की कोई त्रुटि हुई है तो उसके तुरंत संज्ञान में आने पर आवश्यक दूरी में पुनः जमीन का अधिग्रहण क्यों नहीं सुनिश्चित किया जाता?

इस प्रकार की गंभीर लापरवाहियों के लिए संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध अब तक कोई उचित कार्रवाई क्यों नहीं शुरू की जा सकी है?

आखिर इस तरह रेलवे राजस्व के अनावश्यक खर्च को रोकने के लिए सीएओ/कंस्ट्रक्शन, महाप्रबंधक और रेलवे बोर्ड ने अब तक क्या कारवाई सुनिश्चत की? यदि नहीं, तो आखिर किन प्रयोजनों से संबंधित अधिकारियों को यह छूट देकर रखी गई है?

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इस तरह के ऐसे बहुत से सवाल जिम्मेदार रेलकर्मियों द्वारा अक्सर उठाए जाते रहे हैं, परंतु ऐसा लगता है कि रेल प्रशासन को इस सब के बारे में कोई चिंता नहीं है।

ऐसे तमाम कार्य खासतौर पर उत्तर रेलवे, पूर्वोत्तर रेलवे, पूर्व मध्य रेलवे, दक्षिण पूर्व रेलवे और उत्तर मध्य रेलवे सहित लगभग सभी जोनल रेलों में बड़े पैमाने पर किए गए हैं और अभी भी किए जा रहे हैं।

यही नहीं, ऐसे गुणवत्ताविहीन कार्यों का ‘पेड’ सीआरएस निरीक्षण और अनुमोदन भी कराया गया है। प्रमाण के लिए पिछले कुछ महीनों के दौरान हुए ऐसे सीआरएस निरीक्षणों और अनुमोदनों की वस्तुस्थिति देखी जा सकती है।

एडवांस टेंडर, एडवांस स्टेशन स्थापनाओं और एडवांस खरीद तथा गुणवत्ताविहीन कार्यों जैसी तमाम भारी भ्रष्टाचारपूर्ण गतिविधियों को यदि नहीं रोका गया और इनकी भौतिक निगरानी सुनिश्चित नहीं की जाती है, तो निश्चित रूप से जल्दी ही रेलवे का दीवाला निकल जाएगा, क्योंकि यही वह गतिविधियां हैं जिनके माध्यम से अधिकांश सरकारी राजस्व संबंधित अधिकारियों की जेब में जा रहा है। और यह भी सही है कि कमोबेश इस सब में नीचे से लेकर ऊपर तक सभी शामिल हैं। क्रमशः








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किसी का फेवर करना कोई मेंबर ट्रैफिक और सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड से सीखे!

भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था की बात कोरी बकवास है – जुगाड़ है, तो सब कुछ संभव है!

एक मजाक बनकर रह गई है 10-15 साल वाली रेलवे बोर्ड और रेलमंत्री की ट्रांसफर नीति

Suresh Tripathi

किसी अधिकारी या कर्मचारी को यदि सारी लाज-शरम छोड़कर फेवर करना हो, तो वह जाकर मेंबर ट्रैफिक और सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड सह एडीशनल मेंबर ट्रैफिक का शागिर्द बन जाए, क्योंकि इन दोनों अधिकारियों की अब तक की जो गतिविधियां रही हैं, उनके मद्देनजर यह बात सही साबित होती है। स्थिति यह है कि मेंबर ट्रैफिक ने एक विवादास्पद अधिकारी को अनावश्यक फेवर करके कम से कम रिटायरमेंट तक तो अपने लिए “फ्री-सोमरस आपूर्ति” का पुनः बंदोबस्त कर लिया है, क्योंकि उनके जीएम/द.पू.रे. रहते हुए भी वही उनकी आपूर्ति का सबसे बड़ा माध्यम था, ऐसा बताया गया है!

