रास्ते में ऑक्सीजन खत्म होने से भायखला रेलवे अस्पताल पहूंचकर जूनियर क्रू कंट्रोलर की मौत

जूनियर सीसी की असामयिक मौत के लिए सीधे जिम्मेदार हैं कल्याण रेलवे अस्पताल के कार्यकारी सीएमएस और एसीएमएस-कोविड नोडल ऑफ़िसर

मुंबई : कल्याण रेलवे अस्पताल और अराजकता-मनमानी का चोली-दामन का संबंध रहा है, इस बात से कल्याण और आसपास रहने वाले लगभग दस हजार रेलकर्मी बखूबी वाकिफ हैं। इसी अराजकता और मनमानी के चलते एंबुलेंस में बिना जांचे-परखे रखे गए ऑक्सीजन सिलेंडर के रास्ते में खत्म हो जाने से एक जूनियर क्रू-कंट्रोलर की असमय मौत हो गई और कहीं कोई हलचल नहीं हुई। यही वजह है कि कल्याण रेलवे अस्पताल के कुछ डॉक्टरों की मनमानी और सनक लगातार बढ़ती जा रही है। क्रू-कंट्रोलर की इस असामयिक मौत पर सभी रेलकर्मियों में भारी आक्रोश है। मान्यताप्राप्त ज़ोनल रेल संगठन एनआरएमयू, सीआरएमएस, मध्य रेलवे एससी-एसटी रेलकर्मचारी संगठन और मध्य रेलवे ओबीसी रेलकर्मचारी संगठन ने अपने बोर्ड लगाकर मेडिकल विभाग की इस अक्षम्य लापरवाही पर रेल प्रशासन से अपना विरोध प्रकट किया है।

वर्तमान में कल्याण रेलवे अस्पताल के सीएमएस और एसीएमएस का चार्ज संभाल रहे दोनों डॉक्टर महातुनकमिजाज न सिर्फ माने जाते हैं, बल्कि वह वास्तव में ऐसे हैं भी! यह कहना है तमाम रेलकर्मियों का। उनका कहना है कि कल्याण रेलवे अस्पताल की एसीएमएस एवं कोविड की नोडल ऑफिसर की सनक वर्तमान में सातवें आसमान पर है। सुबह से शाम तक अकारण भोंकते रहना, पेशेंट्स को, उनके परिवार वालों को, संकट की घड़ी में मरहम लगाने के बजाय सबके सामने जी-भरकर कोसना, बेइज्जत करने वाला उनका व्यवहार अस्पताल को बूचड़खाने में तब्दील कर रहा है।

रेलकर्मियों का कहना है कि इन डॉक्टर साहिबा का मानना है कि वह जो सोचती हैं, केवल वही सही होता है। वह जो चाहती हैं, वैसा ही हर डॉक्टर, अस्पताल कर्मी, यूनियन पदाधिकारी और अधिकारी भी वैसा ही सोचें, समझें और करें भी। अस्पताल में जब डॉक्टर महोदया चलती हैं, या ऐसा कहना चाहिए कि विचरण करती हैं, तो वहां भर्ती मरीजों अथवा दवा लेने आए रेलकर्मियों की आंखों के सामने फिल्मों में विलेन की एंट्री जैसे अनेकों दृश्य घूम जाते हैं। इनके चीखते-चिल्लाते रहने से अस्पताल की शांति तो भंग होती ही है, बल्कि मरीज और उनके रिश्तेदार तनावग्रस्त हो जाते हैं, पर रेलकर्मी या उनके पारिवारिक सदस्य होने के नाते वह कुछ कह नहीं पाते। इसी बात का यह अहंमन्य डॉक्टर साहिबा तो भरपूर फायदा उठाती ही हैं, बल्कि अस्पताल के अन्य डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ भी इसी बात का भरपूर दोहन करता है।

उनका कहना है कि आए दिन कल्याण रेलवे अस्पताल के मेडिकल स्टोर में अनेकों जरूरी दवाओं का अभाव रहता है। हार्ट जैसी गंभीर बीमारियों में भी अनेकों चालू कंपनियों की, हर बार बदल-बदलकर तथा अलग-अलग पोटेंसी की दवाएं देना यहां की विशेषता है। रेलकर्मियों के मरने-जीने की इनको कतई कोई परवाह नहीं होती। जबकि दबंग यूनियन पदाधिकारियों और अधिकारियों को न सिर्फ ब्रांडेड कंपनी की हर दवा लोकल परचेज (एलपी) करके मुहैया कराई जाती है, बल्कि उनके सामने भीगी बिल्ली बनकर उनकी चापलूसी भी होती है।

उन्होंने बताया कि असामाजिक तत्वों से अस्पताल की सुरक्षा के लिए प्राइवेट सिक्योरिटी लगाई गई है, परंतु उसका भरपूर उपयोग यहां मरीजों और उनके पारिवारिक सदस्यों तथा अस्पताल आने वाले अन्य रेलकर्मियों को बेइज्जत करने और उनमें खौफ फैलाने के लिए ज्यादा किया जा रहा है। रेलकर्मियों का आरोप है कि उद्दंड सिक्योरिटी वाले अहंमन्य एसीएमएस के इशारे पर अस्पताल आने वालों के साथ ऐसी अभद्रता करते हैं जैसे कि उन्हें अस्पताल आने वाला हर रेलकर्मी असामाजिक तत्व नजर आता है, उनका यह दुर्व्यवहार और उनके द्वारा की जाने वाली अनावश्यक पूछताछ तथा टोका-टाकी कई बार असहनीय हो जाती है।

