अक्षम रेलकर्मियों के मरने के लिए लावारिस छोड़ देता है रेल प्रशासन – RailSamachar

मामलों को सालों-साल लटकाकर अक्षम रेलकर्मियों को मरने के लिए अकेला छोड़ देना अत्यंत अमानवीय कृत्य है!

खबर है कि मध्य रेलवे में मेडिकल इनवैलीडेशन के बहुत से मामले लंबे समय से पेंडिंग हैं। इसके लिए प्रिंसिपल सीएमडी, मध्य रेलवे द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है। यह पीसीएमडी की अकर्मण्यता है या लापरवाही? यह पूछ रहे हैं मेडिकली काम करने में अक्षम हो चुके रेलकर्मियों के तमाम परिजन।

बताते हैं कि पूरी भारतीय रेल में इस तरह के सैकड़ों-हजारों केस लंबित हैं। परिजनों के सामने उनके मरने की प्रतीक्षा करने के सिवा कोई विकल्प नहीं है।

उनका कहना है कि अपने एकमात्र कमाऊ व्यक्ति को मरते हुए देखना बहुत अमानवीय है, परंतु उनके सामने अन्य कोई विकल्प नहीं बचा है। आर्थिक रूप से भी ऐसे सभी परिवार बुरी तरह टूट चुके हैं।

इस मामले में जानकारों का कहना है कि रेल प्रशासन को वैसे भी संबंधित रेलकर्मी के किसी न किसी परिजन को अनुकंपा नियुक्ति देनी है। ऐसे में अगर लंबे समय से असाध्य बीमारियों के चलते कर्मचारी काम करने में अक्षम और अयोग्य हो चुका है, तो मेडिकली इनवैलीड सर्टिफाई करके और उसके किसी परिजन को अनुकंपा नियुक्ति देकर उसके परिवार को आर्थिक रूप से कंगाल होने से बचाया जा सकता है।

उनका कहना है कि जब उनको नियमानुसार अनुकंपा नियुक्ति देनी ही है, तो रेलकर्मी के मरने का इंतजार किए बिना भी यह काम बहुत आसानी से और मानवता के आधार पर समय रहते किया जाना चाहिए।

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तीन दशक बाद भी कायम है विडंबनापूर्ण स्थिति – RailSamachar

वर्तमान समय में प्रत्येक केंद्रीय/रेल कर्मचारी का कम से कम एक करोड़ का सामूहिक बीमा होना चाहिए, ताकि उनकी समाजिक सुरक्षा का उद्देश्य वास्तव में पूरा हो सके!

1989 के दौर में CGEGIS की मद में केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन से ₹30 प्रति माह कटते थे और केंद्रीय/रेलकर्मियों को ₹30000 का सामूहिक बीमा मिला करता था।

तीन दशक बीत जाने के बाद आज 2021 में भी यही स्थिति लगातार बनी हुई है।

₹30000 तो महीने के बारहवें दिन से पहले ही खत्म हो जाते हैं। इस राशि से रेल कर्मचारियों के परिवारों की सामाजिक सुरक्षा सोचना कितना दयनीय है।

आज जहां एक तरफ ₹330 प्रति वर्ष के निवेश पर प्रधानमंत्री जीवन ज्योति योजना में 2 लाख का सामूहिक बीमा मिलता है, वहीं ₹360 के निवेश पर CGEGIS में ₹30000 की आर्थिक सुरक्षा। क्या विचित्र स्थिति है।

आज जब ढ़ेरों निजी और सरकारी बीमा कंपनियां बाजार में उपलब्ध हैं और रेलवे के लगभग 12 लाख कर्मचारी हैं, तो कोई भी बीमा कंपनी इतने बड़े समूह को बहुत कम प्रीमियम पर अच्छी बीमा राशि (Sum assured) का लाभ आसानी से दे सकती है।

और यदि CGEGIS की भांति सारे केंद्रीय कर्मचारियों का सामूहिक बीमा करवाया जाए, तो और भी कम प्रीमियम पर अधिक बीमा राशि का लाभ सभी रेल कर्मचारियों/केंद्रीय कर्मचारियों को मिल सकता है।

वर्तमान समय में प्रत्येक केंद्रीय कर्मचारी का कम से कम एक करोड़ का सामूहिक बीमा होना चाहिए, ताकि उनकी समाजिक सुरक्षा का उद्देश्य वास्तव में पूरा हो सके।

इस कदम से न केवल केंद्रीय कर्मचारी अपने परिवारों की सुरक्षा के प्रति आश्वस्त हो पाएंगे, बल्कि पारिवारिक सुरक्षा की मद पर व्यक्तिगत बीमा के मंहगे प्रीमियम की भी उनकी बचत हो सकती है।

ऐसा “रेल समाचार” का मानना है!

#CGEGIS #CentralGovernmentEmployees #IndianRailway #RailwayBoard #PMOIndia





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इलेक्ट्रिक शेड में बदल रहा है झांसी डीजल शेड – RailSamachar

झांसी डीजल लोको शेड ने राष्ट्र की सेवा में दिए हैं 46 गौरवशाली वर्ष

प्रयागराज ब्यूरो: भारतीय रेल को विश्व की प्रमुख हरित रेल बनाने के मिशन में उत्तर मध्य रेलवे अपने पूरे परिक्षेत्र का विद्युतीकरण करने की ओर अग्रसर है। इसी परिप्रेक्ष्य में झांसी स्थित डीजल लोको शेड को इलेक्ट्रिक लोको शेड में परिवर्तित करने की परिकल्पना की गई है।

भारतीय रेल द्वारा विद्युतीकरण में वृद्धि के साथ, जितनी संख्या में विद्युत इंजनों का उत्पादन बढ़ाया जा रहा है, उतनी ही संख्या में डीजल इंजनों को सेवा से हटाया जा रहा है। यह स्वाभाविक रूप से डीजल लोको शेड को इलेक्ट्रिक शेड में बदलने की आवश्यकता पैदा हो रही है।

डीजल लोको शेड झांसी उत्तर मध्य रेलवे का एकमात्र प्रमुख डीजल लोको शेड है, जो मेल/एक्सप्रेस, यात्री, माल और शंटिंग सेवाओं की यातायात आवश्यकताओं को पूरा करता है। झांसी डीजल लोको शेड ने राष्ट्र की सेवा में 46 गौरवशाली वर्ष पूरे कर लिए हैं।

वर्तमान में यह शेड 28 डब्ल्यूएजी-7 इलेक्ट्रिक लोको के अलावा 74 एल्को लोको, 13 शंटिंग लोको और 32 एचएचपी लोको का रखरखाव करता है।

यहां एक 140 टन बीडी क्रेन, दुर्घटना राहत ट्रेन और झांसी में तैनात दुर्घटना राहत चिकित्सा वैन का अनुरक्षण भी किया जाता है। यह शेड रनिंग स्टाफ के लिए भी 100 प्रशिक्षुओं के लिए चार कक्षाओं और 80 बिस्तरों वाले छात्रावास के साथ एक कक्षा प्रशिक्षण प्रदान करता है।

डीजल से इलेक्ट्रिक में लोको शेड का रूपांतरण एक क्रमिक चरणबद्ध प्रक्रिया है, जिसकी शुरूआत पिछले साल जुलाई 2020 में पहले ही शुरू किया जा चुकी है। ओएचई परीक्षण सुविधा, परीक्षण शेड से ट्रिप शेड तक ओएचई बिछाने, पटरियों को ऊपर उठाने आदि जैसी अतिरिक्त सुविधाओं के प्रावधान के साथ तीन चरणों में रूपांतरण की योजना बनाई गई है।

परिकल्पना यह की गई है कि मार्च 2021 में 25 इलेक्ट्रिक इंजनों की तुलना में मार्च 2024 तक इस शेड की इलेक्ट्रिक लोको होल्डिंग क्षमता 100 तक बढ़ जाएगी। वर्तमान में डीजल इंजनों की होल्डिंग फ्रेट और कोचिंग सेवाओं के लिए क्रमशः 64 और 37 है, जो कि फ्रेट इंजनों के लिए घटकर 17 हो जाएगी। जबकि मार्च 2024 तक कोचिंग सेवाओं के लिए कोई डीजल लोकोमोटिव नहीं रहेगा। डीजल इंजन केवल शंटिंग के लिए और आपात स्थिति के लिए ही रहेंगे।

पीपीटी को एक वीडियो कांफ्रेंसिंग में प्रस्तुत करते हुए, उ.म.रे. के मुख्य मोटिव पावर इंजीनियर अनिल द्विवेदी ने बताया कि इस रूपांतरण अभ्यास की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह है कि लोको शेड के समग्र लेआउट में कोई बड़ा बदलाव नहीं हो रहा है और जनशक्ति का सर्वोत्तम उपयोग किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि शेड में अधिकांश कर्मचारी इलेक्ट्रिक और डीजल दोनों सेवाओं के लिए समान रहेंगे जिससे पूरी योजना में किफायत आएगी।

श्री द्विवेदी ने आगे बताया कि विद्युत इंजनों के अनुरक्षण हेतु पर्यवेक्षकों, टेक्नीशियनों एवं अन्य ग्रुप डी स्टाफ सहित मैनपावर की वर्तमान आवश्यकता को पहले ही प्रशिक्षित किया जा चुका है। इस प्रकार अगले तीन वर्षों के लिए किसी अतिरिक्त जनशक्ति की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से मौजूदा कर्मचारियों की क्षमता का निर्माण किया जा रहा है।

महाप्रबंधक/उ.म.रे. विनय कुमार त्रिपाठी ने कहा कि रेलवे को अधिक कुशल, आर्थिक और पर्यावरण के अनुकूल परिवहन साधन बनाने के लिए पूरी भारतीय रेल में एक एकीकृत योजना बनाई जा रही है। जैसे-जैसे एसी इंजनों की संख्या बढ़ेगी, हम इन लोकोमोटिव्स को त्वरित और सर्वोत्तम रखरखाव प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

वीडियो कांफ्रेंस में उ.म.रे. के अपर महाप्रबंधक रंजन यादव, प्रमुख मुख्य विद्युत अभियंता सतीश कोठारी, मंडल रेल प्रबंधक, झांसी संदीप माथुर सहित झाँसी मंडल के सभी संबंधित अधिकारी उपस्थित थे।

#NCR #NorthCentralRailway #Jhansi #LocoShed





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जिसे निज देश, निज भाषा और निज गौरव का अभिमान नहीं!वह नर नहीं, नरपशु निरा, और मृतक समान है!!

“काबिलियत” नहीं – “योग्यता”। “इंसान” नहीं – “आदमी”, “मनुष्य”। “इंसानियत” नहीं – “मानवता”, “मानवीयता”

सुरेश त्रिपाठी

जिस प्रकार “काबिलियत” का शाब्दिक या भाषिक कोई अर्थ नहीं निकलता। उसी प्रकार “इंसान” और “इंसानियत” शब्दों के साथ भी है। यह केवल आभासी हैं, जो केवल आभास देते हैं। जबकि “योग्यता”, “योग्य” से बना शब्द है, जो “योग्य” है, वही “योग्यता” को धारण करता है। “काब” का कोई अर्थ नहीं निकलता, इसलिए उससे बने “काबिलियत” शब्द का भी कोई अर्थ नहीं है! यह केवल आभासी है।

हम और हमारी भाषा क्या इतने दरिद्र हो गए हैं कि अपने दैनंदिन बोलचाल और कार्य-व्यवहार में उर्दू, अरबी, फारसी, अंग्रेजी के निरर्थक शब्दों का घालमेल कर रहे हैं? अथवा जाने-अनजाने उनका उपयोग करके हम क्या स्वयं को ज्यादा जानकार, योग्य या श्रेष्ठ बताने-जताने का प्रयत्न करते हैं?

माना कि शब्दों के आदान-प्रदान से भाषाएं समृद्ध होती हैं, पर क्या हमारी भाषा इतनी दरिद्र है कि हम उसके लिए दूसरी भाषाओं के निरर्थक शब्दों का आयात करें?