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ज्ञातव्य है कि मंगलवार, 19 मई 2020 को दोपहर बाद करीब पांच बजे रेलवे बोर्ड से मनोज कुमार का प्रमोशन/पोस्टिंग ऑर्डर निकला, उन्हें डायरेक्टर/रेल मूवमेंट, कोलकाता से उठाकर वहीं दक्षिण पूर्व रेलवे में अस्वाभाविक रूप से सीएफटीएम के पद पर पदस्थ किया गया, जो कि सभी अधिकारियों के लिए अत्यंत आश्चर्यजनक था, क्योंकि किसी को भी यह उम्मीद नहीं थी कि इतने विवादास्पद और जूनियर अधिकारी की पहली पोस्टिंग ही सीएफटीएम में हो सकती है। जबकि वहीं उससे कई बैच सीनियर और सक्षम अधिकारी बैठे हुए हैं तथा वहीं उसे बैठाया जा सकता है जहां वह कई साल लगातार बतौर डिप्टी सीओएम रहकर अपने सीनियर्स की जड़ें खोदता रहा था। ऐसे अधिकारी का मेंबर ट्रैफिक द्वारा इतना अधिक फेवर किया जाएगा, किसी को भी भरोसा नहीं था।

उनका यह फेवर यहीं खत्म नहीं हुआ। अगले ही दिन गुरुवार, 20 मई 2020 को सुबह ही उन्होंने मनोज कुमार को सीएफटीएम/द.पू.रे. का चार्ज लेने दक्षिण पूर्व रेलवे मुख्यालय, गार्डेन रीच भेज दिया। जहां प्राप्त जानकारी के अनुसार पीसीओएम को उन्होंने रिपोर्ट किया। वह उन्हें ज्वाइन कराने के लिए महाप्रबंधक के पास लेकर पहुंचीं। मिली जानकारी के अनुसार वर्तमान सीएफटीएम ने तभी उन्हें दो दिन बाद सोमवार को चार्ज हैंड ओवर करने के बारे में सूचित किया था। इसके बाद उन्होंने मनोज कुमार को सोमवार को आने के लिए कहकर वापस भेज दिया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार ऐसा माना जाता है कि गार्डेन रीच मुख्यालय से निकलने के बाद मनोज कुमार ने मेंबर ट्रैफिक को उपरोक्त ताजा स्थिति से अवगत कराया। इसके लिए उन्होंने मेंबर ट्रैफिक से मोबाइल पर बात की या उन्हें टेक्स्ट मैसेज भेजा, यह तो पता नहीं चल सका, मगर द.पू.रे. मुख्यालय से उनके निकलने के तुरंत बाद मेंबर ट्रैफिक का फोन पीसीओएम को पहुंचा और उन्होंने उनसे मनोज कुमार को फौरन सीएफटीएम का चार्ज दिलवाने को कहा। तत्पश्चात मनोज कुमार को कॉल करके बुलाया गया, जो कि कहीं आसपास ही थे और फौरन पहुंच गए, तथा उन्हें चार्ज सौंप दिया गया। अधिकारी आश्चर्यचकित हैं कि आखिर मेंबर ट्रैफिक द्वारा मनोज कुमार का इतना फेवर करने का औचित्य क्या है?

एमटी के फेवर की हद ये है कि 20 मई को ही जैसे ही मनोज कुमार ने करीब 2 बजे सीएफटीएम/द.पू.रे. का चार्ज लिया, उसके थोड़ी देर बाद ही एमटी ने उन्हें डायरेक्टर/रेल मूवमेंट का भी अतिरिक्त प्रभार सौंपते हुए तत्संबंधी आदेश रेलवे बोर्ड से जारी करा दिया। अधिकारियों का कहना है कि यह तो अपक्षित ही था, क्योंकि इस बारे संबंधित अधिकारी ने कोलकाता में पहले से ही हवा बनाई हुई थी। उनका कहना है कि इस फेवर के चलते एमटी ने अपनी रही-सही इज्जत भी गंवा दी है। उनके इस कदम से ट्रैफिक सर्विस के सभी अधिकारी उनसे सख्त नाराज हुए हैं।

