बिहारी मजदूरों को लूट रहे पटना जंक्शन के टीटीई – RailSamachar

पटना जंक्शन के टिकट चेकिंग स्टाफ का भ्रष्टाचारपूर्ण कारनामा

गाड़ी संख्या 02587/ 05097/ 02331, जो जम्मू की तरफ जाती है, में पटना जंक्शन का कुछ टिकट चेकिंग स्टाफ यात्रियों से जमकर वसूली करता है।

मामला दरअसल यह है कि बिहार से बहुत सारे मजदूर अब कोरोना का कहर कुछ कम होने के बाद पंजाब, हिमाचल और जम्मू की तरफ रोजी-रोटी कमाने के लिए वापस लौट रहे हैं। ये लोग ज्यादातर अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे होते हैं।

कोई अगर थोड़ा-बहुत पढ़ा लिखा होता भी है तो भी यहां के टीटीई बाबू की तरफ से बनाई गई टिकट की रसीद ये मजदूर लोग तो क्या खुद टीटी बाबू भी न पढ़ पाएं।

ऐसे बहुत से लोगों को कन्फर्म टिकट नहीं मिलता, मगर ये लोग गाड़ी में बैठ जाते हैं या इन्हें बैठा दिया जाता है। टिकट का पूरा किराया जुर्माने सहित और उससे भी अधिक इनसे ले लिया जाता है।

मगर इनको दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन (डीडीयू) तक की ही टिकट बनाकर गाड़ी में यह कहकर बैठा देते हैं कि “आपकी जम्मू तक की टिकट बना दी है। चिंता मत करो, कोई दिक्कत नहीं होगी, आगे आपको कोई परेशान नहीं करेगा।”

रविवार, 13 जून को गाड़ी संख्या 02331 में ऐसे ही 42 लोग पकड़े गए, जिनमें से 8 को जालंधर, 22 को पठानकोट और बाकी को जम्मू जाना था। इनसे टिकट के निर्धारित किराए से भी अधिक पैसा लेकर गाड़ी में बिठा दिया गया था।

जालंधर में जब ये लोग नीचे उतरे तो इनको वहां के टिकट चेकिंग स्टाफ ने पकड़ लिया और जब उन्होंने इनके पास से मिली रसीद चेक की तो पता चला कि वह तो पटना जंक्शन से दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन तक की ही बनी हुई है।

यह पटना जंक्शन के टिकट चेकिंग स्टाफ की EFT है जिसे देखकर कोई भी ये नहीं बता सकता कि इस पर क्या लिखा है। यह 420220 नंबर से लेकर 420234 नंबर तक की EFT एक ही चेकिंग स्टाफ ने बनाई है, जो जालंधर में पकड़ी गई है।

तभी यात्रियों ने वहां रो-रोकर बताया कि उनसे तो पटना जंक्शन पर बहुत ज्यादा पैसे ले लिए गए हैं और फिर भी उनको गलत टिकट क्यों बनाकर दी गई।

बहरहाल, जालंधर में इन लोगों को फिर से जुर्माना देकर टिकट बनवानी पड़ी। ऐसे ही पठानकोट में भी हुआ और जम्मू जाने वाले 12 लोग कठुआ में उतर कर भाग गए।

इस तरह पटना जंक्शन का कुछ टिकट चेकिंग स्टाफ इन बिहारी मजदूरों को जमकर लूट रहा है और पता नहीं कि उनकी यह लूट-खसोट कब से चल रही है।

ये वह #EFT (एक्सट्रा फेयर टिकट) रसीद है जिससे यात्रियों को जालंधर में दुबारा जुर्माने सहित पैसा भरना पड़ा।

अतः रेल प्रशासन द्वारा पिछले एक-डेढ़ साल के दौरान पटना जंक्शन से डीडीयू स्टेशन तक की बनाई गई सभी टिकट रसीदों (ईएफटी) की गहराई से जांच की जानी चाहिए और संबंधित चेकिंग स्टाफ की जिम्मेदारी तय करते हुए उनके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।

