रास्ते में ऑक्सीजन खत्म होने से भायखला रेलवे अस्पताल पहूंचकर जूनियर क्रू कंट्रोलर की मौत

जूनियर सीसी की असामयिक मौत के लिए सीधे जिम्मेदार हैं कल्याण रेलवे अस्पताल के कार्यकारी सीएमएस और एसीएमएस-कोविड नोडल ऑफ़िसर

मुंबई : कल्याण रेलवे अस्पताल और अराजकता-मनमानी का चोली-दामन का संबंध रहा है, इस बात से कल्याण और आसपास रहने वाले लगभग दस हजार रेलकर्मी बखूबी वाकिफ हैं। इसी अराजकता और मनमानी के चलते एंबुलेंस में बिना जांचे-परखे रखे गए ऑक्सीजन सिलेंडर के रास्ते में खत्म हो जाने से एक जूनियर क्रू-कंट्रोलर की असमय मौत हो गई और कहीं कोई हलचल नहीं हुई। यही वजह है कि कल्याण रेलवे अस्पताल के कुछ डॉक्टरों की मनमानी और सनक लगातार बढ़ती जा रही है। क्रू-कंट्रोलर की इस असामयिक मौत पर सभी रेलकर्मियों में भारी आक्रोश है। मान्यताप्राप्त ज़ोनल रेल संगठन एनआरएमयू, सीआरएमएस, मध्य रेलवे एससी-एसटी रेलकर्मचारी संगठन और मध्य रेलवे ओबीसी रेलकर्मचारी संगठन ने अपने बोर्ड लगाकर मेडिकल विभाग की इस अक्षम्य लापरवाही पर रेल प्रशासन से अपना विरोध प्रकट किया है।

वर्तमान में कल्याण रेलवे अस्पताल के सीएमएस और एसीएमएस का चार्ज संभाल रहे दोनों डॉक्टर महातुनकमिजाज न सिर्फ माने जाते हैं, बल्कि वह वास्तव में ऐसे हैं भी! यह कहना है तमाम रेलकर्मियों का। उनका कहना है कि कल्याण रेलवे अस्पताल की एसीएमएस एवं कोविड की नोडल ऑफिसर की सनक वर्तमान में सातवें आसमान पर है। सुबह से शाम तक अकारण भोंकते रहना, पेशेंट्स को, उनके परिवार वालों को, संकट की घड़ी में मरहम लगाने के बजाय सबके सामने जी-भरकर कोसना, बेइज्जत करने वाला उनका व्यवहार अस्पताल को बूचड़खाने में तब्दील कर रहा है।

रेलकर्मियों का कहना है कि इन डॉक्टर साहिबा का मानना है कि वह जो सोचती हैं, केवल वही सही होता है। वह जो चाहती हैं, वैसा ही हर डॉक्टर, अस्पताल कर्मी, यूनियन पदाधिकारी और अधिकारी भी वैसा ही सोचें, समझें और करें भी। अस्पताल में जब डॉक्टर महोदया चलती हैं, या ऐसा कहना चाहिए कि विचरण करती हैं, तो वहां भर्ती मरीजों अथवा दवा लेने आए रेलकर्मियों की आंखों के सामने फिल्मों में विलेन की एंट्री जैसे अनेकों दृश्य घूम जाते हैं। इनके चीखते-चिल्लाते रहने से अस्पताल की शांति तो भंग होती ही है, बल्कि मरीज और उनके रिश्तेदार तनावग्रस्त हो जाते हैं, पर रेलकर्मी या उनके पारिवारिक सदस्य होने के नाते वह कुछ कह नहीं पाते। इसी बात का यह अहंमन्य डॉक्टर साहिबा तो भरपूर फायदा उठाती ही हैं, बल्कि अस्पताल के अन्य डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ भी इसी बात का भरपूर दोहन करता है।

उनका कहना है कि आए दिन कल्याण रेलवे अस्पताल के मेडिकल स्टोर में अनेकों जरूरी दवाओं का अभाव रहता है। हार्ट जैसी गंभीर बीमारियों में भी अनेकों चालू कंपनियों की, हर बार बदल-बदलकर तथा अलग-अलग पोटेंसी की दवाएं देना यहां की विशेषता है। रेलकर्मियों के मरने-जीने की इनको कतई कोई परवाह नहीं होती। जबकि दबंग यूनियन पदाधिकारियों और अधिकारियों को न सिर्फ ब्रांडेड कंपनी की हर दवा लोकल परचेज (एलपी) करके मुहैया कराई जाती है, बल्कि उनके सामने भीगी बिल्ली बनकर उनकी चापलूसी भी होती है।

उन्होंने बताया कि असामाजिक तत्वों से अस्पताल की सुरक्षा के लिए प्राइवेट सिक्योरिटी लगाई गई है, परंतु उसका भरपूर उपयोग यहां मरीजों और उनके पारिवारिक सदस्यों तथा अस्पताल आने वाले अन्य रेलकर्मियों को बेइज्जत करने और उनमें खौफ फैलाने के लिए ज्यादा किया जा रहा है। रेलकर्मियों का आरोप है कि उद्दंड सिक्योरिटी वाले अहंमन्य एसीएमएस के इशारे पर अस्पताल आने वालों के साथ ऐसी अभद्रता करते हैं जैसे कि उन्हें अस्पताल आने वाला हर रेलकर्मी असामाजिक तत्व नजर आता है, उनका यह दुर्व्यवहार और उनके द्वारा की जाने वाली अनावश्यक पूछताछ तथा टोका-टाकी कई बार असहनीय हो जाती है।

