उपकृत हुए मालामाल, डीजी/आरपीएफ हुए बदनाम – RailSamachar

व्यवस्था में शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी को निष्पक्ष होना चाहिए

सुरेश त्रिपाठी

Arun Kumar, DG/RPF/Rlys

आरपीएफ के शीर्ष पद पर आरोप लगाना कुछ सालों से एक आम बात हो गई है। यह आरोप कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि इसके अधिकारी ही लगाते रहे हैं। यह आरोप कुछ भी हो सकते हैं, जैसे चाल-चलन, लॉबिंग, चारित्रिक व्यवहार, पक्षपात, भ्रष्टाचार, प्रांतवाद, जातिवाद, बिरादरीवाद इत्यादि। कुछ समय पहले एक महिला अधिकारी द्वारा भी बहुत गंभीर आरोप लगाए गए थे। न्याय की कोई उम्मीद अथवा कोई अन्य विकल्प नहीं होने पर उसने प्रतिनियुक्ति पर दूसरे उपक्रम में चले जाना ही अपने लिए सुरक्षित समझा था।

यह भी सच है कि आरपीएफ में केवल एक पद पुलिस का बचा है। अतः यह भी कोशिश होती रहती है कि इस पद पर भी कब्जा किया जाए। इसलिए इस पद को बदनाम भी किया जाता रहा है, लेकिन आईपीएस अधिकारी जानते हैं कि इन सब गतिविधियों को कैसे डील किया जाता है। वह भी “फूट डालो, राज करो” वाली अंग्रेजों की नीति अपनाते हैं।

शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी के लिए यह कतई उचित नहीं है कि कुछ को अपना “खास” बनाकर दूसरों को डराते रहा जाए। रेल के अन्य विभागों के अधिकारियों की ही तरह आरपीएफ में भी न तो सभी अधिकारी चोर हैं, न ही बेईमान। ये सत्य है कि कुछ आईआरपीएफएस अधिकारियों की छवि आज भी इमानदारों की है, जबकि कुछ भोग-विलास और बेईमानी में डूबे रहते हैं।

हालांकि वर्तमान डीजी/आरपीएफ द्वारा आरपीएफ की छवि सुधारने के लिए भी कुछ कार्य अवश्य किए गए हैं। इसके अलावा वह भी कमोबेश अपनी साफ-सुथरी छवि के कारण काफी हद तक प्रकाश में रहे, लेकिन ये भी सच है कि कुछ लोग उन पर तानाशाह और प्रांतवादी तथा केवल बिहार, खासकर पटना, दरभंगा इत्यादि के लोगों को उपकृत करने के आरोप लगाते रहे हैं।

इसमें भी कोई शक नहीं है कि वर्तमान डीजी/आरपीएफ ने रेलवे में अपने कार्यकाल के दौरान खूब मनमानी की है और यह भी सही है कि कुछ भ्रष्ट आरपीएफ अधिकारियों को उनका भरपूर प्रश्रय भी मिला, जबकि सर्वसामान्य आरपीएफ कर्मी उनकी इस उदारता से महरूम रहे हैं।

अब जब अगले महीने 30 जून को वह रिटायर होने जा रहे हैं, तब आरपीएफ के जोनल ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट (जेडटीआई), खड़गपुर जैसे अत्यंत विवादित मामले में पूरा घालमेल करने का भी आरोप उन पर लगाया जा रहा है। उनके द्वारा गठित जांच कमेटी की रिपोर्ट क्या रही? पीसीएससी/द.पू.रे. उक्त जांच से अछूते कैसे रह गए? उनकी महंगी कार खरीद (70 लाख की लैंड क्रूजर?) और उसमें प्रिंसिपल/जेडटीआई का कथित कंट्रीब्यूशन, जिसकी चर्चा हर आरपीएफ कर्मी की जबान पर है, जांच के दायरे में क्यों नहीं आया? पीसीएससी/जेडटीआई की पोस्टिंग से पहले – दिसंबर 2020 तक – जब जेडटीआई, पीसीएससी/द.पू.रे. के अधिकार क्षेत्र में था और लगभग हर महीने उन्होंने जेडटीआई का दौरा किया था, तब उन्हें भी जांच के घेरे में क्यों नहीं लिया गया?

केवल हफ्ते भर के लिए ही प्रिंसिपल (कमांडेंट) और उसके कथित वसूली इंस्पेक्टर को दक्षिण पूर्व रेलवे मुख्यालय में अटैच करने का औचित्य क्या था? जब कैडेट्स को यह पता हो कि कमांडेंट और उसका कथित दलाल जेडटीआई में फिर वापस आने वाले हैं, तब वह जांच कमेटी के सामने सच कैसे बोलेंगे? फिर से उन दोनों को जेडटीसी में ही क्यों बहाल किया गया? इसका औचित्य क्या है? केवल जेडटीआई के लिए पीसीएससी जैसे नए उच्च पद के सृजन का औचित्य क्या है? क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि आरपीएफ में अधिकारी इफरात हो गए हैं? ऐसे कई महत्वपूर्ण प्रश्न अनुत्तरित तो हैं ही, बल्कि शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी की ईमानदारी, गरिमा और नीयत पर भी सवाल खड़े करते हैं।

