रेल संगठनों के निठल्ले पदाधिकारियों की चापलूसी से बचें रेल अधिकारी

DRH/KYN: डॉक्टर की तत्परता से बची रेलकर्मी की जान

डॉक्टरों और रेल अधिकारियों को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि वे रेल प्रशासन द्वारा सौंपी गई आधिकारिक जिम्मेदारी और अपने पेशेगत दायित्व का निर्वाह कर रहे होते हैं। अतः उन्हें रेल संगठनों के कुछ निठल्ले पदाधिकारियों की चापलूसी से बचने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए!

In absence of regular surgeon, Dr. Rafiqul Islam, ACMS, Divisional Railway Hospital, Kalyan (DRH/KYN) has again done an exemplary work by diagnosing injured on duty (IOD) railway employee as suffering from serious internal injury and going into in shocked state on 12.05.2021 at 12:00 Noon.

His clinical acumen and alacrity have saved Vikram Kumar’s life who is seriously injured on duty working at diesel loco shed, Kalyan.

His index of suspicion of internal injury came true as he underwent exploratory laparotomy at Fortis hospital Kalyan within half an hour of landing in the hospital.

His mesenteric artery was damaged due to blunt trauma and he lost two and half litres of blood internally.

This is all appreciable because of Dr Rafiqul’s efforts, sincerity and clinical presence of mind.

घटना का विवरण कुछ इस प्रकार है –

बुधवार, 12 मई 2021 को कल्याण डीजल शेड में विक्रम कुमार नामक टेक्नीशियन एक डीजल लोको पर मार्कर लाइट का काम कर रहा था। इसी दौरान अचानक पीछे से एक इंजन रोल डाउन होकर उसके इंजन से टकराया।

विक्रम कुमार जिस इंजन पर काम कर रहे थे, उसके बफर के सामने खड़े हुए थे और पिछले इंजन का बफर उनके इंजन के बफर से टकराया और वह दोनों बफर के बीच में दब गए।

तत्काल वहां आसपास उपस्थित अन्य रेलकर्मियों, जो एक रेल संगठन के सक्रिय सदस्य बताए गए हैं, ने विक्रम को उस बफर में से बाहर निकालकर बिना देरी किए कल्याण रेलवे हॉस्पिटल पहुंचाया।

कल्याण रेलवे अस्पताल में सर्जन की अनुपस्थिति में अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए एसीएमएस डॉ रफीकुल इस्लाम ने हादसे की गंभीरता को भांपते हुए तत्काल सीएमएस डॉ शशांक मल्होत्रा को सूचित किया और उनकी अनुमति से बिना देरी किए आंतरिक रूप से गंभीर घायल विक्रम कुमार को कल्याण के फोर्टिस हॉस्पिटल में भेज दिया गया, जहां डॉक्टरों की तात्कालिक सक्रियता से उसकी जान बच सकी।

ओछी मानसिकता का प्रदर्शन करने से बचें रेल संगठनों के पदाधिकारी

इस बीच उसे अस्पताल लाने वाले रेलकर्मी हर समय उसके साथ थे और जहां पैसे की जरूरत पड़ी वहां उन्होंने पैसा भी खर्च किया। लेकिन बताते हैं कि अगले दिन गुरुवार, 13 मई को एक अन्य रेल संगठन के कुछ लोग, जिनका कि इस महती कार्य में कोई विशेष योगदान नहीं रहा, वे डॉक्टरों को गुलदस्ते देकर फोटो खिंचा रहे थे।

इतनी गंभीर स्थिति में भी यदि कुछ रेलकर्मी अपने सहकर्मी रेल कर्मचारी का सहयोग करने के बजाय रेलवे अस्पताल में जाकर सीएमएस और डॉक्टरों को बुके देकर अपना क्रेडिट ले रहे थे, यह न सिर्फ अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि आपदा में अवसर तलाशने की विकृत मानसिकता का द्योतक भी है।

भविष्य में कोई भी सामाजिक कार्यकर्ता अथवा यूनियन के पदाधिकारी इस तरह की दूषित मानसिकता और ओछी हरकतों का प्रदर्शन करने से बचें, तो उचित होगा।

डॉक्टर और अधिकारी भी बचें चापलूसी से!