उन्होंने कहा कि अब कुछ महीनों से कोविड नामक ऐसा अवसर मिल गया है कि उसके नाम पर अस्पताल में दूसरे सारे इलाज, ऑपरेशन तथा अन्य गतिविधियां बंद पड़ी हैं। यहां कई महीनों से ओटी बंद है। आंखों के ऑपरेशन के लिए रेलकर्मी भटक रहे हैं। मोतियाबिंद के कारण मेडिकल में अटके लोग चुपचाप बाहर से अपना पैसा खर्च कर ऑपरेशन करवा रहे हैं, तब यहां के डॉक्टर उनको फिट कर रहे हैं। पर किसी के दिमाग में यह नहीं आ रहा है कि कर्मचारी को अपने पैसे से बाहर ऑपरेशन न करवाना पड़े, इसका कोई उपाय निकाला जाए।

कर्मचारी कहते हैं कि यहां पागलों जैसा काम चल रहा है, जैसे कि यह कोई मेंटल हॉस्पिटल हो। वास्तविक बीमारी का आदमी इधर-उधर भटक रहा है। यदि कोई हिम्मत करके अस्पताल पहुंच भी गया, तो पहले दो-तीन दिन उसकी कोविड के नाम पर ऐसी दुर्गति होती है कि बिना कोविड के ही उसके प्राण हलक में आ जाते हैं। सस्पेक्टेड कोविड मानकर 12-15 घंटे कल्याण में, फिर पांच से आठ संक्रमित मरीजों के साथ एक ही एंबुलेंस द्वारा मुंबई सेंट्रल स्थित पश्चिम रेलवे के जगजीवन राम अस्पताल (जेआरएच) के लिए भेज दिया जाता है। जहां दो-तीन घंटे एंबुलेंस में ही मरीजों को बैठे रहना पड़ता है।

दो-तीन घंटे बाद उन्हें बताया जाता है कि जेआरएच में बेड उपलब्ध नहीं है, इसलिए अब उनको मध्य रेलवे के भायखला रेलवे अस्पताल भेजा जा रहा है। फिर काफी इंतजार के बाद जैसे-तैसे उनको वार्ड में भर्ती किया जाता है और तब कोविड टेस्ट होता है। दो दिन बाद कोविड की रिपोर्ट यदि नेगेटिव आती है, तब फिर उस कर्मचारी को कल्याण रेलवे अस्पताल भगा दिया जाता है। इस तरह तीन-चार दिन तक एक बीमार आदमी (कर्मचारी) की जानवरों से भी बुरी फजीहत कोविड के नाम पर ही होती रहती है। इससे मरीज उसकी वास्तविक बीमारी ही भूल जाता है। ऐसी में कसाई के यहां बंधे बकरे जैसी हालत के चलते कर्मचारी किसी तरह अपनी जान छुड़ाकर भाग खड़ा होता है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार कल्याण रेलवे अस्पताल के 44 नंबर वार्ड में कोविड पॉजिटिव के लिए 5 बेड रखे गए हैं। वहां कभी कोई सफाई कर्मी ही नहीं रहता। पेशेंट के पारिवारिक सदस्य भी उपस्थित नहीं रह सकते, क्योंकि एसीएमएस किसी कटखनी बिल्ली जैसी गुर्राती रहती हैं। ऐसे में वहां भर्ती मरीज की कितनी फजीहत होती होगी, इसका अंदाजा कोई भी लगा सकता है।

अस्पताल के 44 नंबर वार्ड तक पहुंचने का रास्ता कोविड पेशेंट, मेडिसिन काउंटर, सिक-फिट काउंटर तथा लैब से होकर गुजरता है। अस्पताल में अन्य पेशेंट के साथ कोविड पेशेंट आने के कारण अस्पतालकर्मी भी संक्रमित होते जा रहे हैं। परंतु अस्पताल की एसीएमएस उर्फ नोडल ऑफिसर की सनक के चलते इसका ठोस उपाय उपलब्ध होने के बाद भी नहीं किया जा रहा है।

जानकारों के अनुसार यदि फ्लू ओपीडी, इंस्टीट्यूट के बैडमिंटन हॉल में बना दी जाए तो पेशेंट्स को अस्पताल के बाहर सड़क पर खुले आसमान के नीचे धूप बारिश में नहीं खड़ा होना पड़ेगा बल्कि वह पूर्ववत सीधे अस्पताल में जा पाएंगे। फ्लू ग्रस्त कर्मचारी बैडमिंटन हॉल में आकर आराम से बैठ सकता है। डॉक्टर के देखने के बाद यदि शंका है तो वहीं पर संबंधित दवा देकर उसे सीएचआई ऑफिस की तरफ से पीछे बने दरवाजे से ऑडिटोरियम में भेजा जा सकता है। इसके लिए अस्पताल के दूसरे माले पर स्थित 28 बेड के क्वारंटाइन वार्ड को तत्काल बंदकर ऑडिटोरियम तथा सर्जिकल वार्ड को कोविड वार्ड बना देना चाहिए जिससे कोविड पेशंट अस्पताल में रहकर भी सभी से अलग रह सकेंगे तथा अन्यत्र संक्रमण फैलने से रोका जा सकेगा।

परंतु यह सीधा तरीका सीएमएस कल्याण के दिमाग में नहीं आ रहा है। जबकि नोडल ऑफिसर की मनमानी के चलते यह सारी परेशानी हो रही है तथा बेसिर-पैर के कार्यों में कोविड फंड का गलत इस्तेमाल और दुरुपयोग हो रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि चूंकि यह रेलवे अस्पताल है, और मरीज भी रेल कर्मचारी अथवा उनके पारिवारिक सदस्य ही होते हैं, इसके चलते यहां सब कुछ सहन किया जा रहा है। उनकी इस सहनशीलता के चलते ही यहां के कुछ सनकी डॉक्टरों का सनकीपन बढ़ता जा रहा है। इनको मंडल चिकित्सालय में रखना रेलकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।