हिंदी स्वयं में एक अत्यंत समृद्ध भाषा है। किसी अन्य भाषा के शब्दों को उधार लिए बिना हम अपने आपको हिंदी बहुत सरलता से व्यक्त कर सकते हैं। इसके हर तात्विक शब्द के कई-कई पर्यायवाची उपलब्ध हैं। इसके अलावा दुनिया की लगभग सभी भाषाओं की जननी “संस्कृत” हमारी वैदिक, ऐतिहासिक धरोहर भी हमारे पास सुरक्षित है। तथापि अगर हमें नए शब्दों की आवश्यकता है, तो उन्हें गढ़ा जाना चाहिए अथवा उनकी खोज संस्कृत में की जानी चाहिए।

स्मरण रहे, जो व्यक्ति अथवा समाज उधार पर जीवनयापन करता है, वह ज्यादा समय तक जीवित नहीं रहता। इसी प्रकार जो भाषा उधार के शब्दों पर अवलंबित हो जाती है, उसका अस्तित्व शीघ्र समाप्त हो जाता है। अतः हमें अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी के उन शब्दों का प्रयोग-उपयोग करने से भरसक बचना चाहिए, जिनके अर्थ वास्तव में हमें ज्ञात नहीं होते हैं।

जिसे निज देश, निज भाषा और निज गौरव का अभिमान नहीं! वह नर नहीं, नरपशु निरा, और मृतक समान है!!





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यदि एक बार में महंगाई भत्ता देने में मुश्किलें आ रहीं हैं तो इसे किश्तों में भी दिया जा सकता है -शिवगोपाल मिश्रा

महंगाई भत्ता: थोड़ी लंबी हो सकती है केंद्रीय कर्मियों की प्रतीक्षा, डीए पर होने वाली समिति की बैठक एक बार फिर टली

केंद्रीय कर्मचारियों को 1 जुलाई, 2021 से महंगाई भत्ता (डीए) फिर से देने की घोषणा केंद्र सरकार ने की थी। सातवें वेतन आयोग से जुड़ी समस्याओं को लेकर नेशनल काउंसिल ऑफ ज्वाइंट कंसल्टेटिव मशीनरी (एनसी-जेसीएम) के पदाधिकारी और डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेंनिग (डीओपीटी) तथा वित्त मंत्रालय के अधिकारी लगातार संपर्क में बने हुए हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार मई के अंत में इन सभी संस्थाओं के बीच बातचीत होनी थी, लेकिन कोरोना के कारण अब यह बैठक जून के तीसरे सप्ताह में होने की संभावना है। बैठक टलने के बाद अब कर्मचारियों की प्रतीक्षा अब थोड़ी लंबी हो सकती है।

बताते हैं कि महंगाई भत्ते से जुड़ी समस्याओं को लेकर एनसी-जेसीएम के पदाधिकारी, डीओपीटी और वित्त मंत्रालय के अधिकारियों की बैठक 8 मई को भी होनी थी जो टल गई और उसके बाद मई अंत में बैठक का फैसला किया गया था। अब वह बैठक भी टल जाने से महंगाई भत्ते पर अंतिम निर्णय होने में और देर होने की आशंका है।

एनसी-जेसीएम स्टाफ साइड के सेक्रेटरी शिवगोपाल मिश्रा का कहना है कि कोरोना के मौजूदा हालात में महंगाई भत्ते पर बैठक टलने को नकारात्मक रूप में लेने की जरूरत नहीं है। उनका कहना है कि एनसी-जेसीएम स्टाफ साइड ने सरकार को यह सुझाव दिया है कि यदि एक बार में महंगाई भत्ता देने में मुश्किलें आ रहीं हैं तो इसे किश्तों में भी दिया जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार 1 जुलाई से महंगाई भत्ता दिया जाना था। इसमें पिछली तीन किश्तों – 01.01.2020, 01.07.2020, 01.01.2021 – का बकाया भी शामिल है। केंद्रीय कर्मचारियों के लिए यह मामला वर्तमान में सबसे बड़ी चर्चा का विषय है। किस्तों पर फिलहाल कोई निर्णय न होने का असर उनके एरियर पर भी पड़ेगा।

#NC_JCM #DearnessAllowance





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संवेदनशील पदों पर लंबे समय से बैठे हैं लेखाकर्मी – RailSamachar

फील्ड स्टाफ से ऑफिस स्टाफ की अदला-बदली करके भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जाए

एक ही कार्यालय में कुर्सियों की अदला-बदली करके स्टाफ को भ्रष्टाचार करने से रोकना अत्यंत मुश्किल है! निर्धारित समय पर आवधिक स्थानांतरण सुनिश्चित किए जाएं! इसमें रेल संगठनों के हस्तक्षेप को सरकारी काम में बाधा डालने के अपराध के समकक्ष माना जाए!

पश्चिम रेलवे के एफए एंड सीएओ (एस एंड सी) ऑफिस, चर्चगेट, मुंबई में अधिकांश लेखा स्टाफ लंबे समय से संवेदनशील पदों पर विराजमान है। जो लेखा कर्मचारी संवेदनशील पदों पर हैं, उनको 4 साल से भी ऊपर हो गए हैं।

इसमें कांट्रैक्टर्स के बिल पास करने और फाइनेंस सेक्शन में सारे प्रस्तावों की वेटिंग करने वाले कर्मचारी अपनी जगह पर लंबे समय से जमे हुए हैं।

इनके साथ ऑफिसर भी मिले हुए हैं। इसीलिए उनका निर्धारित समय पर आवधिक स्थानांतरण (पीरियोडिकल ट्रांसफर) नहीं किया जाता है। इसके अलावा जो एक्जीक्यूटिव ऑफिस में हैं, उनका भी यही हाल है।

बताते हैं कि पश्चिम रेलवे एकाउंट्स ऑफिस में भ्रष्टाचार इतना ज्यादा बढ़ गया है कि जिनके घरों में फेमिली के लोग कोरोना संक्रमित हैं, लेकिन वह ऑफिस में बिल पास करने आ जाते हैं। इसके लिए उन पर दबाव तो डाला ही जाता है, लेकिन इसमें कमीशन के लिए उनका भी हित जुड़ा होता है।

जानकारों का कहना है कि कांट्रैक्टर को अपने पेमेंट से मतलब होता है, चाहे जिसे कोरोना हो या न हो। इसके लिए वर्क्स एकाउंटेंट्स की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि बिल पास करवाने में उसकी मुख्य भूमिका होती है।

उनका कहना है कि इसी वजह से पश्चिम रेलवे के एकाउंट्स ऑफिस में भी कोरोना का कहर सतत जारी है। जानकारों का कहना है कि बीएमसी और रेल प्रशासन को ऐसी गतिविधियां करने वालों को अविलंब रोकना चाहिए।

उनका यह भी कहना है कि भ्रष्टाचार को रोकने के लिए न्यूनतम स्तर पर यही किया जा सकता है कि एक ही कार्यालय में कार्यरत कार्मिकों की आपस में कुर्सियां बदलने के बजाय फील्ड स्टाफ से ऑफिस स्टाफ की अदला-बदली की जानी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि सभी रेलों में जोनल एवं मंडल मुख्यालयों में कार्यरत सभी राजपत्रित एवं अराजपत्रित कर्मचारियों के आवधिक स्थानांतरण सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सीनियर डिप्टी जनरल मैनेजर एवं चीफ विजिलेंस ऑफीसर (एसडीजीएम/सीवीओ) की होती है, जो कि वे उचित तरीके से नहीं निभा पाते हैं, क्योंकि उन्हें रेल आवास आवंटित करने जैसे फालतू काम सौंपे गए हैं, जो कि कोई एडीजीएम स्तर का अधिकारी भी कर सकता है।

उन्होंने बताया कि “They work as they wish“ शीर्षक के अंतर्गत 1 मार्च 2021 को कानाफूसी.कॉम द्वारा प्रकाशित खबर का संज्ञान लेते हुए पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक आलोक कंसल ने उक्त विषय जांच और कार्रवाई के लिए विजिलेंस को सौंपा था, परंतु विजिलेंस ने अब तक उस पर क्या कदम उठाया, यह किसी को भी पता नहीं है।

उन्होंने कहा कि “जबकि सर्वप्रथम जिन लेखाकर्मियों का ट्रांसफर होने के बाद भी वे न सिर्फ पुराने पदों पर ही कार्यरत हैं, बल्कि दूसरों को आवंटित कार्य भी उन्होंने अपने खाते में जुड़वा लिया था, उन्हें तत्काल वहां से हटाने के बाद निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की जानी चाहिए थी। चूंकि विजिलेंस द्वारा ऐसा कुछ नहीं किया गया, इसलिए उक्त पदों पर बैठे लेखाकर्मी बदस्तूर भ्रष्टाचार और बिल पासिंग में लगे हुए हैं।

उन्होंने जीएम आलोक कंसल से अपेक्षा की है कि वे उपरोक्त विषय पर तुरंत संज्ञान लेकर यथाशीघ्र उचित कार्रवाई सुनिश्चित करें।

#WesternRailway #Accounts #GMWR #IndianRailway #RailMinIndia #CVCIndia 





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अनजान हैं रेलमंत्री और सीआरबी या.. – RailSamachar

रेलवे को बदनाम करने के पीछे क्या है रेलमंत्री और सीआरबी का उद्देश्य?

सुरेश त्रिपाठी

एडहॉक रेलमंत्री की मनमानी अथवा रेलवे एवं रेलकार्मिकों के साथ उनके द्वारा किया जा रहा सौतेला व्यवहार और री-एंगेज्ड सीआरबी की अनभिज्ञता या हुक्म के गुलामों जैसी कार्यशैली के चलते रेल अधिकारियों की वर्षों से चली आ रही एकमात्र आवश्यक एवं निहायत जरूरी सुविधा – टेलीफोन सहायक कम डाक खलासी (टीएडीके) – पर रेलमंत्री/रेल प्रशासन के साथ हो रहे अनावश्यक तथा गैरजरूरी विवाद को रेलवे को बदनाम करने की एक नई कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।

इस अनावश्यक विवाद के चलते – जिसे फुल बोर्ड द्वारा तत्काल हल किया जा सकता था – न सिर्फ सभी रेल अधिकारी बुरी तरह उद्विग्न और हतोत्साहित हुए हैं, बल्कि अब वह सब इस मुद्दे पर एकजुट भी हो चुके हैं और कुछेक पूर्वाग्रहियों को छोड़कर सभी रेलकर्मी भी उनके साथ हो गए हैं, क्योंकि रेलमंत्री और सीआरबी ने अपनी उच्छ्रंखल एवं अनभिज्ञतापूर्ण कार्यशैली से रेलवे की इस पूरी वर्कफोर्स को बहुत बुरी तरह से निराश किया है। इसी के परिणामस्वरूप अधिकारियों के सभी जोनल संगठनों ने तत्काल अपने ज्ञापन रेलमंत्री और सीआरबी को प्रेषित किया है, जिसका जवाब अब दोनों से देते नहीं बन रहा है।

सीआरबी “वीकेन यादव” – जिन्होंने ज्यादातर समय रेलवे से बाहर रहकर भी इस सुविधा का भरपूर उपयोग किया – और वह भी जो आज सेमी-जूडीसियल पद पर बैठकर इस पर सवाल उठा रहे हैं – ने भी रेलवे में रहते हुए जिंदगी भर इसका भरपूर लाभ/लुत्फ उठाया – उनसे यह सवाल पूछा जाना जरूरी है कि रेलवे से रिटायर होते ही उन्हें अचानक वह बोधिवृक्ष कहां मिल गया, जिसके नीचे पहुंचते ही उन्हें यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि यह सुविधा अनावश्यक या लक्जरी है? उन्हें रेलवे में रहते और अब मास्टरी झाड़ते यह ज्ञान क्यों नहीं मिला कि रेलवे में दोहरी व्यवस्था भी चल रही है? क्या उससे इन सब – रेलमंत्री, सीआरबी और तथाकथित सेमी-जूडीसियल मेंबर – को इसलिए भय है कि वह आईपीएस से संबंधित है और आईपीएस जब चाहे तब उनकी जड़ें खोद सकता है, अतः उसकी किसी बात पर कोई सवाल नहीं उठाना है?

