अब जीएम पोस्टिंग में देरी से और ज्यादा होगी रेल मंत्रालय की किरकिरी

सरकार, मंत्री और सीआरबी जब व्यवस्था के हित की सोचकर कोई निर्णय लेंगे, तभी इसका कुछ भला हो पाएगा। तभी समय पर सही निर्णय और उस पर अमल सुनिश्चित हो पाएगा, तभी रेल का और देश का भी भला होगा, अन्यथा व्यवस्था का तिया-पांचा तो हो ही रहा है।

साढ़े आठ महीने (सितंबर 2020 से 12 जून 2021) बीत जाने के बाद अंततः जीएम पैनल फाइनल होकर शनिवार, 12 जून को रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) में आ गया। अप्रैल में डीपीसी और एसीसी से फाइनल होकर 23-24 मई से यह प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर के लिए पीएमओ में लंबित था।

जीएम पैनल जिस तरह सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि रेलकर्मी और अधिकारी इसके फाइनल होकर आने की प्रतीक्षा कितनी बेसब्री के साथ कर रहे थे।

अब यह सुनिश्चित किया जाए कि बिना कोई देरी किए, बिना किसी फेवर या बारगेनिंग के वैकेंसी सीक्वेंस के अनुसार जीएम की पोस्टिंग की जाएं, अन्यथा ज्ञापनबाजी की शुरूआत होगी, फिर ज्यादा देरी होगी और फिर रेलवे की फजीहत होगी!

इसके अलावा, 30 जून को खाली हो रही तीन जीएम पोस्टों को भी इसी पोस्टिंग प्रस्ताव में शामिल किया जाना चाहिए!

यह अपेक्षा उन सभी वरिष्ठ अधिकारियों की है जो पिछले छह महीनों से अपनी पोस्टिंग की प्रतीक्षा कर रहे हैं और जिनका जीएम में काम करने का कार्यकाल पहले ही छह महीने कम हो चुका है, या जानबूझकर कम किया गया है।

फिलहाल क्रमवार खाली जीएम पद और वैकेंसी सीक्वेंस के अनुसार पोस्टिंग की प्रतीक्षा में वरिष्ठ अधिकारियों की स्थिति निम्नवत है –

1. पूर्व रेलवे                  – अरुण अरोरा
2. उत्तर मध्य रेलवे        – प्रमोद कुमार
3. आईसीएफ               – अतुल अग्रवाल
4. दक्षिण पश्चिम रेलवे   – संजीव किशोर
5. मध्य रेलवे                – ए. के. लाहोटी
6. दक्षिण पूर्व रेलवे        – अर्चना जोशी

इस महीने 30 जून को खाली हो रहे जीएम के तीन पद

1. जीएम/पूर्व मध्य रेलवे
2. डीजी/आरडीएसओ
3. जीएम/दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे

उपरोक्त तीनों पदों पर वैकेंसी सीक्वेंस के अनुसार जीएम पैनलिस्ट तीन वरिष्ठ अधिकारियों – अनुपम शर्मा, आलोक कुमार एवं विजय शर्मा – की जीएम पद पर पोस्टिंग का नंबर लगता है।

एडवांस में हो जीएम पैनल की प्लानिंग

अब आगे से यह भी सुनिश्चित किया जाए कि जीएम पैनल की तैयारी एडवांस में हो। अगर पैनल फाइनल करने की प्रक्रिया में छह-सात महीनों का समय लगता है, जो कि वास्तव में नहीं लगना चाहिए, तो कैलेंडर वर्ष 2022 के जीएम पैनल की तैयारी आज से ही शुरू कर दी जानी चाहिए।

डीआरएम की पोस्टिंग में देरी से भी असंतोष

इसके अलावा, यदि डीआरएम की भी पोस्टिंग में और ज्यादा विलंब होते देखकर पोस्टिंग की प्रतीक्षा कर रहे हताश अधिकारी कह रहे हैं कि यह इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि “रेल नेतृत्व विहीन है और शीर्ष पद पर बैठा अधिकारी उस पर बैठने के लायक नहीं है, उसे फौरन से पेश्तर रिप्लेस किए जाने की आवश्यकता है।”

बहुत पहले साबित हो चुकी थी अकर्मण्यता

हालांकि यह बात तो वर्ष 2018 में अनिर्णय, अकर्मण्यता, मानवीयता, सहृदयता और नेतृत्व गुणवत्ता इत्यादि को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा कराए गए सर्वे में पहले ही साबित हो चुकी थी, तथापि बलिहारी है भारत सरकार की कि जिसे अपरिमित टैलेंट्स से परिपूर्ण भारतीय रेल में शीर्ष पर बैठाने के लिए केवल वही मिलता है, जो उसे मौके पर सही सलाह देने में अक्षम होता है, जी-हजूरी करने में अव्वल होता है, और जो हुकुम का गुलाम होता है, जिसके लिए व्यवस्था के हित के बजाय मंत्री का या अपना हित सर्वोपरि होता है।

सरकार या मंत्री और सीआरबी जब व्यवस्था के हित की सोचकर कोई निर्णय लेंगे, तभी इसका कुछ भला हो पाएगा। तभी समय पर सही निर्णय और उस पर अमल सुनिश्चित हो पाएगा, तभी रेल का और देश का भी भला होगा, अन्यथा व्यवस्था का तिया-पांचा तो हो ही रहा है।

#PiyushGoyal #RailMinIndia #PMOIndia #IndianRailway #RailwayBoard #CEORlys #DoPTGoI





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रेल संगठनों के निठल्ले पदाधिकारियों की चापलूसी से बचें रेल अधिकारी

DRH/KYN: डॉक्टर की तत्परता से बची रेलकर्मी की जान

डॉक्टरों और रेल अधिकारियों को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि वे रेल प्रशासन द्वारा सौंपी गई आधिकारिक जिम्मेदारी और अपने पेशेगत दायित्व का निर्वाह कर रहे होते हैं। अतः उन्हें रेल संगठनों के कुछ निठल्ले पदाधिकारियों की चापलूसी से बचने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए!

In absence of regular surgeon, Dr. Rafiqul Islam, ACMS, Divisional Railway Hospital, Kalyan (DRH/KYN) has again done an exemplary work by diagnosing injured on duty (IOD) railway employee as suffering from serious internal injury and going into in shocked state on 12.05.2021 at 12:00 Noon.

His clinical acumen and alacrity have saved Vikram Kumar’s life who is seriously injured on duty working at diesel loco shed, Kalyan.

His index of suspicion of internal injury came true as he underwent exploratory laparotomy at Fortis hospital Kalyan within half an hour of landing in the hospital.

His mesenteric artery was damaged due to blunt trauma and he lost two and half litres of blood internally.

This is all appreciable because of Dr Rafiqul’s efforts, sincerity and clinical presence of mind.

घटना का विवरण कुछ इस प्रकार है –

बुधवार, 12 मई 2021 को कल्याण डीजल शेड में विक्रम कुमार नामक टेक्नीशियन एक डीजल लोको पर मार्कर लाइट का काम कर रहा था। इसी दौरान अचानक पीछे से एक इंजन रोल डाउन होकर उसके इंजन से टकराया।

विक्रम कुमार जिस इंजन पर काम कर रहे थे, उसके बफर के सामने खड़े हुए थे और पिछले इंजन का बफर उनके इंजन के बफर से टकराया और वह दोनों बफर के बीच में दब गए।

तत्काल वहां आसपास उपस्थित अन्य रेलकर्मियों, जो एक रेल संगठन के सक्रिय सदस्य बताए गए हैं, ने विक्रम को उस बफर में से बाहर निकालकर बिना देरी किए कल्याण रेलवे हॉस्पिटल पहुंचाया।

कल्याण रेलवे अस्पताल में सर्जन की अनुपस्थिति में अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए एसीएमएस डॉ रफीकुल इस्लाम ने हादसे की गंभीरता को भांपते हुए तत्काल सीएमएस डॉ शशांक मल्होत्रा को सूचित किया और उनकी अनुमति से बिना देरी किए आंतरिक रूप से गंभीर घायल विक्रम कुमार को कल्याण के फोर्टिस हॉस्पिटल में भेज दिया गया, जहां डॉक्टरों की तात्कालिक सक्रियता से उसकी जान बच सकी।

ओछी मानसिकता का प्रदर्शन करने से बचें रेल संगठनों के पदाधिकारी

इस बीच उसे अस्पताल लाने वाले रेलकर्मी हर समय उसके साथ थे और जहां पैसे की जरूरत पड़ी वहां उन्होंने पैसा भी खर्च किया। लेकिन बताते हैं कि अगले दिन गुरुवार, 13 मई को एक अन्य रेल संगठन के कुछ लोग, जिनका कि इस महती कार्य में कोई विशेष योगदान नहीं रहा, वे डॉक्टरों को गुलदस्ते देकर फोटो खिंचा रहे थे।

इतनी गंभीर स्थिति में भी यदि कुछ रेलकर्मी अपने सहकर्मी रेल कर्मचारी का सहयोग करने के बजाय रेलवे अस्पताल में जाकर सीएमएस और डॉक्टरों को बुके देकर अपना क्रेडिट ले रहे थे, यह न सिर्फ अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि आपदा में अवसर तलाशने की विकृत मानसिकता का द्योतक भी है।

भविष्य में कोई भी सामाजिक कार्यकर्ता अथवा यूनियन के पदाधिकारी इस तरह की दूषित मानसिकता और ओछी हरकतों का प्रदर्शन करने से बचें, तो उचित होगा।

डॉक्टर और अधिकारी भी बचें चापलूसी से!

संदर्भ वश यहां डॉक्टरों और अधिकारियों को भी ऐसे हर मौके पर यह ध्यान रखना चाहिए कि वे रेल प्रशासन द्वारा सौंपी गई आधिकारिक जिम्मेदारी और अपने पेशेगत दायित्व का निर्वाह कर रहे होते हैं।

अतः उन्हें रेल संगठनों के कुछ दलाल टाइप निठल्ले पदाधिकारियों की चापलूसी से बचने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि उनके साथ नजदीकी दर्शाकर इस तरह कुछ संगठन पदाधिकारी कई बार सामान्य रेलकर्मियों का आर्थिक शोषण करने से भी बाज नहीं आते हैं।

#DRHKYN #CentralRailway #Union #Railway





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संवेदनशील पदों पर लंबे समय से बैठे हैं लेखाकर्मी – RailSamachar

फील्ड स्टाफ से ऑफिस स्टाफ की अदला-बदली करके भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जाए

एक ही कार्यालय में कुर्सियों की अदला-बदली करके स्टाफ को भ्रष्टाचार करने से रोकना अत्यंत मुश्किल है! निर्धारित समय पर आवधिक स्थानांतरण सुनिश्चित किए जाएं! इसमें रेल संगठनों के हस्तक्षेप को सरकारी काम में बाधा डालने के अपराध के समकक्ष माना जाए!

पश्चिम रेलवे के एफए एंड सीएओ (एस एंड सी) ऑफिस, चर्चगेट, मुंबई में अधिकांश लेखा स्टाफ लंबे समय से संवेदनशील पदों पर विराजमान है। जो लेखा कर्मचारी संवेदनशील पदों पर हैं, उनको 4 साल से भी ऊपर हो गए हैं।

इसमें कांट्रैक्टर्स के बिल पास करने और फाइनेंस सेक्शन में सारे प्रस्तावों की वेटिंग करने वाले कर्मचारी अपनी जगह पर लंबे समय से जमे हुए हैं।

इनके साथ ऑफिसर भी मिले हुए हैं। इसीलिए उनका निर्धारित समय पर आवधिक स्थानांतरण (पीरियोडिकल ट्रांसफर) नहीं किया जाता है। इसके अलावा जो एक्जीक्यूटिव ऑफिस में हैं, उनका भी यही हाल है।

बताते हैं कि पश्चिम रेलवे एकाउंट्स ऑफिस में भ्रष्टाचार इतना ज्यादा बढ़ गया है कि जिनके घरों में फेमिली के लोग कोरोना संक्रमित हैं, लेकिन वह ऑफिस में बिल पास करने आ जाते हैं। इसके लिए उन पर दबाव तो डाला ही जाता है, लेकिन इसमें कमीशन के लिए उनका भी हित जुड़ा होता है।

जानकारों का कहना है कि कांट्रैक्टर को अपने पेमेंट से मतलब होता है, चाहे जिसे कोरोना हो या न हो। इसके लिए वर्क्स एकाउंटेंट्स की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि बिल पास करवाने में उसकी मुख्य भूमिका होती है।

उनका कहना है कि इसी वजह से पश्चिम रेलवे के एकाउंट्स ऑफिस में भी कोरोना का कहर सतत जारी है। जानकारों का कहना है कि बीएमसी और रेल प्रशासन को ऐसी गतिविधियां करने वालों को अविलंब रोकना चाहिए।

उनका यह भी कहना है कि भ्रष्टाचार को रोकने के लिए न्यूनतम स्तर पर यही किया जा सकता है कि एक ही कार्यालय में कार्यरत कार्मिकों की आपस में कुर्सियां बदलने के बजाय फील्ड स्टाफ से ऑफिस स्टाफ की अदला-बदली की जानी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि सभी रेलों में जोनल एवं मंडल मुख्यालयों में कार्यरत सभी राजपत्रित एवं अराजपत्रित कर्मचारियों के आवधिक स्थानांतरण सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सीनियर डिप्टी जनरल मैनेजर एवं चीफ विजिलेंस ऑफीसर (एसडीजीएम/सीवीओ) की होती है, जो कि वे उचित तरीके से नहीं निभा पाते हैं, क्योंकि उन्हें रेल आवास आवंटित करने जैसे फालतू काम सौंपे गए हैं, जो कि कोई एडीजीएम स्तर का अधिकारी भी कर सकता है।

उन्होंने बताया कि “They work as they wish“ शीर्षक के अंतर्गत 1 मार्च 2021 को कानाफूसी.कॉम द्वारा प्रकाशित खबर का संज्ञान लेते हुए पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक आलोक कंसल ने उक्त विषय जांच और कार्रवाई के लिए विजिलेंस को सौंपा था, परंतु विजिलेंस ने अब तक उस पर क्या कदम उठाया, यह किसी को भी पता नहीं है।

उन्होंने कहा कि “जबकि सर्वप्रथम जिन लेखाकर्मियों का ट्रांसफर होने के बाद भी वे न सिर्फ पुराने पदों पर ही कार्यरत हैं, बल्कि दूसरों को आवंटित कार्य भी उन्होंने अपने खाते में जुड़वा लिया था, उन्हें तत्काल वहां से हटाने के बाद निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की जानी चाहिए थी। चूंकि विजिलेंस द्वारा ऐसा कुछ नहीं किया गया, इसलिए उक्त पदों पर बैठे लेखाकर्मी बदस्तूर भ्रष्टाचार और बिल पासिंग में लगे हुए हैं।

उन्होंने जीएम आलोक कंसल से अपेक्षा की है कि वे उपरोक्त विषय पर तुरंत संज्ञान लेकर यथाशीघ्र उचित कार्रवाई सुनिश्चित करें।

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जीएम/डीआरएम को नहीं दिया महाराष्ट्र सरकार से कोई रिस्पांस – RailSamachar

जीएम/मध्य एवं पश्चिम रेलवे आलोक कंसल और डीआरएम, मुंबई मंडल शलभ गोयल ने सभी रेल कर्मियों को फ्रंटलाइन वर्कर मानकर वैक्सीन की उचित आपूर्ति सुनिश्चित करने की महाराष्ट्र सरकार से मांग की है।

मुंबई और महाराष्ट्र के दायरे में कार्यरत रेलकर्मियों के अर्जेंट वैक्सीनेशन और उन्हें वैक्सीनेशन में प्राथमिकता देने के लिए जीएम/मध्य रेलवे की तरफ से 17-18 मई के आसपास मुख्य सचिव महाराष्ट्र सरकार को एक पत्र लिखा गया था। ऐसा ही एक पत्र जीएम/पश्चिम रेलवे की तरफ से भी लिखा गया था। परंतु अब तक महाराष्ट्र सरकार की तरफ से दोनों जोनल रेलों के महाप्रबंधकों को कोई जवाब या रिस्पॉन्स नहीं मिला है।

डीआरएम/मुंबई मंडल, मध्य रेलवे शलभ गोयल ने 12 मई को डॉ प्रदीप व्यास, प्रिंसिपल सेक्रेटरी, पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट, महाराष्ट्र सरकार को पत्र लिखकर मुंबई मंडल के सभी रेल कर्मियों को फ्रंटलाइन वर्कर्स मानकर उनके वैक्सीनेशन की अर्जेंट आवश्यकता जताई है।

मुंबई मंडल, मध्य रेलवे में अब तक 9000 कर्मचारियों को वैक्सीन लगाई जा चुकी है, लेकिन अब तक किसी को केवल पहला डोज लग पाया है तो किसी को दोनों डोज लगे हैं, परंतु वैक्सीन की किल्लत लगातार बनी हुई है!