शुक्रवार, 10 जुलाई को कल्याण अप यार्ड में कार्यरत रहे जूनियर क्रू कंट्रोलर ओमप्रकाश सिंह, कोविड संक्रमित रेलकर्मी, ऑक्सीजन की कमी के चलते रेलवे अस्पताल में एडमिट हुआ था। 11 जुलाई को उसका कोविड सैंपल लिया गया तथा 12 जुलाई को उसे पॉजिटिव पाया गया था। अब 12 जुलाई की सुबह 11 बजे रिपोर्ट आने से लेकर 13 जुलाई को दोपहर बाद करीब 3 बजे तक ऑक्सीजन की कमी के पेशेंट को क्यों प्रतीक्षा में रखा गया? उसको 12 जुलाई को सुबह 11 बजे रिपोर्ट मिलने के तुरंत बाद जेआरएच या भायखला अस्पताल क्यों नहीं भेजा गया? यह तो अस्पताल की सनकी नोडल अधिकारी ही बता सकती हैं। जबकि 12 जुलाई को 5 पेशेंट जेआरएच भेजे गए थे, जो कि उससे बहुत कम खतरे में थे। तथापि यदि उसे इतना ही खतरा महसूस हो रहा था तो रेलवे से संबद्ध कल्याण के किसी प्राइवेट अस्पताल में उसे क्यों नहीं रेफर किया गया?

बताते हैं कि 13 जुलाई को दोपहर बाद जब इस पेशेंट को ऑक्सीजन के साथ, एक ही एंबुलेंस में छह लोगों को ठूंसकर, इस ऑक्सीजन लगे मरीज को भी बैठाकर, (क्योंकि एंबुलेंस में छह लोगों के बैठने के बाद किसी मरीज के लेटने की जगह ही नहीं रह सकती) भायखला के लिए रवाना किया गया था। मुलुंड तक पहुंचते-पहुंचते यानि मात्र 35 मिनट बाद ही ऑक्सीजन खत्म हो गई, तब दूसरे सभी पेशेंट, जो खुद पॉजिटिव थे, घबराकर सिलेंडर हिलाकर ऑक्सीजन निकालने का प्रयास करते रहे, और एंबुलेंस चालक 100 से भी अधिक की स्पीड से गाड़ी भगाकर बहुत जोखिमपूर्ण ड्राइविंग करते हुए शाम 4 बजे भायखला अस्पताल पहुंचा था। तब तक पेशेंट की हालत बेहद नाजुक हो चुकी थी, और सभी उपायों के बावजूद शाम 5.15 बजे यह रेलकर्मी असमय काल कवलित हो गया।

यह न सिर्फ अत्यंत अमानवीय कृत्य है, बल्कि डॉक्टरी पेशे को भी बहुत ज़्यादा शर्मशार करने वाला है? ऑक्सीजन आधा घंटे में ही कैसे खत्म हो गई? ऐसा ऑक्सीजन सिलेंडर एंबुलेंस में रखा ही क्यों गया? क्या उक्त रेलकर्मी से कोई जातीय दुश्मनी थी? नोडल ऑफिसर की मनमर्जी, खौफ तथा उनके द्वारा की जाने वाली बेइज्जती के चलते अस्पताल के कर्मचारी भी किंकर्तव्यविमूढ़ होते जा रहे हैं। जो कर्मी जिंदगी-मौत से जूझ रहा था, उसको बिना लेटे अन्य 5 लोगों की भीड़ में ठूंसकर भेजना क्या सही निर्णय था? इसकी उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए, वरना ऐसे अमानवीय कृत्य और भी अधिक होने लगेंगे, और आए दिन रेलकर्मियों की जान ऐसे डॉक्टरों और अस्पताल कर्मियों की लापरवाही से जाती रहेगी।





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अति आवश्यक होने पर ही यात्रा करें! – RailSamachar

भारतीय रेल द्वारा देश भर में प्रतिदिन कई श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही हैं, ताकि श्रमिकों की अपने घरों तक पहुंच सुनिश्चित की जा सके। यह देखा जा रहा है कि कुछ ऐसे लोग भी श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में यात्रा कर रहे हैं, जो पहले से ही ऐसी बीमारियों से पीड़ित हैं जिनसे कोविड-19 महामारी के दौरान उनके स्वास्थ्य को खतरा बढ़ जाता है। यात्रा के दौरान पूर्वग्रसित बीमारियों से लोगों की मृत्यु होने के कुछ दुर्भाग्यपूर्ण मामले भी सामने आए हैं।

ऐसे पूर्व बीमारीग्रस्त लोगों की सुरक्षा हेतु रेल मंत्रालय, केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश क्र. 40-3/2020-DM -l(A) दि.17.05.2020 के तहत, अपील करता है कि पूर्व बीमारीग्रस्त (जैसे उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, कर्करोग, कम प्रतिरक्षा) वाले व्यक्ति, गर्भवती महिलाएं, 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चे एवं 65 वर्ष से ऊपर के बुजुर्ग अपने स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए, जब तक अत्यंत आवश्यक न हो, रेल यात्रा करने से बचें।

