विजिलेंस माफिया द्वारा खड़े किए वॉलंटियर्स के चलते वेंटीलेटर पर गई भारतीय रेल

कैंसर की तरह देश की पूरी व्यवस्था में फैला हुआ है कंप्लेंट माफिया का बड़ा तंत्र !

सरकार ही जाने कि आज तक उसकी भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था के कितने उद्देश्य पूरे हुए?

सुरेश त्रिपाठी

रेलवे बोर्ड विजिलेंस से निकाले गए तीनों आईआई (इंवेस्टीगेशन इंस्पेक्टर) “देर आए, दुरुस्त आए“ और “क्या कारण है कि सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे में ही बनते हैं“ शीर्षक से प्रकाशित पिछली दो किस्तों में उजागर हुई अपनी करतूतों से इतने विचलित हुए हैं, अथवा रेलवे विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन विचलित हुआ है, कि अब और ज्यादा उनके कुकर्म उजागर न हों, इसके लिए वे विभिन्न माध्यमों से हम पर दबाव बना रहे हैं। इसके लिए वे अपने मीडिया सहित भिन्न-भिन्न स्रोतों-संपर्कों का इस्तेमाल कर रहे हैं, क्योंकि इससे उनके रेलवे बोर्ड में बने रहने अथवा किसी रेलवे पीएसयू में एडजस्ट होने पर ही नहीं, बल्कि उनके संरक्षकों के हितों पर भी खतरा मंडराता नजर आ रहा है।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि निष्कासित किए गए इन तीनों आईआई की कुत्सित करतूतों को तब उजागर किया जा सका है, जब डायरेक्टर विजिलेंस (पुलिस), रेलवे बोर्ड ने महीनों तक फील्ड में की जा रही इनकी कारगुजारियों पर दिल्ली पुलिस के सहयोग से लगातार नजर रखी थी। उनकी ही पुख्ता सबूतों के साथ सब्मिट की गई रिपोर्ट के आधार पर इन तीनों को अब और ज्यादा रेलवे बोर्ड विजिलेंस में बनाए रख पाना ट्रैफिक विजिलेंस के अधिकारियों के लिए आसान नहीं रह गया था। परिणामस्वरूप इन्हें तुरंत बाहर किया गया है। तथापि अब निर्लज्ज विजिलेंस अथवा उसकी नाक का सवाल न बनाकर उक्त रिपोर्ट के आधार पर इन तीनों को मेजर पेनाल्टी चार्जशीट भी पकड़ाने के साथ ही इन्हें इनके पैरेंट कैडर/रेलवे में भेजा जाना चाहिए, तभी इनके द्वारा सताए गए, उत्पीड़ित किए गए रेलकर्मियों और अधिकारियों के साथ समुचित न्याय हो पाएगा।

अब आगे..

सारे पीडब्ल्यूआई, एसएसई, टीटीई और जनसामान्य यानि यात्रियों के सीधे संपर्क में काम करने वाला स्टॉफ चोर नहीं होता, और न ही उनके एडीईएन, सीनियर डीईएन, एडीएमई, सीनियर डीएमई, एडीईई, सीनियर डीईई, एएसटीई, सीनियर डीएसटीई, एसीएम, सीनियर डीसीएम, एओएम, सीनियर डीओएम, एडीएफएम, सीनियर डीएफएम आदि भी हमेशा गलत नहीं होते। यह सभी मंडल अधिकारी जिन परिस्थितियों में और जिन मुश्किलों का सामना करते हुए काम कर रहे होते हैं, उसी से रेलवे का अस्तित्व इतनी अंधेरगर्दी के बाद भी अब तक बचा हुआ है।

यही वे लोग हैं, जो अपने जीवन का अधिकांश समय अपने परिवार को न देकर, यहां तक कि अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान न रखकर दधीचि की तरह रेलवे को चलाते रहे हैं। इनका प्रयास होता है कि उनका यह क्षण बिना किसी अनहोनी के गुजर जाए और रेलवे को जो आय आनी है, आ जाए। इनके लिए बीता हुआ क्षण संतोषजनक स्मृति से ज्यादा कुछ नहीं होता और उस क्षण इनके कर्तव्य की सार्थकता उसी में होती है। यही प्रमाण है इनकी ईमानदारी का, मेहनत का, निष्ठा का और अपने काम के प्रति समर्पण का भी।

