कोच पोजीशन में रेल अधिकारी थोड़ी तो उपयोग करें अपनी बुद्धिमत्ता

रेलवे को है केवल अपनी कमाई की चिंता, यात्रियों की कोई परवाह नहीं

गुरुवार, दि. 17.06.2021 को ट्रेन नं.  01079 लोकमान्य तिलक टर्मिनस से गोरखपुर के लिए चली स्पेशल ट्रेन में ए-1 कोच के यात्री लगातार ट्रेन कंडक्टर को शिकायत कर रहे हैं कि उनके कोच के साथ जुड़े जनरल कोच के यात्री उनका टॉयलेट गंदा कर रहे हैं, अतः दोनों कोचों के बीच खुला वेस्टिबुल बंद कराया जाए, क्योंकि इसके चलते न केवल एसी ए-1 कोच में बदबू आ रही है, बल्कि उनकी शांति भी भंग हो रही है और रेल की यह कोच व्यवस्था बिल्कुल गलत है।

गुरुवार को ए-1 कोच के यात्रियों की कोई सुनवाई ऑन बोर्ड ट्रेन स्टाफ ने नहीं की। ट्रेन में चल रहा कैटरिंग वेंडिंग स्टाफ बार-बार उक्त वेस्टिबुल को खोलकर अपना धंधा करता रहा। यात्रियों के मना करने पर उनका प्रतियुत्तर होता है कि “तुम्हारी शांति और कोच में होने वाली गंदगी के लिए हम अपना धंधा नहीं छोड़ सकते!”

शुक्रवार, 18.06.2021 की सुबह जब ट्रेन ललितपुर के आसपास पहुंच रही थी, तब फिर वही परिदृश्य उपस्थित हो गया जब वेंडिंग स्टाफ वेस्टिबुल खुला छोड़कर अपना धंधा करने गया, तो जनरल कोच के यात्री ए-1 कोच के टॉयलेट का उपयोग करके दोनों टॉयलेट पूरी तरह से गंदे कर चुके थे। इससे आई बदबू के चलते ए-1 कोच के गेट से लगे पहले कूपे में बर्थ नंबर एक से छह में बैठे सभी यात्री बिफर उठे।

कोच कंडक्टर (भोपाल मंडल स्टाफ) को बुलाया गया। वह उल्टे यात्रियों को ही यह कहकर समझाने लगा कि “कोच को यहां इसलिए लगाया गया है, क्योंकि स्टाफ कम है और इतने ही स्टाफ को ज्यादा से ज्यादा कैश/केस बनाने का दबाव रहता है। केस तो जनरल कोच में ही मिलते हैं।” अब स्टाफ की इस बेचारगी पर यात्री क्या कहें, क्योंकि यह उनकी समस्या नहीं है। तथापि कंडक्टर ने जो भी समझाया वह विषय अथवा यात्री समस्या से अलग था।

बहरहाल, कंडक्टर ने यह कहकर यात्रियों को शांत किया कि अब उक्त वेस्टिबुल नहीं खोला जाएगा। तथापि उपरोक्त यात्रियों ने कंडक्टर को संबोधित करते हुए सोशल मीडिया पर रेल प्रशासन द्वारा की जाने वाली कोविड प्रोटोकॉल संबंधी बड़ी-बड़ी बातों का उल्लेख करके रेलवे की तमाम लानत-मलामत कर दी। यात्रियों ने यह भी कहा कि “इसी तरह की गतिविधियों के कारण रेलवे अपने स्थाई उपयोगकर्ताओं को गंवा रहा है। वह तो अब भविष्य में कभी रेल से यात्रा नहीं करेंगे।”

वास्तविकता यह है कि किसी भी ट्रेन में एसी कोचों को जनरल कोचों के साथ संलग्न नहीं किया जाता, और ऐसा लगभग अन्य सभी ट्रेनों में है भी, जिनमें सेकेंड एसी कोच के बाद थर्ड एसी, फिर स्लीपर, पैंट्री तथा बाकी कोचों की सीक्वेंस होती है। तथापि इस ट्रेन में एसी कोच, वह भी सेकेंड एसी कोच, को जनरल कोच के साथ अटैच किया गया है।

“अब यह बुद्धिमत्ता जिस किसी अधिकारी ने दर्शाई है, उसे पीयूष गोयल की जगह रेलमंत्री की कुर्सी पर बैठाया जाना चाहिए, क्योंकि पीयूष गोयल की अपेक्षा उक्त अधिकारी ज्यादा तत्परता से रेलवे को बरबाद करेगा!” यह कहना था उपरोक्त रेलयात्रियों का।

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अक्षम रेलकर्मियों के मरने के लिए लावारिस छोड़ देता है रेल प्रशासन – RailSamachar

मामलों को सालों-साल लटकाकर अक्षम रेलकर्मियों को मरने के लिए अकेला छोड़ देना अत्यंत अमानवीय कृत्य है!

खबर है कि मध्य रेलवे में मेडिकल इनवैलीडेशन के बहुत से मामले लंबे समय से पेंडिंग हैं। इसके लिए प्रिंसिपल सीएमडी, मध्य रेलवे द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है। यह पीसीएमडी की अकर्मण्यता है या लापरवाही? यह पूछ रहे हैं मेडिकली काम करने में अक्षम हो चुके रेलकर्मियों के तमाम परिजन।

बताते हैं कि पूरी भारतीय रेल में इस तरह के सैकड़ों-हजारों केस लंबित हैं। परिजनों के सामने उनके मरने की प्रतीक्षा करने के सिवा कोई विकल्प नहीं है।

उनका कहना है कि अपने एकमात्र कमाऊ व्यक्ति को मरते हुए देखना बहुत अमानवीय है, परंतु उनके सामने अन्य कोई विकल्प नहीं बचा है। आर्थिक रूप से भी ऐसे सभी परिवार बुरी तरह टूट चुके हैं।

इस मामले में जानकारों का कहना है कि रेल प्रशासन को वैसे भी संबंधित रेलकर्मी के किसी न किसी परिजन को अनुकंपा नियुक्ति देनी है। ऐसे में अगर लंबे समय से असाध्य बीमारियों के चलते कर्मचारी काम करने में अक्षम और अयोग्य हो चुका है, तो मेडिकली इनवैलीड सर्टिफाई करके और उसके किसी परिजन को अनुकंपा नियुक्ति देकर उसके परिवार को आर्थिक रूप से कंगाल होने से बचाया जा सकता है।

उनका कहना है कि जब उनको नियमानुसार अनुकंपा नियुक्ति देनी ही है, तो रेलकर्मी के मरने का इंतजार किए बिना भी यह काम बहुत आसानी से और मानवता के आधार पर समय रहते किया जाना चाहिए।

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अब जीएम पोस्टिंग में देरी से और ज्यादा होगी रेल मंत्रालय की किरकिरी

सरकार, मंत्री और सीआरबी जब व्यवस्था के हित की सोचकर कोई निर्णय लेंगे, तभी इसका कुछ भला हो पाएगा। तभी समय पर सही निर्णय और उस पर अमल सुनिश्चित हो पाएगा, तभी रेल का और देश का भी भला होगा, अन्यथा व्यवस्था का तिया-पांचा तो हो ही रहा है।

साढ़े आठ महीने (सितंबर 2020 से 12 जून 2021) बीत जाने के बाद अंततः जीएम पैनल फाइनल होकर शनिवार, 12 जून को रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) में आ गया। अप्रैल में डीपीसी और एसीसी से फाइनल होकर 23-24 मई से यह प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर के लिए पीएमओ में लंबित था।

जीएम पैनल जिस तरह सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि रेलकर्मी और अधिकारी इसके फाइनल होकर आने की प्रतीक्षा कितनी बेसब्री के साथ कर रहे थे।

अब यह सुनिश्चित किया जाए कि बिना कोई देरी किए, बिना किसी फेवर या बारगेनिंग के वैकेंसी सीक्वेंस के अनुसार जीएम की पोस्टिंग की जाएं, अन्यथा ज्ञापनबाजी की शुरूआत होगी, फिर ज्यादा देरी होगी और फिर रेलवे की फजीहत होगी!

इसके अलावा, 30 जून को खाली हो रही तीन जीएम पोस्टों को भी इसी पोस्टिंग प्रस्ताव में शामिल किया जाना चाहिए!

यह अपेक्षा उन सभी वरिष्ठ अधिकारियों की है जो पिछले छह महीनों से अपनी पोस्टिंग की प्रतीक्षा कर रहे हैं और जिनका जीएम में काम करने का कार्यकाल पहले ही छह महीने कम हो चुका है, या जानबूझकर कम किया गया है।

फिलहाल क्रमवार खाली जीएम पद और वैकेंसी सीक्वेंस के अनुसार पोस्टिंग की प्रतीक्षा में वरिष्ठ अधिकारियों की स्थिति निम्नवत है –

1. पूर्व रेलवे                  – अरुण अरोरा
2. उत्तर मध्य रेलवे        – प्रमोद कुमार
3. आईसीएफ               – अतुल अग्रवाल
4. दक्षिण पश्चिम रेलवे   – संजीव किशोर
5. मध्य रेलवे                – ए. के. लाहोटी
6. दक्षिण पूर्व रेलवे        – अर्चना जोशी

इस महीने 30 जून को खाली हो रहे जीएम के तीन पद

1. जीएम/पूर्व मध्य रेलवे
2. डीजी/आरडीएसओ
3. जीएम/दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे

उपरोक्त तीनों पदों पर वैकेंसी सीक्वेंस के अनुसार जीएम पैनलिस्ट तीन वरिष्ठ अधिकारियों – अनुपम शर्मा, आलोक कुमार एवं विजय शर्मा – की जीएम पद पर पोस्टिंग का नंबर लगता है।

एडवांस में हो जीएम पैनल की प्लानिंग

अब आगे से यह भी सुनिश्चित किया जाए कि जीएम पैनल की तैयारी एडवांस में हो। अगर पैनल फाइनल करने की प्रक्रिया में छह-सात महीनों का समय लगता है, जो कि वास्तव में नहीं लगना चाहिए, तो कैलेंडर वर्ष 2022 के जीएम पैनल की तैयारी आज से ही शुरू कर दी जानी चाहिए।

डीआरएम की पोस्टिंग में देरी से भी असंतोष

इसके अलावा, यदि डीआरएम की भी पोस्टिंग में और ज्यादा विलंब होते देखकर पोस्टिंग की प्रतीक्षा कर रहे हताश अधिकारी कह रहे हैं कि यह इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि “रेल नेतृत्व विहीन है और शीर्ष पद पर बैठा अधिकारी उस पर बैठने के लायक नहीं है, उसे फौरन से पेश्तर रिप्लेस किए जाने की आवश्यकता है।”

बहुत पहले साबित हो चुकी थी अकर्मण्यता

हालांकि यह बात तो वर्ष 2018 में अनिर्णय, अकर्मण्यता, मानवीयता, सहृदयता और नेतृत्व गुणवत्ता इत्यादि को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा कराए गए सर्वे में पहले ही साबित हो चुकी थी, तथापि बलिहारी है भारत सरकार की कि जिसे अपरिमित टैलेंट्स से परिपूर्ण भारतीय रेल में शीर्ष पर बैठाने के लिए केवल वही मिलता है, जो उसे मौके पर सही सलाह देने में अक्षम होता है, जी-हजूरी करने में अव्वल होता है, और जो हुकुम का गुलाम होता है, जिसके लिए व्यवस्था के हित के बजाय मंत्री का या अपना हित सर्वोपरि होता है।

सरकार या मंत्री और सीआरबी जब व्यवस्था के हित की सोचकर कोई निर्णय लेंगे, तभी इसका कुछ भला हो पाएगा। तभी समय पर सही निर्णय और उस पर अमल सुनिश्चित हो पाएगा, तभी रेल का और देश का भी भला होगा, अन्यथा व्यवस्था का तिया-पांचा तो हो ही रहा है।

#PiyushGoyal #RailMinIndia #PMOIndia #IndianRailway #RailwayBoard #CEORlys #DoPTGoI





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रेल संगठनों के निठल्ले पदाधिकारियों की चापलूसी से बचें रेल अधिकारी

DRH/KYN: डॉक्टर की तत्परता से बची रेलकर्मी की जान

डॉक्टरों और रेल अधिकारियों को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि वे रेल प्रशासन द्वारा सौंपी गई आधिकारिक जिम्मेदारी और अपने पेशेगत दायित्व का निर्वाह कर रहे होते हैं। अतः उन्हें रेल संगठनों के कुछ निठल्ले पदाधिकारियों की चापलूसी से बचने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए!

In absence of regular surgeon, Dr. Rafiqul Islam, ACMS, Divisional Railway Hospital, Kalyan (DRH/KYN) has again done an exemplary work by diagnosing injured on duty (IOD) railway employee as suffering from serious internal injury and going into in shocked state on 12.05.2021 at 12:00 Noon.

His clinical acumen and alacrity have saved Vikram Kumar’s life who is seriously injured on duty working at diesel loco shed, Kalyan.

His index of suspicion of internal injury came true as he underwent exploratory laparotomy at Fortis hospital Kalyan within half an hour of landing in the hospital.

His mesenteric artery was damaged due to blunt trauma and he lost two and half litres of blood internally.

This is all appreciable because of Dr Rafiqul’s efforts, sincerity and clinical presence of mind.

घटना का विवरण कुछ इस प्रकार है –

बुधवार, 12 मई 2021 को कल्याण डीजल शेड में विक्रम कुमार नामक टेक्नीशियन एक डीजल लोको पर मार्कर लाइट का काम कर रहा था। इसी दौरान अचानक पीछे से एक इंजन रोल डाउन होकर उसके इंजन से टकराया।

विक्रम कुमार जिस इंजन पर काम कर रहे थे, उसके बफर के सामने खड़े हुए थे और पिछले इंजन का बफर उनके इंजन के बफर से टकराया और वह दोनों बफर के बीच में दब गए।

तत्काल वहां आसपास उपस्थित अन्य रेलकर्मियों, जो एक रेल संगठन के सक्रिय सदस्य बताए गए हैं, ने विक्रम को उस बफर में से बाहर निकालकर बिना देरी किए कल्याण रेलवे हॉस्पिटल पहुंचाया।

कल्याण रेलवे अस्पताल में सर्जन की अनुपस्थिति में अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए एसीएमएस डॉ रफीकुल इस्लाम ने हादसे की गंभीरता को भांपते हुए तत्काल सीएमएस डॉ शशांक मल्होत्रा को सूचित किया और उनकी अनुमति से बिना देरी किए आंतरिक रूप से गंभीर घायल विक्रम कुमार को कल्याण के फोर्टिस हॉस्पिटल में भेज दिया गया, जहां डॉक्टरों की तात्कालिक सक्रियता से उसकी जान बच सकी।

ओछी मानसिकता का प्रदर्शन करने से बचें रेल संगठनों के पदाधिकारी

इस बीच उसे अस्पताल लाने वाले रेलकर्मी हर समय उसके साथ थे और जहां पैसे की जरूरत पड़ी वहां उन्होंने पैसा भी खर्च किया। लेकिन बताते हैं कि अगले दिन गुरुवार, 13 मई को एक अन्य रेल संगठन के कुछ लोग, जिनका कि इस महती कार्य में कोई विशेष योगदान नहीं रहा, वे डॉक्टरों को गुलदस्ते देकर फोटो खिंचा रहे थे।

इतनी गंभीर स्थिति में भी यदि कुछ रेलकर्मी अपने सहकर्मी रेल कर्मचारी का सहयोग करने के बजाय रेलवे अस्पताल में जाकर सीएमएस और डॉक्टरों को बुके देकर अपना क्रेडिट ले रहे थे, यह न सिर्फ अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि आपदा में अवसर तलाशने की विकृत मानसिकता का द्योतक भी है।

भविष्य में कोई भी सामाजिक कार्यकर्ता अथवा यूनियन के पदाधिकारी इस तरह की दूषित मानसिकता और ओछी हरकतों का प्रदर्शन करने से बचें, तो उचित होगा।

डॉक्टर और अधिकारी भी बचें चापलूसी से!

संदर्भ वश यहां डॉक्टरों और अधिकारियों को भी ऐसे हर मौके पर यह ध्यान रखना चाहिए कि वे रेल प्रशासन द्वारा सौंपी गई आधिकारिक जिम्मेदारी और अपने पेशेगत दायित्व का निर्वाह कर रहे होते हैं।

अतः उन्हें रेल संगठनों के कुछ दलाल टाइप निठल्ले पदाधिकारियों की चापलूसी से बचने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि उनके साथ नजदीकी दर्शाकर इस तरह कुछ संगठन पदाधिकारी कई बार सामान्य रेलकर्मियों का आर्थिक शोषण करने से भी बाज नहीं आते हैं।

#DRHKYN #CentralRailway #Union #Railway





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रेल मंत्रालय खोद रहा स्थाई रोजगार की जड़ें, टाटा ग्रुप दे रहा रिटायरमेंट तक की गारंटी!

“अब तो रोबोट तमाम काम कर रहे हैं, उनमें जिस तरह की प्रोग्रामिंग सेट कर दी जाती है, वे वैसा ही काम करते हैं, तो क्यों न रेलवे के चेयरमैन/सीईओ, बोर्ड मेंबर्स सहित सभी महाप्रबंधकों और सभी प्रमुख मुख्य विभागाध्यक्षों के पदों पर प्री-प्रोग्रामिंग करके रोबोट बैठा दिए जाएं और इनके पदों को सरेंडर कर दिया जाए!”

रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड), भारत सरकार ने 20 मई 2021 को कैलेंडर वर्ष 2021-22 के लिए एक वर्क स्टडी प्रोग्राम के तहत पदों को सरेंडर करने का दिशा-निर्देश सभी जोनल रेलों के महाप्रबंधकों को जारी किया है।

इस आदेश के अनुसार रेलवे के ग्रुप ‘सी’ और ‘डी’ श्रेणी के रेल कर्मचारियों के 13,450 पद चालू वर्ष में सरेंडर (खत्म) किए जाएंगे और इनकी कीमत को इम्पलाईज बैंक में जमा करने के लिए कहा गया है।

इसके अलावा कोरोना महामारी के चलते भी हजारों की संख्या में रेलकर्मी अकाल काल कवलित हुए हैं। यदि इसके चलते भी सरकार द्वारा खाली हुए रेलवे के इन हजारों पदों को भी स्कैप करके इम्प्लाइज बैंक में जमा करने का निर्णय निकट भविष्य में ले लिया जाए, तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।

रेल मंत्रालय का निश्चित रूप से यह एक आत्मघाती और युवाओं को स्थाई रोजगार मुहैया कराने का विरोधी फैसला है। सरकारी नौकरशाही की इस सरेंडर नीति के पीछे जो मानसिकता है, वह उच्च स्तर के पदों के सृजन की है।

पहले जो एक ‌विभाग प्रमुख का पद हुआ करता था, उसे अब मुख्य विभाग प्रमुख कर दिया गया है और अब उसके नीचे तीन-तीन, चार-चार विभाग प्रमुख हो गए हैं। इंजीनियरिंग विभाग में तो आधा दर्जन से ज्यादा ऐसे पद सृजित हो गए हैं, क्योंकि सबको मलाई यहीं से मिलनी है। इसी तरह हर विभाग में मुख्यालय स्तर पर चार-पांच-छह तक की संख्या में विभाग प्रमुखों की भरमार हो गई है।

प्रत्येक मंडल में अब तीन-तीन अपर मंडल रेल प्रबंधक (एडीआरएम) के पद हो गए हैं और इनका काम देखें तो शून्य है। अब हर जोन में एक अपर महाप्रबंधक (एजीएम) का पद भी सृजित कर दिया गया है। जब महाप्रबंधक का पद है, तो फिर अपर महाप्रबंधक की क्या जरूरत है? इसका औचित्य (जस्टिफिकेशन) बताने अथवा देने को कोई तैयार नहीं है।

पूर्व मध्य रेलवे के गठन के पहले पूर्वोत्तर रेलवे में पांच मंडल हुआ करते थे, जो वर्ष 2002-03 में विभाजन के पश्चात अब तीन रह गए हैं। जब इसमें पांच मंडल थे, तब इसे एक जनरल मैनेजर (जीएम) संभाल लेता था और आज केवल तीन मंडल हैं, तो भी इसकी व्यवस्था संभल नहीं रही है।

यही हाल उन बाकी सभी छोटी जोनल रेलों का भी है, जिनका गठन 2002-03 में हुआ था और जिन्हें राजनीतिक उद्देश्य से कमोबेश राज्यों के स्तर तक सीमित कर दिया गया था। सब में एक-एक एजीएम बैठाया गया है, तब भी परिणाम जस का तस ही है।

रेलवे के जिन 13,450 पदों को सरेंडर करने का आदेश रेलवे बोर्ड ने दिया है, वह इस देश के युवाओं के स्थाई और सम्मानित रोजगार की खुली लूट है।

ऐसा नहीं है कि काम की कमी के चलते इन पदों को सरेंडर किया जा रहा है। इसके पीछे का उद्देश्य आउटसोर्सिंग एजेंसियों को लाभ पहुंचाना है, क्योंकि ग्रुप ‘डी’ के कर्मचारी जो काम करते हैं, उसके लिए तो हाथों की जरूरत पड़ेगी ही, लेकिन जिस काम को करने के लिए एक स्थाई रेलकर्मी माहवार 35 हजार से 50 हजार तक मजदूरी पाता है, उसी काम को आउटसोर्सिंग एजेंसी एक कर्मचारी से 10-15 हजार में कराएगी।

ऐसे संविदा कर्मियों को न पीएफ देने का झंझट होगा, न ही रोजगार सुरक्षा की कोई गारंटी होगी और न ही ईएसआईएस की कोई सुविधा देने का सरदर्द होगा, जब चाहे तब उसे कान पकड़कर निकाल बाहर करने की मनमानी छूट होगी, वह अलग!