डीजी/आरपीएफ पर यह भी आरोप सही है कि उन्होंने प्रिंसिपल को पूरा प्रश्रय दिया, अन्यथा प्रिंसिपल को 28 दिन की ट्रेनिंग को 45 दिन करने का अधिकार नहीं था। यह सेंक्शन तो डीजी/आरपीएफ के अप्रूवल से ही मिला, क्योंकि यह अप्रूवल देने का अधिकार जोनल पीसीएससी को भी नहीं है। वर्दी में, मेस में, मंदिर के चंदे में, रेत, बालू, पेड़ों की लकड़ी की बिक्री में, छुट्टी में, सिक में, आउटडोर ट्रेनिंग में, इत्यादि जेडटीआई की लगभग सभी मदों में जमकर लूट-खसोट और भ्रष्टाचार हुआ। जांच कमेटी के समक्ष एएसआई बैच के करीब सभी कर्मियों ने खुलकर इस सबका बयान भी किया था।

जहां यह माना जा रहा था कि इस गंभीर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर प्रिंसिपल और उसके बिचौलिए की मुअत्तली तय है, वहीं जांच कमेटी की रिपोर्ट पर डीजी/आरपीएफ ने लीपापोती करते हुए दोनों को जेडटीआई में ही पुनः बहाल कर दिया। इससे यह संदेश गया कि बिना डीजी महोदय की सहमति के कुछ नहीं होता। शायद यही वजह थी कि नए एसआई की पासिंग आउट परेड में सलामी लेने जाना डीजी महोदय ने जरूरी नहीं समझा, जबकि पीने-पिलाने के ऐसे किसी सुअवसर को वह फेमिली सहित कभी हाथ से जाने नहीं देते?

बताते हैं कि पूर्व प्रिंसिपल में भयानक चारित्रिक दोष था। वह सिर्फ रंगरेलियां मनाने में ही व्यस्त रहता था और कभी-कभार अथवा जब किसी उच्च अधिकारी की विजिट होती थी, तब ही वह जेडटीआई में आया करता था। भले ही उसके समय में भ्रष्टाचार इतनी ऊंचाई पर नहीं पहुंचा था, तथापि भ्रष्टाचार की सारी व्यवस्थाएं उसी के कार्यकाल में स्थापित हुई थीं। जेडटीआई के यह सब कारनामे यदि डीजी महोदय को पता नहीं चले, तो इसका मतलब यह है कि उनकी पूरी इंटेलिजेंस फेल और निकम्मी है।

हालांकि शीर्ष पद पर इस तरह के आरोप लगना सामान्य बात समझी जाती है, लेकिन कोशिश यह होनी चाहिए कि शीर्ष पद पर कोई आरोप न लगने पाएं। पद की गरिमा को बनाए रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है। वह जिन लोगों से घिरे हैं, उनकी ही बातें सत्य हैं, ये सोच सही नहीं है। यदि ऐसा नहीं होता, तो फिरोजपुर कांड, एनएफ रेलवे भ्रष्टाचार कांड, ट्रांसफर-पोस्टिंग में कथित पक्षपात इत्यादि कांडों में निष्पक्ष जांच एवं कार्रवाई होती, तो शीर्ष पद पर भरोसा कायम होता और उसकी निष्पक्षता पर जवानों को गर्व की अनुभूति भी होती।

ट्रांसफर में केवल अपने खास लोगों पर दया-माया दिखाना, अन्य को पूरी बेरहमी से घर से बेघर करना, प्रमोशन देते समय न्याय का ध्यान न रखना, छोटी-छोटी बातों से चिढ़ जाना, जिद करना, भय दिखाना, इत्यादि बड़े या शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी को शोभा नहीं देता।

डीजी/आरपीएफ के पद पर आईपीएस अधिकारी का ही रहना भी क्यों जरूरी है? इसके लिए तर्क दिया जाता है कि इससे सभी राज्यों के डीजीपी से तालमेल करने और कानून-व्यवस्था को संभालने में आसानी होती है। हालांकि यह अर्धसत्य है, क्योंकि जो भी उस अथॉरिटी पर रहता है, वह राज्यों के डीजीपी के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए सक्षम और अधिकृत होता है। तथापि जो भी आईपीएस – आरपीएफ के इस शीर्ष पद पर आता है, उसे अपना “ग्रन्थ” अलग से लिखना जरूरी क्यों लगता है? जबकि यह कतई आवश्यक नहीं है।

राज्यों के डीजीपी भी ऐसा वहां कुछ नहीं करते, वह अपने निवर्तमान डीजीपी की बनाई व्यवस्था को ही अपने मुताबिक छोटे-मोटे सुधार करके आगे बढ़ाते हैं। लेकिन आरपीएफ जैसी दूसरों की मोहताज और लावारिस फोर्स में उनके द्वारा अपनी सारी काबिलियत दर्शाने-लागू करने का जिदपूर्ण प्रयास अनुचित ही नहीं, बल्कि अनावश्यक होता है।

यहां तो उनके सामने रेलमंत्री भी चुप रहते हैं। यहां फेमिली वेलफेयर को तो भूल ही जाएं, यहां तो पति-पत्नी नौकरी कर रहे अलग अलग जोन में, बच्चे बीमारी से पीड़ित हैं, तथापि 10-15 का जो ब्रम्हास्त्र है, इसके चलते कितनों ने तो नौकरी तक ही छोड़ दी। कितने ही लोग बीमारी से पीड़ित हैं या उनके बच्चे बिलख रहे हैं, लेकिन 10-15 की कुटिल नीति से उन्हें मुक्ति नहीं मिल सकी।

अवसरवादियों, चाटुकारों से हमेशा घिरे रहने के कारण शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी को कुछ दिखता ही नहीं है। उनके घेरे के चलते उन्हें कुछ दिखना संभव भी नहीं है। ये भी सर्वविदित है कि दिल्ली में रहने के लिए लगभग सभी आईपीएस इस पद पर जोड़-तोड़ करके और राजनीतिक सिफारिशों के चलते ही आते हैं। फिर दूसरों द्वारा इस तरह की सिफारिश लाने पर उन पर कार्रवाई का अस्त्र क्यों चलाया जाता है?