रेलमंत्री और सीआरबी देखें आरपीएफ मैनुअल

सीआरबी और रेलमंत्री को शायद ये नहीं पता है कि उन्हीं के मातहत आरपीएफ में इंस्पेक्टर (आईपीएफ) से लेकर हर ऑफिसर को ऑफीसियली सिक्योरिटी – ऐडी/फॉलोअर, हमराह – रखने का प्रावधान है, जो हर वक्त उसके साथ रहता है और उसके ऑफीसियल जूरिस्डिक्शन में जो काम है वह टीएडीके के काम के ही समान रखा गया है या उससे मिलता-जुलता है। इसके साथ ही उसे व्यक्तिगत सुरक्षा से भी जोड़ दिया गया है।

रेलमंत्री और सीआरबी कृपया देखें आरपीएफ मैनुअल, 1987 का रूल नंबर 271.2 और 271.3, जो सिक्योरिटी ऐडी के एंटाइटलमेंट और ड्यूटी लिस्ट को डिफाइन करता है। लेकिन हकीकत में यह सिक्योरिटी ऐडी, टीएडीके ही है और टीएडीके की तरह ही काम करता है।

आरपीएफ में इस सुविधा का एंटाइटलमेंट इंस्पेक्टर (आईपीएफ) लेवल से ही प्राप्त होना शुरू हो जाता है। एक आईपीएफ, जिसे कंपनी कमांडर भी कहा जाता है, वह अपने साथ अधिकृत रूप से एक ऑफिस ऐडी रखने के लिए अधिकृत (एंटाइटल्ड) है।

वस्तुत: किसको है सिक्योरिटी ऐडी रखने का अधिकार

जबकि वस्तुतः सिक्योरिटी ऐडी की आवश्यकता तो दुर्गम और जोखिम भरी परिस्थितियों में रेल का परिचालन, संरक्षा, आमदनी और रख-रखाव से जुड़े  लोगों को है और इनको सिक्योरिटी ऐडी या वैयक्तिक सहायक की आधिकारिक एंटाइटलमेंट होनी चाहिए, जैसे – जान जोखिम में डालकर रेल को चलाने वाले पीडब्ल्यूआई (एसएसई)/पीवे/वर्क्स/सिग्नल/टेली, इलेक्ट्रिकल, टीआई आदि और पैसा कमाकर देने वाले सीजीएस, सीपीएस, सीएमआई, सीटीआई इत्यादि। जबकि इसके उलट ये बेचारे अगर बीमार होने पर भी किसी रेलकर्मी से अपना कोई काम कराते विजिलेंस की पकड़ में आ गए तो सीधे मैनपावर के दुरुपयोग के चार्ज में इन्हें मेजर पेनाल्टी मिलना तय होता है।

और फिर सुपरवाइजर ही क्यों, कोई जूनियर या सीनियर स्केल तो छोड़िए, दूसरे किसी भी विभाग के अधिकारी, फिर चाहे वह किसी भी लेवल का हो, अगर टीएडीके के अलावा किसी और से अपना ब्रीफकेस भी उठवा लेता है, तो चूंकि वह आईपीएफ के बराबर भी ऑफीसियली एक ऐडी रखने के लिए अधिकृत नहीं है, तो फिर उस अपराध के लिए उसके खिलाफ कंप्लेंटबाजी भी हो सकती है, यूनियनें भी इसे मुद्दा भी बना सकती हैं और शिकायत पर विजिलेंस तो इसे ऑफीसियल पोजीशन के दुरुपयोग का केस बनाता ही है।

रेलवे की सबसे बड़ी विडंबना यह रही है कि जो काम करने वाले और पैसा कमाकर देने वाले डिपार्टमेंट हैं, उन्हें सबसे ज्यादा आपसी रंजिश और खींच-तान में एक-दूसरे को बदनाम करने तथा नीचा दिखाने में अपनी एनर्जी जाया करते देखा जाता है। जबकि 10% मामलों को छोड़कर 90% मामलों में सभी लोगों ने ईमानदारी से रेल हित को ध्यान में रखकर काम किया। लेकिन कुछेक सभी डिपार्टमेंट में मौजूद 10% नकारात्मक, दंभी, अति महत्वाकांक्षी, तिकड़मबाज, भ्रष्ट लोगों का नैरेटिव इतना प्रभावी हुआ कि 90% ईमानदार और रेल हित को सर्वोपरि मानकर काम करने वाले लोगों के काम पर पानी फिर गया।

इतना ही नहीं, एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में ये सभी फ्रंटलाइन डिपार्टमेंट दूसरे-तीसरे की जरूरी सुविधाएं काटते गए या कटवाते गए। इन लोगों ने अपनी सारी ऊर्जा इसी में लगा दी, जिसकी परिणति आज रेल में मचा घोर विभागवाद यानि डिपार्टमेंटलिज्म है। हर मामले में अपनी स्थिति सबसे ज्यादा सुदृढ़ करने में चुपचाप इसका सबसे बेहतर फायदा, मंत्री के अलावा, आरपीएफ जैसे डिपार्टमेंट ने उठाया है।

कोर ऐक्टिविटी से जुड़े विभाग भले ही लड़ें-मरें, एक दूसरे को नीचा दिखाएं, लेकिन उनकी मजबूरी है कि वह अपना काम नहीं छोड़ सकते। छोड़ेंगे तो उनके घर का ही नहीं, देश के घरों का चूल्हा जलना बंद हो जाएगा। एक तरफ जहां ये लोग एक-दूसरे की उपलब्धि को मान्य (रिकग्नाइज) करने की जगह एक-दूसरे को खत्म करने की हद तक नीचा और अनावश्यक दिखाने के लिए नए-नए तरीके प्रयोग कर रहे थे, तो वहीं दूसरी तरफ जो नॉन-कोर एक्टीविटी और बैक एंड सपोर्ट देने वाले विभागों ने बिना काम किए इन फ्रंटलाइन विभागों के अच्छे कामों का श्रेय कैसे लिया जाता है, उस आर्ट में महारत हासिल कर ली। इस दौर में इन्होंने अपनी विघ्न पैदा करने की प्रतिघाती शक्ति (nuisance value) और सुविधा भी खुब बढ़ाई। यही वह फाल्ट लाइन है, जा किसी विजनरी रेलमंत्री को पकड़नी चाहिए थी, जिसमें रेल के सारे मर्ज की दवा छुपी थी। परंतु दुर्भाग्यवश रेलमंत्री की प्राथमिकताएं रेल का सुदृढ़ीकरण करना नहीं, बल्कि इसका बंटाधार करने वाली साबित हो रही हैं।

रेलमंत्री को चाहिए था कि कोर/फ्रंटलाइन विभागों के 90% ईमानदार, मेहनतकश तथा हाशिये पर चले गए लोगों और उनके काम को मान्यता देते, आवश्यक एवं उत्पादक जगहों पर उनको दायित्व सौंपते, रेल के मुख्य ऑब्जेक्टिव्स और गोल्स के हिसाब से परिणाम देने वाले डिपार्टमेंट्स को नीति निर्धारण में वरीयता, महत्त्व और इनसेंटिव प्रदान करते, तब शायद “टका सेर खाजा, टका सेर भाजा” वाली रेलवे की वर्तमान स्थिति नहीं होती।

यही नहीं, सिर्फ इतना करने से ही आज भी भारतीय रेल और इसके कर्मचारी-अधिकारी इतनी कूव्वत तो रखते हैं कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था को अकेले चमका दें। लेकिन दुर्भाग्य है कि इस देश को और रेल को ऐसा नेतृत्व इस दौर में भी नहीं मिल सका।

डीआरएम/जीएम को भी नहीं है आरपीएफ के अदने अधिकारी जैसा अधिकार

अब आईए एएससी पर एक नजर डालते हैं। एक एएससी ऑफीसियली दो वैयक्तिक सहायक (पर्सनल ऐडी) रखने के लिए अधिकृत है और ये विशेषाधिकार बाकी गर्दभों/खच्चरों की तरह काम करने वाले रेलवे के अन्य सभी ग्रेड के सिविल, मैकेनिकल, ट्रैफिक, पर्सनल, एकाउंट्स आदि विभागीय अधिकारियों और डॉक्टरों के पास तो नहीं ही है, डीआरएम, जीएम और सीआरबी एवं रेलमंत्री के पास भी यह विशेषाधिकार नहीं है।

डीआरएम, जीएम और सीआरबी के पास भी आरपीएफ के जो एक दो लोग होते हैं, वह कमांडेंट/पीसीएससी के “प्लेजर/डिस्प्लेजर” पर ही रहते हैं, क्योंकि इसमें चॉइस न डीआरएम की चलती है, न जीएम की, न सीआरबी की और न ही रेलमंत्री की ही चल पाती है। यह बात अलग है कि इनकी चापलूसी में डीएससी/सीनियर डीएससी और पीसीएससी अलग से कुछ सिपाही अवश्य तैनात कर देते हैं, आखिर उनसे “एक्सीलेंट” एसीआर जो लिखवानी होती है! कई कमांडेंट, पीसीएससी साहेब, जिसको अपनी गुप्तचरी लायक ठीक समझते हैं, उसी को डीआरएम/जीएम के साथ लगाते हैं और फिर इन लोगों के मूवमेंट की पल-पल की खबर भी रखते हैं।

आरपीएफ अधिकारियों के लगातार बढ़ते सिक्योरिटी ऐडी

व्यक्तिगत सिक्योरिटी ऐडी की आधिकारिक तौर पर स्वीकृत संख्या हर ग्रेड के साथ आरपीएफ में लगातार बढ़ती जाती है। वर्ष 2004 में डीजी/आरपीएफ द्वारा जारी निर्देशानुसार एसजी/एसएजी ग्रेड के आरपीएफ अधिकारी ऑफीसियली 3 सिक्योरिटी ऐडी रखेगा और एडीशनल डीजी/आरपीएफ के पास 4 सिक्योरिटी ऐडी रहेंगे। ये अधिकृत आदेश है कि इतने आदमी व्यक्तिगत सहायक के तौर पर इनके पास रहेंगे, भले ही इनका नाम कोई और दे दिया जाए।

फाइनेंशियल कंकरेंस का अता-पता नहीं

यहां एक बात दीगर की है कि बात-बात पर दो-दो पैसे की चीज में खुरपेंच करने वाले रेलवे के एकाउंट्स विभाग ने इसको अपनी सहमति दी है कि नहीं, यह इस निर्देश में उल्लेखित नहीं है, क्योंकि बोर्ड और फाइनेंस ने सहमति अगर नहीं दी है, तो सवाल यह उठता है कि इतना बड़ा फाइनेंशियल इंप्लीकेशन का मामला स्वयंभू तरीके से कैसे चल रहा है? और तब फिर ऑडिट एवं विजिलेंस जैसे हाथी डिपार्टमेंट क्या कर रहे हैं? इसके अलावा यदि पूरे बोर्ड और फाइनेंस ने इसे पारित किया है, तो फिर वह टीएडीके के मामले पर चुप्पी क्यों साधे हुए हैं?

तब रेल अधिकारियों को भी कोई आपत्ति नहीं होगी!

यहां तो अभी सिर्फ टीएडीके पर ही वर्तमान यथास्थिति अभी तक चल रहे नियमों के अनुसार ही बनाए रखने की मांग है, जिसमें अधिकारी अपनी पसंद से अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा का ध्यान रख किसी जरूरतमंद को ही रोजगार देता है। अगर सीआरबी और मंत्री इसमें अपना “सैडिस्टिक प्लेजर” लेंगे और यदि वह यह कहते हैं कि आरपीएफ में लोग सिक्योरिटी ऐडी चयन प्रक्रिया से चुने गए लोगों में से ही रखते हैं, तब रेल अधिकारियों को भी शायद कोई आपत्ति नहीं होगी अगर आरपीएफ की तर्ज पर उनके सुपरवाइजरों से लेकर एचएजी+ अधिकारियों को भी हू-ब-हू उतने ही आदमियों की सुविधा मिले और तब भले ही वह आरपीएफ के सिक्योरिटी ऐडी के अलावा कुछ भी कहे जाएं।

बिना उत्पादक जिम्मेदारी और स्पष्ट जवाबदेही के ज्यादा सुविधा

यहां रेलमंत्री और सीआरबी को यह भी पता होना चाहिए कि आरपीएफ अपनी चयन प्रक्रिया खुद बनाती भी है और इंप्लीमेंट भी खुद ही करती है। इसलिए उन्हें अपनी आवश्यकताओं के अनुसार जैसा स्टॉफ चाहिए होता है, वे वैसा ही स्टाफ ले लेते हैं। आरआरसी और आरआरबी जैसा नहीं कि ट्रैकमैन, गेटमैन, पॉइंट्समैन आदि के लिए भी बीटेक/एमटेक और टीटीई, पीडब्ल्यूआई आदि के लिए भी एमटेक, पीएचडी लिए जा रहे हैैं, जो न ट्रैकमैन का ही काम कर पाते हैं और न टीटीई या इंजीनियर का!

इस तरह सुविधा और संसाधन के मामले में आरपीएफ आज की तारीख में आईपीएस और आईएएस से भी बहुत आगे है और वह भी बिना किसी प्रोडक्टिव रेस्पांसिबिलिटी (जिम्मेदारी) और स्पष्ट एकाउंटेबिलिटी (जबाबदेही) के!

