अक्षम रेलकर्मियों के मरने के लिए लावारिस छोड़ देता है रेल प्रशासन – RailSamachar

मामलों को सालों-साल लटकाकर अक्षम रेलकर्मियों को मरने के लिए अकेला छोड़ देना अत्यंत अमानवीय कृत्य है!

खबर है कि मध्य रेलवे में मेडिकल इनवैलीडेशन के बहुत से मामले लंबे समय से पेंडिंग हैं। इसके लिए प्रिंसिपल सीएमडी, मध्य रेलवे द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है। यह पीसीएमडी की अकर्मण्यता है या लापरवाही? यह पूछ रहे हैं मेडिकली काम करने में अक्षम हो चुके रेलकर्मियों के तमाम परिजन।

बताते हैं कि पूरी भारतीय रेल में इस तरह के सैकड़ों-हजारों केस लंबित हैं। परिजनों के सामने उनके मरने की प्रतीक्षा करने के सिवा कोई विकल्प नहीं है।

उनका कहना है कि अपने एकमात्र कमाऊ व्यक्ति को मरते हुए देखना बहुत अमानवीय है, परंतु उनके सामने अन्य कोई विकल्प नहीं बचा है। आर्थिक रूप से भी ऐसे सभी परिवार बुरी तरह टूट चुके हैं।

इस मामले में जानकारों का कहना है कि रेल प्रशासन को वैसे भी संबंधित रेलकर्मी के किसी न किसी परिजन को अनुकंपा नियुक्ति देनी है। ऐसे में अगर लंबे समय से असाध्य बीमारियों के चलते कर्मचारी काम करने में अक्षम और अयोग्य हो चुका है, तो मेडिकली इनवैलीड सर्टिफाई करके और उसके किसी परिजन को अनुकंपा नियुक्ति देकर उसके परिवार को आर्थिक रूप से कंगाल होने से बचाया जा सकता है।

उनका कहना है कि जब उनको नियमानुसार अनुकंपा नियुक्ति देनी ही है, तो रेलकर्मी के मरने का इंतजार किए बिना भी यह काम बहुत आसानी से और मानवता के आधार पर समय रहते किया जाना चाहिए।

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देश की लाइफलाइन – भारतीय रेल – को “कोरोना अवसर” ने स्वार्थ और मंसूबों के लिए निगल लिया!

केंद्र सरकार और रेल मंत्रालय दोनों इस समय साँप-सीढ़ी का खेल खेल रहे हैं। पहले विभिन प्रदेशों में फंसे श्रमिकों को उनके गृह प्रदेश पहुंचाने का खेल श्रमिक स्पेशल चलाकर खेला गया और अब फिर से उन्हें उनके गृह प्रदेश से रोजी-रोटी कमाने के लिए अन्य प्रदेशों में वापस भेजने का खेल चालू हो गया है।

अब तो लूडो का गेम बनाने वाला भी घनचक्कर हो गया है कि उससे भी बुद्धिमान कौन आ गया! सकारात्मक सोच रखने वाले खासकर सत्ताधीश लोग कोरोना को अवसर के रूप में प्रचारित कर रहे थे। शायद उनकी बात को किसी ने सही ढंग से जज नहीं किया।

सरकार सबसे पहले इस अवसर को रेल का दिवाला करके उसे बेपटरी करके ही भुनायेगी। कर्मचारी हैरान और परेशान हैं कि आखिर रेल में हो क्या रहा है??

नियमित गाड़ी नहीं चलेगी, लेकिन उसी के नाम और शेड्यूल पर स्पेशल चलाएंगे। रेल कर्मचारी इतनी गफलत में आ गए हैं कि उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि उन्हें करना क्या है??

Vinod Kumar Yadav, Chairman, Railway Board

धन्य हो प्रशासक और नीति-नियंता ! देश की लाइफ लाइन कही जाने वाली भारतीय रेल को तथाकथित कोरोना नामक अवसर ने अपने स्वार्थ और मंसूबों को पूरा करने के लिए लील लिया !!