लेकिन यह बहुत ही आसान काम है, उनके काम में ऐब निकलना। वैसे भी किसी चीज का पोस्टमार्टम करना बहुत ही आसान काम होता है। यह ऐसा काम है, जिसमें न संवेदना होती है, न जिम्मेदारी जिंदा करने की, न काम के परिणाम के दायित्व की! और कहना कि ऐसा करता, ऐसे करता, इस समय में करता, इतने समय में करता, आदि आदि, तो सही होता या ज्यादा सही होता और यह जानबूझकर इसने गलत मोटिव से किया है। अतः इस पर तो केस बनता है और फिर केस बना दिया जाता है।

विजिलेंस में, पहला- या तो खेले-खेलाए लोग आते हैं, या फिर, दूसरा- वे लोग आते हैं, जिनको फील्ड में काम का कोई बहुआयामी और लंबा अनुभव न के बराबर होता है। लेकिन पहला आते-आते अपना बाजार शुरू कर देता है, जबकि दूसरा पहले से स्थापित माफिया इंस्पेक्टर्स और सिस्टम के हाथ में खेलने लगता है और फिर ये इतना खेलते हैं कि कुछ समय में ही पहले वाले को भी पीछे छोड़ देते हैं।

टीटीई, जो ट्रेन में ड्यूटी के दौरान स्टॉफ शॉर्टेज के चलते 6/7 कोच मैन्ड करता है, उसको पता होता है कि वह कितना कठिन काम कर रहा है और एक पूरे कोच को ठीक से चेक करने में कम से कम 45 मिनट से एक घंटा लगेगा ही। फिर जब तक वह दूसरे-तीसरे कोच में जाएगा, तब तक किसी स्टेशन पर कोई भी आदमी उसके किसी भी कोच में चढ़ सकता है। हम सब जानते हैं कि यह सामान्य घटनाक्रम है, जिसको रोकना किसी के वश में नहीं है। जब तक कि प्रत्येक कोच टीटीई द्वारा मैन्ड न किए जाएं।

लेकिन वही टीटीई जब विजिलेंस में जाता है और जब उसे विजिलेंस का पानी लग जाता है, तब वह भी अपने जैसे ही दूसरे टीटीई की इसी कथित कोताही पर धड़ाधड़ केस बनाता है, यह कहकर कि “तुम्हारे द्वारा मैन्ड किए जा रहे कोच में इतने आदमी बिना रिजर्वेशन के या बिना टिकट के कैसे मिल गए?” अब वह (टीटीई से ही आईआई/विजिलेंस बना) कोच मैन कर रहे बेचारे टीटीई को या तो केस बनाने की धमकी देकर धन दोहन करेगा या फिर केस बनाएगा। दोनों ही गलत हैं। लेकिन यही विजिलेंस है।और वह भी रेलवे की।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। केस बनने के बाद उस टीटीई की नारकीय जिंदगी शुरू होती है। वह अब दस जगह पर रोएगा, गिड़गिड़ाएगा, अपनी बेगुनाही की दलील देगा और दस जगह पर पैसा भी खर्च करेगा। लाख रहम कर, सब जानकर अनुशासनिक अधिकारी (डीए) भी विजिलेंस के डर से उसे कोई न कोई दंड दे ही देता है, वरना यही विजिलेंस माफिया खुद या किसी से कंप्लेंट करवा देता है कि पैसा लेकर डीए ने माफ कर दिया। तब डीए साहेब की परिक्रमा शुरू हो जाती है।

अब उस टीटीई के कैरियर पर धब्बा भी लग गया। कुछ समय बाद उसके परिवार वालों को और उसे खुद भी यह लगने लगता है कि वह बहुत बड़ा अपराधी और चोर है। इसके बाद वह सीख जाता है कि ईमानदारी से काम करोगे, तो फंसोगे और जब फंसोगे तो यह पैसा ही काम आता है। जितना पैसा होगा, उतना ही ज्यादा चांस अपने को ईमानदार साबित करने का होता है और जितने ठन ठन गोपाल रहोगे, उतने ही बड़े नकारे और बेईमान साबित कर दिए जाओगे। इसलिए पैसा जितना कमा सकते हो, कमा लो, क्योंकि यही पैसा बोलता है और जैसा चाहोगे वैसा ही यही बुलवाता भी है।