रेल मंत्रालय ने इस अपील में यह भी कहा है कि “हम समझ सकते हैं कि देश के कई नागरिक इस समय यात्रा करना चाहते हैं एवं उनको निर्बाध रूप से रेल सेवा मिलती रहे, इस हेतु भारतीय रेल और इसके सभी कर्मी चौबीसों घंटे, सातों दिन कार्य कर रहे हैं। परंतु यात्रियों की सुरक्षा हमारी सबसे पहली प्राथमिकता है।”

“इसके लिए सभी नागरिकों का यथोचित सहयोग अपेक्षित है। किसी भी कठिनाई या आकस्मिक समस्या होने पर नजदीकी रेलकर्मी से संपर्क करने में हिचकिचाएं नहीं। भारतीय रेल आपकी सेवा में हमेशा की तरह तत्पर है।”

(हेल्प लाइन नंबर – 139 & 138)








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लॉकडाउन खत्म होने के बाद रेलवे स्टेशनों पर उमड़ने वाली प्रचंड भीड़ पर विचार करे रेल प्रशासन

नियम का उल्लंघन करने वाले यात्रियों पर #रेलवे_ऐक्ट के बजाय #आईपीसी के तहत कार्रवाई हो

जैसा कि अब सभी जानते हैं कि #कम्प्लीट_लॉकडाउन के चलते भारतीय रेल द्वारा न सिर्फ यात्री ट्रेनों का संचालन 14 अप्रैल तक पूरी तरह बंद कर दिया गया है, बल्कि 14 अप्रैल, 24 बजे तक सभी प्रकार की रेल टिकटों की बुकिंग भी बंद कर दी गई है। हो सकता है इस बंद को आगे भी बढ़ाया जाए। परंतु एक बात तो तय है कि इस लॉकडाउन के बाद जब भी रेल सेवा बहाल होगी, इस पर यात्रियों का भारी दबाव आएगा।

ज्ञातव्य है कि पूरे समर सीजन की #एडवांस_बुकिंग के साथ #वेटिंग_लिस्ट में भी यात्री टिकटों की भारी संख्या पहले ही बुक की जा चुकी है। यदि बिना किसी तैयारी के रेल सेवाएं बहाल की गईं, तो #रेलसेवा बंद करके देश ने जो भी मजबूत स्थिति कायम की होगी, वह कुछ ही दिनों में प्रचंड भीड़ की वजह से गंवा दी जाएगी।

हम सब ने देखा ही है कि कैसे-कैसे लापरवाह तथा मूर्ख हमारे बीच हैं, जो किसी की परवाह किए बिना बीमारी को अपने साथ लेकर यात्राएं करते रहे और बीमारी यहां से वहां फैलती रही। ऐसे में रेल सेवाएं बहाल करने से पहले रेलवे को पर्याप्त तैयारियां करनी चाहिए, जिससे कोई विषम स्थिति पैदा न हो।

इसके लिए जरूरी होगा कि रेलवे द्वारा लंबी दूरी की गाड़ियों में वर्तमान प्रतिक्षासूची के यात्रियों की सभी टिकटों को स्वतः रद्द कर दिया जाए और केवल उन्हीं यात्रियों को यात्रा की अनुमति दी जाए, जिनके पास कन्फर्म टिकट तथा डॉक्टर का प्रमाण पत्र हो, जिसमें यह प्रमाणित हो कि वे #COVID19 निगेटिव हैं।

इसके साथ ही कुछ समय के लिए एसी3 तथा स्लीपर क्लास की मिडिल बर्थ की बुकिंग को भी निरस्त करना उचित होगा, जो कि #सोशल_डिस्टेंसिंग बनाने में बाधक है। लंबी दूरी की गाड़ियों में #अनारक्षित टिकटों की बुकिंग भी इस दौरान बंद कर देनी चाहिए, जिसके माध्यम से #आरक्षित डिब्बों के यात्रियों की सुरक्षा औ संरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है।

इसके अलावा यात्री ट्रेनों में चलने वाला ऑन बोर्ड टिकट चेकिंग स्टाफ, एसी मैकेनिक, पैंट्रीकार वेंडर्स इत्यादि भी इस खतरे से अछूते नही रहेंगे। इसलिए क्यों न इस लॉक डाउन के खाली समय में इन तैयारियों को सुनिश्चित करने का एक अभियान शुरू किया जाए।

#रेलकर्मी भी अपने-अपने स्तर पर विभिन्न माध्यमों से अपने #सुझाव रेल प्रशासन तक पहुंचाएं कि लॉकडाउन खत्म होने और रेल सेवा बहाल होने पर प्रचंड भीड़ की स्थिति से निपटने के लिए कौन-कौन से तरीके कारगर साबित हो सकते हैं।

जितनी बड़ी संख्या में रेलकर्मियों के ये बहुमूल्य सुझाव #रेल_प्रशासन तक पहुंचेंगे, उन पर अमल भी उतनी ही तत्परता से सुनिश्चित किया जा सकेगा।

उन्हें अपनी बात किसी भी प्रकार से रेल प्रशासन तक पहुचानी है कि रेल सेवाएं बहाल होने से पहले #वेटिंग टिकट या बिना कन्फर्म बर्थ/सीट की यात्रा को बिना किसी शर्त पूरी तरह अवैध घोषित कर दिया जाए।

इसके साथ ही नियम का उल्लंघन करने वाले यात्रियों पर #रेलवे_ऐक्ट के बजाय #आईपीसी के तहत कार्रवाई हो, यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए, क्योंकि बिना खौफ या डर के हम भारतीय किसी नियम-कानून का पालन करना अपनी शान के विपरीत समझते हैं।