यह इस देश के पढ़े-लिखे युवाओं का खुला शोषण है। श्रम पैसा है, और पैसे की यह बड़ी तथा खुली लूट हो रही है!

ऐसे मुद्दों पर सिविल सोसायटी की चुप्पी बहुत हैरान करने वाली है कि चौबीस घंटे हिन्दू-मुस्लिम पर बहस करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी अपने बच्चों के भविष्य को बरबाद होते देखकर भी सरकार की इन रोजगार विरोधी नीतियों पर मूकदर्शक क्यों बने हुए हैं? स्थाई रोजगार नहीं होने का दंश आज कोविड की महामारी में यह देश भुगत रहा है।

किसी भी देश को अस्थाई और संविदा पर काम करने वाले कर्मियों से कदापि संचालित नहीं किया जा सकता है। यह सब कोविड जैसी महामारी और आए दिन आ रहे तटवर्ती समुद्री तूफानों के चलते देखने को मिला है तथा लगातार अनुभव में भी आ रहा है।

रेलवे बोर्ड ने अपनी सरेंडर पालिसी के बचाव में तर्क दिया है कि “आज के दौर में तकनीक के विकास से कम लोगों के जरिए काम का लक्ष्य (वर्क टारगेट) हासिल कर लिया जा रहा है, इसलिए इन पदों को सरेंडर करने से रेलवे के काम पर कोई असर नहीं पड़ेगा।”

इस संबंध में मेरा यह मानना है कि “अब तो रोबोट तमाम काम कर रहे हैं, उनमें जिस तरह की प्रोग्रामिंग सेट कर दी जाएगी, वे वैसा ही काम करेंगे, तो क्यों न रेलवे के चेयरमैन सीईओ, बोर्ड मेंबर्स सहित सभी महाप्रबंधकों और सभी प्रमुख मुख्य विभागाध्यक्षों के पदों पर प्री-प्रोग्रामिंग करके रोबोट बैठा दिए जाएं और इनके पदों को सरेंडर कर दिया जाए, कम खर्च में बहुत सारा, बल्कि बहुत ज्यादा काम का लक्ष्य हासिल हो जाएगा। इस प्रकार बेईमानी और कमीशनखोरी की भी कोई आशंका नहीं रह जाएगी।”

परंतु रेलवे की स्थिति यह है कि जो महाप्रबंधक जितने ज्यादा पद सरेंडर करेगा, वह उतना ही काबिल माना जाएगा और जो अध्यक्ष रेलवे को जितनी जल्दी बेच देगा, वह नीति आयोग में भेज दिया जाएगा। हुक्म के गुलामों की यह स्थिति पूरी व्यवस्था को चौपट करने पर उतारू है।

इसलिए अब समय आ गया है कि देश का हर नौजवान अपने स्थाई रोजगार की इस चोरी को रोकने के लिए लामबंद होकर अविलंब उठ खड़ा हो, तभी स्थाई रोजगार को और इस देश की बरबाद होती व्यवस्था को बचाया जा सकता है।

लेखक रेलवे में कार्यरत एक वरिष्ठ अधिकारी हैं!

प्रस्तुति: सुरेश त्रिपाठी

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पूरी भारतीय रेल में अब तक हजारों रेलकर्मी हुए कोरोना का शिकार, झूठे आंकड़े देकर झूठ बोलते रहे सीईओ/रे.बो.

झूठ बोलने में रेलवे बोर्ड का कोई सानी नहीं, सुनीत शर्मा, चेयरमैन/सीईओ/रे.बो. ने तोड़े अकर्मण्यता और अनिर्णय के सारे रिकॉर्ड

सुरेश त्रिपाठी

कोरोना महामारी के दूसरे चरण में पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल 314 लोको पायलट्स की मृत्यु का आंकड़ा सामने आया है। हालांकि यह अविश्वसनीय संख्या है, क्योंकि मौत के समाचार जिस गति से चल रहे हैं, उनको देखकर इस आंकड़े पर कोई भी रनिंग स्टाफ भरोसा नहीं कर पा रहा है।

रनिंग स्टाफ के कई वरिष्ठ सुपरवाइजरों का कहना है कि “वास्तव में यह आंकड़ा इससे भी ज्यादा है।” वे कहते हैं, “हॉस्पिटल में कोविड से हुई मौत बताया जाता है, परंतु जब डाटा उनके कार्यालय में आता है तो वही डेथ किसी अन्य कारण से हुई बताई जाती है। यह अत्यंत अविश्वसनीय है।”

स्टेशन मास्टर कैडर में भी अब तक 150 से ज्यादा मौतें कोविड संक्रमण के चलते हो चुकी हैं। पूरा कैडर जब रेल प्रशासन की अनमनस्कता के प्रति आक्रोशित हुआ और उचित ध्यान नहीं दिए जाने पर ड्यूटी न करने की चेतावनी दी, तब प्रशासन को होश आया और उसने उनके साथ वर्चुअल मीटिंग करके समस्या का समाधान करने की पहल हुई।

टिकट चेकिंग, टिकट बुकिंग, पार्सल, लगेज, आरक्षण इत्यादि कैडर्स, जो लगातार पब्लिक के संपर्क में रहते हैं, में भी काफी रेलकर्मी कोरोना का शिकार हुए हैं, परंतु उनके अधिकृत आंकड़े अब तक सामने नहीं आए हैं। तथापि उनकी मौतों के दु:खद समाचार लगातार आते रहते हैं।

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इस महामारी के दूसरे चरण में, जब उम्र का कोई बंधन नहीं रह गया, हर आयु-वर्ग के बहुत सारे रेलकर्मी और अधिकारी काल-कवलित हुए हैं। परंतु ऐसा लगता है कि रेल प्रशासन ने उनकी मौतों को अब तक भी गंभीरता से नहीं लिया है, बल्कि देखने में यही आया है कि उनकी मौत के आंकड़े छिपाने में और व्यवस्था को दिग्भ्रमित करने में रेलवे बोर्ड की ज्यादा रुचि रही है।

चेयरमैन/सीईओ/रेलवे बोर्ड ने झूठ बोला

यदि ऐसा नहीं होता, तो ओपन प्रेस कॉन्फ्रेंस में चेयरमैन सीईओ रेलवे बोर्ड झूठ नहीं बोलते, झूठे आंकड़े प्रस्तुत नहीं करते, मांगे जाने पर भी वह रेलकर्मियों-अधिकारियों की मौत के आंकड़े देने से इंकार नहीं करते!

यदि ऐसा नहीं होता, तो वे मार्च 2020 से दिए गए आंकड़ों का औचित्य सिद्ध करते और जनवरी 2021 से अब तक हुई रेलकर्मियों-अधिकारियों की मौत के आंकड़े शेयर करते! जो कि दिन-प्रतिदिन के हिसाब से रेलवे बोर्ड में संकलित होते हैं।

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जोनल रेलों के विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 1 मई 2021 को पूरी भारतीय रेल में कोरोना से संक्रमित रेलकर्मियों की कुल संख्या 1,15,358 थी। जबकि उसी दिन कोविड से मृत्यु को प्राप्त हुए रेलकर्मियों की कुल संख्या 1695 थी। इस एक दिन में कोविड का शिकार हुए गैर रेलकर्मियों अर्थात रेलकर्मियों के परिजनों एवं रेल अस्पतालों में भर्ती अन्य लोगों की मौत का कुल आंकड़ा 2761 था।

इससे पहले 18 अप्रैल 2021 के दिन पूरी भारतीय रेल में कोरोना से संक्रमित रेलकर्मियों की कुल संख्या 83,180 थी। जबकि उस दिन कोविड से मृत्यु को प्राप्त हुए रेलकर्मियों की कुल संख्या 979 थी और इस एक दिन में कोविड का शिकार हुए गैर रेलकर्मियों अर्थात रेलकर्मियों के परिजनों एवं रेल अस्पतालों में भर्ती अन्य लोगों की मौत का कुल आंकड़ा 1814 था।

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इस प्रकार यह पूरी तरह स्पष्ट है कि 11 मई के आसपास और उससे पहले हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीईओ रेलवे बोर्ड ने प्रेस के सामने साफ-साफ झूठ बोला था।

यहां तक कि जो लोग उनके द्वारा दिए गए आंकड़ों पर सवाल पूछना चाहते थे, उन्हें कुछ भी कहकर साइड लाइन कर दिया गया, परंतु उन्हें मार्च 2020 से दिए गए आंकड़ों का कोई औचित्य नहीं समझाया गया।

जबकि उपरोक्त आंकड़ों से स्पष्ट है कि सीईओ/रेलवे बोर्ड द्वारा मार्च 2020 से 10 मई 2021 तक 13 महीने 10 दिन के लिए बताए गए कुल आंकड़ों से यहां एक दिन का ही आंकड़ा अधिक है।

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यदि ऐसा नहीं था, तो “रेल समाचार” द्वारा 10 मई 2021 को चेयरमैन सीईओ/रेलवे बोर्ड सुनीत शर्मा से जब यह पूछा गया कि –

1. कृपया श्री प्रदीप कुमार, पूर्व मेंबर स्टाफ, रेलवे बोर्ड और वर्तमान मेंबर कैट, जो कि एनआरसीएच में भर्ती हैं और वेंटिलेटर पर हैं, की हेल्थ पोजीशन की अपडेट देने की कृपा करें।

2. रेल अस्पतालों को अपग्रेड करने और रेलकर्मियों को उचित स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने के लिए रेल प्रशासन द्वारा अब तक क्या किया गया?

3. वर्तमान में कितने रेलकर्मी और अधिकारी पूरी भारतीय रेल में कोरोना संक्रमित हैं?

4. पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल कितने रेलकर्मी और अधिकारी कोरोना से काल कवलित हुए हैं? कृपया रेलवे वाइज संख्या देने की कृपा करें।

5. पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल कितने रेलकर्मियों और अधिकारियों का वैक्सीनेशन हो चुका है? कृपया रेलवे वाइज संख्या प्रदान करने की कृपा करें।

6. क्या रेलकर्मियों और अधिकारियों तथा उनके परिजनों को अलग से अथवा सीधे वैक्सीन मुहैया कराने की व्यवस्था नहीं की जा सकती? यदि हां, तो इसके लिए रेल मंत्रालय क्या उपाय कर रहा है? यदि नहीं, तो इसमें समस्या क्या है? कृपया बताने का प्रयास करें।

यह नहीं, 12 मई 2021 को, सीईओ रेलवे बोर्ड की प्रेस कॉन्फ्रेंस के एक दिन बाद भी उन्हें रिमाइंड करते हुए “रेल समाचार” द्वारा पूछा गया था कि –

Resp. Sharma ji, kindly share latest daily “ZONE WISE COVID PREPAREDNESS REPORT-2021” on Indian Railways.

उपरोक्त में से किसी भी तथ्य का कोई स्पष्टीकरण अथवा कोई जवाब अब तक चेयरमैन/सीईओ/रेलवे बोर्ड की तरफ से नहीं आया है।

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“जान है तो जहान है” के सिद्धांत पर जब रेल प्रशासन को अपनी वर्क फोर्स का जीवन बचाना चाहिए था, तब वह झूठ और फरेब का सहारा लेकर केवल ऑक्सीजन एक्सप्रेस चलाने के लिए अपनी पीठ थपथपा रहा है।

हालांकि जनता को भी उसके गंतव्य पर पहुंचाकर सेवा कार्य भी इस संकटकाल में जरूरी है। तथापि झूठ बोलना कतई जरूरी नहीं है। यह वैश्विक महामारी है, इस पर आदमी का कोई वश नहीं है। इसके लिए केवल सावधानियां ही बरती जा सकती हैं।

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अतः पब्लिक के संपर्क में आने वाले रेलकर्मियों को सुरक्षा उपकरणों की आपूर्ति सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके अलावा उम्र और किसी बीमारी से ग्रस्त कर्मचारियों को जनसंपर्क से दूर रखने की यथासंभव कोशिश करते हुए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

“रेल समाचार”, रेल प्रशासन की अकर्मण्यता के कारण अब तक अकाल काल-कवलित हुए सभी रेलकर्मियों को विनम्र श्रृद्धांजलि अर्पित करता है और संक्रमित हुए कर्मचारियों के शीध्र स्वस्थ होने की कामना करता है।

ट्रेन की गति से ढ़हा चांदनी रेलवे स्टेशन:





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रेल मंत्रालय की तदर्थ स्थिति खत्म करके पूर्ण रूप से शुरू किया जाए ट्रेनों का संचालन

जनता और सरकार की छवि से सीधे जुड़े रेल मंत्रालय की तदर्थ व्यवस्था को अविलंब समाप्त कर पूर्णकालिक मंत्री एवं सीआरबी नियुक्त किया जाना चाहिए

Narendra Modi, PM/India

#प्रधानमंत्री देश को आखिर किस दिशा में ले जाना चाहते हैं, यह फिलहाल किसी को समझ में नहीं आ रहा है। यह सही है कि कोरोना नामक इस वैश्विक महामारी ने सबका सब कुछ अस्त-व्यस्त कर दिया है, लेकिन इसका ये मतलब भी नहीं है कि हाथ पर हाथ धरे बैठे रहा जाए!

पिछले साल से ही देश की अर्थव्यवस्था पर ग्रहण लगा हुआ है। जबकि मार्च महीने से पूरा देश ठप पड़ा हुआ है। बेरोजगारी, महंगाई विकराल रूप ले चुकी है। देखते-देखते लॉकडाउन के भी 6 महीने गुजर रहे हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था में कोई सकारात्मक सुधार जैसी संभावनाएं कहीं दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रही हैं।

इसलिए बेहतर होगा कि अर्थव्यवस्था से जुड़ी चीजों को पूर्णतः खोल दिया जाए, क्योंकि अनलॉक सीरीज बहुत कारगर साबित नहीं हुई है। तमाम अर्थशास्त्रियों का भी यही मत है।

सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में देश की लाइफलाइन कही जाने वाली भारतीय रेल का नियमित संचालन इतने लंबे समय से बंद करके रेल मंत्रालय ने पहले रेल का कबाड़ा कर दिया है।

मात्र कुछ ट्रेनों का संचालन करके रेलमंत्री सोशल मीडिया पर लंबी-चौड़ी हांक रहे हैैं। इससे वह आखिर क्या साबित करना चाहते हैं, यह किसी की समझ में नहीं आ रहा है।

जब लगभग सभी प्रदेशों का राज्य परिवहन पूर्व की भांति चलाया जा रहा है, एयर ट्रैफिक भी चालू हो गया है, तो फिर रेल का सामान्य संचालन बंद करके देश की अर्थव्यवस्था का कबाड़ा किया जा रहा है। क्या इसमें भी कोई अवसर ढूंढा जा रहा है?

ट्रेनों का संचालन बंद करने से कोरोना के मामले कम तो नहीं हुए हैं, बल्कि इनमें लगातार वृद्धि हुई है।

यदि देश भर की स्थिति को देखा जाए तो कोरोना का कहर फिलहाल कम नहीं होने वाला है, बल्कि यह अभी और बढ़ेगा, ऐसा अनुमान है, क्योंकि देश में अभी रैपिड जांच पर्याप्त संख्या में नहीं हो रही हैं।

अब यह अलग बात है कि दिल्ली सहित कुछ राज्यों ने रैपिड जांचों को कम करके अथवा क्रत्रिम तरीके से कोरोना के मामले कम होने की बात कही है।

हो सकता है कि इसके पीछे उनका उद्देश्य लोगों में व्याप्त भय को कुछ कम करना हो, पर इस महामारी के प्रकोप को इस तरीके से कम करके बताना तो वास्तव में जनता के साथ एक बड़ा धोखा है। 

बहरहाल, जब पूरा मार्केट खोल दिया गया है, राज्यों का सामान्य परिवहन चल रहा है, तब देश की धड़कन कही जाने वाली भारतीय रेल का पहिया रोक देना देश की सामान्य अर्थव्यवस्था को रोक देने जैसा है।

रेल का सामान्य संचालन इस वक्त देश की सबसे बड़ी जरूरत है। इस पर प्रधानमंत्री द्वारा रेल मंत्रालय को तुरंत आवश्यक निर्देश दिए जाने चाहिए।

इसके अलावा प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे रेल मंत्रालय की तदर्थ व्यवस्था को अविलंब समाप्त कर सीधे जनता और सरकार की छवि से जुड़े इस महत्वपूर्ण मंत्रालय को पूर्णकालिक मंत्री तथा सीआरबी प्रदान करें।





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विजिलेंस माफिया द्वारा खड़े किए वॉलंटियर्स के चलते वेंटीलेटर पर गई भारतीय रेल

कैंसर की तरह देश की पूरी व्यवस्था में फैला हुआ है कंप्लेंट माफिया का बड़ा तंत्र !

सरकार ही जाने कि आज तक उसकी भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था के कितने उद्देश्य पूरे हुए?

सुरेश त्रिपाठी

रेलवे बोर्ड विजिलेंस से निकाले गए तीनों आईआई (इंवेस्टीगेशन इंस्पेक्टर) “देर आए, दुरुस्त आए“ और “क्या कारण है कि सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे में ही बनते हैं“ शीर्षक से प्रकाशित पिछली दो किस्तों में उजागर हुई अपनी करतूतों से इतने विचलित हुए हैं, अथवा रेलवे विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन विचलित हुआ है, कि अब और ज्यादा उनके कुकर्म उजागर न हों, इसके लिए वे विभिन्न माध्यमों से हम पर दबाव बना रहे हैं। इसके लिए वे अपने मीडिया सहित भिन्न-भिन्न स्रोतों-संपर्कों का इस्तेमाल कर रहे हैं, क्योंकि इससे उनके रेलवे बोर्ड में बने रहने अथवा किसी रेलवे पीएसयू में एडजस्ट होने पर ही नहीं, बल्कि उनके संरक्षकों के हितों पर भी खतरा मंडराता नजर आ रहा है।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि निष्कासित किए गए इन तीनों आईआई की कुत्सित करतूतों को तब उजागर किया जा सका है, जब डायरेक्टर विजिलेंस (पुलिस), रेलवे बोर्ड ने महीनों तक फील्ड में की जा रही इनकी कारगुजारियों पर दिल्ली पुलिस के सहयोग से लगातार नजर रखी थी। उनकी ही पुख्ता सबूतों के साथ सब्मिट की गई रिपोर्ट के आधार पर इन तीनों को अब और ज्यादा रेलवे बोर्ड विजिलेंस में बनाए रख पाना ट्रैफिक विजिलेंस के अधिकारियों के लिए आसान नहीं रह गया था। परिणामस्वरूप इन्हें तुरंत बाहर किया गया है। तथापि अब निर्लज्ज विजिलेंस अथवा उसकी नाक का सवाल न बनाकर उक्त रिपोर्ट के आधार पर इन तीनों को मेजर पेनाल्टी चार्जशीट भी पकड़ाने के साथ ही इन्हें इनके पैरेंट कैडर/रेलवे में भेजा जाना चाहिए, तभी इनके द्वारा सताए गए, उत्पीड़ित किए गए रेलकर्मियों और अधिकारियों के साथ समुचित न्याय हो पाएगा।

अब आगे..