इस प्रकार रेलवे विजिलेंस के भ्रष्टाचार और स्वस्थ आर्गेनाइजेशन के निर्माण हेतु कदम-कदम पर एक-एक नया वॉलंटियर खड़ा करता रहता है और अपने महान उद्देश्य को सार्थक करते हुए अपना कारवां लगातार बढ़ाता चलता है। इन्होंने अब इतने वॉलंटियर्स खड़े कर दिए हैं कि जिसके चलते भारतीय रेल ही वेंटीलेटर पर चली गई है। अब वही टीटीई विजिलेंस माफिया का नया वॉलंटियर बन जाता है और अब ट्रेन पर चढ़ने से पहले उसे विजिलेंस टीम के मूवमेंट का पूरा डिटेल पता होता है। अब अगर उसको अपने किसी सहयोगी/प्रतिद्वंद्वी टीटीई को निपटाना होता है, तो वह उसकी भी सेटिंग कर लेता है कि उसको कैसे फंसाना है तथा कब और कहां उसे चेक करवाना है? 

अगर साहेब लोगों का मूवमेंट उसकी ट्रेन में है, तो फिर या तो उनकी मांग के अनुसार बंदोबस्त रखेगा या फिर ऑन द स्पॉट उनके टेस्ट के अनुरूप चीजों की व्यवस्था करेगा। अब से पहले वह अपनी जानकारी में एक भी अवैध यात्री को अपने कोच में नहीं चढ़ने देता था, या  लड़कर भी पेनाल्टी के साथ उसकी टिकट बनाता ही था। अब वह हर ट्रिप में जब तक कम से कम 10 हजार नहीं कमा लेता है, अपनी ईमानदारी को कोसता रहता है। अब तो जो यात्री टिकट बनाने की जिद्द भी करता है, उसको कुछ डिस्काउंट कर सधे हुए चार्टेर्ड एकाउंटेंट की तरह समझा देता है कि टिकट बनाने में उसका कितना नुकसान है।

अब तो विजिलेंस टीम को ट्रेन से उतरने से पहले इतना देकर मुट्ठी गरम कर देता है कि जितनी उसके हफ्ते भर की सैलरी होती है, यह कहते हुए कि साहब यह तो सब आप लोगों की ही कृपा है। उसकी इस ईमानदारी, निश्छलता और सेवाभाव से भावविह्वल होते हुए विजिलेंस टीम स्टेशन पर उतरकर अपने अगले “भ्रष्टाचार उन्मूलन अभियान” की ओर बढ़ जाती है। अब वही टीटीई ट्रेन में भरपूर कमाई करने के साथ-साथ विजिलेंस केस में फंसे दूसरे स्टॉफ से दलाली करके भी कमाने लगता है।

विजिलेंस से पाला पड़ने के बाद इसी तरह की ईमानदारी की सीख फील्ड में कार्यरत लगभग सभी कर्मचारियों को मिलती है और इसी तरह से भ्रष्टाचार को खत्म करने की उनकी जिजीविषा बलवती होती जाती है। तकरीबन यही कहानी हर विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों के साथ कभी न कभी घटित होती है।

पहला, मेरा मानना है कि विजिलेंस की जगह रेलवे और अन्य मंत्रालयों में भी एक विभाग ऐसा बनाया जाए, जिसका काम विजिलेंस से ठीक उल्टा हो, जिसमें जैसे विजिलेंस (सतर्कता) में खोज-खोजकर केस बनाए जाते हैं, उस नए विभाग (समर्थता-क्षमता की खोज, पहचान और असलियत को समझने वाला विभाग) द्वारा पुरस्कार देने के लिए खोज-खोजकर ईमानदारी से सभी कर्मचारी और अधिकारी के काम का भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से निष्पक्ष ऑडिट करे, जो या तो आउट ऑफ टर्न प्रमोशन के रूप में हो या इंक्रीमेंट के रूप में। जिस कार्यसंस्कृति को आप बढ़ावा देना चाहते हों, उसी को इसका सबसे बड़ा क्राइटेरिया रखा जाना चाहिए।

