क्या रेलकर्मियों और उनके रहनुमाओं को सुनाई दे रहा है सरकारी रणनीति का ब्रम्हनाद!

रेल प्रशासन, कोरोनावायरस के भय को बहुत खूबी के साथ भुना रहा है, क्योंकि उसे मालूम है कि इस माहौल में रेलकर्मी किसी प्रकार के आंदोलन को चाहकर भी अंजाम नहीं दे सकेंगे, जबकि उनके संगठन पहले ही मौन अवस्था में हैं। कभी कर्मचारियों का वेतन काटा जा रहा है, तो कभी टीए देने से इंकार किया जा रहा है। डेढ़ साल का डीए/आरए तो सरकार पहले ही हड़प चुकी है, तथापि जब-तब सोशल मीडिया पर बोगस पोस्ट डालकर भ्रमित किया जा रहा है कि डीए/आरए देने के लिए सरकार तैयार हो गई है। जबकि प्रशासन की कुटिल नीतियां बदस्तूर जारी हैं।

Railway workers are waiting for workman special at platform without maintaining any physical distancing

इसी रणनीति के तहत रनिंग स्टाफ को जानबूझकर 20 से 32 घंटे रनिंग में रखा जा रहा है। यह स्थिति लगभग सभी मंडलों में है। कुछ मंडलों में हालांकि रनिंग रूम को आंशिक या पूर्ण रूप से बंद कर दिया गया है। काम के बाद फंसे कर्मचारियों के लिए नियमित रूप से टॉवर वैगन या कर्मचारी स्पेशल चलाई जा रही हैं, मगर उनमें फिजिकल डिस्टेंस का कोई ध्यान नहीं रखा जा रहा है।

रनिंग रूम में गार्ड, ड्राइवर, सहायक ड्राइवर, सामूहिक रूप से रहने को विवश हैं, जिससे उनमें कोरोना जैसी महामारी के संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है। कॉमन शौचालय, कॉमन स्नानघर, कॉमन खाने के बर्तन उनको कोरोना के संक्रमण का शिकार बना सकते हैं। रनिंग रूम में सेनेटाइजेशन की कोई उचित व्यवस्था नहीं की गई है। वहां जो लोको पायलट ठहरते हैं, उन्हें दूसरे की इस्तेमाल की गई मच्छरदानी और बिस्तर दिया जाता है।

काम नगण्य होने के बावजूद ऐसी महामारी की अवस्था में क्रू को रनिंग रूम में रखना सुरक्षित नहीं है। यह बात जानते हुए भी प्रशासन कोरोना संक्रमण को क्यों बढ़ावा दे रहा है, समझ से परे है। क्रू राउंड ट्रिप वर्किंग करने को तैयार है, फिर भी उन्हें जबरन रनिंग रूम में संक्रमित होने के लिए रखा जा रहा है। इस तरह जानबूझकर मौत के मुंह में ढ़केला जा रहा है।

कोरोना महामारी के कारण रनिंग रूम में रहना अत्यंत असुक्षित है। रेल प्रशासन संक्रमण से लापरवाह होकर कर्मी दल के लिए कोई उचित व्यवस्था नहीं कर रहा है, जिससे काम से मुक्त कर्मी आसानी से वापस अपने ठिकाने पर नहीं पहुंच पा रहा है।

सभी रनिंग रूम कोरोना के माहौल में पूर्णतः असुक्षित हैं। क्रू के संक्रमित होने की प्रबल संभावना और ऐसे माहौल में रहने से क्रू नॉर्मल नहीं रह सकता। यही कारण है कि किसी अनहोनी की आशंका से उनका ब्लड प्रेशर हमेशा बढ़ा हुआ रहता है।

रेलवे बोर्ड के आरबीई नं.37/2010, पत्रांक संख्या ई(एलएल)/2009/एचईआर/1 दि. 26.02.2010 तथा पत्रांक संख्या ई(एलएल)/2016/एचपीसी/7 दिनांक 23.11.2016 का उल्लंघन कर रनिंग स्टाफ/क्रू को कोरोना संक्रमण काल में जबरन हेडक्वार्टर से 72 से 90 घंटे बाहर रखा जा रहा है। ऐसे में जब कोई क्रू, कंट्रोल से बात करता है, उसे एक ही जवाब मिलता है, “आपको हेडक्वार्टर से निकले 72 घंटे नहीं हुआ है, आप अभी बाहर ही रहिए।” रनिंग स्टाफ की समस्याओं पर अधिकारियों का ध्यान आकृष्ट करने की उनकी सभी कोशिशें बेकार साबित हो रही हैं।