संदर्भ वश यहां डॉक्टरों और अधिकारियों को भी ऐसे हर मौके पर यह ध्यान रखना चाहिए कि वे रेल प्रशासन द्वारा सौंपी गई आधिकारिक जिम्मेदारी और अपने पेशेगत दायित्व का निर्वाह कर रहे होते हैं।

अतः उन्हें रेल संगठनों के कुछ दलाल टाइप निठल्ले पदाधिकारियों की चापलूसी से बचने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि उनके साथ नजदीकी दर्शाकर इस तरह कुछ संगठन पदाधिकारी कई बार सामान्य रेलकर्मियों का आर्थिक शोषण करने से भी बाज नहीं आते हैं।

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जारी है उत्तर रेलवे निर्माण संगठन में बिड कैपेसिटी घोटाला

“आखिर कब तक चलेगा यह पिक एंड चूज का खेल? यह सब ऊपर बैठे बड़े लोगों (अधिकारियों) का खेल है, जो न केवल कर्मचारियों को, बल्कि ठेकेदारों को भी बेवकूफ बनाते हैं और अपनी जेबें भरते हैं।”

उत्तर रेलवे निर्माण संगठन में बिड कैपेसिटी का घोटाला आज भी लगातार चल रहा है। परंतु इस पर लगाम लगाने वाला कोई नहीं है, क्योंकि उत्तर रेलवे का जोनल विजिलेंस और रेलवे बोर्ड का सार्वभौमिक विजिलेंस दोनों गहरी नींद में सुला दिए गए हैं। फिर सीवीसी से ही क्या उम्मीद की जा सकती है।

पूर्व सीएओ/कंस्ट्रक्शन, उत्तर रेलवे बी. डी. गर्ग के समय में अथवा उनके द्वारा शुरू किया गया बिड कैपेसिटी का यह घोटाला आज भी उत्तर रेलवे में लगातार जारी है। अब तो उत्तर रेलवे निर्माण संगठन के अधिकारियों द्वारा इस घोटाले को यहां एक परंपरा के रूप में स्थापित कर दिया गया है।

सबको पता है कि 6 माह में काम नहीं हो सकता, फिर क्यों शॉर्ट टर्म टेंडर किया जा रहा है? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए उत्तर रेलवे निर्माण संगठन का कोई अधिकारी तैयार नहीं है।

सीपीआरओ को भी लगता है कि केवल दिल्ली के कुछ चुनिंदा पत्रकारों के ही फोन उठाने का निर्देश दिया गया है?

उल्लेखनीय है कि इसी तरह रोहतक-मेहम-हांसी नई रेल लाइन के निर्माण में हुए भारी भ्रष्टाचार और उसके विरुद्ध की गई ढ़ेरों लिखित शिकायतों के चलते मार्शल इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड का कांट्रैक्ट टर्मिनेट कर दिया गया था। तथापि दोषी अधिकारियों के विरुद्ध आजतक कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

अब इसी रोहतक-मेहम-हांसी लाइन की हांसी-तोशम रोड (स्टेट हाइवे-12) की क्रासिंग किमी. 68-110 पर रोड ओवर ब्रिज (आरओबी) का निर्माण करने का टेंडर सीएओ/सी/उ.रे. द्वारा जारी किया गया है।

जानकारों का कहना है कि यह टेंडर जारी करने से पहले कार्य की उचित समीक्षा भी नहीं की गई है।

इस टेंडर की विज्ञापित वैल्यू ₹2285068.10 है। इस टेंडर में भी उक्त आरओबी का निर्माण पूरा करने की अवधि छह महीने ही रखी गई है, जबकि यह निश्चित है कि छह महीनों में यह तो क्या, कोई भी ब्रिज (आरओबी) बनकर तैयार नहीं हो सकता। जबकि इसके साथ अन्य कई कार्य भी किए जाने हैं।