जैसे अगर विश्वस्तरीय कार्य गुणवत्ता, अथवा विश्वस्तरीय से भी बेहतर कार्य, समय से या कम समय में, कम लागत पर कार्य, बिना गुणवत्ता पर समझौता किए पूरा करना, नए ट्रैफिक लाकर या इन्नोवेटिव तरीके से आय बढ़ाने पर, सेवा क्षेत्र में मानक स्वरूप नए तरह का कार्य करने पर, तकनीकी में दूरगामी सकारात्मक नया काम करने जैसे कार्यों को क्राइटेरिया रखा जाए। इसके लिए आउट ऑफ टर्न प्रमोशन, इंक्रीमेंट, मनचाहे शहर में पोस्टिंग, आउट ऑफ टर्न मकान अलॉटमेंट का प्रावधान या स्वेच्छा से परिवार नॉन-डिपेंडेंट (जैसे पैरेंट्स) में से किसी को भी अपने अधिकार में से एक या दो पास देने का प्रावधान, रिटायरमेंट के बाद अपनी पसंद के शहर में 2/3/4/5 साल के लिए रेलवे आवास में रहने की सुविधा आदि जैसे कुछ छोटे-बड़े ऐसे प्रावधान हों, जिन्हें कार्य के अनुसार और कार्य के रिकॅग्निशन के तौर पर दिया जाना चाहिए। इस रीति से अपने आप स्वस्थ और राष्ट्रहित वाली सकारात्मक कार्यसंस्कृति कुछ सालों में विकसित हो सकती है।

जब 10 रुपये का डिकॉय करके नियमानुसार किसी को नौकरी से तो निकाला जा सकता है और उसके साथ कई जिंदगियों को भी सड़क पर लाया जा सकता है, तो फिर ऐसा नियम क्यों नहीं बनाया जा सकता, जिससे अच्छा काम करने पर सब में उत्साह भरने के लिए और एक नई कार्यसंस्कृति को विकासोन्मुख तथा राष्ट्रहित में उपयोग करने के लिए उपरोक्त पुरस्कार रेलकर्मी और अधिकारी को देने का प्रावधान भी तो किया जा सकता है!

इसमें से कुछ सुविधाएं अभी भी दूसरे रूप में दी जा रही हैं, लेकिन उनका जो क्राइटेरिया है, वह जुगाड़, कार्टेल, चमचागीरी, भ्रष्टाचार, जात-पात, पैसा, लूट-खसोट और माफिया नियंत्रित है। नकारात्मक कार्यसंस्कृति के जितने भी अवयव हैं, वह अभी सभी प्रोत्साहन के, पुरस्कार के, रिकॅग्निशन के क्राइटेरिया हैं और विजिलेंस इसका पहला पहरुआ है।

दूसरा, मेरा मानना है कि एक ईमानदार समाज ही ईमानदार व्यवस्था को डिजर्व करता है। अगर कोई नागरिक अपनी नीयत और ध्येय में ईमानदार है, तो वह पहचान छुपाकर कोई बात या कंप्लेंट कतई नहीं करेगा।

यह मनुष्य की प्रकृति है कि जब उसे किसी पर घात करना होता है, तभी वह क्षद्म रूप अपनाता है। जो निडर होता है, वह छुपकर बात नहीं करता, बल्कि पहचान गलत बताकर या छिपाकर बात वही करता है, जिसमें खुद कोई कमी होती है, खोट होती है, जो अवसरवादी और घातकी होता है, क्योंकि जो वास्तव में डरा होता है, वह कुछ करता ही नहीं है, चूंकि उसे बखूबी पता होता है कि अंततः छुपता कुछ भी नहीं है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज सरकारी तंत्र में जो लोग विजिलेंस या इस तरह की अन्य एजेंसियों से संरक्षित (पैट्रोनाइज) नहीं हैं, वे काम न करना, निर्णय न लेना, अधिकार संपन्न न्याय न करना, सबसे सुरक्षित रास्ता मानते हैं, क्योंकि कंप्लेंट माफिया का बड़ा तंत्र कैंसर की तरह इस देश की पूरी व्यवस्था में फैला हुआ है।