सारे पीडब्ल्यूआई, एसएसई, टीटीई और जनसामान्य यानि यात्रियों के सीधे संपर्क में काम करने वाला स्टॉफ चोर नहीं होता, और न ही उनके एडीईएन, सीनियर डीईएन, एडीएमई, सीनियर डीएमई, एडीईई, सीनियर डीईई, एएसटीई, सीनियर डीएसटीई, एसीएम, सीनियर डीसीएम, एओएम, सीनियर डीओएम, एडीएफएम, सीनियर डीएफएम आदि भी हमेशा गलत नहीं होते। यह सभी मंडल अधिकारी जिन परिस्थितियों में और जिन मुश्किलों का सामना करते हुए काम कर रहे होते हैं, उसी से रेलवे का अस्तित्व इतनी अंधेरगर्दी के बाद भी अब तक बचा हुआ है।

यही वे लोग हैं, जो अपने जीवन का अधिकांश समय अपने परिवार को न देकर, यहां तक कि अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान न रखकर दधीचि की तरह रेलवे को चलाते रहे हैं। इनका प्रयास होता है कि उनका यह क्षण बिना किसी अनहोनी के गुजर जाए और रेलवे को जो आय आनी है, आ जाए। इनके लिए बीता हुआ क्षण संतोषजनक स्मृति से ज्यादा कुछ नहीं होता और उस क्षण इनके कर्तव्य की सार्थकता उसी में होती है। यही प्रमाण है इनकी ईमानदारी का, मेहनत का, निष्ठा का और अपने काम के प्रति समर्पण का भी।

लेकिन यह बहुत ही आसान काम है, उनके काम में ऐब निकलना। वैसे भी किसी चीज का पोस्टमार्टम करना बहुत ही आसान काम होता है। यह ऐसा काम है, जिसमें न संवेदना होती है, न जिम्मेदारी जिंदा करने की, न काम के परिणाम के दायित्व की! और कहना कि ऐसा करता, ऐसे करता, इस समय में करता, इतने समय में करता, आदि आदि, तो सही होता या ज्यादा सही होता और यह जानबूझकर इसने गलत मोटिव से किया है। अतः इस पर तो केस बनता है और फिर केस बना दिया जाता है।

विजिलेंस में, पहला- या तो खेले-खेलाए लोग आते हैं, या फिर, दूसरा- वे लोग आते हैं, जिनको फील्ड में काम का कोई बहुआयामी और लंबा अनुभव न के बराबर होता है। लेकिन पहला आते-आते अपना बाजार शुरू कर देता है, जबकि दूसरा पहले से स्थापित माफिया इंस्पेक्टर्स और सिस्टम के हाथ में खेलने लगता है और फिर ये इतना खेलते हैं कि कुछ समय में ही पहले वाले को भी पीछे छोड़ देते हैं।

टीटीई, जो ट्रेन में ड्यूटी के दौरान स्टॉफ शॉर्टेज के चलते 6/7 कोच मैन्ड करता है, उसको पता होता है कि वह कितना कठिन काम कर रहा है और एक पूरे कोच को ठीक से चेक करने में कम से कम 45 मिनट से एक घंटा लगेगा ही। फिर जब तक वह दूसरे-तीसरे कोच में जाएगा, तब तक किसी स्टेशन पर कोई भी आदमी उसके किसी भी कोच में चढ़ सकता है। हम सब जानते हैं कि यह सामान्य घटनाक्रम है, जिसको रोकना किसी के वश में नहीं है। जब तक कि प्रत्येक कोच टीटीई द्वारा मैन्ड न किए जाएं।

लेकिन वही टीटीई जब विजिलेंस में जाता है और जब उसे विजिलेंस का पानी लग जाता है, तब वह भी अपने जैसे ही दूसरे टीटीई की इसी कथित कोताही पर धड़ाधड़ केस बनाता है, यह कहकर कि “तुम्हारे द्वारा मैन्ड किए जा रहे कोच में इतने आदमी बिना रिजर्वेशन के या बिना टिकट के कैसे मिल गए?” अब वह (टीटीई से ही आईआई/विजिलेंस बना) कोच मैन कर रहे बेचारे टीटीई को या तो केस बनाने की धमकी देकर धन दोहन करेगा या फिर केस बनाएगा। दोनों ही गलत हैं। लेकिन यही विजिलेंस है।और वह भी रेलवे की।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। केस बनने के बाद उस टीटीई की नारकीय जिंदगी शुरू होती है। वह अब दस जगह पर रोएगा, गिड़गिड़ाएगा, अपनी बेगुनाही की दलील देगा और दस जगह पर पैसा भी खर्च करेगा। लाख रहम कर, सब जानकर अनुशासनिक अधिकारी (डीए) भी विजिलेंस के डर से उसे कोई न कोई दंड दे ही देता है, वरना यही विजिलेंस माफिया खुद या किसी से कंप्लेंट करवा देता है कि पैसा लेकर डीए ने माफ कर दिया। तब डीए साहेब की परिक्रमा शुरू हो जाती है।

अब उस टीटीई के कैरियर पर धब्बा भी लग गया। कुछ समय बाद उसके परिवार वालों को और उसे खुद भी यह लगने लगता है कि वह बहुत बड़ा अपराधी और चोर है। इसके बाद वह सीख जाता है कि ईमानदारी से काम करोगे, तो फंसोगे और जब फंसोगे तो यह पैसा ही काम आता है। जितना पैसा होगा, उतना ही ज्यादा चांस अपने को ईमानदार साबित करने का होता है और जितने ठन ठन गोपाल रहोगे, उतने ही बड़े नकारे और बेईमान साबित कर दिए जाओगे। इसलिए पैसा जितना कमा सकते हो, कमा लो, क्योंकि यही पैसा बोलता है और जैसा चाहोगे वैसा ही यही बुलवाता भी है।

इस प्रकार रेलवे विजिलेंस के भ्रष्टाचार और स्वस्थ आर्गेनाइजेशन के निर्माण हेतु कदम-कदम पर एक-एक नया वॉलंटियर खड़ा करता रहता है और अपने महान उद्देश्य को सार्थक करते हुए अपना कारवां लगातार बढ़ाता चलता है। इन्होंने अब इतने वॉलंटियर्स खड़े कर दिए हैं कि जिसके चलते भारतीय रेल ही वेंटीलेटर पर चली गई है। अब वही टीटीई विजिलेंस माफिया का नया वॉलंटियर बन जाता है और अब ट्रेन पर चढ़ने से पहले उसे विजिलेंस टीम के मूवमेंट का पूरा डिटेल पता होता है। अब अगर उसको अपने किसी सहयोगी/प्रतिद्वंद्वी टीटीई को निपटाना होता है, तो वह उसकी भी सेटिंग कर लेता है कि उसको कैसे फंसाना है तथा कब और कहां उसे चेक करवाना है? 

अगर साहेब लोगों का मूवमेंट उसकी ट्रेन में है, तो फिर या तो उनकी मांग के अनुसार बंदोबस्त रखेगा या फिर ऑन द स्पॉट उनके टेस्ट के अनुरूप चीजों की व्यवस्था करेगा। अब से पहले वह अपनी जानकारी में एक भी अवैध यात्री को अपने कोच में नहीं चढ़ने देता था, या  लड़कर भी पेनाल्टी के साथ उसकी टिकट बनाता ही था। अब वह हर ट्रिप में जब तक कम से कम 10 हजार नहीं कमा लेता है, अपनी ईमानदारी को कोसता रहता है। अब तो जो यात्री टिकट बनाने की जिद्द भी करता है, उसको कुछ डिस्काउंट कर सधे हुए चार्टेर्ड एकाउंटेंट की तरह समझा देता है कि टिकट बनाने में उसका कितना नुकसान है।

अब तो विजिलेंस टीम को ट्रेन से उतरने से पहले इतना देकर मुट्ठी गरम कर देता है कि जितनी उसके हफ्ते भर की सैलरी होती है, यह कहते हुए कि साहब यह तो सब आप लोगों की ही कृपा है। उसकी इस ईमानदारी, निश्छलता और सेवाभाव से भावविह्वल होते हुए विजिलेंस टीम स्टेशन पर उतरकर अपने अगले “भ्रष्टाचार उन्मूलन अभियान” की ओर बढ़ जाती है। अब वही टीटीई ट्रेन में भरपूर कमाई करने के साथ-साथ विजिलेंस केस में फंसे दूसरे स्टॉफ से दलाली करके भी कमाने लगता है।

विजिलेंस से पाला पड़ने के बाद इसी तरह की ईमानदारी की सीख फील्ड में कार्यरत लगभग सभी कर्मचारियों को मिलती है और इसी तरह से भ्रष्टाचार को खत्म करने की उनकी जिजीविषा बलवती होती जाती है। तकरीबन यही कहानी हर विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों के साथ कभी न कभी घटित होती है।

पहला, मेरा मानना है कि विजिलेंस की जगह रेलवे और अन्य मंत्रालयों में भी एक विभाग ऐसा बनाया जाए, जिसका काम विजिलेंस से ठीक उल्टा हो, जिसमें जैसे विजिलेंस (सतर्कता) में खोज-खोजकर केस बनाए जाते हैं, उस नए विभाग (समर्थता-क्षमता की खोज, पहचान और असलियत को समझने वाला विभाग) द्वारा पुरस्कार देने के लिए खोज-खोजकर ईमानदारी से सभी कर्मचारी और अधिकारी के काम का भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से निष्पक्ष ऑडिट करे, जो या तो आउट ऑफ टर्न प्रमोशन के रूप में हो या इंक्रीमेंट के रूप में। जिस कार्यसंस्कृति को आप बढ़ावा देना चाहते हों, उसी को इसका सबसे बड़ा क्राइटेरिया रखा जाना चाहिए।

जैसे अगर विश्वस्तरीय कार्य गुणवत्ता, अथवा विश्वस्तरीय से भी बेहतर कार्य, समय से या कम समय में, कम लागत पर कार्य, बिना गुणवत्ता पर समझौता किए पूरा करना, नए ट्रैफिक लाकर या इन्नोवेटिव तरीके से आय बढ़ाने पर, सेवा क्षेत्र में मानक स्वरूप नए तरह का कार्य करने पर, तकनीकी में दूरगामी सकारात्मक नया काम करने जैसे कार्यों को क्राइटेरिया रखा जाए। इसके लिए आउट ऑफ टर्न प्रमोशन, इंक्रीमेंट, मनचाहे शहर में पोस्टिंग, आउट ऑफ टर्न मकान अलॉटमेंट का प्रावधान या स्वेच्छा से परिवार नॉन-डिपेंडेंट (जैसे पैरेंट्स) में से किसी को भी अपने अधिकार में से एक या दो पास देने का प्रावधान, रिटायरमेंट के बाद अपनी पसंद के शहर में 2/3/4/5 साल के लिए रेलवे आवास में रहने की सुविधा आदि जैसे कुछ छोटे-बड़े ऐसे प्रावधान हों, जिन्हें कार्य के अनुसार और कार्य के रिकॅग्निशन के तौर पर दिया जाना चाहिए। इस रीति से अपने आप स्वस्थ और राष्ट्रहित वाली सकारात्मक कार्यसंस्कृति कुछ सालों में विकसित हो सकती है।

जब 10 रुपये का डिकॉय करके नियमानुसार किसी को नौकरी से तो निकाला जा सकता है और उसके साथ कई जिंदगियों को भी सड़क पर लाया जा सकता है, तो फिर ऐसा नियम क्यों नहीं बनाया जा सकता, जिससे अच्छा काम करने पर सब में उत्साह भरने के लिए और एक नई कार्यसंस्कृति को विकासोन्मुख तथा राष्ट्रहित में उपयोग करने के लिए उपरोक्त पुरस्कार रेलकर्मी और अधिकारी को देने का प्रावधान भी तो किया जा सकता है!

इसमें से कुछ सुविधाएं अभी भी दूसरे रूप में दी जा रही हैं, लेकिन उनका जो क्राइटेरिया है, वह जुगाड़, कार्टेल, चमचागीरी, भ्रष्टाचार, जात-पात, पैसा, लूट-खसोट और माफिया नियंत्रित है। नकारात्मक कार्यसंस्कृति के जितने भी अवयव हैं, वह अभी सभी प्रोत्साहन के, पुरस्कार के, रिकॅग्निशन के क्राइटेरिया हैं और विजिलेंस इसका पहला पहरुआ है।

दूसरा, मेरा मानना है कि एक ईमानदार समाज ही ईमानदार व्यवस्था को डिजर्व करता है। अगर कोई नागरिक अपनी नीयत और ध्येय में ईमानदार है, तो वह पहचान छुपाकर कोई बात या कंप्लेंट कतई नहीं करेगा।

यह मनुष्य की प्रकृति है कि जब उसे किसी पर घात करना होता है, तभी वह क्षद्म रूप अपनाता है। जो निडर होता है, वह छुपकर बात नहीं करता, बल्कि पहचान गलत बताकर या छिपाकर बात वही करता है, जिसमें खुद कोई कमी होती है, खोट होती है, जो अवसरवादी और घातकी होता है, क्योंकि जो वास्तव में डरा होता है, वह कुछ करता ही नहीं है, चूंकि उसे बखूबी पता होता है कि अंततः छुपता कुछ भी नहीं है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज सरकारी तंत्र में जो लोग विजिलेंस या इस तरह की अन्य एजेंसियों से संरक्षित (पैट्रोनाइज) नहीं हैं, वे काम न करना, निर्णय न लेना, अधिकार संपन्न न्याय न करना, सबसे सुरक्षित रास्ता मानते हैं, क्योंकि कंप्लेंट माफिया का बड़ा तंत्र कैंसर की तरह इस देश की पूरी व्यवस्था में फैला हुआ है।

ब्लैकमेलिंग और धन उगाही का इससे ज्यादा सम्मानित और आसान रास्ता और कोई नहीं है। इसमें कानून के बड़े-बड़े कथित जानकारों से लेकर छोटे स्तर के शातिर और अपराधिक दिमाग के लोग शामिल हैं। वे खुद परिवाद और आरटीआई की कमाई खाते हैं और इसके लिए एक बड़ा विजिलेंस जैसा डिपार्टमेंट भी उनके ही काम को आगे बढ़ाने के लिए सरकार ने खोल रखा है। सरकार ही जाने कि इससे आज तक उसकी भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था के कितने उद्देश्य पूरे हुए?

सुनने, पढ़ने, देखने और अनुभव में देश के हर नागरिक को तो यही लगता है कि 1947 के बाद और इन संस्थाओं की स्थापना के बाद से इस देश में कोई एक चीज “दिन दूनी रात चौगुनी” बढ़ी है, तो वह सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार, कदाचार और इसके उप-उत्पाद (बाई प्रोडक्ट्स) इत्यादि हैं।

फिर भी अगर सरकार इतना प्रावधान कर दे कि यदि परिवाद गलत साबित हुआ, तो परिवादकर्ता को उतनी ही कड़ी सजा दी जाएगी, जितनी परिवाद सत्य सिद्ध होने पर कर्मचारी/अधिकारी को दी जाती, तो बहुत हद तक विजिलेंस और सीबीआई जैसी संस्थाओं के समय, संसाधन और शक्ति का दुरुपयोग होने से बच जाता तथा देश के लाखों ईमानदार कर्मठ सरकारी कर्मचारी और अधिकारी निर्भीक होकर काम कर पाते। क्रमशः





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निचले स्तर की समस्याओं पर रेल प्रशासन का कोई ध्यान नहीं

कोई सुनने वाला नहीं, कहीं नहीं हो रही है सामान्य कर्मचारी की सुनवाई

रेलवे में जो भी रोटेशनल ट्रांसफर होते हैं, यह एक सच्चाई है कि उन पर सही तरीके से अमल नहीं हो रहा है। जो भी साधारण कर्मचारी हैं, उन्हें तुरंत ट्रांसफर पर रिलीव कर दिया जाता है और जो कर्मचारी अफसर का चहेता या यूनियनों का पदाधिकारी होता है, उसे रिलीव नहीं किया जाता।

जिस जगह कर्मचारी का ट्रांसफर होता है, उस जगह की पोस्ट को 6 महीने के लिए वहीं ट्रांसफर कर दिया जाता है, जहां यूनियन का पदाधिकारी चाहता है, या वहां जिस जगह उसको भेजा जाता है।

इसके अलावा 6-8 महीने बाद या एक साल बाद जब भी पुरानी जगह पर कोई वैकेंसी होती है, तब पुनः उस पदाधिकारी को वहां एडजस्ट कर दिया जाता है। यह खेल सभी मंडलों और जोनों में पूरी शिद्दत के साथ खेला जाता है।

लेकिन जब बारी साधारण कर्मचारी की आती है, फिर वह चाहे कितनी भी परेशानी बताए, उसकी कोई नहीं सुनता, न ब्रांच अफसर न ही डीआरएम, और न ही कोई यूनियन पदाधिकारी ! इसी तरह के हर मंडल में लगभग 300-800 मामले होंगे, जिनका ट्रांसफर हुआ और आज तक वह नई जगह नहीं गए या नहीं भेजे गए।

इसी प्रकार जो भी कमाऊ पूत होते हैं, उनके लिए भी कह दिया जाता है कि उनका ट्रांसफर कर दिया गया है परंतु वास्तविकता में उसे उसी जगह दूसरी टेबल दे दी जाती है, और वह बदस्तूर वहीं काम करता रहता है।

रेलवे की छोटी डिस्पेंसरियों में कोई भी विशेषज्ञ डॉक्टर, जो हफ्ते में एक बार आया करते थे, जैसे फिजिशियन, ईएनटी, आई स्पेशलिस्ट, गाइनो, अब सब को छोटी डिस्पेंसरियों में भेजा जाना बंद कर दिया गया है।

अगर कर्मचारी खुद किसी प्राइवेट हॉस्पिटल को दिखाए और वह दवा रेलवे से लेना चाहे, तो उसे उक्त दवाईयां देने से मना कर दिया जाता है। लेकिन यही यदि किसी अफसर या यूनियन नेता की बात हो, तो तुरंत लोकल खरीद करके दे दी जाती है।

जबकि सामान्य बीमार कर्मचारी को प्राइवेट हॉस्पिटल में रेफर करने में भी भारी आनाकानी की जाती है। नीचे स्तर पर इन तमाम समस्याओं को देखने वाला कोई नहीं है। आखिर सामान्य रेल कर्मचारी कहां जाए, उसकी सुनने वाला कौन है?

निचले स्तर पर ऐसी अनगिनत समस्याएं हैं, परंतु रेल प्रशासन का ध्यान निचले स्तर पर नहीं जा रहा है। रही बात मान्यताप्राप्त रेल संगठनों की, तो उन्हें अपनी सुख-सुविधाओं के सिवा बाकी कुछ नजर नहीं आता।





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अतिरिक्त रेवेन्यू कमाने हेतु रेल प्रशासन के विसंगतिपूर्ण निर्णय

बिना उचित प्रशिक्षण, बिना यथोचित अधिकार, चेकिंग स्टाफ को लगाया जा रहा है मार्केटिंग में

सुरेश त्रिपाठी

रेल प्रशासन अतिरिक्त रेवेन्यू कमाने के पीछे जी-जान से लगा हुआ है, यह अच्छी बात है। इसके लिए अब टिकट चेकिंग स्टाफ को जगह-जगह मार्केटिंग के लिए भेजा जा रहा है कि जाओ पता करो कि व्यापारी लोग अपना माल कैसे भेजते हैं और कैसे मंगाते हैं, उनको बताओ कि रेलवे उनको सस्ती और अच्छी सुविधा देने को तैयार है।

परंतु जब व्यापारी स्टेशन पर आता है, तो उसे पार्सल क्लर्क, पोर्टर, स्टेशन मास्टर, गार्ड और डेस्टिनेशन पर भी ऐसे बहुत से लोगों से मिलना पड़ता है, तब उसका काम होता है। इसके साथ ही उसे हर टेबल पर और हर क्लर्क को दस्तूरी भी देनी पड़ती है।

पार्टियों यानि व्यापारियों का कहना है कि रेलवे यदि यह सब व्यवस्था एक जगह पर कर दे, जिससे उन्हें दस लोगों को नमस्कार करना और दस जगह चढ़ावा न चढ़ाना पड़े, मगर यही वह वजह है, जहां रेल प्रशासन फेल हो जाता है।

अब जहां तक टिकट चेकिंग स्टाफ को मार्केटिंग के काम में लगाए जाने की बात है, तो उन्हें न तो इसका कोई अनुभव है, और न ही उन्हें इसका कोई प्रशिक्षण दिया गया है। बस सीधे इस काम को करने का फरमान जारी करके उन्हें मार्केट से ट्रैफिक रेवेन्यू लाने को कह दिया गया है।

जबकि फिलहाल बहुत कम संख्या में ट्रेनें चलाई जा रही हैं और इसके चलते अधिकांश स्टेशनों की टिकट बुकिंग खिड़कियां बंद हैं। यही स्थिति आरक्षण केंद्रों की भी है। ऐसे में जो हजारों बुकिंग क्लर्क और आरक्षण क्लर्क खाली और फुर्सत में बैठे हैं, उन्हें उचित प्रशिक्षण देकर मार्केटिंग के इस काम लगाया जा सकता है। परंतु यह काम जिन लोगों का है, वह यूनियन पदाधिकारी गायब हैं।

बताते हैं कि जबलपुर मंडल, पश्चिम मध्य रेलवे और रायपुर मंडल, दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के टिकट चेकिंग स्टाफ को मार्केटिंग के काम में लगाया गया है, जबकि भोपाल सहित कुछ मंडलों का चेकिंग स्टाफ यह काम न करने पर फिलहाल अड़ा हुआ है और मना कर दिया है।

सर्वप्रथम यह कि टिकट चेकिंग स्टाफ को गुडस, लगेज, पार्सल इत्यादि के बुकिंग रेट्स की कोई जानकारी नहीं हैं। उसको कोई यथोचित अधिकार भी नहीं दिए गए हैं। इस पर भी यदि वह मार्केट से व्यापारी को कोई पुख्ता आश्वासन देकर उसका माल बुक करके रेलवे से भेजने के लिए लेकर आता है, तो इस बात की क्या गारंटी है कि उसके द्वारा व्यापारी को दिए गए आश्वासन की लाज रेल प्रशासन रखेगा ही?