उन्होंने राज्य सरकार को लिखे गए पत्र में कहा है कि महाराष्ट्र में अब भी कोरोना के मामले ज्यादा हैं और ऐसे में ड्यूटी के दौरान ज्यादा लोगों के संपर्क में आने से रेल कर्मियों को अधिक संक्रमण होने का खतरा बना हुआ है। ऐसे में सभी रेल कर्मचारियों को फ्रंटलाइन वर्कर्स मानकर उन्हें वैक्सीनेशन में प्राथमिकता दी जाए।

उल्लेखनीय है कि उड़ीसा और केरल सरकार रेल कर्मियों को फ्रंटलाइन वर्कर्स घोषित कर चुकी हैं। इसी आधार पर जीएम मध्य एवं पश्चिम रेलवे की तरफ से भी महाराष्ट्र सरकार से यह मांग की गई है।

मध्य रेलवे में कुल करीब एक लाख कर्मचारी हैं, जबकि मुंबई मंडल में 32 हजार कर्मचारी कार्यरत हैं। इसके अलावा उनके परिजन तथा सेवानिवृत्त कर्मचारियों की संख्या भी काफी है।

रेलवे अपने स्तर पर अलग-अलग जगहों पर वैक्सीनेशन सेंटर खोलकर करीब 51% कर्मचारियों का वैक्सीनेशन कर चुकी है, लेकिन अब तक किसी को केवल पहला डोज लग पाया है, तो किसी को दोनों डोज लगे हैं।

मध्य रेलवे, मुंबई मंडल में अब तक 9000 कर्मचारियों को वैक्सीन लगाई जा चुकी है। वैक्सीन की किल्लत लगातार बनी हुई है। लगातार यात्रियों के संपर्क में आने से रेलकर्मी काफी ज्यादा संख्या में संक्रमित हो रहे हैं, जिससे उनके परिजन भी अछूते नहीं रह पा रहे हैं।

रेलवे द्वारा महाराष्ट्र सरकार को पत्र लिखने की मुख्य वजह यही है कि अगर रेलकर्मियों को फ्रंटलाइन वर्कर्स घोषित कर दिया जाता है, तो उन्हें वैक्सीनेशन में प्राथमिकता मिल सकती है।

रेलकर्मी 24 घंटे काम कर रहे हैं, इसलिए पब्लिक के संपर्क में ज्यादा आने से उन्हें संक्रमण का खतरा ज्यादा है। इसलिए रेलवे ने महाराष्ट्र सरकार से निवेदन किया है कि रेलकर्मियों को फ्रंटलाइन वर्कर्स घोषित किया जाए और उन्हें वैक्सीनेशन में प्राथमिकता दी जाए।

प्राप्त जानकारी के अनुसार दोनों जोनल रेलों – मध्य एवं पश्चिम रेलवे – को अब तक महाराष्ट्र सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला है।

एक तरफ महाराष्ट्र में वैक्सीन आपूर्ति की लगातार कमी बनी हुई है, यह कारण प्रत्यक्ष तो है ही, परंतु राज्य सरकारों द्वारा जोनल महाप्रबंधकों को तनिक भी तवज्जो नहीं दिए जाने का एक प्रमुख कारण यह भी है कि केंद्र सरकार, रेल मंत्रालय ने जोनल महाप्रबंधकों का राज्य सरकारों के मुख्य सचिवों से ऊपर का अपग्रेडेशन नहीं दिया है। इसलिए उन्हें राज्यों के सचिव स्तर के अधिकारी भी कोई तवज्जो नहीं देते हैं।

उल्लेखनीय है कि करीब दो साल पहले रेलमंत्री ने संसद में यह घोषणा की थी कि रेलवे बोर्ड सहित राज्यों के साथ उचित समन्वय स्थापित करने के लिए जोनल महाप्रबंधकों को बोर्ड मेंबर (सेक्रेटरी, भारत सरकार) के स्तर का अपग्रेडेशन दिया जाएगा। परंतु उनकी इस घोषणा पर अब तक जमीनी तौर पर अमल सुनिश्चित नहीं हो पाया है।

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रेल मंत्रालय की तदर्थ स्थिति खत्म करके पूर्ण रूप से शुरू किया जाए ट्रेनों का संचालन

जनता और सरकार की छवि से सीधे जुड़े रेल मंत्रालय की तदर्थ व्यवस्था को अविलंब समाप्त कर पूर्णकालिक मंत्री एवं सीआरबी नियुक्त किया जाना चाहिए

Narendra Modi, PM/India

#प्रधानमंत्री देश को आखिर किस दिशा में ले जाना चाहते हैं, यह फिलहाल किसी को समझ में नहीं आ रहा है। यह सही है कि कोरोना नामक इस वैश्विक महामारी ने सबका सब कुछ अस्त-व्यस्त कर दिया है, लेकिन इसका ये मतलब भी नहीं है कि हाथ पर हाथ धरे बैठे रहा जाए!

पिछले साल से ही देश की अर्थव्यवस्था पर ग्रहण लगा हुआ है। जबकि मार्च महीने से पूरा देश ठप पड़ा हुआ है। बेरोजगारी, महंगाई विकराल रूप ले चुकी है। देखते-देखते लॉकडाउन के भी 6 महीने गुजर रहे हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था में कोई सकारात्मक सुधार जैसी संभावनाएं कहीं दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रही हैं।

इसलिए बेहतर होगा कि अर्थव्यवस्था से जुड़ी चीजों को पूर्णतः खोल दिया जाए, क्योंकि अनलॉक सीरीज बहुत कारगर साबित नहीं हुई है। तमाम अर्थशास्त्रियों का भी यही मत है।

सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में देश की लाइफलाइन कही जाने वाली भारतीय रेल का नियमित संचालन इतने लंबे समय से बंद करके रेल मंत्रालय ने पहले रेल का कबाड़ा कर दिया है।

मात्र कुछ ट्रेनों का संचालन करके रेलमंत्री सोशल मीडिया पर लंबी-चौड़ी हांक रहे हैैं। इससे वह आखिर क्या साबित करना चाहते हैं, यह किसी की समझ में नहीं आ रहा है।

जब लगभग सभी प्रदेशों का राज्य परिवहन पूर्व की भांति चलाया जा रहा है, एयर ट्रैफिक भी चालू हो गया है, तो फिर रेल का सामान्य संचालन बंद करके देश की अर्थव्यवस्था का कबाड़ा किया जा रहा है। क्या इसमें भी कोई अवसर ढूंढा जा रहा है?

ट्रेनों का संचालन बंद करने से कोरोना के मामले कम तो नहीं हुए हैं, बल्कि इनमें लगातार वृद्धि हुई है।

यदि देश भर की स्थिति को देखा जाए तो कोरोना का कहर फिलहाल कम नहीं होने वाला है, बल्कि यह अभी और बढ़ेगा, ऐसा अनुमान है, क्योंकि देश में अभी रैपिड जांच पर्याप्त संख्या में नहीं हो रही हैं।

अब यह अलग बात है कि दिल्ली सहित कुछ राज्यों ने रैपिड जांचों को कम करके अथवा क्रत्रिम तरीके से कोरोना के मामले कम होने की बात कही है।

हो सकता है कि इसके पीछे उनका उद्देश्य लोगों में व्याप्त भय को कुछ कम करना हो, पर इस महामारी के प्रकोप को इस तरीके से कम करके बताना तो वास्तव में जनता के साथ एक बड़ा धोखा है। 

बहरहाल, जब पूरा मार्केट खोल दिया गया है, राज्यों का सामान्य परिवहन चल रहा है, तब देश की धड़कन कही जाने वाली भारतीय रेल का पहिया रोक देना देश की सामान्य अर्थव्यवस्था को रोक देने जैसा है।

रेल का सामान्य संचालन इस वक्त देश की सबसे बड़ी जरूरत है। इस पर प्रधानमंत्री द्वारा रेल मंत्रालय को तुरंत आवश्यक निर्देश दिए जाने चाहिए।

इसके अलावा प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे रेल मंत्रालय की तदर्थ व्यवस्था को अविलंब समाप्त कर सीधे जनता और सरकार की छवि से जुड़े इस महत्वपूर्ण मंत्रालय को पूर्णकालिक मंत्री तथा सीआरबी प्रदान करें।





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एलडीसीई में अब मनमाने तरीके से नहीं दे पाएंगे अंक – RailSamachar

गड़बड़ी होने पर सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी चयन समिति

आसानी से अब परीक्षा रद्द नहीं करा पाएंगे विजिलेंस माफिया

वाया विजिलेंस, ग्रुप ‘बी’ अधिकारी बनने का रास्ता भी अब हुआ कठिन

सुरेश त्रिपाठी

रेलवे बोर्ड ने सोमवार, 20 जुलाई 2020 को एक पत्र (सं. ई(जीपी)/2018/2/31) जारी करके सभी जोनल रेलों और उत्पादन इकाईयों को ग्रुप ‘सी’ से ग्रुप ‘बी’ में होने वाली पदोन्नतियों के लिए ली जाने वाली विभागीय परीक्षा (एलडीसीई) के सभी प्रश्नों को शत-प्रतिशत ऑब्जेक्टिव करने का आदेश दिया है।

अब ग्रुप ‘सी’ से ग्रुप ‘बी’ ऑफीसर की परीक्षा के सभी प्रश्न ऑब्जेक्टिव टाइप होंगे। बस निशान लगाते जाओ। इस प्रणाली के रेलवे को फिलहाल कई लाभ होंगे, जैसे-

अब विभाग प्रमुख (पीएचओडी) मेहनत से परीक्षा के प्रश्न पत्र तैयार करेंगे और जांचने वाले अधिकारी भी अब मनमाने तरीके से अंक नहीं दे पाएंगे, जैसा कि वे अब तक वर्णनात्मक प्रश्नों में कर पाते थे।

अब विजिलेंस वाले बिना वजह कोई केस नहीं बना पाएंगे, जैसा कि वे अब तक वर्णनात्मक उत्तरों को लेकर काॅपी जब्त कर पूरे के पूरे सेलेक्शन को खटाई में डाल दिया करते थे, वह भी महज इसलिए कि या तो उनकी “सेवा-पानी” नहीं हुई होती थी, या वे (डेपुटेशन पर आए विजिलेंस इंस्पेक्टर) फेल हो जाते थे, तो इस तरह पूरे सेलेक्शन को कैंसल कराने में कोई कसर न छोड़ते थे। फिर चाहे अधिकारियों के खिलाफ ही उन्हें विजिलेंस केस क्यों बनाने पड़ें हों।

प्रश्न पत्र अब तक संबंधित विभाग के पीएचओडी ही सेट करते रहे हैं। इस सर्कुलर के बाद से अब जीएम उत्तर पुस्तिकाएं जांचने के लिए जिस अधिकारी को नामित करेंगे, वह चयन समिति का सदस्य भी होना चाहिए।

अब ऐसा नहीं होगा कि पीसीपीओ ने पेपर सेट किया और अपने अधीनस्थ सीपीओ/एडमिन या सीपीओ/आईआर को पेपर जांचने पर लगा दिया। अब क्योंकि उसका चयन समिति का सदस्य होना अनिवार्य है, अत: वह जिम्मेदारी से पेपर जांचेगा और किसी भी गड़बड़ी के लिए वह स्वयं तथा सामूहिक रूप से चयन समिति के सभी सदस्य उत्तरदायी होंगे।

यह तो लगभग सर्वविदित है ही, और एक जांचा-परखा तथ्य भी, कि ग्रुप ‘सी’ से ग्रुप ‘बी’ में प्रमोशन के लिए काफी लेनदेन होता है और करीब 90% ग्रुप ‘बी’ प्रमोशन इसी आधार पर होते रहे हैं। उपरोक्त निर्देश जारी करके रेलवे बोर्ड द्वारा अब जो समुचित सुधार और व्यवस्था की गई है, उससे शायद विभागीय वरिष्ठ अधिकारियों के इस विभागीय भ्रष्टाचार पर कुछ लगाम लग सकती है।





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रास्ते में ऑक्सीजन खत्म होने से भायखला रेलवे अस्पताल पहूंचकर जूनियर क्रू कंट्रोलर की मौत

जूनियर सीसी की असामयिक मौत के लिए सीधे जिम्मेदार हैं कल्याण रेलवे अस्पताल के कार्यकारी सीएमएस और एसीएमएस-कोविड नोडल ऑफ़िसर

मुंबई : कल्याण रेलवे अस्पताल और अराजकता-मनमानी का चोली-दामन का संबंध रहा है, इस बात से कल्याण और आसपास रहने वाले लगभग दस हजार रेलकर्मी बखूबी वाकिफ हैं। इसी अराजकता और मनमानी के चलते एंबुलेंस में बिना जांचे-परखे रखे गए ऑक्सीजन सिलेंडर के रास्ते में खत्म हो जाने से एक जूनियर क्रू-कंट्रोलर की असमय मौत हो गई और कहीं कोई हलचल नहीं हुई। यही वजह है कि कल्याण रेलवे अस्पताल के कुछ डॉक्टरों की मनमानी और सनक लगातार बढ़ती जा रही है। क्रू-कंट्रोलर की इस असामयिक मौत पर सभी रेलकर्मियों में भारी आक्रोश है। मान्यताप्राप्त ज़ोनल रेल संगठन एनआरएमयू, सीआरएमएस, मध्य रेलवे एससी-एसटी रेलकर्मचारी संगठन और मध्य रेलवे ओबीसी रेलकर्मचारी संगठन ने अपने बोर्ड लगाकर मेडिकल विभाग की इस अक्षम्य लापरवाही पर रेल प्रशासन से अपना विरोध प्रकट किया है।

वर्तमान में कल्याण रेलवे अस्पताल के सीएमएस और एसीएमएस का चार्ज संभाल रहे दोनों डॉक्टर महातुनकमिजाज न सिर्फ माने जाते हैं, बल्कि वह वास्तव में ऐसे हैं भी! यह कहना है तमाम रेलकर्मियों का। उनका कहना है कि कल्याण रेलवे अस्पताल की एसीएमएस एवं कोविड की नोडल ऑफिसर की सनक वर्तमान में सातवें आसमान पर है। सुबह से शाम तक अकारण भोंकते रहना, पेशेंट्स को, उनके परिवार वालों को, संकट की घड़ी में मरहम लगाने के बजाय सबके सामने जी-भरकर कोसना, बेइज्जत करने वाला उनका व्यवहार अस्पताल को बूचड़खाने में तब्दील कर रहा है।

रेलकर्मियों का कहना है कि इन डॉक्टर साहिबा का मानना है कि वह जो सोचती हैं, केवल वही सही होता है। वह जो चाहती हैं, वैसा ही हर डॉक्टर, अस्पताल कर्मी, यूनियन पदाधिकारी और अधिकारी भी वैसा ही सोचें, समझें और करें भी। अस्पताल में जब डॉक्टर महोदया चलती हैं, या ऐसा कहना चाहिए कि विचरण करती हैं, तो वहां भर्ती मरीजों अथवा दवा लेने आए रेलकर्मियों की आंखों के सामने फिल्मों में विलेन की एंट्री जैसे अनेकों दृश्य घूम जाते हैं। इनके चीखते-चिल्लाते रहने से अस्पताल की शांति तो भंग होती ही है, बल्कि मरीज और उनके रिश्तेदार तनावग्रस्त हो जाते हैं, पर रेलकर्मी या उनके पारिवारिक सदस्य होने के नाते वह कुछ कह नहीं पाते। इसी बात का यह अहंमन्य डॉक्टर साहिबा तो भरपूर फायदा उठाती ही हैं, बल्कि अस्पताल के अन्य डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ भी इसी बात का भरपूर दोहन करता है।

उनका कहना है कि आए दिन कल्याण रेलवे अस्पताल के मेडिकल स्टोर में अनेकों जरूरी दवाओं का अभाव रहता है। हार्ट जैसी गंभीर बीमारियों में भी अनेकों चालू कंपनियों की, हर बार बदल-बदलकर तथा अलग-अलग पोटेंसी की दवाएं देना यहां की विशेषता है। रेलकर्मियों के मरने-जीने की इनको कतई कोई परवाह नहीं होती। जबकि दबंग यूनियन पदाधिकारियों और अधिकारियों को न सिर्फ ब्रांडेड कंपनी की हर दवा लोकल परचेज (एलपी) करके मुहैया कराई जाती है, बल्कि उनके सामने भीगी बिल्ली बनकर उनकी चापलूसी भी होती है।

उन्होंने बताया कि असामाजिक तत्वों से अस्पताल की सुरक्षा के लिए प्राइवेट सिक्योरिटी लगाई गई है, परंतु उसका भरपूर उपयोग यहां मरीजों और उनके पारिवारिक सदस्यों तथा अस्पताल आने वाले अन्य रेलकर्मियों को बेइज्जत करने और उनमें खौफ फैलाने के लिए ज्यादा किया जा रहा है। रेलकर्मियों का आरोप है कि उद्दंड सिक्योरिटी वाले अहंमन्य एसीएमएस के इशारे पर अस्पताल आने वालों के साथ ऐसी अभद्रता करते हैं जैसे कि उन्हें अस्पताल आने वाला हर रेलकर्मी असामाजिक तत्व नजर आता है, उनका यह दुर्व्यवहार और उनके द्वारा की जाने वाली अनावश्यक पूछताछ तथा टोका-टाकी कई बार असहनीय हो जाती है।

उन्होंने कहा कि अब कुछ महीनों से कोविड नामक ऐसा अवसर मिल गया है कि उसके नाम पर अस्पताल में दूसरे सारे इलाज, ऑपरेशन तथा अन्य गतिविधियां बंद पड़ी हैं। यहां कई महीनों से ओटी बंद है। आंखों के ऑपरेशन के लिए रेलकर्मी भटक रहे हैं। मोतियाबिंद के कारण मेडिकल में अटके लोग चुपचाप बाहर से अपना पैसा खर्च कर ऑपरेशन करवा रहे हैं, तब यहां के डॉक्टर उनको फिट कर रहे हैं। पर किसी के दिमाग में यह नहीं आ रहा है कि कर्मचारी को अपने पैसे से बाहर ऑपरेशन न करवाना पड़े, इसका कोई उपाय निकाला जाए।