आखिर कब तक चलेगा यह पिक एंड चूज का खेल? यह कहना है उत्तर रेलवे निर्माण संगठन में कार्यरत कुछ फील्ड सुपरवाइजरों का। उनका कहना है कि “यह सब ऊपर बैठे बड़े लोगों (अधिकारियों) का खेल है, जो न केवल कर्मचारियों को, बल्कि ठेकेदारों को भी बेवकूफ बनाते हैं और अपनी जेबें भरते हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि “जो कोई इनसे फाइट करता है, उसे ये सब मिलकर बरबाद कर देते हैं।” वह कहते हैं कि वी. के. गुप्ता और बी. डी. गर्ग पर चूंकि कोई कार्रवाई नहीं हुई, इसलिए उनके द्वारा सेट किया गया भ्रष्टाचार का सिस्टम अब यहां परंपरा बन चुका है।

कर्मचारी और कांट्रैक्टर कहते हैं –

ऊपर तक मिले हैं कंस्ट्रक्शन अधिकारी!

जिन पर रिश्वतखोरी ने की हुई है सवारी!!

विशेष: टेंडर्स में “एडवरटाइज्ड वैल्यू” का कोई अर्थ नहीं निकलता। इन छद्म शब्दों का कोई औचित्य भी प्रमाणित नहीं होता। अतः इसे पहले की ही भांति “एस्टीमेटेड कास्ट” यानि “अनुमानित लागत” लिखा जाए और यह आंकड़ा, अंकों के साथ-साथ अक्षरों/शब्दों में भी लिखी जानी चाहिए!

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रेलवे के निर्माण संगठनों द्वारा कब किया जाएगा गुणवत्तापूर्ण निर्माण कार्य!

एडवांस टेंडर, एडवांस स्टेशन स्थापनाओं, एडवांस खरीद और गुणवत्ताविहीन कार्यों जैसी तमाम भारी भ्रष्टाचारपूर्ण गतिविधियों को अविलंब रोका जाना चाहिए

सुरेश त्रिपाठी

रेलवे के निर्माण संगठनों द्वारा कब गुणवत्तापूर्ण निर्माण कार्य किया जाएगा, यह सवाल इन निर्माण संगठनों के ही फील्ड में कार्यरत अब लगभग सभी कर्मचारियों द्वारा उठाया जाने लगा है। उनका कहना है कि निर्माण संगठन के अधीन गुणवत्तापूर्ण तरीके से निर्माणाधीन नई लाइनों का निर्माण कब देखने को मिलेगा?

आखिर कब वह दिन आएंगे कि सीना ठोंक कर कहा जा सकेगा कि सीआरएस के निरीक्षणों के लिए नई लाइनें प्रस्तुत हैं। आखिर ऐसी गुणवत्तापूर्ण कार्यपद्धति को भौतिक रूप में कौन सीएओ अपने आउटपुट में दर्ज करवाएगा? और कौन महाप्रबंधक या मेंबर इंजीनियरिंग रेलवे बोर्ड इन्हेें ऐसे कार्यों के लिए विवश कर सकेंगे? यह सब देखने के लिए हम  फीलड कर्मचारियों को बड़ी बेसब्री से इंतजार है। यह उद्गार हैं रेलकर्मियों के!

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उनका बार-बार यही सवाल है कि आखिर निर्धारित मानक के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण निर्माण कार्य क्यों नहीं किया जा रहा है! नई लाइनों में रिवर्स कर्व डालने का आखिर क्या औचित्य है? आधा-अधूरा निर्माण कार्य करके “पेड सीआरएस निरीक्षण और अनुमोदन” से आखिर किसका हितसाधन पूरा हो रहा है। यह गंभीर जांच का विषय है।

आखिर लाइन बिछाने के लिए बनाए गए फार्मेशन में मिट्टी की क्वालिटी के साथ ही ब्लैंकेटिंग की क्वालिटी और उसके कम्पैक्शन की जांच और साथ ही वास्तविक एलाइनमेंट, जो ‘एल’ सेक्शन में प्रस्तावित होता है, उसके अनुरूप कार्य क्यों नहीं किया जाता है। इसकी जबाबदेही आखिर कब तय की जाएगी?