#Patnajn #EastCentralRailway #ECR #Ticket #IndianRailway #NorthernRailway #TTE





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निर्दोष यात्री को पकड़कर लूटा – RailSamachar

सभी संबंधित अधिकारियों ने लिखित शिकायत के बावजूद अब तक कोई संज्ञान नहीं लिया

सवाल: आईपीएफ एवं संबंधित आरपीएफ कर्मियों के विरुद्ध तत्काल निलंबन और बर्खास्तगी की कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

सुरेश त्रिपाठी

सोलापुर आरपीएफ के उल्लेखनीय कारनामे लगातार सामने आ रहे हैं। अब यह जो मामला सामने आया है, वह और ज्यादा गंभीर है, क्योंकि इसमें एक निर्दोष यात्री, जो कि पूर्व रेल कर्मचारी भी है, को अकारण पकड़कर न सिर्फ ३६-४० घंटे तक सोलापुर से कलबुर्गी तक प्रताड़ित किया गया, बल्कि उसे रात भर लॉक अप में बंद रखकर गंदी-गंदी गालियां दी गईं और उसके पास से पांच हजार तीन सौ सात रुपए भी लूट लिए गए। ऐसी अन्यायपूर्ण और गैरकाननी गतिविधियाँ अक्सर यहां आईपीएफ/सोलापुर के कार्यक्षेत्र में घटित हो रही हैं, तथापि रेल प्रशासन को इसकी कोई परवाह है, ऐसा कम से कम उसके आचरण से तो नहीं लगता है।

यह घटना काजल नगर, होटगी रोड, सोलापुर निवासी महबूब सलीम पठान, जो कि पहले सोलापुर मंडल, मध्य रेलवे के सिग्नल एवं दूरसंचार विभाग का कर्मचारी भी रह चुका है, के साथ २३/२४ फरवरी की दरम्यानी रात को १ बजे तब घटित हुई, जब वह बकायदा रेल टिकट लेकर सोलापुर से कलबुर्गी जा रहा था। ‘रेलसमाचार’ को ईमेल पर सभी संबंधित अधिकारियों को भेजी गई अपनी लिखित शिकायतें, एफआईआर इत्यादि सहित समस्त जानकारी भेजकर बाद में मोबाइल पर बात करके पठान ने बताया कि वह २३ फरवरी की रात को ट्रेन सं १६३८१, कन्याकुमारी एक्सप्रेस से कलबुर्गी जाने के लिए निकला था, तभी उसे आरपीएफ वालों ने अकारण पकड़कर लॉक अप में बंद कर दिया।

पठान के बताए अनुसार जब वह प्लेटफार्म सं १ से टिकट लेकर प्लेटफार्म सं ३ की तरफ ट्रेन पकड़ने जा रहा था, तभी आरपीएफ के चार लोगों ने उसे रोककर पूछा कि कहां जा रहे हो। इस पर उसने उन्हें अपने गंतव्य के बारे में बताया और अपना टिकट भी उन्हें दिखाया। फिर भी वह लोग उसे आरपीएफ ऑफिस में ले गए और लॉक अप में बंद कर दिया, जबकि उसने कोई गलती भी नहीं की थी। उसके पूछने पर भी उन लोगों ने उसका अपराध नहीं बताया तथा कोई उसकी बात सुनने को भी तैयार नहीं था।

उसने बताया कि २४ फरवरी को सुबह करीब ६.२० बजे लॉक अप से निकालकर उसके पास से उसका मोबाइल, एटीएम कार्ड, उसके स्कूटर की चाबी, रेलवे टिकट और ५३०७ रुपए नकद उससे छीन लिया गया। इसके बाद अपराधियों वाली स्लेट पकड़ाकर उसकी फोटो भी निकाली गई। तत्पश्चात दोपहर को करीब १२ बजे गाड़ी सं ११०१३ से उसे लेकर कलबुर्गी गए और वहां जीआरपी को सौंप दिया। उसने बताया कि जीआरपी लॉक अप में वह बेहोश हो गया था, क्योंकि उसको लगभग १२-१४ घंटे से खाने के लिए कुछ भी नहीं दिया गया था।