ब्लैकमेलिंग और धन उगाही का इससे ज्यादा सम्मानित और आसान रास्ता और कोई नहीं है। इसमें कानून के बड़े-बड़े कथित जानकारों से लेकर छोटे स्तर के शातिर और अपराधिक दिमाग के लोग शामिल हैं। वे खुद परिवाद और आरटीआई की कमाई खाते हैं और इसके लिए एक बड़ा विजिलेंस जैसा डिपार्टमेंट भी उनके ही काम को आगे बढ़ाने के लिए सरकार ने खोल रखा है। सरकार ही जाने कि इससे आज तक उसकी भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था के कितने उद्देश्य पूरे हुए?

सुनने, पढ़ने, देखने और अनुभव में देश के हर नागरिक को तो यही लगता है कि 1947 के बाद और इन संस्थाओं की स्थापना के बाद से इस देश में कोई एक चीज “दिन दूनी रात चौगुनी” बढ़ी है, तो वह सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार, कदाचार और इसके उप-उत्पाद (बाई प्रोडक्ट्स) इत्यादि हैं।

फिर भी अगर सरकार इतना प्रावधान कर दे कि यदि परिवाद गलत साबित हुआ, तो परिवादकर्ता को उतनी ही कड़ी सजा दी जाएगी, जितनी परिवाद सत्य सिद्ध होने पर कर्मचारी/अधिकारी को दी जाती, तो बहुत हद तक विजिलेंस और सीबीआई जैसी संस्थाओं के समय, संसाधन और शक्ति का दुरुपयोग होने से बच जाता तथा देश के लाखों ईमानदार कर्मठ सरकारी कर्मचारी और अधिकारी निर्भीक होकर काम कर पाते। क्रमशः





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क्या कारण है कि सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे में ही बनते हैं!

आखिर रेलवे बोर्ड के आईआई ही ज्यादा भ्रष्ट, निरंकुश और उत्पाती क्यों होते हैं?

सुरेश त्रिपाठी

रेलवे बोर्ड विजिलेंस ने “आरबी गैंग” के तीनों इंवेस्टीगेशन इंस्पेक्टर (आईआई) को रेलवे बोर्ड से मुक्ति के समसंख्यक आदेश (पत्र सं. 2020/ईआरबी-2/20/1) उसी दिन शुक्रवार, 17 जुलाई 2020 को दोपहर बाद  जीएम/कार्मिक, उत्तर रेलवे के लिए जारी कर दिए गए थे। अब जो अधिकारी इन तीनों कुख्यात आईआई को रेलवे बोर्ड में बनाए रखने की अभी भी पैरवी कर रहे हैं, उनको या तो यह पता नहीं है कि फील्ड में इन्होंने अपने साथ ही उनका भी नाम चर्चित कर रखा है, या फिर उनकी भी कोई मजबूरी है!

क्या बात है कि रेलवे बोर्ड के आईआई ही इतने ज्यादा भ्रष्ट, निरंकुश और उत्पाती होते हैं? “बिना ऊपर की शह और इशारे के ये तो हो ही नहीं सकता है” (अपनी सफाई में तो ये लोग फील्ड में यही कहते फिरते हैं)। इसका कारण खोजने पर जबाब आसानी से मिल जाएगा।

बहरहाल शनिवार, 18 जुलाई को “देर आए, दुरुस्त आए!“ शीर्षक से इन तीनों आईआई को रेलवे बोर्ड विजिलेंस से निकाले जाने की खबर “रेलसमाचार.कॉम” में और रविवार, 19 जुलाई को “कानाफूसी.कॉम” में “रेलवे विजिलेंस का आंख खोल देने वाला सच“ शीर्षक से प्रकाशित होने के बाद से सैकड़ों-हजारों रेलकर्मियों, अधिकारियों, जिसमें रिटायर्ड भी शामिल हैं और साथ ही आईआई का एग्जाम दे चुके कैंडिडेट भी, ने सत्यता उजागर करने पर “रेलसमाचार” का धन्यवाद करते हुए पीईडी/विजिलेंस/रे.बो. के इस आवश्यक कदम की सराहना की है और हर विभाग के कर्मचारी तथा अधिकारी लगातार कई विजिलेंस इंस्पेक्टरों/अधिकारियों की पोल खोलने वाली तथ्यात्मक बातें विभिन्न माध्यमों से साझा कर रहे हैं।