कर्मचारी कहते हैं कि यहां पागलों जैसा काम चल रहा है, जैसे कि यह कोई मेंटल हॉस्पिटल हो। वास्तविक बीमारी का आदमी इधर-उधर भटक रहा है। यदि कोई हिम्मत करके अस्पताल पहुंच भी गया, तो पहले दो-तीन दिन उसकी कोविड के नाम पर ऐसी दुर्गति होती है कि बिना कोविड के ही उसके प्राण हलक में आ जाते हैं। सस्पेक्टेड कोविड मानकर 12-15 घंटे कल्याण में, फिर पांच से आठ संक्रमित मरीजों के साथ एक ही एंबुलेंस द्वारा मुंबई सेंट्रल स्थित पश्चिम रेलवे के जगजीवन राम अस्पताल (जेआरएच) के लिए भेज दिया जाता है। जहां दो-तीन घंटे एंबुलेंस में ही मरीजों को बैठे रहना पड़ता है।

दो-तीन घंटे बाद उन्हें बताया जाता है कि जेआरएच में बेड उपलब्ध नहीं है, इसलिए अब उनको मध्य रेलवे के भायखला रेलवे अस्पताल भेजा जा रहा है। फिर काफी इंतजार के बाद जैसे-तैसे उनको वार्ड में भर्ती किया जाता है और तब कोविड टेस्ट होता है। दो दिन बाद कोविड की रिपोर्ट यदि नेगेटिव आती है, तब फिर उस कर्मचारी को कल्याण रेलवे अस्पताल भगा दिया जाता है। इस तरह तीन-चार दिन तक एक बीमार आदमी (कर्मचारी) की जानवरों से भी बुरी फजीहत कोविड के नाम पर ही होती रहती है। इससे मरीज उसकी वास्तविक बीमारी ही भूल जाता है। ऐसी में कसाई के यहां बंधे बकरे जैसी हालत के चलते कर्मचारी किसी तरह अपनी जान छुड़ाकर भाग खड़ा होता है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार कल्याण रेलवे अस्पताल के 44 नंबर वार्ड में कोविड पॉजिटिव के लिए 5 बेड रखे गए हैं। वहां कभी कोई सफाई कर्मी ही नहीं रहता। पेशेंट के पारिवारिक सदस्य भी उपस्थित नहीं रह सकते, क्योंकि एसीएमएस किसी कटखनी बिल्ली जैसी गुर्राती रहती हैं। ऐसे में वहां भर्ती मरीज की कितनी फजीहत होती होगी, इसका अंदाजा कोई भी लगा सकता है।

अस्पताल के 44 नंबर वार्ड तक पहुंचने का रास्ता कोविड पेशेंट, मेडिसिन काउंटर, सिक-फिट काउंटर तथा लैब से होकर गुजरता है। अस्पताल में अन्य पेशेंट के साथ कोविड पेशेंट आने के कारण अस्पतालकर्मी भी संक्रमित होते जा रहे हैं। परंतु अस्पताल की एसीएमएस उर्फ नोडल ऑफिसर की सनक के चलते इसका ठोस उपाय उपलब्ध होने के बाद भी नहीं किया जा रहा है।

जानकारों के अनुसार यदि फ्लू ओपीडी, इंस्टीट्यूट के बैडमिंटन हॉल में बना दी जाए तो पेशेंट्स को अस्पताल के बाहर सड़क पर खुले आसमान के नीचे धूप बारिश में नहीं खड़ा होना पड़ेगा बल्कि वह पूर्ववत सीधे अस्पताल में जा पाएंगे। फ्लू ग्रस्त कर्मचारी बैडमिंटन हॉल में आकर आराम से बैठ सकता है। डॉक्टर के देखने के बाद यदि शंका है तो वहीं पर संबंधित दवा देकर उसे सीएचआई ऑफिस की तरफ से पीछे बने दरवाजे से ऑडिटोरियम में भेजा जा सकता है। इसके लिए अस्पताल के दूसरे माले पर स्थित 28 बेड के क्वारंटाइन वार्ड को तत्काल बंदकर ऑडिटोरियम तथा सर्जिकल वार्ड को कोविड वार्ड बना देना चाहिए जिससे कोविड पेशंट अस्पताल में रहकर भी सभी से अलग रह सकेंगे तथा अन्यत्र संक्रमण फैलने से रोका जा सकेगा।

परंतु यह सीधा तरीका सीएमएस कल्याण के दिमाग में नहीं आ रहा है। जबकि नोडल ऑफिसर की मनमानी के चलते यह सारी परेशानी हो रही है तथा बेसिर-पैर के कार्यों में कोविड फंड का गलत इस्तेमाल और दुरुपयोग हो रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि चूंकि यह रेलवे अस्पताल है, और मरीज भी रेल कर्मचारी अथवा उनके पारिवारिक सदस्य ही होते हैं, इसके चलते यहां सब कुछ सहन किया जा रहा है। उनकी इस सहनशीलता के चलते ही यहां के कुछ सनकी डॉक्टरों का सनकीपन बढ़ता जा रहा है। इनको मंडल चिकित्सालय में रखना रेलकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।

शुक्रवार, 10 जुलाई को कल्याण अप यार्ड में कार्यरत रहे जूनियर क्रू कंट्रोलर ओमप्रकाश सिंह, कोविड संक्रमित रेलकर्मी, ऑक्सीजन की कमी के चलते रेलवे अस्पताल में एडमिट हुआ था। 11 जुलाई को उसका कोविड सैंपल लिया गया तथा 12 जुलाई को उसे पॉजिटिव पाया गया था। अब 12 जुलाई की सुबह 11 बजे रिपोर्ट आने से लेकर 13 जुलाई को दोपहर बाद करीब 3 बजे तक ऑक्सीजन की कमी के पेशेंट को क्यों प्रतीक्षा में रखा गया? उसको 12 जुलाई को सुबह 11 बजे रिपोर्ट मिलने के तुरंत बाद जेआरएच या भायखला अस्पताल क्यों नहीं भेजा गया? यह तो अस्पताल की सनकी नोडल अधिकारी ही बता सकती हैं। जबकि 12 जुलाई को 5 पेशेंट जेआरएच भेजे गए थे, जो कि उससे बहुत कम खतरे में थे। तथापि यदि उसे इतना ही खतरा महसूस हो रहा था तो रेलवे से संबद्ध कल्याण के किसी प्राइवेट अस्पताल में उसे क्यों नहीं रेफर किया गया?

बताते हैं कि 13 जुलाई को दोपहर बाद जब इस पेशेंट को ऑक्सीजन के साथ, एक ही एंबुलेंस में छह लोगों को ठूंसकर, इस ऑक्सीजन लगे मरीज को भी बैठाकर, (क्योंकि एंबुलेंस में छह लोगों के बैठने के बाद किसी मरीज के लेटने की जगह ही नहीं रह सकती) भायखला के लिए रवाना किया गया था। मुलुंड तक पहुंचते-पहुंचते यानि मात्र 35 मिनट बाद ही ऑक्सीजन खत्म हो गई, तब दूसरे सभी पेशेंट, जो खुद पॉजिटिव थे, घबराकर सिलेंडर हिलाकर ऑक्सीजन निकालने का प्रयास करते रहे, और एंबुलेंस चालक 100 से भी अधिक की स्पीड से गाड़ी भगाकर बहुत जोखिमपूर्ण ड्राइविंग करते हुए शाम 4 बजे भायखला अस्पताल पहुंचा था। तब तक पेशेंट की हालत बेहद नाजुक हो चुकी थी, और सभी उपायों के बावजूद शाम 5.15 बजे यह रेलकर्मी असमय काल कवलित हो गया।

यह न सिर्फ अत्यंत अमानवीय कृत्य है, बल्कि डॉक्टरी पेशे को भी बहुत ज़्यादा शर्मशार करने वाला है? ऑक्सीजन आधा घंटे में ही कैसे खत्म हो गई? ऐसा ऑक्सीजन सिलेंडर एंबुलेंस में रखा ही क्यों गया? क्या उक्त रेलकर्मी से कोई जातीय दुश्मनी थी? नोडल ऑफिसर की मनमर्जी, खौफ तथा उनके द्वारा की जाने वाली बेइज्जती के चलते अस्पताल के कर्मचारी भी किंकर्तव्यविमूढ़ होते जा रहे हैं। जो कर्मी जिंदगी-मौत से जूझ रहा था, उसको बिना लेटे अन्य 5 लोगों की भीड़ में ठूंसकर भेजना क्या सही निर्णय था? इसकी उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए, वरना ऐसे अमानवीय कृत्य और भी अधिक होने लगेंगे, और आए दिन रेलकर्मियों की जान ऐसे डॉक्टरों और अस्पताल कर्मियों की लापरवाही से जाती रहेगी।





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ट्रेनों के परिचालन में प्लेटफार्मों की विसंगति से यात्रियों को भारी असुविधा – RailSamachar

प्लेटफार्म नं. 1 और प्लेटफार्म नं. 6-7 को छोड़कर सीधे प्लेटफार्म नं. 8-9 पर यात्रियों को भेजा जाना, यह किसी विशेष प्रयोजन के तहत किया गया प्रतीत होता है, जबकि यहां सामान्य सुविधा नियमों का पालन करना जरूरी नहीं समझा गया

अहमदाबाद : पश्चिम रेलवे का अहमदाबाद रेलवे स्टेशन एक अत्यंत व्यस्त और भारी भीड़ वाला स्टेशन है। कम ट्रेनों के चलते भी इस रेलवे स्टेशन पर काफी भीड़ हो जाती है। स्टेशन का प्लेटफार्म-4 फिलहाल दुरुस्तीकरण के लिए बंद किया गया है। तथापि उस पर भी गाड़ियां ले ली जा रही हैं। इससे यात्रियों की आवाजाही में परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा प्लेटफार्म-1 और 6-7 को खाली रखकर सीधे प्लेटफार्म 8-9 पर यात्रियों को भेजना उन्हें और ज्यादा परेशानी में डालने जैसा है। स्टेशन पर ट्रेन ऑपरेशन की इस विसंगति को लेकर जेडआरयूसीसी/प.रे. के सदस्य योगेश मिश्रा, किंजन पटेल और शैलेश उपाध्याय ने सोमवार, 29 जून को रेल प्रशासन का ध्यान यात्रियों की परेशानी की ओर आकर्षित करते हुए एक ज्ञापन सौंपा है।

ज्ञापन के अनुसार अहमदाबाद मंडल से वर्तमान में 100 जोड़ी ट्रेनों में से 10 जोड़ी ट्रेनों को अहमदाबाद स्टेशन से चलाया जा रहा है। जबकि एक पासिंग ट्रेन भी है। इस प्रकार कुल 11 जोड़ी ट्रेनों का आवागमन अहमदाबाद स्टेशन पर होता है। अहमदाबाद स्टेशन पर कुल 12 प्लेटफार्म थे। परंतु बुलेट ट्रेन एवं मेट्रो का निर्माण कार्य चलने के कारण प्लेटफार्म नं. 10, 11 और 12 को पूरी तरह बंद कर दिया गया है।

इस प्रकार अहमदाबाद रेलवे स्टेशन के पूर्वी छोर (प्लेटफार्म-12 की तरफ) से आवागमन का पूरा मार्ग अवरुद्ध हो चुका है। अब वहां से किसी भी व्यक्ति का किसी भी प्रकार से आवागमन नहीं हो सकता। अतः 22 मार्च से जनता कर्फ्यू और 24 मार्च से लॉकडाउन के बाद नियमित यात्री ट्रेनों का संचालन बंद किया गया था।

यह स्थिति है अहमदाबाद स्टेशन के प्लेटफार्म नं. 8-9 की, जिस पर अभी निर्माण कार्य प्रगति पर है। फिर भी इस पर ट्रेन का परिचालन 29 जून शुरू कर दिया गया है। नीचे का यह वीडियो इस बात का साक्ष्य है। आखिर प्लेटफार्म नं. 6-7 पर परिचालन क्यों नही किया जा सकता? इसकी जवाबदेही किसकी है? यात्रियों की समस्या के विषय में लापरवाही क्यों और कब तक?

Taking train on under construction platform at #Ahmedabad station by Ahmedabad Division Operating authorities

1 मई से श्रमिक ट्रेनें चालू हुईं तथा 1 जून 2020 से स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही हैं। इसमें अहमदाबाद स्टेशन से 10 ट्रेनें चल रही हैं। वर्तमान में अहमदाबाद स्टेशन पर 1 से 8 तक कुल 8 प्लेटफार्म उपलब्ध हैं। इन प्लेटफॉर्मों पर ट्रेनों का कम से कम आवागमन होने के कारण वर्तमान में 1 जून से प्लेटफार्म नं. 1, 3, 4 और 5, यानि कुल 4 प्लेटफार्मों से ट्रेनों का परिचालन ऑपरेटिंग डिपार्टमेंट द्वारा किया जा रहा है।

परंतु 29 जून से प्लेटफार्म नं. 4 की मरम्मत हेतु 38 दिन का ब्लाक लिया गया है, जिसके कारण प्लेटफार्म नं. 4 से चलने वाली गाड़ियों को अन्य प्लेटफार्मों पर डायवर्ट किया जाना है। 1 जून से अहमदाबाद स्टेशन से चलने वाली विशेष ट्रेन नं. 02947 अहमदाबाद-पटना, ट्रेन नं. 09019 अहमदाबाद-गोरखपुर स्पेशल ट्रेन, प्लेटफार्म नंबर 1 से चलनी थी। जबकि प्लेटफार्म-3 से 02915 अहमदाबाद-दिल्ली, 09165 अहमदाबाद-दरभंगा, 09167 अहमदाबाद-वाराणसी ट्रेन चलाई जा रही थी।

इसी प्रकार ट्रेन नं. 02479 जोधपुर-बांद्रा टर्मिनस की पासिंग प्लेटफार्म-3 से कराई जा रही थी। प्लेटफार्म-4 से ट्रेन नं. 02917 अहमदाबाद-निजामुद्दीन चलाई जा रही थी। ट्रेन नं. 02480 बांद्रा टर्मिनस-जोधपुर की पासिंग हो रही थी। जबकि प्लेटफार्म-5 से ट्रेन नं. 02833 अहमदाबाद-हावड़ा, 02934 अहमदाबाद मुंबई सेंट्रल, 02957 अहमदाबाद-नई दिल्ली, 09083 अहमदाबाद-मुजफ्फरपुर स्पेशल ट्रेन चलाई जा रही है।

परंतु 28 दिन के परिचालन के बाद प्लेटफार्म-4 के दुरुस्तीकरण के लिए ब्लॉक लेने पर यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए सिर्फ प्लेटफार्म-4 की ट्रेनों को अन्य प्लेटफार्मों पर डायवर्ट करके उन्हें वहां से ऑपरेट किया जाना चाहिए था। इसके बजाय अहमदाबाद मंडल के ऑपरेटिंग विभाग द्वारा प्लेटफार्म-1 से सिर्फ बांद्रा टर्मिनस-जोधपुर ट्रेन 02480 पास की जा रही है।

जबकि प्लेटफार्म-3 से ट्रेन नं. 02947 अहमदाबाद-पटना, और ट्रेन नं. 02917 अहमदाबाद-निजामुद्दीन ही चलाई जा रही है। प्लेटफार्म-4 को ब्लॉक कर दिया गया है। प्लेटफार्म-5 से ट्रेन नं. 02833 अहमदाबाद-हावड़ा एक्सप्रेस, 02934 अहमदाबाद-मुंबई सेंट्रल, 02957 अहमदाबाद-नई दिल्ली ट्रेनें चलाई जा रही है। प्लेटफार्म नं. 5-6-7 से एक भी ट्रेन को ऑपरेट न करके किन कारणों से प्लेटफार्म-8/9 से गाड़ियों का परिचालन किए जाने का निर्णय लिया गया, यह समझ से परे है।

प्लेटफार्म-8 से 29 जून को ट्रेन नं.09083 अहमदाबाद मुजफ्फरपुर, ट्रेन नं.02915 अहमदाबाद-दिल्ली, ट्रेन नं. 02479 जोधपुर-बांद्रा टर्मिनस की पासिंग कराई गई। जबकि प्लेटफार्म-9 से ट्रेन नं.09165 अहमदाबाद दरभंगा, ट्रेन नं.09167 अहमदाबाद-वाराणसी, ट्रेन नं. 09014 अहमदाबाद-गोरखपुर एक्सप्रेस ट्रेन चलाई गई। प्लेटफार्म-12 की तरफ से आवागमन का संपूर्ण मार्ग बंद होने के कारण प्लेटफार्म उस तरफ से किसी भी प्रकार से आवागमन नहीं हो सकता है।

वर्तमान में सुरक्षा के दृष्टिकोण से एवं सोशल डिस्टेंसिंग का पालन और थर्मल स्कैनिंग करते हुए, सैनिटाइजर मार्ग से गुजरकर यात्रियों को प्लेटफार्म पर प्रवेश दिया जा रहा है। जो अहमदाबाद मंडल का सराहनीय कार्य है। अहमदाबाद स्टेशन पर  मात्र प्लेटफार्म-1 की तरफ से ही आवागमन का मार्ग प्रशस्त किया गया है। ऐसी स्थिति में प्लेटफार्म-1 से एस्केलेटर (स्वचालित सीढ़ियों) अथवा एफओबी सीढ़ियां चढ़कर यात्रियों को नजदीकी प्लेटफार्म पर पहुंचने की सुविधाजनक व्यवस्था की जानी चाहिए।

यह एक साधारण नियम है, उस साधारण नियमों को भी ऑपरेटिंग विभाग ने ताक पर रखकर प्लेटफार्म-1 से मात्र एक ट्रेन, वह भी जो सिर्फ पासिंग है, का परिचालन जारी रखा गया है। प्लेटफार्म-3 से मात्र 2 ट्रेनों का आवागमन जारी रखने का निर्देश दिया गया है। जबकि प्लेटफार्म-5 से 3 ट्रेनों का परिचालन किया जा रहा है। वहीं प्लेटफार्म-8 से 2 ट्रेनें एवं प्लेटफार्म-9 से 3 ट्रेनों का परिचालन हो रहा है।

अब प्रश्न यह खड़ा होता है कि प्लेटफार्म नं. 1, 3, 5 के बाद प्लेटफार्म नं. 6 और 7 से परिचालन का कार्य किन कारणों से नहीं कराया जा रहा है? आखिर यात्रियों को एक प्लेटफार्म और आगे जाने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है? और किन कारणों से यात्री प्लेटफार्म नं. 6-7 पर न उतरकर, प्लेटफार्म नं. 8-9 पर कयों जाएं? यात्री को इसके लिए 50-100 कदम अतिरिक्त चलना पड़ेगा। यात्रियों को कम से कम दूरी तक चलाकर प्लेटफार्म पर उतारा जा सके, ऐसी सुविधाजनक व्यवस्था की जानी चाहिए।

फोटो परिचय: अहमदाबाद स्टेशन के प्लेटफार्म नं. 8-9 पर निर्माण कार्य चल रहा है। यह सोमवार, 29 जून की तस्वीर है। फिर भी इस प्लेटफार्म पर ट्रेन का परिचालन किया गया। जबकि प्लेटफार्म नं. 6-7 खाली पड़े हैं, उन पर परिचालन नहीं किया जा रहा, रेल प्रशासन से यह सवाल है जेडआरयूसीसी/प.रे. के सदस्यों का!