उन्होंने कहा कि अब कुछ महीनों से कोविड नामक ऐसा अवसर मिल गया है कि उसके नाम पर अस्पताल में दूसरे सारे इलाज, ऑपरेशन तथा अन्य गतिविधियां बंद पड़ी हैं। यहां कई महीनों से ओटी बंद है। आंखों के ऑपरेशन के लिए रेलकर्मी भटक रहे हैं। मोतियाबिंद के कारण मेडिकल में अटके लोग चुपचाप बाहर से अपना पैसा खर्च कर ऑपरेशन करवा रहे हैं, तब यहां के डॉक्टर उनको फिट कर रहे हैं। पर किसी के दिमाग में यह नहीं आ रहा है कि कर्मचारी को अपने पैसे से बाहर ऑपरेशन न करवाना पड़े, इसका कोई उपाय निकाला जाए।

कर्मचारी कहते हैं कि यहां पागलों जैसा काम चल रहा है, जैसे कि यह कोई मेंटल हॉस्पिटल हो। वास्तविक बीमारी का आदमी इधर-उधर भटक रहा है। यदि कोई हिम्मत करके अस्पताल पहुंच भी गया, तो पहले दो-तीन दिन उसकी कोविड के नाम पर ऐसी दुर्गति होती है कि बिना कोविड के ही उसके प्राण हलक में आ जाते हैं। सस्पेक्टेड कोविड मानकर 12-15 घंटे कल्याण में, फिर पांच से आठ संक्रमित मरीजों के साथ एक ही एंबुलेंस द्वारा मुंबई सेंट्रल स्थित पश्चिम रेलवे के जगजीवन राम अस्पताल (जेआरएच) के लिए भेज दिया जाता है। जहां दो-तीन घंटे एंबुलेंस में ही मरीजों को बैठे रहना पड़ता है।

दो-तीन घंटे बाद उन्हें बताया जाता है कि जेआरएच में बेड उपलब्ध नहीं है, इसलिए अब उनको मध्य रेलवे के भायखला रेलवे अस्पताल भेजा जा रहा है। फिर काफी इंतजार के बाद जैसे-तैसे उनको वार्ड में भर्ती किया जाता है और तब कोविड टेस्ट होता है। दो दिन बाद कोविड की रिपोर्ट यदि नेगेटिव आती है, तब फिर उस कर्मचारी को कल्याण रेलवे अस्पताल भगा दिया जाता है। इस तरह तीन-चार दिन तक एक बीमार आदमी (कर्मचारी) की जानवरों से भी बुरी फजीहत कोविड के नाम पर ही होती रहती है। इससे मरीज उसकी वास्तविक बीमारी ही भूल जाता है। ऐसी में कसाई के यहां बंधे बकरे जैसी हालत के चलते कर्मचारी किसी तरह अपनी जान छुड़ाकर भाग खड़ा होता है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार कल्याण रेलवे अस्पताल के 44 नंबर वार्ड में कोविड पॉजिटिव के लिए 5 बेड रखे गए हैं। वहां कभी कोई सफाई कर्मी ही नहीं रहता। पेशेंट के पारिवारिक सदस्य भी उपस्थित नहीं रह सकते, क्योंकि एसीएमएस किसी कटखनी बिल्ली जैसी गुर्राती रहती हैं। ऐसे में वहां भर्ती मरीज की कितनी फजीहत होती होगी, इसका अंदाजा कोई भी लगा सकता है।

अस्पताल के 44 नंबर वार्ड तक पहुंचने का रास्ता कोविड पेशेंट, मेडिसिन काउंटर, सिक-फिट काउंटर तथा लैब से होकर गुजरता है। अस्पताल में अन्य पेशेंट के साथ कोविड पेशेंट आने के कारण अस्पतालकर्मी भी संक्रमित होते जा रहे हैं। परंतु अस्पताल की एसीएमएस उर्फ नोडल ऑफिसर की सनक के चलते इसका ठोस उपाय उपलब्ध होने के बाद भी नहीं किया जा रहा है।

जानकारों के अनुसार यदि फ्लू ओपीडी, इंस्टीट्यूट के बैडमिंटन हॉल में बना दी जाए तो पेशेंट्स को अस्पताल के बाहर सड़क पर खुले आसमान के नीचे धूप बारिश में नहीं खड़ा होना पड़ेगा बल्कि वह पूर्ववत सीधे अस्पताल में जा पाएंगे। फ्लू ग्रस्त कर्मचारी बैडमिंटन हॉल में आकर आराम से बैठ सकता है। डॉक्टर के देखने के बाद यदि शंका है तो वहीं पर संबंधित दवा देकर उसे सीएचआई ऑफिस की तरफ से पीछे बने दरवाजे से ऑडिटोरियम में भेजा जा सकता है। इसके लिए अस्पताल के दूसरे माले पर स्थित 28 बेड के क्वारंटाइन वार्ड को तत्काल बंदकर ऑडिटोरियम तथा सर्जिकल वार्ड को कोविड वार्ड बना देना चाहिए जिससे कोविड पेशंट अस्पताल में रहकर भी सभी से अलग रह सकेंगे तथा अन्यत्र संक्रमण फैलने से रोका जा सकेगा।