पठान ने बताया कि उसे बेहोशी की हालत में जीआरपी वालों ने कलबुर्गी के सिविल हॉस्पिटल में ले जाकर भर्ती किया। इसका पता उसे होश आने पर हॉस्पिटल में चला। पठान का कहना था कि सूचना मिलने पर जब उसके परिजन आए, तब अगले दिन जीआरपी कलबुर्गी ने उसे जमानत पर छोड़ा, मगर अन्य सामान के साथ उसके नकद ५३०७ रुपए और उसका रेल टिकट नहीं लौटाया। इसके पहले उन्होंने उसकी माँ और भाई से कुछ सादे पेपर्स पर उनके हस्ताक्षर करा लिए थे।

भुक्तभोगी महबूब पठान ने बताया कि जमानत पर छूटने के बाद उसने डीएससी/सोलापुर और मंडल रेल प्रबंधक/सोलापुर को इस घटना की विस्तृत जानकारी दी और कार्रवाई करने की मांग भी की। इसके पहले उसने कलबुर्गी से लौटने के तत्काल बाद २५ फरवरी को सदर बाजार पुलिस स्टेशन, सोलापुर में उक्त चारों आरपीएफ वालों के विरुद्ध एफआईआर (सं १९४१००१६०७२०००००४) दर्ज करवा दी थी और ट्विटर के माध्यम से संबंधित सभी अधिकारियों को अवगत करा दिया था।

देखें और सुनें महबूब पठान की जुबानी उसकी आपबीती कहानी-

https://youtu.be/-ko6kUFgcE0

बहरहाल, उपरोक्त घटना को घटित हुए लगभग एक महीना होने जा रहा है, परंतु अब तक किसी भी अधिकारी ने इसका न तो संज्ञान लिया है और न ही कोई उचित कार्रवाई की गई है। जबकि लिखित शिकायत में आरोपी आरपीएफ वालों के नाम भी बताए गए हैं। उल्लेखनीय है कि उक्त चारों आरोपी आरपीएफ कर्मियों में कांस्टेबल कुंदन सिंह, कांस्टेबल सचिन शिंदे, कांस्टेबल दत्ता कचरे और कांस्टेबल राजकुमार उरांव शामिल हैं। यह चारों भ्रष्ट आरपीएफ कर्मी, महाभ्रष्ट आईपीएफ/सोलापुर राकेश कुमार सिंह के ‘स्पेशल’ वाले बताए गए हैं।

डीजी/आरपीएफ अरुण कुमार और पीसीएससी/मध्य रेलवे अतुल पाठक चाहे जितनी कोशिश कर रहे हों इन भ्रष्टों और महाभ्रष्टों को सुधारने की, मगर वह अपनी इन कोशिशों में कम से कम अब तक कामयाब नहीं हो पाए हैं। सवाल यह है कि यदि आरपीएफ पोस्टें ‘अलॉट’ नहीं हो रही हैं, तो आरपीएफ निरीक्षकों में इस कदर भ्रष्टाचरण पैदा कैसे हुआ?

दूसरा सवाल यह उठाया जा रहा है कि इतनी बड़ी घटना को खुलेआम अंजाम दिया गया, तथापि सारे प्रत्यक्ष सबूत उपलब्ध होने के बावजूद अब तक उक्त चारों दोषी आरपीएफ कर्मियों के खिलाफ तत्काल निलंबन और बर्खास्तगी की आवश्यक कार्रवाई क्यों नहीं की गई? उच्च आरपीएफ प्रशासन की इस शिथिलता को क्यों न संबंधित आरपीएफ कर्मियों और आईपीएफ/सोलापुर का फेवर माना जाए?