यदि सामान्य मानवीय दृष्टिकोण से भी देखा जाए तो भी 30-35 किग्रा वजन लिए हुए व्यक्ति को कम से कम दूरी तक पैदल चलकर पहुंचने की व्यवस्था करनी चाहिए। इसको ध्यान में रखकर प्लेटफार्म नं.1 और प्लेटफार्म नं. 6-7 को छोड़कर सीधे प्लेटफार्म नं. 8-9 पर यात्रियों को भेजा जाना, यह किसी विशेष प्रयोजन के तहत किया गया प्रतीत होता है, जबकि यहां सामान्य सुविधा नियमों का पालन करना जरूरी नहीं समझा गया। वह भी तब जब प्लेटफार्म-12 की तरफ से आवागमन का कोई भी मार्ग उपलब्ध नहीं है।

यात्रियों को प्लेटफार्म-1 से प्रवेश देकर, प्लेटफार्म-8 में पहुंचने की बजाय अगर प्लेटफार्म नं. 6-7 पर उतारा जाए तो यह उनके लिए न सिर्फ काफी सुविधाजनक होगा, बल्कि उनका समय और वजन लेकर चलने का उनका परिश्रम कुछ कम हो सकता है। गस तथ्य पर विचार किया जाना चाहिए।

उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में लेते हुए इस विषय पर विचार करने और यात्रियों को होने वाली मुश्किलों को कम करने का प्रयास करने हेतु उचित कार्यवाही किए जाने का यह ज्ञापन क्षेत्रीय रेल उपभोगकर्ता परामर्शदात्री समिति, पश्चिम रेलवे के सदस्य योगेश मिश्रा ने महाप्रबंधक/प.रे. आलोक कंसल, प्रमुख मुख्य परिचालन प्रबंधक/परे. शैलेंद्र कुमार और डीआरएम/अहमदाबाद दीपक कुमार को भेजा है।



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लापरवाह एएनओ के कुप्रबंधन से एनआरसीएच की कई नर्सें हुईं कोरोना संक्रमित

स्टाफ करता है सप्ताह में 72 घंटे की ड्यूटी, एएनओ और उसके चहेते करते हैं सिर्फ 24 घंटे की साप्ताहिक ड्यूटी, एनआरसीएच में एचओईआर के समस्त नियम-निर्देश हैं ताक पर

उत्तर रेलवे सेंट्रल हॉस्पिटल (एनआरसीएच) की कई नर्सें कोरोना संक्रमित हो हैं। उन्हें फिलहाल होम कोरंटाइन किया गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार इन नर्सों की यह हालत लापरवाह और एरोगेंट असिसटेंट नर्सिंग ऑफिसर/मैन पॉवर प्लानिंग (एएनओ/एमपीपी) की मनमानी तथा कुप्रबंधन के कारण हुई है।

पता चला है कि एनआरसीएच में एएनओ की मनमानी के चलते नर्सों एवं अन्य पैरामेडिकल स्टाफ से अनावश्यक रूप से 12-12 घंटे की ड्यूटी करवाई जा रही है। इस दौरान सभी नर्सों को लगातार पीपीई पहने रहना पड़ता है।

इसके अलावा एएनओ द्वारा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों की पूरी तरह से अनदेखी तथा अवहेलना करके एनआरसीएच के समस्त स्टाफ को एकसाथ ड्यूटी पर बुलाया जाता है। इसीलिए स्टाफ का एक-दूसरे के साथ अधिकतम संपर्क हो रहा है।

एनआरसीएच के सूत्रों का कहना है कि ऑपरेशन थिएटर (ओटी) में कार्यरत समस्त नर्सिंग स्टाफ को भी एकसाथ ड्यूटी पर बुलाया जा रहा था। इसी वजह से उनमें से कोई एक-दो स्टाफ बाहर से संक्रमित होकर आया होगा, जिसके निकट संपर्क में आने के कारण बाकी स्टाफ भी संक्रमित हुआ।

स्टाफ का कहना है कि चूंकि बाहर से संक्रमित होकर आया स्टाफ दो-तीन दिनों तक आराम से ड्यूटी कर रहा था, इसलिए उसके संपर्क में आईं ओटी की 6 नर्सें भी संक्रमित पाई गई हैं, जिनको फिलहाल होम कोरंटाइन किया गया है।

समस्त नर्सिंग स्टाफ का कहना है कि एनआरसीएच में उनसे 12-12 घंटों की ड्यूटी करवाकर उनका भयानक शोषण किया जा रहा है और रेलवे की कोई सक्षम अथॉरिटी उनकी कोई समस्या सुनने-समझने को तैयार नहीं है।

उनका कहना है कि एरोगेंट एएनओ और उसका खास चापलूस स्टाफ सुबह 8 बजे से शाम को 4 बजे तक की ही ड्यूटी करता है, वह भी सप्ताह में सिर्फ 3 दिन। इस तरह एएनओ और उसके खास चहेते साप्ताहिक सिर्फ 24 घंटे की ही नौकरी कर रहे हैं।

जबकि वहीं अन्य स्टाफ से – नॉन-कोविद में ३६ घंटे और कोविद वार्ड एवं ओपीडी में 72 घंटे – की ड्यूटी ली जा रही है। यानि अन्य स्टाफ से 14 दिन की ड्यूटी, वह भी लगातार 12-12 घंटे की!

स्टाफ का कहना है कि एनआरसीएच में एचओईआर के नियमों-निर्देशों का किसी भी स्तर पर किसी भी तरह से अनुपालन नहीं किया जा रहा है। यहां सीनियर डॉक्टर सिर्फ अपने केबिन में बैठकर हवा-हवाई निर्णय लेते हैं, जबकि जमीन पर स्टाफ की जो परेशानियां हैं, भौतिक समस्याएं हैं और अन्य जो वास्तविकताएं हैं, उनका सामना कोई नहीं करना चाहता।

प्राप्त ताजा जानकारी के अनुसार अब जब कई नर्सें कोरोना संक्रमित हो चुकी हैं, और इससे हॉस्पिटल की भी काफी बदनामी हो रही है, तथा यह बात केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय सहित कोविद ग्रुप के भी संज्ञान में आ चुकी है, तब रेल प्रशासन को कुछ होश आ रहा है, क्योंकि उसको स्थिति सुधारने तथा उस पर पूरा नियंत्रण करने के लिए सख्ती से कहा गया है।








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जब हम कोरोना से लड़ते हुए देश सेवा में लगे थे, तब सरकार हमारी पीठ पर खंजर घोंप रही थी -शिवगोपाल मिश्रा

यह समय चुनौतीपूर्ण है, इसलिए हमें कोरोना से डरकर नहीं, लड़कर यूनियन का काम करना होगा -महामंत्री

एनआरएमयू, लखनऊ मंडल की समीक्षा बैठक संपन्न

नई दिल्ली: नार्दर्न रेलवे मेंस यूनियन, लखनऊ मंडल की समीक्षा बैठक शनिवार, 30 मई को संपन्न हुई। बैठक में महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने कहा कि ये वक्त चुनौतीपूर्ण है, इसलिए हमें कोरोना से डरकर नहीं, लड़कर यूनियन का काम करना होगा। उन्होंने कहा कि ये सही है कि कोरोना के चलते चौतरफा दहशत का माहौल है। फिर ये जल्दी खत्म होने वाला भी नहीं है। ऐसे में हम सब घर तो नहीं बैठ सकते है। परंतु सावधानी के साथ अपना काम भी करना है और यूनियन की गतिविधियों को भी जारी रखना है।

वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए लखनऊ मंडल की समीक्षा बैठक में महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने सभी मामलों पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि लॉकडाउन के बावजूद रेलकर्मचारी पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ ट्रेनों का संचालन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन से जब पूरा देश ठप हो गया, लोग घरों में बैठ रह गए, तब देशवासियों की चिंता रेलकर्मियों ने की, क्योंकि अगर इस दहशत के माहौल में मालगाडियों और पार्सल ट्रेनों का संचालन न होता, तो कई राज्यों में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति ठप हो जाती।

उन्होंने कहा कि रेलकर्मचारियों ने मालगाड़ियों, पार्सल ट्रेनों का संचालन कर अनाज, फल, सब्जी, दूध की ही आपूर्ति को नहीं, बल्कि अन्य जरूरी सामानों की भी किसी राज्य में कमी नहीं होने दी। जब राज्य सरकारें मजदूरों को उनके घर पहुंचाने में नाकाम साबित हुईं, तो फिर किसी तरह की चिंता किए बगैर हजारों ट्रेनों के जरिए 50 लाख से ज्यादा मजदूरों को उनके घर रेलकर्मियों ने ही पहुंचाया।

महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि जब हम कोरोना से लड़ते हुए देश की सेवा कर रहे थे, तब हमारी सरकार हमारी पीठ थपथपाने के बजाय हमारी पीठ पर हमला कर रही थी। उस दौरान सरकार श्रमिक विरोधी काम करते हुए कर्मचारियों को मिल रही सुविधाओं में कटौती करने की साजिश में जुट गई। उन्होंने कहा कि एक तरफ तो रेलकर्मचारियों ने बिना मांगे पीएम केयर फंड में 151 करोड़ रुपये का योगदान दिया, तो दूसरी तरफ सरकार ने हमारी पीठ पर खंजर घोंपा। वह हमसे कहते तो हम कुछ और भी मदद करते, लेकिन ऐसा न करके सरकार ने डीए फ्रीज करने का एकतरफा फैसला सुना दिया।

उन्होंने कहा कि एआईआरएफ और एनआरएमयू का इतिहास है कि हमने कभी किसी भी सरकार की मनमानी नहीं चलने दी। हमने कर्मचारी हितों के साथ कभी समझौता नहीं किया। इसलिए इस मामले पर फेडरेशन ने अपना रुख साफ कर दिया कि सरकार की ये चालबाजी हमें मंजूर नहीं है।

महामंत्री ने कहा कि फिलहाल तो डीए को फ्रीज करने का मामला हो, या  फिर पदों को खत्म करने की बात हो, पुरानी पेंशन की बहाली समेत अन्य दूसरे मुद्दों पर एनआरएमयू और फेडरेशन लगातार सरकार के संपर्क में रहकर अपना विरोध जताती रही है। जब देखा गया कि इस सबके बाद भी सरकार का रवैया कर्मचारियों के खिलाफ ही है, तो एआईआरएफ की स्टैंडिग कमेटी की बैठक में संघर्ष का निर्णय लिया गया।

उन्होंने कहा कि इसी क्रम में एक से छह जून तक तो हम राष्ट्रीय स्तर पर जनजागरण करेंगे और आठ जून को काला दिवस मनाने के लिए काली पट्टी बांधकर काम करेंगे। इसके बाद भी अगर हमारी बात नहीं सुनी जाती है, तो आगे की रणनीति पर विचार किया जाएगा।

उन्होंने दोहराया कि अगर सरकार को बैकफुट पर लाना है, तो हमें निचले स्तर पर गर्मी पैदा करनी होगी। इसके बिना काम चलने वाला नहीं है। महामंत्री ने कहा कि इन हालात में हमें कोरोना से डरकर घर नहीं बैठ जाना है, बल्कि कोरोना से भी लड़कर सरकार का भी मुकाबला करने को तैयार रहना है।

महामंत्री ने संगठन की समीक्षा बैठक में लखनऊ मंडल की तारीफ की और कहा कि मेंबरशिप का मामला हो या फिर केंद्र से निर्धारित किए गए कार्यक्रम हों, हर मामले में लखनऊ मंडल का प्रदर्शन बेहतर रहा है। उन्होंने युवाओं को संगठित करने पर जोर दिया। संगठन में दो शाखाओं के चुनाव भी होने हैं, लिहाजा सभी शाखा सचिव अपना  इलेक्टोरल तैयार कर केंद्र को भेज दें, ताकि आगे की कार्रवाई की जा सके।

केंद्रीय अध्यक्ष एस. के. त्यागी ने लखनऊ मंडल के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि अभी तो देख रहा हूं कि कोरोना का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, इसलिए सावधानी  बरतनी होगी, क्योंकि  इसकी चपेट में कुछ रेलकर्मचारी भी आ गए हैं, लिहाजा रेल भवन ही नहीं बड़ौदा हाउस को भी बंद करना पड़ा है। उन्होंने कहा कि रेलकर्मियों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। सरकार ने हमें कोरोना वारियर्स तो माना, लेकिन दूसरे विभागों की तरह हमें किसी तरह की सहूलियत नहीं दी। इससे रेल कर्मचारियों में रोष होना स्वाभाविक है। आने वाला समय काफी चुनौतीपूर्ण है, इसलिए हमें काम के साथ अपनी सुरक्षा का भी पूरा ख्याल खुद ही रखना होगा।

केंद्रीय उपाध्यक्ष प्रवीना सिंह ने कहा कि लखनऊ मंडल विपरीत हालात में भी अच्छी मेंबरशिप की है। इसके लिए पूरी टीम बधाई की पात्र है। उन्होंने कहा कि मंडल  में महिला संयोजक के रिटायर होने के बाद ये पद रिक्त है, इस पर अगर जल्दी नियुक्ति हो जाए तो महिलाओं को संगठित करने में और सुविधा होगी।

नेशनल यूथ कन्वीनर प्रीति सिंह ने मंडल में युवाओं के बीच हुए कार्यों पर चर्चा की। इस कांफ्रेंस को केंद्रीय उपाध्यक्ष एस. यू. शाह, कोषाध्यक्ष जोनल यूथ कन्वीनर मनोज श्रीवास्तव ने भी संबोधित किया।

मंडल अध्यक्ष राजेश सिंह ने कहा कि ये सही है कि कोरोना की वजह से हमारे संगठन के कार्यों पर थोड़ा असर पड़ा, लेकिन जब हम सब ने देखा कि महामंत्री खुद इतनी देर तक काम कर रहे हैं, रोज आफिस आ रहे हैं, तो अपने लोगों ने भी संगठन के काम में कोई कोताही नहीं की और अपना प्रदर्शन बेहतर किया। उन्होंने कहा कि हमारी तैयारी है और जल्दी शाखास्तर पर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए कार्यक्रम को आगे बढ़ाया जाएगा।

मंडल मंत्री आर. के. पांडेय ने संगठन के कार्यों की विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि कोरोना के दौरान हमारे साथियों ने तमाम सामाजिक कार्यों में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। हम लोगों ने भूखे मजदूरों को श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में खाने के पैकेट का वितरण किया, लगेज पोर्टरों की मुश्किल घड़ी में मदद की गई। ऐप बेस्ट ट्रांसपोर्टर्स को भी राहत सामग्री का वितरण किया गया।

उन्होंने कहा कि इस दौरान कुछ रेलकर्मियों की भी कुछ समस्याएं रहीं, उनका भी समाधान किया गया। कई मसलों में केंद्रीय नेतृत्व से भी काफी मदद मिली, जिससे हम ये सब कर पाने में कामयाब हुए। उन्होंने आश्वस्त किया एक से छह जून के बीच जनजागरण अभियान के तहत हमारी तैयारी पूरी है और हम बेहतर प्रदर्शन करेंगे। इसके  अलावा आठ जून को हर कर्मचारी काली पट्टी जरूर बांधेगा, इसकी तैयारी की जा चुकी है।

कांफ्रेंस में सेवानिवृत्त हो रहे सहायक मंडलमंत्री घनश्याम पांडेय के कार्यों की भी सराहना की गई। इस दौरान मीटिंग को मुख्य रूप से राकेश कनौजिया, सुधीर तिवारी, एस. के. सिंह, रंजन सिह, संजय श्रीवास्तव, सुनिल सिंह, धीरेन्द्र सिंह, बिंदा प्रसाद, राकेश कुमार पांडेय, मदन गोपाल मिश्रा, राजकुमार, हीरा लाल और अजय श्रीवास्तव ने भी संबोधित किया।

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किसी का फेवर करना कोई मेंबर ट्रैफिक और सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड से सीखे!

भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था की बात कोरी बकवास है – जुगाड़ है, तो सब कुछ संभव है!