परंतु यह सीधा तरीका सीएमएस कल्याण के दिमाग में नहीं आ रहा है। जबकि नोडल ऑफिसर की मनमानी के चलते यह सारी परेशानी हो रही है तथा बेसिर-पैर के कार्यों में कोविड फंड का गलत इस्तेमाल और दुरुपयोग हो रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि चूंकि यह रेलवे अस्पताल है, और मरीज भी रेल कर्मचारी अथवा उनके पारिवारिक सदस्य ही होते हैं, इसके चलते यहां सब कुछ सहन किया जा रहा है। उनकी इस सहनशीलता के चलते ही यहां के कुछ सनकी डॉक्टरों का सनकीपन बढ़ता जा रहा है। इनको मंडल चिकित्सालय में रखना रेलकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।

शुक्रवार, 10 जुलाई को कल्याण अप यार्ड में कार्यरत रहे जूनियर क्रू कंट्रोलर ओमप्रकाश सिंह, कोविड संक्रमित रेलकर्मी, ऑक्सीजन की कमी के चलते रेलवे अस्पताल में एडमिट हुआ था। 11 जुलाई को उसका कोविड सैंपल लिया गया तथा 12 जुलाई को उसे पॉजिटिव पाया गया था। अब 12 जुलाई की सुबह 11 बजे रिपोर्ट आने से लेकर 13 जुलाई को दोपहर बाद करीब 3 बजे तक ऑक्सीजन की कमी के पेशेंट को क्यों प्रतीक्षा में रखा गया? उसको 12 जुलाई को सुबह 11 बजे रिपोर्ट मिलने के तुरंत बाद जेआरएच या भायखला अस्पताल क्यों नहीं भेजा गया? यह तो अस्पताल की सनकी नोडल अधिकारी ही बता सकती हैं। जबकि 12 जुलाई को 5 पेशेंट जेआरएच भेजे गए थे, जो कि उससे बहुत कम खतरे में थे। तथापि यदि उसे इतना ही खतरा महसूस हो रहा था तो रेलवे से संबद्ध कल्याण के किसी प्राइवेट अस्पताल में उसे क्यों नहीं रेफर किया गया?

बताते हैं कि 13 जुलाई को दोपहर बाद जब इस पेशेंट को ऑक्सीजन के साथ, एक ही एंबुलेंस में छह लोगों को ठूंसकर, इस ऑक्सीजन लगे मरीज को भी बैठाकर, (क्योंकि एंबुलेंस में छह लोगों के बैठने के बाद किसी मरीज के लेटने की जगह ही नहीं रह सकती) भायखला के लिए रवाना किया गया था। मुलुंड तक पहुंचते-पहुंचते यानि मात्र 35 मिनट बाद ही ऑक्सीजन खत्म हो गई, तब दूसरे सभी पेशेंट, जो खुद पॉजिटिव थे, घबराकर सिलेंडर हिलाकर ऑक्सीजन निकालने का प्रयास करते रहे, और एंबुलेंस चालक 100 से भी अधिक की स्पीड से गाड़ी भगाकर बहुत जोखिमपूर्ण ड्राइविंग करते हुए शाम 4 बजे भायखला अस्पताल पहुंचा था। तब तक पेशेंट की हालत बेहद नाजुक हो चुकी थी, और सभी उपायों के बावजूद शाम 5.15 बजे यह रेलकर्मी असमय काल कवलित हो गया।

यह न सिर्फ अत्यंत अमानवीय कृत्य है, बल्कि डॉक्टरी पेशे को भी बहुत ज़्यादा शर्मशार करने वाला है? ऑक्सीजन आधा घंटे में ही कैसे खत्म हो गई? ऐसा ऑक्सीजन सिलेंडर एंबुलेंस में रखा ही क्यों गया? क्या उक्त रेलकर्मी से कोई जातीय दुश्मनी थी? नोडल ऑफिसर की मनमर्जी, खौफ तथा उनके द्वारा की जाने वाली बेइज्जती के चलते अस्पताल के कर्मचारी भी किंकर्तव्यविमूढ़ होते जा रहे हैं। जो कर्मी जिंदगी-मौत से जूझ रहा था, उसको बिना लेटे अन्य 5 लोगों की भीड़ में ठूंसकर भेजना क्या सही निर्णय था? इसकी उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए, वरना ऐसे अमानवीय कृत्य और भी अधिक होने लगेंगे, और आए दिन रेलकर्मियों की जान ऐसे डॉक्टरों और अस्पताल कर्मियों की लापरवाही से जाती रहेगी।





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