“टके सेर खाजा, टके सेर भाजा, अंधेर नगरी चौपट राजा”

टीएडीके पर जारी इस नए फरमान से दुःखी और हतोत्साहित रेल के कई ऑफिसर और कर्मचारी कहते सुने जा सकते हैं कि “हम कमाकर दे रहे हैं और काम कर रहे हैं क्या इन्हीं लोगों को सुविधा देने के लिए, जबकि हमारी स्थिति भिखारी जैसी बन गई है। यहां तो वास्तव में – टके सेर खाजा, टके सेर भाजा, अंधेर नगरी चौपट राजा – वाली कहावत ही चरितार्थ हो रही है।”

वह कहते हैं कि, “धुंधकारी साहब (रेलमंत्री) को न जाने रेल के अन्य विभागों के उन बेचारे ऑफिसर्स से कौन सी दुश्मनी है, जो दधीचि की तरह रेल को सींचते, बढ़ाते ला रहे हैं और जो इनके मनमानी राज में भी जैसे-तैसे इसे जिंदा रखने की जद्दोजहद में लगे हैं – और शायद यही उनकी नाराजगी का कारण है – आज इनको रेलमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, तो इन्हीं फ्रंटलाइन डिपार्टमेंटट्स के चलते, लेकिन रेलमंत्री के इस तरह के बर्ताव से और प्रयास से तो लगता नहीं है कि भविष्य में इनके जैसे किसी और को मंत्री कहलाने का भी सौभाग्य मिल पाएगा।”

“घास खाए गदहा, और मार खाए जुलाहा”

सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस सरकार में “घास खाए गदहा और मार खाए जुलाहा” और “सब धान 22 पसेरी” की नीति अपनाने वाले मंत्री हों और मंत्री अपनी गरिमा भूलकर, अपने को सबसे ज्ञानी समझकर और आंखें बंद करके जब अपने लोगों को रौंदना शुरू करता है – जिनको उससे गार्जियन जैसे व्यवहार की अपेक्षा होती है – तब या तो सबकी “आह” उसे ले डूबती है या फिर विद्रोह होता है, और ये दोनों चीजें किसी भी अंधे-दंभी अस्तित्व को जलाकर राख कर देने की ताकत रखती हैं।

सभी विभागों के अधिकारियों से ज्यादा हैं अकेले आरपीएफ अधिकारियों की सुविधाएं

अब अगर आईपीएफ/आरपीएफ से शुरू करके डीजी/आरपीएफ तक को आधिकारिक तौर पर मिल रहे सिक्योरिटी ऐडी, फॉलोअर और हमराह के नंबर जोड़े जाएं, तो ये मुख्यधारा के सभी विभागों के अधिकारियों को मिल रहे कुल टीएडीके से ज्यादा ही होंगे। जबकि यहां देखने वाली बात यह भी है कि डीजी/आरपीएफ की इस मामले में कोई लिमिट निर्धारित नहीं है, वह जितने चाहे उतने बल सदस्यों को अपनी सेवा में लगा सकता है।

जबकि यहीं रेलमंत्री का मंत्री पद जस्टिफाई करने वाले विभागों के बड़े से बड़े अधिकारी, जो 24 घंटा अपनी नौकरी, अपने स्वास्थ्य और परिवार को दांव पर रखकर और उनकी गालियां तथा अपशब्द सुनकर भी काम करता रहता है, वह उनके ही आईपीएफ से सुविधा में बराबरी नहीं कर सकता है। जबकि सुविधाओं के मामले में डीएससी, सीनियर डीएससी, डिप्टी सीएससी, सीएससी, पीसीएससी, डीजी/आरपीएफ तो उनकी अपेक्षा बहुत बड़ी हस्तियां हैं।

हमारा मकसद यहां यह बताने या जस्टीफाई करने का कतई नहीं है कि अगर किसी की एक आंख फूटी है, तो दूसरे की दोनों फोड़ दी जाएं। हमारा मकसद रेलमंत्री को सिर्फ हकीकत से रू-ब-रू कराना है और जिसकी एक ही आंख है उसके और रेलमंत्री के भी सर्वाइवल के लिए उसकी बची एक आंख न फोड़ी जाए, रेल हित में उनको सिर्फ यही आगाह कराना है।

अपवाद हर जगह होते हैं, परंतु वास्तविकता का अवलोकन किया जाए

भले ही टीएडीके के मामले में रेलमंत्री को निर्णय लेने में साल भर लगता, लेकिन अगर वास्तव में रेलमंत्री यह अहसास करना चाहते हैं कि उनका कौन सा विभाग कितनी मौज ले रहा है, कितनी सुविधा उठा रहा है, तो कभी-कभी परिवार का मुखिया होने के नाते सभी विभागों के सभी स्तर के अधिकारियों के घर औचक चाय पर पहुंच जाएं और उनके परिवार से उतनी देर ही वार्तालाप कर लें। यह काम वह सीआरबी एवं बोर्ड मेंबर्स के बंगलों से शुरू करें और जीएम से होते हुए असिस्टेंट स्केल तक पहुंच जाएं। मेरा विश्वास है कि ऐसा करने से या इस तरकीब से रेलमंत्री का सिर्फ पूर्वाग्रह ही खत्म नहीं होगा, बल्कि वह इससे गौरवान्वित ही होंगे कि वह ऐसे परिवार के मुखिया हैं, और उनको ग्लानि तब होगी अपनी सोच पर तथा इनको देखकर कि क्या वह इन्हें ही सुविधाभोगी समझ रहे थे?  

अपवाद हर जगह होते हैं, यहां भी हैं, लेकिन रेलमंत्री को यह यहां ज्यादा इसलिए लगते हैं, क्योंकि जो अपवाद हैं, और जो भ्रष्ट, शातिर, धूर्त, चापलूस, तिकड़मी और घोर अवसरवादी हैं, वही लोग महत्वपूर्ण पदों पर यहां ज्यादा विराजमान हैं और इसीलिए रेलमंत्री के इर्दगिर्द वही लोग ज्यादा हैं, चाहे रेलवे बोर्ड हो, चाहे उनका… इसके अलावा, रेलमंत्री इस व्यवस्था को इसलिए भी ढ़ंग से नहीं समझ पा रहे हैं, क्योंकि एक तो वह जनता द्वारा कभी चुनकर नहीं आए हैं, दूसरे उनके साथ समझदार सलाहकारों के बजाय नासमझ और चापलूस लोग लगे हुए हैं।

क्या ऐसे ही सुरक्षित रह पाएगी देश की संवैधानिक व्यवस्था?

यह रेल संगठन इतनी विसंगतियों के बाद भी कैसे चल रहा है, इस पर यदि रेलमंत्री ज्यादा धयान देते, तो अभी तक रेल की लौह पटरी को वह स्वर्ण पटरी में बदल चुके होते और काम करने वाले भी उत्साह से लबरेज होते। लेकिन अब तो उनके सर्वज्ञानी कार्य-व्यवहार के चलते वर्तमान पटरियां ही बच जाएं, वही बड़ी बात होगी! रही बात काम करने वालों में उत्साह की, तो रेलमंत्री ने 5 अगस्त को उसमें बची-खुची प्राणअग्नि को भी बुझा डालने का प्रयास शुरू कर दिया है। लेकिन उनको यह नेक सलाह है कि उसकी #राख से बचिएगा! क्योंकि जब संसद से पारित और पुनर्स्थापित वैधानिक व्यवस्था पर आईपीएस को हटाने के कानून पर अमल करने की बात आती है, तब तो आप यह कहकर भाग खड़े होते हैं कि “उनकी बात मत करो, वह तो हमको ही हटा देंगे!” क्या ऐसे ही चलती रहेगी और सुरक्षित रह पाएगी इस देश की संवैधानिक व्यवस्था? क्रमशः 





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चिनॉय सेठ, “जब खुद का घर शीशे का हो, तो दूसरों के घरों में पत्थर नहीं फेंका करते!”

सरकार के खर्चों और सरकारी विभागों में हो रहे भ्रष्टाचार पर सरकार का कोई अंकुश नहीं

सुरेश त्रिपाठी

रेलमंत्री पीयूष गोयल द्वारा रेल अधिकारियों-कर्मचारियों को मिल रही सुविधाओं की समीक्षा करने और री-एंगेज्ड कठपुतली चेयरमैन, रेलवे बोर्ड यानि “वीकेन यादव” द्वारा राममंदिर के शिलान्यास के दिन 5 अगस्त को रेल अधिकारियों के बंगला प्यून हटाने के बारे में दिए गए बचकाने संदेश/आदेश के बाद पूरी रेलवे वर्कफोर्स में नीचे से ऊपर तक बहुत कड़ी और जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई है। रेलमंत्री और सीआरबी के तमाम बचकाने निर्णयों को अब तक जैसे-तैसे झेल रहे रेलकर्मी-अधिकारी उनके इस एक निर्णय से अचानक हड़बड़ाकर उठ खड़े हुए हैं, क्योंकि यह निर्णय उनके परिवारों की सुरक्षा और उनकी गरिमा तथा स्वाभिमान को प्रभावित करने वाला है।

रेलमंत्री और सीआरबी के इस कुटिल एवं अनैतिक निर्णय के खिलाफ जहां सभी जोनल अधिकारी संगठनों द्वारा न सिर्फ उन्हें पूरे जस्टिफिकेशन के साथ ज्ञापन भेजे जा रहे हैं, बल्कि उन्होंने यह सुविधा जूनियर/सीनियर स्केल पर भी लागू करने की पुरजोर वकालत की है।

कार्मिक सुविधाओं में कटौती, भ्रष्टाचार पर कोई लगाम नहीं

एक तरफ जहां सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के डीए/आरए में पहले ही डेढ़ साल तक की पाबंदी लगा दी है, वहीं अब उनके वेतन और पेंशन पर भी 20% की कटौती किए जाने का ऐलान किया जा रहा है। इसके साथ ही मितव्ययिता और लागत खर्च में कटौती के नाम पर अन्य कई भत्तों में कटौती की घोषणा की जा चुकी है। जबकि सरकार के खर्चों और सरकारी विभागों में हो रहे भ्रष्टाचार पर सरकार का कोई अंकुश नहीं लग पा रहा है।

इसके अलावा अब रेल अधिकारियों और कर्मचारियों की तैयारी यह भी दिख रही है कि यदि रेलमंत्री नहीं मानते हैं और अपनी मनमानी करने पर अड़े रहते हैं, तो रेल मंत्रालय में उनके द्वारा लगाई गई उनकी वैयक्तिक फौज के कारनामों को भी उजागर करने का उन्होंने मन बना लिया गया है।

ऐसा लगता है कि मंत्री की इस निजी फौज द्वारा किए जा रहे घोर अपमान और मनमानी से अब ये सभी रेल अधिकारी बुरी तरह तंग आ चुके हैं। इसीलिए शायद वे ऐसे ही किसी मौके की तलाश में थे कि कब वे मंत्री और उनके निजी सहायकों की करतूतों का पर्दाफाश कर सकें।

“करो या मरो” की स्थिति ला खड़ी की रेलमंत्री ने!