एक मजाक बनकर रह गई है 10-15 साल वाली रेलवे बोर्ड और रेलमंत्री की ट्रांसफर नीति

Suresh Tripathi

किसी अधिकारी या कर्मचारी को यदि सारी लाज-शरम छोड़कर फेवर करना हो, तो वह जाकर मेंबर ट्रैफिक और सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड सह एडीशनल मेंबर ट्रैफिक का शागिर्द बन जाए, क्योंकि इन दोनों अधिकारियों की अब तक की जो गतिविधियां रही हैं, उनके मद्देनजर यह बात सही साबित होती है। स्थिति यह है कि मेंबर ट्रैफिक ने एक विवादास्पद अधिकारी को अनावश्यक फेवर करके कम से कम रिटायरमेंट तक तो अपने लिए “फ्री-सोमरस आपूर्ति” का पुनः बंदोबस्त कर लिया है, क्योंकि उनके जीएम/द.पू.रे. रहते हुए भी वही उनकी आपूर्ति का सबसे बड़ा माध्यम था, ऐसा बताया गया है!

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ज्ञातव्य है कि मंगलवार, 19 मई 2020 को दोपहर बाद करीब पांच बजे रेलवे बोर्ड से मनोज कुमार का प्रमोशन/पोस्टिंग ऑर्डर निकला, उन्हें डायरेक्टर/रेल मूवमेंट, कोलकाता से उठाकर वहीं दक्षिण पूर्व रेलवे में अस्वाभाविक रूप से सीएफटीएम के पद पर पदस्थ किया गया, जो कि सभी अधिकारियों के लिए अत्यंत आश्चर्यजनक था, क्योंकि किसी को भी यह उम्मीद नहीं थी कि इतने विवादास्पद और जूनियर अधिकारी की पहली पोस्टिंग ही सीएफटीएम में हो सकती है। जबकि वहीं उससे कई बैच सीनियर और सक्षम अधिकारी बैठे हुए हैं तथा वहीं उसे बैठाया जा सकता है जहां वह कई साल लगातार बतौर डिप्टी सीओएम रहकर अपने सीनियर्स की जड़ें खोदता रहा था। ऐसे अधिकारी का मेंबर ट्रैफिक द्वारा इतना अधिक फेवर किया जाएगा, किसी को भी भरोसा नहीं था।

उनका यह फेवर यहीं खत्म नहीं हुआ। अगले ही दिन गुरुवार, 20 मई 2020 को सुबह ही उन्होंने मनोज कुमार को सीएफटीएम/द.पू.रे. का चार्ज लेने दक्षिण पूर्व रेलवे मुख्यालय, गार्डेन रीच भेज दिया। जहां प्राप्त जानकारी के अनुसार पीसीओएम को उन्होंने रिपोर्ट किया। वह उन्हें ज्वाइन कराने के लिए महाप्रबंधक के पास लेकर पहुंचीं। मिली जानकारी के अनुसार वर्तमान सीएफटीएम ने तभी उन्हें दो दिन बाद सोमवार को चार्ज हैंड ओवर करने के बारे में सूचित किया था। इसके बाद उन्होंने मनोज कुमार को सोमवार को आने के लिए कहकर वापस भेज दिया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार ऐसा माना जाता है कि गार्डेन रीच मुख्यालय से निकलने के बाद मनोज कुमार ने मेंबर ट्रैफिक को उपरोक्त ताजा स्थिति से अवगत कराया। इसके लिए उन्होंने मेंबर ट्रैफिक से मोबाइल पर बात की या उन्हें टेक्स्ट मैसेज भेजा, यह तो पता नहीं चल सका, मगर द.पू.रे. मुख्यालय से उनके निकलने के तुरंत बाद मेंबर ट्रैफिक का फोन पीसीओएम को पहुंचा और उन्होंने उनसे मनोज कुमार को फौरन सीएफटीएम का चार्ज दिलवाने को कहा। तत्पश्चात मनोज कुमार को कॉल करके बुलाया गया, जो कि कहीं आसपास ही थे और फौरन पहुंच गए, तथा उन्हें चार्ज सौंप दिया गया। अधिकारी आश्चर्यचकित हैं कि आखिर मेंबर ट्रैफिक द्वारा मनोज कुमार का इतना फेवर करने का औचित्य क्या है?

एमटी के फेवर की हद ये है कि 20 मई को ही जैसे ही मनोज कुमार ने करीब 2 बजे सीएफटीएम/द.पू.रे. का चार्ज लिया, उसके थोड़ी देर बाद ही एमटी ने उन्हें डायरेक्टर/रेल मूवमेंट का भी अतिरिक्त प्रभार सौंपते हुए तत्संबंधी आदेश रेलवे बोर्ड से जारी करा दिया। अधिकारियों का कहना है कि यह तो अपक्षित ही था, क्योंकि इस बारे संबंधित अधिकारी ने कोलकाता में पहले से ही हवा बनाई हुई थी। उनका कहना है कि इस फेवर के चलते एमटी ने अपनी रही-सही इज्जत भी गंवा दी है। उनके इस कदम से ट्रैफिक सर्विस के सभी अधिकारी उनसे सख्त नाराज हुए हैं।

अधिकारियों का कहना है कि “मनोज कुमार को तो तुरंत चार्ज लेने की जल्दी समझी जा सकती है, क्योंकि उन्होंने इस पोस्टिंग के लिए कथित तौर पर काफी मोटा दाम चुकाया होगा। परंतु मेंबर ट्रैफिक को उन्हें चार्ज दिलवाने की ऐसी क्या जल्दी थी, यह समझने वाली बात है।” उन्होंने इसका कारण यह बताया कि “इस पोस्टिंग के लिए मेंबर ट्रैफिक ने जो डील की है, यदि चार्ज टेकिंग ओवर में देरी होती, तो उन्हें यह पोस्टिंग रद्द होने और एक मोटी डील उनके हाथ से न निकल जाने की आशंका रही होगी! इसीलिए उन्हें चार्ज दिलाने की जल्दी थी।” उनका यह भी कहना था कि “यह आशंका सिर्फ मेंबर ट्रैफिक को ही नहीं, बल्कि उस पूर्व रेल राज्यमंत्री को भी थी, जिसने यह डील करवाई है!” उनका तो यह भी मानना है कि इस मामले में पीएमओ के भी सूत्र जुड़े हुए हैं। इस बात से रेलवे बोर्ड के हमारे विश्वसनीय सूत्रों ने भी इत्तेफाक जाहिर किया है।

उल्लेखनीय है कि आईआरटीएस-2000 बैच के कई अधिकारियों का पैनल जनवरी 2020 में ही फाइनल हो चुका था। पक्की खबर यह भी है कि फाइल पर इन सबकी प्रमोशनल पोस्टिंग भी तभी कर दी गई थी। तथापि चूंकि सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड को इनमें से अपने एक चहेते, जिसकी फाइल पर प्रस्तावित पोस्टिंग उत्तर पश्चिम रेलवे, जयपुर की गई है, को दिल्ली में ही बनाए रखना है, इसलिए उन्होंने हम सबकी पोस्टिंग अटकाई हुई है।

अब इसमें से चूंकि मनोज कुमार ने अपनी गोटियां सीधे मेंबर ट्रैफिक के साथ फिट कर लीं, इसलिए उनको फेवर करने के लिए उनके साथ कमलेश गोसाई की पोस्टिंग की गई है। सूत्रों का कहना है कि यह फाइल सीआरबी को भी नहीं भेजी गई, जबकि सीएफटीएम की पोस्टिंग की फाइल सीआरबी तक जाती है। चूंकि रेलमंत्री ने डायरेक्टर/रेल मूवमेंट के पद को अपग्रेड करने और उस पर मनोज कुमार की ही पोस्टिंग की मेंबर ट्रैफिक की अनुशंसा को खारिज करते हुए फाइल लौटा दी थी, अतः अब उनकी सीएफटीएम में पोस्टिंग की फाइल सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड द्वारा चालाकी दिखाते हुए सीआरबी के पास भी नहीं भेजी गई।

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अटके हुए अधिकारियों का कहना है कि बाकी हम सब अभी भी इसलिए अटके हुए हैं, क्योंकि हमारी पोस्टिंग तो तभी हो पाएगी जब सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड अपने चहेते को दिल्ली में फिट करने का कोई मुकम्मल जुगाड़ कर लेंगे। अभी तो फिलहाल उन्होंने कोविद के नाम पर उसे स्वास्थ्य मंत्रालय में टिकाकर दिल्ली में ही रखा हुआ है।

जिस तरह सरकार और रेलमंत्री द्वारा भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था की बात करना न सिर्फ बेमानी है, बल्कि यह केवल एक कोरी बकवास है। उसी तरह रेलमंत्री द्वारा 10-15 साल से एक शहर-एक रेलवे में टिके ऐसे तमाम अधिकारियों को दर-बदर करने की घोषित नीति भी अब तक केवल बकवास ही साबित हुई है। रेलवे बोर्ड के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि “यदि सरकार में, और रेलमंत्री सेल से लेकर मंत्रियों और पार्टी सांसदों तक किसी की पहुंच है, तो उसके लिए सब कुछ संभव है।” रेल मंत्रालय में ऐसे अनेकों उदाहरण मौजूद हैं।

Why this IRTS officer is being most favoured by Railway Board repeatedly?

रेल मंत्रालय में भ्रष्टाचार का यह आलम रेलमंत्री सेल से लेकर कमोबेश हर बोर्ड मेंबर और विभाग प्रमुख तक पसरा हुआ है। ठेकेदारों का कहना है कि “प्रत्येक टेंडर में कमीशन का रेट कुल मिलाकर लगभग 10% तक पहुंच चुका है। तथापि अब जब रेलवे की आंतरिक आर्थिक स्थिति गड़बड़ा गई है और कर्मचारियों को वेतन देने तक के लाले पड़ने की नौबत आ चुकी है, तब एक तरफ वैश्विक महामारी के समय भी मालगाड़ियां चलाई गईं हैं, तो दूसरी तरफ खुद के साथ रेलवे की कमाई के लिए आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के नाम पर पार्सल स्पेशल ट्रेनें चलाकर हार्ड पार्सल की ढ़ुलाई की जा रही है।”

जाहिर है कि ऐसे में यह महामारी रेलमंत्री के साथ ही कुछ कदाचारी रेल अधिकारियों के लिए भी वरदान स्वरुप साबित हो रही है। यही वजह है कि उन्हें मनोज कुमार जैसे जुगाड़ू और कमाऊ पूतों की सख्त जरूरत है। इसीलिए उनको कमाऊ पोस्ट पर बैठाना उन्हें जरूरी लगता है। इसीलिए उनकी नीति और निर्णय में कहीं कोई एकरूपता नहीं है। इसीलिए अब कास्ट कटिंग की बात की जा रही है। इसके लिए रेलवे बोर्ड ने सभी जोनल रेलों को मौखिक आदेश जारी किया है। रेलकर्मियों की 50% कटौती के लिए रेलमंत्री ने तो पहले ही फरमान जारी किया हुआ है।








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जरूरत है हर मुद्दे पर सरकार से सवाल करने की! – RailSamachar

लग्घी से पानी पिलाने से किसी की प्यास नहीं बुझती, आज जरूरत है कि सरकार किसी की भी हो, जहां जैसी जरूरत हो, वहां उससे वैसा सवाल किया जाए!

तो सवाल यह है कि जब बीस लाख करोड़ के पैकेज से भारत को “आत्मनिर्भर” बनाने कि बात की जा सकती है, तो कुछ सौ करोड़ खर्च करके राष्ट्रीय महामार्गों पर पैदल चलते लाखों लोगों को उनके घर क्यों नहीं पहुंचाया जा सकता?

तो सवाल है कि जब यह भीड़ ही नहीं रहेगी, तो आप किसके दम पर “आत्मनिर्भर भारत” बनाएंगे?

आप भूल रहें हैं कि यही वह भीड़ है, जिसने दिल्ली को दिल्ली बनाया। मुंबई को चमकाया और सूरत की सूरत सुधारी है।

इन्हीं के दम पर फैक्ट्री हैं, धंधे हैं, मॉल और पब हैं। आप इन्हीं के दम पर नेता हैं और इन्हीं के दम पर आपकी राजनीति है, पत्रकार हैं, बुद्धिजीवी हैं और हम लेखक हैं।

यही वह भीड़ है, जिसकी मेहनत और जिसके सीने से निकलने वाले पसीने के दम पर आपकी पांच ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी का सपना खड़ा हुआ है।

यही वह भीड़ है, जो थाली बजाती है, दीये जलाती है और ठीक आठ बजे टीवी खोलकर आपका इंतजार करती है। लेकिन आप तो मुंह में गमछा बांधकर कुछ दिन से “मेरा भाषण ही तेरा राशन है” वाली मुद्रा में हैं।

इधर भीड़ खाली पेट बीस लाख करोड़ के जीरो गिनते हुए सोच रही है कि आत्मनिर्भर भारत के विज्ञापन में वो कहां खड़ी होगी। पैदल चलते लोगों की थकी आंखें जानना चाहती हैं कि देश और राज्यों का ये कौन सा तंत्र है, जो अपने नागरिकों को उनके घर नहीं पहुंचा सकता?

क्या इतने संसाधन विहीन थे हम? शायद नहीं। इसलिए माफ करें प्रधानमंत्री जी, आप “लग्घी से पानी पिलाने” की बात करते हैं!

अब इस देश का तंत्र जनता को लग्गी से पानी पिला रहा है। जिनको तत्काल खाना और पानी चाहिए, उन्हें आत्मनिर्भर और लोकल से वोकल का मंत्र देकर बीस लाख करोड़ के जीरो गिनवा रहा है।

लेकिन दिक्कत है कि मुझे ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए थी। मुझे डरना चाहिए था, क्योंकि अब मुझे भी सर्टिफिकेट दे दिया जाएगा। कहा जाएगा कि तुम क्या जानो देश कैसे चलता है ?

मैं भी जानता हूं कि कमरे में बैठकर बातें करना दुनिया का सबसे आसान काम है। लेकिन इस सवाल से कैसे मुंह मोड़ लूं कि जब बीस लाख करोड़ खर्च करके इकोनॉमी बचाई जा सकती है, तो कुछ सौ करोड़ खर्च करके इन इकोनॉमी बचाने वालों को क्यों नहीं बचाया जा सकता!

लेकिन मैं देख रहा हूं, इस देश के बौद्धिक चलन को! यहां सवाल करने वाले हाशिये पर ढ़केल दिए जातें हैं और सवाल से समर्थन और विरोध करने वाले मजे में रहते हैं।

मुझे यकीन हो गया है कि अब यहां दो ही किस्म के लोग बचे रहेंगे.. या तो वो आंख मूंदकर किसी के समर्थन में खड़े होने वाले होंगे या आंख मूंदकर किसी के विरोध में। या तो वो किसी को भगवान मानते हैं, या किसी को शैतान। लेकिन न जाने क्यों, मुझे अब इन दोनों अतियों से चिढ़ होने लगी है।

यही कारण है कि मेरे जैसे आदमी ने लिखना कम कर दिया। और ये देखकर हैरान रह गया कि यहां मोदी की आलोचना करने पर भीड़ से निकला एक भक्त किसी को वामपंथी और कांग्रेसी ठहरा देता है।

अगर आपने उलटकर राजमाता और उनके युवराज से या फिर बाबूजी की राजनीतिक विरासत ढ़ो रहे राजकुमारों से सवाल कर दिया तो एक कथित सेक्युलर बुद्धिजीवी आपको “भक्त” का सर्टिफिकेट लाल कागज पर जारी कर देता है।

वहीं आपने गलती से भी यदि वामपंथियो की बौद्धिक बेईमनियों को आईना दिखा दिया, तब तो आप इस तथाकथित समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं।

यही कारण है कि मैंने मान लिया है कि यहां संतुलन बनाए रखना मुश्किल है। सत्य एक भ्रम है। निरपेक्षता एक ढोंग है और संवेदना एक बाजार है।

एक बुद्धिजीवी अपने हिस्से का सामान लेकर, बाजार में जब तक घूमता रहता है, तब तक वो प्रासंगिक बना रहता है, वरना गायब हो जाता है।

मुझे यकीन हो गया है कि मेरे जैसे लोग शायद नहीं पढ़े जाएंगे, क्योंकि अब वो हर वक्त किसी का गुणगान या विरोध करने की कला में शायद माहिर नहीं हो पाएंगे।

तथापि इतना तो तय है कि हम प्रासंगिक बने रहें या नहीं, साहित्यकार कहे जाएंगे या नहीं, लेकिन जब भी देश के हाशिये पर खड़े आम आदमी के ऊपर संकट आएगा, तब न हम किसी सत्ता के साथ खड़े रहेंगे, न ही किसी विपक्ष के साथ।

हम अटैची पर अपनी संतान को लेकर रोड पर घसीटने वाली मां के साथ ही खड़े रहेंगे। हम उन हाथों के साथ खड़े रहेंगे, जिन हाथों को थामने वाला कोई बचा नहीं है।

हम उन आंखों के साथ खड़े रहेंगे, जो पानी की खाली बोतलों और भोजन के बिखरे पैकेटों को टुकुर-टुकुर देखकर अपनी किस्मत को कोस रही हैं।

हम उन पैरों के साथ खड़े रहेंगे, जो अपने मरे हुए सपने को लेकर वक्त की कठिन चढ़ाईयां चढ़ रहे हैं। हम तय करेंगे कि भूख के साहित्य और मजबूरी की कविता को लाचारी के छंदों में लपेटकर कभी न बेचें।