अधिकारियों का कहना है कि “मनोज कुमार को तो तुरंत चार्ज लेने की जल्दी समझी जा सकती है, क्योंकि उन्होंने इस पोस्टिंग के लिए कथित तौर पर काफी मोटा दाम चुकाया होगा। परंतु मेंबर ट्रैफिक को उन्हें चार्ज दिलवाने की ऐसी क्या जल्दी थी, यह समझने वाली बात है।” उन्होंने इसका कारण यह बताया कि “इस पोस्टिंग के लिए मेंबर ट्रैफिक ने जो डील की है, यदि चार्ज टेकिंग ओवर में देरी होती, तो उन्हें यह पोस्टिंग रद्द होने और एक मोटी डील उनके हाथ से न निकल जाने की आशंका रही होगी! इसीलिए उन्हें चार्ज दिलाने की जल्दी थी।” उनका यह भी कहना था कि “यह आशंका सिर्फ मेंबर ट्रैफिक को ही नहीं, बल्कि उस पूर्व रेल राज्यमंत्री को भी थी, जिसने यह डील करवाई है!” उनका तो यह भी मानना है कि इस मामले में पीएमओ के भी सूत्र जुड़े हुए हैं। इस बात से रेलवे बोर्ड के हमारे विश्वसनीय सूत्रों ने भी इत्तेफाक जाहिर किया है।

उल्लेखनीय है कि आईआरटीएस-2000 बैच के कई अधिकारियों का पैनल जनवरी 2020 में ही फाइनल हो चुका था। पक्की खबर यह भी है कि फाइल पर इन सबकी प्रमोशनल पोस्टिंग भी तभी कर दी गई थी। तथापि चूंकि सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड को इनमें से अपने एक चहेते, जिसकी फाइल पर प्रस्तावित पोस्टिंग उत्तर पश्चिम रेलवे, जयपुर की गई है, को दिल्ली में ही बनाए रखना है, इसलिए उन्होंने हम सबकी पोस्टिंग अटकाई हुई है।

अब इसमें से चूंकि मनोज कुमार ने अपनी गोटियां सीधे मेंबर ट्रैफिक के साथ फिट कर लीं, इसलिए उनको फेवर करने के लिए उनके साथ कमलेश गोसाई की पोस्टिंग की गई है। सूत्रों का कहना है कि यह फाइल सीआरबी को भी नहीं भेजी गई, जबकि सीएफटीएम की पोस्टिंग की फाइल सीआरबी तक जाती है। चूंकि रेलमंत्री ने डायरेक्टर/रेल मूवमेंट के पद को अपग्रेड करने और उस पर मनोज कुमार की ही पोस्टिंग की मेंबर ट्रैफिक की अनुशंसा को खारिज करते हुए फाइल लौटा दी थी, अतः अब उनकी सीएफटीएम में पोस्टिंग की फाइल सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड द्वारा चालाकी दिखाते हुए सीआरबी के पास भी नहीं भेजी गई।

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अटके हुए अधिकारियों का कहना है कि बाकी हम सब अभी भी इसलिए अटके हुए हैं, क्योंकि हमारी पोस्टिंग तो तभी हो पाएगी जब सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड अपने चहेते को दिल्ली में फिट करने का कोई मुकम्मल जुगाड़ कर लेंगे। अभी तो फिलहाल उन्होंने कोविद के नाम पर उसे स्वास्थ्य मंत्रालय में टिकाकर दिल्ली में ही रखा हुआ है।

जिस तरह सरकार और रेलमंत्री द्वारा भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था की बात करना न सिर्फ बेमानी है, बल्कि यह केवल एक कोरी बकवास है। उसी तरह रेलमंत्री द्वारा 10-15 साल से एक शहर-एक रेलवे में टिके ऐसे तमाम अधिकारियों को दर-बदर करने की घोषित नीति भी अब तक केवल बकवास ही साबित हुई है। रेलवे बोर्ड के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि “यदि सरकार में, और रेलमंत्री सेल से लेकर मंत्रियों और पार्टी सांसदों तक किसी की पहुंच है, तो उसके लिए सब कुछ संभव है।” रेल मंत्रालय में ऐसे अनेकों उदाहरण मौजूद हैं।

Why this IRTS officer is being most favoured by Railway Board repeatedly?