क्रिया की प्रतिक्रिया होना प्राकृतिक सिद्धांत है। यह हमारा वैदिक साहित्य बहुत पहले से कहता आ रहा है और जिसे बाद में प्रतिपादित करके सर न्यूटन विज्ञान में अमर हो गए। और यह भी हर निकृष्ट से निकृष्ट और निकम्मे से भी निकम्मे आदमी, यहां तक कि कबीरदास कह गए हैं कि “मरी खाल की स्वांस सों, लौह भसम होई जाए” का जांचा-परखा सत्य है कि आदमी तब तक प्रतिक्रिया नहीं करता जब तक कि उसकी गरिमा और सम्मान को चोट नहीं लगती। और ये भी कि आदमी अपने तक तो बर्दाश्त करता है, पर जब बात उसके परिवार की सुरक्षा और इज्जत की आ जाती है, तब वह इसके विरुद्ध अपनी पूरी ताकत से प्रतिकार करने के लिए उठ खड़ा होता है। पिछले पांच-छह सालों से हर दिन अनाचार, अत्याचार, उत्पीड़न झेल रहे और अपमानित हो रहे रेल अधिकारियों और कर्मचारियों के सामने रेलमंत्री और सीआरबी ने अब “करो या मरो” की यही स्थिति लाकर खड़ी कर दी है।

रेलमंत्री ने “कमर के नीचे वार” किया

एक पूर्व मंत्री के साथ काफी समय तक काम कर चुके एक वरिष्ठ रेल अधिकारी ने रेलवे के वर्तमान निजाम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि एक समय था जब इन्हीं रेलकर्मियों-अधिकारियों की बदौलत रेलवे ने हर फील्ड में बड़े-बड़े कीर्तिमान स्थापित किए थे, क्योंकि इन्हें सक्षम नेतृत्व मिला था। उनका कहना है कि वर्तमान रेलमंत्री और उनके सलाहकार अब तक रेलवे में जो भी ऊटपटांग उठापटक कर रहे थे, उसका सीधा प्रभाव किसी व्यक्ति विशेष या रेल कर्मचारियों-अधिकारियों के परिवारों पर नहीं पड़ रहा था। पहली बार रेलमंत्री ने एक ऐसा बचकाना और द्वेषपूर्ण निर्णय लिया है, जो सीधे अधिकारियों और उनके परिवारों को हिट कर रहा है, इसे ही अंग्रेजी में “below the belt hit” (कमर के नीचे वार) करना कहा जाता है।

जरूरी था विभिन्न स्तर पर स्टेक होल्डर्स से विचार-विमर्श

उनका स्पष्ट मत है कि अवल्ल तो मंत्री को ऐसा करना ही नहीं चाहिए। अगर इनको कुछ करना ही था तो इस तरह के मामले में जल्दबाजी नहीं करते और सभी जोनों के अधिकारी संगठनों, हर आयु वर्ग के अधिकारियों तथा उनके विभिन्न ट्रेनिंग इंस्टिट्यूटस से भी विचार-विमर्श कर लेते, क्योंकि हम लोगों के समय भी और प्रायः सभी रेलमंत्रियों के समय टीएडीके और सैलून का मुद्दा कुछेक कारणों से जब तब आता रहा है, लेकिन हम लोगों ने यह देखा कि रेल अधिकारियों के काम की प्रकृति के हिसाब से यह व्यस्था जरूरी भी है और होनहार युवाओं को रेलवे को जॉइन करने का  सबसे बड़ा आकर्षण/इंसेंटिव भी।

वह आगे कहते हैं कि ऐसे में कोई भी परिपक्व मंत्री अपने मंत्रालय के अधिकारियों और कर्मचारियों की उपलब्ध सुविधाओं में अगर कोई इजाफा नहीं करता है, तो उनमें छेड़छाड़ भी नहीं करता और खासकर जो निर्णय सीधे व्यक्तिगत स्तर पर और परिवारों को प्रभावित करता हो, उसे तो मंत्री कतई नहीं छूता है।

नेतृत्व की अक्षमता और सैडिस्टिक मानसिकता में इंसानियत का अभाव

एनडीए सरकार के कार्यकाल में ही रहे एक अन्य रेलमंत्री के साथ जुड़े एक और वरिष्ठ रेल अधिकारी का यह स्पष्ट मानना था कि रेलवे के अधिकारियों और कर्मचारियों जैसी टारगेट ओरियंटेड वर्कफोर्स शायद ही किसी अन्य विभाग मंत्रालय में होगी। उन्होंने कहा कि यह भी सही है कि वस्तुत: लीडरशिप जैसी होगी, ऑर्गनाइजेशन अपना रिजल्ट भी वैसा ही देगा। आज रेलवे की जो दुर्व्यवस्था है उसका सीधा कारण सिर्फ और सिर्फ नेतृत्व की अक्षमता ही है।

कोई निर्णय कैसे अपने घोर समर्थकों को भी विरोधी बना सकता है, इसकी बानगी तब देखने को मिली, जब इलेक्ट्रिकल के ही एक वरिष्ठ अधिकारी इसके लिए सीआरबी पर ही फटते नजर आए। उनका कहना था कि कम से कम रेलवे में काम किए सीआरबी “वीकेन यादव” जैसे एक अधिकारी से ऐसी अपेक्षा नहीं थी। उन्होंने कहा कि यदि वीकेन यादव के मन में टीएडीके के मामले को लेकर कुछ चल रहा है, या मंत्री ने इस पर कुछ करने को उनसे कहा था, तब भी कोरोना जैसी संक्रामक महामारी के समय में उन्हें इतनी तो इंसानियत जरूर दिखानी चाहिए थी कि अधिकारियों को एक माह का एडवांस नोटिस दे देते कि “फिलहाल इसे 1 सितंबर या 1 अक्टूबर से रोका जाएगा, जब तक इस पर आगे कोई निर्णय न हो जाए।”

उनका कहना था कि तब कम से कम जिन अधिकारियों ने अपना टीएडीके सरेंडर कर दिया है और जिनके टीएडीके की बहाली की प्रक्रिया चल रही है, उन्हें यह मिल जाता (ध्यान रहे कि पूरी भारतीय रेल में ऐसे बहुत ज्यादा मामले नहीं होंगे) तथा कोरोना काल में उनका परिवार इस तरह की असहाय स्थिति में अपने को नहीं पाता। इसके अलावा जिनके टीएडीके का समय पूरा हो गया है और जो सरेंडरिंग की प्रक्रिया शुरू करने वाले थे, वे भी तब तक रुक जाते, जब तक इस पर कोई सर्वसम्मत निर्णय नहीं हो जाता।

उनका कहना था कि “लेकिन यहां तो सैडिस्टिक तरीके से यह धमकी दे दी गई कि 1 जुलाई से भी जिसकी बहाली हो गई है, उसका भी रिव्यू होगा।” उन्होंने कहा कि अपनी समर्पित वर्कफोर्स अथवा अपने सहयोगियों के साथ इससे बड़ा भद्दा मजाक और ज्यादाती क्या हो सकती है? वह भी तब, जब खुद पूरे सेवाकाल में उन्होंने इस सुविधा का भरपूर इस्तेमाल किया और अब भी कर रहे हैं!

कई अधिकारियों और कर्मचारियों का यह भी कहना है कि रेलमंत्री अपने किसी भावी लाभ को ध्यान में रखकर अपना एजेंडा पूरा करने और रेलवे को बदनाम करने के लिए पहले बहुत ही गंदे और ओछे तरीके से तोहमत लगाते हैं, और फिर जबरदस्ती उसके पीछे पड़ जाते हैं। ऐसा ओछापन आज तक शायद ही किसी रेलमंत्री ने दिखाया होगा।

पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़े वंचितों के बारे में भी सोचना होगा

उनका कहना है कि, “रेलमंत्री को पहले यह तो पता कर लेना चाहिए कि भले ही उनका कोई भी पूर्वाग्रह हो, लेकिन यह बहुत बड़ा सत्य है कि बंगला प्यून या टीएडीके के माध्यम से अधिकांश उन वंचित और आर्थिक, सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को एकमात्र सरकारी रोजगार का अवसर मिल पाता है, जो तबका सिर्फ और सिर्फ मेहनत के बूते पर ही जिंदा रहता है। जो सामाजिक तौर पर न तो किसी प्रतियोगी परीक्षा की दौड़ में आने वाले खर्च को वहन करने में सक्षम होता है और न ही मेहनत के अलावा उसका कोई मेरिट और जुगाड़ ही होता है। समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े ये लोग किसी भी पारंपरिक चयन प्रक्रिया के माध्यम से कोई भी सरकारी नौकरी कभी पा ही नहीं सकते।”

चाबुक और हिकारत से हांकने पर काम नहीं होता

उनका स्पष्ट मानना है कि “कायदे से यह सुविधा जूनियर और सीनियर स्केल अधिकारियों को भी मिलनी चाहिए, क्योंकि हर बेहतरीन ऑर्गनाइजेशन अपने कर्मचारियों को दिए गए इंसेंटिव से ही परखा और पहचाना जाता है। उसी से किसी कंपनी की आउटपुट निर्धारित होती है और कर्मचारी जब पूरी तरह से अपने मालिक में गार्जियन का भाव देखते हैं, तो अपना बेहतर देते हैं। टाटा ग्रुप इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। लेकिन जिस कंपनी  का मालिक चाबुक से और हिकारत से देखते हुए अपने कर्मचारियों अथवा मातहतों को हांकने की कोशिश करता है, वह जल्दी ही अपने पुरखों के द्वारा खड़ी की गई सम्पति का नाश कर देता है। वर्तमान रेलमंत्री शायद यही कर रहे हैं।”

यहां रेल मंत्रालय (रेल भवन) के गलियारों में चल रहे कई किस्सों में से एक मजेदार किस्सा एक अधिकारी ने शेयर किया –

“एक अन्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मजाक में एक सीरियस बात अपने साथ रुड़की में पढ़े एक रिटायर्ड बोर्ड मेंबर से एक बार कहा कि गनीमत है कि ये रेलमंत्री ही हैं, अगर ये रक्षामंत्री बन जाते, तो सबसे पहले सेना को खत्म कर देते और कहते चीनी आउटसोर्स एजेंसी से इनसे सस्ते में आदमी और हथियार दोनों डिप्लॉय हो जाएंगे। बाद में वह इसके फायदे भी गिना देंगे कि पहले तो कोई हिंदुस्तानी अब बॉर्डर पर मरेगा नहीं और दूसरे जहां एक मिलिट्री डिवीजन को मेनटेन करने पर 100 रुपए खर्च होते थे, वहां अब चाइनीज और चीनी एजेंसियां 30 रुपए में ही यह काम करेंगी। या फिर वे संभवतः यह भी बता देते कि “चीन अब इस आउटसोर्स के बदले उल्टे सरकार को भी 1000 रुपए हर महीने देने का ऑफर कर रहा है और इसी लागत विष्लेषण (कॉस्ट एनालिसिस) के आधार पर चीनी, पाकिस्तानी एजेंसियों और हिजबुल आदि को भी लेह, लद्दाख, कश्मीर, पंजाब, राजस्थान आदि बॉर्डर पर देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने का काम मिल जाएगा।” (बहुत से लोग तब तक इस नूतन प्रयोग की वाहवाही भी करेंगे, जब तक कि देश पर साक्षात चीन या पाकिस्तान का कब्जा न हो जाए।)

सुरक्षा के साथ खिलवाड़ साबित होगी कोई भी नई व्यवस्था

अब तक का यह अनुभव रहा है कि बीपी/टीएडीके माध्यम से आने वाले लोग कैटेगिरी चेंज होने पर जिस जिस विभाग में काम करते हैं, वे सबसे ज्यादा बेहतर, अनुशासित और कर्मठ मानव संसाधन सिद्ध हुए हैं। किसी और माध्यम से यह व्यवस्था थोपने पर यह न सिर्फ घातक सिद्ध हो सकती है, बल्कि अधिकारियों और उनके परिवारों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ भी होगा।

इसके कई उदाहरण मौजूद हैं। 2004 में इटारसी डीजल लोको शेड में तैनात रहे एक सीनियर डीएमई की घर में अकेली पत्नी की हत्या बंगला प्यून ने ही की थी। इसी प्रकार दक्षिण मध्य रेलवे की लालागुड़ा वर्कशॉप में पदस्थ रहे एक अधिकारी का परिवार बंगला प्यून की क्रूरता के चलते ही अकारण मौत के मुंह में समाकर बरबाद हो गया था।

इसी तरह जब तक रेलवे में रेल से जुड़े लोगों की बहाली होती रही अथवा ट्रेड अप्रेंटिस के माध्यम से स्किल्ड मानव संसाधन लाया जाता रहा, तब तक रेलवे का काम सुचारु रूप से चलता रहा। परंतु जब से यस व्यवस्था खत्म करके राजनीतिज्ञों के फायदे के लिए आरआरबी/आरआरसी जैसी भ्रष्टतम व्यवस्था के माध्यम से कथित पढ़े-लिखे लोगों को लाया जाने लगा, तब से उनसे काम लेना रेल अधिकारियों के लिए न सिर्फ एक बड़ा सिरदर्द साबित हुआ है, बल्कि रेलवे सहित रेलयात्रियों की भी संरक्षा और सुरक्षा हर स्तर पर प्रभावित हुई है।

जब वर्तमान व्यवस्था में, जहां सब कुछ जांच-परखकर किया जाता है, वहां जब अधिकारी और उनका परिवार सुरक्षित नहीं है, तब आरआरसी/आरआरबी जैसी महाभ्रष्ट व्यवस्था से आने वाले किसी अनजान, अज्ञात आदमी को रखे जाने पर क्या स्थिति हो सकती है, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

पहले आरआरसी से भर्ती लोगों से काम तो करवा लें रेलमंत्री

अधिकारियों का कहना है कि कुछेक विभागों, जिनमें सरप्लस मैनपावर है, उनके कुछ अधिकारियों को छोड़ कर बाकि सभी अधिकारियों की दिनचर्या सिर्फ एकमात्र टीएडीके के ऊपर ही निर्भर होती है। उनका कहना है कि रेलमंत्री पहले तो आरआरसी आदि से ट्रैकमैन, हेल्पर खलासी आदि के लिए बहाल हुए लोगों से ही व्यवस्थित काम करावा लें, वही बहुत होगा। इसके बाद ही आरआरसी, कांट्रेक्ट और आउटसोर्सिंग एजेंसियों से टीएडीके लगाने पर विचार करें! धीरे से उनका यह भी कहना है कि मंत्री जी शायद इसमें भी किसी पार्टी कार्यकर्ता या अपने सहयोगी को घुसाने की सुविचारित दीर्घावधि योजना की संभावना तलाश रहे हैं। जैसा कि उन्होंने ईएनएचएम आदि जैसी भ्रष्टाचार पैदा करने वाली कई अन्य नई योजनाओं को लागू करके किया है।

रेल परिवार के सामने “विलेन” बन गए मंत्री और सीआरबी

उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस एक निर्णय ने एक ही झटके में रेलमंत्री और सीआरबी “वीकेन यादव” को हर रेल अधिकारी के घर में “विलेन” के रूप में खड़ा कर दिया है। अब तक तो वे उन्हें वर्षों से स्थापित और सुचारू रूप से चल रही रेल व्यवस्था को सिर्फ तोड़ते-फोड़ते और बरबाद करते हुए ही देख रहे थे। उनको यह अंदाजा नहीं था कि रेलमंत्री और सीआरबी उनके घरों में घुसने की इस निम्नता अथवा अनैतिकता तक भी उतर सकते हैं!