हम पहले आईना देखेंगे और फिर दूसरों को दिखाएंगे, क्योंकि सत्तर सालों से इस देश में अंधे ही आईने बेचते आएं हैं और हम इन आईनों में अपनी मन-पसंद छवियां देखते आए हैं। इस महामारी में अब इस चलन को खारिज करने की जरूरत है। इसको सिरे से नकारने की जरूरत है।

आज जरूरत है कि सरकार किसी की हो, जहां जैसी जरूरत हो, वहां उससे वैसा सवाल किया जाए। काम अच्छा हो तो तारीफ की जाए और गलत हो तो झट से विरोध किया जाए। मन करे तो सलाह भी दी जाए।

क्योंकि जरूरी नहीं है कि आप अपने कमरे में इस लेख को पढ़ते हुए बचे रहेंगे। ये भयानक दौर है। किसी का भी कोई भरोसा नहीं है। कल को आप भी अपने भूखे बच्चे को लेकर इस पैदल चलती मजबूर भीड़ का हिस्सा हो सकते हैं। आप भी भूख-प्यास से चिल्ला सकते हैं।

और तब.. तब शायद आपको सोचकर अफसोस होगा कि इस अंध विरोध और अंध समर्थन की परम्परा ने सत्तर सालों से इस देश की जनता के साथ सबसे बड़ा धोखा किया है।

*लेखक अतुल कुमार राय एक वरिष्ठ साहित्यकार हैं।








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जीएम इंस्पेक्शन से ठीक पहले आनन-फानन में खड़े किए गए विद्युत पोल मामूली अंधड़ में हुए धराशाई

जबलपुर मंडल, विद्युत विभाग की भ्रष्टाचारपूर्ण कार्य प्रणाली के तहत ठेकेदार ने सतनाटिकरिया और सतनारीवा खंड पर अमानक कार्य को अंजाम दिया

जबलपुर मंडल, पश्चिम मध्य रेलवे के विद्युत विभाग की भ्रष्टाचारपूर्ण कार्य प्रणाली के चलते बिजली के खंभे गाड़ने के काम में जबलपुर के चहेते ठेकेदार ने जमकर लीपापोती की। यही वजह है कि जिस काम को ठेकेदार ने 14 मार्च को पूरा किया, वह जगह-जगह उजागर होने लगा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार कैमा रेलवे स्टेशन पर बिजली के ये आधा दर्जन खंभे एक मामूली आंधी में ढ़ह गए। ठेकेदार का यह अमानक कार्य जीएम निरीक्षण से ठीक पहले किया गया था।

पता चला है कि मानक के अनुरूप गड्ढ़े खोदकर सही तरीके से यह विद्युत पोल खड़े न किए जाने के कारण एक मामूली अंधड़ में ही धराशाई हो गए। जबलपुर मंडल बिजली विभाग के अधिकारियों की भ्रष्टाचारपूर्ण कार्य प्रणाली के कारण जबलपुर के ठेकेदार यासीन खान और उसके मैनेजर जावेद खान ने यह गुणवत्ताविहीन कार्य सतना-टिकरिया और सतना-रीवा रेलखंड पर पड़ने वाले सभी रेलवे स्टेशनों पर अंजाम दिया है।

पश्चिम मध्य रेलवे के महाप्रबंधक शैलेंद्र कुमार सिंह के निरीक्षण दौरे को सफल बनाने के लिए लाखों रुपए का बजट तैयारियों के नाम पर पानी की तरह बहाया गया। इसके लिए सतना-मानिकपुर और रीवा-सतना रेलखंड के सभी रेलवे स्टेशनों पर पूर्व तैयारी को लेकर काफी काम करवाया गया था। विद्युत संबंधी यह सभी कार्य दोनों रेलखंडों पर अधिकारियों ने अपने करीबी जबलपुर निवासी ठेकेदार को सौंपा था।

ठेकेदार ने जल्दबाजी और अधिक मुनाफा कमाने के चक्कर में घटिया निर्माण करवाया, जो अब अधिकारियों के गले की फांस बनता नजर आ रहा है। बिजली के यह खंभे गाड़ने के लिए निर्धारित मानक के अनुरुप गड्ढा खोदे बिना ही खड़े कर दिए गए, जिसके कारण मामूली सी आंधी में यह खंभे ढ़ह गए।

सतना से रीवा की तरफ जाने पर पहला रेलवे स्टेशन कैमा आता है। यहीं पर आंधी के कारण अभी हाल ही में लगाए गए आधा दर्जन बिजली के खंभे धराशाई हो गए। इसकी जानकारी मिलने पर कुछ सुपरवाइजर मौके पर पहुंचे। जितने भी नए खंभे दोनों रेलखंडों के रेलवे स्टेशनों पर खड़े किए गए थे, उनकी नींव ठेकेदार ने निर्धारित मानक के अनुरूप तैयार नहीं की थी, जिससे तेज हवा चलने से वह सब धराशाई हो गए। अब ठेकेदार का यह घटिया काम संबंधित अधिकारियों के लिए न सिर्फ एक मुसीबत बन गया है, बल्कि इससे यह भी साबित हो गया है कि रेलवे में भ्रष्टाचार चौतरफा व्याप्त है।

कुछ रेलकर्मियों का कहना है कि जिस समय ठेकेदार कैमा सहित अन्य रेलवे स्टेशनों पर बिना मानक आधार बनाए यह काम कर रहा था, यदि उसी दौरान जिम्मेदार अधिकारी ध्यान देते, तो शायद जीएम इंस्पेक्शन के महज डेढ़ महीने के अंदर इस तरह का नजारा उपस्थित नहीं होता। मौके पर पहुंची टीम ने देखा कि जिस स्थान पर खंभे गाड़े गए थे, वहां कोई मजबूत आधार नहीं बनाया गया था। यही कहानी सतना-रीवा और सतना-मानिकपुर रेलखंड के सभी रेलवे स्टेशनों पर देखने को मिली।

उल्लेखनीय है कि 14 मार्च 2020 को महाप्रबंधक का दौरा हुआ था। मात्र दो महीने के अंदर लाखों रुपए के काम की गुणवत्ता बेनकाब हो गई है। बिजली के खंभे गिरने की जानकारी मिलते ही डीआरएम/जबलपुर संजय विश्वास ने तत्काल सीनियर डीईई को मामले की जांच करने के लिए कहा। सीनियर डीईई ने अपने कुकर्मों को छिपाने के लिए एसएसई/सतना और एसएसई/रीवा को मोबाइल पर फटकार लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली।

मिली जानकारी के अनुसार ठेकेदार की इसी तरह की कोताही कुछ समय पहले टिकरिया रेलवे स्टेशन पर भी सामने आई थी। यहां पर सोलर पैनल से पंप चलाने के लिए एक रेलवे आवास की छत पर सोलर प्लेटें लगाई गई थीं। जहां एक प्लेट को नट-बोल्ट से बिना उचित तरीके से कसे भगवान भरोसे छोड़ दिया गया था। तेज अंधड़ में वह सोलर प्लेट जमीन पर गिरकर चकनाचूर हो गई। इससे हजारों रुपए का नुकसान तो हुआ ही, बल्कि लोगों की जान का खतरा भी पैदा हो गया।








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महीनों से लंबित भुगतान न मिलने और भारी प्रताड़ना से तंग आकर रेलवे ठेकेदार ने की आत्महत्या

आईआरआईपीए ने ठेकेदार की आत्महत्या के लिए डिप्टी सीई/सी/द.म.रे. एस. के. शर्मा को जिम्मेदार ठहराया

6 मार्च को पूरी भारतीय रेल के कांट्रेक्टर नहीं करेंगे रेलवे का कोई काम, ‘भुगतान दो – काम लो’ का लगाया नारा

इंडियन रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर्स एसोसिएशन ने 2 मार्च को चेयरमैन, रेलवे बोर्ड को एक पत्र लिखकर रेलवे कांट्रेक्टर डी वेंकट रेड्डी की आत्महत्या के लिए दक्षिण मध्य रेलवे, सिकंदराबाद के डिप्टी सीई/सी एस के शर्मा को जिम्मेदार ठहराते हुए रेड्डी को प्रताड़ित करने और महीनों से उसका भुगतान नहीं करने का आरोप लगाया है। इस मौके पर हुई रेलवे ठेकेदारों की एक बैठक में 6 मार्च को देश भर में ठेकेदारों द्वारा रेलवे का काम बंद करने का निर्णय भी लिया गया।

“अत्यंत खेद और भारी दुःख का विषय है कि विषम आर्थिक परिस्थितियों के चलते रेलवे विभाग में काम करने वाले हमारे एक ठेकेदार साथी डी वेंकट रेड्डी को आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा है।” यह लिखा है रेलवे कांट्रेक्टर वेंकट रेड्डी की आत्महत्या के बाद इंडियन रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर्स एसोसिएशन (आईआरआईपीए) के अध्यक्ष बाल किशन शर्मा और महासचिव राकेश कुमार मेघनानी द्वारा चेयरमैन, रेलवे बोर्ड को भेजे गए पत्र में। 

उन्होंने पत्र में लिखा है कि अपने खून पसीने की कमाई लगाकर और दिन-रात एक करके कड़ी मेहनत कर रेलवे ठेकेदारों द्वारा सरकारी/रेलवे ठेकों को निर्धारित गुणवत्ता और समयानुसार पूरा किया जाता है और तब कहीं जाकर किए गए कार्यों के सापेक्ष उन्हें अपना और अपने सहयोगी मजदूरों का पेट पालने तथा सप्लायर्स की रोजी-रोटी चलाने के लिए शासकीय विभागों से भुगतान प्राप्त हो पाता है। मगर शोषण की पराकाष्ठा तब हो जाती है, जब काम पूरा करने के कई-कई महीने बीतने के बाद भी रेलवे विभाग ठेकेदारों को भुगतान नहीं देता है।

उन्होंने लिखा है कि इसके बावजूद निरंतर काम जारी रखने के लिए विभाग द्वारा ठेकेदारों पर अनुचित दबाव बनाया जाता है, जिसके चलते ठेकेदारों पर लेबर और सप्लायर्स के भुगतान का दबाव लगातार बढ़ता चला जाता है। उस पर भी अनेक अधिकारियों द्वारा ठेकेदार को भुगतान मांगने पर विभिन्न तरीकों से प्रताड़ित किया जाता है।

https://youtu.be/sYI_RCYSy9A

!पत्र में उन्होंने कहा है कि इन विषम परिस्थितियों में कोई भी सामान्य व्यक्ति टूट सकता है और उसकी सहनशक्ति जवाब दे जाती है। इसी का नतीजा विगत दिनों उत्तर प्रदेश में दो ठेकेदारों द्वारा की गई आत्महत्या की घटनाएं रही हैं और वर्तमान में शोषण की इन्हीं परिस्थितियों के चलते हमारे अभिन्न साथी और कर्मठ ठेकेदार डी वेंकट रेड्डी को यह आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा है।

उन्होंने लिखा है कि रेलवे जैसे देश के सबसे व्यापक शासकीय विभाग में ठेकेदारों को कई-कई महीनों तक भुगतान नहीं मिलना सरकार की घोर असफलता का परिचायक है।

https://youtu.be/rYJZHoBigtM

बिल्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (बीएआई) की ओर से भी अपने सदस्य स्व. डी वेंकट रेड्डी के असामयिक निधन पर दुःख और संवेदना व्यक्त की गई है। “इस शोक और संकट की घड़ी में बीएआई का समस्त संगठन अपनी पूरी शक्ति के साथ इरिपा के साथ खड़ा है। हम बीएआई की ओर से विश्वास दिलाते हैं कि आपके द्वारा किए जाने वाले राष्ट्रव्यापी आंदोलन में हमारा पूर्ण सहयोग और समर्थन रहेगा।” इस श्रृद्धांजलि सभा में बीएआई की राष्ट्रीय संविधान संशोधन समिति के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ सदस्य मैनेजमेंट कमेटी संजय त्यागी ने यह बात कही।

#IRIPA #RailwayBoard #IndianRailways 








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कैंटीन में 36 लाख के घोटाले की भरपाई रेट बढ़ाकर कर्मचारियों से करने पर आमादा वर्कशॉप प्रशासन – RailSamachar

वर्कशॉप प्रशासन के इस निंदनीय निर्णय का यूनियन और कर्मचारियों का भारी विरोध

माटुंगा वर्कशॉप, मध्य रेलवे की कर्मचारी कैंटीन में वर्ष 2012 से चले आ रहे 36 लाख रुपए के घोटाले की राशि यह घोटाला करने वाले संबंधित अधिकारियों से करने के बजाय वर्कशॉप प्रशासन कैंटीन के खाद्य पदार्थों के रेट बढ़ाकर कर्मचारियों से इसकी भरपाई करने का अत्यंत अन्यायपूर्ण प्रयास कर रहा है। प्रशासन के इस निंदनीय प्रयास का विरोध यूनियन के साथ ही वर्कशॉप के लगभग सभी कर्मचारियों द्वारा भी किया जा रहा है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार माटुंगा वर्कशॉप प्रशासन द्वारा 26 जनवरी 2020 को कैंटीन में मिलने वाले खाद्य पदार्थों की कीमतों में मनमानी और कुतर्कपूर्ण वृद्धि कर दी गई थी। तभी से यूनियन और कर्मचारियों द्वारा इसका जबरदस्त विरोध किया जा रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि 36 लाख की गड़बड़ी करने वालोें को वर्कशॉप प्रशासन द्वारा अन्यायपूर्ण तरीके से बचाने और इस गड़बड़ी का पैसा कर्मचारियों से वसूलने का शर्मनाक प्रयास किया जा रहा है।

पता चला है कि वर्कशॉप प्रशासन के साथ हुई पिछली बैठक में नेशनल रेलवे मजदूर यूनियन (एनआरएमयू) ने चर्चा के दौरान रेट बढ़ाने का सख्त विरोध किया था और इस घोटाले की राशि कर्मचारियों से नहीं, बल्कि घोटाला करने वाले मैनेजमेंट कमेटी के संबंधित अधिकारियों से किए जाने की मांग की थी। परंतु ऐसा लगता है माटुंगा वर्कशॉप प्रशासन ने कर्मचारियों के हित में सोचने के बजाय घोटालेबाजों को बचाना ज्यादा जरूरी समझा है।

संभवतः आज शनिवार 7 मार्च को भी वर्कशॉप प्रशासन के साथ यूनियन प्रतिनिधियों और कैंटीन मैनेजमेंट कमेटी की बैठक होने वाली है।

यूनियन ने वर्कशॉप के अंदर चीफ वर्कशॉप मैनेजर (सीडब्ल्यूएम) कार्यालय के सामने अपना बोर्ड लगाकर वर्कशॉप प्रशासन को चेतावनी देते हुए लिखा था कि यूनियन, वर्कशॉप प्रशासन के अन्यायपूर्ण निर्णय की निंदा करती है और इस बारे में उसे सचेत करती है कि 28 मार्च 2018 को यूनियन द्वारा दिए गए मांग पत्र के अनुसार तत्काल कार्रवाई की जाए।

यूनियन ने अपने बोर्ड में यह भी लिखा था कि 36 लाख की गड़बड़ी करने वालोें के खिलाफ सख्त कदम उठाते हुए इस घोटाले की उपरोक्त राशि उनसे वसूल की जाए और वर्कशॉप कर्मचारियों से इसकी भरपाई करने के प्रयास का निंदनीय कदम तत्काल वापस लिया जाए, अन्यथा कर्मचारियों के हित में यूनियन को आंदोलन करने पर मजबूर होना पड़ सकता है, क्योंकि प्रशासन की वसूली नीति अन्यायपूर्ण है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार एनआरएमयू ने इससे पहले 11 नवंबर 2017 को भी वर्कशॉप प्रशासन को एक मांग पत्र देकर कैंटीन के रेट्स का पुनरीक्षण किए जाने की मांग की थी। उस पर भी वर्कशॉप प्रशासन ने आजतक कोई उचित निर्णय नहीं लिया है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2012 के बाद से आजतक कैंटीन के लेखा-जोखा का समुचित ऑडिट नहीं किया गया है। जो ऑडिट किया भी गया, उसकी रिपोर्ट को प्रशासन ने सार्वजनिक करना जरूरी नहीं समझा।

तथापि वर्ष 2010-11 से 2015-16 तक की जो कथित ऑडिट रिपोर्ट्स (संदर्भ- सीआर/कैंटीन/एमटीएन/आरआर, दि.08.03.2018) कर्मचारियों के हाथ लगी हैं, उनके गहन अध्ययन से माटुंगा वर्कशॉप की कर्मचारी कैंटीन में भारी गड़बड़ियां उजागर हुई हैं। इनके अवलोकन से जाहिर है कि माटुंगा वर्कशॉप की कर्मचारी कैंटीन की मैनेजिंग कमेटी भारी कुप्रबंधन और ऑडिट रिपोर्ट्स के मुताबिक अपरिमित वित्तीय गड़बड़ियों से कैंटीन की स्थिति काफी गंभीर है।

वर्कशॉप प्रशासन की “लापरवाही किसी की और भरपाई किसी से” की अन्यायपूर्ण नीति का विरोध करते हुए यूनियन ने 11 नवंबर 2017 को लिखे पत्र में कैंटीन की विस्तृत समीक्षा सहित “भाव बढ़ाने के कुत्सित प्रयास” की पूरी सच्चाई भी उजागर की थी। इसके साथ ही यूनियन ने कर्मचारियों के हित में चार मांगें भी वर्कशॉप प्रशासन से की थीं।