सामान्य तौर पर वर्तमान में कोचिंग गाड़ियों का मूवमेंट जो लॉकडाउन से पहले था उससे डेढ़ गुना ज्यादा मूवमेंट हो रहा है। कोविड के चक्कर में रनिंग स्टाफ एवं कोचिंग गाड़ियों का स्टेटस लॉस के साथ गाड़ियों का संचालन कराया जा रहा है।

रेल प्रशासन में जोनल एवं मंडल स्तर के अधिकारी नियमों का उल्लंघन करके रनिंग स्टाफ को उसके 30% वेतन से वंचित कर रहे हैं। गाड़ी न चलाने का निर्णय रेल प्रशासन ने सरकार के आदेश पर कोविड-19 महामारी को फैलने से रोकने के लिए लिया था। जहां सभी कर्मियों को उनका पूरा वेतन मिल रहा है, वहीं स्टाफ को पूरे वेतन से वंचित रखने का प्रयास जोनल एवं मंडल स्तर के अधिकारियों द्वारा किया गया है।

ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन का मानना है कि ऐसा नहीं है कि अधिकारियों को नियम मालूम नहीं हैं, परंतु उनके द्वारा प्रशासन की एक सोची-समझी रणनीति के अंतर्गत रनिंग स्टाफ को 30% वेतन से वंचित करने का जानबूझकर प्रयास किया गया है।

एसोसिएशन का कहना है कि अधिकारी अच्छी तरह से जानते हैं कि ये 30%, वेतन के रूप में परिभाषित है और स्टाफ जब नॉन-रनिंग कार्य की स्थिति में रहता है, या प्रशासन की नीति के अंतर्गत उसको जबरदस्ती घर बैठा दिया जाता है, उन सभी स्थितियों में स्टाफ को उसके 30% वेतन का भुगतान करना ही होता है और वह 30 दिनों के लिए बेसिक के 30% के हिसाब से देना होता है। यह राष्ट्रपति द्वारा आदेशित नियमों के आधार पर निर्धारित है।

बावजूद इसके रेल प्रशासन जानबूझकर स्टाफ को 30% वेतन का भुगतान नहीं कर रहा है और ऐसा करके अपनी स्टाफ विरोधी नीति प्रदर्शित कर रहा है। जबकि सभी कर्मचारियों को उनका वेतन महंगाई भत्ता, मकान किराया भत्ता, टीपीटीजी इत्यादि का भुगतान किया जा रहा है।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि रेलवे बोर्ड द्वारा सिर्फ एनएचए, टीए और छुट्टी भुगतान तथा सीईए का भुगतान संबंधित थोड़े समय के लिए रोकने का आदेश दिया गया था। परंतु स्टाफ के पूर्ण वेतन, डीए, मकान किराया भत्ता, एडीशनल रनिंग अलाउंस, पूर्ण रनिंग एलाउंस, जिसका रेल प्रशासन को पूरा भुगतान करना था, बिना किसी आदेश के नियम विरुद्ध मंडल स्तर पर संबंधित अधिकारियों द्वारा गैरकानूनी तरीके से उसके पूर्ण वेतन से वंचित किया जा रहा है, जो कि पेमेंट ऑफ वेजेज ऐक्ट के नियमों का सीधा उल्लंघन है।

ऐसी स्थिति में स्टाफ ने अपनी बात उचित स्तर पर और सही तरीके रखने का भी प्रयास किया। इसके बावजूद यदि रेल अधिकारी अपनी स्टाफ विरोधी नीति को जारी रखते हैं, तब यह जरूरी है कि समस्त स्टाफ को इसका विरोध करने की रणनीति के तहत एकजुट होकर फील्ड में उतरना होगा। यह कहना है लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन का।

इसके अलावा एसोसिएशन द्वारा अन्य कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर रेल कर्मचारियों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की जा रही है। जैसे कि यात्री गाड़ियों की बुकिंग केवल आईआरसीटीसी के माध्यम से की जा रही है। इससे कमर्शियल स्टाफ पर गाज गिरने के सीधे संकेत मिल रहे हैं। स्टाफ का 4200 से ऊपर का मामला अब खतरे की घंटी लग रहा है।

मल्टी स्किलिंग की रणनीति पर भी इसी उद्देश्य से अमल करने की तैयारी है। ईओटीटी लगाकर गार्ड के पदों का पत्ता साफ करने की तैयारी की जा रही है। स्टेशन मास्टर एवं सिग्नल मेनटेनर पोस्ट मिक्स करके दुर्घटनाओं की लगाम लॉकिंग तोड़ने का फार्मूला लाया जा रहा है।