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परिचालन दक्षता में सुधार के लिए 21 विषयों पर काम कर रही भारतीय रेल

कोविड-19 लॉकडाउन के बाद रेल परिचालन, अनुरक्षण, निर्माण और अन्य संबंधित गतिविधियों के लिए योजना तैयार करने हेतु बनी समिति का नोडल अधिकारी महाप्रबंधक, उत्तर मध्य रेलवे/उत्तर रेलवे राजीव चौधरी को बनाया गया है

Rajeev Choudhary, GM/NCR-NR

रेल मंत्रालय ने भारतीय रेल की परिचालन दक्षता में सुधार करने के लिए 21 विषयों की पहचान की है। इस संबंध में प्रत्येक विषय के लिए एक नोडल अधिकारी और रेलवे बोर्ड के एक समन्वय अधिकारी सहित विभाग प्रमुखों, कार्यकारी निदेशकों, महाप्रबंधकों सहित वरीष्ठ अधिकारियों की समितियों का गठन किया गया है।

ये समितियां लॉकडाउन अवधि के दौरान विभिन्न डिजिटल प्लेटफार्मों का उपयोग करके बैठक, चर्चा आदि के माध्यम से विचार-विमर्श करेंगी और समन्वय अधिकारी के माध्यम से अपनी रिपोर्ट रेल मंत्रालय को प्रस्तुत करेंगी। राष्ट्रीय ट्रांसपोर्टर की परिचालन दक्षता में सुधार के लिए भारतीय रेल द्वारा पहचाने गए विषय, जिनकी विभिन्न समितियों द्वारा समीक्षा की जाएगी, निम्नवत हैं:

  नई दिल्ली-हावड़ा, नई दिल्ली-चेन्नई, नई दिल्ली- मुंबई, हावड़ा- मुंबई और चेन्नई-हावड़ा खंडों पर  ट्रेनों का ज़ीरो बेस्ड समय सारणीकरण।

•  भारतीय रेलवे के केंद्रीय प्रशिक्षण संस्थानों द्वारा मैनुअलों की समीक्षा और अद्यतीकरण।

•  सेक्शनों और टर्मिनलों पर कंजेशन को कम करने के लिए टाइमलाईन और रोड मैप के साथ महत्वपूर्ण कार्यों की पहचान करना।

  सेक्शन और लूप लाइनों में गति बढ़ाने के लिए वैधानिक सीआरएस निरीक्षण के लिए आवश्यक विभिन्न दस्तावेजों की समीक्षा और प्रोसेसिंग।

•  रेल संचालन और अनुरक्षण में बचत करने और दक्षता लाने के लिए सामग्रियों की खपत की समीक्षा।

•  फिजिकल फ़ाइल मूवमेंट से बचने और साथ ही कार्य कुशलता लाने के लिए भारतीय रेल की सभी इकाइयों में ई-ऑफिस का कार्यान्वयन ।

•  लोकोमोटिव, कोच, वैगन्, सिग्नलिंग गियर आदि जैसे विभिन्न परिसंपत्तियों के अनुरक्षण अवधि  की समीक्षा और दुनिया भर के सर्वोत्तम  मापदंडों के साथ तुलना।

•  तकनीकी प्रगति के दृष्टिगत  विभिन्न रेल परिसंपत्तियों के कोडल लाइफ़ और रिप्लेसमेंट मानकों की समीक्षा।

•  दक्षता और पारदर्शिता में सुधार के लिए कॉन्ट्रैक्टों के तहत निष्पादित कार्यों के आंकलन के लिए ऑनलाइन मेज़रमेंट बुक की शुरुआत करना।

•  परिवहन के लिए नई वस्तुओं की पहचान करने और रेल के माध्यम से परिवहन में बढ़ोत्तरी के लिए व्यावसायिक अध्ययन।

•  अधिक से अधिक रेल प्रतिष्ठानों जैसे कारखानों, अस्पतालों, कोचिंग डिपो, पिटलाइन, लोडिंग पॉइंट, डिपो, स्टेशन, कार्यालयों, ट्रैक्शन सबस्टेशन, रिले रूम आदि को सीसीटीवी निगरानी के तहत लाना।

•  रेल की भूमि आदि के संबंध में रेलवे अधिनियम का अध्ययन और सुझाव।

•  डीएफसी परियोजना के पूरा होने के दृष्टिगत   वैगन, कोच और लोकोमोटिव आदि आवश्यकताओं की समीक्षा।

•  ट्रैक्शन और गैर-ट्रैक्शन ऊर्जा / ईंधन बिल में कमी लाने के उपायों संबंध में।

•  रेल के वविभिन्न रेलवे क्षेत्रों में डेटा एनालिटिक्स, आर्टीफीशियल इंटैलिजेंस जैसी तकनीक का उपयोग ।

•  व्यय कम करने और आय में सुधार करने के उपाय।

•  ऑन बोर्ड हाउसकीपिंग गतिविधि की व्यापक समीक्षा ।

•  कर्मचारियों की मल्टी स्किलिंग और नए क्षेत्र में री- स्किलिंग करना।

•  ट्रेन संचालन के लिए एंड ऑफ ट्रेन टेलीमिट्री और अन्य प्रौद्योगिकियों का प्रयोग ।