बताते हैं कि 7 मार्च 2018 की बैठक में सीडब्ल्यूएम ने यूनियन की चार मांगें मान ली थीं। इनमें उच्चाधिकार कमेटी का गठन करने, ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक की करने, सभी सामग्री ई-टेंडर प्रणाली से खरीदे जाने और टेंपरिंग मुक्त कंप्यूटराइज्ड रिकॉर्ड कीपिंग प्रणाली लागू किए जाने की मांग शामिल थी। बताते हैं कि यह सारी व्यवस्था आजतक लागू नहीं हो पाई है। जबकि वर्कशॉप प्रशासन 36 लाख के घोटाले को या तो रफा-दफा करने अथवा खाद्य पदार्थों का रेट बढ़ाकर घोटाले की भरपाई कर्मचारियों से करने पर आमादा है।

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बिलों का भुगतान न होने से कांट्रेक्टर्स में मची है त्राहि-त्राहि, कामकाज ठप

वेस्टर्न रेलवे कांट्रेक्टर्स एसोसिएशन ने डीआरएम/मुंबई सेंट्रल/पश्चिम रेलवे को लिखा पत्र

रेल प्रशासन द्वारा दिसंबर 2019 से रोक दिए गए हैं रेलकर्मियों/अधिकारियों के तमाम भत्ते

रेलवे के तमाम कांट्रेक्टर्स/सप्लायर्स पिछले कुछ महीनों से अत्यधिक परेशान हैं, क्योंकि पिछले कुछ महीनों से उनके बिलों का भुगतान रेल प्रशासन द्वारा नहीं किया जा रहा है। इससे कांट्रेक्टर और सप्लायर न तो अपनी देनदारी चुका पा रहे हैं और न ही अपने कर्मचारियों के वेतन का भुगतान कर पा रहे हैं।

कई कांट्रेक्टरों और सप्लायरों ने कानाफूसी.कॉम को फोन करके अपनी आपबीती सुनाई। उनका कहना था कि कई महीनों से उनके फाइनल बिलों का भुगतान रेलवे ने नहीं किया है। एक सप्लायर ने यह भी कहा कि उसने पिछले साल जुलाई में कुछ मेडिकल इंस्ट्रूमेंट्स की सप्लाई का अपना करीब 35-36 लाख का बिल पश्चिम रेलवे को सब्मिट किया था, जिसका भुगतान आज तक नहीं किया गया है। उक्त सप्लायर का यह भी कहना था कि इतने लंबे समय तक बिल रोककर रखा जाता है, तब भी उस पर रेलवे द्वारा कोई व्याज नहीं दिया जाता है।

उल्लेखनीय है कि प्रत्येक टेंडर या सप्लाई ऑर्डर जारी करने से पहले ही निर्धारित मात्रा में संबंधित अधिकारियों द्वारा अपना कमीशन कांट्रेक्टर या सप्लायर से एडवांस में ले लिया जाता है। तथापि समय पर बिल भुगतान की जिम्मेदारी कोई अधिकारी नहीं लेता है। यही स्थिति टेंडर जारी करने वाले विभाग से लेकर लेखा विभाग तक समान रूप से लागू है। रेल अधिकारियों का सिर्फ एक ही जवाब है कि फंड नहीं है।

उन्होंने बताया कि अब यह हालत है कि कोई अधिकारी काम करने के लिए भी दबाव नहीं बना रहा है, इसके चलते रेलवे के लगभग सभी काम ठप पड़ गए हैं। कांट्रेक्टर्स का यह भी कहना है कि जो काम पूरे हो जाते हैं, और जिनका फाइनल बिल सब्मिट हो जाता है अथवा फाइनल भुगतान भी हो जाता है, उन कार्यों के लिए जमा कराई गई ईएमडी, सिक्योरिटी डिपॉजिट और बैंक गारंटी भी रेलवे द्वारा समय से नहीं लौटाई जाती है। इन्हें लौटाने में भी सालों लगा दिए जाते हैं। यही नहीं, यह वापस लेने के लिए भी कांट्रेक्टर्स और सप्लायर्स को अलग से दस्तूरी देनी पड़ती है।

मुंबई सेंट्रल डिवीजन, पश्चिम रेलवे के तमाम कांट्रेक्टर्स ने तो बाकायदा एक पत्र लिखकर मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) को वर्क एक्जीक्यूशन में आने वाली परेशानियों और लंबे समय से बिलों का भुगतान न होने से अवगत कराया है।

वेस्टर्न रेलवे कांट्रेक्टर्स एसोसिएशन द्वारा डीआरएम, मुंबई सेंट्रल को लिखे गए पत्र में उठाए गए कुछ मुद्दे इस प्रकार हैं-

1. The major issue is scarcity/crises of funds in railway, hence our running bills and final bills are not passed. All the contractors are facing the same problem. As we had entered into the contract, we had to execute the work, for which we have deployed all the resources for progress/completion of work in time but we are unable to make labour/suppliers payments.

2. In many work orders final bills and PVC bills are sended to Accounts or are lying in division but not paid due to scarcity/crises of fund. Maintenance period is also over for some work orders but security deposits (SDs) are not released as bills are not passed. Please release SD in such type of work orders for which final bills/PVC bills are in positive. This is more helpful to us in this type of situation.

3. The final bills and PVC bills which are prepared and submitted to the division office but these bills are long pending (more than 2-3 years) due to sanction of final variation or some other reasons, please give instruction and set a cut of date to clear the bills.

4. In many tenders our contract agreements are not prepared in time, even after submission of PBG, due to this delay our running bills are not passed, hence we are stuck and work is affected.

5. Work orders are issued but site is not handed over/no scope of work/GAD and structural drawings are not available, hence there is no progress, please short close this type of work orders and release our PBG & SD if railway is not interested to carry out the work and handing over site.

6. Too much delay in release of PBG/SD and unsuccessful tenders’ EMD which was submitted online, please release that type of all assets.

वेस्टर्न रेलवे कांट्रेक्टर्स एसोसिएशन द्वारा दिए गए उपरोक्त कारण यह समझने के लिए पर्याप्त से भी ज्यादा पर्याप्त हैं कि रेलवे कांट्रेक्टर और सप्लायर किस कदर परेशान हैं। तथापि उनका यह भी कहना है कि इतना ज्यादा हैरान-परेशान करने के बाद भी जब आधा-अधूरा भुगतान किया जाता है, तो भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी में आकंठ डूबे संबंधित रेल अधिकारी ऐसा दर्शाते हैं जैसे वे उन पर कोई बहुत बड़ा अहसान कर रहे हैं।

एक तरफ कांट्रेक्टर्स और सप्लायर्स के बिलों का भुगतान न होने से उनमें त्राहि-त्राहि मची हुई है, तो दूसरी तरफ मंत्री जी शो-बाजी में व्यस्त हैं। जबकि यह हर साल का एक स्थाई सिलसिला बन गया है। हर साल बजट के चार महीने पहले से ही कांट्रेक्टर/सप्लायर के बिलों और रेलकर्मियों एवं अधिकारियों के भत्तों का भुगतान रोककर रेल प्रशासन जितनी तथाकथित बचत दर्शाने की कोशिश करता है, उससे कई गुना ज्यादा राशि अधिकारियों द्वारा हर साल रिश्वतखोरी में हड़प ली जाती है। यह एक वस्तुस्थिति है।

#westernrailway #wr #indianrailway #railwayboard #bills #drmbct








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आईआरसीटीसी के अधिकृत एजेंटों द्वारा ई-टिकट पर निर्धारित राशि से अधिक वसूली

जेडआरयूसीसी सदस्यों ने आवश्यक कार्यवाही हेतु जीएम एवं आईआरसीटीसी को लिखा पत्र

अहमदाबाद : क्षेत्रीय रेल उपयोगकर्ता परामर्शदात्री समिति, पश्चिम रेलवे के सदस्य योगेश मिश्रा एवं किंजन पटेल ने महाप्रबंधक, पश्चिम रेलवे और चीफ ग्रुप मैनेजर (सीजीएम) आईआरसीटीसी, पश्चिम जोन को एक पत्र लिखकर कहा है कि अहमदाबाद मंडल के अंतर्गत दहेगाम स्टेशन के करीब स्थित दहेगाम गांव में आस्था टूर एंड ट्रेवल्स नामक संस्था को आईआरसीटीसी की ई-टिकट बनाने की एजेंसी प्रदान की गई है, वह यात्रियों से निर्धारित शुल्क, रेलवे की टिकट का प्रिंट देने के लिए प्रति व्यक्ति ₹300 अतिरिक्त राशि की वसूली की जाती है।

सदस्यों का कहना है कि एजेंसी का यह कृत्य पूरी तरह से असंवैधानिक है,  यात्रियों का शोषण है और यह रेल टिकटों की खुलेआम कालाबाजारी है।

उन्होंने लिखा है कि इस तरह के अनधिकृत कार्य को रोकने के लिए तुरंत उचित कार्रवाई की जाए  एवं अधिकृत एजेंटों की नियमित जांच की जाए,  कि यात्रियों से अधिक राशि की वसूली न करें। सतर्कता विभाग को सूचित किया जाए कि इन एजेंटों पर तुरंत कार्यवाही करें।

उन्होंने पत्र में उदाहरण देते हुए बताया है कि हम आपको आस्था टूर एंड ट्रेवल्स का टिकट हमारे माननीय सदस्य ने स्वयं ही क्रय किया है, जो हम आप को सबूत के लिए बता सकते हैं। इस टिकट पर प्रति व्यक्ति ₹300 अतिरिक्त, टिकट पर लिखी कीमत से अधिक राशि ली गई है, जो यह प्रमाणित करता है।

उनका कहना है कि यदि जेडआरयूसीसी सदस्य से स्वयं उसके टिकट के पर इस तरह से अधिक धनराशि वह ले रहे हैं, तो जाहिर है कि अन्य व्यक्तियों से भी ₹300 से ₹500 अतिरिक्त लेते ही होंगे, जो कि रेलवे अधिनियम के तहत पूरी तरह अनधिकृत कार्य है।

इस कार्य के लिए इस संस्था पर तो कार्यवाही की जाए,  परंतु आईआरसीटीसी के द्वारा मान्य अन्य एजेंसियों की भी नियमित जांच की जाए और उन पर कड़ी कार्यवाही की जाए, जिससे कि रेलवे की छवि, एजेंट लोग जो खराब कर रहे हैं, इसे धूमिल होने से बचाया जा सके। 








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भारतीय रेल में मची है लूट, जो लूट सके सो लूट ! – RailSamachar

पू.म.रे.निर्माण संगठन के डिप्टी सीईई/सी/साउथ द्वारा की जा रही है भारी लूट और अनियमितता

वर्तमान डिप्टी सीईई/सी/साउथ/महेंद्रूघाट को रेलवे बोर्ड से मिलीं एक साल में पांच मनचाही पोस्टिंग

काम करवाता है धनबाद का एईई/सी, मगर बिलिंग/भुगतान करवाता है डिप्टी सीईई/सी के चरणों में बैठा एईई/सी

पटना : पूर्व मध्य रेलवे का निर्माण संगठन इसकी स्थापना से ही भ्रष्टाचार का बहुत बड़ा गढ़ बन चुका था। एक अनुमान के अनुसार यहां अब तक जितना जमीनी निर्माण कार्य हुआ है, और उसकी जितनी लागत दर्शाई जा चुकी है, यदि इसका एक तुलनात्मक अध्ययन करवा लिया जाए, तो निष्कर्ष यही निकलेगा कि उतनी ही धनराशि में बिहार के कोने-कोने तक रेल लाइन बिछाई जा सकती थी। यहां बोगस टेंडर, फर्जी टेंडर, एडवांस टेंडर, एक ही कार्य के लिए दोहरे-तिहरे टेंडर और सालों पहले मटीरियल की एडवांस खरीद के टेंडर इत्यादि के रूप में हजारों-लाखों करोड़ रुपये की अफरा-तफरी अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से अब तक हो चुकी है।  इसी कड़ी की एक छोटी सी बानगी प्रस्तुत मामला भी है-

1. गढ़वा-सिंगरौली सेक्शन में सामान्य विद्युत कार्यों (जनरल इलेक्ट्रिक वर्क्स) के लिए लगभग 9.60 करोड़ रुपये का टेंडर निकाला गया है। जबकि इसी तरह का काम (सिमिलर नेचर ऑफ वर्क) अभी एक एग्जिस्टिंग कांट्रेक्ट द्वारा चल ही रह है और यह चालू कार्य अभी कम्पलीट भी नहीं हुआ है।

2. इसी तरह जरणादिह-पतरातू सेक्शन में भी जनरल इलेक्ट्रिक वर्क्स के लिए लगभग 9.60 करोड़ रुपये यानि समान लागत का दूसरा टेंडर भी निकाल दिया गया है। जबकि इसी तरह का काम अभी एक एग्जिस्टिंग कांट्रेक्ट द्वारा चल ही रह है। और वह अभी कम्पलीट भी नहीं हुआ है। (उक्त दोनों टेंडर्स की प्रतियां भी यहां प्रस्तुत हैं).

उक्त दोनों टेंडर की ओपनिंग डेट 14.11.19 है। जानकारों का मानना है कि इतने हाई वैल्यू के दो-दो टेंडर्स की फिलहाल कोई जरूरत नहीं है। वह भी तब जबकि दोनों सेक्शन के लिए एक-एक चालू कांट्रेक्ट अभी उपलब्ध है। नियमानुसार ‘सिमिलर नेचर ऑफ वर्क’ का एक टेंडर कम्प्लीट  किए बिना दूसरा नया टेंडर नहीं निकाला जा सकता है, क्योंकि मेजरमेंट में डुप्लीकेसी होने की पूरी संभावना बनी रहती है।

जानकारों का कहना है कि उक्त दोनों टेंडर के वर्क शेड्यूल में 33 केवी का क्रेडेंशियल बिना वजह का डाला गया है, ताकि किसी खास कांट्रेक्टर को फेवर किया जा सके। उनका कहना है कि दोनों टेंडर में 33 केवी से संबंधित कार्यों की कुल वैल्यू लगभग 15 लाख है। जबकि ऐसा करने से 33 केवी का क्रेडेंशियल टेंडर की पूरी वैल्यू के लिए लागू हो जाता है।

इसके अलावा जानकारों का यह भी कहना है कि साइट पर 33 केवी का अब कोई काम नहीं है। और यदि है, तो एग्जिस्टिंग कांट्रेक्ट के माध्यम से उक्त कार्य को बड़ी आसानी से किया जा सकता है। जानकारों का यह भी कहना है कि टेंडर को बेवजह और जानबूझकर ‘रेस्ट्रिक्टिव’ बनाया गया है, ताकि बहुत सीमित कंपीटीशन हो, जिससे अपने किसी मनचाहे और खास चहेते कांट्रेक्टर को उक्त टेंडर अवार्ड किया जा सके। इसके अलावा इस ‘रेस्ट्रिक्शन’ का अन्य कोई अर्थ नहीं हो सकता है।

उल्लेखनीय है कि वर्तमान डिप्टी सीईई/कंस्ट्रक्शन/साउथ, महेंद्रूघाट, पटना के बारे में केवल इतना ही बताना काफी होगा कि ये महाशय विगत एक वर्ष से भी कम समय में सीनियर डीईई/टीआरडी, मुगलसराय से आरडीएसओ, फिर आरडीएसओ से पूर्व मध्य रेलवे में सीनियर डीईई/टीआरडी, सोनपुर, पुनः सीनियर डीईई/टीआरडी/सोनपुर से सीनियर डीईई/जी/दानापुर और अब डिप्टी सीईई/सी/साउथ, महेंद्रूघाट, पटना में अपनी महती जुगाड़ से मनचाही पोस्टिंग पा चुके हैं।

जानकारों का कहना है कि एक साल के अंदर चूंकि इतने सारे ट्रांसफर और मनचाही पोस्टिंग पाने के लिए काफी रुपया खर्च किए होंगे, इसीलिए उक्त पोस्ट पर जॉइन करते ही मनमानी तरीके से टेंडर निकलकर धन उगाही में फौरन जुट गए हैं। उनका यह भी कहना है कि इसके अलावा ट्रांसफर एलाउंस के रूप में भी इन्होंने रेलवे रेवेन्यू को लाखों रुपये का चूना लगाया है। महाभ्रष्ट पूर्व मेंबर ट्रैक्शन की नजदीकी का इन जैसे कदाचारियों को भरपूर इनाम मिला है।

जानकारों ने यह भी बताया कि एक-एक सेक्शन में ‘सिमिलर वर्क’ के लिए इन्होंने कई-कई टेंडर निकाले हुए हैं, ताकि एक ही किए गए काम को कई सारे कॉन्ट्रेक्ट्स में बोगस भुगतान करके मोटा मुनाफा कमाया जा सके और अधिक से अधिक धन की उगाही एवं बंदरबांट की जा सके। जानकारों का अनुमान यह है कि भुगतान किसी एक टेंडर का किया जाएगा और बाकी टेंडर्स की राशि बोगस भुगतान के जरिए आपस में बांट ली जाएगी। उनका कहना है कि सिमिलर नेचर ऑफ वर्क के कई टेंडर एक साथ चलाने के पीछे उनकी यही रणनीति हो सकती है। यानि यह बोगस टेंडरिंग का मामला भी है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार डिप्टी सीईई/सी/साउथ के सभी कार्यों की समस्त बिलिंग एईई/सी/साउथ/महेंद्रूघाट के द्वारा की जाती है। जबकि एईई/सी/साउथ/धनबाद पर दूसरा अधिकारी मौजूद है। यानि काम करवाने के लिए एईई/सी/धनबाद  है मगर उसके कराए गए कार्यों की बिलिंग और भुगतान निर्माण मुख्यालय महेंद्रूघाट, पटना में डिप्टी सीईई/सी/साउथ के पवित्र (भ्रष्ट) चरणों में बैठकर एईई/सी/साउथ कर रहा है। इसका अर्थ यह है कि काम कोई करा रहा है, मगर कमीशन की मलाई कोई और खा रहा है।

जानकार बताते हैं कि डिप्टी सीईई/सी/साउथ महोदय का एक खास चेला एसएसई/इलेक्ट्रिक के. के. सिंह है, जिसको पिछले कई सालों से इस तरह की फर्जी/फाल्स/बोगस बिलिंग करने/करवाने की महारत हासिल है। वर्तमान में डिप्टी सीईई/सी/साउथ/महेंद्रूघाट ओम शंकर प्रसाद, एईई/सी/साउथ/महेंद्रूघाट डी. एन. तिवारी और एसएसई/इलेक्ट्रिक के.के.सिंह तथा एसएसई/सी/इलेक्ट्रिक, बरकाकाना की चौकड़ी से रेलवे को अब तक करोड़ों का चूना लग चुका है, जबकि निकट भविष्य में अभी सैकड़ों करोड़ का चूना और लगने-लगाने की पूरी तैयारी है। जानकारों का कहना है कि इस तरह से ऐसे लोंगों की करोड़ों की कमाई हो रही है।

रेल प्रशासन को चाहिए कि इन अधिकारियों के अधीन चल रहे सभी विद्युत निर्माण संबंधी कार्यों की सीबीआई से जांच कराकर ऐसे अधिकारियों को न सिर्फ कड़ी सजा दी जाए, बल्कि जांच पूरी होने तक इन्हें अन्य किसी दूरस्थ जोनल रेलवे में अविलंब स्थानांतरित किया जाए।

पूर्व मध्य रेलवे निर्माण संगठन के मामले में बोगस टेंडर, सिमिलर वर्क के लिए दोहरे-तिहरे टेंडर सिर्फ विद्युत विभाग में ही किए जा रहे हैं, ऐसा नहीं है, बल्कि ऐसे काम इंजीनियरिंग कंस्ट्रक्शन साइड से तो और भी बड़े पैमाने पर किए जा रहे हैं। इसकी खबर भी जल्दी ही सामने आएगी। उत्तर रेलवे निर्माण संगठन के बाद यदि कहीं सर्वाधिक भ्रष्टाचार और लूट है, तो वह पूर्व मध्य रेलवे निर्माण संगठन में ही हो सकती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या केंद्रीय सार्वजनिक राजस्व को मिलकर लूटने के लिए ही सात नए जोनल मुख्यालय बनाए गए थे?

