इलेक्ट्रिक शेड में बदल रहा है झांसी डीजल शेड – RailSamachar

झांसी डीजल लोको शेड ने राष्ट्र की सेवा में दिए हैं 46 गौरवशाली वर्ष

प्रयागराज ब्यूरो: भारतीय रेल को विश्व की प्रमुख हरित रेल बनाने के मिशन में उत्तर मध्य रेलवे अपने पूरे परिक्षेत्र का विद्युतीकरण करने की ओर अग्रसर है। इसी परिप्रेक्ष्य में झांसी स्थित डीजल लोको शेड को इलेक्ट्रिक लोको शेड में परिवर्तित करने की परिकल्पना की गई है।

भारतीय रेल द्वारा विद्युतीकरण में वृद्धि के साथ, जितनी संख्या में विद्युत इंजनों का उत्पादन बढ़ाया जा रहा है, उतनी ही संख्या में डीजल इंजनों को सेवा से हटाया जा रहा है। यह स्वाभाविक रूप से डीजल लोको शेड को इलेक्ट्रिक शेड में बदलने की आवश्यकता पैदा हो रही है।

डीजल लोको शेड झांसी उत्तर मध्य रेलवे का एकमात्र प्रमुख डीजल लोको शेड है, जो मेल/एक्सप्रेस, यात्री, माल और शंटिंग सेवाओं की यातायात आवश्यकताओं को पूरा करता है। झांसी डीजल लोको शेड ने राष्ट्र की सेवा में 46 गौरवशाली वर्ष पूरे कर लिए हैं।

वर्तमान में यह शेड 28 डब्ल्यूएजी-7 इलेक्ट्रिक लोको के अलावा 74 एल्को लोको, 13 शंटिंग लोको और 32 एचएचपी लोको का रखरखाव करता है।

यहां एक 140 टन बीडी क्रेन, दुर्घटना राहत ट्रेन और झांसी में तैनात दुर्घटना राहत चिकित्सा वैन का अनुरक्षण भी किया जाता है। यह शेड रनिंग स्टाफ के लिए भी 100 प्रशिक्षुओं के लिए चार कक्षाओं और 80 बिस्तरों वाले छात्रावास के साथ एक कक्षा प्रशिक्षण प्रदान करता है।

डीजल से इलेक्ट्रिक में लोको शेड का रूपांतरण एक क्रमिक चरणबद्ध प्रक्रिया है, जिसकी शुरूआत पिछले साल जुलाई 2020 में पहले ही शुरू किया जा चुकी है। ओएचई परीक्षण सुविधा, परीक्षण शेड से ट्रिप शेड तक ओएचई बिछाने, पटरियों को ऊपर उठाने आदि जैसी अतिरिक्त सुविधाओं के प्रावधान के साथ तीन चरणों में रूपांतरण की योजना बनाई गई है।

परिकल्पना यह की गई है कि मार्च 2021 में 25 इलेक्ट्रिक इंजनों की तुलना में मार्च 2024 तक इस शेड की इलेक्ट्रिक लोको होल्डिंग क्षमता 100 तक बढ़ जाएगी। वर्तमान में डीजल इंजनों की होल्डिंग फ्रेट और कोचिंग सेवाओं के लिए क्रमशः 64 और 37 है, जो कि फ्रेट इंजनों के लिए घटकर 17 हो जाएगी। जबकि मार्च 2024 तक कोचिंग सेवाओं के लिए कोई डीजल लोकोमोटिव नहीं रहेगा। डीजल इंजन केवल शंटिंग के लिए और आपात स्थिति के लिए ही रहेंगे।

पीपीटी को एक वीडियो कांफ्रेंसिंग में प्रस्तुत करते हुए, उ.म.रे. के मुख्य मोटिव पावर इंजीनियर अनिल द्विवेदी ने बताया कि इस रूपांतरण अभ्यास की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह है कि लोको शेड के समग्र लेआउट में कोई बड़ा बदलाव नहीं हो रहा है और जनशक्ति का सर्वोत्तम उपयोग किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि शेड में अधिकांश कर्मचारी इलेक्ट्रिक और डीजल दोनों सेवाओं के लिए समान रहेंगे जिससे पूरी योजना में किफायत आएगी।

श्री द्विवेदी ने आगे बताया कि विद्युत इंजनों के अनुरक्षण हेतु पर्यवेक्षकों, टेक्नीशियनों एवं अन्य ग्रुप डी स्टाफ सहित मैनपावर की वर्तमान आवश्यकता को पहले ही प्रशिक्षित किया जा चुका है। इस प्रकार अगले तीन वर्षों के लिए किसी अतिरिक्त जनशक्ति की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से मौजूदा कर्मचारियों की क्षमता का निर्माण किया जा रहा है।

महाप्रबंधक/उ.म.रे. विनय कुमार त्रिपाठी ने कहा कि रेलवे को अधिक कुशल, आर्थिक और पर्यावरण के अनुकूल परिवहन साधन बनाने के लिए पूरी भारतीय रेल में एक एकीकृत योजना बनाई जा रही है। जैसे-जैसे एसी इंजनों की संख्या बढ़ेगी, हम इन लोकोमोटिव्स को त्वरित और सर्वोत्तम रखरखाव प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

वीडियो कांफ्रेंस में उ.म.रे. के अपर महाप्रबंधक रंजन यादव, प्रमुख मुख्य विद्युत अभियंता सतीश कोठारी, मंडल रेल प्रबंधक, झांसी संदीप माथुर सहित झाँसी मंडल के सभी संबंधित अधिकारी उपस्थित थे।

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बिहारी मजदूरों को लूट रहे पटना जंक्शन के टीटीई – RailSamachar

पटना जंक्शन के टिकट चेकिंग स्टाफ का भ्रष्टाचारपूर्ण कारनामा

गाड़ी संख्या 02587/ 05097/ 02331, जो जम्मू की तरफ जाती है, में पटना जंक्शन का कुछ टिकट चेकिंग स्टाफ यात्रियों से जमकर वसूली करता है।

मामला दरअसल यह है कि बिहार से बहुत सारे मजदूर अब कोरोना का कहर कुछ कम होने के बाद पंजाब, हिमाचल और जम्मू की तरफ रोजी-रोटी कमाने के लिए वापस लौट रहे हैं। ये लोग ज्यादातर अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे होते हैं।

कोई अगर थोड़ा-बहुत पढ़ा लिखा होता भी है तो भी यहां के टीटीई बाबू की तरफ से बनाई गई टिकट की रसीद ये मजदूर लोग तो क्या खुद टीटी बाबू भी न पढ़ पाएं।

ऐसे बहुत से लोगों को कन्फर्म टिकट नहीं मिलता, मगर ये लोग गाड़ी में बैठ जाते हैं या इन्हें बैठा दिया जाता है। टिकट का पूरा किराया जुर्माने सहित और उससे भी अधिक इनसे ले लिया जाता है।

मगर इनको दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन (डीडीयू) तक की ही टिकट बनाकर गाड़ी में यह कहकर बैठा देते हैं कि “आपकी जम्मू तक की टिकट बना दी है। चिंता मत करो, कोई दिक्कत नहीं होगी, आगे आपको कोई परेशान नहीं करेगा।”

रविवार, 13 जून को गाड़ी संख्या 02331 में ऐसे ही 42 लोग पकड़े गए, जिनमें से 8 को जालंधर, 22 को पठानकोट और बाकी को जम्मू जाना था। इनसे टिकट के निर्धारित किराए से भी अधिक पैसा लेकर गाड़ी में बिठा दिया गया था।

जालंधर में जब ये लोग नीचे उतरे तो इनको वहां के टिकट चेकिंग स्टाफ ने पकड़ लिया और जब उन्होंने इनके पास से मिली रसीद चेक की तो पता चला कि वह तो पटना जंक्शन से दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन तक की ही बनी हुई है।

यह पटना जंक्शन के टिकट चेकिंग स्टाफ की EFT है जिसे देखकर कोई भी ये नहीं बता सकता कि इस पर क्या लिखा है। यह 420220 नंबर से लेकर 420234 नंबर तक की EFT एक ही चेकिंग स्टाफ ने बनाई है, जो जालंधर में पकड़ी गई है।

तभी यात्रियों ने वहां रो-रोकर बताया कि उनसे तो पटना जंक्शन पर बहुत ज्यादा पैसे ले लिए गए हैं और फिर भी उनको गलत टिकट क्यों बनाकर दी गई।

बहरहाल, जालंधर में इन लोगों को फिर से जुर्माना देकर टिकट बनवानी पड़ी। ऐसे ही पठानकोट में भी हुआ और जम्मू जाने वाले 12 लोग कठुआ में उतर कर भाग गए।

इस तरह पटना जंक्शन का कुछ टिकट चेकिंग स्टाफ इन बिहारी मजदूरों को जमकर लूट रहा है और पता नहीं कि उनकी यह लूट-खसोट कब से चल रही है।

ये वह #EFT (एक्सट्रा फेयर टिकट) रसीद है जिससे यात्रियों को जालंधर में दुबारा जुर्माने सहित पैसा भरना पड़ा।

अतः रेल प्रशासन द्वारा पिछले एक-डेढ़ साल के दौरान पटना जंक्शन से डीडीयू स्टेशन तक की बनाई गई सभी टिकट रसीदों (ईएफटी) की गहराई से जांच की जानी चाहिए और संबंधित चेकिंग स्टाफ की जिम्मेदारी तय करते हुए उनके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।

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यदि एक बार में महंगाई भत्ता देने में मुश्किलें आ रहीं हैं तो इसे किश्तों में भी दिया जा सकता है -शिवगोपाल मिश्रा

महंगाई भत्ता: थोड़ी लंबी हो सकती है केंद्रीय कर्मियों की प्रतीक्षा, डीए पर होने वाली समिति की बैठक एक बार फिर टली

केंद्रीय कर्मचारियों को 1 जुलाई, 2021 से महंगाई भत्ता (डीए) फिर से देने की घोषणा केंद्र सरकार ने की थी। सातवें वेतन आयोग से जुड़ी समस्याओं को लेकर नेशनल काउंसिल ऑफ ज्वाइंट कंसल्टेटिव मशीनरी (एनसी-जेसीएम) के पदाधिकारी और डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेंनिग (डीओपीटी) तथा वित्त मंत्रालय के अधिकारी लगातार संपर्क में बने हुए हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार मई के अंत में इन सभी संस्थाओं के बीच बातचीत होनी थी, लेकिन कोरोना के कारण अब यह बैठक जून के तीसरे सप्ताह में होने की संभावना है। बैठक टलने के बाद अब कर्मचारियों की प्रतीक्षा अब थोड़ी लंबी हो सकती है।

बताते हैं कि महंगाई भत्ते से जुड़ी समस्याओं को लेकर एनसी-जेसीएम के पदाधिकारी, डीओपीटी और वित्त मंत्रालय के अधिकारियों की बैठक 8 मई को भी होनी थी जो टल गई और उसके बाद मई अंत में बैठक का फैसला किया गया था। अब वह बैठक भी टल जाने से महंगाई भत्ते पर अंतिम निर्णय होने में और देर होने की आशंका है।

एनसी-जेसीएम स्टाफ साइड के सेक्रेटरी शिवगोपाल मिश्रा का कहना है कि कोरोना के मौजूदा हालात में महंगाई भत्ते पर बैठक टलने को नकारात्मक रूप में लेने की जरूरत नहीं है। उनका कहना है कि एनसी-जेसीएम स्टाफ साइड ने सरकार को यह सुझाव दिया है कि यदि एक बार में महंगाई भत्ता देने में मुश्किलें आ रहीं हैं तो इसे किश्तों में भी दिया जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार 1 जुलाई से महंगाई भत्ता दिया जाना था। इसमें पिछली तीन किश्तों – 01.01.2020, 01.07.2020, 01.01.2021 – का बकाया भी शामिल है। केंद्रीय कर्मचारियों के लिए यह मामला वर्तमान में सबसे बड़ी चर्चा का विषय है। किस्तों पर फिलहाल कोई निर्णय न होने का असर उनके एरियर पर भी पड़ेगा।

#NC_JCM #DearnessAllowance





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रिटायरमेंट के बाद भी पंद्रह दिन तक ऑफिस आकर बैठते रहे पीसीएसओ, पूर्वोत्तर रेलवे

रिटायर हो चुके एस. एन. शाह को “कारण बताओ नोटिस” जारी की जाए। तत्पश्चात इस बात की जांच की जानी चाहिए कि 14-15 दिनों में उन्होंने ऑफिस में बैठकर क्या-क्या घालमेल किया?

विजय शंकर, ब्यूरो प्रमुख,गोरखपुर

यह अजब है कि कोई विभाग प्रमुख (पीएचओडी) रिटायर होने के बाद भी ऑफिस में बाकायदा बैठकर लगातार पंद्रह दिनों से काम कर रहा हो, अपने मातहत रहे अधिकारियों और कर्मचारियों को डांट-डपट रहा हो, हड़का रहा हो, मातहत अधिकारी की गाड़ी जबरन इस्तेमाल कर रहा हो, फिर भी उसके मातहतों को तो छोड़ो, उसके ऊपर समकक्ष अधिकारी भी इसे अनदेखा करें, यह बात कुछ हजम में नहीं होती!

यह करिश्मा साक्षात घटित हुआ है पूर्वोत्तर रेलवे मुख्यालय गोरखपुर में, जहां पीसीएसओ एस. एन. शाह 30 अप्रैल को सेवानिवृत्त होने के बाद भी अब तक लगातार और बाकायदा अपने चैंबर में आकर पूर्व रुतबे के साथ बैठ रहे हैं।

बताते हैं कि उन्होंने इसका बहाना अपने मातहत काम कर रहे लोगों को यह कहकर बताया कि “उन्होंने सोचा, जब तक नए सीएसओ की पोस्टिंग नहीं होती, तब तक वह खुद पेंडिंग काम निपटा दें!”

अब एसएंडटी कैडर के इस वरिष्ठ मूढ़ व्यक्ति की नजर से देखा जाए, तो इसका तात्पर्य यह है कि जब तक नए जीएम की पोस्टिंग नहीं हो, तब तक रिटायर हो चुके जीएम को आकर काम करते रहना चाहिए!

आश्चर्य की बात यह है कि दूसरे विभागों के समकक्ष विभाग प्रमुखों ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? यदि वह अपना बिरादरी भाव नहीं बिगाड़ना चाहते थे, तब भी उन्होंने यह बात जीएम के संज्ञान में लाना जरूरी क्यों नहीं समझा?

इसके अलावा पता चला है कि सीएसओ/एनईआर का अतिरिक्त कार्यभार मैकेनिकल डिपार्टमेंट के एक अधिकारी बी. एस. दोहरे को सौंपा गया है। यदि वह सीएसओ के चैंबर में नहीं भी बैठ रहे थे, तब भी उन्होंने शाह को वहां बैठने अथवा कार्यालय आने से मना क्यों नहीं किया?

दोहरे यदि शाह को टोककर उनसे बुरे नहीं बनना चाहते थे, तब भी रिटायरमेंट के बाद शाह के चैंबर में आकर बैठने की जानकारी से उन्होंने स्वयं महाप्रबंधक को अवगत क्यों नहीं कराया? जबकि अन्य विभाग प्रमुखों की अपेक्षा अतिरिक्त कार्यभारी होने से यह खुद उनकी पहली जिम्मेदारी थी?

जब “रेल समाचार” द्वारा यह विषय जीएम/पूर्वोत्तर रेलवे श्री वी. के. त्रिपाठी से मोबाइल पर बात करके उनके संज्ञान में लाया गया, तब वह भी आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने कहा कि “ऐसा कैसे हो सकता है, क्योंकि सीएसओ का अतिरिक्त कार्यभार मैकेनिकल अधिकारी बी. एस. दोहरे को सौंपा गया है। तथापि वह इस पर अभी तत्काल कार्यवाही कर रहे हैं।”

यह वास्तव में अत्यंत आश्चर्यजनक है कि एक रिटायर हो चुका अधिकारी लगातार पंद्रह दिनों से प्रतिदिन आकर पूर्ववत अपने चैंबर में बैठ रहा है। पूर्व की भांति कार्यालयीन सभी दैनंदिन कामकाज निपटा रहा है, तथापि न तो मातहत उसे कुछ कह रहे हैं और न ही उसके समकक्ष अधिकारी उसे कुछ बोल रहे हैं।

मातहतों को तो एक बार यह मानकर बख्शा जा सकता है कि शाह ने अब तक उनकी एसीआर नहीं लिखी है, हालांकि यह उनकी अक्षम्य कर्तव्यहीनता है, मगर समकक्ष अधिकारियों को इस कोताही के लिए कतई माफ नहीं किया जाना चाहिए।

चूंकि एस. एन. शाह रिटायर हो चुके हैं, व्यवस्था से बाहर हो चुके हैं, इसलिए अधिकारिक तौर पर अथवा अन्य किसी भी रूप में वह ऑफिस या चैंबर में बैठने के हकदार नहीं रह गए थे। तथापि उन्होंने जानबूझकर ऐसा किया।

अतः सर्वप्रथम उन्हें “कारण बताओ नोटिस” जारी की जानी चाहिए। तत्पश्चात इस बात की जांच की जानी चाहिए कि इन 14-15 दिनों में उन्होंने ऑफिस में बैठकर क्या-क्या घालमेल किया?





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रेल मंत्रालय खोद रहा स्थाई रोजगार की जड़ें, टाटा ग्रुप दे रहा रिटायरमेंट तक की गारंटी!

“अब तो रोबोट तमाम काम कर रहे हैं, उनमें जिस तरह की प्रोग्रामिंग सेट कर दी जाती है, वे वैसा ही काम करते हैं, तो क्यों न रेलवे के चेयरमैन/सीईओ, बोर्ड मेंबर्स सहित सभी महाप्रबंधकों और सभी प्रमुख मुख्य विभागाध्यक्षों के पदों पर प्री-प्रोग्रामिंग करके रोबोट बैठा दिए जाएं और इनके पदों को सरेंडर कर दिया जाए!”

रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड), भारत सरकार ने 20 मई 2021 को कैलेंडर वर्ष 2021-22 के लिए एक वर्क स्टडी प्रोग्राम के तहत पदों को सरेंडर करने का दिशा-निर्देश सभी जोनल रेलों के महाप्रबंधकों को जारी किया है।

इस आदेश के अनुसार रेलवे के ग्रुप ‘सी’ और ‘डी’ श्रेणी के रेल कर्मचारियों के 13,450 पद चालू वर्ष में सरेंडर (खत्म) किए जाएंगे और इनकी कीमत को इम्पलाईज बैंक में जमा करने के लिए कहा गया है।

इसके अलावा कोरोना महामारी के चलते भी हजारों की संख्या में रेलकर्मी अकाल काल कवलित हुए हैं। यदि इसके चलते भी सरकार द्वारा खाली हुए रेलवे के इन हजारों पदों को भी स्कैप करके इम्प्लाइज बैंक में जमा करने का निर्णय निकट भविष्य में ले लिया जाए, तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।

रेल मंत्रालय का निश्चित रूप से यह एक आत्मघाती और युवाओं को स्थाई रोजगार मुहैया कराने का विरोधी फैसला है। सरकारी नौकरशाही की इस सरेंडर नीति के पीछे जो मानसिकता है, वह उच्च स्तर के पदों के सृजन की है।

पहले जो एक ‌विभाग प्रमुख का पद हुआ करता था, उसे अब मुख्य विभाग प्रमुख कर दिया गया है और अब उसके नीचे तीन-तीन, चार-चार विभाग प्रमुख हो गए हैं। इंजीनियरिंग विभाग में तो आधा दर्जन से ज्यादा ऐसे पद सृजित हो गए हैं, क्योंकि सबको मलाई यहीं से मिलनी है। इसी तरह हर विभाग में मुख्यालय स्तर पर चार-पांच-छह तक की संख्या में विभाग प्रमुखों की भरमार हो गई है।

प्रत्येक मंडल में अब तीन-तीन अपर मंडल रेल प्रबंधक (एडीआरएम) के पद हो गए हैं और इनका काम देखें तो शून्य है। अब हर जोन में एक अपर महाप्रबंधक (एजीएम) का पद भी सृजित कर दिया गया है। जब महाप्रबंधक का पद है, तो फिर अपर महाप्रबंधक की क्या जरूरत है? इसका औचित्य (जस्टिफिकेशन) बताने अथवा देने को कोई तैयार नहीं है।

पूर्व मध्य रेलवे के गठन के पहले पूर्वोत्तर रेलवे में पांच मंडल हुआ करते थे, जो वर्ष 2002-03 में विभाजन के पश्चात अब तीन रह गए हैं। जब इसमें पांच मंडल थे, तब इसे एक जनरल मैनेजर (जीएम) संभाल लेता था और आज केवल तीन मंडल हैं, तो भी इसकी व्यवस्था संभल नहीं रही है।

यही हाल उन बाकी सभी छोटी जोनल रेलों का भी है, जिनका गठन 2002-03 में हुआ था और जिन्हें राजनीतिक उद्देश्य से कमोबेश राज्यों के स्तर तक सीमित कर दिया गया था। सब में एक-एक एजीएम बैठाया गया है, तब भी परिणाम जस का तस ही है।

रेलवे के जिन 13,450 पदों को सरेंडर करने का आदेश रेलवे बोर्ड ने दिया है, वह इस देश के युवाओं के स्थाई और सम्मानित रोजगार की खुली लूट है।

ऐसा नहीं है कि काम की कमी के चलते इन पदों को सरेंडर किया जा रहा है। इसके पीछे का उद्देश्य आउटसोर्सिंग एजेंसियों को लाभ पहुंचाना है, क्योंकि ग्रुप ‘डी’ के कर्मचारी जो काम करते हैं, उसके लिए तो हाथों की जरूरत पड़ेगी ही, लेकिन जिस काम को करने के लिए एक स्थाई रेलकर्मी माहवार 35 हजार से 50 हजार तक मजदूरी पाता है, उसी काम को आउटसोर्सिंग एजेंसी एक कर्मचारी से 10-15 हजार में कराएगी।

ऐसे संविदा कर्मियों को न पीएफ देने का झंझट होगा, न ही रोजगार सुरक्षा की कोई गारंटी होगी और न ही ईएसआईएस की कोई सुविधा देने का सरदर्द होगा, जब चाहे तब उसे कान पकड़कर निकाल बाहर करने की मनमानी छूट होगी, वह अलग!

यह इस देश के पढ़े-लिखे युवाओं का खुला शोषण है। श्रम पैसा है, और पैसे की यह बड़ी तथा खुली लूट हो रही है!

ऐसे मुद्दों पर सिविल सोसायटी की चुप्पी बहुत हैरान करने वाली है कि चौबीस घंटे हिन्दू-मुस्लिम पर बहस करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी अपने बच्चों के भविष्य को बरबाद होते देखकर भी सरकार की इन रोजगार विरोधी नीतियों पर मूकदर्शक क्यों बने हुए हैं? स्थाई रोजगार नहीं होने का दंश आज कोविड की महामारी में यह देश भुगत रहा है।

किसी भी देश को अस्थाई और संविदा पर काम करने वाले कर्मियों से कदापि संचालित नहीं किया जा सकता है। यह सब कोविड जैसी महामारी और आए दिन आ रहे तटवर्ती समुद्री तूफानों के चलते देखने को मिला है तथा लगातार अनुभव में भी आ रहा है।

रेलवे बोर्ड ने अपनी सरेंडर पालिसी के बचाव में तर्क दिया है कि “आज के दौर में तकनीक के विकास से कम लोगों के जरिए काम का लक्ष्य (वर्क टारगेट) हासिल कर लिया जा रहा है, इसलिए इन पदों को सरेंडर करने से रेलवे के काम पर कोई असर नहीं पड़ेगा।”

इस संबंध में मेरा यह मानना है कि “अब तो रोबोट तमाम काम कर रहे हैं, उनमें जिस तरह की प्रोग्रामिंग सेट कर दी जाएगी, वे वैसा ही काम करेंगे, तो क्यों न रेलवे के चेयरमैन सीईओ, बोर्ड मेंबर्स सहित सभी महाप्रबंधकों और सभी प्रमुख मुख्य विभागाध्यक्षों के पदों पर प्री-प्रोग्रामिंग करके रोबोट बैठा दिए जाएं और इनके पदों को सरेंडर कर दिया जाए, कम खर्च में बहुत सारा, बल्कि बहुत ज्यादा काम का लक्ष्य हासिल हो जाएगा। इस प्रकार बेईमानी और कमीशनखोरी की भी कोई आशंका नहीं रह जाएगी।”

परंतु रेलवे की स्थिति यह है कि जो महाप्रबंधक जितने ज्यादा पद सरेंडर करेगा, वह उतना ही काबिल माना जाएगा और जो अध्यक्ष रेलवे को जितनी जल्दी बेच देगा, वह नीति आयोग में भेज दिया जाएगा। हुक्म के गुलामों की यह स्थिति पूरी व्यवस्था को चौपट करने पर उतारू है।

इसलिए अब समय आ गया है कि देश का हर नौजवान अपने स्थाई रोजगार की इस चोरी को रोकने के लिए लामबंद होकर अविलंब उठ खड़ा हो, तभी स्थाई रोजगार को और इस देश की बरबाद होती व्यवस्था को बचाया जा सकता है।

लेखक रेलवे में कार्यरत एक वरिष्ठ अधिकारी हैं!

प्रस्तुति: सुरेश त्रिपाठी

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पूरी भारतीय रेल में अब तक हजारों रेलकर्मी हुए कोरोना का शिकार, झूठे आंकड़े देकर झूठ बोलते रहे सीईओ/रे.बो.

झूठ बोलने में रेलवे बोर्ड का कोई सानी नहीं, सुनीत शर्मा, चेयरमैन/सीईओ/रे.बो. ने तोड़े अकर्मण्यता और अनिर्णय के सारे रिकॉर्ड

सुरेश त्रिपाठी

कोरोना महामारी के दूसरे चरण में पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल 314 लोको पायलट्स की मृत्यु का आंकड़ा सामने आया है। हालांकि यह अविश्वसनीय संख्या है, क्योंकि मौत के समाचार जिस गति से चल रहे हैं, उनको देखकर इस आंकड़े पर कोई भी रनिंग स्टाफ भरोसा नहीं कर पा रहा है।

रनिंग स्टाफ के कई वरिष्ठ सुपरवाइजरों का कहना है कि “वास्तव में यह आंकड़ा इससे भी ज्यादा है।” वे कहते हैं, “हॉस्पिटल में कोविड से हुई मौत बताया जाता है, परंतु जब डाटा उनके कार्यालय में आता है तो वही डेथ किसी अन्य कारण से हुई बताई जाती है। यह अत्यंत अविश्वसनीय है।”

स्टेशन मास्टर कैडर में भी अब तक 150 से ज्यादा मौतें कोविड संक्रमण के चलते हो चुकी हैं। पूरा कैडर जब रेल प्रशासन की अनमनस्कता के प्रति आक्रोशित हुआ और उचित ध्यान नहीं दिए जाने पर ड्यूटी न करने की चेतावनी दी, तब प्रशासन को होश आया और उसने उनके साथ वर्चुअल मीटिंग करके समस्या का समाधान करने की पहल हुई।

टिकट चेकिंग, टिकट बुकिंग, पार्सल, लगेज, आरक्षण इत्यादि कैडर्स, जो लगातार पब्लिक के संपर्क में रहते हैं, में भी काफी रेलकर्मी कोरोना का शिकार हुए हैं, परंतु उनके अधिकृत आंकड़े अब तक सामने नहीं आए हैं। तथापि उनकी मौतों के दु:खद समाचार लगातार आते रहते हैं।

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इस महामारी के दूसरे चरण में, जब उम्र का कोई बंधन नहीं रह गया, हर आयु-वर्ग के बहुत सारे रेलकर्मी और अधिकारी काल-कवलित हुए हैं। परंतु ऐसा लगता है कि रेल प्रशासन ने उनकी मौतों को अब तक भी गंभीरता से नहीं लिया है, बल्कि देखने में यही आया है कि उनकी मौत के आंकड़े छिपाने में और व्यवस्था को दिग्भ्रमित करने में रेलवे बोर्ड की ज्यादा रुचि रही है।

चेयरमैन/सीईओ/रेलवे बोर्ड ने झूठ बोला

यदि ऐसा नहीं होता, तो ओपन प्रेस कॉन्फ्रेंस में चेयरमैन सीईओ रेलवे बोर्ड झूठ नहीं बोलते, झूठे आंकड़े प्रस्तुत नहीं करते, मांगे जाने पर भी वह रेलकर्मियों-अधिकारियों की मौत के आंकड़े देने से इंकार नहीं करते!

यदि ऐसा नहीं होता, तो वे मार्च 2020 से दिए गए आंकड़ों का औचित्य सिद्ध करते और जनवरी 2021 से अब तक हुई रेलकर्मियों-अधिकारियों की मौत के आंकड़े शेयर करते! जो कि दिन-प्रतिदिन के हिसाब से रेलवे बोर्ड में संकलित होते हैं।

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जोनल रेलों के विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 1 मई 2021 को पूरी भारतीय रेल में कोरोना से संक्रमित रेलकर्मियों की कुल संख्या 1,15,358 थी। जबकि उसी दिन कोविड से मृत्यु को प्राप्त हुए रेलकर्मियों की कुल संख्या 1695 थी। इस एक दिन में कोविड का शिकार हुए गैर रेलकर्मियों अर्थात रेलकर्मियों के परिजनों एवं रेल अस्पतालों में भर्ती अन्य लोगों की मौत का कुल आंकड़ा 2761 था।

इससे पहले 18 अप्रैल 2021 के दिन पूरी भारतीय रेल में कोरोना से संक्रमित रेलकर्मियों की कुल संख्या 83,180 थी। जबकि उस दिन कोविड से मृत्यु को प्राप्त हुए रेलकर्मियों की कुल संख्या 979 थी और इस एक दिन में कोविड का शिकार हुए गैर रेलकर्मियों अर्थात रेलकर्मियों के परिजनों एवं रेल अस्पतालों में भर्ती अन्य लोगों की मौत का कुल आंकड़ा 1814 था।

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इस प्रकार यह पूरी तरह स्पष्ट है कि 11 मई के आसपास और उससे पहले हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीईओ रेलवे बोर्ड ने प्रेस के सामने साफ-साफ झूठ बोला था।

यहां तक कि जो लोग उनके द्वारा दिए गए आंकड़ों पर सवाल पूछना चाहते थे, उन्हें कुछ भी कहकर साइड लाइन कर दिया गया, परंतु उन्हें मार्च 2020 से दिए गए आंकड़ों का कोई औचित्य नहीं समझाया गया।

जबकि उपरोक्त आंकड़ों से स्पष्ट है कि सीईओ/रेलवे बोर्ड द्वारा मार्च 2020 से 10 मई 2021 तक 13 महीने 10 दिन के लिए बताए गए कुल आंकड़ों से यहां एक दिन का ही आंकड़ा अधिक है।

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यदि ऐसा नहीं था, तो “रेल समाचार” द्वारा 10 मई 2021 को चेयरमैन सीईओ/रेलवे बोर्ड सुनीत शर्मा से जब यह पूछा गया कि –

1. कृपया श्री प्रदीप कुमार, पूर्व मेंबर स्टाफ, रेलवे बोर्ड और वर्तमान मेंबर कैट, जो कि एनआरसीएच में भर्ती हैं और वेंटिलेटर पर हैं, की हेल्थ पोजीशन की अपडेट देने की कृपा करें।

2. रेल अस्पतालों को अपग्रेड करने और रेलकर्मियों को उचित स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने के लिए रेल प्रशासन द्वारा अब तक क्या किया गया?

3. वर्तमान में कितने रेलकर्मी और अधिकारी पूरी भारतीय रेल में कोरोना संक्रमित हैं?

4. पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल कितने रेलकर्मी और अधिकारी कोरोना से काल कवलित हुए हैं? कृपया रेलवे वाइज संख्या देने की कृपा करें।

5. पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल कितने रेलकर्मियों और अधिकारियों का वैक्सीनेशन हो चुका है? कृपया रेलवे वाइज संख्या प्रदान करने की कृपा करें।

6. क्या रेलकर्मियों और अधिकारियों तथा उनके परिजनों को अलग से अथवा सीधे वैक्सीन मुहैया कराने की व्यवस्था नहीं की जा सकती? यदि हां, तो इसके लिए रेल मंत्रालय क्या उपाय कर रहा है? यदि नहीं, तो इसमें समस्या क्या है? कृपया बताने का प्रयास करें।

यह नहीं, 12 मई 2021 को, सीईओ रेलवे बोर्ड की प्रेस कॉन्फ्रेंस के एक दिन बाद भी उन्हें रिमाइंड करते हुए “रेल समाचार” द्वारा पूछा गया था कि –

Resp. Sharma ji, kindly share latest daily “ZONE WISE COVID PREPAREDNESS REPORT-2021” on Indian Railways.

उपरोक्त में से किसी भी तथ्य का कोई स्पष्टीकरण अथवा कोई जवाब अब तक चेयरमैन/सीईओ/रेलवे बोर्ड की तरफ से नहीं आया है।

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“जान है तो जहान है” के सिद्धांत पर जब रेल प्रशासन को अपनी वर्क फोर्स का जीवन बचाना चाहिए था, तब वह झूठ और फरेब का सहारा लेकर केवल ऑक्सीजन एक्सप्रेस चलाने के लिए अपनी पीठ थपथपा रहा है।

हालांकि जनता को भी उसके गंतव्य पर पहुंचाकर सेवा कार्य भी इस संकटकाल में जरूरी है। तथापि झूठ बोलना कतई जरूरी नहीं है। यह वैश्विक महामारी है, इस पर आदमी का कोई वश नहीं है। इसके लिए केवल सावधानियां ही बरती जा सकती हैं।

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अतः पब्लिक के संपर्क में आने वाले रेलकर्मियों को सुरक्षा उपकरणों की आपूर्ति सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके अलावा उम्र और किसी बीमारी से ग्रस्त कर्मचारियों को जनसंपर्क से दूर रखने की यथासंभव कोशिश करते हुए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

“रेल समाचार”, रेल प्रशासन की अकर्मण्यता के कारण अब तक अकाल काल-कवलित हुए सभी रेलकर्मियों को विनम्र श्रृद्धांजलि अर्पित करता है और संक्रमित हुए कर्मचारियों के शीध्र स्वस्थ होने की कामना करता है।

ट्रेन की गति से ढ़हा चांदनी रेलवे स्टेशन:





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डीआरएम के बाद जीएम पद की गरिमा को भी शर्मशार कर रहे आलोक कंसल !

जब तक चमचों/चाटुकारों की फौज को भी दंडित नहीं किया जाएगा, तब तक जीएम जैसे ताकतवर पद पर बैठे लोगों के बेलगाम संवेदनशून्य मानसिक विकार से उत्पन्न फूहड़ प्रदर्शनों का सिलसिला नहीं रुकेगा!

#AlokKansal, #GMWR & his wife #TanujaKansal

सुरेश त्रिपाठी

नाचने-गाने, रास रचाने और पत्नी की उंगलियों तथा इशारों पर नाचने, उठने-बैठने-चलने के लिए मशहूर पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक आलोक कंसल के कई रोमांटिक वीडियो पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहे हैं। अब यह तो सर्वज्ञात ही है कि रेलवे के ऐसे उच्च पदों पर बैठे आलोक कंसल जैसे कुछ महानुभावों की यह कथित रोमांटिक नौटंकी अथवा भौंड़ेपन का बेशर्म प्रदर्शन या तो ऑफीसर्स क्लब के फंड – जो अधिकारियों के कंट्रीब्यूशन से जमा होता है – से होता है, या फिर अन्य कदाचारी माध्यमों से इसका इंतजाम किया जाता है।

रेलवे में आलोक कंसल जैसे महानुभावों की कोई कमी नहीं है। पहले भी कभी नहीं रही – अरुणेंद्र कुमार जैसे बीवी के गुलाम पहले भी रह चुके हैं – अभी भी है – कंसल के ही कैडर बिरादर उत्तर रेलवे की एक मजबूत कमाऊ पोस्ट पर आज भी मौजूद हैं – ऐसे सैंकड़ों उदाहरण हैं और ऐसा भी नहीं है कि इसमें किसी एक कैडर विशेष का ही एकाधिकार रहा हो। सभी कैडर में “आलोक कंसल” विद्यमान रहे हैं। इसी का परिणाम की आज रेलवे की लुटिया डूब रही है। फिर भी इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा।

आलोक कंसल जैसे दरिद्र मानसिकता के लोगों को न पद की गरिमा का ख्याल है, न ही रेलवे की बदहाल होती जा रही आर्थिक स्थिति का। इन्हें तो पद पर रहते हुए सिर्फ अपनी जेबें भरने और जी-भरकर मौज-मस्ती करने की ही फिक्र रहती है। पद की गरिमा और रेलवे की हालत गई चूल्हे भाड़ में, क्योंकि इन्हें बखूबी मालूम होता है कि पद से हटने और रिटायर होने के बाद अपने खर्च पर यह मौज-मस्ती नहीं हो पाएगी, और रेलवे में फिर कोई कुत्ता भी इन्हें नहीं पूछेगा!