रेलवे बोर्ड और रेलवे बोर्ड विजिलेंस में काम कर चुके कुछ लोगों का तो सबूत के साथ यह भी कहना है कि अगर पिछले कुछ सालों की विजिलेंस फाइलों और मामलों की गहराई से विस्तृत ऑडिट तथा गहन जांच कराई जाए, तो सरकार रेलवे विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन को बंद करना ही पसंद करेगी।

विजिलेंस की आड़ में अब तक जितने भी रेलकर्मियों तथा अधिकारियों के साथ भ्रष्ट और अनैतिक तरीके से अनाचार, अत्याचार, शोषण, उत्पीड़न हुआ है, उसे देखकर तो “आईएसआईएस” भी शर्मशार हो जाएगा और शायद विजिलेंस के इन इंस्पेक्टरों और अधिकारियों में अपने सबसे योग्यतम उम्मीदवार भी मिल जाएंगे।

यह अलग बात है कि सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे कर्मचारियों, अधिकारियों के ही खिलाफ होते हैं। देश के सारे मंत्रालय और सारे पीएसयू को मिलाकर भी सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे में ही बनते हैं। तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि रेलवे ही देश की सबसे भ्रष्टतम संस्था है?

जो लोग रेलवे फील्ड में काम करते हैं और फील्ड में काम करने का लंबा अनुभव रखते हैं, और जो लोग अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण 40-40 साल अपना अमूल्य योगदान देकर रेलवे से रिटायर हो चुके हैं, उनका कहना है कि “ऐसा बिल्कुल नहीं है। वस्तुतः विजिलेंस के लिए वहीं केस होता है, जहां भ्रष्टचार का स्पष्ट मामला हो और जहां उद्देश्य (इंटेंशन) भी स्पष्ट हो। क्योंकि फील्ड में कार्य बहुत सी चीजों पर निर्भर करता है और टाइम फैक्टर बहुत महत्वपूर्ण होता है। अतः फील्ड कर्मचारी, अधिकारी भले ही निर्धारित पॉलिसी का शब्दशः अनुपालन न करें, लेकिन वे रेल हित से कोई समझौता नहीं करते हैं।”

वैसे भी यह एक सर्वज्ञात तथ्य है कि सबसे बड़ा खेल पॉलिसी बनाने में ही होता है, जिस पर किसी विजिलेंस वाले ने रेलवे में अब तक शायद ही कभी कोई केस बनाया होगा। कुछ विभागों में पालिसी बनाई ही इस तरह से जाती है कि रामचरितमानस की चौपाई की तरह उसका कोई भी अपने बुद्धिविलास से किसी भी तरह की व्याख्या कर सकता है, खासकर वाणिज्य, कार्मिक और लेखा विभाग की पॉलिसियां इस बात का उदाहरण हैं।

ऐसे में यदि हरिश्चंद्र भी रेलवे विभाग में काम कर रहे होंगे, तो बहुत अच्छे से कोई इसी माफिया तंत्र के अनुभव का फायदा उठाकर कंप्लेंट कर देगा, तब उनको भी अपनी नौकरी बचाने के लाले पड़ जाएंगे। यही कारण है कि रेलवे में सिर्फ वही कर्मचारी-अधिकारी विजिलेंस केस में ज्यादा फंसते हैं, जो ज्यादा तेजतर्रार और रिजल्ट ओरिएंटेड तथा ईमानदार मनसा वाले होते हैं, जिन्हें दुनियादारी कम, अपना काम ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है।

