देश में भारी आर्थिक संकट के बावजूद जारी हो रहे करोड़ों-अरबों के अनावश्यक टेंडर

महामारी के संकटकाल में रेल अस्पतालों की दुर्दशा, नहीं मिल रहा रेलकर्मियों को उपचार

सुरेश त्रिपाठी

कोरोना महामारी के संकटकाल में रेलवे अस्पतालों और हेल्थ यूनिटों का बुरा हाल है। कोरोना फंड के नाम पर न जाने कितनी धनराशि रेल अस्पतालों को दी गई लेकिन परिणाम क्या निकला! आज स्थिति यह है कि रेल कर्मचारी और उनके परिवार रेल अस्पतालों में जाने से कतरे रहे है।

सामान्य रोगी को भी पहले जिला अस्पताल से कोविड टेस्ट कराने की सलाह रेलवे डॉक्टर दे रहे हैं। कमाल है, जो सामान्य मरीज है, वह क्यों कोरोना का टेस्ट कराए? अस्पताल के डॉक्टर तो ऐसे पीपीई किट पहन रहे हैं, मानो सिर्फ उन्हीं पर कोरोना अटैक करेगा, बाकी जो रेलकर्मी फील्ड और कार्यालयों में काम कर रहे हैं, मानो वे सब अमृत पीकर और कर्ण के कवच-कुंडल पहनकर आए हैं।

अगर ऐसे ही रेलवे अस्पतालों के हालात हैं तो फिर रेल अस्पताल बंद कर देने चाहिए और इस मद के फंड को सही जगह इस्तेमाल किया जाना चाहिए। डॉक्टर यदि अपने चैम्बर में ओपीडी का केस देख भी रहे हैं तो मरीज उनके चैम्बर के बाहर ही खड़ा होकर अपना दुखड़ा रोएगा और वहीं से दवा लिख दी जाएगी.. ऐसी दयनीय हालत हो गई है रेल कर्मचारियों और उनके परिवारों की! लेकिन रीढ़हीन यूनियन पदाधिकारी, अधिकारी और मंत्री सब मौन हैं।

उधर उत्तर रेलवे केंद्रीय अस्पताल (एनआरसीएच) का जो हाल है, वह अब सबको पता है कि वहां लंबे समय से मरीजों की बाहर से जांच कराने में किस कदर कमीशन का खेल चल रहा था और किस तरह अस्पताल प्रमुख को एमडी के पद से निवृत्त करके जनरल प्रैक्टिस में भेजने के पांच दिन बाद पुनः उसी पद पर उनकी नियुक्ति कर दी गई। जाहिर है कि सेटिंग और पहुंच बहुत ऊपर तक रही होगी। एनआरसीएच में कमीशनखोरी का यह खेल कानाफूसी.कॉम रेलसमाचार.कॉम की “उत्तर रेलवे केंद्रीय अस्पताल में जारी कमीशनखोरी का खेल” शीर्षक खबर प्रकाशित होने के बाद रेल प्रशासन यह कमीशनखोरी का खेल रोककर कोविद सहित सभी प्रकार की जांचें अब अस्पताल में ही करना अनिवार्य कर दिया है। 

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एक तरफ केंद्र सरकार कर्मचारियों की मूल सुविधाओं पर आर्थिक संकट दिखाकर कैंची चला रही है, तो दूसरी तरफ रेलवे और अन्य सरकारी विभागों में बिना वर्तमान परिस्थिति का आकलन किए अरबों-खरबों के टेंडर निकाले जा रहे हैं। सरकार का यह कृत्य विरोधाभासी है!

जब मुद्रा संकट है और देश चौतरफा आर्थिक संकट का सामना कर रहा है, तो अनावश्यक कार्यों को कुछ समय के लिए रोक दिया जाना चाहिए। टेंडर अवार्ड करने की इतनी जल्दी क्यों है? क्या स्टेशनों पर मेकेनाइज्ड क्लीनिंग का काम विभागीय सफाई कर्मचारियों से नहीं कराया जा सकता? वह भी तब जब अगले साल तक भी सामान्य रेल यातायात और ट्रैफिक बहाल होना मुश्किल लग रहा है, तब ऐसे में अनाप-शनाप और अनावश्यक खर्च क्यों किया जाना चाहिए??