यह भी सबको पता है कि डीआरएम/नागपुर/द.पू.म.रे. रहते हुए कंसल वहां भी रेलवे के काम को तरजीह देने के बजाय इसी तरह के रास-रंग में डूबे रहते थे। तब भी कुछ अधिकारियों ने इन्हें पद की गरिमा का हवाला दिया था। उन्होंने उस समय जिस बात की आशंका व्यक्त की थी, आज जीएम पद पर आसीन होकर कंसल उसे ही बखूबी अंजाम दे रहे हैं।

भीषण खतौली दुर्घटना के बाद इन्हें सीटीई/उ.रे. के पद से तत्काल शिफ्ट करके किसी फालतू जगह डालने के बजाए पूर्व मध्य रेलवे कंस्ट्रक्शन में डाला गया था, वहां भी इन्होंने कमीशनखोरी में कोई कसर नहीं छोड़ी थी और कुछ समय बाद ही पुनः उत्तर रेलवे वापस पहुंचने में कामयाब रहे थे। जहां से अब मंत्री की पसंद से उनके जूरिस्डिक्शन में पदस्थ होकर तन-मन-धन से पूरी सेवा करने में जुटे हैं।

रेलमंत्री यदि बोर्ड मेंबर्स और कुछ ईडी’ज की ही दिनचर्या देख लें, जिनके बंगलों में न सिर्फ बोर्ड की कैंटीन से खाना सप्लाई होता है, बल्कि वह छह-सात सौ रुपए प्रति बोतल का इंपोर्टेड पानी पीते रहे हैं। वह तो भला हो फाइनेंस विभाग का, जिसने इनके तमाम दबावों को दरकिनार करते हुए हाल ही में इनकी ये लक्जरियस नक्शेबाजी पर रोक लगा दी।

रेलमंत्री को जहां भ्रष्टाचार और निकम्मेपन पर अपना ध्यान केंद्रित करके ऐसी अय्याशियों पर हो रहे फालतू खर्चों पर नियंत्रण और निकम्मों-नचनियों को घर भेजना चाहिए था, वहां वह बेकार और अनावश्यक मुद्दों पर न सिर्फ अपना कीमती समय जाया कर रहे हैं, बल्कि अपनी क्षणिक कार्य-प्रणाली से रेलवे की बदनामी सहित सरकार की छवि को भी धूमिल होने से नहीं बचा पा रहे हैं।

रेलमंत्री जी! आलोक कंसल जैसे महान प्रतिभासंपन्न जीएम्स (महाप्रबंधकों) से भरा पड़ा है आपका रेल महकमा। अब लगे हाथ आलोक कंसल साहब को भी सीआरबी बनने का मौका दे ही दीजिए। क्योंकि आपके रेल महकमे में योग्य अधिकारी हाशिये पर और निराशा के माहौल में ढ़केल दिए गए हैं, जबकि कंसल जैसे विकृत रास-रंग में डूबे खड़की बूढ़े जिस ऑर्गनाइजेशन की पतवार संभालेंगे, उसका तो ईश्वर ही मालिक होगा।

अब जब सिर्फ ईएसई (#ESE) से ही आईआरएमएस (#IRMS) का सेलेक्शन करने का राग छेड़ दिया गया है, तो अब आपके पास ऐसी नचनिया प्रतिभाओं की शायद ही कोई कमी रह जाएगी। कई वरिष्ठ रेल अधिकारियों का कहना है कि अगर रेलमंत्री और सीआरबी में थोड़ी सी भी शर्मोहया और नैतिकता बची है, तो इस संवेदनहीन फूहड़ नचनिया को तुरंत निलंबित करते हुए अविलंब जीएम पद से हटाने का प्रशासनिक साहस दिखाया जाए।

उनका कहना है कि जहां पूरे देश में कोरोनावायरस से हर गली-मोहल्ले में मातम पसरा हुआ है, और मुंबई महानगर इस मामले में भयानक दौर से गुजर रहा है, वहां इस नचनिया जीएम की ही रेलवे के कई कर्मचारी कोरोना के शिकार होकर अकाल काल-कलवित हो चुके हैं और यह जीएम पद की गरिमा को भूलकर तथा बेशर्म होकर “सावन की झड़ी” का राग अलापते हुए रास-रंग में डूबकर वीडियो बनवाने में लगा हुआ है।

एक यूनियन पदाधिकारी का कहना था कि जहां एक तरफ रेल कर्मचारियों के घरों/परिवारों में मातम, मायूसी और डर का माहौल है, हजारों कर्मचारी कोरोना संक्रमित हो चुके हैं, जबकि सैकड़ों रेलकर्मियों की मौत हो चुकी है, वहां ये जीएम “रोम के नीरो” से भी दस कदम आगे निकलकर अपनी भौंड़ी ऐय्याशी का निर्लज्ज और संवेदनशून्य तकनीकी कौशल का प्रदर्शन कर रहे हैं।

कई अधिकारियों और यूनियन पदाधिकारियों ने रेलमंत्री से सीधी मांग करते हुए कहा कि इनको तत्काल निलंबित करने के बाद इनकी कम से कम ब्रांच अफसर (बीओ) लेवल से भी जांच हो, तब इनके सामने कुबेर भी शायद छोटे पड़ जाएंगे।

उनका कहना था कि पूरे रेल महकमे में ये पति-पत्नी दोनों ही कुख्यात हैं। इनकी पत्नी के नाम से तो कई आईओडब्ल्यू/पीडब्ल्यूआई और डिप्टी लेवल तक के अफसरों की रूह कांपती है। कितने ही कर्मचारी इतने अपमानित हुए हैं कि उनके सामने आत्महत्या करने या नौकरी छोड़ने तक की नौबत आ गई। यदि यकीन न हो तो उत्तर रेलवे सहित ये जहां-जहां रहे हैं, वहां-वहां के इनके मातहतों से इस बात का वेरिफिकेशन करा लिया जाए।

#TanijaKansal wife of #AlokKansal, #GMWR

यह बात बिल्कुल सही है कि ऐसे एक नहीं कई अफसर रेल में भरे पड़े हैं, जो आने वाले समय में निश्चित तौर पर जीएम, सीआरबी मैटीरियल हैं, जिनकी एकमात्र प्रतिभा सिर्फ उनकी “एज प्रोफाइल” है। इसी प्रोफाइल के चलते आज बोर्ड मेंबर और सीआरबी बने बैठे लोग मौके पर मंत्री को उचित बात बताने के बजाय घिघिया रहे हैं।

इसीलिए ऐसे अफसरों को उनके मातहत शुरू से ही जीएम, बोर्ड मेंबर तथा सीआरबी के नजरिये से देखते हैं। यही कारण है कि मातहतों की यह फौज भविष्य के डर से इनके सारे आसुरी कृत्यों को नपुंसकों की तरह अथवा न चाहते हुए भी मजबूरी वश बर्दाश्त करती रहती है।

लेकिन कुछ अधिकारियों का कहना है कि कंसल से दुःखी पूरे जोन के अधिकारी यह जानते हैं कि इनका कोई कुछ नहीं करेगा, क्योकि यह रेलमंत्री की पसंद से ही पश्चिम रेलवे में जीएम बनकर आए हैं और मंत्री जी को यह हर तरह से खुश रखते हैं!

यह भी सर्वज्ञात है कि इसी शासनकाल में सुशासन बाबू और रेलमंत्री के जीरो टॉलरेंस की ये स्थिति थी कि डीआरएम के डिवीजनल इंस्पेक्शन के दौरान जब डीआरएम ने भरी गर्मी में टेंट के नीचे लंच कर लिया था, तो डीआरएम (रांची) का तबादला इसे ऐय्याशी मानते हुए कर दिया गया था और उनको चार्जशीट देने की भी तैयारी थी। इसी तरह के कई और उदाहरण भी देखने में आए थे।

ऐसे में यदि कंसल के मामले में रेलमंत्री कार्रवाही नहीं करते हैं, तो न सिर्फ यह कोरोना संक्रमण से लड़ रहे और मर रहे सैकड़ों रेल कर्मचारियों और अधिकारियों के जख्मों पर नमक रगड़ने जैसा होगा, बल्कि देश में कोरोना से सबसे बुरी तरह प्रभावित महाराष्ट्र और मुंबई की जनता का भी यह घोर अपमान होगा।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को भी इसका संज्ञान लेना चाहिए और अगर उन्हें रेलमंत्री की तरह यह रचनात्मक प्रतिभा लगे, तो फिर उन्हें अपने “मन की बात” कार्यक्रम में इसकी प्रेरणास्प्रद चर्चा जरूर करनी चाहिए। तब हो सकता है कि इससे देश के करोड़ों बेरोजगार युवाओं को अपनी आर्थिक बदहाली को भुलाने में कुछ मदद हो सके।

#TanujaKansal wife of #AlokKansal, #GMWR

इसमें सिर्फ जीएम/पश्चिम रेलवे ही नहीं, जब तक उनके चमचों और चाटुकारों की फौज को भी दंडित नहीं किया जाएगा – जो जीएम्स के इस तरह के ऊल-जलूल कार्यों में बढ़-चढ़कर अपना योगदान देते हैं – तब तक जीएम जैसे ताकतवर पद पर बैठे लोगों के बेलगाम संवेदनशून्य मानसिक विकार से उत्पन्न फूहड़ प्रदर्शनों का सिलसिला नहीं रुकेगा।

कई अफसर और उनकी पत्नियां अपना काम और घर द्वार छोड़कर जीएम की चमचागीरी में कॉस्टिंग डायरेक्टर, क्रिएटिव डायरेक्टर, प्रोडक्शन मैनेजर, फ्लोर मैनेजर, सिनेमॅटोग्राफर आदि का ही काम करते-करते अपने को बहुत बड़ा फिल्म प्रोफेशनल समझने लगते हैं और बिना रेल का कोई काम किए, फील्ड में बिना पसीना बहाए, पूरे सेवाकाल में रेलवे की सारी सुख-सुविधाएं भोगते रहते हैं। कई तो यही सब करते-करते कब खुद डीआरएम, जीएम और सीआरबी बन जाते हैं, और बने भी हैं, पर किसी को इसका आजतक अहसास नहीं हुआ।

#TanijaKansal wife of #AlokKansal, #GMWR

इसमें कैमरा, साज-सज्जा आदि का प्रबंध करने वाले, ऑफीसर्स क्लबों के सेक्रेटरी, जीएम के सेक्रेटरी, महिला समितियों की सदस्य विभिन्न अधिकारियों की पत्नियों आदि की भी पहचान कर उन्हें कहीं किसी दूरस्थ रेलवे में भेजने से ही बहुसंख्यक ईमानदार, मेहनतकश, बिना माई-बाप के अधिकारियों-कर्मचारियों में एक सही संदेश जाएगा।





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देश में भारी आर्थिक संकट के बावजूद जारी हो रहे करोड़ों-अरबों के अनावश्यक टेंडर

महामारी के संकटकाल में रेल अस्पतालों की दुर्दशा, नहीं मिल रहा रेलकर्मियों को उपचार

सुरेश त्रिपाठी

कोरोना महामारी के संकटकाल में रेलवे अस्पतालों और हेल्थ यूनिटों का बुरा हाल है। कोरोना फंड के नाम पर न जाने कितनी धनराशि रेल अस्पतालों को दी गई लेकिन परिणाम क्या निकला! आज स्थिति यह है कि रेल कर्मचारी और उनके परिवार रेल अस्पतालों में जाने से कतरे रहे है।

सामान्य रोगी को भी पहले जिला अस्पताल से कोविड टेस्ट कराने की सलाह रेलवे डॉक्टर दे रहे हैं। कमाल है, जो सामान्य मरीज है, वह क्यों कोरोना का टेस्ट कराए? अस्पताल के डॉक्टर तो ऐसे पीपीई किट पहन रहे हैं, मानो सिर्फ उन्हीं पर कोरोना अटैक करेगा, बाकी जो रेलकर्मी फील्ड और कार्यालयों में काम कर रहे हैं, मानो वे सब अमृत पीकर और कर्ण के कवच-कुंडल पहनकर आए हैं।

अगर ऐसे ही रेलवे अस्पतालों के हालात हैं तो फिर रेल अस्पताल बंद कर देने चाहिए और इस मद के फंड को सही जगह इस्तेमाल किया जाना चाहिए। डॉक्टर यदि अपने चैम्बर में ओपीडी का केस देख भी रहे हैं तो मरीज उनके चैम्बर के बाहर ही खड़ा होकर अपना दुखड़ा रोएगा और वहीं से दवा लिख दी जाएगी.. ऐसी दयनीय हालत हो गई है रेल कर्मचारियों और उनके परिवारों की! लेकिन रीढ़हीन यूनियन पदाधिकारी, अधिकारी और मंत्री सब मौन हैं।

उधर उत्तर रेलवे केंद्रीय अस्पताल (एनआरसीएच) का जो हाल है, वह अब सबको पता है कि वहां लंबे समय से मरीजों की बाहर से जांच कराने में किस कदर कमीशन का खेल चल रहा था और किस तरह अस्पताल प्रमुख को एमडी के पद से निवृत्त करके जनरल प्रैक्टिस में भेजने के पांच दिन बाद पुनः उसी पद पर उनकी नियुक्ति कर दी गई। जाहिर है कि सेटिंग और पहुंच बहुत ऊपर तक रही होगी। एनआरसीएच में कमीशनखोरी का यह खेल कानाफूसी.कॉम रेलसमाचार.कॉम की “उत्तर रेलवे केंद्रीय अस्पताल में जारी कमीशनखोरी का खेल” शीर्षक खबर प्रकाशित होने के बाद रेल प्रशासन यह कमीशनखोरी का खेल रोककर कोविद सहित सभी प्रकार की जांचें अब अस्पताल में ही करना अनिवार्य कर दिया है। 

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एक तरफ केंद्र सरकार कर्मचारियों की मूल सुविधाओं पर आर्थिक संकट दिखाकर कैंची चला रही है, तो दूसरी तरफ रेलवे और अन्य सरकारी विभागों में बिना वर्तमान परिस्थिति का आकलन किए अरबों-खरबों के टेंडर निकाले जा रहे हैं। सरकार का यह कृत्य विरोधाभासी है!

जब मुद्रा संकट है और देश चौतरफा आर्थिक संकट का सामना कर रहा है, तो अनावश्यक कार्यों को कुछ समय के लिए रोक दिया जाना चाहिए। टेंडर अवार्ड करने की इतनी जल्दी क्यों है? क्या स्टेशनों पर मेकेनाइज्ड क्लीनिंग का काम विभागीय सफाई कर्मचारियों से नहीं कराया जा सकता? वह भी तब जब अगले साल तक भी सामान्य रेल यातायात और ट्रैफिक बहाल होना मुश्किल लग रहा है, तब ऐसे में अनाप-शनाप और अनावश्यक खर्च क्यों किया जाना चाहिए??

यह सब जानते-बूझते होने के बाद भी यदि यही हाल है, तो कहना ही पड़ेगा कि कोरोना कहीं न कहीं अवसर भी लेकर आया है! लेकिन कमजोर विपक्ष के कारण इस चालाकी को कोई उजागर नहीं कर पा रहा है।

प्रयागराज स्टेशन की मेकेनाइज्ड तरीके से साफ-सफाई करने के लिए टेंडर 4 साल की अवधि के लिए अभी हाल ही में निकाला गया है जिसकी कीमत 29 करोड़ रुपया है। इसी हफ्ते कानपुर सेंट्रल के लिए भी लगभग 30 करोड़ रुपये का टेंडर निकलेगा। अब इसे अवसर नहीं तो क्या कहा जाए! इस वक्त इसकी क्या जरूरत थी?

उल्लेखनीय है कि अभी दो साल पहले ही प्रयागराज और कानपुर सेंट्रल दोनों रेलवे स्टेशनों की मेकेनाइज्ड साफ-सफाई के ठेके करीब 15-15 करोड़ में दिए गए थे, अब यह राशि पुनः बढ़कर दोगुनी हो गई है, जबकि दो साल पहले तक साफ-सफाई के यही ठेके ढ़ाई-तीन करोड़ के हुआ करते थे। स्टेशनों की सफाई को लेकर यह स्थिति सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि यही हाल सभी जोनल रेलों में भी हुआ है जिसमें कमीशनखोरी की प्रमुख भूमिका है।

इसके साथ ही उत्तर रेलवे वाराणसी मंडल द्वारा हाल ही में एक ऐसा ही सफाई का टेंडर (एम-सीएनडब्ल्यू-42/2019-20, इशू दि. 30.03.2020, क्लोज्ड दि. 20.05.2020) जारी किया गया है, जिसकी सेवा-शर्तें (टर्म्स एंड कंडीशंस) देखकर ही लगता है कि उक्त टेंडर किसी खास पार्टी को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इस टेंडर की कुल एडवरटाइज्ड वैल्यू ₹64448684.81 है।

क्या रेल प्रशासन को नहीं पता कि सामान्य रेल संचालन और यात्रियों की आवाजाही कम से कम इस साल तो सामान्य होने से रही, फिर किसके लिए रेल राजस्व को लुटाने की तैयारी क्यों की जा रही है?

विभागीय सफाई कर्मचारी अधिकांश अधिकारियों, निरीक्षकों, और सुपरवाइजरों के घरों में काम कर रहे हैं और उनके एवज में रेल प्रशासन साफ-सफाई का ठेका प्राइवेट पार्टी को देने के लिए टेंडर निकाल रहा है। इसी तरह सिग्नल एंड टेलीकम्यूनिकेशन, इंजीनियरिंग आदि विभागों में भी अनावश्यक कार्यों के लिए करोड़ों-अरबों के टेंडर निकाले जा रहे हैं जिनकी कम से कम इस साल तक सामान्यतः कोई विशेष जरूरत नहीं पड़ने वाली है।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान तथाकथित यात्री सुख-सुविधाओं और साफ-सफाई सहित सिविल इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल एवं एसएंडटी के टेंडर्स की लागत जिस तरह अनाप-शनाप बढ़ी है, या जानबूझकर बढ़ाई गई है, उसको देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि भ्रष्टाचार किस सीमा तक पहुंच चुका है और इस लूट का हिस्सा कहां तक पहुंच रहा होगा? जबकि आर्थिक संकट के नाम पर देशवासियों की भावनाओं को उभारकर तथा उनकी मनोदशा को दिग्भ्रमित करके राजनीतिक रोटियां सेंकने का खेल बदस्तूर जारी है।





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सैकड़ों रेलकर्मी हो रहे हैं कोरोना संक्रमित, परंतु रेल प्रशासन को नहीं है उनके मरने-जीने की कोई परवाह!

मुंबई, दिल्ली और चेन्नई, तीनों महानगरों में कार्यरत रेलकर्मियों को है कोरोना संक्रमण का ज्यादा खतरा

सुरेश त्रिपाठी

यह सर्वविदित है कि मुंबई महानगर कोरोना वायरस की महामारी से बुरी तरह जूझ रहा है। दिन प्रति प्रतिदिन इसके मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। फिलहाल निकट भविष्य में इनके नियंत्रण की कोई उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है। तथापि मजबूरीवश राज्य सरकार को सीमित लॉकडाउन के चलते भी कामकाजी गतिविधियां शुरू करनी पड़ रही हैं। इस हेतु अब राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए उसके कहने और टिकट भाड़ा वहन करने पर सोमवार, 15 जून से मध्य एवं पश्चिम रेलवे को सीमित लोकल ट्रेनों की भी शुरुआत करनी पड़ी है।

यह सही है कि किसी महामारी अथवा किन्हीं विपरीत परिस्थितियों के कारण तमाम कामकाजी और व्यावसायिक गतिविधियां लंबे समय तक रोककर नहीं रखी जा सकतीं। तथापि फील्ड में बड़ी संख्या में कार्यरत अपने कर्मचारियों के लिए उनसे बचाव के हरसंभव उपाय अवश्य अपनाए जा सकते हैं, क्योंकि तमाम नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों ने तो अपने बचाव के सभी संभव उपाय कर लिए हैं, यही कारण है कि एकाध अपवाद को छोड़कर इनमें से कोई भी इस महामारी से ज्यादा प्रभावित होता नजर नहीं आया। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं है कि कर्मचारियों के मामले में राज्य सरकार और रेल प्रशासन दोनों प्राधिकारों द्वारा भारी कोताही बरती जा रही है।

Railway workers are waiting for workman special at platform without maintaining any physical distancing

अब जहां तक रेलकर्मियों की बात है, तो ऐसा लगता है जैसे कि उनका कोई माई-बाप ही नहीं रह गया है और उन्हें इस महामारी से निपटने तथा काम करने के लिए भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। भले ही रेलवे द्वारा इस महामारी से मरने और संक्रमित होने वाले रेलकर्मियों का एकीकृत आंकड़ा जारी नहीं किया जा रहा है, परंतु एक अनुमान के अनुसार रेलवे में कार्यरत सैकड़ों कर्मचारियों की मौत हो चुकी है। हर दिन दो-चार-दस की संख्या में ऐसी मौतें होने की खबरें किसी न किसी जोनल रेलवे से आ रही हैं। तथापि जोनो/मंडलों में इन असामयिक मौतों को लेकर कोई चिंता है, ऐसा नहीं लगता!