शीर्ष पद पर आसीन अधिकारी को पद की गरिमा और गंभीरता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक होता है। मातहत स्टाफ का मॉरल ऊंचा रखना और व्यवस्था पर उनका भरोसा कायम रखना ज्यादा जरूरी होता है। यह केवल कल्याणकारी कार्यों से ही संभव हो सकता है, जो कि शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी को करना चाहिए।

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पूरी भारतीय रेल में अब तक हजारों रेलकर्मी हुए कोरोना का शिकार, झूठे आंकड़े देकर झूठ बोलते रहे सीईओ/रे.बो.

झूठ बोलने में रेलवे बोर्ड का कोई सानी नहीं, सुनीत शर्मा, चेयरमैन/सीईओ/रे.बो. ने तोड़े अकर्मण्यता और अनिर्णय के सारे रिकॉर्ड

सुरेश त्रिपाठी

कोरोना महामारी के दूसरे चरण में पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल 314 लोको पायलट्स की मृत्यु का आंकड़ा सामने आया है। हालांकि यह अविश्वसनीय संख्या है, क्योंकि मौत के समाचार जिस गति से चल रहे हैं, उनको देखकर इस आंकड़े पर कोई भी रनिंग स्टाफ भरोसा नहीं कर पा रहा है।

रनिंग स्टाफ के कई वरिष्ठ सुपरवाइजरों का कहना है कि “वास्तव में यह आंकड़ा इससे भी ज्यादा है।” वे कहते हैं, “हॉस्पिटल में कोविड से हुई मौत बताया जाता है, परंतु जब डाटा उनके कार्यालय में आता है तो वही डेथ किसी अन्य कारण से हुई बताई जाती है। यह अत्यंत अविश्वसनीय है।”

स्टेशन मास्टर कैडर में भी अब तक 150 से ज्यादा मौतें कोविड संक्रमण के चलते हो चुकी हैं। पूरा कैडर जब रेल प्रशासन की अनमनस्कता के प्रति आक्रोशित हुआ और उचित ध्यान नहीं दिए जाने पर ड्यूटी न करने की चेतावनी दी, तब प्रशासन को होश आया और उसने उनके साथ वर्चुअल मीटिंग करके समस्या का समाधान करने की पहल हुई।

टिकट चेकिंग, टिकट बुकिंग, पार्सल, लगेज, आरक्षण इत्यादि कैडर्स, जो लगातार पब्लिक के संपर्क में रहते हैं, में भी काफी रेलकर्मी कोरोना का शिकार हुए हैं, परंतु उनके अधिकृत आंकड़े अब तक सामने नहीं आए हैं। तथापि उनकी मौतों के दु:खद समाचार लगातार आते रहते हैं।

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इस महामारी के दूसरे चरण में, जब उम्र का कोई बंधन नहीं रह गया, हर आयु-वर्ग के बहुत सारे रेलकर्मी और अधिकारी काल-कवलित हुए हैं। परंतु ऐसा लगता है कि रेल प्रशासन ने उनकी मौतों को अब तक भी गंभीरता से नहीं लिया है, बल्कि देखने में यही आया है कि उनकी मौत के आंकड़े छिपाने में और व्यवस्था को दिग्भ्रमित करने में रेलवे बोर्ड की ज्यादा रुचि रही है।

चेयरमैन/सीईओ/रेलवे बोर्ड ने झूठ बोला

यदि ऐसा नहीं होता, तो ओपन प्रेस कॉन्फ्रेंस में चेयरमैन सीईओ रेलवे बोर्ड झूठ नहीं बोलते, झूठे आंकड़े प्रस्तुत नहीं करते, मांगे जाने पर भी वह रेलकर्मियों-अधिकारियों की मौत के आंकड़े देने से इंकार नहीं करते!

यदि ऐसा नहीं होता, तो वे मार्च 2020 से दिए गए आंकड़ों का औचित्य सिद्ध करते और जनवरी 2021 से अब तक हुई रेलकर्मियों-अधिकारियों की मौत के आंकड़े शेयर करते! जो कि दिन-प्रतिदिन के हिसाब से रेलवे बोर्ड में संकलित होते हैं।

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जोनल रेलों के विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 1 मई 2021 को पूरी भारतीय रेल में कोरोना से संक्रमित रेलकर्मियों की कुल संख्या 1,15,358 थी। जबकि उसी दिन कोविड से मृत्यु को प्राप्त हुए रेलकर्मियों की कुल संख्या 1695 थी। इस एक दिन में कोविड का शिकार हुए गैर रेलकर्मियों अर्थात रेलकर्मियों के परिजनों एवं रेल अस्पतालों में भर्ती अन्य लोगों की मौत का कुल आंकड़ा 2761 था।

इससे पहले 18 अप्रैल 2021 के दिन पूरी भारतीय रेल में कोरोना से संक्रमित रेलकर्मियों की कुल संख्या 83,180 थी। जबकि उस दिन कोविड से मृत्यु को प्राप्त हुए रेलकर्मियों की कुल संख्या 979 थी और इस एक दिन में कोविड का शिकार हुए गैर रेलकर्मियों अर्थात रेलकर्मियों के परिजनों एवं रेल अस्पतालों में भर्ती अन्य लोगों की मौत का कुल आंकड़ा 1814 था।