जिनके घर शीशे के होते हैं, वह दूसरों के घरों में पत्थर नहीं फेंकते!

रेलवे बोर्ड के कई अति वरिष्ठ उच्च अधिकारी और हाल ही में बोर्ड से रिटायर हुए मेंबर्स, जिन्होंने काफी नजदीक से वर्तमान रेलमंत्री को देखा है और उनकी कार्यशैली को भली-भांति जानते हैं, का मानना है कि शायद इस घटना के कारण रेलमंत्री को ये सीख मिल जाए कि, “जिनके खुद के घर शीशे के होते हैं, उन्हें दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए।”

उनका कहना है कि, “क्योंकि यह मनुष्य की प्रकृति है कि वह तब तक सिर झुकाकर सब कुछ बर्दास्त करता है, जब तक वह देखता है कि उसका असर उसके परिवार, उसकी गरिमा या स्वाभिमान पर नहीं पड़ रहा, लेकिन जब इस सब पर असर पड़ने लगता है, तब छोटा से छोटा तथा कमजोर से कमजोर आदमी भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूरी ताकत से उसका प्रतिकार करता ही है।”

किसके लिए काम करती है मंत्री के साथ लगी फौज?

कई रेल अधिकारियों का कहना है कि अधिकांश रेल कर्मचारी और अधिकारी जो भी काम करते हैं, वह तो रेल के लिए और देश के लिए करते हैं। लेकिन रेलमंत्री तो सिर्फ अपने परिवार (कार्यकर्ताओं) के लिए ही काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि “भारत सरकार में ये पहले कॉर्पोरेट स्टाइल में काम करने वाले मंत्री हैं, जो सिर्फ रेल मंत्रालय में ही अपने 70 आदमियों की एक बड़ी फौज अपने साथ रखे हुए हैं, बाकी दो मंत्रालय और भी हैं उनके पास। हालांकि यह बात अलग है कि ये बहुत कुछ करते हुए दिखाई देते हैं, जिसमें रेलवे की स्थापित कार्यशैली और रेलकर्मियों एवं अधिकारियों को मिली सुविधाओं से सौतिया डाह के चलते उन्हें बदनाम करने की मात्रा ही ज्यादा रही है, पर जमीनी स्तर पर इनसे आज तक कुछ किया नहीं जा सका है।”

वह आगे कहते हैं कि, “स्पष्टतः रेलमंत्री के साथ लगी निजी लोगों की यह बड़ी फौज उनकी व्यक्तिगत पसंद के, व्यक्तिगत कारणों से और व्यक्तिगत तथा पारिवारिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही तो है। यह फौज रेल के लिए तो कतई काम नहीं कर रही और न ही देश के लिए कर रही है, तो आखिर अपनी इस फौज को किस महान कार्य पर लगा रखा है रेलमंत्री ने?” यह उनका सीधा सवाल है।

उनका कहना है कि अगर मंत्री के ही तर्कों का सहारा लिया जाए, तो रेलवे के 14 लाख लोगों में से रेलवे और देश के काम के लिए बड़ी आसानी से उपयुक्त और उपयोगी आदमी ढूंढे जा सकते हैं, इस सच्चाई के अलावा कि मंत्री आधिकारिक तौर पर अपनी पसंद से 5/6 लोगों को रख सकते हैं।

फेल होने की राह पर अग्रसर रेलमंत्री

यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि मंत्रियों और सांसदों में तब इस बात को लेकर कितनी नाराजगी थी, जब वैयक्तिक सहायक के रूप में प्रधानमंत्री ने कुछ मानक निर्धारित कर दिए थे और संघ से जुड़े लोगों को वरीयता दी जाने लगी थी। लेकिन फिर भी बाकी कौन होंगे, क्यों होंगे, कैसे होंगे, तब तुम घर पर उससे काम करवा सकोगे या साथ रखोगे, इसे प्रधानमंत्री ने रेलमंत्री के जैसी सैडिस्टिक मानसिकता से निर्देशित नहीं करवाया, क्योंकि यदि वे ऐसा करते तो शायद अब तक पार्टी में भयंकर विद्रोह हो गया होता और पार्टी खत्म होने के कगार पर कब की पहुंच गई होती। अधिकारियों का स्पष्ट मानना है कि अपने ऐसे ही सहायकों की वजह से इनके पहले वाले मंत्री फेल हुए थे और अब यह भी इसी वजह से उसी राह पर अग्रसर हैं।

आने वाले समय में सबसे कमजोर नब्ज साबित होगा रेल मंत्रालय

कई अधिकारियों और कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों का कहना है कि अभी तक तो दूसरे मंत्रालय के भ्रष्टचार की चर्चाएं होती थीं, लेकिन अब अगर कोई दूसरी सरकार आएगी, तो इस सरकार की सबसे कमजोर नब्ज रेल मंत्रालय ही होगा, क्योंकि जिस तुगलकी तरीके से इसको तहस-नहस किया जा रहा है, और जिस मनमाने तरीके से रेलवे को और इसकी गतिविधियों तथा संसाधनों को तोड़-मरोड़कर बेचा जा रहा है, वह स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा सुनियोजित घोटाला है, जिसकी सीधी मार इस देश की आम जनता पर पड़ेगी और फिर क्रमिक जांचों की शुरुआत रेल मंत्रालय से ही होगी।

कुछ अधिकारियों का यह भी कहना था कि इस सरकार को इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि तमाम दुश्वारियों के बावजूद भी अधिकांश लोग राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री मोदी के साथ खड़े हैं, लेकिन इस तरह के निर्णय से ये लोग बाध्य किए जा रहे हैं कि वे इस सरकार के विरुद्ध सिर्फ कुछ बोलें ही नहीं, बल्कि कुछ पुख्ता करें भी। और यही अथवा ऐसी ही कुछ अन्य साजिशें रेल मंत्रालय चला रहे लोगों द्वारा सरकार के खिलाफ की जा रही हैं। 

अंततः इस बात का ख्याल रेलमंत्री और सीआरबी को होना ही चाहिए कि “सब दिन होत न एक सामना!”

क्रमशः पढ़ें – “एक छत के नीचे कैसे चल रही है आरपीएफ में दोहरी व्यवस्था!”





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#बोल कि लब आजाद हैं तेरे… – RailSamachar

रेलमंत्री और सीआरबी को शायद राममंदिर का बनना और शिलान्यास होना रास नहीं आया!

लगता है कि प्रधानमंत्री से रेल मंत्रालय को चला रहे लोगों की कोई अंदरूनी दुश्मनी है? जिसे अब तक शायद वह समझ नहीं पाए हैं!

सुरेश त्रिपाठी

Narendra Modi, Hon’ble PM/India

बुधवार, 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में राममंदिर के शिलान्यास और इसके निर्माण की शुरुआत होते देखकर जहां पूरा देश सदियों के इस सपने को साकार होता देख अभिभूत था, खुशी मना रहा था, दीप जलाने की तैयारी कर रहा था, वहां सीआरबी महोदय ने रेल अधिकारियों के लिए एक ऐसा फरमान उपहार स्वरूप जारी किया, जो पाकिस्तान का रेल मंत्रालय भी शायद ऐसा करने से पहले कम से कम आज के दिन तो एक बार जरूर सोचता।

रेल अधिकारियों में आज इतनी निराशा और हतोत्साह था कि एकाध रेलवे आवास को छोड़कर किसी भी आवास में आज दीपक जलाकर 5 अगस्त के इस ऐतिहासिक दिन का अभिनंदन नहीं किया गया।

ऐसा लगता है कि रेल मंत्रालय को चला रहे लोगों की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कोई अंदरूनी खुन्नस है, जो वह मोदी जी के रेलवे और देश के लिए किए जा रहे हर अच्छे काम और हर कोशिश को हर मौके पर पलीता लगाने और उस पर पानी फेरकर उनकी छवि को धूमिल करने का प्रयास करते नजर आते हैं। पिछले पांच-छह सालों से जो देखने में आ रहा है, उससे तो कम से कम यही निष्कर्ष निकलता है!

सीआरबी का किसी आतंकवादी मुखिया जैसा व्यवहार?

बहरहाल, जितना कोई आतंकवादी संगठन धमाकाकर और हजारों लोगों को मारकर निराशा, शोक और मनहूसियत का माहौल बना सकता था, उससे कहीं ज्यादा बड़ा उन आतंकवादियों का काम आज 5 अगस्त को रेल मंत्रालय के इस मैसेज में भेजे गए सीआरबी के फरमान ने किया।

“CRB has directed that not a single case of bungalow peon appointment shall be approved. All cases approved in the last one month should be reviewed  immediately. This may please be confirmed”.

“Kind attention all PFAs: Hon’ble MR has desired that number of TADK appointments made w.e.f  01.07.2020 in each Railway/PU should be provided immediately. It is requested to provide the information by 12:00 hrs on 06.08.2020 for your railway. The same may be sent at financialcommissioner@gmail.com. This may be treated most urgent. -Naresh Salecha, AM/R”.

इस दिन की महत्ता और संवेदनशीलता को देखकर शायद ही कोई देशभक्त या रामभक्त आज इस तरह का कोई फरमान जारी करता।

एक तरफ प्रधानमंत्री का साष्टांग, देश के समस्त लोगों को अभिभूत कर रहा था और शुभ भविष्य का संदेश देता नजर आ रहा था, तो वहीं दूसरी तरफ उनके एक मंत्रालय का कृत्य ऐसा बर्ताव कर रहा था मानो वह फिर से इस देश में रावण और बाबर की सत्ता के आगमन की आहट दे रहा हो।

सीआरबी और बोर्ड के उच्च अधिकारी पहले स्वीकार करें

“या तो सीआरबी और रेलवे बोर्ड में रिटायरमेंट के कगार पर बैठे तमाम “शिखंडी” उच्च रेल अधिकारी पहले यह स्वीकार करें कि बंगला प्यून उर्फ #टीएडीके रेलवे में शुरू से एक गैरजरूरी सुविधा रही है, या फिर यह रेल अधिकारियों की विशेष कार्य परिस्थितियों को देखते हुए निहायत ही जरूरी सुविधा मानकर उन्हें अब तक दी जाती रही है!”

क्योंकि अब तक टीएडीके जैसी जरूरी सुविधा का उपभोग कर जब रेल छोड़ने की बारी आई, तो निहायत ही दोगलेपन से आप उस निहायत ही जरूरी टीएडीके की सुविधा को खत्म कर रहे हो, जबकि आप जानते हो कि रेल अधिकारी जिन कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं, वहां यह सुविधा कम, जरूरत ज्यादा है।

लेकिन फिर भी अगर आप लोग टीएडीके को गलत मानते हैं, तो सबसे पहले उसकी भरपाई करें और कम से कम लिखित में दें कि “हां, हमने इस सुविधा का अभी तक गलत उपभोग किया है, जबकि हमें इसकी जरूरत ही नहीं थी!” कम से कम ऊपर वालों को इसे नैतिक आधार पर जरूर स्वीकार (कन्फेस) करना चाहिए।

विषय और समय की गंभीरता को समझे बिना निर्णय

दूसरी बात इस कोविड-19 पैन्डेमिक जैसी भयानक वैश्विक महामारी जनित अनिश्चितता के दौर में इस तरह से बिना समुचित गंभीरता अपनाए, बिना इसके औचित्य का उपयुक्त मंथन किए, और बिना किसी समिति की अनुशंसा के एकाएक मैसेज देकर इसे रोकने का औचित्य क्या है? यह भी स्पष्ट किया जाए।

इस तुगलकी फरमान की एक विसंगति यह भी है कि  “एलिजिबिलिटी” होने के बावजूद जिन अधिकारियों के पास अभी टीएडीके नहीं है, या जिनका प्रक्रिया में है, अथवा जिनके टीएडीके 1 जुलाई के बाद बहाल हुए हैं, या कैटेगरी चेंज करने के लिए जिनके टीएडीके की मियाद निकट भविष्य में पूरी होने वाली है, वे अधिकारी तब तक बिना टीएडीके के रहेंगे!