इस महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित रेलवे का फील्ड स्टाफ हो रहा है, जिनमें टीटीई, लोको पायलट्स, गार्ड्स, ट्रैक मेनटेनर, सिग्नल मेनटेनर, कमर्शियल एवं ट्रैफिक स्टाफ प्रमुख रूप से शामिल है। इसके अलावा ऑफिस स्टाफ भी इसलिए प्रभावित हो रहा है, क्योंकि वहां भी काम करते हुए फिजिकल डिस्टेंसिंग नियमों का पर्याप्त रूप से पालन करना संभव नहीं हो पा रहा है, क्योंकि निर्देशित 20% स्टाफ के बजाय लगभग पूरे ऑफिस स्टाफ को जबरन ड्यूटी पर बुलाया जा रहा है। इस सब के लिए अधिकारियों की प्रशासनिक एवं अनुशासनिक दादागीरी और मनमानी भी जिम्मेदार है।

उदाहरण स्वरुप पश्चिम रेलवे के वसई स्टेशन पर पिछले हफ्ते चार रेलकर्मियों को कोरोना संक्रमित पाया गया था। इसके लिए उन्हें इलाज हेतु भेजने के बाद पता चला कि उन चारों के संपर्क में करीब 45-46 जो अन्य रेलकर्मी भी आए थे, उन्हें नियमानुसार 14 दिन के लिए होम कोरेंटीन की एडवाइस की गई थी और पूरा वसई स्टेशन बंद कर दिया गया था। परंतु अभी उनका यह निर्धारित पीरियड पूरा भी नहीं हुआ था कि राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए सोमवार, 15 जून से लोकल शुरू होते ही उन सभी को फौरन ड्यूटी पर पहुंचने का आदेश मुंबई सेंट्रल मंडल के संबंधित वाणिज्य अधिकारी द्वारा दनदना दिया गया।

इसी तरह पश्चिम रेलवे के ही सूरत रेलवे स्टेशन पर एक चीफ टिकट इंस्पेक्टर (सीटीआई) के 2 जून को कोरोना पॉजिटिव, जिसकी जांच रिपोर्ट 12 जून को मिली, पाए जाने के बाद वहां के 21-22 स्टाफ को होम कोरेंटीन किया गया था। इनमें दो एडीआरएम और एक डीसीएम जैसे बड़े अधिकारी भी शामिल थे। यह सभी लोग उक्त सीटीआई के संपर्क में आए थे। इसी प्रकार उधना रेलवे स्टेशन पर भी एक बुकिंग क्लर्क को पॉजिटिव पाए जाने पर वहां के स्टेशन स्टाफ को भी आइसोलेट किया गया।

वसई और सूरत के मामलों में मंडल अधिकारियों द्वारा बरती गई लापरवाही तथा मनमानी का विरोध दोनों यूनियनों (डब्ल्यूआरएमएस/डब्ल्यूआरईयू) के मंडल एवं मुख्यालय पदाधिकारियों द्वारा किया गया है, परंतु उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई, क्योंकि किसी की भी नहीं सुनने का जैसा रवैया केंद्र सरकार ने अपना रखा है, वैसा ही रवैया केंद्र सरकार के अधिकारियों ने भी लंबे समय से अपनाया हुआ है। नतीजा यह है कि कोई भी कितना ही चिल्लाता रहे, किसी की कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

इसके अलावा दक्षिण रेलवे, उत्तर रेलवे की स्थिति भी काफी डरावनी है। पिछले हफ्ते दक्षिण रेलवे के पेरंबूर, चेन्नई स्थित प्रमुख रेलवे अस्पताल में एक साथ बीस रेलकर्मियों की मौत की खबर स्थानीय अंग्रेजी दैनिक में प्रकाशित हुई थी। इसी तरह उत्तर रेलवे मुख्यालय बड़ौदा हाउस और भारतीय रेल के मुख्यालय “रेल भवन” में भी कई अधिकारी और कर्मचारी इस महामारी से प्रभावित हो चुके हैं। उत्तर रेलवे के सेंट्रल हॉस्पिटल की दुर्गति, कोविद केसेस की जांचों में कमीशनखोरी और एमडी को जनरल प्रैक्टिस में भेजे जाने के बाद पुनः उसी पद पर उनकी पुनर्नियुक्ति में रेल प्रशासन की पूरी मनमानी भी सामने आ चुकी है।

अन्य जोनल रेलों में भी उपरोक्त से स्थिति अलग नहीं है। मगर मुंबई, दिल्ली और चेन्नई में जो हालत चल रही है, उसको देखते हुए इन तीनों महानगरों में कार्यरत अधिकांश रेलकर्मियों को संक्रमण का खतरा ज्यादा है। अतः यदि सेफ और सिक्योर वर्किंग सुनिश्चित करनी है, तो रेल प्रशासन को अपने कर्मचारियों के लिए इस महामारी से बचाव के पर्याप्त इंतजाम करने के साथ ही केंद्रीय गृहमंत्रालय द्वारा जारी की गई नियमावली का अक्षरशः पालन करवाना भी सुनिश्चित करना होगा।

Chief Typist of SrDOM/G office, Mumbai Division, Central Railway, B. R. Damse expired on Monday, 15th June morning at Kalyan Railway hospital. He was admitted in Kalyan Railway Hospital on Sunday, 14th June of breathlessness. As per Doctors of Kalyan Railway Hospital, a case of suspected Covid. As per sources, he last attended office on 5/6/2020. Entire SrDOM office is being fully sanitised on Monday. The Office was Last sanitised on 12/6/2020.

“It is come to know that a vacant building, behind building no.8 is handed over to BMC for covid-19 patients, if it is true we all have to protest against it, to save containment of our Mazgaon Railway colony”, this message viral on social media on Saturday-Sunday in between employee and officers who resides at Mazgoan Railway colony.








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जब हम कोरोना से लड़ते हुए देश सेवा में लगे थे, तब सरकार हमारी पीठ पर खंजर घोंप रही थी -शिवगोपाल मिश्रा

यह समय चुनौतीपूर्ण है, इसलिए हमें कोरोना से डरकर नहीं, लड़कर यूनियन का काम करना होगा -महामंत्री

एनआरएमयू, लखनऊ मंडल की समीक्षा बैठक संपन्न

नई दिल्ली: नार्दर्न रेलवे मेंस यूनियन, लखनऊ मंडल की समीक्षा बैठक शनिवार, 30 मई को संपन्न हुई। बैठक में महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने कहा कि ये वक्त चुनौतीपूर्ण है, इसलिए हमें कोरोना से डरकर नहीं, लड़कर यूनियन का काम करना होगा। उन्होंने कहा कि ये सही है कि कोरोना के चलते चौतरफा दहशत का माहौल है। फिर ये जल्दी खत्म होने वाला भी नहीं है। ऐसे में हम सब घर तो नहीं बैठ सकते है। परंतु सावधानी के साथ अपना काम भी करना है और यूनियन की गतिविधियों को भी जारी रखना है।

वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए लखनऊ मंडल की समीक्षा बैठक में महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने सभी मामलों पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि लॉकडाउन के बावजूद रेलकर्मचारी पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ ट्रेनों का संचालन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन से जब पूरा देश ठप हो गया, लोग घरों में बैठ रह गए, तब देशवासियों की चिंता रेलकर्मियों ने की, क्योंकि अगर इस दहशत के माहौल में मालगाडियों और पार्सल ट्रेनों का संचालन न होता, तो कई राज्यों में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति ठप हो जाती।

उन्होंने कहा कि रेलकर्मचारियों ने मालगाड़ियों, पार्सल ट्रेनों का संचालन कर अनाज, फल, सब्जी, दूध की ही आपूर्ति को नहीं, बल्कि अन्य जरूरी सामानों की भी किसी राज्य में कमी नहीं होने दी। जब राज्य सरकारें मजदूरों को उनके घर पहुंचाने में नाकाम साबित हुईं, तो फिर किसी तरह की चिंता किए बगैर हजारों ट्रेनों के जरिए 50 लाख से ज्यादा मजदूरों को उनके घर रेलकर्मियों ने ही पहुंचाया।

महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि जब हम कोरोना से लड़ते हुए देश की सेवा कर रहे थे, तब हमारी सरकार हमारी पीठ थपथपाने के बजाय हमारी पीठ पर हमला कर रही थी। उस दौरान सरकार श्रमिक विरोधी काम करते हुए कर्मचारियों को मिल रही सुविधाओं में कटौती करने की साजिश में जुट गई। उन्होंने कहा कि एक तरफ तो रेलकर्मचारियों ने बिना मांगे पीएम केयर फंड में 151 करोड़ रुपये का योगदान दिया, तो दूसरी तरफ सरकार ने हमारी पीठ पर खंजर घोंपा। वह हमसे कहते तो हम कुछ और भी मदद करते, लेकिन ऐसा न करके सरकार ने डीए फ्रीज करने का एकतरफा फैसला सुना दिया।

उन्होंने कहा कि एआईआरएफ और एनआरएमयू का इतिहास है कि हमने कभी किसी भी सरकार की मनमानी नहीं चलने दी। हमने कर्मचारी हितों के साथ कभी समझौता नहीं किया। इसलिए इस मामले पर फेडरेशन ने अपना रुख साफ कर दिया कि सरकार की ये चालबाजी हमें मंजूर नहीं है।

महामंत्री ने कहा कि फिलहाल तो डीए को फ्रीज करने का मामला हो, या  फिर पदों को खत्म करने की बात हो, पुरानी पेंशन की बहाली समेत अन्य दूसरे मुद्दों पर एनआरएमयू और फेडरेशन लगातार सरकार के संपर्क में रहकर अपना विरोध जताती रही है। जब देखा गया कि इस सबके बाद भी सरकार का रवैया कर्मचारियों के खिलाफ ही है, तो एआईआरएफ की स्टैंडिग कमेटी की बैठक में संघर्ष का निर्णय लिया गया।

उन्होंने कहा कि इसी क्रम में एक से छह जून तक तो हम राष्ट्रीय स्तर पर जनजागरण करेंगे और आठ जून को काला दिवस मनाने के लिए काली पट्टी बांधकर काम करेंगे। इसके बाद भी अगर हमारी बात नहीं सुनी जाती है, तो आगे की रणनीति पर विचार किया जाएगा।

उन्होंने दोहराया कि अगर सरकार को बैकफुट पर लाना है, तो हमें निचले स्तर पर गर्मी पैदा करनी होगी। इसके बिना काम चलने वाला नहीं है। महामंत्री ने कहा कि इन हालात में हमें कोरोना से डरकर घर नहीं बैठ जाना है, बल्कि कोरोना से भी लड़कर सरकार का भी मुकाबला करने को तैयार रहना है।

महामंत्री ने संगठन की समीक्षा बैठक में लखनऊ मंडल की तारीफ की और कहा कि मेंबरशिप का मामला हो या फिर केंद्र से निर्धारित किए गए कार्यक्रम हों, हर मामले में लखनऊ मंडल का प्रदर्शन बेहतर रहा है। उन्होंने युवाओं को संगठित करने पर जोर दिया। संगठन में दो शाखाओं के चुनाव भी होने हैं, लिहाजा सभी शाखा सचिव अपना  इलेक्टोरल तैयार कर केंद्र को भेज दें, ताकि आगे की कार्रवाई की जा सके।

केंद्रीय अध्यक्ष एस. के. त्यागी ने लखनऊ मंडल के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि अभी तो देख रहा हूं कि कोरोना का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, इसलिए सावधानी  बरतनी होगी, क्योंकि  इसकी चपेट में कुछ रेलकर्मचारी भी आ गए हैं, लिहाजा रेल भवन ही नहीं बड़ौदा हाउस को भी बंद करना पड़ा है। उन्होंने कहा कि रेलकर्मियों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। सरकार ने हमें कोरोना वारियर्स तो माना, लेकिन दूसरे विभागों की तरह हमें किसी तरह की सहूलियत नहीं दी। इससे रेल कर्मचारियों में रोष होना स्वाभाविक है। आने वाला समय काफी चुनौतीपूर्ण है, इसलिए हमें काम के साथ अपनी सुरक्षा का भी पूरा ख्याल खुद ही रखना होगा।

केंद्रीय उपाध्यक्ष प्रवीना सिंह ने कहा कि लखनऊ मंडल विपरीत हालात में भी अच्छी मेंबरशिप की है। इसके लिए पूरी टीम बधाई की पात्र है। उन्होंने कहा कि मंडल  में महिला संयोजक के रिटायर होने के बाद ये पद रिक्त है, इस पर अगर जल्दी नियुक्ति हो जाए तो महिलाओं को संगठित करने में और सुविधा होगी।

नेशनल यूथ कन्वीनर प्रीति सिंह ने मंडल में युवाओं के बीच हुए कार्यों पर चर्चा की। इस कांफ्रेंस को केंद्रीय उपाध्यक्ष एस. यू. शाह, कोषाध्यक्ष जोनल यूथ कन्वीनर मनोज श्रीवास्तव ने भी संबोधित किया।

मंडल अध्यक्ष राजेश सिंह ने कहा कि ये सही है कि कोरोना की वजह से हमारे संगठन के कार्यों पर थोड़ा असर पड़ा, लेकिन जब हम सब ने देखा कि महामंत्री खुद इतनी देर तक काम कर रहे हैं, रोज आफिस आ रहे हैं, तो अपने लोगों ने भी संगठन के काम में कोई कोताही नहीं की और अपना प्रदर्शन बेहतर किया। उन्होंने कहा कि हमारी तैयारी है और जल्दी शाखास्तर पर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए कार्यक्रम को आगे बढ़ाया जाएगा।

मंडल मंत्री आर. के. पांडेय ने संगठन के कार्यों की विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि कोरोना के दौरान हमारे साथियों ने तमाम सामाजिक कार्यों में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। हम लोगों ने भूखे मजदूरों को श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में खाने के पैकेट का वितरण किया, लगेज पोर्टरों की मुश्किल घड़ी में मदद की गई। ऐप बेस्ट ट्रांसपोर्टर्स को भी राहत सामग्री का वितरण किया गया।

उन्होंने कहा कि इस दौरान कुछ रेलकर्मियों की भी कुछ समस्याएं रहीं, उनका भी समाधान किया गया। कई मसलों में केंद्रीय नेतृत्व से भी काफी मदद मिली, जिससे हम ये सब कर पाने में कामयाब हुए। उन्होंने आश्वस्त किया एक से छह जून के बीच जनजागरण अभियान के तहत हमारी तैयारी पूरी है और हम बेहतर प्रदर्शन करेंगे। इसके  अलावा आठ जून को हर कर्मचारी काली पट्टी जरूर बांधेगा, इसकी तैयारी की जा चुकी है।

कांफ्रेंस में सेवानिवृत्त हो रहे सहायक मंडलमंत्री घनश्याम पांडेय के कार्यों की भी सराहना की गई। इस दौरान मीटिंग को मुख्य रूप से राकेश कनौजिया, सुधीर तिवारी, एस. के. सिंह, रंजन सिह, संजय श्रीवास्तव, सुनिल सिंह, धीरेन्द्र सिंह, बिंदा प्रसाद, राकेश कुमार पांडेय, मदन गोपाल मिश्रा, राजकुमार, हीरा लाल और अजय श्रीवास्तव ने भी संबोधित किया।

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क्या रेलकर्मियों और उनके रहनुमाओं को सुनाई दे रहा है सरकारी रणनीति का ब्रम्हनाद!

रेल प्रशासन, कोरोनावायरस के भय को बहुत खूबी के साथ भुना रहा है, क्योंकि उसे मालूम है कि इस माहौल में रेलकर्मी किसी प्रकार के आंदोलन को चाहकर भी अंजाम नहीं दे सकेंगे, जबकि उनके संगठन पहले ही मौन अवस्था में हैं। कभी कर्मचारियों का वेतन काटा जा रहा है, तो कभी टीए देने से इंकार किया जा रहा है। डेढ़ साल का डीए/आरए तो सरकार पहले ही हड़प चुकी है, तथापि जब-तब सोशल मीडिया पर बोगस पोस्ट डालकर भ्रमित किया जा रहा है कि डीए/आरए देने के लिए सरकार तैयार हो गई है। जबकि प्रशासन की कुटिल नीतियां बदस्तूर जारी हैं।

Railway workers are waiting for workman special at platform without maintaining any physical distancing

इसी रणनीति के तहत रनिंग स्टाफ को जानबूझकर 20 से 32 घंटे रनिंग में रखा जा रहा है। यह स्थिति लगभग सभी मंडलों में है। कुछ मंडलों में हालांकि रनिंग रूम को आंशिक या पूर्ण रूप से बंद कर दिया गया है। काम के बाद फंसे कर्मचारियों के लिए नियमित रूप से टॉवर वैगन या कर्मचारी स्पेशल चलाई जा रही हैं, मगर उनमें फिजिकल डिस्टेंस का कोई ध्यान नहीं रखा जा रहा है।

रनिंग रूम में गार्ड, ड्राइवर, सहायक ड्राइवर, सामूहिक रूप से रहने को विवश हैं, जिससे उनमें कोरोना जैसी महामारी के संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है। कॉमन शौचालय, कॉमन स्नानघर, कॉमन खाने के बर्तन उनको कोरोना के संक्रमण का शिकार बना सकते हैं। रनिंग रूम में सेनेटाइजेशन की कोई उचित व्यवस्था नहीं की गई है। वहां जो लोको पायलट ठहरते हैं, उन्हें दूसरे की इस्तेमाल की गई मच्छरदानी और बिस्तर दिया जाता है।

काम नगण्य होने के बावजूद ऐसी महामारी की अवस्था में क्रू को रनिंग रूम में रखना सुरक्षित नहीं है। यह बात जानते हुए भी प्रशासन कोरोना संक्रमण को क्यों बढ़ावा दे रहा है, समझ से परे है। क्रू राउंड ट्रिप वर्किंग करने को तैयार है, फिर भी उन्हें जबरन रनिंग रूम में संक्रमित होने के लिए रखा जा रहा है। इस तरह जानबूझकर मौत के मुंह में ढ़केला जा रहा है।

कोरोना महामारी के कारण रनिंग रूम में रहना अत्यंत असुक्षित है। रेल प्रशासन संक्रमण से लापरवाह होकर कर्मी दल के लिए कोई उचित व्यवस्था नहीं कर रहा है, जिससे काम से मुक्त कर्मी आसानी से वापस अपने ठिकाने पर नहीं पहुंच पा रहा है।

सभी रनिंग रूम कोरोना के माहौल में पूर्णतः असुक्षित हैं। क्रू के संक्रमित होने की प्रबल संभावना और ऐसे माहौल में रहने से क्रू नॉर्मल नहीं रह सकता। यही कारण है कि किसी अनहोनी की आशंका से उनका ब्लड प्रेशर हमेशा बढ़ा हुआ रहता है।

रेलवे बोर्ड के आरबीई नं.37/2010, पत्रांक संख्या ई(एलएल)/2009/एचईआर/1 दि. 26.02.2010 तथा पत्रांक संख्या ई(एलएल)/2016/एचपीसी/7 दिनांक 23.11.2016 का उल्लंघन कर रनिंग स्टाफ/क्रू को कोरोना संक्रमण काल में जबरन हेडक्वार्टर से 72 से 90 घंटे बाहर रखा जा रहा है। ऐसे में जब कोई क्रू, कंट्रोल से बात करता है, उसे एक ही जवाब मिलता है, “आपको हेडक्वार्टर से निकले 72 घंटे नहीं हुआ है, आप अभी बाहर ही रहिए।” रनिंग स्टाफ की समस्याओं पर अधिकारियों का ध्यान आकृष्ट करने की उनकी सभी कोशिशें बेकार साबित हो रही हैं।

सामान्य तौर पर वर्तमान में कोचिंग गाड़ियों का मूवमेंट जो लॉकडाउन से पहले था उससे डेढ़ गुना ज्यादा मूवमेंट हो रहा है। कोविड के चक्कर में रनिंग स्टाफ एवं कोचिंग गाड़ियों का स्टेटस लॉस के साथ गाड़ियों का संचालन कराया जा रहा है।

रेल प्रशासन में जोनल एवं मंडल स्तर के अधिकारी नियमों का उल्लंघन करके रनिंग स्टाफ को उसके 30% वेतन से वंचित कर रहे हैं। गाड़ी न चलाने का निर्णय रेल प्रशासन ने सरकार के आदेश पर कोविड-19 महामारी को फैलने से रोकने के लिए लिया था। जहां सभी कर्मियों को उनका पूरा वेतन मिल रहा है, वहीं स्टाफ को पूरे वेतन से वंचित रखने का प्रयास जोनल एवं मंडल स्तर के अधिकारियों द्वारा किया गया है।

ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन का मानना है कि ऐसा नहीं है कि अधिकारियों को नियम मालूम नहीं हैं, परंतु उनके द्वारा प्रशासन की एक सोची-समझी रणनीति के अंतर्गत रनिंग स्टाफ को 30% वेतन से वंचित करने का जानबूझकर प्रयास किया गया है।

एसोसिएशन का कहना है कि अधिकारी अच्छी तरह से जानते हैं कि ये 30%, वेतन के रूप में परिभाषित है और स्टाफ जब नॉन-रनिंग कार्य की स्थिति में रहता है, या प्रशासन की नीति के अंतर्गत उसको जबरदस्ती घर बैठा दिया जाता है, उन सभी स्थितियों में स्टाफ को उसके 30% वेतन का भुगतान करना ही होता है और वह 30 दिनों के लिए बेसिक के 30% के हिसाब से देना होता है। यह राष्ट्रपति द्वारा आदेशित नियमों के आधार पर निर्धारित है।

बावजूद इसके रेल प्रशासन जानबूझकर स्टाफ को 30% वेतन का भुगतान नहीं कर रहा है और ऐसा करके अपनी स्टाफ विरोधी नीति प्रदर्शित कर रहा है। जबकि सभी कर्मचारियों को उनका वेतन महंगाई भत्ता, मकान किराया भत्ता, टीपीटीजी इत्यादि का भुगतान किया जा रहा है।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि रेलवे बोर्ड द्वारा सिर्फ एनएचए, टीए और छुट्टी भुगतान तथा सीईए का भुगतान संबंधित थोड़े समय के लिए रोकने का आदेश दिया गया था। परंतु स्टाफ के पूर्ण वेतन, डीए, मकान किराया भत्ता, एडीशनल रनिंग अलाउंस, पूर्ण रनिंग एलाउंस, जिसका रेल प्रशासन को पूरा भुगतान करना था, बिना किसी आदेश के नियम विरुद्ध मंडल स्तर पर संबंधित अधिकारियों द्वारा गैरकानूनी तरीके से उसके पूर्ण वेतन से वंचित किया जा रहा है, जो कि पेमेंट ऑफ वेजेज ऐक्ट के नियमों का सीधा उल्लंघन है।

ऐसी स्थिति में स्टाफ ने अपनी बात उचित स्तर पर और सही तरीके रखने का भी प्रयास किया। इसके बावजूद यदि रेल अधिकारी अपनी स्टाफ विरोधी नीति को जारी रखते हैं, तब यह जरूरी है कि समस्त स्टाफ को इसका विरोध करने की रणनीति के तहत एकजुट होकर फील्ड में उतरना होगा। यह कहना है लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन का।

इसके अलावा एसोसिएशन द्वारा अन्य कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर रेल कर्मचारियों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की जा रही है। जैसे कि यात्री गाड़ियों की बुकिंग केवल आईआरसीटीसी के माध्यम से की जा रही है। इससे कमर्शियल स्टाफ पर गाज गिरने के सीधे संकेत मिल रहे हैं। स्टाफ का 4200 से ऊपर का मामला अब खतरे की घंटी लग रहा है।

मल्टी स्किलिंग की रणनीति पर भी इसी उद्देश्य से अमल करने की तैयारी है। ईओटीटी लगाकर गार्ड के पदों का पत्ता साफ करने की तैयारी की जा रही है। स्टेशन मास्टर एवं सिग्नल मेनटेनर पोस्ट मिक्स करके दुर्घटनाओं की लगाम लॉकिंग तोड़ने का फार्मूला लाया जा रहा है।

अलग-अलग जिलों और राज्यों से आने वाले लोगों को आने के बाद क्वारेंटीन किया जा रहा है, पर रेलकर्मियों को ‘क्वारेंटीन का वैक्सीन’ समझकर काम लिया जा रहा है।

10/30/50 प्रतिशत स्टाफ से यानि कम से कम स्टाफ से काम करवाने का बहाना बनाकर कम स्टाफ से काम चलाने की भावी रणनीति की टेस्टिंग चल रही है।

कारखानों में वास्तविक रेल कार्य से हटाकर अन्य कार्यों में स्टाफ का इस्तेमाल करके और उसकी तारीफों के पुल बांधकर कम स्टाफ में रेल कार्य की टेस्टिंग की जा रही है और स्टाफ इस तारीफ की अफीम की पिनक में मस्त है।

ऑपरेटिंग रेश्यो बहुत ज्यादा बताया जा रहा है। रेलवे ने केवल मालगाड़ियां चलाकर अधिक मुनाफा कमाया है। कम यात्रियों के साथ आईआरसीटीसी के माध्यम से गाड़ी का ऑपरेटिंग खर्च लेकर गाड़ी संचालन कई बड़े सवाल खड़े कर रहा है।

कार्य न कराकर स्टाफ को घर में रुकने की बात कहकर बैक डोर से उसके भत्तों पर कैंची चलाई जा रही है। इसी रणनीति के तहत कर्मचारियों को अप्रैल महीने के टीए का भुगतान करने से मना कर दिया गया है और मान्यता प्राप्त श्रमिक संगठन सिर्फ एक पत्र लिखकर चुप बैठे हैं।

देखें, सोशल मीडिया पर झूठ कैसे फैलाया जाता है: दि. 12.05.2020 को ये पत्र एनएफआईआर के महामंत्री डॉ एम राघवैया ने प्रधानमंत्री द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ के मेगा पैकेज का हवाला देते हुए केंद्रीय कर्मचारियों को डीए देने के संदर्भ में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण को लिखा था, जिसे भक्तों ने सरकार द्वारा डीए कटौती वापस लिए जाने और 1 जनवरी 2020 से डीए लागू करने की घोषणा के रूप में प्रचारित कर दिया।

रेल प्रशासन और सरकार का शायद यह मानना है कि जब चीन अधिक रेल किलोमीटर मात्र सात लाख स्टाफ से मेनटेन करता है, तब भारत में 12 लाख 17 हजार स्टाफ की क्या जरूरत है, जबकि यहां चीन से काफी कम किलोमीटर रेल है।

रेल कर्मचारियों को कोरोना वारियर्स केवल नाम के लिए कहा जा रहा है, मगर 50 लाख का बीमा कवर नहीं दिया जा रहा है। सरकारी कर्मचारियों को कामचोर कहने वाले अभी भी गाहे-बगाहे शगूफा छोड़ रहे हैं।

भारत सरकार द्वारा अपनी इसी रणनीति के तहत श्रम कानूनों को सस्पेंड किया जा रहा है। मात्र 300 रुपये में दिहाड़ी वाले ठेका कर्मचारी रखने के सिस्टम को तो पहले ही मंजूरी दे दी गई थी। परंतु इस सबके प्रति कहीं कोई सक्रिय हलचल नजर नहीं आ रही है।

इसी रणनीति के तहत रेलवे बोर्ड द्वारा मंगलवार, 12 मई 2020 को एक नोटिफिकेशन (सं. ई(जी)/2020/मिस्लेनि./05) निकालकर इंडियन रेलवे स्टैब्लिशमेंट कोड (आईआरईसी) के अपडेशन के नाम पर इंडियन रेलवे स्टैब्लिशमेंट मैनुअल (आईआरईएम) के कुछ महत्वपूर्ण प्रावधानों को आपस में मर्ज करने का निर्णय चुपचाप ले लिया गया। इसे रेलवे की आठ ग्रुप ‘ए’ संगठित सेवाओं के मर्जर की भी छुपी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

इन और ऐसे तमाम तथ्यों का जो मतलब निकलता है वह मतलब अवश्य निकाला जाना चाहिए, क्योंकि रोम-रोम में जब कम्पन होता है, तो बह्मनाद भी तेज सुनाई देता है। परंतु क्या सरकारी कर्मचारियों और उनके रहनुमाओं को भी यह नाद सुनाई दे रहा है?

#AILRSA #AIRF #NFIR #FROA #IRPOF








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परिचालन दक्षता में सुधार के लिए 21 विषयों पर काम कर रही भारतीय रेल

कोविड-19 लॉकडाउन के बाद रेल परिचालन, अनुरक्षण, निर्माण और अन्य संबंधित गतिविधियों के लिए योजना तैयार करने हेतु बनी समिति का नोडल अधिकारी महाप्रबंधक, उत्तर मध्य रेलवे/उत्तर रेलवे राजीव चौधरी को बनाया गया है

Rajeev Choudhary, GM/NCR-NR

रेल मंत्रालय ने भारतीय रेल की परिचालन दक्षता में सुधार करने के लिए 21 विषयों की पहचान की है। इस संबंध में प्रत्येक विषय के लिए एक नोडल अधिकारी और रेलवे बोर्ड के एक समन्वय अधिकारी सहित विभाग प्रमुखों, कार्यकारी निदेशकों, महाप्रबंधकों सहित वरीष्ठ अधिकारियों की समितियों का गठन किया गया है।

ये समितियां लॉकडाउन अवधि के दौरान विभिन्न डिजिटल प्लेटफार्मों का उपयोग करके बैठक, चर्चा आदि के माध्यम से विचार-विमर्श करेंगी और समन्वय अधिकारी के माध्यम से अपनी रिपोर्ट रेल मंत्रालय को प्रस्तुत करेंगी। राष्ट्रीय ट्रांसपोर्टर की परिचालन दक्षता में सुधार के लिए भारतीय रेल द्वारा पहचाने गए विषय, जिनकी विभिन्न समितियों द्वारा समीक्षा की जाएगी, निम्नवत हैं:

  नई दिल्ली-हावड़ा, नई दिल्ली-चेन्नई, नई दिल्ली- मुंबई, हावड़ा- मुंबई और चेन्नई-हावड़ा खंडों पर  ट्रेनों का ज़ीरो बेस्ड समय सारणीकरण।

•  भारतीय रेलवे के केंद्रीय प्रशिक्षण संस्थानों द्वारा मैनुअलों की समीक्षा और अद्यतीकरण।

•  सेक्शनों और टर्मिनलों पर कंजेशन को कम करने के लिए टाइमलाईन और रोड मैप के साथ महत्वपूर्ण कार्यों की पहचान करना।

  सेक्शन और लूप लाइनों में गति बढ़ाने के लिए वैधानिक सीआरएस निरीक्षण के लिए आवश्यक विभिन्न दस्तावेजों की समीक्षा और प्रोसेसिंग।

•  रेल संचालन और अनुरक्षण में बचत करने और दक्षता लाने के लिए सामग्रियों की खपत की समीक्षा।

•  फिजिकल फ़ाइल मूवमेंट से बचने और साथ ही कार्य कुशलता लाने के लिए भारतीय रेल की सभी इकाइयों में ई-ऑफिस का कार्यान्वयन ।

•  लोकोमोटिव, कोच, वैगन्, सिग्नलिंग गियर आदि जैसे विभिन्न परिसंपत्तियों के अनुरक्षण अवधि  की समीक्षा और दुनिया भर के सर्वोत्तम  मापदंडों के साथ तुलना।

•  तकनीकी प्रगति के दृष्टिगत  विभिन्न रेल परिसंपत्तियों के कोडल लाइफ़ और रिप्लेसमेंट मानकों की समीक्षा।

•  दक्षता और पारदर्शिता में सुधार के लिए कॉन्ट्रैक्टों के तहत निष्पादित कार्यों के आंकलन के लिए ऑनलाइन मेज़रमेंट बुक की शुरुआत करना।

•  परिवहन के लिए नई वस्तुओं की पहचान करने और रेल के माध्यम से परिवहन में बढ़ोत्तरी के लिए व्यावसायिक अध्ययन।

•  अधिक से अधिक रेल प्रतिष्ठानों जैसे कारखानों, अस्पतालों, कोचिंग डिपो, पिटलाइन, लोडिंग पॉइंट, डिपो, स्टेशन, कार्यालयों, ट्रैक्शन सबस्टेशन, रिले रूम आदि को सीसीटीवी निगरानी के तहत लाना।

•  रेल की भूमि आदि के संबंध में रेलवे अधिनियम का अध्ययन और सुझाव।

•  डीएफसी परियोजना के पूरा होने के दृष्टिगत   वैगन, कोच और लोकोमोटिव आदि आवश्यकताओं की समीक्षा।

•  ट्रैक्शन और गैर-ट्रैक्शन ऊर्जा / ईंधन बिल में कमी लाने के उपायों संबंध में।

•  रेल के वविभिन्न रेलवे क्षेत्रों में डेटा एनालिटिक्स, आर्टीफीशियल इंटैलिजेंस जैसी तकनीक का उपयोग ।

•  व्यय कम करने और आय में सुधार करने के उपाय।

•  ऑन बोर्ड हाउसकीपिंग गतिविधि की व्यापक समीक्षा ।

•  कर्मचारियों की मल्टी स्किलिंग और नए क्षेत्र में री- स्किलिंग करना।

•  ट्रेन संचालन के लिए एंड ऑफ ट्रेन टेलीमिट्री और अन्य प्रौद्योगिकियों का प्रयोग ।

  •  मालगाड़ियों की गति को बढ़ाकर माल और यात्री गाड़ियों के बीच की गति के अंतर को कम करना।
  • कोविड -19 लॉकडाउन के बाद भारतीय रेल पर संचालन अनुरक्षण, निर्माण और विनिर्माण गतिविधियों के लिए की कार्य योजना – यह मद कोविड -19 लॉकडाउन के बाद भारतीय रेल के लिए सबसे महत्वपूर्ण है और इस पर विचार एवं कार्यान्वयन उत्तर मध्य रेलवे, पूर्व तटीय रेलवे, मध्य रेल, इंटीग्रेटेड कोच फैक्ट्री के महाप्रबंधकों की समिति द्वारा किया जा रहा है और उत्तर मध्य रेलवे तथा उत्तर रेलवे के महाप्रबंधक श्री राजीव चौधरी इस समिति के नोडल अधिकारी हैं।







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आरक्षण का लाभ नीचे तक नहीं जाने दे रही क्रीमी लेयर –सुप्रीम कोर्ट

निर्वाचित सरकारों में आरक्षण के मौजूदा स्वरूप से उपजी विकृतियों से निपटने की इच्छाशक्ति नहीं है

प्रेमपाल शर्मा

सर्वप्रथम सुप्रीम कोर्ट के निर्णय (22 अप्रैल 2020) की मुख्य बातें:

* आरक्षण की पात्रता सूची एससी/एसटी/ओबीसी की समीक्षा होनी चाहिए, ताकि नीचे तक इसका लाभ पहुंच सके।

* इन सभी वर्गों की सत्ता में भागीदारी और इनके साथ हुए भेदभाव को दूर करने के लिए आरक्षण का प्रावधान शुरुआत में 10 वर्ष के लिए किया गया था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। समय-समय पर संशोधन तो हुए, लेकिन वर्गों की सूचियों की समीक्षा कभी नहीं हुई, जिससे लगातार आरक्षण का लाभ उठा रहे लोग इन सुविधाओं को अपने ही वर्ग में नीचे तक नहीं पहुंचने दे रहे।

* ऐसा लगता है कि निर्वाचित सरकारों में आरक्षण के मौजूदा स्वरूप से उपजी चुनौतियों, विकृतियों से निपटने की इच्छाशक्ति ही नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय पर विचार करने से पहले भारतीय न्यायपालिका के बारे में ज्यां द्रेज और अमर्त्य सेन की किताब (An uncertain glory: India & it’s contradiction – भारत और उसके विरोधाभास) का एक अंश-

“भारतीय न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के विपरीत ज्यादा स्वतंत्र है। यहां न्यायपालिका की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बीच कोई द्वंद नहीं है। भारत में न्यायपालिका की स्वतंत्रता ने अदालतों, खासकर उच्चतम न्यायालय को अपने फैसलों में क्षमता तथा न्याय के केंद्रीय मुद्दों पर स्वतंत्र एवं शक्तिशाली निर्णय करने में मदद की है। जैसे मौलिक अधिकारों की सुरक्षा, नीति निर्देशक सिद्धांतों में दिए गए आर्थिक तथा सामाजिक अधिकार, आदि.. चुनावी राजनीति में हार-जीत के प्रश्न और निहितस्वार्थ विधायिका, कार्यपालिका को ज्यादातर सही मुद्दों से भटकाकर लोकतंत्र का नुकसान ही करते हैं..।”

आरक्षण के प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी सख्त टिप्पणी पहली बार नहीं की है। भारत सरकार के शासन में जितनी मुकदमेबाजी आरक्षण के प्रश्न पर हुई है और शायद संविधान में जितने संशोधन इस मुद्दे पर हुए हैं, दुनिया भर में भी शायद उसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलेगा। विद्वान लेखक ज्यां द्रेज-अमर्त्य सेन का निष्कर्ष इस बात को ही सिद्ध करता है कि देश के दूरगामी हितों को देखने की बजाय राजनीतिक सत्ताएं सही निर्णय लेने में कितनी कमजोर हैं।

इसी निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने जोड़ा है कि जो भी आरक्षण है, संसद द्वारा स्वीकृत, वह वैसा ही बना रहेगा, लेकिन उसके सही हकदारों तक यह लाभ, यह सुविधाएं निश्चित रूप से पहुंचनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट भी इसी देश, इसी समाज का हिस्सा है। याद कीजिए 2016 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश जोसेफ कुरियन ने कहा था कि, “जब क्रीमी लेयर का सिद्धांत ओबीसी पर लागू है, तो वह एससी-एसटी पर भी क्यों नहीं?” उन्होंने व्यक्तिगत अपना उदाहरण पेश करते हुए कहा था कि, “मेरे बेटे को मिलने वाली सुविधाएं और मेरे ड्राइवर को मिलने वाली सुविधाओं में बहुत अंतर है। एक जाति का होने के बावजूद भी मुझे या मेरे जैसे अमीरों को वह सुविधाएं क्यों मिलनी चाहिए?”