इसके अलावा जहां पूर्व मेंबर ट्रैक्शन घनश्याम सिंह जैसे महाभ्रष्ट बैठे रहे हों, वहां यह तो समझ में आता है कि रेल प्रशासन ऐसे भ्रष्ट और कदाचारी अधिकारियों पर बार-बार मेहरबान क्यों होता है, जिनको एक साल के अंदर रेलवे बोर्ड से कई-कई बार मनचाही पोस्टिंग दी गई, मगर यह समझ से परे है कि रेलवे बोर्ड विजिलेंस और सीबीआई सहित स्थानीय जांच एजेंसियां कहां सोती रहती हैं? जहां तक जोनल विजिलेंस की बात है, तो ऐसे मामलों में न सिर्फ उसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है, बल्कि उसकी मिलीभगत और भागीदारी के बिना ऐसा खुला भ्रष्टाचार और लूटतंत्र चल पाना संभव नहीं हो सकता!








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हावड़ा पार्सल/गुड्स में बीसों साल से जमे हुए हैं कुछ खास रेलकर्मी

मंडल के प्रत्येक वाणिज्य अधिकारी को होती है 50 हजार से 5 लाख की अवैध कमाई

सीवीसी/विजिलेंस के सभी डायरेक्टिव ताक पर, भ्रष्ट स्टाफ को प्राप्त है अधिकारियों का संरक्षण

कोलकाता : हावड़ा पार्सल, दांकुनी गुड्स, पाकुर गुड्स, बर्दवान पार्सल, भद्रेश्वर गुड्स, श्रीरामपुर पार्सल, बाली गुड्स, त्रिवेणी गुड्स। पूर्व रेलवे, हावड़ा मंडल के इन सभी महत्वपूर्ण पार्सल/गुड्स डिपो में करीब 20-25 सालों से कुछ विशेष लोगों की पोस्टिंग है, जो कुछ संबंधित वाणिज्य अधिकारियों की जरूरतों और हितों का पूरा ख्याल रखने की महारत रखते हैं।

इनमें से कुछ नाम और उनकी खास विशेषताएं इस प्रकार हैं-

1. सुभाष चौधरी, ईआर मेंस कांग्रेस से संबंधित हैं। हावड़ा टिकट बुकिंग में बीएस1 हैं। पार्सल में 25 रहे हैं। वहां भी सिर्फ साइन किए, काम कभी नहीं किया, आज भी नहीं कर रहे हैं। सिर्फ पैसा उगाही करना ही इनका प्रमुख काम है।

2. संजीव गुप्ता, अभी सीएस1/हावड़ा पार्सल में पदस्थ हैं, पहले बीएस1 रहे हैं। यह भी ईआर मेंस यूनियन से संबंधित हैं। यह काउंटर पर कभी काम नहीं करते, यह पैसा नहीं लेते हैं, मगर इजी वर्किंग को ही प्रीफर करते हैं।

3. सुमन बोस, पार्सल शेड नं.3 में पदस्थ हैं, सीपीसी यानि चीफ पार्सल क्लर्क हैं। 18 साल से एक ही सीट पर काम कर रहे हैं। पहले माल बुकिंग में थे और अब डिस्पैचिंग में हैं। डिस्पैच में कभी विजिलेंस केस होने का डर नहीं रहता है। इसलिए यह हमेशा सेफ साइड पोस्टिंग में रहने वाले खास प्राणी हैं। हावड़ा पार्सल का यह सबसे मलाईदार शेड है। यह मोस्ट सेंसिटिव पोस्ट है। फिर भी यह यहां पिछले 18 सालों से जमे हुए हैं।

4. अजय कुमार, सीएस1 हैं, नौकरी में आने से लेकर अब तक पार्सल में ही पदस्थ हैं। कर्मचारियों द्वारा इन्हें हावड़ा मंडल सहित संपूर्ण पूर्व रेलवे पार्सल का माफिया बताया गया है। यह विभागीय प्रमुख को साधकर पूरे जोनल पार्सल कंट्रोल करते हैं। कर्मचारियों ने बताया कि यह इतने पावरफुल हैं कि इन्होंने पदोन्नति से पहले वर्तमान सीसीएम/पीएम की पोस्टिंग सीनियर डीसीएम, हावड़ा के पद पर करवाई थी, जिनकी कमजोरी पैसा और शबाब दोनों रही हैं। इसी संदर्भ में उनकी पत्नी की शिकायत पर उन्हें हावड़ा से हटाया गया था।

बताते हैं कि इनके पहले वाले सीनियर डीसीएम की पोस्टिंग भी अजय कुमार ने ही करवाई थी। अजय कुमार को हावड़ा पार्सल से कुछ समय के लिए तब हटाया गया, जब उनके खिलाफ एक बड़ा विजिलेंस केस हुआ था। इनकी कैश हैंडलिंग करीब 10 साल से बंद है। आज भी इनकी पोस्टिंग पार्सल एकाउंट में है, मगर हावड़ा पार्सल शेड नं.3 में इंचार्ज के तौर पर काम कर रहे हैं। वहां इनसे सभी स्टाफ इससे इसलिए डरता है, क्योंकि यही सब कुछ तय करते हैं कि किसको कितना पैसा पहुंचाना है। यह पीएस/पीसीसीएम अजय राय, जो पहले बुकिंग/आरक्षण क्लर्क थे और बाद में एसीएम में पदोन्नत होकर अधिकारी बन गए, अजय कुमार के लंगोटिया यार हैं।

5. जॉय बल्लभ भी यहां काफी समय से पदस्थ हैं, सीपीसी हैं। एक विजिलेंस केस होने के बाद इनका ट्रांसफर हावड़ा बुकिंग से तारकेश्वर बुकिंग में हुआ था। फिर वापस वहां से जुगाड़ लगाकर जल्दी ही हावड़ा पार्सल में आ गए। दुबारा जब विजिलेंस केस हुआ, तब इनको हावड़ा बुकिंग में भेजा गया था, मगर आज तक यह न वहां गए और न ही संबंधित अधिकारियों ने इनके ट्रांसफर आर्डर पर अमल करवाने की जरूरत समझी। जबकि अन्य लोगों का आर्डर उसी दिन या 2-3 दिन में लागू करवाया जाता है। तथापि जॉय बल्लभ महोदय का आर्डर आज तक नहीं लागू हुआ।

बताते हैं कि इस शेड से एसीएम/कोचिंग, एसीएम/गुड्स, डीसीएम और सीनियर डीसीएम आदि सबका न सिर्फ खास ख्याल रखा जाता है, बल्कि सबका हिस्सा भी उनके ओहदे के अनुसार समय पर पहुंचाया जाता है।

कर्मचारियों का कहना है कि सिर्फ हावड़ा पार्सल से डीसीएम को कुछ नहीं मिलता। बाकी सब जगह से मिलता है। कर्मचारियों के अनुसार एसीएम/कोचिंग और एसीएम/गुड्स में से प्रत्येक को हावड़ा पार्सल से प्रतिमाह 40-50 रुपये मिल जाते हैं, जबकि हावड़ा पार्सल को छोड़कर बाकी सभी जगह से डीसीएम को कुल मिलाकर एक लाख की आमदनी प्रतिमाह हो जाती है। वहीं सीनियर डीसीएम को सब जगह से कुल मिलाकर प्रतिमाह लगभग पांच लाख रुपये मिलते हैं।

हावड़ा मंडल के उपरोक्त पांचों महान पार्सल कर्मियों के खौफ से आतंकित और उत्पीड़ित कुछ रेलकर्मियों का यह भी कहना था कि यदि कोई उच्च वाणिज्य अधिकारी किसी आपातकालीन स्थिति में इनसे कभी यह फरमाइश कर दे कि एक घंटे में 50 लाख रुपये की जरूरत है, तो यह लोग उससे पहले ही यह रकम उस तक पहुंचा देने की पूरी क्षमता रखते हैं। यही नहीं, इन्होंने इसी की बदौलत करोड़ों की संपत्ति अर्जित की है। यदि इनकी अर्जित संपत्तियों की सीबीआई जांच करवाई जाए, तो सबकी कलई खुलकर सामने आ जाएगी।








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रेलमंत्री को किस हैसियत से मिलने पहुंचा था डपोरशंख?

एएसएम से बना अधिकारी और पिछले कुछ सालों से कर रहा है सत्ता की दलाली

फेडरेशन और डपोरशंख को चला रहे हैं चंदा चाटुकार!”

पिछले हफ्ते जब कैडर मर्जर के मामले में रेलवे की सिविल सेवाओं – ट्रैफिक, कार्मिक एवं एकाउंट्स – के कुछ अधिकारी पूर्व अनुमति लेकर रेलमंत्री को मिलने गए थे, तब उनके साथ ही एक ‘डपोरशंख’ को भी रेलमंत्री से मिलने की अनुमति दी गई थी और वह भी इन अफसरों के साथ ही रेलमंत्री को मिलने पहुंचा था। बाद में इस पर तमाम अफसरों ने भारी ऐतराज जताया है।

रेलवे बोर्ड के हमारे विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार जब उपरोक्त तीनों सेवाओं के अधिकारी अपनी बात रेलमंत्री के सामने रखकर उन्हें अपने भविष्य और समस्याओं से अवगत करा रहे थे, तभी बीच में कूदते हुए इस डपोरशंख उर्फ सत्ता के दलाल ने रेलमंत्री से कहा कि ‘वह बेधड़क कैडर मर्जर करें, उसके 3700 रेल अधिकारी उनके साथ हैं।’ बताते हैं कि इस संदर्भ में उसने रेलमंत्री को वह पत्र भी सौंपा है जिसमें कैडर मर्जिंग का ‘सशर्त समर्थन’ यह कहते हुए किया गया है कि ‘रेल प्रशासन ‘डपोरशंख ग्रुप’ के अफसरों के हितों का ध्यान रखे।’ उक्त पत्र की प्रति ‘कानाफूसी.कॉम’ के पास सुरक्षित है।

“It is strange that organization has not discussed such a very very important issue with its officers except some yes man”, said a branch officer of Bhusawal Division, Central Railway from ‘Daporshankh Group’

सूत्रों का कहना है कि सहायक स्टेशन मास्टर (एएसएम) से अधिकारी बनकर रेलवे से रिटायर हुए इस डपोरशंख के ऐसा कहने पर इस मुलाकात और बातचीत का पूरा परिदृश्य ही बदल गया। इसके परिणामस्वरूप रेलमंत्री का सुर भी बदल गया और उन्होंने मिलने आए अधिकारियों के साथ एक मंजे हुए पॉलिटीशियन की तरह व्यवहार किया और उन्हें यह कहकर रुखसत कर दिया कि ‘अब तो कैबिनेट का निर्णय हो चुका है, परंतु उनके सभी हितों का ध्यान रखा जाएगा।’ सूत्रों का कहना है कि रेलमंत्री के इस आश्वासन के बाद अफसरों ने बातचीत को वहीं खत्म कर दिया और समझदारी दिखाते हुए मंत्री के चेंबर से निकल गए।

यहां एक बात खासतौर पर उल्लेखनीय है कि रेलमंत्री के साथ हुई अधिकारियों की इस मुलाकात के बारे में सोशल मीडिया में यह खबर चलाई गई कि रेलमंत्री ने मिलने आए अधिकारियों को डांट-डपटकर भगा दिया और हड़काकर यह भी कहा कि यदि वह लोग ज्यादा तड़का-भड़की दिखाएंगे तो उनके विभाग ही रेलवे से हटाए जा सकते हैं। इस पर सूत्रों का कहना है कि यह भ्रामक खबर ‘डपोरशंख ग्रुप’ अथवा अधिकारियों के बड़े धड़े द्वारा चलाई गई थी। इसके पीछे रेलमंत्री और रेल प्रशासन को उनके खिलाफ भड़काने की मंशा निहित थी। इसके अलावा रेलमंत्री को मिलने गए अधिकारियों ने भी वहां ऐसी कोई बात होने से इंकार किया है।

चंदा चाटुकार, फेडरेशन और डपोरशंख को चला रहे हैं

तथापि, रेलवे बोर्ड में यह चर्चा का विषय बन गया है कि ये डपोरशंख, अधिकारियों का ठेकेदार कब से बन गया? अधिकारियों का कहना है कि सत्ता के गलियारों में संदिग्ध विचरण करने वाले इस डपोरशंख को किस हैसियत से रेलमंत्री को मिलने की अनुमति प्रदान की गई? सूत्रों का कहना है कि “पूर्व सीआरबी के समय सत्ता की धौंस में इसने जोड़-तोड़ करके अपने ग्रुप के कथित अफसरों का जो थोड़ा-बहुत लाभ करवाया था, वह सब अब कैडर मर्जिंग के चलते खत्म हो जाने वाला है। इससे आने वाले कुछेक वर्षों बाद इन कथित अफसरों का प्रमोशन और कैरियर प्रोग्रेशन में भारी नुकसान होना निश्चित है। इसी तथ्य को भांपते हुए और अपनी कथित ठेकेदारी बनाए रखने के लिए यह डपोरशंख ‘ऊपर’ के हवाले से रेलमंत्री को मुलाकात अथवा डील करने पहुंचा था।”

Where is agenda of AGM? and where you people have discussed in Zone that what stand you are suppose to take? Mind it, you are our representative not alone individuals. You suppose to take posture what majority says in Zone !

Regards

(Above msg posted by Mr XYZ from Central Railway on discussion on the issue of cadre merger at AGM of Federation. “Chanda chatukar, Officer Federation aur Daporshankh ko chala rahe hain”, he also said.)

कुछ अधिकारियों का कहना था कि रेलवे से रिटायरमेंट के बाद सत्ता की दलाली और एक खास केंद्रीय मंत्री के नाम पर रेलवे बोर्ड सहित जोनल अधिकारियों पर भी धौंस जमाने वाले इस डपोरशंख ने रेलमंत्री के नाम का भी खूब इस्तेमाल किया है। उनका कहना था कि ‘अंदर कुछ बात होती है, पर बाहर आकर यह उस बातचीत को चाशनी में लपेटकर प्रस्तुत करता है, जिससे कई बोर्ड अधिकारी इसके झांसे में आ जाते हैं। जबकि कोई भी बोर्ड अधिकारी इसे पसंद नहीं करता है और जिन अधिकारियों की ठेकेदारी इसने ले रखी है, उनमें से भी अधिकांश अधिकारी इसे सख्त नापसंद करते हैं।’

बहरहाल, अब देखना यह है कि भिन्न कैडर अधिकारियों में भारी असंतोष के चलते अब रेलमंत्री कैडर मर्जर पर क्या रुख अपनाते हैं? सूत्रों के अनुसार इस मामले में प्रधानमंत्री सहित पूरी कैबिनेट को अंधेरे में रखा गया और उन्हें इस तथाकथित मर्जर की संपूर्ण वस्तुस्थिति से अवगत नहीं कराया गया है। उनका यह भी कहना था कि इस मर्जर के पीछे अवश्य कोई न कोई बड़ी साजिश हो सकती है, जिसके कामयाब होने पर रेलवे का न सिर्फ पूरा बंटाधार होना तय है, बल्कि इसके पूरी तरह से निजीकरण के साथ ही बोर्ड में तथाकथित नामांकित निदेशकों, यानि डपोरशंख जैसे राजनीतिक दलालों और आईएएस का काबिज होना निश्चित है।

सौजन्य से : kanafossi.com








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