क्या कोई बता सकता है कि आज तक रेलवे में महाघाघ लोग कभी विजिलेंस के द्वारा पकड़े गए हैं? जिनके लिए काम नहीं, दाम ज्यादा महत्वपूर्ण रहा है, क्या विजिलेंस ने कभी उनको पकड़ा है? अथवा उन पर हाथ डालने की कभी हिमाकत की है? यदि ऐसा कोई घाघ पकड़ा गया है, तो उसे बाहरी एजेंसी (सीबीआई) ने ही पकड़ा है, लेकिन उसमें भी अधिकांश लोग बचकर निकल जाते हैं और जो सीधा रहता है, वही पिसता है। कारण इसके कई हैं, लेकिन एक सबसे बड़ा कारण विजिलेंस में महाघाघ और महाभ्रष्ट इंस्पेक्टरों और अधिकारियों का वर्चस्व होना है। यही है रेलवे विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन की असलियत।

दूसरे मंत्रालयों में यदि सीधे-सीधे करप्शन का मामला नहीं होता है, तो वहां केस नहीं बनता, और न ही जलेबी जैसा घुमाया जाता है। लेकिन रेलवे में महाभ्रष्टों ने अपने को ईमानदार साबित करने का सबसे आसान रास्ता चुना है – दूसरे को बेईमान और भ्रष्ट साबित करने का!

यहां सीधा गणित है, जो जितनी ज्यादा संख्या में दूसरे को बेईमान बताएगा, वह यहां उतना ही बड़ा और ज्यादा ईमानदार माना जाएगा। अपनी खोट छिपाने के लिए और अपने अस्तित्व को न्यायोचित ठहराने के लिए वर्षों से रेलवे विजिलेंस यही कर रहा है।

एक बार यह समीक्षा हो जाए कि विजिलेंस की कार्यवाही से अब तक कितने भ्रष्ट कर्मचारी सही हुए हैं, अथवा सही रास्ते पर आ गए हैं और कितने ईमानदार तथा काम को वरीयता देने वाले कर्मचारियों/अधिकारियों का मनोबल बढ़ा है, विजिलेंस कार्यवाही के बाद कार्य की गति और गुणवत्ता दोनों बढ़ गई है, तब स्थिति एकदम स्पष्ट हो जाएगी। क्योंकि अगर भ्रष्ट आदमी पर कार्यवाही होगी और ईमानदार तथा काम को प्रधानता देने वाले उत्पीड़ित नहीं किए जाएंगे, तो रेलवे ऑर्गेनाइजेशन में काम की गति और गुणवत्ता अपने आप बहुत बढ़ जाएगी।

लेकिन क्या कोई रेल अधिकारी या कर्मचारी यह दावे के साथ कह सकता है कि उसे ये दोनों चीजें रेलवे में कहीं नजर आ रही हैं? जबकि यहां ईमानदार और काम करने वाले या तो हासिये पर डाल दिए गए हैं और पूरी तरह से हतोत्साहित हैं, या फिर किसी परेशानी में पड़ने के भय से उन्होंने निर्णय लेना ही छोड़ दिया है। और यह सब रेलवे विजिलेंस की देन है।

क्या किसी को पता है कि सीबीआई जिन अधिकारियों और कर्मचारियों को लाखों-करोड़ों की घूस लेते रंगेहाथ पकड़ती है, उनके ऊपर विजिलेंस ने क्या कभी कोई केस किया हुआ होता है? उनमें से किसी का भी नाम क्या “एग्रीड लिस्ट” अथवा “सीक्रेट लिस्ट” में भी डाला है? या किसी विजिलेंस वाले को, जो कार्यकाल के बीच में ही हटाया गया हो, क्या उसको इन दोनों लिस्टों में से किसी एक में आज तक कभी डाला गया है? इन सब सवालों का जबाब न में ही मिलेगा।

विजिलेंस माफिया और विभागों के बड़े माफिया मिलकर “एग्रीड लिस्ट” का इस्तेमाल कैसे ईमानदार या इनकी आंख में खटकने वाले अथवा इनके रास्ते के रोड़े बनने वाले कर्मचारी, अधिकारी को निपटाने में करते हैं? और “एग्रीड लिस्ट” को ये माफिया कैसे ब्रह्मास्त्र के रूप में इस्तेमाल करता है? जब ये माफिया हर तरह से प्रयास करके भी किसी ईमानदार कर्मचारी या अधिकारी को फंसाने में कामयाब नहीं हो पाता है, तब क्या करता है! इस पर विस्तार से आगे लिखा जाएगा। क्रमशः





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