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जहां सीधी लाइन या सर्कुलर कर्व प्रस्तावित होता है, वहां उक्त लोकेशन पर रिवर्स कर्व डालने का आखिर औचित्य क्यों नहीं पूछा जाता है? आखिर क्यों लूट की छूट देकर रखी गई है कि जैसे-तैसे छोटे-बड़े पुलों के फार्मेशन का निर्माण करते हुए लाइन बिछाकर सीआरएस अनुमोदन करवा लिया जाए?

सीएओ/कंस्ट्रक्शन, महाप्रबंधक और सीआरएस द्वारा नई लाइनों में रिवर्स कर्व का औचित्य कयों नहीं पूछा जा रहा है। इतनी बड़ी गड़बड़ी को आखिर जानबूझकर क्यों नजरंदाज किया जा रहा है? इन उच्चाधिकारियों द्वारा अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाने का आखिर क्या अर्थ लगाया जाए?

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रेलवे की जमीन उपलब्ध नहीं होने के नाम पर रिटेनिंग वॉल के निर्माण पर करोड़ों रुपए आखिर क्यों खर्च किए जा रहे हैं। जमीन का अधिग्रहण जिसने करवाया, उससे इसका औचित्य क्यों नहीं पूछा जाता? यदि जमीन के अधिग्रहण में किसी प्रकार की कोई त्रुटि हुई है तो उसके तुरंत संज्ञान में आने पर आवश्यक दूरी में पुनः जमीन का अधिग्रहण क्यों नहीं सुनिश्चित किया जाता?

इस प्रकार की गंभीर लापरवाहियों के लिए संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध अब तक कोई उचित कार्रवाई क्यों नहीं शुरू की जा सकी है?

आखिर इस तरह रेलवे राजस्व के अनावश्यक खर्च को रोकने के लिए सीएओ/कंस्ट्रक्शन, महाप्रबंधक और रेलवे बोर्ड ने अब तक क्या कारवाई सुनिश्चत की? यदि नहीं, तो आखिर किन प्रयोजनों से संबंधित अधिकारियों को यह छूट देकर रखी गई है?

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इस तरह के ऐसे बहुत से सवाल जिम्मेदार रेलकर्मियों द्वारा अक्सर उठाए जाते रहे हैं, परंतु ऐसा लगता है कि रेल प्रशासन को इस सब के बारे में कोई चिंता नहीं है।

ऐसे तमाम कार्य खासतौर पर उत्तर रेलवे, पूर्वोत्तर रेलवे, पूर्व मध्य रेलवे, दक्षिण पूर्व रेलवे और उत्तर मध्य रेलवे सहित लगभग सभी जोनल रेलों में बड़े पैमाने पर किए गए हैं और अभी भी किए जा रहे हैं।

यही नहीं, ऐसे गुणवत्ताविहीन कार्यों का ‘पेड’ सीआरएस निरीक्षण और अनुमोदन भी कराया गया है। प्रमाण के लिए पिछले कुछ महीनों के दौरान हुए ऐसे सीआरएस निरीक्षणों और अनुमोदनों की वस्तुस्थिति देखी जा सकती है।

एडवांस टेंडर, एडवांस स्टेशन स्थापनाओं और एडवांस खरीद तथा गुणवत्ताविहीन कार्यों जैसी तमाम भारी भ्रष्टाचारपूर्ण गतिविधियों को यदि नहीं रोका गया और इनकी भौतिक निगरानी सुनिश्चित नहीं की जाती है, तो निश्चित रूप से जल्दी ही रेलवे का दीवाला निकल जाएगा, क्योंकि यही वह गतिविधियां हैं जिनके माध्यम से अधिकांश सरकारी राजस्व संबंधित अधिकारियों की जेब में जा रहा है। और यह भी सही है कि कमोबेश इस सब में नीचे से लेकर ऊपर तक सभी शामिल हैं। क्रमशः








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अस्तित्व बचाना है तो रेल संगठनों और रेलकर्मियों को स्वत:स्फूर्त खड़ा होना होगा

नेताओं को निजी हित में सार्वजनिक संपत्तियों को बांटने की प्रवृत्ति से बाज आना चाहिए