रेल मंत्रालय में भ्रष्टाचार का यह आलम रेलमंत्री सेल से लेकर कमोबेश हर बोर्ड मेंबर और विभाग प्रमुख तक पसरा हुआ है। ठेकेदारों का कहना है कि “प्रत्येक टेंडर में कमीशन का रेट कुल मिलाकर लगभग 10% तक पहुंच चुका है। तथापि अब जब रेलवे की आंतरिक आर्थिक स्थिति गड़बड़ा गई है और कर्मचारियों को वेतन देने तक के लाले पड़ने की नौबत आ चुकी है, तब एक तरफ वैश्विक महामारी के समय भी मालगाड़ियां चलाई गईं हैं, तो दूसरी तरफ खुद के साथ रेलवे की कमाई के लिए आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के नाम पर पार्सल स्पेशल ट्रेनें चलाकर हार्ड पार्सल की ढ़ुलाई की जा रही है।”

जाहिर है कि ऐसे में यह महामारी रेलमंत्री के साथ ही कुछ कदाचारी रेल अधिकारियों के लिए भी वरदान स्वरुप साबित हो रही है। यही वजह है कि उन्हें मनोज कुमार जैसे जुगाड़ू और कमाऊ पूतों की सख्त जरूरत है। इसीलिए उनको कमाऊ पोस्ट पर बैठाना उन्हें जरूरी लगता है। इसीलिए उनकी नीति और निर्णय में कहीं कोई एकरूपता नहीं है। इसीलिए अब कास्ट कटिंग की बात की जा रही है। इसके लिए रेलवे बोर्ड ने सभी जोनल रेलों को मौखिक आदेश जारी किया है। रेलकर्मियों की 50% कटौती के लिए रेलमंत्री ने तो पहले ही फरमान जारी किया हुआ है।








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सीपीडी/आरई/दानापुर पर अति-मेहरबान रेलवे बोर्ड ! – RailSamachar

क्या भारतीय रेल में अभय कुमार चौधरी के जितना काबिल अधिकारी अब कोई बचा ही नहीं?

सीपीडी/आरई/दानापुर अभय कुमार चौधरी पर पूर्व मेंबर ट्रैक्शन घनश्याम सिंह के रिटायर होने के एक साल बाद भी रेलवे बोर्ड आखिर क्यों मेहरबान है। यह बात किसी की भी समझ से परे है। घनश्याम सिंह, जिनका नाम उनकी भ्रष्ट कार्य-प्रणाली के चलते साथी विद्युत अधिकारियों ने “घमासान सिंह” रख दिया था, ने ही मेंबर ट्रैक्शन बनते ही अपने चहेते अभय कुमार चौधरी को सीपीडी/आरई/दानापुर बनाया था।

इतना ही नहीं घमासान सिंह ने अपने कार्यकाल में अक्टूबर 2018 से सीपीडी/आरई/हावड़ा का कुछ हिस्सा सीपीडी/आरई/दानापुर को ट्रांसफर कर दिया था। फरवरी 2019 में जब सीपीडी/आरई/हावड़ा का ट्रांसफर हो गया, तब घमासान सिंह ने सीपीडी/आरई/दानापुर को सीपीडी/आरई/हावड़ा का पूरा चार्ज सौंप दिया। जो अभी तक चल रहा है। जबकि घनश्याम सिंह का रिटायरमेंट हुए इसी माह एक साल होने जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि चीफ प्रोजेक्ट डायरेक्टर/रेलवे इलेक्ट्रीफिकेशन (सीपीडी/आरई) दानापुर अभय कुमार चौधरी को घमासान सिंह का लगातार वरदहस्त प्राप्त रहा है। विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि इन दोनों की सेटिंग इतनी जबरदस्त है कि अभी भी आरई दानापुर का अच्छा खासा धन उगाही का हिस्सा घमासान सिंह को पहुंच रहा है! तथापि, रेलवे बोर्ड, रेलवे विजिलेंस और कोर मुख्यालय/प्रयागराज के दिमाग़ में अब तक उन्हें हटाने का ख्याल भी नहीं आ रहा है।