किसके भक्त हैं सीआरबी और बोर्ड अधिकारी!

रेल अधिकारियों के लिए 5 अगस्त का यह दिन जैसे युगों में आने वाले किसी ऐतिहासिक दिन का उपहार है! अब भारतीय रेल मंत्रालय इस दिन को इतिहास में उपहार के रूप में दर्ज कराना चाहता था, या उपहासास्पद और निराश करने वाले दिन के रूप में, यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसके आधुनिक नीति-नियंता रामभक्त हैं या बाबर के अथवा मोहम्मद बिन तुगलक के भक्त हैं!

सर्वप्रथम पहल अपने से करें मंत्री और सीआरबी

वैसे भी अगर किसी भी जिम्मेदार और नैतिक नेतृत्व को इस तरह का कदम उठाना होता है, तो सर्वप्रथम उसकी पहल अपने से करनी चाहिए! गांधी की तरह!!

मंत्री, सीआरबी, बोर्ड मेंबर्स और बोर्ड में बैठे बाकी अन्य “ऊदबिलाव” जैसे रेल अधिकारी, जिनके सरकारी आवासों में 20/25 रेलकर्मी काम कर रहे हैं, इन सभी रेलकर्मियों को हटाकर सबसे पहले वे अपनी इस मुहिम की शुरुआत करें।

इसके साथ ही वह भी पहले खुद के टीएडीके भी हटाएं। अगर तब ये तथाकथित बड़े नीति-नियंता एक दिन भी काम कर लें, तब फिर इनको जो समझ में आए, वह करें और तब रेल अधिकारियों की इस टीएडीके नाम की कथित लक्जरी सुविधा की जरूरत का अंत कर दें।

लेकिन ऐसा अनर्थ नहीं होना चाहिए कि मंत्री, सीआरबी, बोर्ड मेंबर्स के आवासों में सरकरी आदमियों की फौज लगी हो और दूसरों के लिए आप आदर्शवादी प्रवचन दें।

“पर उपदेश कुशल बहुतेरे”

25 साल पहले तक जो रेलमंत्री रहे, चाहे रामविलास पासवान हों या लालू यादव, इन सभी पूर्व रेलमंत्रियों/नेताओं के घरों पर आज भी रेलवे के कई-कई कर्मचारी काम कर रहे हैं। कई बीसों साल पहले रिटायर जीएम, बोर्ड मेंबर्स और सीआरबी के घरों पर भी आज भी रेलवे के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी काम कर रहे हैं। सुशासन बाबू के घर से लेकर उनके टारगेट पर रहे पूर्व सीआरबी कांतारू के घर पर भी रेलवे के लोग आज भी काम कर रहें हैं। लेकिन है किसी में इतनी हिम्मत या साहस कि इनमें से किसी नेता या रिटायर्ड अधिकारी के घर से किसी आदमी को हटा दे?

या है किसी वर्तमान मंत्री, सीआरबी या बोर्ड मेंबर में इतना नैतिक बल, कि अपनी कोठियों में एक भी रेलवे स्टॉफ या टीएडीके न रखे?

या है किसी सीवीसी में, सीबीआई में दम, जो अचानक इनकी कोठियों पर छापा मारकर देखे कि कितने सरकारी आदमी इनकी कोठियों पर काम कर रहें है?

ब्लैकमेलिंग पावर और सैडिस्टिक प्लेजर

लेकिन अपने को ज्यादा काबिल और आदर्शवादी दिखाने की जुगत में, जिनको जरूरत है और जिनका काम, मेहनत, योगदान ही जिनके अस्तित्व को जस्टीफाई करता है, उनकी जरूरतों का बलिदान करना उन्हें ज्यादती नहीं, वरन जायज लगता है, क्योंकि इसमें ज्यादा “ब्लैकमेलिंग पावर” भी है और उससे ज्यादा “सैडिस्टिक प्लेजर” भी !

जरा सोचिये, बुढ़ापे में जहां सीआरबी, बोर्ड मेंबर्स आदि घर में मात्र दो प्राणी ही होते हैं और सामाजिक जिम्मेदारी न के बराबर होने से नाते-रिश्तेदार भी न के बराबर ही आते हैं, अगर उन्हें 10-20 आदमी रखने की जरूरत और जस्टीफिकेशन है, तो फिर उनके जूनियर अधिकारी जिनके बच्चे अभी पढ़ ही रहे हैं, बीमार बुजुर्ग मां-बाप भी उनके साथ ही रहते हैं और सामजिक जिम्मेदारी का बोझ भी सबसे ज्यादा इन्हीं पर होता है तथा गांव-घर से नाते-रिश्तेदार भी गाहे-बगाहे आते ही रहते हों, तो फिर उनके लिए यह टीएडीके गैरजरूरी कैसे हो गया?

महान ईमानदार योगी बाबा उर्फ सुशासन बाबू

जिंदगी भर “रंगीला बादशाह की लाइफस्टाइल” से रेलवे का उपभोग करने वाले महान ईमानदार योगी बाबा उर्फ सुशासन बाबू (लौह… पुरूष) रेलवे के ऐसे पहले अधिकारी थे, जिन्होंने अपनी निजी छवि या दूकान चमकाने के लिए इसका कीड़ा अपने राजनीतिक आकाओं के दिमाग में घुसाया।

रेल अधिकारी भ्रष्ट हैं, नाकाबिल हैं, सुविधाभोगी हैं, ऐय्याशी करते हैं, मैनपावर का बहुत मिस्यूज करते हैं, आदि आदि यह सब इन्हीं सुशासन बाबू के द्वारा प्रतिपादित विचार थे, जो कि बहुत तेजी से आम जनता और वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व में भी “परसेप्शन” बन गए। (हालांकि यह भी माना जाता है कि दूसरों में ये सारे ऐब वही खोज सकता है, जिसमें ये सारे (अव)गुण खुद पहले से मौजूद रहे हों!)

उन्होंने अपनी स्वतःस्फूर्त प्रेरणा से अभियान शुरु किया कि किसी भी अफसर के घर पर टीएडीके के अलावा कोई अन्य रेलवे स्टाफ काम करता मिल गया, तो परिणाम बहुत बुरा होगा। अनुशासनिक कारवाही होगी, विजिलेंस कार्यवाही होगी, आदि आदि। हालांकि हुआ कुछ भी नहीं, सब कुछ टांय-टांय फिस्स हो गया। तथापि उनका निशाना कहां था और इसमें उनको कितनी सफलता मिली, यह तो रेलवे के लोग ही बेहतर जानते हैं, लेकिन इसका फायदा सुशासन बाबू को जरूर हुआ।

उनकी छद्म ईमानदारी का, आत्मप्रवंची प्रखर बहुमुखी प्रतिभा(?) का, बहरूपिया लोकलुभावन छवि का इतना जबरदस्त प्रभाव इस सरकार पर पड़ा कि उन्हें फिर से एयर इंडिया का बचा-खुचा बंटाधार करने – क्षमा करें – बचा-खुचा कार्य करने के लिए सीएमडी बना दिया गया।

इसके बाद ईमानदारी के प्रतिरूप महान योगी सुशासन बाबू की कथित बहुमुखी प्रतिभा के व्यामोह में पड़कर दक्षिण के एक राज्य ने इनसे अपनी सेवाएं देने का आग्रह किया और इन्होंने उसे अनुग्रहित कर कृतार्थ भी किया, लेकिन कहते हैं न कि “हीरे की असली परख जौहरी ही करता है” और सुशासन बाबू की परख भी इस देश की उन्हीं के जैसी एक बड़ी ईमानदार(?) कंपनी ने किया, जो सिर्फ अपने ईमानदार(?) कार्यों के लिए ही जानी जाती है, जिस पर आज तक कोई लांछन ही नहीं लगा !

कृपया यहां सिर्फ तीन लिंक देखने का कष्ट करें!

https://m.economictimes.com/markets/stocks/news/gmr-group-under-cbi-lens/articleshow/47278528.cms

http://www.cnbctv18.com/business/ashwani-lohani-joins-gmr-group-as-ceo-services-business-6431391.htm

https://www.firstpost.com/business/gmrs-big-steal-rs-24000-cr-land-for-rs-31-lakh-421326.html/amp

रेलवे और रेलकर्मियों-अधिकारियों की छवि को जानबूझकर किया गया छिन्न-भिन्न

रेलवे के अधिकारियों और कर्मचारियों की छवि को छिन्न-भिन्न करने का और उनकी जरूरत को सुविधा या विलासिता बताने का जो कुत्शित कार्य सुशासन बाबू ने शुरू किया था, उसे अंतिम रूप देने का कार्य वर्तमान सीआरबी वी. के. यादव उर्फ “वीकेन यादव”, भारतीय रेल का पहला “सीईओ” बनने की चाहत में कर रहें है।

“सुशासन बाबू” और “वीकेन यादव” की अजगरी प्रवृत्ति

किसी भी “ऑर्गनाईजेशन” के “मुखिया” के लिए उस ऑर्गनाइजेशन में काम करने वाले लोग उसके परिवार और बच्चों की तरह होते हैं और इनके जरूरी हितों की देखभाल और रक्षा करना उसका पहला कर्तव्य होता है, लेकिन इस धरती पर “अजगर” जैसे भी कुछ जीव होते हैं, जो अपनी “भूख” मिटाने के लिए अपने बच्चों को ही निगल जाते हैं। “सुशासन बाबू” और “वीकेन यादव” ने भी अपनी महत्त्वाकांक्षा और भूख के लिए वही किया और कर रहे हैं, जो सदियों से “अजगर” करता रहा है।

समकक्ष व्यवस्था उपलब्ध कराए बिना वापस नहीं ली जा सकती कोई सुविधा

सुचारु रूप से चल रही व्यवस्था में बदलाव या परिवर्तन उसमें तोड़फोड़ कर अथवा उसे बरबाद करके नहीं हो सकता और न ही इसे विकास या नई/अनोखी व्यवस्था का नाम दिया जा सकता है। तथापि प्रबंधन और व्यवस्था में सुधार करने के बजाय जो लोग ऐसा करते हैं, या करने का प्रयास कर रहे होते हैं, वह निहायत निकम्मे, नालायक, नामुराद, जाहिल, गंवार और सौतिया डाह रखने वालों की श्रेणी में गिने जाते हैं।

संवैधानिक व्यवस्था है और प्राकृतिक न्याय का तकाजा भी, कि “जनता अथवा सरकारी कर्मियों के लिए पहले से चली आ रही कोई सुविधा तब तक वापस नहीं ली जा सकती है, जब तक कि उसके समकक्ष वैसी ही दूसरी कोई सुधारित या परिष्कृत सुविधा उन्हें मुहैया न करा दी जाए!” पर ऐसा कुछ कभी इस देश में होता नहीं देखा गया, सिर्फ खुद के लिए सुविधाएं बटोरने का काम राजनीतिक नेतृत्व द्वारा किया गया, वह भी बाकायदा संविधान की डुगडुगी बजाकर!

