भारतीय रेल में मची है लूट, जो लूट सके सो लूट ! – RailSamachar

पू.म.रे.निर्माण संगठन के डिप्टी सीईई/सी/साउथ द्वारा की जा रही है भारी लूट और अनियमितता

वर्तमान डिप्टी सीईई/सी/साउथ/महेंद्रूघाट को रेलवे बोर्ड से मिलीं एक साल में पांच मनचाही पोस्टिंग

काम करवाता है धनबाद का एईई/सी, मगर बिलिंग/भुगतान करवाता है डिप्टी सीईई/सी के चरणों में बैठा एईई/सी

पटना : पूर्व मध्य रेलवे का निर्माण संगठन इसकी स्थापना से ही भ्रष्टाचार का बहुत बड़ा गढ़ बन चुका था। एक अनुमान के अनुसार यहां अब तक जितना जमीनी निर्माण कार्य हुआ है, और उसकी जितनी लागत दर्शाई जा चुकी है, यदि इसका एक तुलनात्मक अध्ययन करवा लिया जाए, तो निष्कर्ष यही निकलेगा कि उतनी ही धनराशि में बिहार के कोने-कोने तक रेल लाइन बिछाई जा सकती थी। यहां बोगस टेंडर, फर्जी टेंडर, एडवांस टेंडर, एक ही कार्य के लिए दोहरे-तिहरे टेंडर और सालों पहले मटीरियल की एडवांस खरीद के टेंडर इत्यादि के रूप में हजारों-लाखों करोड़ रुपये की अफरा-तफरी अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से अब तक हो चुकी है।  इसी कड़ी की एक छोटी सी बानगी प्रस्तुत मामला भी है-

1. गढ़वा-सिंगरौली सेक्शन में सामान्य विद्युत कार्यों (जनरल इलेक्ट्रिक वर्क्स) के लिए लगभग 9.60 करोड़ रुपये का टेंडर निकाला गया है। जबकि इसी तरह का काम (सिमिलर नेचर ऑफ वर्क) अभी एक एग्जिस्टिंग कांट्रेक्ट द्वारा चल ही रह है और यह चालू कार्य अभी कम्पलीट भी नहीं हुआ है।

2. इसी तरह जरणादिह-पतरातू सेक्शन में भी जनरल इलेक्ट्रिक वर्क्स के लिए लगभग 9.60 करोड़ रुपये यानि समान लागत का दूसरा टेंडर भी निकाल दिया गया है। जबकि इसी तरह का काम अभी एक एग्जिस्टिंग कांट्रेक्ट द्वारा चल ही रह है। और वह अभी कम्पलीट भी नहीं हुआ है। (उक्त दोनों टेंडर्स की प्रतियां भी यहां प्रस्तुत हैं).

उक्त दोनों टेंडर की ओपनिंग डेट 14.11.19 है। जानकारों का मानना है कि इतने हाई वैल्यू के दो-दो टेंडर्स की फिलहाल कोई जरूरत नहीं है। वह भी तब जबकि दोनों सेक्शन के लिए एक-एक चालू कांट्रेक्ट अभी उपलब्ध है। नियमानुसार ‘सिमिलर नेचर ऑफ वर्क’ का एक टेंडर कम्प्लीट  किए बिना दूसरा नया टेंडर नहीं निकाला जा सकता है, क्योंकि मेजरमेंट में डुप्लीकेसी होने की पूरी संभावना बनी रहती है।

जानकारों का कहना है कि उक्त दोनों टेंडर के वर्क शेड्यूल में 33 केवी का क्रेडेंशियल बिना वजह का डाला गया है, ताकि किसी खास कांट्रेक्टर को फेवर किया जा सके। उनका कहना है कि दोनों टेंडर में 33 केवी से संबंधित कार्यों की कुल वैल्यू लगभग 15 लाख है। जबकि ऐसा करने से 33 केवी का क्रेडेंशियल टेंडर की पूरी वैल्यू के लिए लागू हो जाता है।

इसके अलावा जानकारों का यह भी कहना है कि साइट पर 33 केवी का अब कोई काम नहीं है। और यदि है, तो एग्जिस्टिंग कांट्रेक्ट के माध्यम से उक्त कार्य को बड़ी आसानी से किया जा सकता है। जानकारों का यह भी कहना है कि टेंडर को बेवजह और जानबूझकर ‘रेस्ट्रिक्टिव’ बनाया गया है, ताकि बहुत सीमित कंपीटीशन हो, जिससे अपने किसी मनचाहे और खास चहेते कांट्रेक्टर को उक्त टेंडर अवार्ड किया जा सके। इसके अलावा इस ‘रेस्ट्रिक्शन’ का अन्य कोई अर्थ नहीं हो सकता है।

उल्लेखनीय है कि वर्तमान डिप्टी सीईई/कंस्ट्रक्शन/साउथ, महेंद्रूघाट, पटना के बारे में केवल इतना ही बताना काफी होगा कि ये महाशय विगत एक वर्ष से भी कम समय में सीनियर डीईई/टीआरडी, मुगलसराय से आरडीएसओ, फिर आरडीएसओ से पूर्व मध्य रेलवे में सीनियर डीईई/टीआरडी, सोनपुर, पुनः सीनियर डीईई/टीआरडी/सोनपुर से सीनियर डीईई/जी/दानापुर और अब डिप्टी सीईई/सी/साउथ, महेंद्रूघाट, पटना में अपनी महती जुगाड़ से मनचाही पोस्टिंग पा चुके हैं।