जहां रेल प्रशासन अतिरिक्त रेलवे रेवेन्यू कमाने की हरसंभव जुगत में लगा हुआ है, वहीं अपने गुड्स शेडों और पार्सल डिपो आदि तक पहुंचने वाली अप्रोच रोड ठीक करवाने पर उसका कोई ध्यान नहीं है। जबकि होना तो यह चाहिए कि जिस जगह से रेलवे को लाखों-करोड़ों की रोजाना आमदनी हो रही हो, वह जगह सभी आवश्यक सुविधाओं से युक्त, एकदम साफ-सुथरी और वहां तक पहुंचने की सभी सड़कें एकदम सही हों।

भोपाल मंडल, पश्चिम मध्य रेलवे में गुना सेक्शन से लाल मिर्च, खड़ा धनिया, काबुली चना इत्यादि पूरे देश में जाता है, लेकिन बगैर बुक हुए, जो बुकिंग चार्ज है, उससे 6-8 गुना ज्यादा की ईएफआर बनती है, उन्हें यह देना मंजूर है, लेकिन यह सही तरीका नहीं है, क्योंकि सही तरीके में टाइम बहुत लगता है और माल समय पर नही पहुंच पाता है। इसीलिए व्यापारी ऑन बोर्ड रेलवे स्टाफ को ज्यादा पैसा देना तो पसंद करता है, मगर उसे अपना माल बुक करके प्रॉपर तरीके से ले जाना नहीं भाता है।

बताते हैं कि आजकल भोपाल मंडल में चेकिंग स्टाफ को ईएफटी काटने से मना कर दिया गया है। ऐसे में जब स्टाफ किसी पैसेंजर को चेक करता है और बगैर टिकट पाता है, और जब वह ऊपर के अधिकारियों से इस बारे में पूछता है, तो संबंधित अधिकारी कोई निर्णय नहीं लेता कि इनका क्या करना है।

आरपीएफ/जीआरपी स्टाफ उन्हें लेने को तैयार नहीं होता कि कौन इनका पहले कोरोना टेस्ट कराए, तब इनकी एफआईआर भरे। इसलिए जो लोग किसी छोटे स्टेशन पर बिना टिकट आ रहे हैं, वह रेलवे को बगैर किराया दिए मुफ्त में जा रहे हैं। इस पर भी किसी का ध्यान नहीं है।

यही नहीं, रेलवे स्टेशनों और रेल परिसरों में जितने भी अवैध धंधे या छीना-झपटी और चोरी, अवैध वेंडिंग आदि की जितनी भी गतिविधियां होती हैं, वह सब आरपीएफ एवं जीआरपी की छत्रछाया में ही होती हैं। इन पर रेल प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं है। इस कोरोना काल में भी, जब बहुत गिनी-चुनी गाड़ियों का संचालन हो रहा है, तब भी कुछ रेलवे स्टेशनों पर आरपीएफ/जीआरपी की छत्रछाया में खाद्य सामग्री बेचते हुए अवैध वेंडर देखे गए हैं।





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निजीकरण के आईने में भारतीय रेल और आत्मनिर्भर भारत ! – RailSamachar

यह कैसा गणतंत्र है, जो शासन-प्रशासन की ऐसी बीमारियां – भ्रष्टाचार, जातिवाद, क्षेत्रवाद – खत्म करने के बजाय और बढ़ा रहा है! यदि वह इतना निकम्मा है, तो बाजार, निजीकरण अपना रास्ता तो खोजेगा ही!

आजादी के बाद जैसे-जैसे “भ्रष्टाचार” बढ़ता गया, वैसे-वैसे इस “केक” में हिस्सेदारी का हक भी, क्योंकि नैतिकता राजा से शुरू होती है, रंक से नहीं! इसलिए उसी अनुपात में सरकारी विभाग विनाश की तरफ बढ़ते गए और लगातार बढ़ रहे हैं!

Prempal Sharma

रेल की खबरें भी मीडिया में टीआरपी बढ़ाने का अच्छा नुस्खा है। एक्सीडेंट हो, किराए में पैसे दो पैसे की वृद्धि हो, भर्ती का कोई प्रश्न हो या निजीकरण की छोटी-मोटी अफवाह। मीडिया की आंखों में चमक आ जाती है। इसमें कोई आश्चर्य की बात भी नहीं। वर्षों से हम सुनते भी आ रहे हैं कि रेलवे भारत की लाइफ लाइन है, धमनी हैं.. आदि आदि और इतनी बड़ी इतनी तेज कि इतनी बड़ी आबादी के लिए सबसे जरूरी और विश्वसनीय यातायात का साधन है। विकास का मानदंड भी।

लेकिन अफसोस इस बात का कि हम लगातार गिरावट की तरफ बढ़ रहे हैं। पिछले वर्ष ऑपरेटिंग रेश्यो 98% रहा है, यानि ₹98 खर्च करने पर औसतन 100 रुपए की कमाई। हाथी जैसी विशालकाय, संसाधनों के बावजूद मात्र ₹2 की बचत से आप रेलवे को कैसे आधुनिक बनाएंगे? कैसे चीन-जापान की तरह भारतीय रेल 200-300 किलोमीटर प्रति घंटा चलेगी? नई पटरियां, नया विस्तार कैसे होगा? यह प्रश्न आजादी के बाद से ही दूसरे अनेक मसलों की तरह अनुत्तरित हैं!

एक दंभ जरूर है कि हम कर्मचारियों की संख्या में दुनिया के सबसे बड़े नियोक्ता हैं। सबसे ज्यादा रोजगार देते हैं। तो क्या रेल सिर्फ रोजगार के लिए ही बनी है?

1 जुलाई 2020 को यह घोषणा हुई कि 109 मार्गों पर प्राइवेट कंपनियां रेल चलाएंगी, सिर्फ ड्राइवर रेलवे का होगा बाकी डिब्बे, मेंटेनेंस सब कुछ प्राइवेट हाथों में, रेल विभाग को यह प्राइवेट कंपनियां कुछ किराया देंगी।

अगले दिन 2 जुलाई को रेल मंत्रालय से एक और आदेश निकला, कि इस बीच जो भी रेलवे में रिक्तियां हैं, वह अभी नहीं भरी जाएंगी, उनमें कटौती की जाएगी। सिर्फ सेफ्टी पदों को छोड़कर। बस हो गया तूफान खड़ा।

विपक्ष के नेताओं से लेकर रेल कर्मचारियों के रोष की बातें मीडिया चलाता रहा। गुस्सा आना स्वाभाविक है, विशेषकर मौजूदा कोरोना काल में जब रेलवे ने सारी  विपरीत परिस्थितियों के बावजूद देश में न कहीं दवाओं की कमी होने दी, न किसी माल की। और जब जरूरत हुई तो आनन-फानन में 5000 श्रमिक गाड़ियां चलाकर लगभग एक करोड़ श्रमिकों को उनके घर पहुंचाया।

यह आसान काम नहीं था। जब पूरा देश कई महीने से बंद था, तब रेल कर्मचारी फील्ड में लगातार अपने काम पर जुटे हुए थे। रेल पुलों, कोचों, पटरियों के रखरखाव जैसे काफी समय से लंबित काम भी इसी बीच पूरे किए गए। मेरी नजरों में डॉक्टर, नर्स और सिविल प्रशासन के साथ-साथ रेल कर्मचारियों को भी कोरोना योद्धा में शामिल किया जाना चाहिए था, देर अब भी नहीं हुई।

लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ कि एक दिन पहले जिस रेल मंत्रालय ने रेलवे में शत-प्रतिशत पंक्चुअलिटी उर्फ समयपालन का रिकॉर्ड रेलवे के इतिहास में बनाया और उसकी घोषणा की, उसके अगले ही दिन निजी रेलवे की इजाजत भी ताबड़तोड़ दे डाली। यानी एक गाल पर प्यार की थपकी तो दूसरे पर तड़ातड़ तमाचे। वास्तविक जरूरत तो इस समय की यह है कि आने वाले दिनों की चुनौतियों को देखते हुए रेल कर्मचारियों की तारीफ कर उनमें और ज्यादा उर्जा भरी जाए, विशेषकर आत्मनिर्भर भारत बनाने की घोषणाओं के बरक्स।

कोरोना विपत्ति के पूरे दौर में पक्ष-विपक्ष दोनों यह महसूस कर रहे हैं कि सरकारी तंत्र ही ऐसी चुनौतियों से सबसे सक्षम ढ़ंग से निपट सकता है, चाहे वह स्वास्थ्य सुविधाएं हों, या सरहदों पर मंडराती चीन-पाकिस्तान की चुनौतियां। ऐसे में तो रेल जैसे विभाग को और अधिक चुस्त-दुरुस्त, मजबूत और विस्तार करने की जरूरत है।

लेकिन क्या यह चुस्त-दुरुस्त सिर्फ निजीकरण से ही संभव है? क्या सरकार के मौजूदा ढ़ांचे में कोई संभावना ही नहीं बची? अभी 6 महीने पहले ही रेलवे के ढ़ांचे में कुछ बुनियादी परिवर्तन की शुरुआत हुई है, जैसे रेलवे बोर्ड में आठ सदस्यों की जगह सिर्फ चार रहेंगे और इंजीनियरिंग तथा सिविल सेवाओं को मिलाकर भी एक रेलवे मैनेजमेंट सर्विस बनाने की योजना है। तीन साल पहले रेल बजट को भी मुख्य बजट में शामिल करके एक बड़ा कदम उठाया था। और भी हलचलें जारी हैं, लेकिन उनकी दिशा अभी भी धुंधली और अस्पष्ट है।

ऐसी स्थितियों में कर्मचारियों का मनोबल और कमजोर होता है, जबकि देश की जरूरतों को देखते हुए उसे और मजबूत करने की जरूरत है। इस बात को भी कोई स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि पूरे तंत्र की सिर्फ 5% रेल में यह शुरुआत की जा रही है और कि इससे रेलवे को फायदा होगा और देश की जनता यानि यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी। विश्व स्तरीय। या कम समय में यात्रा कर सकेंगे और यह केवल निजीकरण के रास्ते से ही संभव है।

इस मोड़ पर रेलवे के कुछ हिस्से को प्राइवेट हाथों में देने के निर्णय से, भूतपूर्व ही सही एक रेल कर्मचारी होने के नाते फिलहाल निजीकरण पर मेरी भी पूरी असहमति है। हालांकि अभी सिर्फ प्रतिवेदन मंगाए गए हैं, लेकिन अच्छा हो कि निजी कंपनियों की तरफ देखने से पहले रेलवे के प्रशासनिक ढांचे की कमियों को ही दूर किया जाए। मेरी असहमति विपक्ष के उन कच्चे पक्के राजनीतिक नेताओं से भी है जो अचानक ही बरसाती मेंढ़कों की तरह टर्रा रहे हैं।

रेलवे में निजीकरण का यह पहला कदम नहीं है। यूपीए एक-दो के दौरान बिहार में जो कई रेलवे कारखाने खोले गए, वे सब इसी पीपीपी मॉडल के थे। और भी कई कदमों की शुरुआत उन्हीं दिनों हुई थी। यहां तक कि कांग्रेस के प्रधानमंत्री नरसिंह राव जिनका जन्म शताब्दी वर्ष भी अभी पिछले ही हफ्ते शुरू हुआ था और उनकी तारीफ में सबसे बड़ा कशीदा यही कसा जाता है कि देश उदारीकरण और निजीकरण के रास्ते की शुरुआत उन्होंने की। जिसकी वजह से आज देश कई क्षेत्रों में कुछ कुछ आधुनिक और आत्मनिर्भर हुआ है। इसलिए तमाम राजनेताओं की बातें यकीन के लायक भी नहीं है। एक तरफ आत्मनिर्भर भारत की बात और दूसरी तरफ यह निजी कंपनियां, जो सब कुछ बाहर से मंगाकर यहां जोड़-तोड़ करती हैं और मुनाफा कमाती हैं।

आईए, रेल मंत्रालय के एक कल्याणकारी विभाग रेलवे के स्कूलों की प्रयोगशाला से रेलवे में निजीकरण को समझने की कोशिश करते हैं। विशेषकर उनके लिए जो किसी न किसी पार्टी के साथ नाली-नाभि-नालबद्ध हैं और आडंबर में जीने के आदी हो चुके हैं।

किसी समय पूरे देश में रेलवे के 800 स्कूल थे। रेल कर्मचारियों की बस्तियों के बीच। खुले मैदान, अच्छी इमारतें, अच्छे शिक्षक। लाल बहादुर शास्त्री से लेकर अनेकों वैज्ञानिक इंजीनियर इन्हीं स्कूलों में पढ़े थे। अंग्रेज अपने उपनिवेश का शोषण करना जानते थे तो कल्याणकारी योजनाएं भी बनाते थे। अपने मातहत कर्मचारियों के लिए स्कूल इसीलिए खोले कि उनके बच्चों को बिना किसी चिंता के पढ़ने-लिखने आगे बढ़ने की सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हों। यहां तक कि रेल अफसरों के लिए मसूरी की पहाड़ियों में एक आलीशान रेजिडेंशियल ओक ग्रोव स्कूल भी 1888 में स्थापित किया। अपने कर्मचारियों की अगली पीढ़ियों के खातिर।

आज रेलवे में 8000 से ज्यादा तोप अधिकारी हैं। मेरा प्रश्न है कितने अधिकारियों ने ओक ग्रोव स्कूल में अपने बच्चों को भेजा है? यहां तक कि रेलवे के निचले स्तर के कर्मचारी भी अपने बच्चों को रेलवे के स्कूल में नहीं भेज रहे? पिछले 30 वर्षों में यह गिरावट बहुत तेजी से आई है जिन रेल अधिकारियों की सांस रेलवे के निजीकरण से फुल रही है, रेलवे की यूनियनें उतनी ही आराम तलब हो चुकी हैं, क्या उन्होंने ब्रिटिश विरासत की इस कल्याणकारी योजना यानि स्कूलों के बंद होने पर कोई मजबूत आवाज उठाई? क्या कभी किसी उच्च अधिकारी ने इन स्कूलों में जाकर शिक्षकों और स्कूल की परेशानियां सुनी? रेलमंत्री पुरस्कार कुछ समय पहले हर वर्ष 400-500 तक दिए जाते रहे हैं। क्या कभी किसी स्कूल शिक्षक या उनके प्राचार्य को दिया गया?

मैंने कुछ दिन रेलवे स्कूलों के प्रशासन को नजदीक से देखा है। वर्ष 2013 से 15 तक वाराणसी के डीएलडब्ल्यू स्कूल में कई विषयों के पोस्ट ग्रेजुएट टीचर (पीजीटी) के पद वर्षों तक खाली थे। वहीं के कई ट्रेंड ग्रेजुएट टीचर (टीजीटी) को प्रमोट किया जाना था। कारण पूछा, तो पता लगा कि पेपर कौन बनाए? कैसे बनाएं? उत्तर रेलवे में बरेली का एकमात्र रेलवे स्कूल बचा है। लंबी-चौड़ी जमीन है, क्या कभी उत्तर रेलवे के किसी अधिकारी ने उसकी बेहतरी के बारे में सोचा? यह चंद उदाहरण हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब यानि समूची हिंदी पट्टी में मुश्किल से कोई रेलवे स्कूल जिंदा बचा है। दो-चार हैं भी, तो वे भी मौत के कगार पर।

उन्हीं दिनों के बोर्ड एक सदस्य से जब इनकी बेहतरी के लिए कुछ अनुरोध किया, तो उनका जवाब था कि सरकारी स्कूल या रेलवे के स्कूलों में अब कौन पढ़ाता है? और हमें इनको तुरंत बंद कर देना चाहिए! आनन-फानन में ऐसी कमेटी भी बना दी जाती है, जो बॉस के मुंह को ताकते हुए तुरंत ऐसी सिफारिश भी करते हैं और बस संदेश पूरे देश को चला गया कि रेलवे के स्कूलों को बंद किया जाए। आश्चर्य यूनियनें भी चुप्पी साधे रहीं।

अभी 2 जुलाई को जो रिक्तियों को न भरने का फैसला किया गया तो कुछ रेलवे ने अगले ही दिन इस ढंग से दोहराया कि बचे-खुचे रेलवे स्कूलों में शिक्षकों की संख्या 50% कम कर दी जाए। आप सब की सूचना के लिए बता दें कि रेलवे के बचे-खुचे कुछ स्कूलों में पहले से ही 50% पद खाली पड़े हैं। उन्हें न भरने की कसम खा ली है। जैसे-तैसे काम चलाया जा रहा है। दक्षिण पूर्व रेलवे में रेलवे के स्कूल बहुत अच्छे चल रहे थे। यानि कि उनमें बच्चों के दाखिले की मारामारी थी। लेकिन धीरे-धीरे वहां भी बच्चे आने इसलिए कम हो गए, कयोंकि पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं।

संतरागाछी स्कूल में 2009 से 11वीं 12वीं के लिए बायोलॉजी का शिक्षक नहीं था और कई वर्षों से रसायन शास्त्र का भी नहीं। लेकिन क्या कभी उच्च अधिकारी ने वहां जाकर उनकी खबर ली? यदि जाते भी हैं तो वे स्कूल के वार्षिक समारोह में गुलदस्ता लेने और अपनी आत्मकथा के कुछ अंश बांटने!

मैं इन सब अधिकारियों की निष्ठा, विद्वता की तारीफ करता हूं लेकिन जब शिक्षा में निजीकरण हो, तो आप चुप लगाए रहते हैं और जब अपनी सेवाओं में कटौती हो, तो आप पूरे देश को जगाना चाहते हैं। यह बात गले नहीं उतरती दोस्तों!

मेरे आकलन के अनुसार देश के पूर्वी भाग यानि पश्चिम बंगाल में खड़कपुर, कोलकाता, आसाम, छत्तीसगढ़ के बिलासपुर, भिलाई, जैसी जगहों में अभी भी रेलकर्मी रेलवे के स्कूलों को ही प्राथमिकता देते हैं। मुंबई के कल्याण रेलवे स्कूल ने भी अपनी प्रतिष्ठा कायम रखी है, जहां पिछले कुछ वर्षों में कल्याण रेलवे स्कूल के बच्चे न सिर्फ आईआईटी और मेडिकल में भी चुने गए हैं, बल्कि अन्य स्कूलों से नाम वापस लेकर इसमें दाखिले की लाइन में खड़े हुए हैं।

साउथ ईस्टर्न रेलवे के संतरागाछी, खड़कपुर रेलवे स्कूल से भी पिछले वर्षों में नीट परीक्षा के तहत सरकारी मेडिकल कॉलेजों में रेल कर्मचारियों के बच्चे चुने गए हैं। यानि पर्याप्त संभावनाएं हैं रेलवे स्कूलों में, बशर्ते रेल प्रशासन इन स्कूलों की तरफ कभी ध्यान भी तो दे।

हाल ही में कोरोना संक्रमित समय में मुंबई के कल्याण रेलवे स्कूल ने आगे बढ़कर तुरंत बच्चों की मदद लेकर हजारों की संख्या में मास्क बनाए, सैकड़ों लीटर सैनिटाइजर आदि तैयार करके रेल प्रशासन और रेलकर्मियों को उपलब्ध कराया। जब भी पदों की कटौती की बात होती है या जमीन बेचने की, तो सबसे पहले रेल प्रशासन का ध्यान रेलवे स्कूलों की तरफ ही जाता है।

अब धीरे-धीरे वह सरकारी अस्पतालों की तरफ भी बढ़ रहा है। जबकि कोरोना की विपत्ति में इन दोनों विभागों का सबसे अच्छा इस्तेमाल रेल और देश के हित में हुआ है और आगे भी हो सकता है।

रेलवे के अफसरों के जब भी ट्रांसफर आर्डर होते हैं, उनकी एक वास्तविक चिंता अपने बच्चों की शिक्षा और पढ़ाई के लिए होती है। वे साफ कहते हैं कि हाजीपुर में अच्छे स्कूल नहीं हैं, न सोनपुर में, न गोरखपुर में, इसीलिए उन्हें दिल्ली चाहिए या फिर मुंबई, कोलकाता। काश, वे कभी यह भी सोच पाते कि बच्चों की चिंता खलासी, कार ड्राइवर या दूसरे फील्ड कर्मचारियों की भी तो होती है?

अंग्रेजों ने इन स्कूलों को प्राथमिकता इसीलिए तो दी थी कि वे एक समान शिक्षा पा सकें और चिंतामुक्त होकर रेलवे में पूरी निष्ठा से अपना योगदान दे सकें।

मौजूदा उच्च अधिकारियों के सपने में भी कर्मचारियों के कल्याण की ऐसी बातें नहीं आतीं, वरना बोर्ड के सदस्य ऐसा नहीं कहते कि रेलवे के स्कूल बंद कर दिए जाएं। वैसे इमानदारी से ही यह उनके मुंह से निकला, क्योंकि उन्हें अब इतनी मोटी तनख्वाह मिलने लगी है और इतने ज्यादा भत्ते कि उस पैसे से वे बहुत मजे से दिल्ली के  संस्कृति, मॉडर्न, डीपीएस या अशोका, जिंदल जैसे महंगे स्कूलों – यूनिवर्सिटी में अपने बच्चों को पढ़ा सकते हैं और फिर सीधे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर।

इन अमीरों में सवर्ण, दलित, सारा क्रीमी लेयर शामिल है। उन्हें अंग्रेजी चाहिए और निजी स्कूल। अपनी सरकारी यात्राओं के लिए भी उन्हें रेल नहीं चाहिए। वे प्राइवेट एयरलाइंस से जाना पसंद करते हैं। भले ही किराया कितना भी हो, क्योंकि उसमें नाश्ता अच्छा मिलता है। लेकिन अपनी नौकरी सरकारी ही चाहिए।

अपने कैडर का एक भी पद इधर-उधर होने से उनकी आत्मा हिलने लगती है। उन्हें तुरंत संविधान याद आता है। रोस्टर का एक-एक पॉइंट याद आ जाता है। सारे काम छोड़कर वकीलों की तलाश में जुट जाते हैं। कोर्ट कचहरी में मुकदमेबाजी होती है।

लेकिन इन बेचारे नौकरशाहों को क्यों दोष दिया जाए, यह तो उन सपेरों की धुन पर नाचते हैं। विपक्ष के एक नौजवान मगर पूर्व नेता ने निजीकरण के विरोध में वक्तव्य देने से पहले काश यह सोचा होता कि 10 साल तक उनकी पार्टी के जो प्रधानमंत्री रहे वे निजीकरण के सबसे बड़े पहरुए हैं। नरसिंह राव तो नाम के ही प्रधानमंत्री थे, उदारीकरण और निजीकरण की इबारत तो उन्हीं ने लिखी थी। और वे भले भी इतने हैं कि कभी उसे छुपाते भी नहीं।

तो रेलवे में यह सब शुरुआत उन्हीं दिनों पूरी रफ्तार से हो गई थी। रेलवे स्कूल सबसे कमजोर कड़ी थे, इसलिए वे लगभग 80% बंद हो चुके हैं। क्या स्कूलों के बंद होने पर आपने मीडिया की तरफ से कभी कोई बेचैनी सुनी?क्योंकि देश अमीर और गरीब में बंट चुका है। जो अमीर हैं उनके लिए अंग्रेजी और निजी स्कूल! गरीब के बच्चे के लिए सरकारी स्कूल कुछ दिन और उसके बाद वह भी रास्ता बंद।

सरकार और सरकारी स्कूलों के डूबने की कहानी लगभग एक सी ही है और वह है सरकारी नौकरी को एक ऐसे स्वादिष्ट खुशबूदार केक की तरह देखना, जिसमें सिर्फ खाने को हिस्सा चाहिए, करने को नहीं। आजादी के बाद जैसे-जैसे भ्रष्टाचार बढ़ता गया, वैसे-वैसे इस केक में हिस्सेदारी का हक भी, क्योंकि नैतिकता राजा से शुरू होती है, रंक से नहीं। इसलिए उसी अनुपात में सरकारी विभाग विनाश की तरफ बढ़ते गए और लगातार बढ़ रहे हैं।

आज हर जाति के हर विभाग में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संगठन मौजूद हैं, उनके दर्जनों प्रेसिडेंट, महासचिव, सचिव और सैकड़ों-हजारों की संख्या में अन्य पदाधिकारी हैं। काम करने के लिए किसी को जगह मिले न मिले, उनको उसी दफ्तर में अलग कमरा चाहिए नेतागिरी के लिए। यह तथाकथित राष्ट्रीय संगठनों के अलावा हैं। राष्ट्रीय यूनियन राष्ट्रीय नेताओं के इशारों पर चलती है।

रोजमर्रा के ट्रांसफर, विभागों के बंटवारे में प्रशासन की इमानदारी, पारदर्शिता किसी खूंटी पर टंगी रहती है। धीरे-धीरे एक नौजवान सरकारी दुर्ग में प्रवेश करने के कुछ ही वर्षों में किसी जाति या संगठन का सदस्य बनकर रह जाता है। भाड़ में गया उसका संविधान पढ़ना और नैतिकता की शपथ लेना।

इस तरह या तो कमीशनखोर बनिए या कमीशनवॉज। लोकनायक भवन आदि में बैठे कमीशन में दौड़ने की क्षमता रखिए। ये सब कमीशन संविधान की दुहाई देते हैं, इसीलिए संवैधानिक तरीके से “कमीशन” करते हैं हैं। यदि उनकी मर्जी से आपने ट्रांसफर/पोस्टिंग नहीं की, उनकी झूठी शिकायत पर किसी को दंड नहीं दिया, तो वह रोज आपको लोकनायक भवन की सीढ़ियों पर खड़ा रखेंगे।

प्रशासन की रीढ़ इतनी कमजोर हो चुकी है कि वह कोई नैतिक स्टैंड ले ही नहीं पाता। ऐसे में क्या तो हम चीन से मुकाबला करेंगे और कौन सी विश्वस्तरीय आत्मनिर्भर रेल चलाएंगे?