फोटो परिचय: आईपीएफ/सोलापुर एवं उसके ‘पालतू जीरो पुलिस’ तथा ‘स्पेशल’ वालों के संरक्षण में सोलापुर रेलवे स्टेशन पर अवैध हाकर। रेलमंत्री और डीजी/आरपीएफ के ‘हाकर मुक्त रेलवे’ के दावे को मुंह चिढ़ाते हुए अवैध खाद्य पदार्थ विक्रेता सिर्फ सोलापुर में ही नहीं, बल्कि भारतीय रेल के किसी भी स्टेशन पर खुलेआम अपना धंधा करते हुए देखे जा सकते हैं।








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भारतीय रेल में मची है लूट, जो लूट सके सो लूट ! – RailSamachar

पू.म.रे.निर्माण संगठन के डिप्टी सीईई/सी/साउथ द्वारा की जा रही है भारी लूट और अनियमितता

वर्तमान डिप्टी सीईई/सी/साउथ/महेंद्रूघाट को रेलवे बोर्ड से मिलीं एक साल में पांच मनचाही पोस्टिंग

काम करवाता है धनबाद का एईई/सी, मगर बिलिंग/भुगतान करवाता है डिप्टी सीईई/सी के चरणों में बैठा एईई/सी

पटना : पूर्व मध्य रेलवे का निर्माण संगठन इसकी स्थापना से ही भ्रष्टाचार का बहुत बड़ा गढ़ बन चुका था। एक अनुमान के अनुसार यहां अब तक जितना जमीनी निर्माण कार्य हुआ है, और उसकी जितनी लागत दर्शाई जा चुकी है, यदि इसका एक तुलनात्मक अध्ययन करवा लिया जाए, तो निष्कर्ष यही निकलेगा कि उतनी ही धनराशि में बिहार के कोने-कोने तक रेल लाइन बिछाई जा सकती थी। यहां बोगस टेंडर, फर्जी टेंडर, एडवांस टेंडर, एक ही कार्य के लिए दोहरे-तिहरे टेंडर और सालों पहले मटीरियल की एडवांस खरीद के टेंडर इत्यादि के रूप में हजारों-लाखों करोड़ रुपये की अफरा-तफरी अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से अब तक हो चुकी है।  इसी कड़ी की एक छोटी सी बानगी प्रस्तुत मामला भी है-

1. गढ़वा-सिंगरौली सेक्शन में सामान्य विद्युत कार्यों (जनरल इलेक्ट्रिक वर्क्स) के लिए लगभग 9.60 करोड़ रुपये का टेंडर निकाला गया है। जबकि इसी तरह का काम (सिमिलर नेचर ऑफ वर्क) अभी एक एग्जिस्टिंग कांट्रेक्ट द्वारा चल ही रह है और यह चालू कार्य अभी कम्पलीट भी नहीं हुआ है।

2. इसी तरह जरणादिह-पतरातू सेक्शन में भी जनरल इलेक्ट्रिक वर्क्स के लिए लगभग 9.60 करोड़ रुपये यानि समान लागत का दूसरा टेंडर भी निकाल दिया गया है। जबकि इसी तरह का काम अभी एक एग्जिस्टिंग कांट्रेक्ट द्वारा चल ही रह है। और वह अभी कम्पलीट भी नहीं हुआ है। (उक्त दोनों टेंडर्स की प्रतियां भी यहां प्रस्तुत हैं).