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इस प्रकार यह पूरी तरह स्पष्ट है कि 11 मई के आसपास और उससे पहले हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीईओ रेलवे बोर्ड ने प्रेस के सामने साफ-साफ झूठ बोला था।

यहां तक कि जो लोग उनके द्वारा दिए गए आंकड़ों पर सवाल पूछना चाहते थे, उन्हें कुछ भी कहकर साइड लाइन कर दिया गया, परंतु उन्हें मार्च 2020 से दिए गए आंकड़ों का कोई औचित्य नहीं समझाया गया।

जबकि उपरोक्त आंकड़ों से स्पष्ट है कि सीईओ/रेलवे बोर्ड द्वारा मार्च 2020 से 10 मई 2021 तक 13 महीने 10 दिन के लिए बताए गए कुल आंकड़ों से यहां एक दिन का ही आंकड़ा अधिक है।

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यदि ऐसा नहीं था, तो “रेल समाचार” द्वारा 10 मई 2021 को चेयरमैन सीईओ/रेलवे बोर्ड सुनीत शर्मा से जब यह पूछा गया कि –

1. कृपया श्री प्रदीप कुमार, पूर्व मेंबर स्टाफ, रेलवे बोर्ड और वर्तमान मेंबर कैट, जो कि एनआरसीएच में भर्ती हैं और वेंटिलेटर पर हैं, की हेल्थ पोजीशन की अपडेट देने की कृपा करें।

2. रेल अस्पतालों को अपग्रेड करने और रेलकर्मियों को उचित स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने के लिए रेल प्रशासन द्वारा अब तक क्या किया गया?

3. वर्तमान में कितने रेलकर्मी और अधिकारी पूरी भारतीय रेल में कोरोना संक्रमित हैं?

4. पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल कितने रेलकर्मी और अधिकारी कोरोना से काल कवलित हुए हैं? कृपया रेलवे वाइज संख्या देने की कृपा करें।

5. पूरी भारतीय रेल में अब तक कुल कितने रेलकर्मियों और अधिकारियों का वैक्सीनेशन हो चुका है? कृपया रेलवे वाइज संख्या प्रदान करने की कृपा करें।

6. क्या रेलकर्मियों और अधिकारियों तथा उनके परिजनों को अलग से अथवा सीधे वैक्सीन मुहैया कराने की व्यवस्था नहीं की जा सकती? यदि हां, तो इसके लिए रेल मंत्रालय क्या उपाय कर रहा है? यदि नहीं, तो इसमें समस्या क्या है? कृपया बताने का प्रयास करें।

यह नहीं, 12 मई 2021 को, सीईओ रेलवे बोर्ड की प्रेस कॉन्फ्रेंस के एक दिन बाद भी उन्हें रिमाइंड करते हुए “रेल समाचार” द्वारा पूछा गया था कि –

Resp. Sharma ji, kindly share latest daily “ZONE WISE COVID PREPAREDNESS REPORT-2021” on Indian Railways.

उपरोक्त में से किसी भी तथ्य का कोई स्पष्टीकरण अथवा कोई जवाब अब तक चेयरमैन/सीईओ/रेलवे बोर्ड की तरफ से नहीं आया है।

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“जान है तो जहान है” के सिद्धांत पर जब रेल प्रशासन को अपनी वर्क फोर्स का जीवन बचाना चाहिए था, तब वह झूठ और फरेब का सहारा लेकर केवल ऑक्सीजन एक्सप्रेस चलाने के लिए अपनी पीठ थपथपा रहा है।

हालांकि जनता को भी उसके गंतव्य पर पहुंचाकर सेवा कार्य भी इस संकटकाल में जरूरी है। तथापि झूठ बोलना कतई जरूरी नहीं है। यह वैश्विक महामारी है, इस पर आदमी का कोई वश नहीं है। इसके लिए केवल सावधानियां ही बरती जा सकती हैं।

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अतः पब्लिक के संपर्क में आने वाले रेलकर्मियों को सुरक्षा उपकरणों की आपूर्ति सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके अलावा उम्र और किसी बीमारी से ग्रस्त कर्मचारियों को जनसंपर्क से दूर रखने की यथासंभव कोशिश करते हुए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

“रेल समाचार”, रेल प्रशासन की अकर्मण्यता के कारण अब तक अकाल काल-कवलित हुए सभी रेलकर्मियों को विनम्र श्रृद्धांजलि अर्पित करता है और संक्रमित हुए कर्मचारियों के शीध्र स्वस्थ होने की कामना करता है।

ट्रेन की गति से ढ़हा चांदनी रेलवे स्टेशन:





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जब हम कोरोना से लड़ते हुए देश सेवा में लगे थे, तब सरकार हमारी पीठ पर खंजर घोंप रही थी -शिवगोपाल मिश्रा

यह समय चुनौतीपूर्ण है, इसलिए हमें कोरोना से डरकर नहीं, लड़कर यूनियन का काम करना होगा -महामंत्री

एनआरएमयू, लखनऊ मंडल की समीक्षा बैठक संपन्न

नई दिल्ली: नार्दर्न रेलवे मेंस यूनियन, लखनऊ मंडल की समीक्षा बैठक शनिवार, 30 मई को संपन्न हुई। बैठक में महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने कहा कि ये वक्त चुनौतीपूर्ण है, इसलिए हमें कोरोना से डरकर नहीं, लड़कर यूनियन का काम करना होगा। उन्होंने कहा कि ये सही है कि कोरोना के चलते चौतरफा दहशत का माहौल है। फिर ये जल्दी खत्म होने वाला भी नहीं है। ऐसे में हम सब घर तो नहीं बैठ सकते है। परंतु सावधानी के साथ अपना काम भी करना है और यूनियन की गतिविधियों को भी जारी रखना है।

वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए लखनऊ मंडल की समीक्षा बैठक में महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने सभी मामलों पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि लॉकडाउन के बावजूद रेलकर्मचारी पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ ट्रेनों का संचालन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन से जब पूरा देश ठप हो गया, लोग घरों में बैठ रह गए, तब देशवासियों की चिंता रेलकर्मियों ने की, क्योंकि अगर इस दहशत के माहौल में मालगाडियों और पार्सल ट्रेनों का संचालन न होता, तो कई राज्यों में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति ठप हो जाती।

उन्होंने कहा कि रेलकर्मचारियों ने मालगाड़ियों, पार्सल ट्रेनों का संचालन कर अनाज, फल, सब्जी, दूध की ही आपूर्ति को नहीं, बल्कि अन्य जरूरी सामानों की भी किसी राज्य में कमी नहीं होने दी। जब राज्य सरकारें मजदूरों को उनके घर पहुंचाने में नाकाम साबित हुईं, तो फिर किसी तरह की चिंता किए बगैर हजारों ट्रेनों के जरिए 50 लाख से ज्यादा मजदूरों को उनके घर रेलकर्मियों ने ही पहुंचाया।

महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि जब हम कोरोना से लड़ते हुए देश की सेवा कर रहे थे, तब हमारी सरकार हमारी पीठ थपथपाने के बजाय हमारी पीठ पर हमला कर रही थी। उस दौरान सरकार श्रमिक विरोधी काम करते हुए कर्मचारियों को मिल रही सुविधाओं में कटौती करने की साजिश में जुट गई। उन्होंने कहा कि एक तरफ तो रेलकर्मचारियों ने बिना मांगे पीएम केयर फंड में 151 करोड़ रुपये का योगदान दिया, तो दूसरी तरफ सरकार ने हमारी पीठ पर खंजर घोंपा। वह हमसे कहते तो हम कुछ और भी मदद करते, लेकिन ऐसा न करके सरकार ने डीए फ्रीज करने का एकतरफा फैसला सुना दिया।

उन्होंने कहा कि एआईआरएफ और एनआरएमयू का इतिहास है कि हमने कभी किसी भी सरकार की मनमानी नहीं चलने दी। हमने कर्मचारी हितों के साथ कभी समझौता नहीं किया। इसलिए इस मामले पर फेडरेशन ने अपना रुख साफ कर दिया कि सरकार की ये चालबाजी हमें मंजूर नहीं है।

महामंत्री ने कहा कि फिलहाल तो डीए को फ्रीज करने का मामला हो, या  फिर पदों को खत्म करने की बात हो, पुरानी पेंशन की बहाली समेत अन्य दूसरे मुद्दों पर एनआरएमयू और फेडरेशन लगातार सरकार के संपर्क में रहकर अपना विरोध जताती रही है। जब देखा गया कि इस सबके बाद भी सरकार का रवैया कर्मचारियों के खिलाफ ही है, तो एआईआरएफ की स्टैंडिग कमेटी की बैठक में संघर्ष का निर्णय लिया गया।

उन्होंने कहा कि इसी क्रम में एक से छह जून तक तो हम राष्ट्रीय स्तर पर जनजागरण करेंगे और आठ जून को काला दिवस मनाने के लिए काली पट्टी बांधकर काम करेंगे। इसके बाद भी अगर हमारी बात नहीं सुनी जाती है, तो आगे की रणनीति पर विचार किया जाएगा।

उन्होंने दोहराया कि अगर सरकार को बैकफुट पर लाना है, तो हमें निचले स्तर पर गर्मी पैदा करनी होगी। इसके बिना काम चलने वाला नहीं है। महामंत्री ने कहा कि इन हालात में हमें कोरोना से डरकर घर नहीं बैठ जाना है, बल्कि कोरोना से भी लड़कर सरकार का भी मुकाबला करने को तैयार रहना है।

महामंत्री ने संगठन की समीक्षा बैठक में लखनऊ मंडल की तारीफ की और कहा कि मेंबरशिप का मामला हो या फिर केंद्र से निर्धारित किए गए कार्यक्रम हों, हर मामले में लखनऊ मंडल का प्रदर्शन बेहतर रहा है। उन्होंने युवाओं को संगठित करने पर जोर दिया। संगठन में दो शाखाओं के चुनाव भी होने हैं, लिहाजा सभी शाखा सचिव अपना  इलेक्टोरल तैयार कर केंद्र को भेज दें, ताकि आगे की कार्रवाई की जा सके।

केंद्रीय अध्यक्ष एस. के. त्यागी ने लखनऊ मंडल के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि अभी तो देख रहा हूं कि कोरोना का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, इसलिए सावधानी  बरतनी होगी, क्योंकि  इसकी चपेट में कुछ रेलकर्मचारी भी आ गए हैं, लिहाजा रेल भवन ही नहीं बड़ौदा हाउस को भी बंद करना पड़ा है। उन्होंने कहा कि रेलकर्मियों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। सरकार ने हमें कोरोना वारियर्स तो माना, लेकिन दूसरे विभागों की तरह हमें किसी तरह की सहूलियत नहीं दी। इससे रेल कर्मचारियों में रोष होना स्वाभाविक है। आने वाला समय काफी चुनौतीपूर्ण है, इसलिए हमें काम के साथ अपनी सुरक्षा का भी पूरा ख्याल खुद ही रखना होगा।