रोस्टर के झगड़े और मुकदमे वादियों में कैट-हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट में हजारों केस भरे पड़े हैं। हर पक्ष जर्रा जर्रा इसका जिम्मेदार है। फिर से जर्मन कवि बर्टोल्ड ब्रेस्ट के शब्दों में – “वे सब भी जिम्मेदार हैं जो यह सब देखते हुए चुप रहते हैं।” यह कैसा गणतंत्र है, जो शासन-प्रशासन की ऐसी बीमारियां – भ्रष्टाचार, जातिवाद, क्षेत्रवाद – खत्म करने के बजाय और बढ़ा रहा है और यदि वह इतना निकम्मा है, तो बाजार, निजीकरण अपना रास्ता तो खोजेगा ही!

आप सब ने उस जर्मन कवि की कविता भी पढ़ी होगी जो उसने हिटलरशाही के दौर में लिखी थी –

पहले उन्होंने कम्युनिस्टों को मारा/ मैं चुप रहा/ क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था/ फिर उन्होंने सोशलिस्टों को घेरा/ मैं तब भी चुप रहा/ क्योंकि मैं सोशलिस्ट नहीं था/ अंत में मुझे घेर लिया गया/ लेकिन तब तक/ देखने वाला भी आस-पास कोई नहीं था !

रेलवे भी देश का हिस्सा है। जब निजीकरण की बाढ़ इतनी आगे बढ़ चुकी हो जिसमें बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, पासपोर्ट, पैन कार्ड, सिक्योरिटी गार्ड इत्यादि पूरी तरह आ चुके हों, तो रेलवे में भी बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी? रेलमंत्री जी! बीमारी कुछ है, इलाज आप कुछ दूसरा कर रहे हैं! वक्त के साथ प्रशासनिक नीतियों को बदलिए, भ्रष्टाचार को रोकिए, जातिवाद, लालफीताशाही, निकम्मेपन पर लगाम लगाईए! रेल वह कीमती विरासत है, जो देश को आत्मनिर्भर भारत के रास्ते पर सबसे तेजी से लेकर जा सकती है!

 #प्रेमपालशर्मा, पूर्व संयुक्त सचिव, रेल मंत्रालय

संपर्क: 99713 99046

ईमेल: ppsharmarly@gmail.com

वेबसाइट: www.prempalsharma.com





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रेल मंत्रालय द्वारा मुंशी प्रेमचंद और मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित

रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) द्वारा रेल कर्मचारियों की साहित्यिक प्रतिभा और अभिरुचि को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से हिंदी में कहानी, उपन्यास, नाटक एवं अन्य गद्य साहित्य के लिए ‘मुंशी प्रेमचंद्र पुरस्कार’ और काव्य गजल संग्रह के लिए ‘मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार’ योजनाएं विगत काफी समय से चलाई जा रही हैं।

इन दोनों योजनाओं के अंतर्गत पुरस्कार एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान किए जाते हैं I पुरस्कारों में कथा, कहानी, उपन्यास, नाटक एवं अन्य गद्य साहित्य हेतु – प्रेमचंद्र पुरस्कार – जिसमें प्रथम पुरस्कार ₹20000, द्वितीय पुरस्कार ₹10000 एवं तृतीय पुरस्कार ₹7000 प्रदान किया जाता है।

इसी प्रकार मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार योजना के अंतर्गत काव्य/गजल संग्रह हेतु प्रथम पुरस्कार ₹20000,  द्वितीय पुरस्कार ₹10000 एवं तृतीय पुरस्कार ₹7000 दिया जाता हैI यह योजना रेल अधिकारियों और कर्मचारियों दोनों के लिए समान रूप से लागू है।

उपरोक्त दोनों विधाओं के लिए प्रविष्टियाँ प्राप्त करने की अंतिम तिथि 20.08.20 है। इच्छुक अधिकारी और कर्मचारी गण अपनी प्रविष्टियाँ निर्धारित तिथि के अंदर भेजने का प्रयास करें।



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सैकड़ों रेलकर्मी हो रहे हैं कोरोना संक्रमित, परंतु रेल प्रशासन को नहीं है उनके मरने-जीने की कोई परवाह!

मुंबई, दिल्ली और चेन्नई, तीनों महानगरों में कार्यरत रेलकर्मियों को है कोरोना संक्रमण का ज्यादा खतरा

सुरेश त्रिपाठी

यह सर्वविदित है कि मुंबई महानगर कोरोना वायरस की महामारी से बुरी तरह जूझ रहा है। दिन प्रति प्रतिदिन इसके मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। फिलहाल निकट भविष्य में इनके नियंत्रण की कोई उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है। तथापि मजबूरीवश राज्य सरकार को सीमित लॉकडाउन के चलते भी कामकाजी गतिविधियां शुरू करनी पड़ रही हैं। इस हेतु अब राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए उसके कहने और टिकट भाड़ा वहन करने पर सोमवार, 15 जून से मध्य एवं पश्चिम रेलवे को सीमित लोकल ट्रेनों की भी शुरुआत करनी पड़ी है।

यह सही है कि किसी महामारी अथवा किन्हीं विपरीत परिस्थितियों के कारण तमाम कामकाजी और व्यावसायिक गतिविधियां लंबे समय तक रोककर नहीं रखी जा सकतीं। तथापि फील्ड में बड़ी संख्या में कार्यरत अपने कर्मचारियों के लिए उनसे बचाव के हरसंभव उपाय अवश्य अपनाए जा सकते हैं, क्योंकि तमाम नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों ने तो अपने बचाव के सभी संभव उपाय कर लिए हैं, यही कारण है कि एकाध अपवाद को छोड़कर इनमें से कोई भी इस महामारी से ज्यादा प्रभावित होता नजर नहीं आया। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं है कि कर्मचारियों के मामले में राज्य सरकार और रेल प्रशासन दोनों प्राधिकारों द्वारा भारी कोताही बरती जा रही है।

Railway workers are waiting for workman special at platform without maintaining any physical distancing

अब जहां तक रेलकर्मियों की बात है, तो ऐसा लगता है जैसे कि उनका कोई माई-बाप ही नहीं रह गया है और उन्हें इस महामारी से निपटने तथा काम करने के लिए भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। भले ही रेलवे द्वारा इस महामारी से मरने और संक्रमित होने वाले रेलकर्मियों का एकीकृत आंकड़ा जारी नहीं किया जा रहा है, परंतु एक अनुमान के अनुसार रेलवे में कार्यरत सैकड़ों कर्मचारियों की मौत हो चुकी है। हर दिन दो-चार-दस की संख्या में ऐसी मौतें होने की खबरें किसी न किसी जोनल रेलवे से आ रही हैं। तथापि जोनो/मंडलों में इन असामयिक मौतों को लेकर कोई चिंता है, ऐसा नहीं लगता!

इस महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित रेलवे का फील्ड स्टाफ हो रहा है, जिनमें टीटीई, लोको पायलट्स, गार्ड्स, ट्रैक मेनटेनर, सिग्नल मेनटेनर, कमर्शियल एवं ट्रैफिक स्टाफ प्रमुख रूप से शामिल है। इसके अलावा ऑफिस स्टाफ भी इसलिए प्रभावित हो रहा है, क्योंकि वहां भी काम करते हुए फिजिकल डिस्टेंसिंग नियमों का पर्याप्त रूप से पालन करना संभव नहीं हो पा रहा है, क्योंकि निर्देशित 20% स्टाफ के बजाय लगभग पूरे ऑफिस स्टाफ को जबरन ड्यूटी पर बुलाया जा रहा है। इस सब के लिए अधिकारियों की प्रशासनिक एवं अनुशासनिक दादागीरी और मनमानी भी जिम्मेदार है।

उदाहरण स्वरुप पश्चिम रेलवे के वसई स्टेशन पर पिछले हफ्ते चार रेलकर्मियों को कोरोना संक्रमित पाया गया था। इसके लिए उन्हें इलाज हेतु भेजने के बाद पता चला कि उन चारों के संपर्क में करीब 45-46 जो अन्य रेलकर्मी भी आए थे, उन्हें नियमानुसार 14 दिन के लिए होम कोरेंटीन की एडवाइस की गई थी और पूरा वसई स्टेशन बंद कर दिया गया था। परंतु अभी उनका यह निर्धारित पीरियड पूरा भी नहीं हुआ था कि राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए सोमवार, 15 जून से लोकल शुरू होते ही उन सभी को फौरन ड्यूटी पर पहुंचने का आदेश मुंबई सेंट्रल मंडल के संबंधित वाणिज्य अधिकारी द्वारा दनदना दिया गया।

इसी तरह पश्चिम रेलवे के ही सूरत रेलवे स्टेशन पर एक चीफ टिकट इंस्पेक्टर (सीटीआई) के 2 जून को कोरोना पॉजिटिव, जिसकी जांच रिपोर्ट 12 जून को मिली, पाए जाने के बाद वहां के 21-22 स्टाफ को होम कोरेंटीन किया गया था। इनमें दो एडीआरएम और एक डीसीएम जैसे बड़े अधिकारी भी शामिल थे। यह सभी लोग उक्त सीटीआई के संपर्क में आए थे। इसी प्रकार उधना रेलवे स्टेशन पर भी एक बुकिंग क्लर्क को पॉजिटिव पाए जाने पर वहां के स्टेशन स्टाफ को भी आइसोलेट किया गया।

वसई और सूरत के मामलों में मंडल अधिकारियों द्वारा बरती गई लापरवाही तथा मनमानी का विरोध दोनों यूनियनों (डब्ल्यूआरएमएस/डब्ल्यूआरईयू) के मंडल एवं मुख्यालय पदाधिकारियों द्वारा किया गया है, परंतु उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई, क्योंकि किसी की भी नहीं सुनने का जैसा रवैया केंद्र सरकार ने अपना रखा है, वैसा ही रवैया केंद्र सरकार के अधिकारियों ने भी लंबे समय से अपनाया हुआ है। नतीजा यह है कि कोई भी कितना ही चिल्लाता रहे, किसी की कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

इसके अलावा दक्षिण रेलवे, उत्तर रेलवे की स्थिति भी काफी डरावनी है। पिछले हफ्ते दक्षिण रेलवे के पेरंबूर, चेन्नई स्थित प्रमुख रेलवे अस्पताल में एक साथ बीस रेलकर्मियों की मौत की खबर स्थानीय अंग्रेजी दैनिक में प्रकाशित हुई थी। इसी तरह उत्तर रेलवे मुख्यालय बड़ौदा हाउस और भारतीय रेल के मुख्यालय “रेल भवन” में भी कई अधिकारी और कर्मचारी इस महामारी से प्रभावित हो चुके हैं। उत्तर रेलवे के सेंट्रल हॉस्पिटल की दुर्गति, कोविद केसेस की जांचों में कमीशनखोरी और एमडी को जनरल प्रैक्टिस में भेजे जाने के बाद पुनः उसी पद पर उनकी पुनर्नियुक्ति में रेल प्रशासन की पूरी मनमानी भी सामने आ चुकी है।

अन्य जोनल रेलों में भी उपरोक्त से स्थिति अलग नहीं है। मगर मुंबई, दिल्ली और चेन्नई में जो हालत चल रही है, उसको देखते हुए इन तीनों महानगरों में कार्यरत अधिकांश रेलकर्मियों को संक्रमण का खतरा ज्यादा है। अतः यदि सेफ और सिक्योर वर्किंग सुनिश्चित करनी है, तो रेल प्रशासन को अपने कर्मचारियों के लिए इस महामारी से बचाव के पर्याप्त इंतजाम करने के साथ ही केंद्रीय गृहमंत्रालय द्वारा जारी की गई नियमावली का अक्षरशः पालन करवाना भी सुनिश्चित करना होगा।

Chief Typist of SrDOM/G office, Mumbai Division, Central Railway, B. R. Damse expired on Monday, 15th June morning at Kalyan Railway hospital. He was admitted in Kalyan Railway Hospital on Sunday, 14th June of breathlessness. As per Doctors of Kalyan Railway Hospital, a case of suspected Covid. As per sources, he last attended office on 5/6/2020. Entire SrDOM office is being fully sanitised on Monday. The Office was Last sanitised on 12/6/2020.

“It is come to know that a vacant building, behind building no.8 is handed over to BMC for covid-19 patients, if it is true we all have to protest against it, to save containment of our Mazgaon Railway colony”, this message viral on social media on Saturday-Sunday in between employee and officers who resides at Mazgoan Railway colony.








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देश की लाइफलाइन – भारतीय रेल – को “कोरोना अवसर” ने स्वार्थ और मंसूबों के लिए निगल लिया!

केंद्र सरकार और रेल मंत्रालय दोनों इस समय साँप-सीढ़ी का खेल खेल रहे हैं। पहले विभिन प्रदेशों में फंसे श्रमिकों को उनके गृह प्रदेश पहुंचाने का खेल श्रमिक स्पेशल चलाकर खेला गया और अब फिर से उन्हें उनके गृह प्रदेश से रोजी-रोटी कमाने के लिए अन्य प्रदेशों में वापस भेजने का खेल चालू हो गया है।

अब तो लूडो का गेम बनाने वाला भी घनचक्कर हो गया है कि उससे भी बुद्धिमान कौन आ गया! सकारात्मक सोच रखने वाले खासकर सत्ताधीश लोग कोरोना को अवसर के रूप में प्रचारित कर रहे थे। शायद उनकी बात को किसी ने सही ढंग से जज नहीं किया।

सरकार सबसे पहले इस अवसर को रेल का दिवाला करके उसे बेपटरी करके ही भुनायेगी। कर्मचारी हैरान और परेशान हैं कि आखिर रेल में हो क्या रहा है??

नियमित गाड़ी नहीं चलेगी, लेकिन उसी के नाम और शेड्यूल पर स्पेशल चलाएंगे। रेल कर्मचारी इतनी गफलत में आ गए हैं कि उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि उन्हें करना क्या है??

Vinod Kumar Yadav, Chairman, Railway Board

धन्य हो प्रशासक और नीति-नियंता ! देश की लाइफ लाइन कही जाने वाली भारतीय रेल को तथाकथित कोरोना नामक अवसर ने अपने स्वार्थ और मंसूबों को पूरा करने के लिए लील लिया !!








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अक्षम नेतृत्व के चलते डिरेल हुई भारतीय रेल! – RailSamachar

ऐसा लगता है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने तय कर लिया है कि सरकारी कर्मचारियों सहित देश की पूरी जनता को कोरोना संक्रमित बनाना है!

सुरेश त्रिपाठी

बिना उचित तैयारी के लॉकडाउन का खामियाजा आम जनता के अलावा यदि किसी सरकारी क्षेत्र पर पड़ा है तो वह है देश की लाइफलाइन कही जाने वाली – भारतीय रेल। अब कोढ़ में खाज वाली कहावत इसलिए चरितार्थ हो रही है, क्योंकि पिछले कई वर्षों से रेल मंत्रालय मानो शून्य की तरफ चला गया है!

रेल मंत्रालय का न तो कोई विजन रह गया है, न ही कोई सफल और दूरदृष्टि युक्त योजना। सिवाय निजीकरण की कोशिशें करने, विभागवाद और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने, अनाप-शनाप खर्च, टेंडर्स में अपनों को घुसाने, उनके अनुरूप टर्म्स-कंडीशन बनवाने, बिना कॉस्ट कटिंग किए टेंडर अवार्ड करने और विजिलेंस सिस्टम को मुर्दा बनाने के अलावा कुछ भी तो नया नहीं हुआ है रेल मंत्रालय में!

और अब तो एनडीए-१ का वह राग भी रेलमंत्री अथवा कोई अन्य केंद्रीय मंत्री द्वारा नहीं आलापा जा रहा है कि भारतीय रेल में साढ़े आठ लाख करोड़ का निवेश किया जाएगा। सरकार और उसके मंत्रीगण तो इस जुमले को भूल ही चुके हैं, पर देश की जनता को भी शायद अब यह जुमला याद नहीं रहा!

The ‘most badjuban’ Minister for Railways Piyush Goyal become a Derailminister!

आखिर सिस्टम सुधरे भी तो कैसे, जैसा राजा वैसी प्रजा। रेलमंत्री पीयूष गोयल “डिरेलमंत्री” साबित हो चुके हैं, पर न जाने क्यों प्रधानमंत्री उन्हें ढ़ोए जा रहे हैं। उनका एक भी निर्णय अब तक न तो निष्पक्ष रहा और न ही आज तक किसी अंतिम निष्कर्ष तक पहुंच पाया। उनकी निरंकुशता और दुर्व्यवहार का ही परिणाम है कि अब रेलवे की नौकरशाही भी बेलगाम हो चुकी है।

Vinod Kumar Yadav, The Most-Incompetent Chairman, Railway Board

वैसे तो सरकार द्वारा चेयरमैन, रेलवे बोर्ड के पद पर बैठाए गए अब तक के सभी अधिकारी अक्षम और नाकामयाब रहे हैं, मगर वर्तमान सीआरबी उनमें से भी सबसे ज्यादा अक्षम (मोस्ट इन्कम्पीटेंट) और कठपुतली साबित हुए हैं। जो भारतीय रेल दशकों से लेकर अब तक प्रतिदिन 13000 यात्री ट्रेनों का सफल/सुचारु संचालन कर रही थी, वह अब रोज 200 श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाने में असमर्थ साबित हो रही है। यह है डिरेलमंत्री और अक्षम सीआरबी की उपलब्धि!

जिस तरह सरकार की नीतियों-निर्देशों में एकरूपता का अभाव रहा है, ठीक उसी तरह रेल मंत्रालय के निर्णयों में भी अस्पष्टता और मनमानी लगातार देखने को मिली है। रेलवे कोचों को आइसोलेशन वार्ड में बदलने का भी इनमें से एक ऐसा ही निर्णय था, जिसमें सौ करोड़ से भी ज्यादा की कीमती रेलवे रेवेन्यू खर्च की गई, जबकि उनका कोई इस्तेमाल नहीं हुआ।

वह तो अच्छा हुआ कि समय रहते एक ट्रैफिक अधिकारी के सुझाव पर स्लीपर कोचों के बजाय जनरल कोचों का इस्तेमाल किया गया। अब इन्हें डिस्मेंटल करने के लिए भी अलग से बड़ी राशि खर्च की जाएगी। यानि सब तरफ गोलमाल ही है। अब जब केंद्र सरकार ने लॉकडाउन के अपने ही नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए श्रमिकों को उनके घरों तक पहुंचाने के लिए रेलवे का साधन चुना, तो वहीं से तय हो गया था कि आगे प्रवासी यात्रियों की तकलीफ कितनी बढ़ने वाली है।

रेलवे बोर्ड के अक्षम चेयरमैन खुद स्वीकार कर रहे हैं कि 2600 से ज्यादा श्रमिक ट्रेनें चलाई जा चुकी हैं, जिसमें 80% ट्रेनें केवल उत्तर प्रदेश, बिहार के लिए चलाई गई हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि मात्र इन दो प्रदेशों से कितनी बड़ी संख्या में लोगों को रोजी-रोजगार के लिए देश के दूसरे हिस्सों में जाना पड़ता है। उस पर बजाय उद्योग लगाने और रोजगार पैदा करने के इन दोनों प्रदेशों के नेता इस पर भी राजनीति कर रहे हैं!