उक्त दोनों टेंडर की ओपनिंग डेट 14.11.19 है। जानकारों का मानना है कि इतने हाई वैल्यू के दो-दो टेंडर्स की फिलहाल कोई जरूरत नहीं है। वह भी तब जबकि दोनों सेक्शन के लिए एक-एक चालू कांट्रेक्ट अभी उपलब्ध है। नियमानुसार ‘सिमिलर नेचर ऑफ वर्क’ का एक टेंडर कम्प्लीट  किए बिना दूसरा नया टेंडर नहीं निकाला जा सकता है, क्योंकि मेजरमेंट में डुप्लीकेसी होने की पूरी संभावना बनी रहती है।

जानकारों का कहना है कि उक्त दोनों टेंडर के वर्क शेड्यूल में 33 केवी का क्रेडेंशियल बिना वजह का डाला गया है, ताकि किसी खास कांट्रेक्टर को फेवर किया जा सके। उनका कहना है कि दोनों टेंडर में 33 केवी से संबंधित कार्यों की कुल वैल्यू लगभग 15 लाख है। जबकि ऐसा करने से 33 केवी का क्रेडेंशियल टेंडर की पूरी वैल्यू के लिए लागू हो जाता है।

इसके अलावा जानकारों का यह भी कहना है कि साइट पर 33 केवी का अब कोई काम नहीं है। और यदि है, तो एग्जिस्टिंग कांट्रेक्ट के माध्यम से उक्त कार्य को बड़ी आसानी से किया जा सकता है। जानकारों का यह भी कहना है कि टेंडर को बेवजह और जानबूझकर ‘रेस्ट्रिक्टिव’ बनाया गया है, ताकि बहुत सीमित कंपीटीशन हो, जिससे अपने किसी मनचाहे और खास चहेते कांट्रेक्टर को उक्त टेंडर अवार्ड किया जा सके। इसके अलावा इस ‘रेस्ट्रिक्शन’ का अन्य कोई अर्थ नहीं हो सकता है।

उल्लेखनीय है कि वर्तमान डिप्टी सीईई/कंस्ट्रक्शन/साउथ, महेंद्रूघाट, पटना के बारे में केवल इतना ही बताना काफी होगा कि ये महाशय विगत एक वर्ष से भी कम समय में सीनियर डीईई/टीआरडी, मुगलसराय से आरडीएसओ, फिर आरडीएसओ से पूर्व मध्य रेलवे में सीनियर डीईई/टीआरडी, सोनपुर, पुनः सीनियर डीईई/टीआरडी/सोनपुर से सीनियर डीईई/जी/दानापुर और अब डिप्टी सीईई/सी/साउथ, महेंद्रूघाट, पटना में अपनी महती जुगाड़ से मनचाही पोस्टिंग पा चुके हैं।

जानकारों का कहना है कि एक साल के अंदर चूंकि इतने सारे ट्रांसफर और मनचाही पोस्टिंग पाने के लिए काफी रुपया खर्च किए होंगे, इसीलिए उक्त पोस्ट पर जॉइन करते ही मनमानी तरीके से टेंडर निकलकर धन उगाही में फौरन जुट गए हैं। उनका यह भी कहना है कि इसके अलावा ट्रांसफर एलाउंस के रूप में भी इन्होंने रेलवे रेवेन्यू को लाखों रुपये का चूना लगाया है। महाभ्रष्ट पूर्व मेंबर ट्रैक्शन की नजदीकी का इन जैसे कदाचारियों को भरपूर इनाम मिला है।

जानकारों ने यह भी बताया कि एक-एक सेक्शन में ‘सिमिलर वर्क’ के लिए इन्होंने कई-कई टेंडर निकाले हुए हैं, ताकि एक ही किए गए काम को कई सारे कॉन्ट्रेक्ट्स में बोगस भुगतान करके मोटा मुनाफा कमाया जा सके और अधिक से अधिक धन की उगाही एवं बंदरबांट की जा सके। जानकारों का अनुमान यह है कि भुगतान किसी एक टेंडर का किया जाएगा और बाकी टेंडर्स की राशि बोगस भुगतान के जरिए आपस में बांट ली जाएगी। उनका कहना है कि सिमिलर नेचर ऑफ वर्क के कई टेंडर एक साथ चलाने के पीछे उनकी यही रणनीति हो सकती है। यानि यह बोगस टेंडरिंग का मामला भी है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार डिप्टी सीईई/सी/साउथ के सभी कार्यों की समस्त बिलिंग एईई/सी/साउथ/महेंद्रूघाट के द्वारा की जाती है। जबकि एईई/सी/साउथ/धनबाद पर दूसरा अधिकारी मौजूद है। यानि काम करवाने के लिए एईई/सी/धनबाद  है मगर उसके कराए गए कार्यों की बिलिंग और भुगतान निर्माण मुख्यालय महेंद्रूघाट, पटना में डिप्टी सीईई/सी/साउथ के पवित्र (भ्रष्ट) चरणों में बैठकर एईई/सी/साउथ कर रहा है। इसका अर्थ यह है कि काम कोई करा रहा है, मगर कमीशन की मलाई कोई और खा रहा है।