केंद्रीय उपाध्यक्ष प्रवीना सिंह ने कहा कि लखनऊ मंडल विपरीत हालात में भी अच्छी मेंबरशिप की है। इसके लिए पूरी टीम बधाई की पात्र है। उन्होंने कहा कि मंडल  में महिला संयोजक के रिटायर होने के बाद ये पद रिक्त है, इस पर अगर जल्दी नियुक्ति हो जाए तो महिलाओं को संगठित करने में और सुविधा होगी।

नेशनल यूथ कन्वीनर प्रीति सिंह ने मंडल में युवाओं के बीच हुए कार्यों पर चर्चा की। इस कांफ्रेंस को केंद्रीय उपाध्यक्ष एस. यू. शाह, कोषाध्यक्ष जोनल यूथ कन्वीनर मनोज श्रीवास्तव ने भी संबोधित किया।

मंडल अध्यक्ष राजेश सिंह ने कहा कि ये सही है कि कोरोना की वजह से हमारे संगठन के कार्यों पर थोड़ा असर पड़ा, लेकिन जब हम सब ने देखा कि महामंत्री खुद इतनी देर तक काम कर रहे हैं, रोज आफिस आ रहे हैं, तो अपने लोगों ने भी संगठन के काम में कोई कोताही नहीं की और अपना प्रदर्शन बेहतर किया। उन्होंने कहा कि हमारी तैयारी है और जल्दी शाखास्तर पर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए कार्यक्रम को आगे बढ़ाया जाएगा।

मंडल मंत्री आर. के. पांडेय ने संगठन के कार्यों की विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि कोरोना के दौरान हमारे साथियों ने तमाम सामाजिक कार्यों में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। हम लोगों ने भूखे मजदूरों को श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में खाने के पैकेट का वितरण किया, लगेज पोर्टरों की मुश्किल घड़ी में मदद की गई। ऐप बेस्ट ट्रांसपोर्टर्स को भी राहत सामग्री का वितरण किया गया।

उन्होंने कहा कि इस दौरान कुछ रेलकर्मियों की भी कुछ समस्याएं रहीं, उनका भी समाधान किया गया। कई मसलों में केंद्रीय नेतृत्व से भी काफी मदद मिली, जिससे हम ये सब कर पाने में कामयाब हुए। उन्होंने आश्वस्त किया एक से छह जून के बीच जनजागरण अभियान के तहत हमारी तैयारी पूरी है और हम बेहतर प्रदर्शन करेंगे। इसके  अलावा आठ जून को हर कर्मचारी काली पट्टी जरूर बांधेगा, इसकी तैयारी की जा चुकी है।

कांफ्रेंस में सेवानिवृत्त हो रहे सहायक मंडलमंत्री घनश्याम पांडेय के कार्यों की भी सराहना की गई। इस दौरान मीटिंग को मुख्य रूप से राकेश कनौजिया, सुधीर तिवारी, एस. के. सिंह, रंजन सिह, संजय श्रीवास्तव, सुनिल सिंह, धीरेन्द्र सिंह, बिंदा प्रसाद, राकेश कुमार पांडेय, मदन गोपाल मिश्रा, राजकुमार, हीरा लाल और अजय श्रीवास्तव ने भी संबोधित किया।

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जीएम इंस्पेक्शन से ठीक पहले आनन-फानन में खड़े किए गए विद्युत पोल मामूली अंधड़ में हुए धराशाई

जबलपुर मंडल, विद्युत विभाग की भ्रष्टाचारपूर्ण कार्य प्रणाली के तहत ठेकेदार ने सतनाटिकरिया और सतनारीवा खंड पर अमानक कार्य को अंजाम दिया

जबलपुर मंडल, पश्चिम मध्य रेलवे के विद्युत विभाग की भ्रष्टाचारपूर्ण कार्य प्रणाली के चलते बिजली के खंभे गाड़ने के काम में जबलपुर के चहेते ठेकेदार ने जमकर लीपापोती की। यही वजह है कि जिस काम को ठेकेदार ने 14 मार्च को पूरा किया, वह जगह-जगह उजागर होने लगा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार कैमा रेलवे स्टेशन पर बिजली के ये आधा दर्जन खंभे एक मामूली आंधी में ढ़ह गए। ठेकेदार का यह अमानक कार्य जीएम निरीक्षण से ठीक पहले किया गया था।

पता चला है कि मानक के अनुरूप गड्ढ़े खोदकर सही तरीके से यह विद्युत पोल खड़े न किए जाने के कारण एक मामूली अंधड़ में ही धराशाई हो गए। जबलपुर मंडल बिजली विभाग के अधिकारियों की भ्रष्टाचारपूर्ण कार्य प्रणाली के कारण जबलपुर के ठेकेदार यासीन खान और उसके मैनेजर जावेद खान ने यह गुणवत्ताविहीन कार्य सतना-टिकरिया और सतना-रीवा रेलखंड पर पड़ने वाले सभी रेलवे स्टेशनों पर अंजाम दिया है।