आज जबकि सीपीडी/आरई/हावड़ा के अधीन लगभग 1000 टीकेएम से अधिक का इलेक्ट्रीफिकेशन का काम चल रहा है, जो कि सीपीडी/आरई/दानापुर के कार्यक्षेत्र से ज्यादा है। फिर भी सीपीडी/आराई/हावड़ा की जगह किसी भी इलेक्ट्रिकल ऑफीसर की पोस्टिंग नहीं की जा रही है। जैसे कि अभय कुमार चौधरी के जितना काबिल अधिकारी भारतीय रेल में अब कोई बचा ही नहीं है।

सूत्रों का कहना है कि अभय कुमार चौधरी को रेलवे बोर्ड विजिलेंस का भी वरदहस्त प्राप्त है। इसीलिए वह ओपन लाइन द्वारा किए गए ज़्यादातर काम के टेंडर अपने चहेते कांट्रेक्टर को अवार्ड करते हैं और कथित फाल्स बिलिंग कर करोड़ों रुपये का आपस में ठेकेदार के साथ मिलकर बंदरबांट कर रहे हैं। सीपीडी/आरई/हावड़ा के सभी टेंडर भी सीपीडी/आरई/दानापुर यानि अभय कुमार चौधरी द्वारा ही पटना में बैठकर किए जा रहे हैं।

यही वजह है कि शायद करोड़ों के खेल में रेलवे बोर्ड और विजिलेंस को भी मोटा माल पहुंच रहा होगा? इसीलिए सीपीडी/दानापुर अभय कुमार चौधरी को हटाने की बात तो दूर रही, उसे पिछले 18-20 महीनों से सीपीडी/आरई/हावड़ा की पोस्ट का अतिरिक्त प्रभार देकर और उसे खाली रखकर लुकिंग ऑफ्टर अरेंजमेंट से काम चलाया जा रहा है, जबकि बतौर सीपीडी/दानापुर अभय कुमार चौधरी का कार्यकाल भी पूरा हो चुका है।

अब होना यह चाहिए कि अभय कुमार चौधरी को अविलंब सीपीडी/दानापुर की पोस्ट से ट्रांसफर करके उनके अधीन हुए अब तक सभी कार्यों और उनके द्वारा पटना के विभिन्न मॉल्स में खरीदी गई दूकानों सहित उनकी समस्त चल-अचल संपत्तियों की सीबीआई जांच कर करोड़ों के घोटाले को उजागर कर उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिए। इसके साथ ही सीपीडी/आरई/हावड़ा के पद पर किसी अन्य सक्षम अधिकारी की पोस्टिंग अविलंब होनी चाहिए। क्रमशः

बेशर्मों को सींग और पूंछ नहीं होती!

देखें, घनश्याम सिंह उर्फ घमासान सिंह द्वारा अपनी वाहवाही के लिए बनाया गया वीडियो, जबकि वह अपनी पूरी रेलसेवा के दौरान भ्रष्टाचार के लिए पूरी भारतीय रेल में न सिर्फ अत्यंत विवादास्पद रहे, बल्कि बदनाम होकर रिटायर हुए और अभी भी न सिर्फ जम्मू-दिल्ली के सीबीआई दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, बल्कि क्वालिटी इंजीनियरिंग द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में दायर किए गए एक मुकदमें का सामना भी उन्हें करना पड़ रहा है।








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