जानकार बताते हैं कि डिप्टी सीईई/सी/साउथ महोदय का एक खास चेला एसएसई/इलेक्ट्रिक के. के. सिंह है, जिसको पिछले कई सालों से इस तरह की फर्जी/फाल्स/बोगस बिलिंग करने/करवाने की महारत हासिल है। वर्तमान में डिप्टी सीईई/सी/साउथ/महेंद्रूघाट ओम शंकर प्रसाद, एईई/सी/साउथ/महेंद्रूघाट डी. एन. तिवारी और एसएसई/इलेक्ट्रिक के.के.सिंह तथा एसएसई/सी/इलेक्ट्रिक, बरकाकाना की चौकड़ी से रेलवे को अब तक करोड़ों का चूना लग चुका है, जबकि निकट भविष्य में अभी सैकड़ों करोड़ का चूना और लगने-लगाने की पूरी तैयारी है। जानकारों का कहना है कि इस तरह से ऐसे लोंगों की करोड़ों की कमाई हो रही है।

रेल प्रशासन को चाहिए कि इन अधिकारियों के अधीन चल रहे सभी विद्युत निर्माण संबंधी कार्यों की सीबीआई से जांच कराकर ऐसे अधिकारियों को न सिर्फ कड़ी सजा दी जाए, बल्कि जांच पूरी होने तक इन्हें अन्य किसी दूरस्थ जोनल रेलवे में अविलंब स्थानांतरित किया जाए।

पूर्व मध्य रेलवे निर्माण संगठन के मामले में बोगस टेंडर, सिमिलर वर्क के लिए दोहरे-तिहरे टेंडर सिर्फ विद्युत विभाग में ही किए जा रहे हैं, ऐसा नहीं है, बल्कि ऐसे काम इंजीनियरिंग कंस्ट्रक्शन साइड से तो और भी बड़े पैमाने पर किए जा रहे हैं। इसकी खबर भी जल्दी ही सामने आएगी। उत्तर रेलवे निर्माण संगठन के बाद यदि कहीं सर्वाधिक भ्रष्टाचार और लूट है, तो वह पूर्व मध्य रेलवे निर्माण संगठन में ही हो सकती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या केंद्रीय सार्वजनिक राजस्व को मिलकर लूटने के लिए ही सात नए जोनल मुख्यालय बनाए गए थे?

इसके अलावा जहां पूर्व मेंबर ट्रैक्शन घनश्याम सिंह जैसे महाभ्रष्ट बैठे रहे हों, वहां यह तो समझ में आता है कि रेल प्रशासन ऐसे भ्रष्ट और कदाचारी अधिकारियों पर बार-बार मेहरबान क्यों होता है, जिनको एक साल के अंदर रेलवे बोर्ड से कई-कई बार मनचाही पोस्टिंग दी गई, मगर यह समझ से परे है कि रेलवे बोर्ड विजिलेंस और सीबीआई सहित स्थानीय जांच एजेंसियां कहां सोती रहती हैं? जहां तक जोनल विजिलेंस की बात है, तो ऐसे मामलों में न सिर्फ उसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है, बल्कि उसकी मिलीभगत और भागीदारी के बिना ऐसा खुला भ्रष्टाचार और लूटतंत्र चल पाना संभव नहीं हो सकता!








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