जानकारों का कहना है कि एक साल के अंदर चूंकि इतने सारे ट्रांसफर और मनचाही पोस्टिंग पाने के लिए काफी रुपया खर्च किए होंगे, इसीलिए उक्त पोस्ट पर जॉइन करते ही मनमानी तरीके से टेंडर निकलकर धन उगाही में फौरन जुट गए हैं। उनका यह भी कहना है कि इसके अलावा ट्रांसफर एलाउंस के रूप में भी इन्होंने रेलवे रेवेन्यू को लाखों रुपये का चूना लगाया है। महाभ्रष्ट पूर्व मेंबर ट्रैक्शन की नजदीकी का इन जैसे कदाचारियों को भरपूर इनाम मिला है।

जानकारों ने यह भी बताया कि एक-एक सेक्शन में ‘सिमिलर वर्क’ के लिए इन्होंने कई-कई टेंडर निकाले हुए हैं, ताकि एक ही किए गए काम को कई सारे कॉन्ट्रेक्ट्स में बोगस भुगतान करके मोटा मुनाफा कमाया जा सके और अधिक से अधिक धन की उगाही एवं बंदरबांट की जा सके। जानकारों का अनुमान यह है कि भुगतान किसी एक टेंडर का किया जाएगा और बाकी टेंडर्स की राशि बोगस भुगतान के जरिए आपस में बांट ली जाएगी। उनका कहना है कि सिमिलर नेचर ऑफ वर्क के कई टेंडर एक साथ चलाने के पीछे उनकी यही रणनीति हो सकती है। यानि यह बोगस टेंडरिंग का मामला भी है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार डिप्टी सीईई/सी/साउथ के सभी कार्यों की समस्त बिलिंग एईई/सी/साउथ/महेंद्रूघाट के द्वारा की जाती है। जबकि एईई/सी/साउथ/धनबाद पर दूसरा अधिकारी मौजूद है। यानि काम करवाने के लिए एईई/सी/धनबाद  है मगर उसके कराए गए कार्यों की बिलिंग और भुगतान निर्माण मुख्यालय महेंद्रूघाट, पटना में डिप्टी सीईई/सी/साउथ के पवित्र (भ्रष्ट) चरणों में बैठकर एईई/सी/साउथ कर रहा है। इसका अर्थ यह है कि काम कोई करा रहा है, मगर कमीशन की मलाई कोई और खा रहा है।

जानकार बताते हैं कि डिप्टी सीईई/सी/साउथ महोदय का एक खास चेला एसएसई/इलेक्ट्रिक के. के. सिंह है, जिसको पिछले कई सालों से इस तरह की फर्जी/फाल्स/बोगस बिलिंग करने/करवाने की महारत हासिल है। वर्तमान में डिप्टी सीईई/सी/साउथ/महेंद्रूघाट ओम शंकर प्रसाद, एईई/सी/साउथ/महेंद्रूघाट डी. एन. तिवारी और एसएसई/इलेक्ट्रिक के.के.सिंह तथा एसएसई/सी/इलेक्ट्रिक, बरकाकाना की चौकड़ी से रेलवे को अब तक करोड़ों का चूना लग चुका है, जबकि निकट भविष्य में अभी सैकड़ों करोड़ का चूना और लगने-लगाने की पूरी तैयारी है। जानकारों का कहना है कि इस तरह से ऐसे लोंगों की करोड़ों की कमाई हो रही है।

रेल प्रशासन को चाहिए कि इन अधिकारियों के अधीन चल रहे सभी विद्युत निर्माण संबंधी कार्यों की सीबीआई से जांच कराकर ऐसे अधिकारियों को न सिर्फ कड़ी सजा दी जाए, बल्कि जांच पूरी होने तक इन्हें अन्य किसी दूरस्थ जोनल रेलवे में अविलंब स्थानांतरित किया जाए।

पूर्व मध्य रेलवे निर्माण संगठन के मामले में बोगस टेंडर, सिमिलर वर्क के लिए दोहरे-तिहरे टेंडर सिर्फ विद्युत विभाग में ही किए जा रहे हैं, ऐसा नहीं है, बल्कि ऐसे काम इंजीनियरिंग कंस्ट्रक्शन साइड से तो और भी बड़े पैमाने पर किए जा रहे हैं। इसकी खबर भी जल्दी ही सामने आएगी। उत्तर रेलवे निर्माण संगठन के बाद यदि कहीं सर्वाधिक भ्रष्टाचार और लूट है, तो वह पूर्व मध्य रेलवे निर्माण संगठन में ही हो सकती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या केंद्रीय सार्वजनिक राजस्व को मिलकर लूटने के लिए ही सात नए जोनल मुख्यालय बनाए गए थे?

इसके अलावा जहां पूर्व मेंबर ट्रैक्शन घनश्याम सिंह जैसे महाभ्रष्ट बैठे रहे हों, वहां यह तो समझ में आता है कि रेल प्रशासन ऐसे भ्रष्ट और कदाचारी अधिकारियों पर बार-बार मेहरबान क्यों होता है, जिनको एक साल के अंदर रेलवे बोर्ड से कई-कई बार मनचाही पोस्टिंग दी गई, मगर यह समझ से परे है कि रेलवे बोर्ड विजिलेंस और सीबीआई सहित स्थानीय जांच एजेंसियां कहां सोती रहती हैं? जहां तक जोनल विजिलेंस की बात है, तो ऐसे मामलों में न सिर्फ उसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है, बल्कि उसकी मिलीभगत और भागीदारी के बिना ऐसा खुला भ्रष्टाचार और लूटतंत्र चल पाना संभव नहीं हो सकता!








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