अतः यह आवश्यक है कि न सिर्फ उपरोक्त कुछ सुझावों पर विचार किया जाए, बल्कि #लॉकडाउन के इस खाली समय में रेल प्रशासन द्वारा लॉकडाउन खत्म होने के बाद #रेलवे_स्टेशनों पर उमड़ने वाली प्रचंड भीड़ को नियंत्रित करने की तैयारियां भी अभी से सुनिश्चित कर ली जाएं।








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बिलों का भुगतान न होने से कांट्रेक्टर्स में मची है त्राहि-त्राहि, कामकाज ठप

वेस्टर्न रेलवे कांट्रेक्टर्स एसोसिएशन ने डीआरएम/मुंबई सेंट्रल/पश्चिम रेलवे को लिखा पत्र

रेल प्रशासन द्वारा दिसंबर 2019 से रोक दिए गए हैं रेलकर्मियों/अधिकारियों के तमाम भत्ते

रेलवे के तमाम कांट्रेक्टर्स/सप्लायर्स पिछले कुछ महीनों से अत्यधिक परेशान हैं, क्योंकि पिछले कुछ महीनों से उनके बिलों का भुगतान रेल प्रशासन द्वारा नहीं किया जा रहा है। इससे कांट्रेक्टर और सप्लायर न तो अपनी देनदारी चुका पा रहे हैं और न ही अपने कर्मचारियों के वेतन का भुगतान कर पा रहे हैं।

कई कांट्रेक्टरों और सप्लायरों ने कानाफूसी.कॉम को फोन करके अपनी आपबीती सुनाई। उनका कहना था कि कई महीनों से उनके फाइनल बिलों का भुगतान रेलवे ने नहीं किया है। एक सप्लायर ने यह भी कहा कि उसने पिछले साल जुलाई में कुछ मेडिकल इंस्ट्रूमेंट्स की सप्लाई का अपना करीब 35-36 लाख का बिल पश्चिम रेलवे को सब्मिट किया था, जिसका भुगतान आज तक नहीं किया गया है। उक्त सप्लायर का यह भी कहना था कि इतने लंबे समय तक बिल रोककर रखा जाता है, तब भी उस पर रेलवे द्वारा कोई व्याज नहीं दिया जाता है।

उल्लेखनीय है कि प्रत्येक टेंडर या सप्लाई ऑर्डर जारी करने से पहले ही निर्धारित मात्रा में संबंधित अधिकारियों द्वारा अपना कमीशन कांट्रेक्टर या सप्लायर से एडवांस में ले लिया जाता है। तथापि समय पर बिल भुगतान की जिम्मेदारी कोई अधिकारी नहीं लेता है। यही स्थिति टेंडर जारी करने वाले विभाग से लेकर लेखा विभाग तक समान रूप से लागू है। रेल अधिकारियों का सिर्फ एक ही जवाब है कि फंड नहीं है।

उन्होंने बताया कि अब यह हालत है कि कोई अधिकारी काम करने के लिए भी दबाव नहीं बना रहा है, इसके चलते रेलवे के लगभग सभी काम ठप पड़ गए हैं। कांट्रेक्टर्स का यह भी कहना है कि जो काम पूरे हो जाते हैं, और जिनका फाइनल बिल सब्मिट हो जाता है अथवा फाइनल भुगतान भी हो जाता है, उन कार्यों के लिए जमा कराई गई ईएमडी, सिक्योरिटी डिपॉजिट और बैंक गारंटी भी रेलवे द्वारा समय से नहीं लौटाई जाती है। इन्हें लौटाने में भी सालों लगा दिए जाते हैं। यही नहीं, यह वापस लेने के लिए भी कांट्रेक्टर्स और सप्लायर्स को अलग से दस्तूरी देनी पड़ती है।

मुंबई सेंट्रल डिवीजन, पश्चिम रेलवे के तमाम कांट्रेक्टर्स ने तो बाकायदा एक पत्र लिखकर मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) को वर्क एक्जीक्यूशन में आने वाली परेशानियों और लंबे समय से बिलों का भुगतान न होने से अवगत कराया है।

वेस्टर्न रेलवे कांट्रेक्टर्स एसोसिएशन द्वारा डीआरएम, मुंबई सेंट्रल को लिखे गए पत्र में उठाए गए कुछ मुद्दे इस प्रकार हैं-

1. The major issue is scarcity/crises of funds in railway, hence our running bills and final bills are not passed. All the contractors are facing the same problem. As we had entered into the contract, we had to execute the work, for which we have deployed all the resources for progress/completion of work in time but we are unable to make labour/suppliers payments.

2. In many work orders final bills and PVC bills are sended to Accounts or are lying in division but not paid due to scarcity/crises of fund. Maintenance period is also over for some work orders but security deposits (SDs) are not released as bills are not passed. Please release SD in such type of work orders for which final bills/PVC bills are in positive. This is more helpful to us in this type of situation.

3. The final bills and PVC bills which are prepared and submitted to the division office but these bills are long pending (more than 2-3 years) due to sanction of final variation or some other reasons, please give instruction and set a cut of date to clear the bills.

4. In many tenders our contract agreements are not prepared in time, even after submission of PBG, due to this delay our running bills are not passed, hence we are stuck and work is affected.

5. Work orders are issued but site is not handed over/no scope of work/GAD and structural drawings are not available, hence there is no progress, please short close this type of work orders and release our PBG & SD if railway is not interested to carry out the work and handing over site.

6. Too much delay in release of PBG/SD and unsuccessful tenders’ EMD which was submitted online, please release that type of all assets.