  •  मालगाड़ियों की गति को बढ़ाकर माल और यात्री गाड़ियों के बीच की गति के अंतर को कम करना।
  • कोविड -19 लॉकडाउन के बाद भारतीय रेल पर संचालन अनुरक्षण, निर्माण और विनिर्माण गतिविधियों के लिए की कार्य योजना – यह मद कोविड -19 लॉकडाउन के बाद भारतीय रेल के लिए सबसे महत्वपूर्ण है और इस पर विचार एवं कार्यान्वयन उत्तर मध्य रेलवे, पूर्व तटीय रेलवे, मध्य रेल, इंटीग्रेटेड कोच फैक्ट्री के महाप्रबंधकों की समिति द्वारा किया जा रहा है और उत्तर मध्य रेलवे तथा उत्तर रेलवे के महाप्रबंधक श्री राजीव चौधरी इस समिति के नोडल अधिकारी हैं।







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कहीं निजी घाटे की पूर्ति करने के लिए तो नहीं दी जा रही प्राइवेट ऑपरेटरों को अनुमति?

लेकिन ‘विभागवाद’ से ओतप्रोत चेयरमैन, रेलवे बोर्ड (सीआरबी) विनोद कुमार यादव के दांव-पेंच से वंदेभारत को बनाने वाले रेल अधिकारियों पर निहित उद्देश्य से विजिलेंस इंक्वायरी अभी भी चल रही है। इसके चलते एक तरफ जहां रेल अधिकारियों में भारी हताशा व्याप्त है, तो दूसरी ओर देश-विदेश में इन अधिकारियों सहित भारतीय रेल का भी मखौल उड़ाया जा रहा है।

https://twitter.com/sritara/status/1237728058091528192?s=19

मात्र 97 करोड़ की लागत से बनी नई दिल्ली-वाराणसी 22435/22436 वंदेभारत एक्सप्रेस ने एक वर्ष में 115% ऑक्यूपैंसी के साथ 92 करोड़ की कमाई की। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या कोई प्राइवेट ट्रेन ऑपरेटर इससे अच्छी, सस्ती और लाभदायक सेवा दे सकता है? फिर भारतीय रेल के निजीकरण और इम्पोर्ट की ऐसी ताबड़तोड़ जल्दी क्यों है?

खबर है कि 38000 करोड़ की लागत से 60 ट्रेनसेट आयात करने और उससे मोटा कमीशन खाने की योजना जब मीडिया में लीक हो गई, तब देश की आंखों में धूल झोंकने के लिए 44 वंदेभारत रेक बनाने की अनुमति आईसीएफ को दी गई। परंतु इसके लिए जो टेंडर निकाला गया है, बताते हैं कि वह कभी फाइनल नहीं होने वाला है। प्राप्त जानकारी के अनुसार हाल ही इस संबंध में रेलवे बोर्ड में हुई बैठक में कोई सहमति नहीं बन पाई, बल्कि संबंधित अधिकारियों और वेंडर्स के बीच कुछ तथ्यों को लेकर गरमागरम बहस अवश्य हुई।

बताते हैं कि जीएम/आईसीएफ में इतना साहस नहीं है कि वह इस टेंडर को फाइनल कर सकें। विश्वसनीय सूत्रों का तो यह भी कहना है कि ऊपर से दबाव डाले जाने पर भी वह यह काम नहीं कर पाएंगे। एक अपुष्ट खबर यह भी है कि पहले सिर्फ 10 रेक बनाने की अनुमति दी गई थी, मगर प्रोपल्शन सिस्टम उपलब्ध कराने वाली कंपनी से जब मोटे कमीशन की डिमांड की गई, तब उसने रेक की संख्या बढ़ाने की मांग कर दी। बताते हैं कि इस तरह 10 रेक को बढ़ाकर 44 रेक किया गया।

सूत्रों का कहना है कि अब यह 44 रेक का टेंडर भी कभी फाइनल नहीं होगा, क्योंकि पहले वाली आयात योजना मीडिया के कारण फेल हो जाने से कमीशन का जो भारी निजी घाटा हुआ है, उसकी भरपाई प्राइवेट ऑपरेटरों को ट्रेनसेट आयात करने की अनुमति देकर की जा रही है।