अब सोचने वाली बात यह है कि एक साथ इतनी ट्रेनों को एक दिशा में ले जाने की इतनी जल्दी क्यों थी? 25 मार्च से लॉकडाउन चल रहा था। जब निकम्मी राज्य सरकारें अपने यहां से बाहरी लोगों को हटाने के लिए अनुरोध कर रही थीं, तो खतरे की घंटी का आभाष तो केंद्र सरकार को उसी समय हो जाना चाहिए था।

लेकिन बात वही बालहठ की है कि मैं जो चाहूंगा वही होगा! जो जहां है वहीं रहेगा! जब केंद्र सरकार का डिजास्टर मैनेजमेंट धड़ाम हुआ तो उसने जनता को आत्मनिर्भर बनाते हुए खुद ही लड़ने के लिए सड़कों पर छोड़ दिया और गरीब, मजदूर, उनका परिवार, आम जनता बेरोजगार होकर सड़क पर आ गई। न तो राज्य सरकारों ने, न ही किसी उद्योगपति ने, और न ही कोई दानदाता इनको बचाने के लिए सामने आया।

केंद्र सरकार ने इन बेबस श्रमिकों को उनके घर भेजने की जिम्मेदारी भी दी तो उस भारतीय रेल को जिसका पहिया खुद ही सरकार ने महीनों से अपनी हठधर्मिता के कारण ठप्प कर दिया था।

इन सबके बीच भी यदि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच संवाद और तालमेल बना रहता, तो शायद इतनी आपाधापी की स्थिति पैदा नहीं होती या कोरोना संक्रमण से सावधानी के साथ निपटते हुए सामान्य जनजीवन को लॉकडाउन-1 के बाद खोल दिया गया होता, तो भी इतनी बुरी तरह इस भीषण गर्मी में प्रवासियों के विस्थापित होने की कालिख सरकार पर नहीं लगती।

भारतीय रेल को श्रमिकों को ले जाने के लिए जो जिम्मेदारी दी गई, वह प्रारंभिक चरण में तो काफी हद तक कामयाब रही, क्योंकि कम लोड के कारण और राज्य सरकारों के सहयोग से यात्रियों की स्क्रीनिंग इत्यादि का काम बखूबी चलता रहा, लेकिन इस भीषण गर्मी के मौसम में जब एक ही दिशा में सारा लोड, वह भी तब जब भूखे-प्यासे लोगों का छोड़ दिया गया हो, तो स्थिति भयावह हो गई।

परिणाम ये हुआ कि फिजिकल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ गईं, कोचों में क्षमता से भी अधिक लोगों को जानवर से भी बदतर स्थिति में ठूंस-ठूंसकर भरकर भेजा जाने लगा। न तो कोचों की सफाई हुई, न सेनेटाइजेशन, न ही पानी, लाइट इत्यादि की व्यवस्था पर ध्यान दिया गया और न ही उनके खाने-पीने की कोई उचित व्यवस्था हुई।

कोढ़ में खाज का काम ट्रेनों की अक्षम्य लेट-लतीफी ने पूरा कर दिया। जो गाड़ियां समय से पहले चलती थीं, अब उनके आगमन-प्रस्थान समय का पता ही नहीं है। उस पर भी जब 40-40 ट्रेनों का मार्ग भटक जाए और वह डेढ़-दो दिन के बजाय हफ्ते-दस दिन बाद गंतव्य पर पहुंचें, तो उनमें सवार श्रमिकों, जिन्हें पानी तक नहीं मुहैया कराया गया, की हालत क्या होगी, इसका अंदाजा लगा पाना कतई मुश्किल नहीं है!

कोच इस वक्त आग का गोला बना हुआ है। छोटे-छोटे बच्चे, बूढ़े-बुज़ुर्ग सब लोग असहाय हो गए। उन्हें क्या पता था कि जिस दर-दर की ठोकर से बचने के लिए वे वापस अपने घर को जाने को मजबूर हुए हैं, वह रास्ता इतना दुरूह साबित होगा।

इन विशेष गाड़ियों में खानपान उपलब्ध कराने की व्यवस्था आईआरसीटीसी को सौंपी गई है, लेकिन इस आपदा में उसका विकृत चेहरा सामने आया है। किसी भी कोच में न तो पूरा खाना बांटा जा रहा और न ही पानी। अधिकारी वातानुकूलित चेंबर में बैठकर टेलीविजन देखने में व्यस्त हैं और उनका स्टाफ गरीबों का भोजन और पानी हड़पने में लगा हुआ है।

उत्तर रेलवे में बनाए गए नोडल फंड से सभी जोनल रेलों के पीसीसीएम को श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में श्रमिकों को खान-पान उपलब्ध कराने के लिए प्रति श्रमिक स्पेशल एक लाख रुपए खर्च करने का अधिकार दिया गया है। परंतु जब जबलपुर स्टेशन पर पश्चिम मध्य रेलवे द्वारा अपने स्टाफ के माध्यम से यह कोशिश की गई, तो आईआरसीटीसी के लोगों ने उन्हें जबरन रोक दिया। यही नहीं, वह तो इसकी शिकायत लेकर सीधे पीसीसीएम के चेंबर में घुस गए। सब कमीशनखोरी का चक्कर है। यह कोरोना क्राइसिस भी कुछ लोगों के लिए वरदान साबित हो रही है।

हर दिन गाड़ियों में किसी न किसी श्रमिक यात्री की मौत की खबर आ रही है, लेकिन संवेदनहीन हो चुकी व्यवस्था को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। हर साल इस मौसम में गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, पंजाब से मुख्यतः यूपी, बिहार के लोग घर जाते हैं और तब ज्यादा ट्रेनें भी चलाई जाती हैं। फिर इस बार सिस्टम फेल क्यों हो गया?

आखिर रेल मंत्रालय केंद्र सरकार को ये कहने की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पा रहा है कि इस तरह से ट्रेनों का संचालन नहीं किया जा सकता है? केंद्र सरकार और डिरेलमंत्री अपनी नाकामी का ठीकरा भारतीय रेल पर अब क्यों फोड़ रहे हैं? तब उन सभी जोनल रेलों के पीसीओएम की बात क्यों नहीं सुनी गई जो ऐसी विषय स्थिति में ट्रेनें नहीं चलाए जाने का सुझाव वीडियो कांफ्रेंसिंग में दे रहे थे!

क्या अब इन प्रवासी मजदूरों के माध्यम से देश के दूर-दराज गांवों तक कोरोना नहीं फैलेगा? न तो गाड़ियों में कोई एस्कोर्टिंग हो रही है और न ही किसी स्टेशन पर पर्याप्त सुरक्षा है। अभी भी डिरेलमंत्री ट्रेन चलाने के लिए महाराष्ट्र सरकार से मजदूरों की लिस्ट मांग रहे हैं लेकिन एक बार भी ये नहीं कह रहे हैं कि इन्हें रोकें और इनके रोजगार को जिंदा रखें। आखिर इनका पलायन क्यों नहीं रोका जा रहा है?

सोशल मीडिया पर कथित फिजिकल डिस्टेंसिंग की फोटो डालकर आत्ममुग्ध हो रहा रेल प्रशासन कभी कोच के अंदर जाकर देख तो ले कि जानवर भी इतनी बुरी तरह से नहीं ठूंसे जाते हैं, वह भी इस भीषण गर्मी में! यही हाल अब सभी वर्कमैन स्पेशल में भी देखने को मिल रहा है। यानि ऐसा लगता है कि जैसे सरकार और नेताओं ने मिलकर तय कर लिया है कि पूरे देश की जनता और सभी सरकारी कर्मचारियों को कोरोना संक्रमित बनाना है!








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सिविल प्रशासन के सामने नतमस्तक रेल प्रशासन – RailSamachar

एमसीएफ अस्पताल को कोविद अस्पताल बनाने पर कर्मचारियों में रोष

सुरेश त्रिपाठी

इसमें कोई संदेह नहीं है कि कोरोनावायरस की वर्तमान वैश्विक महामारी को देखते हुए हर व्यक्ति की स्वत: यह जिम्मेदारी बनती है कि वह सरकार और व्यवस्था के साथ हर प्रकार का सहयोग और समायोजन करे। परंतु इसका यह मतलब भी कदापि नहीं हो सकता है कि सरकार के नुमाइंदे/नौकरशाह अचानक प्राप्त असीमित अधिकारों का मनमानी और धमकी भरा प्रयोग कर जनसाधारण में भय व्याप्त करें। भय की यह स्थिति उत्तर प्रदेश सहित हरियाणा, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल तथा कुछ अन्य प्रदेशों तक में देखी जा रही है।

लॉकडाउन के पालन और कोरोना महामारी से बचाव तथा व्यवस्था के संदर्भ में भारत सरकार के आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के तहत राज्य सरकारों ने सिविल प्रशासन यानि जिला पुलिस अधीक्षकों एवं जिलाधिकारियों को समुचित दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन दिशा-निर्देशों का कब, कहां और कितना पालन किया जाना है, कितना नहीं, यह भी बताया गया है। परंतु लगभग सभी जिलों की अंतर्गत व्यवस्था में सिविल प्रशासन की अक्षरशः मनमानी चल रही है। इसमें अहंकार और अचानक प्राप्त हुई निरंकुश सत्ता का घमंड समा गया है, जो कि अनेक जिलों में देखने को मिल रहा है। कोरोना को नियंत्रित करने के लिए दिया गया अधिकार सर्वसामान्य जनता और दर-बदर हो रहे लोगों के लिए असह्य नरकयातना तथा अमानवीय अत्याचार का हथियार बन गया है।

मॉडर्न कोच फ़ैक्ट्री के हॉस्पिटल को कोरोना हॉस्पिटल बनाए जाने का निरीक्षण करते हुए जिलाधिकारी/रायबरेली श्रीमती शुभ्रा सक्सेना। उनके साथ हैं फ़ैक्ट्री के अधिकारीगण और जिला सिविल प्रशासन के अन्य अधिकारी।

ऐसे में किसी जिलाधिकारी का सर्वसामान्य लोगों को यह धमकी देना कहां तक उचित हो सकता है कि यदि किसी ने उनके निर्णय का विरोध किया तो वह उसे गिरफ्तार करा देंगी। हां, यह सही है कि जिला रायबरेली, उत्तर प्रदेश की जिलाधिकारी शुभ्रा सक्सेना ने यह धमकी लालगंज, रायबरेली स्थित मॉडर्न कोच फैक्ट्री (एमसीएफ) के कर्मचारियों और यूनियन प्रतिनिधियों को तब दी जब वह 6 मई को एमसीएफ अस्पताल को कोविद अस्पताल और फैक्ट्री परिसर में आइसोलेशन वार्ड बनाने हेतु वहां निरीक्षण करने पहुंची थीं।

यही नहीं, जिलाधिकारी ने अपने निरीक्षण के दौरान वहां मौजूद एमसीएफ के किसी अधिकारी को कुछ भी बोलने का मौका नहीं दिया। यहां तक कि उन्होंने दबी जबान में कुछ अधिकारियों द्वारा उन्हें अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने के लिए दिए गए सुझाव को भी नजरंदाज कर दिया। कर्मचारी प्रतिनिधियों एवं उनकी संयुक्त संघर्ष समिति के सदस्यों की जुबान पर तो उन्होंने पहले ही यह कहकर ताला लगा दिया था कि विरोध में यदि कोई कुछ बोला तो उसे पुलिस के हवाले कर दिया जाएगा।

लालगंज, रायबरेली स्थित एमसीएफ के एकमात्र अस्पताल को जिला प्रशासन ने अपने संरक्षण में ले लिया है। इस संबंध में उसी दिन आदेश के पालन हेतु एक पत्र (सं. 448/जेए- कोविद-19-अधि/2020, दि.06.05.2020) भी फैक्ट्री प्रबंधन को थमा दिया, जिसके बाद एमसीएफ हॉस्पिटल को कोरोना अस्पताल और संक्रमितों के लिए आइसोलेशन वार्ड बनाना शुरू कर दिया गया। तथापि इसका विरोध फैक्ट्री कर्मचारियों के अलावा आसपास के जनप्रतिनिधियों द्वारा भी किया जा रहा है।

Under construction cover isolation ward at MCF complex, Raebareli

फैक्ट्री के कर्मचारियों का कहना है कि जिलाधिकारी अथवा स्थानीय प्रशासन को फैक्ट्री की व्यवस्था के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। यह जानकारी जिला प्रशासन से फैक्ट्री खोले जाने की अनुमति मांगने गए चीफ प्लांट इंजीनियर (सीपीई) ने ही अपनी हांकने अनुमति मिलने के लिए की जाने वाली जरूरी चापलूसी के चक्कर में दी होगी। उनका कहना था कि सीपीई की इस हरकत के बदले आखिर शनिवार, 9 मई, यानि आज से फैक्ट्री खोले जाने की अनुमति जिला प्रशासन ने दे दी है। अब फैक्ट्री के सभी अधिकारी और कर्मचारी असमंजस में हैं और तय नहीं कर पा रहे हैं कि कर्मचारियों का नियोजन किस तरह किया जाए, जिससे कि कोरोना संक्रमण से बचा जा सके। जबकि फैक्ट्री के आवासीय परिसर में बनाए जा रहे कोविद अस्पताल के कारण वहां रह रहे सभी अधिकारी और कर्मचारी में दहशत के माहौल में रहने को अभिशप्त हो गए हैं।

एमसीएफ अस्पताल को कोरोना संक्रमित मरीजों के लिए कोविद अस्पताल बनाने पर ऐहार ग्राम पंचायत के पूर्व प्रधान राजकिशोर सिंह बघेल ने भी पुरजोर विरोध किया है। उन्होंने कहा कि एमसीएफ अस्पताल के बजाय रायबरेली शहर, जो कि रेड जोन में है, के एकदम पास स्थित एम्स को कोविद अस्पताल बनाया जाना चाहिए, जो कि जिला प्रशासन के लिए अत्यंत सुविधाजनक और सभी की पहुंच में है। बघेल ने यह भी कहा कि लालगंज और इसके आसपास का क्षेत्र पूरी तरह से कोरोनामुक्त है, ऐसे में जिला प्रशासन को भी कोरोना मरीजों को यहां लाने से बचना चाहिेए। बघेल ने हालांकि मीडिया के सामने ही डीएम को रोका और उनसे कहा कि लालगंज क्षेत्र अब तक कोरोना से सुरक्षित है। ऐसे में आवासीय परिसर के अंदर बने अस्पताल को क्यों कोरंटीन सेंटर बनाया जा रहा है, यदि बनाना ही है तो एम्स को बनाएं, एनटीपीसी को बनाएं, जहां सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं। डीएम उनकी हर बात को अनसुना करके बिना कोई जवाब दिए वहां से चली गईं।

ज्ञातव्य है कि बुधवार, 6 मई को जिलाधिकारी (डीएम) श्रीमती शुभ्रा सक्सेना, ने एसपी स्वप्निल ममगई सहित अन्य अधिकारियों के साथ एमसीएफ अस्पताल का मुआयना किया था, जिसके बाद अस्पताल की ओपीडी को एमसीएफ में ही किसी अन्य जगह शिफ्ट करने का आदेश डीएम ने दिया और फैक्ट्री अस्पताल को कोविद अस्पताल बनाने का ऐलान कर दिया। इस मौके पर फैक्ट्री प्रशासन की तरफ से सीपीई ए. के. सिंह, सेक्रेटरी/जीएम अमित सिंह, एसीएमओ डी. डी. शुक्ला, डॉ दीपक शाही आदि मौजूद थे।

एमसीएफ हॉस्पिटल को कोविद अस्पताल बनाए जाने पर फैक्ट्री कर्मचारियों ने डीएम/रायबरेली के सामने ही ऐतराज जाहिर करते हुए कहा कि यह अस्पताल फैक्ट्री के आवासीय परिसर के अंदर बना है और इस क्षेत्र के लोग अब तक बिल्कुल सुरक्षित हैं। उन्हें प्रशासन ने पेट्रोल डालने तक के लिए बाहर नहीं निकलने दिया है। कर्मचारियों ने कहा कि यदि फैक्ट्री में संक्रमण फैल गया तो उनका इलाज /खून की जांच आदि कहां होगी। इस पर डीएम ने उन्हें रायबरेली सिविल अस्पताल में जांच कराने और जरूरत पड़ने पर समुचित सुविधा उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया।

डीएम द्वारा फैक्ट्री से करीब 25 किमी. दूर रायबरेली सिटी स्थित सिविल अस्पताल में जांच कराने की बात कहने पर कर्मचारियों ने इतनी दूर जाकर जांच कराने से ऐतराज जताया और कहा कि यदि रायबरेली में उनकी जांच कराई जाएगी तो वहां आने-जाने का साधन और छुट्टी का क्या होगा। बेहतर होगा कि उन्हें यहीं सुविधा दी जाए। इसके बाद डीएम ने उन्हें विरोध करने पर पुलिस के हवाले करने की बात कहतेऔर किसी की अन्य कोई बात न सुनते हुए बिना कोई जवाब दिए वहां से चली गईं। इस तरह जिला प्रशासन द्वारा कर्मचारियों की बात को अनसुना कर दिया गया। 

प्राप्त जानकारी के अनुसार जिला प्रशासन पहले ऊंचाहार स्थित एनटीपीसी का अस्पताल देखने और उसे कोविद अस्पताल बनाने के उद्देश्य से ऊंचाहार गया था, बताते हैं कि एनटीपीसी प्रशासन और यूनियन ने उनकी एक भी नहीं सुनी। उनके पुरजोर विरोध को देखकर जिला प्रशासन के अधिकारी वहां से बैरंग वापस लौट आए थे। मगर एमसीएफ प्रशासन और यहां की दोनों यूनियनों के नेताओं के डर जाने तथा खुलकर सामने नहीं आने के कारण एमसीएफ अस्पताल को न सिर्फ कोविद अस्पताल बना दिया गया है, बल्कि फैक्ट्री परिसर में आइसोलेशन वार्ड भी बनाया जा रहा है।

पूर्व ग्राम प्रधान बघेल सहित एमसीएफ के कई कर्मियों एवं कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने भी यह दावा किया कि एम्स को इसलिए कोविद अस्पताल में तब्दील नहीं किया जा रहा है, क्योंकि उसे कोई प्राइवेट पार्टी संचालित कर रही है, जिसे जिला प्रशासन का पर्याप्त संरक्षण प्राप्त है। उनका यह भी कहना है कि आवासीय परिसर में कोरोना अस्पताल और आइसोलेशन वार्ड बनाए जाने से 90% आउटसोर्स वाली गस फैक्ट्री में कार्यरत करीब साढ़े तीन सौ अधिकारियों, उनके परिजनों और लगभग दस हजार कर्मचारियों (कांट्रेक्ट लेबर सहित) के संक्रमित होने का खतरा पैदा हो गया है।

उनका यह भी कहना था कि यहां ऑफीसर्स कालोनी सहित फैक्ट्री, अस्पताल इत्यादि से दूषित पानी निकासी की इन-बिल्ट व्यवस्था होने से यह आशंका और भी बलवती हो जाती है। उल्लेखनीय है कि पेरिस, फ्रांस की नदी में कोरोनावायरस के विषाणु पाए जाने की पुष्टि हो चुकी है। अतः ऐसे में सावधानी बरतना आवश्यक है।

जब रेल मंत्रालय ने अपनी यह नीति पहले ही घोषित की हुई है कि जहां सिंगल रेलवे हॉस्पिटल है, वहां कोविद अस्पताल नहीं बनाया जाएगा और न ही राज्य सरकार को सौंपा जाएगा, तब सवाल यह उठता है कि एमसीएफ हॉस्पिटल और टेक्निकल ट्रेनिंग हॉस्टल जिला प्रशासन को कैसे सौंप दिया गया? या तो रेल प्रशासन को सिंगल हॉस्पिटल की परिभाषा का भान नहीं हो रहा है, अथवा उसे अपनी घोषित नीति का विस्मरण हो गया है, या फिर उसमें राज्य के चीफ सेक्रेटरी से सीधे संवाद करने का साहस नहीं बचा है! जबकि बताते हैं कि जब एक कनिष्ठ अधिकारी ने डीएम से अपने निर्णय पर पुनर्विचार का अनुरोध किया, तभी तपाक से डीएम ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम लेकर कहा कि इस बारे में आप सीधे उन्हीं से बात कर लें!