दूसरे शब्दों में जब तक सिर्फ जाति के इस इकहरे पैमाने से आरक्षण मिलता रहेगा, तो वह नीचे तक कभी नहीं पहुंचेगा। वर्ष 2006 में नागराज के मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्य पीठ ने प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए भी कुछ ऐसी ही शर्तें कही थीं। जैसे कि यदि उस श्रेणी में उनका प्रतिनिधित्व पूरा नहीं होता हो और उससे आगे उनके पिछड़ेपन का कोई मानदंड भी बनाया जाए।

इसी प्रकार वर्ष 2018 में जरनैल सिंह के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर के सिद्धांत को एससी-एसटी पर भी लागू करने की बात दोहराई थी। फिर क्या हुआ? क्यों नहीं हुआ? सुप्रीम कोर्ट को इसीलिए यह दोहराना पड़ा है कि सरकारों में आरक्षण की चुनौतियों से निपटने की इच्छाशक्ति ही नहीं है।

ज्यादातर अंग्रेजी शासकों और शासन की बुराईयां करते हुए (मुगल वंश और मुस्लिम शासकों को बचाते हुए) हमारे इतिहासकार बार-बार “फूट डालो और राज करो” के जुमले को दोहराते रहते हैं, लेकिन उससे 100 गुना ज्यादा इस जुमले को आजादी के बाद भारतीय राजनीति में दुरुपयोग किया गया है। शासन की कमजोर इच्छाशक्ति हर क्षेत्र में झलकती है। वह शिक्षा हो, समानता की बातें हों, गरीबी हटाओ या लोकतंत्र के सभी स्तंभ। मुद्दे को फिर से जाति व्यवस्था की तरफ लाते हैं-

डॉ भीमराव अंबेडकर और महात्मा गांधी दोनों की ही भूमिका ऐतिहासिक है। डॉ अंबेडकर का आग्रह था कि जब तक सामाजिक बराबरी नहीं होती, राजनीतिक आजादी का कोई अर्थ नहीं है। लेकिन गांधी जी का यकीन था कि राजनीतिक आजादी से ही सामाजिक बराबरी और दूसरे निर्णय भारतीय बेहतर ले सकते हैं।

इसीलिए जिन वर्गों को, जातियों को सैकड़ों सालों तक वंचित रखा गया, उन पर तरह-तरह के अत्याचार किए गए, उनके लिए आरक्षण की सुविधा संविधान में दी गई और विधायिका में भी। पूना पैक्ट से ही सवर्णों में आरक्षण शब्द से चिढ़ लगातार रही है, क्योंकि उनके संस्कारों, वर्ण व्यवस्था में समानता बहुत दूर की चिड़िया रही है। केवल नारों तक सीमित। व्यवहार से कोसों दूर। लेकिन कुछ शिक्षा के प्रसार, विकास की योजनाएं, शहरीकरण, ग्लोबलाइजेशन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण इत्यादि बातों के चलते सवर्णों को यह अहसास होने लगा कि मनुष्य-मनुष्य के बीच जाति-गोत्र का भेदभाव वाकई कलंक है। सख्त कानून भी बनाए गए ऐसे भेदभाव के खिलाफ और परिवर्तन की बयार शुरू भी हो गई।

निश्चित रूप से अभी इसे गांव-देहात तक जाने में और समय लगेगा, इसीलिए 10 वर्ष की अवधि को बार-बार बढ़ाने की जरूरत भी पड़ी है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो सवर्णों-दबंगों को यह समझने की जरूरत है कि जब तक वे अपने को ऊंची जाति, श्रेष्ठता या जाति में यकीन करते रहेंगे, तब तक इस देश में आरक्षण भी रहेगा।इसलिए जाति के खिलाफ लड़ने की पहली जिम्मेदारी सवर्ण समाज की है।

जैसे वक्त के साथ नदी मैली होती जाती है और इसीलिए उसे साफ करने की जरूरत पड़ती है, वैसा ही बहुत सारे नियमों-परंपराओं-व्यवस्थाओं में होता है। संविधान में संशोधन भी तो इसी चेतना से होते हैं और इसीलिए आरक्षण की सूची उनके नियमों में पुनर्विचार की तुरंत जरूरत है।

पहले केवल सीधी भर्ती में आरक्षण था, फिर पदोन्नति में भी हुआ। फिर शिक्षा संस्थानों में भी। अगले पड़ाव में ओबीसी के लिए हुआ और पिछले दिनों 50% की सीमा को लांघते हुए 10% आर्थिक पिछड़ेपन के लिए भी। कुछ राज्यों में, जिनमें तमिलनाडु कर्नाटक आदि शामिल हैं, आरक्षण 70% को भी पार कर चुका है।

लेकिन इस बहस के शुरू होते ही दोनों पक्ष तलवार लेकर खड़े हो जाते हैं। न किसी को पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू याद आते, जिनका बार-बार कहना था कि कार्यकुशलता और दक्षता की कीमत पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। और न डॉ भीमराव अंबेडकर, जो इसे केवल 10 वर्ष तक रखना चाहते थे और उनकी सदिच्छा थी कि तब तक समाज बराबरी के स्तर पर पहुंचने की उम्मीद है।

आरक्षण के मुद्दे पर मंडल कमीशन के दौर में भी देशव्यापी बहसें लगातार चली हैं। और ऐन उसी वक्त कुछ लोग अमेरिका, जापान आदि देशों में एफर्मेटिव ऐक्शन की बातें करते हैं गलत तथ्य और आंकड़े देते हुए। शायद ही दुनिया का कोई देश हो जो शासन-प्रशासन से लेकर शिक्षा संस्थानों में जाति, उपजाति, जनजाति, अगड़े, पिछड़े, अति पिछड़े जैसे खानों में बंटा हो। धर्म और क्षेत्र के खानों को भी मिला दिया जाए, तो वाकई एक भानुमति का पिटारा। निश्चित रूप से यह खाने समाज के हर हिस्से में और मजबूत हुए हैं।

कुछ बुद्धिजीवी इन्हें आईडेंटिटी की तलाश के नाम पर महिमामंडित करते हैं और उसी तर्क से राजनीतिज्ञ भी यथास्थितियों को बनाए रखने में ही सामाजिक न्याय की चादर ओढ़े रहते हैं। अंजाम धीरे-धीरे शासन-प्रशासन और भी पतन की तरफ बढ़ रहे हैं। पचास के दशक में जो शिक्षा सभी के लिए बराबर थी, अब वह गरीबों की पहुंच से और दूर हो गई है। उसी प्रकार स्वास्थ्य सुविधाएं भी। कुछ लोगों का कहना है कि निजीकरण की तरफ इसी आक्रोश में देश और इसकी संस्थाएं और बढ़ रही हैं।

पिछले 20 वर्षों से आरक्षण की बहस का एक नया रूप सामने आया है। जैसे पहले सवर्ण लोग जाति व्यवस्था को बनाए रखने के पक्ष में तर्क देते थे (कुछ अभी भी देते हैं) वैसे ही आरक्षण से लाभ पाए व्यक्ति भी (इसे क्रीमी लेयर भी कह सकते हैं) यानि जिसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नौकरियों में, पदों पर आने के बाद ठीक हो गई है। इससे उनकी सामाजिक हैसियत भी बढ़ी है। अब वे इन सुविधाओं को वैसे ही बरकरार रखना चाहते हैं जैसे किसी वक्त सवर्ण, जिन्हें अक्सर ब्राह्मणवाद कहकर पुकारा जाता है, अपनी हैसियत को बनाए रखना चाहते थे। इसलिए आरक्षण के प्रश्न पर किसी भी कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जैसे ही कोई निर्णय आता है, वे हाय-हाय करते हुए सड़कों पर उतर आते हैं। यह बार-बार हो रहा है। लोकतंत्र तथा सारी संस्थाओं और व्यवस्थाओं की धज्जियां उड़ाते हुए। ताजा उदाहरण बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के मेडिकल कॉलेज में नियुक्तियों के रोस्टर का था।

हम सभी जानते हैं कि मेडिकल कॉलेज में प्रवेश करने और फिर उसमें प्राध्यापक बनने के लिए एक न्यूनतम योग्यता की जरूरत होती है। मौजूदा नियमों के अंतर्गत वहां के रेडियोलॉजी या दूसरी उच्च तकनीकी शाखा में आरक्षण का अनुपात बदल गया, यानि कि किसी शाखा में शत-प्रतिशत सवर्ण यानि पांडे, गुप्ता, ठाकुर और किसी में अनुपात से ज्यादा एससी-एसटी, ओबीसी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए अपने निर्णय में कहा कि सभी विभागों में भारत सरकार द्वारा निर्धारित आरक्षण की प्रतिशतता होनी चाहिए। ऐसे मामले रेलवे और दूसरे विभागों में भी इससे पहले आते रहे हैं और इसीलिए 14 प्वाइंट रोस्टर की बजाए पोस्ट बेस्ड रोस्टर सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय के द्वारा पूरे देश में लागू किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने भी बहुत लंबी बहस के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय को सही माना। यानि एससी-एसटी, ओबीसी का प्रतिशत तो वही रहेगा लेकिन उसकी गणना विभागवार की जाए। पूरे यूनिवर्सिटी की एक साथ नहीं।लेकिन प्रशासनिक दक्षता, शैक्षणिक योग्यता इन सारी चीजों को ठोकर लगाते हुए तर्क इसी बात पर चलते रहे कि एक-दो पोस्टें इधर जाएंगी या उधर कमी हो जाएगी।

जैसा अमर्त्य सेन और ज्यां द्रेज कहते हैं, राजनीतिज्ञों ने अपने वोट बैंक की खातिर इसमें हस्तक्षेप किया और पहले अध्यादेश निकालकर यथास्थिति लौटआई। और फिर संसद से सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को उलटवा दिया। यह उस सरकार ने किया जो शाहबानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को संसद द्वारा बदलवाने के खिलाफ दशकों तक रोना रोती रही।

एससी-एसटी, ओबीसी ऐक्ट के मामले में भी ज्यां द्रेज और अमृत सेन की बात सही निकली और सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता को वैसा ही संसद ने झटका दिया। हम कैसे धीरे-धीरे संस्थाओं की आजादी और उनके अंत की तरफ बढ़ रहे हैं यह अफसोसजनक और शर्मनाक है। सुप्रीम कोर्ट के सामने ऐसे सैकड़ों मामले पूरे विवरणों के साथ लाए गए हैं जिनमें आरक्षण का लाभ चंद जातियां और चंद व्यक्ति ही लगातार उठाते जा रहे हैं।

कुछ मोटे-मोटे ताजा उदाहरणों को ही सामने रखकर बात करते हैं- तीन वर्ष पहले टीना डाबी ने सिविल सेवा परीक्षा में टॉप किया था। बहुत खुशी की बात थी और एक महिला के नाते और ज्यादा खुशी की बात। लेकिन सबसे पहले टिप्पणी एक तत्कालीन सांसद की आई कि “एससी लड़की ने टॉप किया है।” यह शर्मनाक था, जहां व्यक्ति को जाति के ऐसे खाने से नापा-तोला जाए। लेकिन इसके क्रीमी लेयर पक्ष की तरफ विचार करने की जरूरत है। टीना डाबी के माता-पिता दोनों क्लास वन सर्विस में इंजीनियर रहे हैं आरक्षण के कोटे के तहत। न चाहते हुए भी टीना डाबी को उसका फायदा मिलेगा। और यदि वे चाहें तो उनकी अगली संतानों को भी मिलेगा।

सन 50 के बाद सैकड़ों आरक्षित वर्ग के मेधावी लोक सेवाओं में आए हैं। उनकी क्षमताओं पर यहां बात करने का आवश्यकता नहीं है। इनमें से कई कलेक्टर, डायरेक्टर, एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर, जनरल मैनेजर, प्रोफेसर, वाइस चांसलर, संसद सदस्य हैं। कई पिछले 40-50 वर्षों से चाणक्यपुरी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय या लुटियन दिल्ली के बंगलों में रह रहे हैं। जैसा जोसेफ कुरियन ने कहा कि “यदि आरक्षण का लाभ इन्हीं के बच्चों को मिलता रहा, तो वह कभी भी सबसे नीचे के पायदान पर नहीं पहुंच सकता।”

व्यवहार में देखा जाए तो मेरे गांव के अनुसूचित जाति के छीतरमल, ननुआ, छोटू आदि की हालत अभी भी वैसी ही बनी हुई है। वहां न वे सवर्ण जातियों की ज्यादती से पूरी तरह मुक्त हो पाए और न उन तक इस शहरी क्रीमी लेयर ने आरक्षण का कोई लाभ पहुंचने दिया।

मैं कोई नई बात नहीं कह रहा, इंदिरा साहनी वाले मामले में ओबीसी के लिए क्रीमी लेयर का सिद्धांत इसीलिए लागू किया गया था, जिससे कि वाकई जरूरतमंद और जिनको लाभ मिलना चाहिए, उन तक लाभ पहुंचे। लेकिन वहां भी क्रीमी लेयर को एक लाख से बढ़ाकर आठ लाख कर दिया गया है। अब इसे और भी आगे बढ़ाने की तैयारी चल रही है। यह फिर भारतीय लोकतंत्र के लिए दु:खद होगा।

जब कोरोना वायरस में लाखों मजदूर सड़कों पर भूखे मर रहे हों, न उन्हें स्कूल जाने की सुविधा, न सिर पर कोई छत। इन्हीं गरीबों की दुहाई देते हुए उस क्रीमी लेयर को कुछ जातियां तो लागू ही नहीं होने दे रहीं तथा कुछ उसकी सीमाओं को और ऊपर उठाती जाने के लिए लगातार लामबंद रहती हैं। हिंदी के प्रसिद्ध कवि मुक्तिबोध के शब्दों में, “रात के अंधेरे में इन सभी जातियों, सवर्ण समेत, की क्रीमी लेयर के उस्ताद मिल बैठकर लोकतंत्र को चूस रहे हैं।”

और जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सरकारों में आरक्षण की चुनौतियों/बीमारियों से निपटने की इच्छाशक्ति ही नहीं बची। जो नौकरशाह न्यायपालिका की बुराइयों की तरफ उंगली उठाते हैं, सुप्रीम कोर्ट का इशारा उनकी तरफ भी है कि वह प्रशासन के सही निर्णय लेने में सबसे ज्यादा डरपोक और नाकारा साबित हुए हैं। सरकार को सही सलाह देना उनकी नैतिक जिम्मेदारी है। हर बार फुटबॉल को सुप्रीम कोर्ट के पाले में डाल देने से समस्याएं हल नहीं होने वालीं। सुप्रीम कोर्ट इस बात को भी दर्जनों बार रेखांकित कर चुका है।

संविधान की मूल संरचना, धर्म की व्याख्या, सूचना का अधिकार, हर धर्म की महिला के हक और अधिकार के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हर बार आगे बढ़कर संविधान और लोकतंत्र की रक्षा की है। क्रीमी लेयर खुद आगे आकर सुझाव दे, तो सोने में सुहागा होगा। सवर्णों की सी कट्टरता से बचें ! अपने भाईयों की खातिर ही सही !!

हमारी मांग ! सरकार तुरंत तीन कदम उठाए:

1. सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार एससी-एसटी में आरक्षण के लिए पात्रता सूची की समीक्षा हो और पैमाना यानि क्रीमी लेयर उन्हीं के वर्गों की खातिर तुरंत लागू हो।

2. ओबीसी की क्रीमी लेयर, जो फिलहाल आठ लाख प्रतिवर्ष है, को घटाकर चार लाख किया जाए।

3. पूरे समाज में जाति व्यवस्था को खत्म करने के लिए शर्मा, पांडे, मिश्रा, ठाकुर, गुप्ता, चौधरी जैसे प्रचलित जातिवादी नाम-उपनाम (सरनेम) पर तुरंत प्रतिबंध लगाया जाए। जाति सूचक शब्द लगाना अपराध माना जाए।

सुप्रीम कोर्ट को एक बार फिर बधाई ! निष्पक्षता ! साफगोई ! और साहस के लिए !!

#प्रेमपाल शर्मा, पूर्व संयुक्त सचिव, रेल मंत्रालय। संपर्क: 99713 99046.








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यात्री ट्रेनें नहीं चल रही हैं, ऐसे मार्जिन में केबल मेगरिंग कराने पर अधिकारियों का जोर

केबल मेगरिंग करने का नया फरमान, रिले रूम के वायरस ग्रस्त होने पर कैसे बचेगी रेलकर्मियों की जान !

अब तक एसएंडटी कर्मचारियों को इंजीनियरिंग विभाग के कर्मचारियों के साथ रेल बदलने, ट्रैक मशीन से पैकिंग करने के कार्य में लगाया गया था परंतु अब एक और नया फरमान जारी कर दिया गया है। इस नए आदेश में केबल मेगरिंग कराने के निर्देश दिये गये हैं।

जब कर्मचारियों का कहना है कि समस्या काम करने की नहीं, बल्कि काम करने की जगह को लेकर है, क्योंकि केबल मेगरिंग कराने के लिए रिले रूम जिस पर दो लाॅक होते हैं, जिनकी एक चाभी एसएंडटी विभाग के पास तथा दूसरी चाभी स्टेशन मास्टर के पास होती है।

स्टेशन मास्टर चाभी तभी देते हैं, जब एसएंडटी विभाग का जेई या एसएसई स्तर का निरीक्षक चाभी मांगने के लिए कंट्रोल से पीएन लेता है और स्टेशन मास्टर को कंट्रोल चाभी देने के लिए अनुमति देता है।

यानि रिले रूम पूरी तरह से बंद और सुरक्षित होता है। अतः रिले रूम को खोले बगैर केबल मेगरिंग करना संभव नहीं है।

जबकि रिले रूम के अंदर सिग्नल की सारी सर्किट तथा हजारों-लाखों की संख्या में सिग्नलिंग तारों का गुच्छा सिग्नलिंग उपकरणों को चलाने के लिए लगा होता है।

अब प्रश्न यह है कि क्या एक बंद और सुरक्षित कमरे को इस कोविद-19 महामारी के समय खोलकर उसे भी असुरक्षित नहीं किया जा रहा है और क्या इस प्रकार के रिले रूम को सैनेटाइज किया जाना संभव है जहाँ हजारों-लाखों की संख्या में सिगनलिंग तारों का गुच्छा तथा सिगनलिंग सिस्टम मौजूद हो?

एसएंडटी कर्मियों का आग्रह है कि आखिर अधिकारियों को कर्मचारियों की सुध क्यों नहीं हो रही है? उनका कहना है कि जब प्रधानमंत्री खुद देश के हर नागरिक को ‘घर पर रहिये और केवल घर पर रहिये’ के लिए निवेदन कर रहे हैं, तो क्या हमारे अधिकारी अपने मातहत कर्मचारियों को ‘घर पर रहिये और केवल घर पर रहिये’ के लिए प्रेरित नहीं कर सकते हैं?

उन्होंने कहा कि अभी हाल ही में चेयरमैन, रेलवे बोर्ड ने भी सभी अधिकारियों को केवल मालगाड़ियों के लिए आवश्यक स्टाफ को ही ड्यूटी पर लगाने का निर्देश दिया है, वह भी रोटेशन में। परंतु ब्रांच अधिकारियों, खासतौर पर एसएंडटी तथा इंजीनियरिंग विभाग के अधिकारियों को ट्रेनें कम चल रही हैं, तो काम करने के लिए अच्छा मार्जिन दिख रहा है, इसीलिए वह सामान्य दिनों से भी ज्यादा काम करवा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि कहने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल रखा जा रहा है, परंतु इंजीनियरिंग तथा एसएंडटी विभाग का प्रत्येक काम रिस्क एवं हार्डशिप के बिना संभव ही नहीं है, ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग तो मात्र एक छलावा है। ऐसी परिस्थितियों में कई रेलकर्मी कोरोना महामारी के चपेट में आ रहे हैं, जिसका एक बेहतरीन उदाहरण पश्चिम रेलवे के मुंबई सेंट्रल मंडल के नंदुरबार सेक्शन में आ चुका है, जहां संदिग्ध मामले पाए जाने पर तीन ट्रैकमैनों को होम क्वारंटाइन किया गया है।

उन्होंने कहा कि जो लोको पायलट ट्रेन चलाते हैं, उनको भी ब्रेथ एनालाईजर टेस्ट तथा बायोमैट्रिक उपकरणों से छुट दी गई है, परंतु कुछ लाॅबियों में यह अभी मान्य नहीं किया जा रहा है और कहा जा रहा है कि उनके पास मंडल कार्यालय से अभी तक कोई निर्देश प्राप्त नहीं हुए हैं। अब जबकि अभी हाल ही में पालनपुर में एक लोको पायलट को कोरोना से संक्रमित पाया गया था, तब भी रेल प्रशासन के आदेशों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। 

सवाल यह है कि आखिर इस वैश्विक कोरोना महामारी से इन रेल कर्मचारियों को कौन बचाएगा और इसके लिए जिम्मेदार किसे ठहराया जाएगा?