वेस्टर्न रेलवे कांट्रेक्टर्स एसोसिएशन द्वारा दिए गए उपरोक्त कारण यह समझने के लिए पर्याप्त से भी ज्यादा पर्याप्त हैं कि रेलवे कांट्रेक्टर और सप्लायर किस कदर परेशान हैं। तथापि उनका यह भी कहना है कि इतना ज्यादा हैरान-परेशान करने के बाद भी जब आधा-अधूरा भुगतान किया जाता है, तो भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी में आकंठ डूबे संबंधित रेल अधिकारी ऐसा दर्शाते हैं जैसे वे उन पर कोई बहुत बड़ा अहसान कर रहे हैं।

एक तरफ कांट्रेक्टर्स और सप्लायर्स के बिलों का भुगतान न होने से उनमें त्राहि-त्राहि मची हुई है, तो दूसरी तरफ मंत्री जी शो-बाजी में व्यस्त हैं। जबकि यह हर साल का एक स्थाई सिलसिला बन गया है। हर साल बजट के चार महीने पहले से ही कांट्रेक्टर/सप्लायर के बिलों और रेलकर्मियों एवं अधिकारियों के भत्तों का भुगतान रोककर रेल प्रशासन जितनी तथाकथित बचत दर्शाने की कोशिश करता है, उससे कई गुना ज्यादा राशि अधिकारियों द्वारा हर साल रिश्वतखोरी में हड़प ली जाती है। यह एक वस्तुस्थिति है।

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अस्तित्व बचाना है तो रेल संगठनों और रेलकर्मियों को स्वत:स्फूर्त खड़ा होना होगा

नेताओं को निजी हित में सार्वजनिक संपत्तियों को बांटने की प्रवृत्ति से बाज आना चाहिए

यदि रेलवे को अधिक उपयोगी और उत्पादनकारी बनाना है, तो सबसे पहले रेलमंत्री उसे बनाया जाना चाहिए, जिसे रेलवे का पर्याप्त ज्ञान भी हो और वह सीधे जनता से चुनकर आया हो, जिससे जनता की सामान्य जरूरतों का उसे भान हो, जैसे स्वास्थ्य मंत्री या विदेश मंत्री को अपने अपने विभागों की जानकारी है।

ट्रेनों को प्राइवेट आपरेटरों से चलाना यदि इतना ही आवश्यक लगता है, तो सरकार को चाहिए कि वह उन्हें कोई एक ऐसा यात्री रूट दे दे, जिस पर वह अपना पूरा इंफ्रास्ट्राक्चर तैयार करके चलाएं, तभी सरकार की नीति और आपरेटर की कार्यक्षमता का सही आकलन किया जा सकेगा।

रेलवे का ट्रैक जो पहले से ही ‘ए’-‘बी’ इत्यादि भागों में बंटा हुआ है, जिसमें अधिकतम गतिसीमा भी पहले से ही 130/160 किमी. निर्धारित है, ऐसे में यह कहना कि अमुक गाड़ी को इस गति से चलाया जायेगा, केवल देश को तथा जनता को बेवकूफ बनाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

इससे तो यह पता चलता है कि या तो मंत्री जी को कुछ पता नहीं है, अथवा उनके अधिकारी उन्हें बेफकूफ बनाने या दिग्भ्रमित करने में सफल हैं, तथा मंत्री जी की इसमें कुछ स्वार्थसिद्धि हो रही है? अतः मंत्री ऐसा हो, जो न सिर्फ ईमानदार हो, बल्कि कर्तव्यनिष्ठ और दूरदृष्टि वाला भी हो। और जिसने अपने जीवन में देश के लिए कुछ खास किया हो तथा उसके अंदर भविष्य में भी कुछ विशेष कर गुजरने की इच्छाशक्ति हो।

यदि सरकार ईमानदारी से रेलवे का उद्धार करना चाहती है, तो उसे अधिकारियों की संख्या को कंट्रोल करना चाहिए और नीचे स्तर पर कार्य करने वाले कर्मचारियों की संख्या को पूर्व मानकों के अनुरूप पुनर्स्थापित करना चाहिए। ठेके पर मजदूरों की नियुक्ति, ठेकेदारों से अमापक काम करवाने, रिटायर्ड कर्मियों का रिएंगेजमेंट, स्थाई कर्मचारियों की छंटनी, सरकारी संस्थानों/विभागों/सेवाओं आदि का निजीकरण इत्यादि से देश में बढ़ती बेरोजगारी की समस्या का समाधान नहीं होने वाला है।

तेजस एक्सप्रेस को चलाने में कुछ विसंगतियां प्रतीत होती हैं, जैसे कि जमीन हमारी, ट्रैक हमारा, स्टेशन हमारे, उन पर स्टाफ हमारा, अनुरक्षण हमारा, गार्ड और ड्राइवर भी हमारे, मगर किराया तय करेगा निजी आपरेटर, यह कहां की, किस तरह की समझदारी और कैसी व्यापारिक नीति है? गंतव्य पर पहुंचने में एक-दो घंटे की देरी पर यात्रियों को 100-200 रुपये का मुआवजा देकर सरकार जन-सामान्य को भिखारी की तरह लाइन में खड़ा करके आखिर कौन सा आदर्श उपस्थित करना चाह रही है?