यदि रेलवे को अधिक उपयोगी और उत्पादनकारी बनाना है, तो सबसे पहले रेलमंत्री उसे बनाया जाना चाहिए, जिसे रेलवे का पर्याप्त ज्ञान भी हो और वह सीधे जनता से चुनकर आया हो, जिससे जनता की सामान्य जरूरतों का उसे भान हो, जैसे स्वास्थ्य मंत्री या विदेश मंत्री को अपने अपने विभागों की जानकारी है।

ट्रेनों को प्राइवेट आपरेटरों से चलाना यदि इतना ही आवश्यक लगता है, तो सरकार को चाहिए कि वह उन्हें कोई एक ऐसा यात्री रूट दे दे, जिस पर वह अपना पूरा इंफ्रास्ट्राक्चर तैयार करके चलाएं, तभी सरकार की नीति और आपरेटर की कार्यक्षमता का सही आकलन किया जा सकेगा।

रेलवे का ट्रैक जो पहले से ही ‘ए’-‘बी’ इत्यादि भागों में बंटा हुआ है, जिसमें अधिकतम गतिसीमा भी पहले से ही 130/160 किमी. निर्धारित है, ऐसे में यह कहना कि अमुक गाड़ी को इस गति से चलाया जायेगा, केवल देश को तथा जनता को बेवकूफ बनाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

इससे तो यह पता चलता है कि या तो मंत्री जी को कुछ पता नहीं है, अथवा उनके अधिकारी उन्हें बेफकूफ बनाने या दिग्भ्रमित करने में सफल हैं, तथा मंत्री जी की इसमें कुछ स्वार्थसिद्धि हो रही है? अतः मंत्री ऐसा हो, जो न सिर्फ ईमानदार हो, बल्कि कर्तव्यनिष्ठ और दूरदृष्टि वाला भी हो। और जिसने अपने जीवन में देश के लिए कुछ खास किया हो तथा उसके अंदर भविष्य में भी कुछ विशेष कर गुजरने की इच्छाशक्ति हो।

यदि सरकार ईमानदारी से रेलवे का उद्धार करना चाहती है, तो उसे अधिकारियों की संख्या को कंट्रोल करना चाहिए और नीचे स्तर पर कार्य करने वाले कर्मचारियों की संख्या को पूर्व मानकों के अनुरूप पुनर्स्थापित करना चाहिए। ठेके पर मजदूरों की नियुक्ति, ठेकेदारों से अमापक काम करवाने, रिटायर्ड कर्मियों का रिएंगेजमेंट, स्थाई कर्मचारियों की छंटनी, सरकारी संस्थानों/विभागों/सेवाओं आदि का निजीकरण इत्यादि से देश में बढ़ती बेरोजगारी की समस्या का समाधान नहीं होने वाला है।

तेजस एक्सप्रेस को चलाने में कुछ विसंगतियां प्रतीत होती हैं, जैसे कि जमीन हमारी, ट्रैक हमारा, स्टेशन हमारे, उन पर स्टाफ हमारा, अनुरक्षण हमारा, गार्ड और ड्राइवर भी हमारे, मगर किराया तय करेगा निजी आपरेटर, यह कहां की, किस तरह की समझदारी और कैसी व्यापारिक नीति है? गंतव्य पर पहुंचने में एक-दो घंटे की देरी पर यात्रियों को 100-200 रुपये का मुआवजा देकर सरकार जन-सामान्य को भिखारी की तरह लाइन में खड़ा करके आखिर कौन सा आदर्श उपस्थित करना चाह रही है?

रेलवे की सभी उत्पादन इकाईयों का एक साथ निगमीकरण करने के बहाने निजीकरण करने के बजाय सरकार किसी एक उत्पादन इकाई को ट्रायल आधार पर किसी कमर्शियल अनुभवी प्राइवेट सेक्टर को देकर पहले निजी क्षेत्र की क्षमता का आकलन करे और उसमें राजनीतिक दखलंदाजी रोककर उनके हिसाब से चलाए। ऐसा करने से भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी, उत्पादन की गुणवत्ता उच्चकोटि की होगी तथा उत्पादन भी अधिक होगा।