“हम बचेंगे, तो देश बचेगा”

एसएंडटी कर्मचारियों के एक व्हाट्सऐप ग्रुप में डाला गया मैसेज भी कानाफूसी.कॉम को प्राप्त हुआ है। इसमें कहा गया था कि – “जबकि भारत सरकार एवं देश के प्रधानमंत्री खुद बार-बार सभी नागरिकों से ‘घर में ही रहें और केवल घर में ही रहें’ की अपील कर रहे हैं, ऐसी स्थिति में घर से बाहर निकलना मौत के मुँह में जाने के बराबर ही नहीं, बल्कि पूरे भारत को मौत के मुँह डालने के बराबर माना जा रहा है। ऐसी विकट परिस्थिति में हम रेल कर्मचारियों के ऊपर विशेष जिम्मेदारियां आ जाती हैं। परंतु हमारी जिम्मेदारियों की आड़ में हमारा शोषण किया जाना उचित नहीं है। हम कर्मचारी भी आप अधिकारियों के परिवार के एक सदस्य की तरह ही हैं और हमसे काम लेना आपकी जवाबदारी है, परंतु इसे किसी भी अधिकारी को अपने इगो पर नहीं लेना चाहिए। और जहां तक संभव हो, हम सभी को एक-दूसरे की भावनाओं को तथा समस्याओं को इससे भी ज्यादा हमारे घर से बाहर निकलने के डर को महसूस करना चाहिए। अगर बात केवल हम कर्मचारियों की होती, तो कोई बात नहीं थी, परंतु यह महामारी हमारे परिवार को ही नहीं, पूरे देश को महामारी के दलदल में डाल रही है। हमारी एक गलती न जाने किस-किस को लील जाए। आज किसी भी प्रकार किसी से हुई एक छोटी सी गलती भी बहुत बड़ी गलती बन सकती है। अतः आप सभी से हाथ जोड़ कर नम्र निवेदन है कि आप सभी के हाथों में हमारी ही नहीं, बल्कि हमारे पूरे परिवार के साथ-साथ हमारे समाज की जिंदगियां भी हैं। मेरे इस अनुरोध पर आप सभी एक बार पुनर्विचार करें तथा शिफ्ट ड्यूटी में कार्यरत कर्मचारियों के दर्द को समझने की कोशिश करें, जब गाड़ियां चल नहीं रही हैं, तो शिफ्ट ड्यूटी में कर्मचारियों की संख्या कम की जानी चाहिए, उन्हें अल्टर्नेट दिन में बुलाया जाना चाहिए तथा जनरल ड्यूटी में भी किसी भी प्रकार का नया काम नहीं किया जाना चाहिए। जहां तक संभव हो, हमें इस वक्त केवल और केवल इमरजेंसी कार्यों का संपादन ही करना चाहिए। इस महामारी से बचेंगे, तो बहुत सारे काम कर लेंगे। हम बचेंगे तो देश बचेगा।”

Lifted Lc 67  both the booms air

Replaced point no 13A and 11B today at KKLR yard

A boom 90, 90 89

B boom  90,94 96

Planned special work on Barabhum Station – spot vedio

https://youtu.be/dp2Kk_gsNYg

New and special works are going on in Godiwada section, Vijayawada division, South Central Railway

https://twitter.com/irstmu/status/1244405020109361152?s=08








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प्रधानमंत्री के अथक प्रयासों को पलीता लगाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहा है रेल प्रशासन

एक तरफ देश के प्रधानमंत्री ने #कोविद19 के प्रसार को रोकने के लिए पूरे भारत में 21 दिन का लॉकडाउन करने का गंभीर निर्णय लिया और सभी पक्ष-विपक्ष को साथ लेकर देश को इस गंभीर संकट से उबारने का प्रयास कर रहे हैं, जिसके अंतर्गत देश में समस्त परिवहन प्रणाली के संचालन पर 14 अप्रैल तक रोक लगा दी गई है। भारत की लाइफ लाइन कही जाने वाली भारतीय रेल के पहिए तक थम गए सिवाय मालगाड़ी परिवहन के, जिनके माध्यम से आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है।

दूसरी तरफ खबर आ रही है कि सभी जोनों द्वारा अपने अपने खाली रेक उन जगहों से वापस मंगाए जा रहे हैं, जहां पर जाकर उनके रेक फंस गए थे। अब लगभग सभी रेलों में सारी अव्यवस्था इसी मूर्खतापूर्ण निर्णय के कारण हो रही है, क्योंकि जो भी खाली रेक वापस आ रहे हैं, उनमें लगभग 500 से 1000 तक यात्री भी भरकर आ रहे हैं।

अब प्रश्न यह उठता है कि जब सारे स्टेशन सील कर दिए गए हैं, तो फिर ये लोग इतनी बड़ी संख्या में ट्रेनों में प्रवेश कैसे कर जा रहे हैं? साफ है कि सुरक्षा व्यवस्था में कोई भारी सेंध लगा रहा है अथवा लोगों की मजबूरियों का दोहन किया जा रहा है। सवाल यह है कि ये लोग कोरोना संक्रमण से कैसे बचेंगे और क्या इन लोगों के कारण संक्रमण नहीं फैलेगा?

Isliye doori hai bahut jaroori

विश्वसनीय सूत्रों से जानकारी मिली है कि रेल प्रशासन अपनी कमजोरी छुपाने के लिए बता रहा है कि जो भी लोग यात्रा कर रहे हैं, वे रेलवे के ही कर्मचारी हैं, जो कि सरासर झूठ है। यदि ये रेल कर्मचारी ही हैं, तो ये कौन सी ड्यूटी करने जा रहे हैं? जब देश के प्रधानमंत्री ने कह दिया कि जो जहां हैं, वहीं रहें, तो फिर पीएम के इस अनुरोध, जिसे सरकारी भाषा में आदेश समझा जाता है, को रेल मंत्रालय पलीता क्यों लगा रहा है?

ऐसे में यह कहना पड़ेगा कि जिसने भी ये मूर्खतापूर्ण निर्णय लिया है, उसके विरुद्ध पीएमओ को कड़ा ऐक्शन लेना चाहिए। यदि खाली रेक ही मंगवाना था, तो इतनी जल्दी क्या थी? संपूर्ण रेल संचालन तो 14 अप्रैल तक बंद है। जब हफ्ता-दस में स्थिति सामान्य होती नजर आती, तब खाली रेक को वापस मंगा लिया जाता। 

बहरहाल रेल बंदी के समय भी हजारों की संख्या में यात्रियों को ट्रेनों में यात्रा की अनुमति देना कोरोना के संक्रमण को और फैलाने में योगदान ई देने जैसा ही है। जब देश की 99% जनता पूरी तरह जैसे है, जहां है, की तर्ज पर घरों में बैठी है, तब रेल प्रबंधन के मूर्खतापूर्ण निर्णय से प्रधानमंत्री के अभियान को पलीता लगाया जा रहा है।

अभी भी रेलवे के विभिन्न कामकाज के चलते रेलकर्मियों में सोशल डिस्टेंसिंग का अनुपालन पूर्णतया नहीं हो रहा है। केवल आवश्यक सेवाओं के लिए न्यूनतम स्टाफ को ही उपस्थित रहने के नियम को भी तोड़ा जा रहा है। अन्य रेलकर्मी भी स्टेशनों पर भीड़ लगा रहे हैं, जिनकी कोई जरूरत ही नहीं है।

प्रशासनिक स्तर के अधिकारी और सुपरवाइजर भी स्टेशनों पर अनावश्यक दौड़ लगाकर भीड़ लगा रहे हैं, जिससे सामान्य कार्य संचालन के साथ-साथ सोशल डिस्टेंसिंग की लक्ष्मण रेखा का भी अनुपालन सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है।

यदि #कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकना है तो कृपया कुछ दिनों के लिए परिचालन, रेल सुरक्षा बल, मेडिकल, सफाई कर्मियों इत्यादि को छोड़कर अन्य लोग स्टेशन से दूरी बनाकर रहें और वर्क फ्रॉम होम के तहत कार्य करें, तो कुछ हद तक इस संक्रमण को रोकने में मदद मिल सकती है, अन्यथा प्रधानमंत्री के तमाम अथक प्रयासों को पलीता लगाने में रेल मंत्रालय और अत्युत्साही रेल अधिकारी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।








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अपने आदेशों/निर्देशों पर अमल करवाने में अक्षम साबित हो रहा है रेलवे बोर्ड

पहली पोस्टिंग से लेकर अब तक एक ही शहर टिके हुए हैं कुछ रेल अधिकारी

सुरेश त्रिपाठी

भारतीय रेल में अव्यवस्था और भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा कारण बार-बार यह उभरकर सामने आया है कि रेलवे बोर्ड अपने द्वारा जारी किए गए आदेशों और निर्देशों को लागू करवाने में सर्वथा असमर्थ साबित होता रहा है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि अधिकारियों और कर्मचारियों की न सिर्फ कार्यक्षमता में गिरावट आई है, बल्कि उनकी कार्यशैली में भी कोई सुधार या बदलाव नहीं हो पाया है।

ऐसे में उन तमाम अधिकारियों की मनमानी, उद्दंडता और भ्रष्टाचार को प्रश्रय मिलता रहा है, जो अपनी पहली पोस्टिंग से लेकर आजतक एक ही शहर और एक ही जोन में जमे हुए हैं। यहां तक कि इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिनका आजतक कोई जोन भी एलॉट नहीं किया गया है।

उदाहरण स्वरूप, इनमें से एक 1992 बैच की आईआरपीएस अधिकारी सुनीता सिंह का ही मामला देख लें, जो कि रेलसेवा ज्वाइन करने से लेकर अब तक पिछले 28 वर्षों से लगातार दिल्ली में ही पदस्थ हैं और आजतक कभी एक दिन के लिए भी दिल्ली से बाहर इनकी पोस्टिंग नहीं हुई है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार सुनीता सिंह को अब तक उत्तर रेलवे जोन भी एलॉट नहीं हुआ है, फिर भी एसएजी (सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड/जॉइंट सेक्रेटरी लेवल) तक की सभी पदोन्नतियां इन्हें दिल्ली में ही प्राप्त हो चुकी हैं। यहां ऐसे कई अन्य अधिकारी भी हो सकते हैं।

उल्लेखनीय है कि रेलवे में सर्विस ज्वाइन करने के बाद नियमानुसार प्रत्येक ग्रुप ‘ए’ अधिकारी को एक जोन एलॉट किया जाता है, जहां वह जेएजी (जूनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड) तक काम करता है, उसके बाद ही अन्य जोनों में उसका ट्रांसफर करने का नियम है।

परंतु ऐसा बताया गया है कि आईआरपीएस अधिकारी सुनीता सिंह को सर्विस ज्वाइन करने के समय उत्तर रेलवे जोन आवंटित नहीं किया गया था और उनकी लीन भी उत्तर रेलवे में नहीं है।

उत्तर रेलवे में ऐसे ही एक और प्रमोटी आईआरपीएस अधिकारी हैं आर. के. मल्होत्रा! जो कि वर्ष 1997 में एपीओ बनकर ग्रुप ‘सी’ से ग्रुप ‘बी’ में पदोन्नत हुए थे।

मल्होत्रा भी पिछले 23 वर्षों से लगातार दिल्ली में और खासतौर पर उतर रेलवे में ही रहकर कुर्सी तोड़ रहे हैं। इन्होंने भी आजतक दिल्ली से बाहर एक बार भी कदम नहीं रखा है और दिल्ली से बाहर आजतक कभी एक दिन की भी ड्यूटी नहीं की है।

यही नहीं, मल्होत्रा ने तो ग्रुप ‘सी’ की भी अपनी अब तक की पूरी रेलवे सर्विस दिल्ली में ही रहकर की है। और अब वर्ष 2022 में जब सेवानिवृत्ति के करीब पहुंच रहे हैं, तब सेवाकाल के दो साल बाकी होने पर अन्यत्र ट्रांसफर नहीं किए जाने का नियम बताकर वह सुखरूप दिल्ली से ही रिटायर हो जाएंगे।

सर्वप्रथम आवश्यक यह है कि आर. के. मल्होत्रा जैसे प्रमोटी अधिकारियों को ग्रुप ‘ए’ मिलते ही अन्य जोनों में उनका ट्रांसफर करना सुनिश्चित किया जाए। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि ग्रुप ‘बी’ में पदोन्नति देने के समय भी उनकी पहली पोस्टिंग उसी डिवीजन अथवा डिवीजन से जुड़े मुख्यालय में कदापि नहीं की जानी चाहिए। ऐसे जितने भी प्रमोटी ग्रुप ‘ए’ अधिकारी हैं, उनका जोनल ट्रांसफर तुरंत सुनिश्चित किया जाए।

इसके बाद यह देखा जाए कि जो अधिकारी अपनी पहली पोस्टिंग से लेकर आजतक एक ही शहर में टिके हुए हैं, (इसमें सिर्फ ‘शहर’ की ही गणना की जानी चाहिए, न कि उस शहर में स्थित अन्य जोन/पीएसयू आदि घोंसलों की), उन्हें अविलंब अन्य जोनल रेलों में स्थानांतरित किया जाना चाहिए।

यदि ऐसा सुनिश्चित नहीं किया जाएगा और इसका कड़ाई से पालन नहीं करवाया जाएगा, तो न कभी भारतीय रेल से भ्रष्टाचार को खत्म या न्यूनतम किया जा सकता है और न ही अधिकारियों की उद्दंडता, मनमानी और भ्रष्टाचार पर कभी कोई लगाम लगाई जा सकती है। इसके अलावा ऐसा न होने पर उनकी कार्यक्षमता और कार्यशैली में भी कोई सुधार नहीं लाया जा सकता है।

रेलवे बोर्ड से बार-बार इस संदर्भ में आदेश जारी किए जाते हैं, परंतु हर बार कभी राजनीतिक, तो कभी प्रशासनिक जोड़-तोड़ करके उन आदेशों को पलीता लगा दिया जाता है और नतीजा होता है वही ढ़ाक के तीन पात! इसका परिणाम यह है कि आज दिल्ली/मुंबई में अधिकारियों की इतनी भरमार हो चुकी है कि उनमें से बहुतों के पास बैठने तक के लिए कोई जगह नहीं है।

#indianrailways #corruption #transfer #corruptpolicy #RailwayBoard #pmo #PeriodicalTransferPolicy #NoToIRMS








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कहीं निजी घाटे की पूर्ति करने के लिए तो नहीं दी जा रही प्राइवेट ऑपरेटरों को अनुमति?

लेकिन ‘विभागवाद’ से ओतप्रोत चेयरमैन, रेलवे बोर्ड (सीआरबी) विनोद कुमार यादव के दांव-पेंच से वंदेभारत को बनाने वाले रेल अधिकारियों पर निहित उद्देश्य से विजिलेंस इंक्वायरी अभी भी चल रही है। इसके चलते एक तरफ जहां रेल अधिकारियों में भारी हताशा व्याप्त है, तो दूसरी ओर देश-विदेश में इन अधिकारियों सहित भारतीय रेल का भी मखौल उड़ाया जा रहा है।

https://twitter.com/sritara/status/1237728058091528192?s=19

मात्र 97 करोड़ की लागत से बनी नई दिल्ली-वाराणसी 22435/22436 वंदेभारत एक्सप्रेस ने एक वर्ष में 115% ऑक्यूपैंसी के साथ 92 करोड़ की कमाई की। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या कोई प्राइवेट ट्रेन ऑपरेटर इससे अच्छी, सस्ती और लाभदायक सेवा दे सकता है? फिर भारतीय रेल के निजीकरण और इम्पोर्ट की ऐसी ताबड़तोड़ जल्दी क्यों है?

खबर है कि 38000 करोड़ की लागत से 60 ट्रेनसेट आयात करने और उससे मोटा कमीशन खाने की योजना जब मीडिया में लीक हो गई, तब देश की आंखों में धूल झोंकने के लिए 44 वंदेभारत रेक बनाने की अनुमति आईसीएफ को दी गई। परंतु इसके लिए जो टेंडर निकाला गया है, बताते हैं कि वह कभी फाइनल नहीं होने वाला है। प्राप्त जानकारी के अनुसार हाल ही इस संबंध में रेलवे बोर्ड में हुई बैठक में कोई सहमति नहीं बन पाई, बल्कि संबंधित अधिकारियों और वेंडर्स के बीच कुछ तथ्यों को लेकर गरमागरम बहस अवश्य हुई।

बताते हैं कि जीएम/आईसीएफ में इतना साहस नहीं है कि वह इस टेंडर को फाइनल कर सकें। विश्वसनीय सूत्रों का तो यह भी कहना है कि ऊपर से दबाव डाले जाने पर भी वह यह काम नहीं कर पाएंगे। एक अपुष्ट खबर यह भी है कि पहले सिर्फ 10 रेक बनाने की अनुमति दी गई थी, मगर प्रोपल्शन सिस्टम उपलब्ध कराने वाली कंपनी से जब मोटे कमीशन की डिमांड की गई, तब उसने रेक की संख्या बढ़ाने की मांग कर दी। बताते हैं कि इस तरह 10 रेक को बढ़ाकर 44 रेक किया गया।

सूत्रों का कहना है कि अब यह 44 रेक का टेंडर भी कभी फाइनल नहीं होगा, क्योंकि पहले वाली आयात योजना मीडिया के कारण फेल हो जाने से कमीशन का जो भारी निजी घाटा हुआ है, उसकी भरपाई प्राइवेट ऑपरेटरों को ट्रेनसेट आयात करने की अनुमति देकर की जा रही है।

देश में इस समय करीब 10 करोड़ युवा बेरोजगार हैं और यह बेरोजगारी लगातार बढ़ती जा रही है। रेल मंत्रालय ने भर्ती के नाम पर बेरोजगारों से फार्म भरवाकर पिछले एक साल से भी ज्यादा समय से उनकी 1000 करोड़ रुपये से भी अधिक की राशि हड़प रखी है। परंतु एक साल से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद इस भर्ती की कोई तारीख घोषित नहीं कर सका है।

https://youtu.be/0tsBT7SWLdw

महात्मा गांधी ने विदेशी उत्पादों के बहिष्कार से इंग्लैंड के उद्योगों की कमर तोड़ डाली थी, देशी खादी को बढ़ावा दिया था और ब्रिटिश-शासन को उखाड़ फेंका था। लेकिन ‘अति-समझदार’ रेलमंत्री पीयूष गोयल और ‘नासमझ’ सीआरबी विनोद कुमार यादव स्वदेशी रेल उद्योग को नष्ट करके निजी रेल कंपनियों के माध्यम से ट्रेनसेट इंपोर्ट करने पर आमादा हैं। जबकि देश में करोड़ों युवा बेरोजगारी के कारण इधर-उधर भटक रहे हैं।

Uncertainty on Cadre-Merger issue

Does CRB VKYadav think before he leaps? He has quite obviously misled the Cabinet.

Now he say that officers will be permitted to remain in their “own” cadres since IRMS is not legally enforceable. Were Law Ministry, DOPT and UPSC consulted before making the Cabinet note?

What does mean Mr BACKTRACKER

On Cadre-Merger CRB VKYadav initially claimed that none would suffer, then he backtracked & said that some people may lose & some gain. Now in a complete reversal he says that officers need not opt for IRMS.

https://twitter.com/kanafoosi/status/1228955966814572544?s=19

#CRB #VKYadav #CadreMerger #IRMS #DoPT #UPSC #Cabinet #TrainSet #Vandebharat #IndianRailway #PiyushGoyal #PMO #PMOIndia 





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इधर देश उलझा है सीएए/एनआरसी के चक्कर में, उधर चुपचाप हो रहा है रेलवे का निजीकरण

देश की संवैधानिक और पारंपरिक प्रक्रियाओं का हो रहा खुला उल्लंघन, किया जा रहा है जन-आकांक्षाओं का मान-मर्दन

जनता की गाढ़ी कमाई से बनी देश की वेशकीमती संपदा का निजीकरण करके खुद की रियासतें बनाने में लगे हैं तथाकथित राजनेता!