रेलवे की सभी उत्पादन इकाईयों का एक साथ निगमीकरण करने के बहाने निजीकरण करने के बजाय सरकार किसी एक उत्पादन इकाई को ट्रायल आधार पर किसी कमर्शियल अनुभवी प्राइवेट सेक्टर को देकर पहले निजी क्षेत्र की क्षमता का आकलन करे और उसमें राजनीतिक दखलंदाजी रोककर उनके हिसाब से चलाए। ऐसा करने से भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी, उत्पादन की गुणवत्ता उच्चकोटि की होगी तथा उत्पादन भी अधिक होगा।

सरकार को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आजादी के बाद से देश के विकास में सर्वाधिक योगदान देने वाले सभी बड़े संस्थान सार्वजनिक क्षेत्र के संरक्षण में ही खड़े हो पाए हैं। इस दौरान निजी क्षेत्र सिर्फ अपना मुनाफा कमाने में लगा था।

सिर्फ रेलवे में ही नहीं, बल्कि सभी सरकारी विभागों में शिलान्यास और उद्घाटन की प्रथा पूरी तरह समाप्त होनी चाहिए। इससे जनता की गाढ़ी कमाई से जमा सार्वजनिक राजस्व की बरबादी तो होती ही है, बल्कि इसका कोई लाभ जनता को नहीं मिलता। ऐसे लगभग सभी समारोह सिर्फ नेताओं की वाहवाही के कर्मकांड बनकर रह गए हैं। रेलवे में पहले राजनीतिक हस्तक्षेप शून्य के बराबर था। परंतु पिछले करीब 15-20 सालों में यह बहुत ज्यादा बढ़ गया है। इस कारण से भ्रष्टाचार भी बढ़ता जा रहा है। इसका नतीजा रेलवे की बरबादी के रूप में सामने है।

सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि रेलवे सिर्फ एक परिवहन माध्यम ही नहीं है, बल्कि यह इस देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ के साथ ही सामाजिक और सांस्कृतिक समरसता की एक महत्वपूर्ण नब्ज भी है, जिसे निजी क्षेत्र को सौंपकर कुछ खास हासिल नहीं होगा। विश्व के किसी भी देश में रेलवे का निजीकरण उस देश और उसकी जनता के लिए आजतक फायदेमंद साबित नहीं हुआ है।

यह भी याद रखना चाहिए कि अटलबिहारी बाजपेई सरकार द्वारा वर्ष 2003-04 में रेलवे के जोनों की संख्या बढ़ाना भी रेलवे के लिए नुकसानदेह ही साबित हुआ है। इसके लिए जो हजारों करोड़ रुपये बरबाद किए गए, उस फंड का इस्तेमाल रेलवे की अतिरिक्त क्षमता बढ़ाने में बखूबी किया जा सकता था। अतः राजनीतिक दलों और नेताओं को देश को तोड़ने और सार्वजनिक संपत्तियों का अपने-अपने हितों के अनुरूप बांटने तथा अपनी-अपनी राजनीतिक रियासतें बनाने की प्रवृत्ति से समय रहते बाज आना चाहिए।

अब जहां तक रेलवे के मान्यताप्राप्त संगठनों की बात है, तो उन पर से अधिकांश रेलकर्मियों का भरोसा उठ चुका है। सब खेमेबाजी और कौटुंबिक (कैटेगराइज) हितों की आपसी लड़ाई में गुत्थमगुत्था हैं। उनके ढ़ुलमुल नेतृत्व और नीतियों के चलते उन्हें कहीं न कहीं सरकार द्वारा बड़ी चालाकी से अलग-थलग भी किया गया है, जिससे उन पर कार्मिकों का विश्वास डगमगाया है। शायद यही कारण है कि वह सरकार के साथ कोई बड़ी लड़ाई लड़ने अथवा निर्णायक आंदोलन छेड़ने से हिचकिचा रहे हैं। यदि ऐसा नहीं है तो अब तक वह ऐसे किसी निर्णायक आंदोलन की रूपरेखा लेकर सामने क्यों नहीं आ पाए हैं?

हालांकि इसके लिए सिर्फ मान्यताप्राप्त संगठन ही अकेले दोषी नहीं हैं, बल्कि करीब 12 लाख रेलकर्मी भी दोषी हैं, क्योंकि रेलवे की बरबादी और सरकार की निजीकरण की नीति के खिलाफ उनकी तरफ से भी ऐसा कोई स्वत: स्फूर्त आंदोलन उठ खड़ा नहीं हुआ, जैसा कि बिहार के सासाराम में करीब तीन लाख छात्रों ने कर दिखाया। अभी भी समय है, रेलवे के मान्यताप्राप्त संगठनों और रेलकर्मियों को यदि अपना अस्तित्व बचाए रखना है, तो उन्हें स्वत: स्फूर्त उठ खड़ा होना चाहिए!








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एआईआरएफ सरकार की रेलवे को निजीकरण करने की मंशा कभी पूरी नहीं होने देगी – काम. शिव गोपाल मिश्र

सरकार कर्मचारी यूनियनों को भी समाप्त करने पर तुली है। न यूनियनें रहेंगी और न ही समस्याएं उजागर होंगी। इसके लिए नई नीति बन रही है, जिसमें कर्मचारी संगठन मालिकों के आदेश के बिना हड़ताल की तो बात दूर अपनी बात भी नहीं कह पाएंगे। लेकिन फेडरेशन ऐसा नहीं होना देगा। आंदोलन का बिगुल बज चुका है।