इस संदर्भ में फैक्ट्री प्रशासन कुछ भी कहने से बच रहा है, जबकि एआईआरएफ के महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने उपरोक्त रेलवे नीति की पुष्टि करते हुए कहा कि इस संबंध में सीआरबी ने भी उन्हें आश्वस्त किया था कि सिंगल रेलवे हॉस्पिटल नहीं सौंपा जाएगा। परंतु बाद में ऐसा लगता है कि सीआरबी ने उन्हें भी ठेंगा दिखा दिया और कुछ भी पुख्ता करने के बजाय अपनी निर्धारित नीति से पलटी मार गए। इसीलिए कॉम. मिश्रा भी कुछ करने में असमर्थ दिखाई दिए, क्योंकि बाद में पूछे जाने पर उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। उनके यानि आरसीएफ/एमसीएफ मेंस यूनियन के महामंत्री भी सिर्फ एमसीएफ प्रमोटी ऑफीसर्स एसोसिएशन द्वारा लिखे गए पत्र का समर्थन करके अपने कर्तव्य की इतिश्री मानकर चुपचाप बैठ गए।

बहरहाल, उपरोक्त पूरे मामले का लब्बोलुआब यह है कि महामारी के चलते सिविल प्रशासन को प्राप्त असीमित अधिकार के मद्देनजर कोई भी सक्षम प्राधिकार आगे आकर हजारों रेलकर्मियों के स्वास्थ्य सहित लाखों स्थानीय लोगों के हितों के संरक्षण में कुछ भी स्पष्ट कहने और करने से डर रहा है। ऐसे में सीआरबी, जिनको खुद पर पर्याप्त भरोसा नहीं है, सहित अन्य सभी सक्षम रेल अधिकारी सिविल प्रशासन के सामने बौने साबित हो रहे हैं, अन्यथा यह कहकर कि “उन्हें आपदा प्रबंधन के तहत असीमित अधिकार प्राप्त है, ऐसे में हम कुछ नहीं कर सकते हैं, हमें सहयोग करना चाहिए”, एसएजी/एचएजी स्तर के रेल अधिकारी एक सीनियर स्केल अथवा जेएजी स्तर के आदने से सिविल अधिकारी को सर-सर करके उसके सामने नतमस्तक नहीं होते!








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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘मन की बात’ में की गई भारतीय रेल की सराहना

कोविद-19 महामारी के विरुद्ध जारी हैं भारतीय रेल के हरसंभव प्रयास

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार, 26 अप्रैल को प्रसारित ‘मन की बात’ कार्यक्रम में भारतीय रेल के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि देश के किसी भी हिस्से में आवश्यक वस्तुओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए रेलकर्मी लगातार काम कर रहे हैं। भारतीय रेल द्वारा लगभग 60 मार्गों पर 100 से अधिक पार्सल ट्रेनें चलाए जाने का उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया।

सेवा के लक्ष्य के साथ, भारतीय रेल सभी मोर्चों पर कोविद-19 महामारी के विरुद्ध संघर्ष में हरसंभव तरीके से अपना योगदान दे रही है। रेल कोरोना योद्धा न केवल निरंतर मालगाड़ियों और पार्सल ट्रेनों का संचालन सुनिश्चित कर रहे हैं, बल्कि कई नवाचारों, शारीरिक दूरी बनाए रखने की कोशिशों सहित स्वच्छता प्रयासों के साथ कोविद-19 से भी लड़ रहे हैं।

भारतीय रेल के कुछ उल्लेखनीय प्रयास

•  मालगाड़ियों और पार्सल ट्रेनों  की औसत गति में निरंतर सुधार हो रहा है। जहां पार्सल  ट्रेनों  के लिए 75 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की औसत गति को बनाई रखी जा रही है, वहीं मालगाड़ी की औसत गति भी अबतक की सर्वश्रेष्ठ 50 किलोमीटर प्रति घंटा  की रफ्तार तक पहुंच रही है।

•  25 अप्रैल, 2020 तक कुल 245 समयसारिणी बद्ध पार्सल ट्रेनों का संचालन किया गया है, जिसमें से 212 ट्रेनें निर्धारित समय सरिणी के साथ चलीं और इसके साथ 86.5% की समग्र समयपालनता बनाए रखी गई। लॉकडाउन के दौरान उत्तर मध्य रेलवे ने आवश्यक वस्तुओं के लगभग 140 टन पार्सल ट्रैफ़िक बुक किए हैं।

•  उत्तर मध्य रेलवे ने अब तक अप्रैल में 32 लॉंग हॉल (दो माल गाड़ियों को एक साथ जोड़ कर) गाड़ियों का परिचालन किया है जिससे सेक्शन के थ्रूपुट में वृद्धि हुई है।

•  उत्तर मध्य रेलवे की विभिन्न इकाइयों द्वारा अबतक लगभग 1.5 लाख रीयूज़ेबल फेस कवर और 8000 लीटर सैनिटाइजर का उत्पादन किया गया है।

•  लॉकडाउन के दौरान उत्तर मध्य रेलवे द्वारा अब तक लगभग 75000 जरूरतमंद व्यक्तियों को पकाया हुआ भोजन प्रदान किया गया है। इसके अलावा पोर्टरों, सफाई कर्मचारियों, दिहाडी मजदूरों आदि को भी राशन वितरित किया गया है।

•  उत्तर मध्य रेल द्वारा मेडिकल कर्मियों के लिए पीपीई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कवरऑल भी बनाया जा रहा है और झांसी कारखाने तथा प्रयागराज  डिवीजन द्वारा क्रमशः 750 और 400 सहित अब तक कुल 1150 कवरआल तैयार हो चुके हैं। उत्तर मध्य रेल  ने अपने फ्रंटलाइन कोरोना योद्धाओं को संक्रमण से बचाने के लिए करीब 10000 कवरआल  बनाने की योजना बनाई है।

•  अब तक उत्तर मध्य रेल के लगभग 105000 रेल कर्मचारियों और उनके परिवार के सदस्यों के मोबाइल फोन पर आरोग्य सेतु ऐप डाउनलोड हो चुके हैं।








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परिचालन दक्षता में सुधार के लिए 21 विषयों पर काम कर रही भारतीय रेल

कोविड-19 लॉकडाउन के बाद रेल परिचालन, अनुरक्षण, निर्माण और अन्य संबंधित गतिविधियों के लिए योजना तैयार करने हेतु बनी समिति का नोडल अधिकारी महाप्रबंधक, उत्तर मध्य रेलवे/उत्तर रेलवे राजीव चौधरी को बनाया गया है

Rajeev Choudhary, GM/NCR-NR

रेल मंत्रालय ने भारतीय रेल की परिचालन दक्षता में सुधार करने के लिए 21 विषयों की पहचान की है। इस संबंध में प्रत्येक विषय के लिए एक नोडल अधिकारी और रेलवे बोर्ड के एक समन्वय अधिकारी सहित विभाग प्रमुखों, कार्यकारी निदेशकों, महाप्रबंधकों सहित वरीष्ठ अधिकारियों की समितियों का गठन किया गया है।

ये समितियां लॉकडाउन अवधि के दौरान विभिन्न डिजिटल प्लेटफार्मों का उपयोग करके बैठक, चर्चा आदि के माध्यम से विचार-विमर्श करेंगी और समन्वय अधिकारी के माध्यम से अपनी रिपोर्ट रेल मंत्रालय को प्रस्तुत करेंगी। राष्ट्रीय ट्रांसपोर्टर की परिचालन दक्षता में सुधार के लिए भारतीय रेल द्वारा पहचाने गए विषय, जिनकी विभिन्न समितियों द्वारा समीक्षा की जाएगी, निम्नवत हैं:

  नई दिल्ली-हावड़ा, नई दिल्ली-चेन्नई, नई दिल्ली- मुंबई, हावड़ा- मुंबई और चेन्नई-हावड़ा खंडों पर  ट्रेनों का ज़ीरो बेस्ड समय सारणीकरण।

•  भारतीय रेलवे के केंद्रीय प्रशिक्षण संस्थानों द्वारा मैनुअलों की समीक्षा और अद्यतीकरण।

•  सेक्शनों और टर्मिनलों पर कंजेशन को कम करने के लिए टाइमलाईन और रोड मैप के साथ महत्वपूर्ण कार्यों की पहचान करना।

  सेक्शन और लूप लाइनों में गति बढ़ाने के लिए वैधानिक सीआरएस निरीक्षण के लिए आवश्यक विभिन्न दस्तावेजों की समीक्षा और प्रोसेसिंग।

•  रेल संचालन और अनुरक्षण में बचत करने और दक्षता लाने के लिए सामग्रियों की खपत की समीक्षा।

•  फिजिकल फ़ाइल मूवमेंट से बचने और साथ ही कार्य कुशलता लाने के लिए भारतीय रेल की सभी इकाइयों में ई-ऑफिस का कार्यान्वयन ।

•  लोकोमोटिव, कोच, वैगन्, सिग्नलिंग गियर आदि जैसे विभिन्न परिसंपत्तियों के अनुरक्षण अवधि  की समीक्षा और दुनिया भर के सर्वोत्तम  मापदंडों के साथ तुलना।

•  तकनीकी प्रगति के दृष्टिगत  विभिन्न रेल परिसंपत्तियों के कोडल लाइफ़ और रिप्लेसमेंट मानकों की समीक्षा।

•  दक्षता और पारदर्शिता में सुधार के लिए कॉन्ट्रैक्टों के तहत निष्पादित कार्यों के आंकलन के लिए ऑनलाइन मेज़रमेंट बुक की शुरुआत करना।

•  परिवहन के लिए नई वस्तुओं की पहचान करने और रेल के माध्यम से परिवहन में बढ़ोत्तरी के लिए व्यावसायिक अध्ययन।

•  अधिक से अधिक रेल प्रतिष्ठानों जैसे कारखानों, अस्पतालों, कोचिंग डिपो, पिटलाइन, लोडिंग पॉइंट, डिपो, स्टेशन, कार्यालयों, ट्रैक्शन सबस्टेशन, रिले रूम आदि को सीसीटीवी निगरानी के तहत लाना।

•  रेल की भूमि आदि के संबंध में रेलवे अधिनियम का अध्ययन और सुझाव।

•  डीएफसी परियोजना के पूरा होने के दृष्टिगत   वैगन, कोच और लोकोमोटिव आदि आवश्यकताओं की समीक्षा।

•  ट्रैक्शन और गैर-ट्रैक्शन ऊर्जा / ईंधन बिल में कमी लाने के उपायों संबंध में।

•  रेल के वविभिन्न रेलवे क्षेत्रों में डेटा एनालिटिक्स, आर्टीफीशियल इंटैलिजेंस जैसी तकनीक का उपयोग ।

•  व्यय कम करने और आय में सुधार करने के उपाय।

•  ऑन बोर्ड हाउसकीपिंग गतिविधि की व्यापक समीक्षा ।

•  कर्मचारियों की मल्टी स्किलिंग और नए क्षेत्र में री- स्किलिंग करना।

•  ट्रेन संचालन के लिए एंड ऑफ ट्रेन टेलीमिट्री और अन्य प्रौद्योगिकियों का प्रयोग ।

  •  मालगाड़ियों की गति को बढ़ाकर माल और यात्री गाड़ियों के बीच की गति के अंतर को कम करना।
  • कोविड -19 लॉकडाउन के बाद भारतीय रेल पर संचालन अनुरक्षण, निर्माण और विनिर्माण गतिविधियों के लिए की कार्य योजना – यह मद कोविड -19 लॉकडाउन के बाद भारतीय रेल के लिए सबसे महत्वपूर्ण है और इस पर विचार एवं कार्यान्वयन उत्तर मध्य रेलवे, पूर्व तटीय रेलवे, मध्य रेल, इंटीग्रेटेड कोच फैक्ट्री के महाप्रबंधकों की समिति द्वारा किया जा रहा है और उत्तर मध्य रेलवे तथा उत्तर रेलवे के महाप्रबंधक श्री राजीव चौधरी इस समिति के नोडल अधिकारी हैं।







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कोविद-19 महामारी के दौरान भारतीय रेल द्वारा माल परिवहन हेतु घोषित की कई प्रोत्साहन योजनाएं

कोविद-19 महामारी को ध्यान में रखते हुए, भारतीय रेल ने माल ग्राहकों को प्रोत्साहन देने की घोषणा की है। इन प्रोत्साहनों से देश के निर्यात को बढ़ावा मिलने से  अर्थव्यवस्था को सहायता  मिलेगी। इन प्रयासों से माल ग्राहकों को भौतिक रूप से शेड में जाने के स्थान पर इलेक्ट्रॉनिक रूप से सामानों के लिए अपनी मांगों को पंजीकृत करने की सुविधा मिल सकेगी और इस प्रकार यह अधिक सुविधाजनक, तेज और पारदर्शी प्रक्रिया बनेगी।

डेमरेजव्हार्फेज और अन्य  शुल्कों  से छूट

कोविड महामारी के मद्देनजर, रेलवे बोर्ड ने निर्णय लिया है कि माल / पार्सल यातायात में फोर्स मेज्यूर  के तहत डेमरेज, व्हार्फेज, स्टैकिंग, स्टैबलिंग चार्ज नहीं लगेंगे। इसी तरह कंटेनर ट्रैफिक के लिए भी डिटेंशन चार्ज  और ग्राउंड  यूसेज चार्ज भी नहीं लागू होगा। ये दिशानिर्देश 22.03.2020 से 03.05.2020 तक लागू हैं।

फ्रेट फारवर्डर्सआयरन एंड स्टीलआयरन ओर और नमक के ट्रैफिक के मामले में इलेक्ट्रॉनिक रजिस्ट्रेशन ऑफ डिमांड (e-RD) और इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन रेलवे रिसिप्ट  (eT-RR) सुविधा का विस्तार

मांग का इलेक्ट्रॉनिक पंजीकरण (ई-आरडी) ग्राहकों को भौतिक रूप से माल शेड जाने के बजाय इलेक्ट्रॉनिक रूप से माल की अपनी मांगों को पंजीकृत करने की सुविधा प्रदान करता है। यह सरल, सुविधाजनक, त्वरित और पारदर्शी है।

रेलवे रसीद (ईटी-आरआर) का इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन, पेपरलेस ट्रांजेक्शन सिस्टम से एक कदम आगे है, जिसमें रेलवे रसीद भी उत्पन्न की जाती है और एफओआईएस के माध्यम से ग्राहक को इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रेषित की जाती है, और यहां तक कि माल की डिलीवरी भी ईटी-आरआर के ई-सरेंडर के माध्यम से दी जाती है। इससे ग्राहक को मांग पंजीकरण, माल की डिलीवरी लेने के लिएऔर आरआर/चालान प्राप्त करने के लिए माल शेड जाने आवश्यकता समाप्त हो जाती है।

रेलवे रसीद (आरआर) के बिना माल प्राप्त करना

जहां तक संभव हो, ग्राहकों  को ईटी-आरआर का विकल्प चुनने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि माल की डिलीवरी  लेने के लिए ओरिजिनल पेपर आरआर को गंतव्य बिंदुओं तक नहीं ले जाना पड़े। हालांकि कागज आरआर के मामले में भी, कंसाइनर (पार्टी भेजने वाली पार्टी) मूल स्टेशन पर नाम, पदनाम, आधार, पैन, जीएसटीआईएन जैसे कंसाइनर/रिसीवर का विवरण प्रदान करेगा जिसे वाणिज्यि कंट्रोल के माध्यम से गंतव्य तक पहुंचाया जाएगा। टीएमएस में इन विवरणों के सत्यापन के बाद डिलीवरी दी जाएगी और इसके लिए इंडेमिनिटी नोट जमा करना, जिसमें यह कहा गया होगा कि कोई भी दावा उनकी जिम्मेदारी होगी और आरआर की स्कैन/फोटोकॉपी होगी। ये दिशानिर्देश 03.05.2020 तक मान्य हैं।

कंटेनर यातायात को प्रोत्साहित करने के लिए नीतिगत उपाय

क.  खाली कंटेनरों और खाली फ्लैट की आवाजाही के लिए हॉलेज चार्जों को लागू ना करना:- कोविड-19  के कारण लॉकडाउन के मद्देनजर, रेलवे बोर्ड ने निर्णय लिया है कि 24.03.2020 से 30.04.2020 तक खाली कंटेनरों और खाली फ्लैट वैगनों की आवाजाही के लिए कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा। इससे न केवल भार्तीय रेल बल्कि निर्यात में वृद्धि से  अर्थव्यवस्था को बढ़ावा भी देने की उम्मीद है।

ख. कंटेनर ट्रैफिक की सहायता के लिए चार्ज में हब और स्पोक प्रणाली के तहत छूट:- कंटेनरों को रेलवे टेलीस्कोपिक दर का लाभ देता है, जिसमें बीच में एक ब्रेक / ट्रांजिट प्वाइंट के साथ ट्रैफिक प्रारंभिक स्थान से गंतव्य तक पहुंचाया जाता है। इसे हब एंड स्पोक सिस्टम कहा जाता है। मौजूदा दिशा-निर्देशों के तहत, पारगमन बिंदु के बीच का ब्रेक पांच दिनों तक सीमित है। कोरोना वायरस के प्रभाव के फलस्वरूप आईसीडी पर कार्गो की निकासी में देरी को ध्यान में रखते हुए रेलवे बोर्ड ने दिनांक 16.04.2020 से 30.05.2020 तक टेलीस्कोपिक लाभ प्राप्त करने के लिए सीमा को पांच दिनों से बढ़ा कर पंद्रह दिनों तक करने का निर्णय लिया है।

माल परिवहन के लिए छूट

रेलवे के पास ऐसे ग्राहकों के लिए ऐसे परिवहन उत्पाद / योजनाएँ हैं जो मानक लंबाई की रेक, दो आरंभिक प्वाइंट से प्रारंभ होने वाली रेक, दो गंतव्यों वाली रेक आदि की बुकिंग करना चाहते हैं।

ऑपरेटिंग ऑप्टिमाइजेशन की दृष्टि से दूरी प्रतिबंध आदि के साथ ये सभी छूट मालग्राहकों के लिए उपलब्ध है। कोविड लॉकडाउन के दौरान निम्नलिखित सुविधाएं प्रदान की गई हैं :-

क. मिनी रेक के लिए दूरी प्रतिबंध 600 किमी था, जिसे इंट्रा ज़ोनल ट्रैफ़िक के लिए 1000 किलोमीटर तक बढ़ाया गया था। अब इंटर जोनल और इंट्रा जोनल ट्रैफिक दोनों के लिए एक समान 1500 किलोमीटर की अनुमति दे दी गई है।

ख. इसी तरह, दो प्वाइंटों से प्रारंभ होने वाले रेकों के लिए एक दूरी का प्रतिबंध है जिसके तहत लीन सीज़न में दो लोडिंग पॉइंट पर 200 किमी से अधिक और पीक सीज़न 400 किमी से अधिक दूरी नही होनी चाहिए। यह व्यवस्था रेक के इष्टतम उपयोग सुनिश्चित करने के लिए है। पर अभी बिना किसी सीज़न के बंधन के, 500 किमी तक के लोडिंग पॉइंट के  दूरी प्रतिबंध की छूट दी गई है।

ग. इसके अलावा, ट्रेन लोड के लाभ के लिए निर्धारित संख्या में वैगनों को लोड किया जाना आवश्यक है अन्यथा यदि लोडेड वैगनों की संख्या इस संख्या से कम है तो बुकिंग वैगन-लोड दरों में की जाती हैं, जो थोड़ी अधिक होती हैं।

इस प्रावधान में भी बीसीएनएचएल वैगनों के संबंध में छूट दी गई है, ये एक प्रकार के कवर्ड वैगन हैं जिनको मुख्य रूप से बैग्ड कन्साइनमेंट जैसे खाद्यान्न, कृषि उपज अर्थात प्याज आदि के लिए उपयोग किया  जाता  हैं। आवश्यक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के दृष्टिगत उनके लदान को प्रोत्साहित करने के लिए इन में अब ट्रेन लोड के लाभ के लिए पहले की न्यूनतम संख्या 57 के स्थान पर अब 42 वैगनों को लोड किए जाने की छूट दी गई है।

पैरा 5 में ये सभी छूट 30.09.2020 तक मान्य हैं।








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भारतीय रेल में अराजकता का माहौल – RailSamachar

रेलवे बोर्ड के आदेशों में विसंगति, अधिकारियों की मनमानी, आपदा के समय भी निहितार्थी निर्णय, पीएम और पीएमओ के दिशा-निर्देशों की अनदेखी, रेलकर्मियों में व्याप्त हो रहा भारी असंतोष

सुरेश त्रिपाठी

जाहिलियत की अगर हद देखनी हो, तो रेलवे बोर्ड के अफसरों का यह कारनामा देखें। ‘रेल समाचार’ ने जो बात देश के हर कोने से फीडबैक लेने के बाद से कही थी वह सच साबित हो रही है, लेकिन दुःख इस बात का है कि अभी भी रेलवे बोर्ड में ऊपर बैठे अफसरों पर इसका कोई असर नहीं दिखाई दे रहा है।

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रेल राजस्व की तो धज्जियां उड़ाई ही जा रही हैं, बल्कि रेलवे बोर्ड के तुगलकी फरमान के चक्कर में सैकड़ों पार्सल स्टाफ, ड्राइवर, गार्ड, परिचालन से संबंधित सभी विभागों के कर्मचारियों की जान खतरे में है। एक तरह से इसे सीधे प्रधानमंत्री के आदेश की अवहेलना के तौर पर देखा जा सकता है, जिन्होंने बार-बार देश के नागरिकों से अनुरोध करते हुए कहा है कि जहां हैं, वहीं रहें, अपने घर में रहें और सुरक्षित रहें!