यह सब जानते-बूझते होने के बाद भी यदि यही हाल है, तो कहना ही पड़ेगा कि कोरोना कहीं न कहीं अवसर भी लेकर आया है! लेकिन कमजोर विपक्ष के कारण इस चालाकी को कोई उजागर नहीं कर पा रहा है।

प्रयागराज स्टेशन की मेकेनाइज्ड तरीके से साफ-सफाई करने के लिए टेंडर 4 साल की अवधि के लिए अभी हाल ही में निकाला गया है जिसकी कीमत 29 करोड़ रुपया है। इसी हफ्ते कानपुर सेंट्रल के लिए भी लगभग 30 करोड़ रुपये का टेंडर निकलेगा। अब इसे अवसर नहीं तो क्या कहा जाए! इस वक्त इसकी क्या जरूरत थी?

उल्लेखनीय है कि अभी दो साल पहले ही प्रयागराज और कानपुर सेंट्रल दोनों रेलवे स्टेशनों की मेकेनाइज्ड साफ-सफाई के ठेके करीब 15-15 करोड़ में दिए गए थे, अब यह राशि पुनः बढ़कर दोगुनी हो गई है, जबकि दो साल पहले तक साफ-सफाई के यही ठेके ढ़ाई-तीन करोड़ के हुआ करते थे। स्टेशनों की सफाई को लेकर यह स्थिति सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि यही हाल सभी जोनल रेलों में भी हुआ है जिसमें कमीशनखोरी की प्रमुख भूमिका है।

इसके साथ ही उत्तर रेलवे वाराणसी मंडल द्वारा हाल ही में एक ऐसा ही सफाई का टेंडर (एम-सीएनडब्ल्यू-42/2019-20, इशू दि. 30.03.2020, क्लोज्ड दि. 20.05.2020) जारी किया गया है, जिसकी सेवा-शर्तें (टर्म्स एंड कंडीशंस) देखकर ही लगता है कि उक्त टेंडर किसी खास पार्टी को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इस टेंडर की कुल एडवरटाइज्ड वैल्यू ₹64448684.81 है।

क्या रेल प्रशासन को नहीं पता कि सामान्य रेल संचालन और यात्रियों की आवाजाही कम से कम इस साल तो सामान्य होने से रही, फिर किसके लिए रेल राजस्व को लुटाने की तैयारी क्यों की जा रही है?

विभागीय सफाई कर्मचारी अधिकांश अधिकारियों, निरीक्षकों, और सुपरवाइजरों के घरों में काम कर रहे हैं और उनके एवज में रेल प्रशासन साफ-सफाई का ठेका प्राइवेट पार्टी को देने के लिए टेंडर निकाल रहा है। इसी तरह सिग्नल एंड टेलीकम्यूनिकेशन, इंजीनियरिंग आदि विभागों में भी अनावश्यक कार्यों के लिए करोड़ों-अरबों के टेंडर निकाले जा रहे हैं जिनकी कम से कम इस साल तक सामान्यतः कोई विशेष जरूरत नहीं पड़ने वाली है।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान तथाकथित यात्री सुख-सुविधाओं और साफ-सफाई सहित सिविल इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल एवं एसएंडटी के टेंडर्स की लागत जिस तरह अनाप-शनाप बढ़ी है, या जानबूझकर बढ़ाई गई है, उसको देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि भ्रष्टाचार किस सीमा तक पहुंच चुका है और इस लूट का हिस्सा कहां तक पहुंच रहा होगा? जबकि आर्थिक संकट के नाम पर देशवासियों की भावनाओं को उभारकर तथा उनकी मनोदशा को दिग्भ्रमित करके राजनीतिक रोटियां सेंकने का खेल बदस्तूर जारी है।





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