अलग-अलग जिलों और राज्यों से आने वाले लोगों को आने के बाद क्वारेंटीन किया जा रहा है, पर रेलकर्मियों को ‘क्वारेंटीन का वैक्सीन’ समझकर काम लिया जा रहा है।

10/30/50 प्रतिशत स्टाफ से यानि कम से कम स्टाफ से काम करवाने का बहाना बनाकर कम स्टाफ से काम चलाने की भावी रणनीति की टेस्टिंग चल रही है।

कारखानों में वास्तविक रेल कार्य से हटाकर अन्य कार्यों में स्टाफ का इस्तेमाल करके और उसकी तारीफों के पुल बांधकर कम स्टाफ में रेल कार्य की टेस्टिंग की जा रही है और स्टाफ इस तारीफ की अफीम की पिनक में मस्त है।

ऑपरेटिंग रेश्यो बहुत ज्यादा बताया जा रहा है। रेलवे ने केवल मालगाड़ियां चलाकर अधिक मुनाफा कमाया है। कम यात्रियों के साथ आईआरसीटीसी के माध्यम से गाड़ी का ऑपरेटिंग खर्च लेकर गाड़ी संचालन कई बड़े सवाल खड़े कर रहा है।

कार्य न कराकर स्टाफ को घर में रुकने की बात कहकर बैक डोर से उसके भत्तों पर कैंची चलाई जा रही है। इसी रणनीति के तहत कर्मचारियों को अप्रैल महीने के टीए का भुगतान करने से मना कर दिया गया है और मान्यता प्राप्त श्रमिक संगठन सिर्फ एक पत्र लिखकर चुप बैठे हैं।

देखें, सोशल मीडिया पर झूठ कैसे फैलाया जाता है: दि. 12.05.2020 को ये पत्र एनएफआईआर के महामंत्री डॉ एम राघवैया ने प्रधानमंत्री द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ के मेगा पैकेज का हवाला देते हुए केंद्रीय कर्मचारियों को डीए देने के संदर्भ में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण को लिखा था, जिसे भक्तों ने सरकार द्वारा डीए कटौती वापस लिए जाने और 1 जनवरी 2020 से डीए लागू करने की घोषणा के रूप में प्रचारित कर दिया।

रेल प्रशासन और सरकार का शायद यह मानना है कि जब चीन अधिक रेल किलोमीटर मात्र सात लाख स्टाफ से मेनटेन करता है, तब भारत में 12 लाख 17 हजार स्टाफ की क्या जरूरत है, जबकि यहां चीन से काफी कम किलोमीटर रेल है।

रेल कर्मचारियों को कोरोना वारियर्स केवल नाम के लिए कहा जा रहा है, मगर 50 लाख का बीमा कवर नहीं दिया जा रहा है। सरकारी कर्मचारियों को कामचोर कहने वाले अभी भी गाहे-बगाहे शगूफा छोड़ रहे हैं।

भारत सरकार द्वारा अपनी इसी रणनीति के तहत श्रम कानूनों को सस्पेंड किया जा रहा है। मात्र 300 रुपये में दिहाड़ी वाले ठेका कर्मचारी रखने के सिस्टम को तो पहले ही मंजूरी दे दी गई थी। परंतु इस सबके प्रति कहीं कोई सक्रिय हलचल नजर नहीं आ रही है।

इसी रणनीति के तहत रेलवे बोर्ड द्वारा मंगलवार, 12 मई 2020 को एक नोटिफिकेशन (सं. ई(जी)/2020/मिस्लेनि./05) निकालकर इंडियन रेलवे स्टैब्लिशमेंट कोड (आईआरईसी) के अपडेशन के नाम पर इंडियन रेलवे स्टैब्लिशमेंट मैनुअल (आईआरईएम) के कुछ महत्वपूर्ण प्रावधानों को आपस में मर्ज करने का निर्णय चुपचाप ले लिया गया। इसे रेलवे की आठ ग्रुप ‘ए’ संगठित सेवाओं के मर्जर की भी छुपी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

इन और ऐसे तमाम तथ्यों का जो मतलब निकलता है वह मतलब अवश्य निकाला जाना चाहिए, क्योंकि रोम-रोम में जब कम्पन होता है, तो बह्मनाद भी तेज सुनाई देता है। परंतु क्या सरकारी कर्मचारियों और उनके रहनुमाओं को भी यह नाद सुनाई दे रहा है?

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