पश्चिम मध्य रेलवे के महाप्रबंधक शैलेंद्र कुमार सिंह के निरीक्षण दौरे को सफल बनाने के लिए लाखों रुपए का बजट तैयारियों के नाम पर पानी की तरह बहाया गया। इसके लिए सतना-मानिकपुर और रीवा-सतना रेलखंड के सभी रेलवे स्टेशनों पर पूर्व तैयारी को लेकर काफी काम करवाया गया था। विद्युत संबंधी यह सभी कार्य दोनों रेलखंडों पर अधिकारियों ने अपने करीबी जबलपुर निवासी ठेकेदार को सौंपा था।

ठेकेदार ने जल्दबाजी और अधिक मुनाफा कमाने के चक्कर में घटिया निर्माण करवाया, जो अब अधिकारियों के गले की फांस बनता नजर आ रहा है। बिजली के यह खंभे गाड़ने के लिए निर्धारित मानक के अनुरुप गड्ढा खोदे बिना ही खड़े कर दिए गए, जिसके कारण मामूली सी आंधी में यह खंभे ढ़ह गए।

सतना से रीवा की तरफ जाने पर पहला रेलवे स्टेशन कैमा आता है। यहीं पर आंधी के कारण अभी हाल ही में लगाए गए आधा दर्जन बिजली के खंभे धराशाई हो गए। इसकी जानकारी मिलने पर कुछ सुपरवाइजर मौके पर पहुंचे। जितने भी नए खंभे दोनों रेलखंडों के रेलवे स्टेशनों पर खड़े किए गए थे, उनकी नींव ठेकेदार ने निर्धारित मानक के अनुरूप तैयार नहीं की थी, जिससे तेज हवा चलने से वह सब धराशाई हो गए। अब ठेकेदार का यह घटिया काम संबंधित अधिकारियों के लिए न सिर्फ एक मुसीबत बन गया है, बल्कि इससे यह भी साबित हो गया है कि रेलवे में भ्रष्टाचार चौतरफा व्याप्त है।

कुछ रेलकर्मियों का कहना है कि जिस समय ठेकेदार कैमा सहित अन्य रेलवे स्टेशनों पर बिना मानक आधार बनाए यह काम कर रहा था, यदि उसी दौरान जिम्मेदार अधिकारी ध्यान देते, तो शायद जीएम इंस्पेक्शन के महज डेढ़ महीने के अंदर इस तरह का नजारा उपस्थित नहीं होता। मौके पर पहुंची टीम ने देखा कि जिस स्थान पर खंभे गाड़े गए थे, वहां कोई मजबूत आधार नहीं बनाया गया था। यही कहानी सतना-रीवा और सतना-मानिकपुर रेलखंड के सभी रेलवे स्टेशनों पर देखने को मिली।

उल्लेखनीय है कि 14 मार्च 2020 को महाप्रबंधक का दौरा हुआ था। मात्र दो महीने के अंदर लाखों रुपए के काम की गुणवत्ता बेनकाब हो गई है। बिजली के खंभे गिरने की जानकारी मिलते ही डीआरएम/जबलपुर संजय विश्वास ने तत्काल सीनियर डीईई को मामले की जांच करने के लिए कहा। सीनियर डीईई ने अपने कुकर्मों को छिपाने के लिए एसएसई/सतना और एसएसई/रीवा को मोबाइल पर फटकार लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली।

मिली जानकारी के अनुसार ठेकेदार की इसी तरह की कोताही कुछ समय पहले टिकरिया रेलवे स्टेशन पर भी सामने आई थी। यहां पर सोलर पैनल से पंप चलाने के लिए एक रेलवे आवास की छत पर सोलर प्लेटें लगाई गई थीं। जहां एक प्लेट को नट-बोल्ट से बिना उचित तरीके से कसे भगवान भरोसे छोड़ दिया गया था। तेज अंधड़ में वह सोलर प्लेट जमीन पर गिरकर चकनाचूर हो गई। इससे हजारों रुपए का नुकसान तो हुआ ही, बल्कि लोगों की जान का खतरा भी पैदा हो गया।








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हावड़ा पार्सल/गुड्स में बीसों साल से जमे हुए हैं कुछ खास रेलकर्मी

मंडल के प्रत्येक वाणिज्य अधिकारी को होती है 50 हजार से 5 लाख की अवैध कमाई

सीवीसी/विजिलेंस के सभी डायरेक्टिव ताक पर, भ्रष्ट स्टाफ को प्राप्त है अधिकारियों का संरक्षण

कोलकाता : हावड़ा पार्सल, दांकुनी गुड्स, पाकुर गुड्स, बर्दवान पार्सल, भद्रेश्वर गुड्स, श्रीरामपुर पार्सल, बाली गुड्स, त्रिवेणी गुड्स। पूर्व रेलवे, हावड़ा मंडल के इन सभी महत्वपूर्ण पार्सल/गुड्स डिपो में करीब 20-25 सालों से कुछ विशेष लोगों की पोस्टिंग है, जो कुछ संबंधित वाणिज्य अधिकारियों की जरूरतों और हितों का पूरा ख्याल रखने की महारत रखते हैं।

इनमें से कुछ नाम और उनकी खास विशेषताएं इस प्रकार हैं-

1. सुभाष चौधरी, ईआर मेंस कांग्रेस से संबंधित हैं। हावड़ा टिकट बुकिंग में बीएस1 हैं। पार्सल में 25 रहे हैं। वहां भी सिर्फ साइन किए, काम कभी नहीं किया, आज भी नहीं कर रहे हैं। सिर्फ पैसा उगाही करना ही इनका प्रमुख काम है।

2. संजीव गुप्ता, अभी सीएस1/हावड़ा पार्सल में पदस्थ हैं, पहले बीएस1 रहे हैं। यह भी ईआर मेंस यूनियन से संबंधित हैं। यह काउंटर पर कभी काम नहीं करते, यह पैसा नहीं लेते हैं, मगर इजी वर्किंग को ही प्रीफर करते हैं।