सरकार को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आजादी के बाद से देश के विकास में सर्वाधिक योगदान देने वाले सभी बड़े संस्थान सार्वजनिक क्षेत्र के संरक्षण में ही खड़े हो पाए हैं। इस दौरान निजी क्षेत्र सिर्फ अपना मुनाफा कमाने में लगा था।

सिर्फ रेलवे में ही नहीं, बल्कि सभी सरकारी विभागों में शिलान्यास और उद्घाटन की प्रथा पूरी तरह समाप्त होनी चाहिए। इससे जनता की गाढ़ी कमाई से जमा सार्वजनिक राजस्व की बरबादी तो होती ही है, बल्कि इसका कोई लाभ जनता को नहीं मिलता। ऐसे लगभग सभी समारोह सिर्फ नेताओं की वाहवाही के कर्मकांड बनकर रह गए हैं। रेलवे में पहले राजनीतिक हस्तक्षेप शून्य के बराबर था। परंतु पिछले करीब 15-20 सालों में यह बहुत ज्यादा बढ़ गया है। इस कारण से भ्रष्टाचार भी बढ़ता जा रहा है। इसका नतीजा रेलवे की बरबादी के रूप में सामने है।

सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि रेलवे सिर्फ एक परिवहन माध्यम ही नहीं है, बल्कि यह इस देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ के साथ ही सामाजिक और सांस्कृतिक समरसता की एक महत्वपूर्ण नब्ज भी है, जिसे निजी क्षेत्र को सौंपकर कुछ खास हासिल नहीं होगा। विश्व के किसी भी देश में रेलवे का निजीकरण उस देश और उसकी जनता के लिए आजतक फायदेमंद साबित नहीं हुआ है।

यह भी याद रखना चाहिए कि अटलबिहारी बाजपेई सरकार द्वारा वर्ष 2003-04 में रेलवे के जोनों की संख्या बढ़ाना भी रेलवे के लिए नुकसानदेह ही साबित हुआ है। इसके लिए जो हजारों करोड़ रुपये बरबाद किए गए, उस फंड का इस्तेमाल रेलवे की अतिरिक्त क्षमता बढ़ाने में बखूबी किया जा सकता था। अतः राजनीतिक दलों और नेताओं को देश को तोड़ने और सार्वजनिक संपत्तियों का अपने-अपने हितों के अनुरूप बांटने तथा अपनी-अपनी राजनीतिक रियासतें बनाने की प्रवृत्ति से समय रहते बाज आना चाहिए।

अब जहां तक रेलवे के मान्यताप्राप्त संगठनों की बात है, तो उन पर से अधिकांश रेलकर्मियों का भरोसा उठ चुका है। सब खेमेबाजी और कौटुंबिक (कैटेगराइज) हितों की आपसी लड़ाई में गुत्थमगुत्था हैं। उनके ढ़ुलमुल नेतृत्व और नीतियों के चलते उन्हें कहीं न कहीं सरकार द्वारा बड़ी चालाकी से अलग-थलग भी किया गया है, जिससे उन पर कार्मिकों का विश्वास डगमगाया है। शायद यही कारण है कि वह सरकार के साथ कोई बड़ी लड़ाई लड़ने अथवा निर्णायक आंदोलन छेड़ने से हिचकिचा रहे हैं। यदि ऐसा नहीं है तो अब तक वह ऐसे किसी निर्णायक आंदोलन की रूपरेखा लेकर सामने क्यों नहीं आ पाए हैं?

हालांकि इसके लिए सिर्फ मान्यताप्राप्त संगठन ही अकेले दोषी नहीं हैं, बल्कि करीब 12 लाख रेलकर्मी भी दोषी हैं, क्योंकि रेलवे की बरबादी और सरकार की निजीकरण की नीति के खिलाफ उनकी तरफ से भी ऐसा कोई स्वत: स्फूर्त आंदोलन उठ खड़ा नहीं हुआ, जैसा कि बिहार के सासाराम में करीब तीन लाख छात्रों ने कर दिखाया। अभी भी समय है, रेलवे के मान्यताप्राप्त संगठनों और रेलकर्मियों को यदि अपना अस्तित्व बचाए रखना है, तो उन्हें स्वत: स्फूर्त उठ खड़ा होना चाहिए!








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