देश में इस समय करीब 10 करोड़ युवा बेरोजगार हैं और यह बेरोजगारी लगातार बढ़ती जा रही है। रेल मंत्रालय ने भर्ती के नाम पर बेरोजगारों से फार्म भरवाकर पिछले एक साल से भी ज्यादा समय से उनकी 1000 करोड़ रुपये से भी अधिक की राशि हड़प रखी है। परंतु एक साल से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद इस भर्ती की कोई तारीख घोषित नहीं कर सका है।

https://youtu.be/0tsBT7SWLdw

महात्मा गांधी ने विदेशी उत्पादों के बहिष्कार से इंग्लैंड के उद्योगों की कमर तोड़ डाली थी, देशी खादी को बढ़ावा दिया था और ब्रिटिश-शासन को उखाड़ फेंका था। लेकिन ‘अति-समझदार’ रेलमंत्री पीयूष गोयल और ‘नासमझ’ सीआरबी विनोद कुमार यादव स्वदेशी रेल उद्योग को नष्ट करके निजी रेल कंपनियों के माध्यम से ट्रेनसेट इंपोर्ट करने पर आमादा हैं। जबकि देश में करोड़ों युवा बेरोजगारी के कारण इधर-उधर भटक रहे हैं।

Uncertainty on Cadre-Merger issue

Does CRB VKYadav think before he leaps? He has quite obviously misled the Cabinet.

Now he say that officers will be permitted to remain in their “own” cadres since IRMS is not legally enforceable. Were Law Ministry, DOPT and UPSC consulted before making the Cabinet note?

What does mean Mr BACKTRACKER

On Cadre-Merger CRB VKYadav initially claimed that none would suffer, then he backtracked & said that some people may lose & some gain. Now in a complete reversal he says that officers need not opt for IRMS.

https://twitter.com/kanafoosi/status/1228955966814572544?s=19

#CRB #VKYadav #CadreMerger #IRMS #DoPT #UPSC #Cabinet #TrainSet #Vandebharat #IndianRailway #PiyushGoyal #PMO #PMOIndia 





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कदाचारी स्टाफ के लिए कोई मायने नहीं रखता विभाग प्रमुख का आदेश

सीएमआई/कानपुर के पद पर कदाचारी की पुनः पोस्टिंग की जुगाड़

‘डीलिंग’ हो चुकी, अब सीसीएम के आदेश का कोई महत्व नहीं!

अब तक क्यों नहीं हुई फर्जी कोटेशन वर्क, बिना टेंडर पार्किंग/डीलक्स टॉयलेट संचालन आदि अनियमितताओं की जांच

कानपुर : वैसे तो वर्तमान में पूरी ‘रेलवे सिस्टम’ में ही भांग मिली हुई है, कहीं कम कहीं ज्यादा, पर भ्रष्टाचार और मनमानी का बोलबाला चौतरफा है। ऐसे में उत्तर मध्य रेलवे जोन और इलाहाबाद मंडल में खासकर वाणिज्य विभाग से जारी होने वाले ट्रांसफर/पोस्टिंग आदेश और उनमें किए जाने वाले परिवर्तन अथवा उनके निरस्तीकरण मानो भांग खाकर ही किए जा रहे हैं। अब हर जगह जीएम/उ.म.रे राजीव चौधरी खुद तो निगरानी करने जा नहीं सकते। इसलिए नीचे के अफसर अपनी मनमानी करने पर उतारू हैं।

गौरतलब है कि जीएम श्री चौधरी ने ही कानपुर के महाकदाचारी पूर्व डिप्टी सीटीएम एवं स्टेशन निदेशक को बिना किसी रिलीवर के रातोंरात हटाकर झांसी मंडल में मई, 2019 में जॉइन करवाया था और उनकी सारी राजनीतिक पकड़ की तथाकथित हेकड़ी पल भर में निकाल दी थी। इसके बाद उसी के अगले सप्ताह इसी कड़ी के भ्रष्ट सुपरवाइजर को पीसीसीएम एम. एन. ओझा ने तुरंत प्रभाव से सीएमआई के पद से हटाकर उसके मूल कैडर बुकिंग में भेज करके कानपुर एरिया में फैले भ्रष्टाचार की सड़ांध को काफी हद तक खत्म करने का महत्वपूर्ण काम किया था।

लेकिन कहावत है कि पैसा और जुगाड़ बड़ा बलवान होता है। पता चला है कि इसी दोनों के दम पर उस अदने से बुकिंग सुपरवाइजर ने पीसीसीएम के आदेश को धता बताकर फिर से कानपुर में सीएमआई के पद पर आने की डीलिंग कर ली है। वह भी तब जब सीनियर डीसीएम नवीन दीक्षित द्वारा प्रशासनिक आधार पर उसका आवधिक स्थानांतरण कानपुर से फतेहपुर में कर दिया गया है। (देखें क्रम सं.6, कार्यालय आदेश सं. 631, दि. 08.11.2019)।