सुरेश त्रिपाठी

पूरे देश को सीएए/एनआरसी की भंवर में उलझाकर और भारतीय रेल के करीब 14000 अधिकारियों को कैडर मर्जर में लपेटकर तथा लगभग 13.30 लाख रेलकर्मियों को 30/55 के चक्कर में फंसाकर और उनके अंदर नौकरी जाने का डर पैदा करके तथा उन्हें निकम्मा बताकर रेलवे के निजीकरण का काम चुपचाप किया जा रहा है। हालांकि मान्यताप्राप्त रेल संगठन इस सबका अपनी तौर पर पुरजोर विरोध कर रहे हैं, मगर उनके इस विरोध का सरकार पर कोई असर नहीं हो रहा है। सरकार ने पिछले कुछ सालों से विरोध/शिकायतों को अनदेखा और विरोधी स्वरों को अनसुना करने की अघोषित नीति अपना रखी है।

रेल कारखानों और 150 ट्रेनों सहित अन्य कई प्रकार से किए जा रहे निजीकरण के खिलाफ मान्यताप्राप्त रेल संगठनों ने गत दिनों एनसी-जेसीएम का बहिष्कार किया। इसके अलावा सभी जोनल/मंडल मुख्यालयों पर एक हफ्ते तक विरोध सप्ताह मनाया और अब दोनों रेल संगठन ‘रेल बचाओ-देश बचाओ’ संगोष्ठियां कर रहे हैं। इधर मान्यताप्राप्त रेल संगठन अपने अस्तित्व को बचाने में लगे हुए हैं। उधर अधिकारियों को कैडर मर्जर में उलझाकर उन्हें आपस में बांट दिया गया है। यही नहीं, एक ‘डपोरशंख’ सलाहकार ने सत्ता की दलाली करते हुए कैडर मर्जर पर एक अधिकारी संगठन का समर्थन घोषित कर दिया है।

उपरोक्त हालात के मद्देनजर यदि चुपचाप रेलवे के निजीकरण का निर्णय हो गया, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अब सरकार ने रेलवे के निजीकरण को मंजूरी दी ही दी है, तो रेलवे के सबसे कमाऊ और व्यस्त 100 रेल मार्गों पर 150 निजी ऑपरेटरों की निजी ट्रेनें चलेंगी और जनता से निजी ऑपरेटरों द्वारा मनमाना किराया वसूल किया जाएगा। परंतु सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि क्या इन निजी ट्रेनों के इंजन और कोच भी निजी होंगे या फिर यह सब पहले की ही भांति सरकारी संपत्तियां रहेंगी? क्या वे फैक्ट्रियां, जहां कोच, धुरा, पहिया इत्यादि बनते हैं, वह सरकार के पास ही रहेंगी, अथवा वह भी प्राइवेट हाथों में बेच दी जाएंगी?

रेलवे स्टेशन, उनका रखरखाव, यह सब प्राइवेट को सौंपा जाएगा या सरकार के पास रहेगा! टिकटिंग, सिग्नलिंग आदि का क्या किया जाएगा! अभी सिर्फ तेजस एक्सप्रेस का ही प्रयोग किया गया है, जिसमें कैटरिंग सर्विस को अन्य ट्रेनों की तरह निजी हाथों में सौंपा गया है, जबकि कहा यह जा रहा है कि यह पूरी ट्रेन ही अब निजी ऑपरेटर को सौंप दी गई है। तथापि सिर्फ कुछ लड़कियों को चुनकर उनको एयर होस्टेस जैसे टाइट ड्रेस पहनाकर और वैसा मैनरिज्म सिखाकर यदि यह सोचा जा रहा है कि ट्रेन प्राइवेट हो गई, रेलवे का निजीकरण पूरा हो गया, तो यह प्रयोग कम से कम तेजस के मामले में तो सफल नहीं हुआ है। यह एक बड़ा मुगालता ही नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ा धोखा भी है।

इसके अलावा, जनता के पैसे (टैक्स) यानि जनता की गाढ़ी कमाई से रेलवे की जो-जो संपत्तियां बनी हैं, वह चाहे कोच और इंजन हों, कोच फैक्ट्रियां हों, रेल लाइनें हों, रेलवे स्टेशन हों, स्टाफ हो, रेलवे की जमीन हो, यह सब जनता के टैक्स से बने हैं। इन्हें बेचा नहीं जा सकता है और बेचा भी नहीं जाना चाहिए।

तथापि यदि बेचना अपरिहार्य ही है, तो इनकी बोलियां लगाकर इन्हें औने-पौने दाम पर अपने कुछ चहेतों को सौंपने के बजाय, ओपन टेंडरिंग का पारदर्शी तरीका अपनाया जाना चाहिए। अथवा यदि निजी क्षेत्र रेल चलाने के लिए इतना ही उत्सुक और सक्षम है, तो उसे इसके लिए अपनी अलग रेल लाइनें बिछाकर और पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करके रेल चलाने की अनुमति दी जाए। परंतु इस सबसे ध्यान हटाने के लिए देश में जो कुछ चलाया जा रहा है, वह ठीक नहीं है। यह कहना है तमाम वरिष्ठ रेल अधिकारियों और रेलवे क्षेत्र के विषेशज्ञों का।

यह बात सार्वभौमिक रूप से सत्य साबित हुई है कि रेलवे का निजीकरण कभी सफल नहीं हुआ है। तमाम विशेषज्ञों का भी यही मानना है। उनका कहना है कि इंग्लैंड सहित विश्व भर में अब तक जिन-जिन देशों में रेलवे का निजीकरण किया गया, उन सभी देशों को अंततः उनका पुनर्राष्ट्रीयकरण करना पड़ा है। उनका यह भी कहना है कि दुनिया के जिन-जिन देशों ने रेलवे का निजीकरण किया, उन्हें बाद में उसका राष्ट्रीयकरण करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

ब्रिटेन ने भी कुछ साल पहले अपनी रेलवे का निजीकरण किया था, अब वहां भी एक-एक करके रेल लाइनों का राष्ट्रीयकरण किया जा रहा है। यहां यह भी बताना जरूरी है कि ब्रिटेन की तत्कालीन सरकार ने अपनी ही पार्टी के उद्योगपति सांसदों को अपनी रेलवे को तोड़कर और कंपनियों में उसके तुकड़े करके सौंपी थी। इन सांसदों ने इस दरम्यान रेलवे से सिर्फ मुनाफा कमाया, मगर उनके रखरखाव और प्रगति पर कोई तवज्जो नहीं दी। नतीजा यह हुआ कि रेल दुर्घटनाएं बढ़ती गईं, जिससे वहां की जनता में सरकार के खिलाफ गुस्सा भर गया और रेलवे के पुनर्राष्ट्रीयकरण की मांग जोर पकड़ने लगी। इसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार को रेल का राष्ट्रीयकरण करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

उल्लेखनीय है कि अर्जेंटीना को भी रेल दुर्घटनाओं में भारी वृद्धि के बाद वर्ष 2015 में रेलवे का फिर से राष्ट्रीयकरण करना पड़ा था। इसी तरह न्यूजीलैंड ने भी वर्ष 1980 में रेलवे का निजीकरण किया था, उसको भी 2008 में भारी घाटे के बाद रेलवे का पुनर्राष्ट्रीयकरण करने के लिए मजबूर होना पड़ा। यही हाल आस्ट्रेलिया का भी हुआ, जहां आस्ट्रेलियाई जनता द्वारा बड़े पैमाने पर चलाए गए ‘हमारा ट्रैक वापस लो’ आंदोलन के बाद वहां की सरकार को रेलवे को फिर से अपने हाथों में लेना पड़ा।

ऐसा ही कुछ अब भारत में भी किया जा रहा है। वर्तमान केंद्र सरकार अपने चहेते कुछ उद्योग घरानों को रेलवे की वेशकीमती संपदा सौंपने की नीति पर चलती नजर आ रही है। ऐसा लगता है कि सरकार ने दुनिया के अनुभव और इतिहास से कोई सबक नहीं लिया है, जिसके परिणाम निकट भविष्य में बहुत घातक सिद्ध हो सकते हैं और देश की 132 करोड़ जनता को इसका बहुत बुरा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

सच्चाई यह है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन यह तीनों विषय न सिर्फ सब्सिडाइज्ड होने चाहिए, बल्कि सरकार के ही हाथों में रहना चाहिए, ताकि जनता को इसका लाभ और सुविधा मिलती रहे। यह तीनों विषय देश की जनता के लिए बिना किसी भेदभाव के समान रूप से उपलब्ध होने चाहिए। लेकिन प्रत्यक्ष रूप से देखने में यह आ रहा है कि हमारी सरकार इन तीनों विषयों को न सिर्फ बरबाद कर रही है, बल्कि इन्हें एक-एक करके निजी हाथों में सौंपती जा रही है। जहां देश में शिक्षा का बुरा हाल है, वहीं तमाम सरकारी अस्पताल खुद बीमार हैं।

जबकि राज्यों की परिवहन व्यवस्था जहां लगभग राजनीतिक लोगों या उनके सिपहसालारों के हाथों में खेल रही है, वहीं केंद्र सरकार के स्वामित्व वाली एकमात्र बची भारतीय रेल, जो इस देश के सर्वसामान्य सहित सबसे निचले तबके की सवारी है, पर भी इनकी नजर लगी हुई है। इसे भी अब बेचने की शुरूआत कर दी गई है। रेलवे की कुछ वेशकीमती जमीनें अपने चहेतों को बेच दी गई हैं, अथवा लंबे समय की लीज पर दे दी गई हैं। अब ट्रेनें बेची जा रही हैं। देश और जनता की किसी को फिक्र नहीं है, सभी राजनीतिक लोग सिर्फ अपनी-अपनी रियासतें बनाने में लगे हुए हैं।

दिल्ली मेट्रो की नीति का पालन करने के बजाय मनमानी तरीके से भारतीय रेल का बंटाधार किया जा रहा है। अब ये जो 150 निजी ट्रेनें 100 कमाऊ और फायदे वाले रेल मार्गों पर चलाई जाने वाली हैं, उनके 15 मिनट आगे और 15 मिनट पीछे भारतीय रेल की कोई ट्रेन नहीं चलेगी। यह फैसला चुपचाप ले लिया गया और पूरे देश का ध्यान एक ऐसे मुद्दे पर उलझा दिया गया, जो कि बहुत महत्वपूर्ण होने के बावजूद देश की अत्यंत कीमती संपत्ति निजी हाथों में सौंपने से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो सकता है। लेकिन ऐसे फैसले चुपचाप लिए जा रहे हैं, जिनके लिए देश की जनता को चौतरफा चौकन्ना रहने की जरूरत है।

कहा जा रहा है कि मोदी सरकार अब खुलकर रेलवे का निजीकरण करने पर उतर आई है। प्राइवेट ऑपरेटरों को 100 रेलमार्गों पर 150 प्राइवेट ट्रेनों के परिचालन की अनुमति दे दी गई है। पीटीआई के मुताबिक निवेश को लेकर ‘निजी भागीदारी: यात्री रेलगाड़ियां’ शीर्षक से एक डिस्कशन पेपर लाया गया है, जिसमें कहा गया है कि इन 100 मार्गों पर निजी इकाईयों को 150 गाड़ियों के संचालन की अनुमति देने से 22,500 करोड़ रुपये का निवेश आएगा।

खास बात यह है कि इन प्राइवेट ऑपरेटरों को अपनी गाड़ियों में बाजार के अनुसार किराया वसूलने की छूट होगी। वे इन गाड़ियों में अपनी सुविधा के हिसाब से विभिन्न श्रेणियों की बोगियां लगाने के साथ-साथ रूट पर उनके ठहराव वाले स्टेशनों का भी चयन कर सकेंगे। अभी तक तेजस में प्राइवेट आपरेटर को किराया तय करने के अलावा ट्रेन के भीतर अपना टिकट चेकिंग और कैटरिंग एवं हाउसकीपिंग स्टाफ रखने की छूट है।

रेलवे अपने इंफ्रास्ट्रक्चर एवं रनिंग स्टाफ का उपयोग करने के लिए प्राइवेट आपरेटर से हॉलेज शुल्क वसूल रहा है, लेकिन अब जो 150 ट्रेनों को संचालित करने की योजना बनाई गई है, इसमें रेलवे बोर्ड निजी आपरेटरों के साथ सीधे कंसेशन एग्रीमेंट करने जा रहा है। अब प्राइवेट आपरेटरों को रोलिंग स्टॉक के चयन में भी छूट मिलने जा रही है। प्राइवेट ऑपरेटर चाहे तो विदेशों से ट्रेनसेट/कोच का आयात कर संचालन कर सकता है। उस पर भारतीय रेल के कारखानों में बने ट्रेनसेट्स और कोचों का उपयोग करने की शर्त लागू नहीं होगी। 

यानी देश के बड़े-बड़े रेलवे कारखानों पर भी जल्दी ताला लगने वाला है।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि देश में पहली प्राइवेट ट्रेन ‘तेजस एक्सप्रेस’ के मुनाफे के बारे में झूठी खबरें फैलाई गईं और यह कहा गया कि इसे एक महीने में ही 70 लाख रुपए का मुनाफा हुआ। लेकिन इस पर संसद में उठाए गए सवाल के जवाब में जो बताया गया, उससे इसकी असलियत सबके सामने आ गई। संसद में बताया गया, तेजस को 447.04 लाख रुपये की कुल आमदनी हुई और 439.31 लाख रुपये का खर्च हुआ। इसका अर्थ यह है कि मात्र 7.73 लाख रुपये का मुनाफा हुआ है। इस दरम्यान तेजस की ऑक्यूपेंसी भी मात्र 62% रही है, जबकि इसी रूट पर चलने वाली शताब्दी एक्सप्रेस की ऑक्यूपेंसी 90% से 100% के बीच रही है। 

रेलमंत्री कह रहे थे कि दिल्ली-लखनऊ तेजस एक्सप्रेस को प्रायोगिक आधार पर चलाया गया है। यदि उनकी कही गई यह बात सच है और रेलमंत्री अभी भी अपनी कही गई बात पर कायम हैं, और अब जब तेजस एक्स. का प्रयोग भी असफल हो गया है, तो क्या रेलमंत्री देश को बताएंगे कि फिर कैसे 150 प्राइवेट ट्रेनों को चलाने की अनुमति दी जा रही है?

क्या रेलमंत्री देश के सामने यह भी खुलासा करेंगे कि 26 साल पुरानी रिपोर्ट के आधार पर कैडर मर्जर करके रेलवे का कौन सा भला होने वाला है? और यह भी कि संसद की अनुमति के बिना, सिर्फ कैबिनेट से पास करवाकर, यह कैडर मर्जर संवैधानिक कैसे हो सकता है? क्या रेलमंत्री यह भी बताएंगे कि इस कथित कैडर मर्जर से संविधान के चैप्टर 18, आर्टिकल 309 का उल्लंघन नहीं हो रहा है?








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रेलवे का निजीकरण करके किया जा रहा है यात्रियों की संरक्षा और सुरक्षा के साथ बहुत बड़ा समझौता

कैडर मर्जर और निजीकरण का एजेंडा लागू करने के लिए सोशल मीडिया में चलाई जा रहीं हैं भ्रामक खबरें

रेल प्रशासन की चालबाजी में फंसे रेलवे के किंकर्तव्यविमूढ़ मान्यताप्राप्त संगठन!

#Railway is #essentially a #safety based #transportation #organization. Any #neglect or #superfluous #approach to it, will #lead to #disaster on #safety front

मोदी सरकार अब खुलकर रेलवे का निजीकरण करने पर उतरू हो गई है। निजी ऑपरेटरों को 100 रेलमार्गों पर 150 निजी ट्रेनों के परिचालन की अनुमति दे दी गई है। सरकारी न्यूज एजेंसी पीटीआई के अनुसार निवेश को लेकर ‘निजी भागीदारी: यात्री रेलगाड़ियां’ शीर्षक से एक डिस्कशन पेपर लाया गया है। इसमें कहा गया है कि इन 100 मार्गों पर निजी ट्रेन ऑपरेटर्स को 150 गाड़ियों के परिचालन की अनुमति देने से 22,500 करोड़ रुपये का निवेश आएगा। हालांकि आंकड़ा यह संदिग्ध है।

विशेष बात यह है कि इन प्राइवेट ऑपरेटर्स को अपनी गाड़ियों में बाजार के अनुसार किराया वसूल करने की छूट होगी। वे इन गाड़ियों में अपनी सुविधा के हिसाब से विभिन्न श्रेणियों की बोगियां लगाने के साथ-साथ रूट पर उनके ठहराव वाले स्टेशनों का भी चयन कर सकेंगे।

अब तक तेजस में प्राइवेट आपरेटर्स को किराया तय करने के अलावा ट्रेन के भीतर अपना टिकट चेकिंग स्टाफ तथा कैटरिंग एवं हाउसकीपिंग स्टाफ रखने की छूट दी गई है।

रेलवे अपने इंफ्रास्ट्रक्चर एवं रनिंग स्टाफ का उपयोग करने के लिए प्राइवेट आपरेटर्स से हॉलेज शुल्क वसूल रहा है, लेकिन अब जो 150 ट्रेनों को संचालित करने की योजना बनाई गई है, इसमे रेलवे बोर्ड निजी आपरेटर्स के साथ सीधे कंसेशन एग्रीमेंट करने जा रहा है।

अब प्राइवेट आपरेटर्स को रोलिंग स्टॉक के चयन में भी छूट मिलने जा रही है। प्राइवेट ऑपरेटर्स चाहें तो विदेशों से ट्रेनसेट्स का आयात कर संचालन कर सकते हैं। उस पर भारतीय रेल के कारखानों में बने ट्रेनसेट्स लेने और उनका उपयोग करने की शर्त लागू नहीं होगी।

यानी इसका मतलब यह है कि देश के बड़े-बड़े और सालों से स्थापित रेलवे के कारखानों पर भी जल्दी ही ताला लगने की नौबत आने वाली है।

सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात यह है कि देश में पहली प्राइवेट ट्रेन ‘तेजस एक्सप्रेस’ के नाम से दिल्ली और लखनऊ के बीच चलाई जा रही है। इस ‘तेजस एक्सप्रेस’ के मुनाफे के बारे में झूठी और मनगढ़ंत खबरें पालतू मीडिया के माध्यम से चलाई गईं।

कहा गया कि ‘तेजस’ को एक महीने में ही 70 लाख रुपये का मुनाफा हुआ, लेकिन असलियत कुछ दिनों बाद ही संसद में उठाए गए सवाल से ही बाहर आ गई, जिसमें बताया गया कि तेजस को 447.04 लाख रुपये की कुल आमदनी हुई और 439.31 लाख रुपये का खर्च हुआ। इसका अर्थ यह है कि इसे मात्र 7.73 लाख रुपये का मुनाफा एक महीने में हुआ था।

यही नहीं, इस दरम्यान ‘तेजस’ का ऑक्यूपेंसी लेवल भी मात्र 62 प्रतिशत रहा, जबकि इसी रूट पर चलने वाली शताब्दी एक्सप्रेस का ऑक्यूपेंसी लेवल 90 से 100% के बीच रहा है। ऐसे में रेलवे द्वारा चलाई जा रही शताब्दी एक्सप्रेस रेलवे के लिए फायदेमंद और यात्रियों के लिए किफायती रही है, या तेजस एक्सप्रेस! इस बारे में रेल प्रशासन चुप्पी साधे हुए है।

तेजस को शुरू करने से पहले रेलमंत्री कह रहे थे कि दिल्ली-लखनऊ के बीच तेजस एक्सप्रेस को प्रायोगिक आधार पर चलाया गया है, यदि यह सच है तब तेजस एक्सप्रेस का प्रयोग तो असफल हो गया है।

ऐसे में फिर कैसे 150 निजी ट्रेनों को चलाने की अनुमति दी जा रही हैं? इस सवाल का कोई जवाब रेल मंत्रालय अथवा रेलमंत्री देने को तैयार नहीं हैं। वह सिर्फ सोशल मीडिया में रेलवे की फालतू बातों का प्रचार करने में लगे हुए हैं।