तथापि रेलवे में प्रधानमंत्री के सतत आग्रह की लगातार अनदेखी कर अवहेलना की जा रही है। रेलवे बोर्ड के आदेशों, दिशा-निर्देशों में कोई एकरूपता नहीं है। पहले तो रेलवे बोर्ड ने रास्तों में जहां-तहां फंसे रेलकर्मियों को तीन-चार डिब्बों की स्पेशल ट्रेन चलाकर उनके गृह-गंतव्य तक पहुंचाने के कई जोनल रेलों के मुख्य परिचालन प्रबंधकों के अनुरोध को ठुकरा दिया।

इससे सैकड़ों रेलकर्मी – ओबीएचएस, कोच अटेंडेंट, एसी मैकेनिक और रनिंग स्टाफ – जहां-तहां फंसे रहे तथा उन्हें उनके होम स्टेशन पहुंचाए जाने की गुहार लगाते रहे, मगर रेलवे बोर्ड के संबंधित अधिकारियों के कानों में जूं तक नहीं रेंगी और फिर खाली रेक दौड़ाने की अनुमति दे दी, जिससे कि किसी अन्य रेलवे को किसी दूसरी रेलवे के रेक का अनुरक्षण न करना पड़े। रेलवे बोर्ड का यह एक बिना सोचा-समझा और अत्यंत मूर्खतापूर्ण निर्णय था।

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जहां लॉकडाउन के अभी तीन-चार दिन ही बीते थे और देश भर में कोरोनावायरस के मामले लगातार बढ़ते जा रहे थे, जिन पर अभी भी नियंत्रण होने या कमी आने का कोई संकेत नहीं है, तभी रेलवे बोर्ड ने पार्सल स्पेशल ट्रेनें चलाने का एक और तुगलकी फरमान जारी कर दिया।

रेलवे बोर्ड ने यह फरमान जारी करने से पहले किसी जोन के महाप्रबंधक (जीएम) अथवा प्रमुख मुख्य परिचालन प्रबंधक (पीसीओएम) से न तो कोई चर्चा की और न ही उन्हें विश्वास में लिया। यही नहीं, रेलवे को पार्सल ट्रैफिक मुहैया कराने वाले किसी भी स्टेक होल्डर से भी कोई बात नहीं की गई और सीधे पार्सल स्पेशल ट्रेनें चलाने का फरमान जारी कर दिया गया। जिसका नतीजा सामने है कि दासियों लाख की परिचालन लागत की बनिस्बत रेलवे को इन पार्सल स्पेशल ट्रेनों के लिए कुछ हजार का पार्सल सामान पहुंचाने को मिला है।

उदाहरण के तौर पर रेलवे बोर्ड के दबाब में पश्चिम मध्य रेलवे ने रीवा से बीना के लिए चलाई गई पार्सल स्पेशल ट्रेन से इन्होंने कमाई है मात्र 556 रुपए! प्राप्त जानकारी के अनुसार पश्चिम मध्य रेलवे ने ऐसी पांच पार्सल स्पेशल ट्रेनें चलाई हैं, जिनकी कुल परिचालन लागत के बराबर तो क्या उसे एक चौथाई पार्सल कीमत भी नहीं मिली है। यही हाल अन्य जोनल रेलों से चलाई जा रही पार्सल स्पेशल ट्रेनों का भी है।

यशवंतपुर (बंगलोर) से हावड़ा के लिए जो ट्रेन चलाई गई है, उसमें जो सामान था, वह शायद एक छोटी किराने की दूकान के लिए भी शर्म की बात होती। इससे आमदनी रेल की होती है मात्र 55 हजार रुपए। जबकि डीआरएम, बंगलोर ने इस मौके पर क्या गर्वित संदेश दिया, वह भी यहां देख लें। कहा तो यह भी जा रहा है कि लॉकडाउन से पहले जो पार्सल बुक पड़ा था, वह इन कथित पार्सल स्पेशल ट्रेनों में “आवश्यक वस्तुओं” के नाम पर भरकर भेजा जा रहा है। वास्तव में इसी के लिए कुछ पार्टियों द्वारा सीआरबी को पटाया गया है।

मंडल रेल प्रबंधक, बंगलोर द्वारा यशवंतपुर-हावड़ा पार्सल स्पेशल शुरू करने के अवसर पर रेलवे बोर्ड को भेजा गया संदेश

Dear Sirs, First ever Timetabled Parcel Express of SWR started on its maiden historical journey from YPR to HWH today. This first Timetabled Parcel Express is consisting of 5 VPs carrying about 11000 kgs essential goods. Enroute loading is expected from few more stations. This first ever Timetabled Parcel Express (YPR-HWH-YPR) started from YPR at RT. 100% original punctuality. A new chapter for IR during the tough times. Regards DRM SBC

मजे की बात यह है कि लोगों की आंख में धूल झोंकने के लिए मेडिसिन को भी लोडिंग समरी में दिखया जाता है, जिसकी एवज में रेलवे को मात्र 100 रुपए की आमदनी हुई। अब सोचिये कि यह कितनी बड़ी आमदनी हुई है और यह कितना बड़ा कंसाइनमेंट था दवा का? (और वह दवा क्या डेस्टिनेशन स्टेशन वाले शहर में उपलब्ध नहीं थी और वह दवा भी एसेंसियल नेचर की थी क्या?)

इसी तरह चेन्नई से दिल्ली की पार्सल स्पेशल ट्रेन से रेलवे को मात्र 12/13 हजार रुपए की ही कमाई हुई। पार्सल स्टाफ के रेलकर्मियों द्वारा भी यह सवाल उठाया जा रहा है कि चेन्नई की बीज लोड करने वाली पार्टी पर आखिर रेलवे इतनी मेहरबान क्यों है? जबकि अभी के माहौल में यह बीज एसेंसियल कमोडिटीज की श्रेणी में तो कतई नहीं आता है!

इनमें से किसी भी पार्सल स्पेशल ट्रेन में एसेंसियल कमोडिटीज नहीं भेजी जा रही हैं पर उनके नाम पर दलाल कुछ 100/200 रुपए अपने पॉकेट से खर्च करके दवा के कुछ पैकेट रख दे रहे हैं जिससे रेलवे बोर्ड में बैठे उनके आकाओं को कहने को रहे कि हम दवा जैसे अत्यंत जरूरी माल की ढुलाई कर राष्ट्र की इस सबसे जरूरी मुहिम में अपना अमूल्य योगदान दिए हैं और इस तरह हम लोग इस कृत्य के लिए “कीर्ति चक्र” के पात्र हैं, लेकिन सिविलियंस को यह विरले ही मिल सकता है, अतः हम “पद्मविभूषण” से ही संतोष कर लेंगे!

जी यह मजाक नहीं है। वस्तुतः यह रेलवे में ऊपर बैठे लोगों के मन की बात है। ये उनकी दिली ख्वाहिश भी है।शायद सरकार में बैठे ऐसे निर्द्वंद, निरंकुश, अगंभीर, असंवेदनशील, गैरजिम्मेदार और नाकाबिल लोग इसी तरह की इच्छा अपने मन में पालते रहते हैं और अधिकार के साथ थोड़ा सा भी मौका मिलने पर इसी तरह के तुगलकी फरमान जारी करते हैं।

रेलवे बोर्ड में बैठे इन कथित बड़े लोगों ने फील्ड से मिल रहे नेगेटिव फीड बैक के बावजूद और बिना राज्य सरकार या लोकल एडमिनिस्ट्रेशन के आग्रह/निर्देश अथवा अनुरोध के एसेंसियल कमोडिटीज के नाम पर बड़ा खेल शुरू कर दिया।

10-15 लाख खर्च कर 500 और 50000 हजार का माल ढ़ोने का ढोंग कर रेलवे बोर्ड में बैठे इन कथित मूढ़ बड़े अफसरों ने पूरे देश में अपने सैकड़ों कर्मचारियों को खतरे में डाल दिया है। एक नमूना देखें – रेलवे बोर्ड के दबाव के चलते पूर्व रेलवे, हावड़ा मंडल के सीनियर डीसीएम ने पार्सल कर्मचारियों की ड्यूटी लिस्ट जारी कर दी, मगर उनको उनके घरों से लाने की कोई व्यवस्था नहीं की।

यूनियन द्वारा इस संबंध में पुलिस/कर्फ्यू पास के बिना स्टाफ के ड्यूटी पर न आने की बात कहने पर सीनियर डीसीएम का जवाब था कि सभी के लिए पास कंट्रोल में बनाकर रख दिए गए हैं, वहां से ले लें। इसे मूर्खतापूर्ण न कहा जाए, तो क्या कहा जाए, कि कंट्रोल रूम तक कर्मचारी बिना पास के पुलिस से बचकर पहुंचेगा कैसे?

इस संबंध में चीफ पार्सल एंड लगेज इंस्पेक्टर/हावड़ा और यूनियन पदाधिकारी के बीच हुआ वार्तालाप –

Sir, It is an ordinary general List or roster valid for tomorrow. No any roster become valid without seal and signature. Second have you issue permission letter for duty on Emergency for traveling in this lock down period call by our PM. Pl do needful for save our employees, nation as well as our staff. We are ready to perform our duty but after taking necessary measures.

List has issued by CPLI/HWH D K Giri on 01.04.2020 for joining duty. Then Union has requested to him as above and said, “otherwise Rail Mazdoor Union, Eastern Zone and National Front of Indian Trade Union, West Bengal will creat ruckus”.

CPLI replied as under…

SrDCM will issue permission letter to staffs on emergency if any staffs demands.

Remark passed by SrDCM/HWH as under

“Pass is lying at commercial control those who are assigned emergency duty they may come and collect”.

उपरोक्त स्थिति लगभग सभी जोनों/मंडलों की है। ऐसे में यह कहा जा रहा है कि रेलवे बोर्ड के अफसरों ने कुछ पीएमओ की नजर में आने की चाहत और कुछ अपना अपना स्वार्थ/एजेंडा साधने के चक्कर में जाने-अनजाने कोरोना वायरस के फैलाव को राष्ट्रीय स्तर पर रेलवे को कैरियर बनाने का माध्यम सम्पादित कर दिया है।

रेल कर्मचारियों के बीच दबे स्वरों में दक्षिण रेलवे से उतर रेलवे, पूर्वोत्तर रेलवे, उत्तर मध्य रेलवे, उत्तर पश्चिम रेलवे, पूर्व तट रेलवे एवं दक्षिण पश्चिम रेलवे और पश्चिम रेलवे, मुंबई से लेकर पूर्व रेलवे एवं दक्षिण पूर्व रेलवे, कोलकोता तक इसको लेकर रेलकर्मियों में आक्रोश बढ़ता चला जा रहा है और दबे स्वर में उनके द्वारा इसके माध्यम से रेलवे बोर्ड के अफसरों की कुछ और मंशा/धंधे की बात भी की जा रही है।

रेल कर्मचारियों का यह कहना है कि आज जब व्यापारी से लेकर लेबर तक डर के कारण और प्रधानमंत्री के निर्देश के अनुपालन में घरों में दुबके बैठा है, न माल है और न कहीं से उस तरह की एसेंसियल कमोडिटीज के लिए रेलवे से डिमांड मिल रही है, फिर भी खुद ये बड़े अधिकारी लोग आदेश निकालकर अपने-अपने आलीशान घरों में बैठ नीचे के तबके के लोगों को परेशान होते देखकर अपना मनोरंजन कर रहे हैं।

कुछ रेलकर्मियों का तो यह भी कहना था कि इन्हीं कुछ बड़े अधिकारियों में से कुछ ने पार्टीयों से एहसान की एवज में सोमरस की अबाध आपूर्ति भी सुनिश्चित कर चुके हैं और अपने आलीशान बंगलों में बैठकर मौज कर रहे हैं, तो बिना न्यायोचित ट्रैफिक और काम के हम स्टाफ को स्टेशनों और ट्रेनों में क्यों भेजा जा रहा है?

रेलवे में यह स्थिति सिर्फ कमर्शियल स्टाफ की ही नहीं है, बल्कि इससे भी बुरी स्थिति में ट्रैक मेंटेनर्स, सिग्नलिंग स्टाफ को काम करना पड़ रहा है। जहां सोशल डिस्टेंसिंग का कोई स्कोप नहीं है और न ही इसका पालन सुनिश्चित किया जा रहा है। इंजीनियरिंग एवं सिग्नल अधिकारियों को लगता है, यही सबसे मुफीद मौका है कि खाली पड़े ट्रैक की हर संभव मेंटीनेंस को सुनिश्चित कर लिया जाए।

Track Maintainers with track machine working at Farah station, Agra dIvision, North Central Railway

अहमदाबाद मंडल, पश्चिम रेलवे के कई सिग्नलिंग स्टाफ और आईआरएसटीएमयू के पदाधिकारियों ने जब फील्ड में स्टाफ के साथ की जा रही अधिकारियों की मनमानी की तस्वीरें ट्विटर सहित अन्य सोशल मीडिया में डाल दीं और उसे पीएमओ सहित केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय, श्रम मंत्रालय, कार्मिक मंत्रालय एवं मानवाधिकार आयोग को भी टैग कर दिया, तो उन्हें जोन से लेकर मंडल मुख्यालय तक से धमकी दी गई कि यदि उन्होंने यह सब करना बंद नहीं किया तो उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे और ट्विटर पर जवाब में सब कुछ ठीक होने की बात कही गई। देखें एक बानगी-

https://twitter.com/irstmu/status/1245236009559674883?s=20

“All staff of maintenance which are not following the instructions and maintaining without mask and clicking and sending pictures now and not doing maintenance by giving one or other irrelevant reasons, should be identified and bring to my notice”, this threatening message given by the DSTE/W/ADI.

एक और ऐसा ही ढ़की-छिपी धमकी का संदेश देखें-

उनका कहना है कि इससे तो सिर्फ हम ही नहीं, हमारा परिवार भी खतरे में है। अगर काम हो, तो रेल कर्मचारी जान की परवाह किए बिना काम करने को तैयार है और करता भी रहा है, लेकिन कुछ बड़े अधिकारियों के छिपे एजेंडे के चलते वह अपने और अपने परिवार की कुर्बानी नहीं दे सकते।

लगभग सभी जोनों की स्थिति एक जैसी ही है, जहां कुछ ब्रांच अफसरों और कुछ मुख्यालय अधिकारियों की मनमानी चरम पर है। किसी भी जोन या डिवीजन का एक भी रेल कर्मचारी ऐसा नहीं मिला जिसने यह कहा हो कि प्रशासन उनके साथ वाजिब सहयोग कर रहा है। अधिकांश रेलकर्मियों और यूनियन पदाधिकारियों का कहना था कि प्रशासन ने पर्याप्त मात्रा में फेस मास्क और सेनिटाइजर उपलब्ध नहीं कराया, न सोशल डिस्टेंसिंग का कोई ख्याल रखा जा रहा है, जबकि रेलवे की ग्राउंड वर्किंग सामुहिक रूप से होती है। उनका कहना था कि सिर्फ कहने के लिए रेल बंद है, क्योंकि रेलवे में पीएम के लॉकडाउन सहित अन्य सावधानियों का कोई औचित्य नहीं रह गया है। ऐसे में रेलवे कोरोना की प्रमुख वाहक भी बन रही है।

अतः उनका कहना है कि इन कुछ बड़े रेल अधिकारियों के इस खेल के पीछे छुपे एजेंडे की बाकायदा न्यायिक या सीबीआई जांच होनी चाहिए। इसके पीछे की मंशा और नफा-नुकसान की जांच होने पर प्रधानमंत्री मोदी जी को बखूबी पता चलेगा कि कितने काबिल लोगों (विषधर धुंधकारियों) के भरोसे वे देश को और रेलवे को बदलना चाहते हैं। यूनियन पदाधिकारियों की इस बात से कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने भी अपनी सहमति जताई है।

इस वैश्विक आपदा की स्थिति में भी कई अधिकारी, ठेकेदार और व्यापारी बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं। पीएमओ को बाकायदा इस आपदा के सामान्य होने के बाद से इस तरह के सभी आदेशों, भुगतान और अप्रूवल्स की जांच करानी चाहिए, जिससे भ्रष्ट लोगों के गठबंधन और उनके द्वारा किए गए भ्रष्टाचार का बड़ी आसानी से पता चल जाएगा।

इसके बाद भी रेलवे बेचैन है पार्सल ढ़ोने को..

अब कई जगह पर रेलवे के पार्सल के नोटिफिकेशन को देखकर लोगों ने कर्मचारी और अधिकारियों को परेशान करना शुरु कर दिया है। कोई एक किलो चूर्ण अपने किसी रिलेटिव को नासिक भेजना चाहता है, तो कोई 5 किलो हरी सब्जी। कोई फेसमास्क के नाम पर एक बोरा माल भेजना चाहता है, तो कोई पटना सैनिटाइजर के नाम पर स्पिरिट या बीयर। सबकी धमकी सीधे मंत्री या सीआरबी से शिकायत करने की होती है। इससे कई कर्मचारी और अधिकारी बुरी तरह परेशान हो गए हैं और साथ ही उनके परिवार वाले भी असमय आने वाली फोन कॉल्स से भी दुःखी हो चुके हैं।

उत्तर रेलवे द्वारा ट्रेन नं.00324/23 और 00326/25 नई दिल्ली-हावड़ा, ट्रेन नं. 00901/02 बांद्रा टर्मिनस- लुधियाना तथा ट्रेन नं.00646/47 चेन्नई सेंट्रल – नई दिल्ली के तौर पर चार पार्सल स्पेशल ट्रेन चलाई जा रही हैं। इसी प्रकार सभी जोनल रेलों ने रेलवे बोर्ड के दबाव में पार्सल स्पेशल ट्रेनों को चलाने का शेड्यूल बनाया है। अब देखने वाली बात यह है कि इन तथाकथित पार्सल स्पेशल्स में वास्तव में क्या भरकर भेजा जा रहा है!

कायदे से फेस मास्क कोई अधिकृत कंपनी ही बना सकती है और बेच सकती है। इसका अपना एक मानक तय होता है। लेकिन अब इसकी किल्लत के नाम पर सारे दर्जी अपना बाकी काम छोड़कर फेस मास्क बना रहे हैं। पता चला है कि अब रेलवे की उत्पादन इकाईयों में भी फेस मास्क और मेडिकल उपकरण बनाए जाएंगे। इन अमानक फेस मास्क का उपयोग भी काफी नुकसानदेह साबित हो सकता है। वह भी तब जब यह कहा जा रहा है कि कोरोना वायरस की रोकथाम में एन-95 मास्क भी बहुत कारगर नहीं है। तथापि यह समझना मुश्किल हो रहा है कि यात्री-माल परिवहन के मुख्य कार्य से भटका कर रेलवे को आखिर किस दिशा में दौड़ाने का प्रयास किया जा रहा है?

देखें अधिकारियों की मनमानी और कर्मचारियों को अनावश्यक परेशान किए जाने की एक और बानगी, जिसमें रेलवे की तिजोरी में पड़े मात्र 213 रुपए लॉकडाउन के दौरान बैंक में जमा करने पर जोर दिया गया है, जिसकी ट्रांसपोर्टेशन लागत ही कम से कम इसकी दस गुना होगी- 

“All sectional TI (c)s are requested to advise the station concerned to deposit the entire station earnings lying at stations or goods shed to nearest SBI branches under Rail Shakti account within 31st Mar’2020 and send the all acknowledged TR note along with CR notes to DC/HWH through whattsap. Transportation cost towards remittance of earnings to nearest SBI branches will be reimbursed and a format for stations to be submitted also to DC/HWH. This is as per SrDFM/HWH considering the present situstion. Please treat the matter most urgent.

“An amount of Rs. 213 (Rs Two Hundred  Thirteen only) has been lying at strong Room Since 25th March after delivery of emergency items to ID Hospital, Beliaghat. Now you are requested to issue further instruction for disposal the same”.

“Please deposit the cash by tomorrow anyhow”.

“It’s necessary to manage the situation but administration will have also take necessary action towards staff such as permission letter for Emergency duty in this Lock down period and others”. replied by the commercial supervisor and said his residence is about 5km far from HWH Station. No any convenience is available, also required police verification. kindly arrange a suitable way for the same, I am ready for my duty.

“You may talk TIC HWH-1”.

These above conversation is between the commercial supervisor with Howrah Parcel Depot Incharge and ACM. They are ordering forcibly to deposit Rs. 213/- only lying in iron safe provided at Howrah Parcel Strong Room without any arrangements of permission order for Emergency duty or any convenience.

https://twitter.com/irstmu/status/1243477077849853953?s=20

मनमानी की एक और बानगी: लॉकडाउन के समय जब सब अपने घरों में कैद रहने को मजबूर हैं और कोई अपने ऑफिस नहीं जा पा रहा है तब माडर्न कोच फैक्ट्री (एमसीएफ) रायबरेली के एक डिप्टी सीएमई ने आदेश जारी करके वहां काम कर रहे सभी ठेकेदारों को शुक्रवार, 5 अप्रैल तक अपने लेबर्स का संपूर्ण हिसाब-किताब श्रमिक पोर्टल पर अपलोड करने को कहा है। यह भी कि ऐसा न करने पर उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। जबकि ठेकेदारों का कहना है कि उनका सारा रिकॉर्ड उनके ऑफिस के कंप्यूटरों में है, पुलिस अनुमति नहीं दे रही है, रेलवे से उन्हें भुगतान नहीं मिल रहा है, ऐसे में उन पर चौतरफा मार पड़ रही है और कोई उनकी सुनने वाला नहीं है।

उपरोक्त तमाम तथ्यों से जाहिर है कि वर्तमान स्थिति में पूरी भारतीय रेल में अराजकता का माहौल बन गया है। बोर्ड द्वारा लगातार जारी किए जा रहे विसंगतिपूर्ण आदेशों को देख-देखकर जोनल अधिकारी रेलवे बोर्ड के प्रति स्पष्टत: अपशब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। परंतु उनकी समस्या यह है कि लगभग रोजाना हो रही वीडियो कांफ्रेंसिंग के बावजूद वे अपनी बात सीधे रेलमंत्री से नहीं कह पा रहे हैं। हां, यदि रेलमंत्री, सीआरबी सहित रेलवे बोर्ड के सभी मेंबर्स को बाहर रखकर सीधे जोनल जीएम और पीसीओएम के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग करें, तो उन्हें न सिर्फ जमीनी हकीकत का पता चलेगा, बल्कि रेलवे बोर्ड के तथाकथित काबिल मेंबर्स और रेल परिचालन से सर्वथा अनभिज्ञ सीआरबी की भी पोल खुल जाएगी।








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