विश्वसनीय स्रोतों से पता चला है कि दंभ में वह लोगों से कहता फिर रहा है कि ‘अधिकारी को हड्डी फेंको और जो चाहे वो करा लो, चाहे वो सीसीएम, सीनियर डीसीएम या डिप्टी सीटीएम ही क्यों न हों, पैसा सबको चाहिए।’

यह भी पता चला है कि उसकी कानपुर में सीएमआई के पद पर पुनः पोस्टिंग की सिफारिश झांसी में सीनियर डीसीएम के पद पर पदस्थ उसके भागीदार पूर्व स्टेशन डारेक्टर/कानपुर द्वारा भी की जा रही है। इसके अलावा कानपुर सेंट्रल में दैनंदिन आधार पर पार्सल की लीज अवैध तरीके से लेकर रेलवे को लाखों का चूना लगाने वाले दलालों द्वारा भी की जा रही है, क्योंकि इन भ्रष्ट लोगों को डर है कि यदि उन लोगों से संबंधित फाइल खुल गई, तो बहुत लोग सलाखों के पीछे पहुंच जाएंगे।

यही नहीं, पिछले तीन सालों में कोटेशन के नाम पर फर्जी काम दिखाकर पूर्व स्टेशन डायरेक्टर द्वारा रेलवे को लाखों रुपये का चूना लगाया गया है। इसके अलावा उन्होंने पार्किंग और डीलक्स टॉयलेट का कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने के बाद अवैध तरीके से दोनों का संचालन कई महीनों तक करा करके प्रतिमाह लाखों रुपए अवैध ढंग से वसूला, जिसमें स्टेशन अधीक्षक, सीएमआई भी शामिल रहे हैं।

कर्मचारियों का कहना है कि उपरोक्त सभी अनियमितताओं की जांच अब तक जोनल विजिलेंस द्वारा शुरू क्यों नहीं की गई है, जबकि यह मामले कई बार मीडिया में आ चुके हैं। उनका कहना था कि इसका मतलब क्या यह समझा जाए कि विजिलेंस की भी उक्त मामलों में कोई मिलीभगत है अथवा वह किसी दबाव में है!

जानकारों का कहना है कि इस अनियमितता पर नए पदस्थ स्टेशन डायरेक्टर हिमांशु उपाध्याय ने आते ही रोक लगाई और स्वयं के प्रयत्नों से खत्म हो चुके ऐसे लगभग सभी कॉन्ट्रेक्ट्स को नए सिरे से अवार्ड कराया। हालांकि उनकी भी कुछ कारगुजारियों पर स्टाफ को शक है और वह खासकर मैनपावर प्लानिंग को लेकर आपस में ‘कानाफूसी’ कर रहे हैं, लेकिन यकीनी तौर पर कोई भी स्टाफ ठोस सबूत देने से फिलहाल बच रहा है।

अब जहां तक बात तथाकथित सीएमआई की है, तो इस मुद्दे पर पता चला है कि इस वक्त सीनियर डीसीएम इलाहाबाद नवीन दीक्षित ऑफिसियल ट्रेनिंग पर जापान गए हैं। चूंकि ट्रांसफर आर्डर उन्होंने ही निकाला है, इसलिए उनके वापस आते ही उक्त बुकिंग सुपरवाइजर द्वारा अपना आर्डर कैंसिल कराकर कानपुर में सीएमआई के लिए करा लिया जाएगा। उसका कॉन्फिडेंस इतना है कि खुलेआम कहता फिर रहा है कि ‘डीलिंग हो चुकी है, इसमें अब सीसीएम के आदेश का कोई महत्व नहीं रह गया है।’

अब पीसीसीएम को यह तय करना है कि क्या एक अदने से बुकिंग स्टाफ के पास इतनी ताकत आ गई है कि उसे अब पीसीसीएम का आदेश भी तुच्छ लगने लगा है? क्या उसके लिए पीसीसीएम का पद इतना गैरमामूली है कि वह दूसरे स्टाफ के सामने उसका सम्मानजनक तरीके से उच्चारण भी करना जरूरी नहीं समझता? अथवा क्या वह अपनी इस लूट-खसोट और कदाचार में उनके भी शामिल होने का कोई संकेत दे रहा है?








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