3. सुमन बोस, पार्सल शेड नं.3 में पदस्थ हैं, सीपीसी यानि चीफ पार्सल क्लर्क हैं। 18 साल से एक ही सीट पर काम कर रहे हैं। पहले माल बुकिंग में थे और अब डिस्पैचिंग में हैं। डिस्पैच में कभी विजिलेंस केस होने का डर नहीं रहता है। इसलिए यह हमेशा सेफ साइड पोस्टिंग में रहने वाले खास प्राणी हैं। हावड़ा पार्सल का यह सबसे मलाईदार शेड है। यह मोस्ट सेंसिटिव पोस्ट है। फिर भी यह यहां पिछले 18 सालों से जमे हुए हैं।

4. अजय कुमार, सीएस1 हैं, नौकरी में आने से लेकर अब तक पार्सल में ही पदस्थ हैं। कर्मचारियों द्वारा इन्हें हावड़ा मंडल सहित संपूर्ण पूर्व रेलवे पार्सल का माफिया बताया गया है। यह विभागीय प्रमुख को साधकर पूरे जोनल पार्सल कंट्रोल करते हैं। कर्मचारियों ने बताया कि यह इतने पावरफुल हैं कि इन्होंने पदोन्नति से पहले वर्तमान सीसीएम/पीएम की पोस्टिंग सीनियर डीसीएम, हावड़ा के पद पर करवाई थी, जिनकी कमजोरी पैसा और शबाब दोनों रही हैं। इसी संदर्भ में उनकी पत्नी की शिकायत पर उन्हें हावड़ा से हटाया गया था।

बताते हैं कि इनके पहले वाले सीनियर डीसीएम की पोस्टिंग भी अजय कुमार ने ही करवाई थी। अजय कुमार को हावड़ा पार्सल से कुछ समय के लिए तब हटाया गया, जब उनके खिलाफ एक बड़ा विजिलेंस केस हुआ था। इनकी कैश हैंडलिंग करीब 10 साल से बंद है। आज भी इनकी पोस्टिंग पार्सल एकाउंट में है, मगर हावड़ा पार्सल शेड नं.3 में इंचार्ज के तौर पर काम कर रहे हैं। वहां इनसे सभी स्टाफ इससे इसलिए डरता है, क्योंकि यही सब कुछ तय करते हैं कि किसको कितना पैसा पहुंचाना है। यह पीएस/पीसीसीएम अजय राय, जो पहले बुकिंग/आरक्षण क्लर्क थे और बाद में एसीएम में पदोन्नत होकर अधिकारी बन गए, अजय कुमार के लंगोटिया यार हैं।

5. जॉय बल्लभ भी यहां काफी समय से पदस्थ हैं, सीपीसी हैं। एक विजिलेंस केस होने के बाद इनका ट्रांसफर हावड़ा बुकिंग से तारकेश्वर बुकिंग में हुआ था। फिर वापस वहां से जुगाड़ लगाकर जल्दी ही हावड़ा पार्सल में आ गए। दुबारा जब विजिलेंस केस हुआ, तब इनको हावड़ा बुकिंग में भेजा गया था, मगर आज तक यह न वहां गए और न ही संबंधित अधिकारियों ने इनके ट्रांसफर आर्डर पर अमल करवाने की जरूरत समझी। जबकि अन्य लोगों का आर्डर उसी दिन या 2-3 दिन में लागू करवाया जाता है। तथापि जॉय बल्लभ महोदय का आर्डर आज तक नहीं लागू हुआ।

बताते हैं कि इस शेड से एसीएम/कोचिंग, एसीएम/गुड्स, डीसीएम और सीनियर डीसीएम आदि सबका न सिर्फ खास ख्याल रखा जाता है, बल्कि सबका हिस्सा भी उनके ओहदे के अनुसार समय पर पहुंचाया जाता है।

कर्मचारियों का कहना है कि सिर्फ हावड़ा पार्सल से डीसीएम को कुछ नहीं मिलता। बाकी सब जगह से मिलता है। कर्मचारियों के अनुसार एसीएम/कोचिंग और एसीएम/गुड्स में से प्रत्येक को हावड़ा पार्सल से प्रतिमाह 40-50 रुपये मिल जाते हैं, जबकि हावड़ा पार्सल को छोड़कर बाकी सभी जगह से डीसीएम को कुल मिलाकर एक लाख की आमदनी प्रतिमाह हो जाती है। वहीं सीनियर डीसीएम को सब जगह से कुल मिलाकर प्रतिमाह लगभग पांच लाख रुपये मिलते हैं।

हावड़ा मंडल के उपरोक्त पांचों महान पार्सल कर्मियों के खौफ से आतंकित और उत्पीड़ित कुछ रेलकर्मियों का यह भी कहना था कि यदि कोई उच्च वाणिज्य अधिकारी किसी आपातकालीन स्थिति में इनसे कभी यह फरमाइश कर दे कि एक घंटे में 50 लाख रुपये की जरूरत है, तो यह लोग उससे पहले ही यह रकम उस तक पहुंचा देने की पूरी क्षमता रखते हैं। यही नहीं, इन्होंने इसी की बदौलत करोड़ों की संपत्ति अर्जित की है। यदि इनकी अर्जित संपत्तियों की सीबीआई जांच करवाई जाए, तो सबकी कलई खुलकर सामने आ जाएगी।








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