यह बातें आल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन (एआइआरएफ) के महामंत्री शिव गोपाल मिश्र ने कही। वह सोमवार को रेल अधिकारी क्लब परिसर में एनई रेलवे मजदूर यूनियन (नरमू) के 59वें वार्षिक अधिवेशन के खुले सत्र को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। महामंत्री ने सरकार पर सीधे हमला बोला। कहा कि यह सही है कि सरकार अंग्रेजी हुकूमत की तर्ज पर कार्य कर रही है लेकिन इसको लेकर तनिक भी भयभीत होने की जरूरत नहीं है। सुनने में आ रहा है कि रेलवे बोर्ड हड़ताल करने वाले कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाएगा। यूनियन करने वाले 50 हजार कर्मचारियों को जबरन रिटायर्ड कर दिया जाएगा लेकिन यह सही नहीं है। यूनियन से जुड़े 99 फीसद कर्मचारी अपना 100 फीसद कार्य करते हैं। रेल कर्मचारियों के चलते देश में सस्ते कोच और इंजन तैयार हो रहे हैं। ट्रेनें निर्बाध गति से चल रही हैं। कर्मचारी अपनी कुर्बानियां दे रहे हैं। इसके बाद भी सरकार रेलवे को टुकड़े-टुकड़े में निजी हाथों में सौंपना चाहती है, लेकिन फेडरेशन सरकार की मंशा को पूरा नहीं होने देगा।

एआइआरएफ के महामंत्री ने कहा कि कर्मचारियों के कार्य करने के घंटे बढ़ते जा रहे हैं। संरक्षा कोटियों में भी आठ घंटे से अधिक ड्यूटी ली जा रही है। स्टेशनों और कार्यालयों का नव निर्माण हो रहा है। लेकिन कालोनियों की सुध नहीं ली जा रही। इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट फेडरेशन की चेयरपरसन प्रीती सिंह ने अपने उद्बोधन में आंदोलन में युवाओं और महिलाओं को अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने का आह्वान किया। अधिवेशन का संचालन नरमू के अध्यक्ष बसंत लाल चतुर्वेदी ने किया। अध्यक्षता केएल गुप्त ने की। इस मौके पर संयुक्त महामंत्री नवीन कुमार मिश्र, एससीएसटी एसोसिएशन के महामंत्री चंद्रशेखर और मुन्नी लाल आदि मौजूद थे।

नरमू ने निकाला जुलूस, लाल झंडों से रंगा रेलवे परिसर

एनई रेलवे मजदूर यूनियन ने रेलवे स्टेशन से अधिकारी क्लब तक गाजे- बाजे के साथ जुलूस निकाला। कार्यकर्ताओं ने एआइआरएफ और नरमू के पक्ष में जमकर नारेबाजी की। निजीकरण, निगमीकरण व नई पेंशन योजना को लेकर सरकार के विरोध में प्रदर्शन भी किया।

कार्यकर्ताओं ने एआइआरएफ के महामंत्री शिव गोपाल मिश्र और सहायक महामंत्री केएल गुप्त का फूलमालाओं से स्वागत किया। आगे बैंड के साथ घोड़े चल रहे थे, पीछे खुली जीप में पदाधिकारी कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा रहे थे। स्टेशन और मुख्यालय परिसर लाल झंडों से रंग गया था।

आल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन (एआइआरएफ) के महामंत्री शिव गोपाल मिश्र ने कहा कि रेलवे बोर्ड ही नहीं सरकार भी झूठा प्रचार कर रही है कि देश की पहली कॉरपोरेट एक्सप्रेस तेजस 70 लाख के फायदे में है। लोगों को भ्रमित किया जा रहा है। जबकि यह ट्रेन पूरी तरह से घाटे में चल रही है। इसके बाद भी रेलवे बोर्ड ने 150 प्राइवेट ट्रेन और 50 स्टेशनों को निजी हाथों में देने की योजना तैयार कर ली है।

फेडरेशन सरकार की मंशा सफल नहीं होने देगा। ट्रेनों और स्टेशनों को बेचने नहीं देगा। महामंत्री सोमवार को रेलवे अधिकारी क्लब में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। एनई रेलवे मजदूर यूनियन के 59वें वार्षिक अधिवेशन में बतौर मुख्य अतिथि भाग लेने आए शिव गोपाल मिश्र ने कहा कि न रेलवे का निजीकरण होगा और न ही निगमीकरण। सरकार ने मजबूर किया तो हड़ताल होगा। एक साथ देशभर में भारतीय रेलवे का चक्का जाम हो जाएगा। रेलवे में निजीकरण, निगमीकरण, नई पेंशन योजना, खाली होते रिक्त पद और कर्मचारियों के बढ़ते कार्य की अवधि बड़ी चुनौती बनती जा रही है। चेन्नई में आयोजित एआइआरएफ के अधिवेशन में लड़ाई की रणनीति पर मुहर लग चुकी है। फेडरेशन देश भर के श्रमिक और कर्मचारी संगठनों को एक मंच पर लाने का कार्य करेगा। कर्मचारी संगठन ही नहीं रेल उपभोक्ताओं को भी आंदोलन से जोड़ा जाएगा। क्योंकि अब यह आंदोलन फेडरेशन और रेल कर्मचारियों का ही नहीं आम जन का मुद्दा बन गया है। सेंट्रल ट्रेड यूनियन ने पुरानी पेंशन योजना की बहाली को लेकर बजट सत्र में आठ जनवरी को संसद पर प्रदर्शन करने का निर्णय लिया है।

’>>अंग्रेजी हुकूमत की तर्ज पर चल रही वर्तमान सरकार

’ भयभीत होने की जरूरत नहीं, बज चुका है आंदोलन का बिगुल

पेंशन बंद होने से छह लाख से अधिक युवाओं का भविष्य अंधकार में है। फेडरेशन भी संसद सहित देशभर में आंदोलन करेगा। निजीकरण, निगमीकरण पर अंकुश लगाने तथा पुरानी पेंशन योजना की बहाली पर सरकार नहीं मानी तो फेडरेशन बजट सत्र में ही हड़ताल की घोषणा भी कर देगा। लेकिन हड़ताल को राजनीतिक रंग नहीं देगा।

शिव गोपाल मिश्र, महामंत्री, एआइआरएफ





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