कहते हैं कमजोर पर ही सबका वश चलता है और अभी रेल अधिकारियों-कर्मचारियों से ज्यादा कमजोर, बेचारा और लावारिस शायद इस देश में कोई और नहीं है।

सोची-समझी रणनीति के तहत उभारा गया विभागवाद

अभी तक भारतीय रेल को सफलतापूर्वक चलाने वाले अधिकारी और कर्मचारी आचानक पिछले चार-पांच सालों में आपसी “विभागवाद” के इतने तीखे विवाद में धंस चुके हैं कि न तो वह रेलवे का, देश का दूरगामी हित देख पा रहें हैं, और न ही अपना।

इनकी आपस की लड़ाई इन्हें इतना अंधा बना चुकी है कि इन्हें ये सब देखते हुए भी कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि रेलवे को बेचने वाले बहरूपिये इन्हें कितनी चालाकी से आपस मे लड़ाकर अपने गोल की ओर बढ़ रहे हैं और ये हर बीतते दिन के साथ कमजोर कठपुतली बनते जा रहे हैं।

मुंबई में फुट ओवरब्रिज गिरने पर जब रेलवे इंजीनियर्स को भ्रष्ट और नाकाबिल बताकर सेना को उनका कार्य दे दिया गया था, उस समय सबने एक होकर इसका विरोध करने के बजाय सिर्फ सिविल इंजीनियर्स का मामला मानकर बाकी विभागों ने खूब रस लिया।

फिर जब इलेक्ट्रिकल वालों के साथ अन्याय होना शुरू हुआ, तो मैकेनिकल वाले इसमें अपनी साम्राज्य विस्तार नीति की जीत मान रहे थे और बाकी डिपार्टमेंट इलेक्ट्रिकल-मैकेनिकल की आपसी लड़ाई मानकर मजा लूट रहे थे।

फिर जब ट्रैफिक वालों की बजाई जाने लगी, तो बाकी लोग इसका रसास्वादन करने लगे। ट्रैफिक वालों का भी अहंकार ऐसा कि यहां कोई अपने को बावन हाथ से कम नहीं मानता, परिणाम सामने है कि आज इस पूरे कैडर को ढ़केलकर दीवार से चिपका दिया गया है और अब इनकी चूं भी नहीं निकल पा रही है।

और अब जब इलेक्ट्रिकल सीआरबी ने मैकेनिकल वालों को पद-दलित करने के लिए चुटिया बांधकर कमर कसी हुई है, तब भी बाकी डिपार्टमेंट ताली बजा रहे हैं।

एकाउंट्स जैसे कुछ डिपार्टमेंट अपने को सबसे ज्यादा काबिल, अभिजात्य और दूसरे ग्रह से आया प्राणी मानकर सिर्फ अपनी बात करते रहे हैं, जबकि व्यवस्था को आगे बढ़ाने के काम में सबसे बड़ा अड़ंगा यही हैं।

यही हाल तकरीबन कार्मिक, स्टोर्स, आरपीएफ आदि अन्य विभागों का भी रहा। जहां-जहां ऑर्गनाइजेशन के हित को ध्यान में रखकर सबको कैडर से अलग हटकर एकजुट होना चाहिए था, वहां-वहां सबने “इंडिविजुअल कैडर इंटरेस्ट और एजेंडा” को लेकर चतुराई से चलना शुरू किया।

“फूट डालो, राज करो” की अंग्रेज नीति का अनुसरण

चालाक-चतुर नेतृत्व ने इन सबकी इसी कमजोरी को पकड़ा। और अंग्रेजों की दी गई “फूट डालो, राज करो” की नीति को बिना किसी प्रभावी प्रतिरोध के सफलता से लागू कर दिया। इसी का दुष्परिणाम है कि आज रेलवे के सभी अधिकारी-कर्मचारी इस बद्तर हालात में लावारिस खड़े हैं, जहां हांक लगाने पर भी उनका साथ देने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है।

दरअसल ये सब यह भूल गए थे कि ट्रैफिक, सिविल, मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, पर्सनल, स्टोर्स, एकाउंट्स आदि तथा टेक्निकल-नॉन टेक्निकल आप एक-दूसरे की नजर में ही हो, लेकिन राजनीतिक आकाओं और दुनिया की नजर में आप सिर्फ और सिर्फ एक मामूली “सरकारी अधिकारी” या “कर्मचारी” ही हो, इससे ज्यादा कुछ नहीं! और यह भी कि आड़े वक्त लोगों के काम आकर जनमानस में आपने कभी अपनी छवि सुधारने की कोशिश नहीं की!

कोई भी बड़ा या छोटा दिखने वाला निर्णय, जो रेलवे को निजीकरण (#privatization) या निगमीकरण (#corporatization) की तरफ लेकर जाने वाला होगा, वह सभी के सभी “रेल अधिकारियों और रेल कर्मचारियों” के लिए होगा, न कि किसी एक कैडर विशेष के लिए!

“स्टोरकीपर”, “सुशासन बाबू” और वर्तमान “वीकेन यादव” के काल का ही सिर्फ रेल अधिकारी और कर्मचारी शांत दिमाग से आकलन कर लें, तो उनकी समझ में बखूबी आ जाएगा कि कबीरदास की चक्की ही चल रही है, जिसमें बचना किसी को नहीं है।

ए. के. मित्तल (ईश्वर उनकी दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे) के समय जो लोग अपने साम्राज्य विस्तार का जयघोष कर रहे थे, सुशासन बाबू के काल में वे ही पाटन के बीच आ गए। और सुशासन बाबू के समय जो लोग (मैकेनिकल वाले) अपने साम्राज्य विस्तार का उत्सव मना रहे थे, आज अपना अस्तित्व बचाने की जुगत में हलकान हुए पड़े हैं। इसलिए यदि अभी भी यह सब देख और सीखकर सुधर जाएं, तो रेल भी बचे और देश भी।

कैडरिज्म युक्त मारिज़ुआना का नशा

एक बात का और ख्याल रखें कि कैडर का भला सोचने से एक-दो अफसरों या मुठी भर लोगों का ही भला होता है और स्टोरकीपर, सुशासन बाबु, वीकेन यादव सरीखे अक्षम, परंतु अति चालाक या छुपे रुस्तम टाइप के लोग ही इस कैडर मानसिकता की आड़ में राज भोग लेते हैं, बाकी कैडरिज्म युक्त मारिज़ुआना के नशे में ऐसे धुत्त पड़े रहते हैं कि भले ही वे 22/25 साल की नौकरी और काबिलियत के बाद भी एसएजी में किसी सड़ी हुई जगह पड़े रहें, लेकिन इसी में आह्लादित रहते हैं कि मानो वही सीआरबी बन गए हों।

विश्वसनीयता खो चुके हैं दोनों अधिकारी संगठन

जहां एक तरफ चापलूसी और दलाली के चलते एक अधिकारी संगठन लगभग खत्म हो चुका है, वहीं दूसरी तरफ दूसरे अधिकारी संगठन के पदाधिकारी विश्वसनीयता खोकर शिखंडी साबित हो रहे हैं। रेल अधिकारियों में एफआरओए (#FROA) को लेकर काफी गुस्सा है। उनका कहना है कि इसमें ऐसे लोग पदाधिकारी हैं जो अधिकारियों की और रेल हित की बात करने के बजाय अपने पद का उपयोग व्यक्तिगत हित साधने और अपनी अच्छी पोस्टिंग सुनिश्चित करने के लिए करते हैं।

उनका कहना है कि वर्तमान का एफआरओए पहले से ही उस बात की भूमिका बनाने/गढ़ने लगता है जो वास्तव में सीआरबी या रेलमंत्री चाहते हैं। उन्होंने बताया, टीएडीके के मामले में भी कल रात चली मैराथन मीटिंग में इन्होंने कहने के लिए टीएडीके का मुद्दा उठाया। पर जब रेलमंत्री ने कहा कि “टीएडीके की व्यवस्था को खत्म नहीं किया जाएगा, लेकिन पर्सनल चॉइस नहीं होगी।” तब ये इसका प्रोटेस्ट किए बिना और उसका औचित्य समझाए बिना ही मान गए, जबकि इन्हें रेलमंत्री को तत्काल बताना चाहिए था कि टीएडीके की पर्सनल चॉइस के पीछे कई महत्वपूर्ण तथ्य रहे हैं, जो किसी अन्य तरीके से या आरआरसी जैसे पूल से देने से न सिर्फ अधिकारी के परिवार की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है, बल्कि टीएडीके उसके लिए एक बहुत बड़ा सिरदर्द भी साबित हो सकता है। अधिकारी अपनी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के आधार पर टीएडीके इसलिए लगाते हैं, क्योंकि जरूरत पड़ने पर वह चौबीसों घंटे भी उनके साथ परिवार के एक सदस्य की तरह रहता है।

कुछ अधिकारियों ने आरआरसी जैसी व्यवस्था यानि कि दूसरे की “अनुशंसा” या किसी अन्य “कंसिडरेशन” के आधार पर, और बिना व्यक्तिगत पसंद को वरीयता दिए जब टीएडीके बहाल किए हैं, तो भारी मुसीबत में पड़े हैं।ऐसा भी नहीं है कि आरआरसी जैसी कोई भ्रष्ट और छद्म व्यवस्था अभी नहीं है?

जांचे-परखे बिना लिए गए टीएडीके की असलियत

प्रायः हर जगह एक संगठित गिरोह सक्रिय रहता है, जो शुरू में ही ताड़ लेता है कि किस अधिकारी को टीएडीके की जरूरत है और उसके पास खोजने का समय नहीं है। तब धीरे से वह अपना कैंडिडेट लेकर पहुंच जाता है, कुछ दिन खूब सेवा करता है, जब अधिकारी प्रभावित होकर उसे बहाल कर लेता है, तब फिर वह अपना असली रंग दिखाना शुरू करता है और अधिकारी एवं उसके परिवार का जीना हराम कर देता है। कोर्ट केस से लेकर अन्य कई झूठे आरोपों में फंसा देता है।

इसीलिए आमतौर पर जब अधिकारी अपनी पसंद से और परखकर टीएडीके बहाल नहीं करता है, तो उसकी यही गति होती है। यही कारण है कि अधिकारी की पसंद से रखे गए टीएडीके जब कैटेगरी चेंज होकर दूसरी जगह पर जाते हैं, तो अन्य माध्यमों से आए कर्मचारियों से वह ज्यादा व्यवहार में सभ्य और अपने काम के प्रति समर्पित साबित होते हैं। इस तरह रेलवे को एक ज्यादा बेहतर मानव संसाधन की प्राप्ति भी होती है। इस तरह के सैकड़ों उदाहरण ऐसे मौके पर एफआरओए के मूर्धन्य पदाधिकारियों को रेलमंत्री के संज्ञान में लाकर पर्सनल चॉईस के औचित्य को जस्टीफाई करना चाहिए था।

पर्सनल चॉइस का अन्य औचित्य

इसके अलावा टीएडीके की पर्सनल चॉइस की सुविधा कहीं न कहीं रेलवे में आने और रहने का एक बड़ा मोटिवेटिंग फैक्टर तथा इंसेंटिव भी है। अभी तक इसका लाभ ले चुके सीआरबी और उनके जैसे अधिकारियों को यह बात रेलमंत्री को बतानी चाहिए और एफआरओए को भी इसी बात को स्पष्ट करना चाहिए। लेकिन वर्तमान में एफआरओए के जो पदाधिकारी हैं, वे अधिकारियों के बीच तो आईआरएमएस (#IRMS) के विरोध में अपना सुर मिलाते हैं, मगर वही जब रेलमंत्री के सामने जाते हैं, तो सब पर अपना समर्थन देकर/हाथ खड़ा करके चले आते हैं और फिर बाहर आकर यूनियन वालों की तरह अपनी झूठी कहानी सुनाते हैं। इसीलिए उन पर जयचंद का ठप्पा लग चुका है और अब उन पर न किसी को भरोसा रह गया है, न विश्वास।

अब टीएडीके विषय पर लिए बनाई गई समिति के सदस्यों से यह अपेक्षा की जा रही है कि उन्हें किसी प्रकार के दबाब में आए बिना टीएडीके को वर्तमान स्वरूप में ही बनाए रखने की अनुशंसा करनी चाहिए।

दिल्ली से हटकर बनाए जाएं अधिकारी संगठनों के पदाधिकारी

रेल अधिकारी जब तक दक्षिण रेलवे, पूर्व तट रेलवे, पूर्व रेलवे, दक्षिण पूर्व रेलवे या पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे अथवा दिल्ली से हटकर किसी अन्य रेलवे के अधिकारियों के हाथ में अधिकारी संगठनों की कमान नही थमाएंगे तब तक दिल्ली और रेलवे बोर्ड से बनाए गए इनके अध्यक्ष और महामंत्री आदि पदाधिकारी अपनी ही डीलिंग करते रहेंगे। एनएफआर वाले को या एसआर वाले को तो कोई यह कहकर धमका नहीं सकता है कि तुम्हें वहां भेज देंगे जहां तुम हो! किसी भी हाल में उनको खोने को कुछ नहीं होगा। उनके लिए जो भी होगा, उससे बेहतर ही होगा। इसीलिए वे निर्भीक होकर हर फोरम में सच्ची बात ही बोलेंगे।

अगर रेल अधिकारियों और कर्मचारियों में अभी भी और थोड़ी सी भी गैरत बची है तथा रेल के प्रति निष्ठा और देश के प्रति थोड़ी सी भी राष्ट्रभक्ति जिंदा है, तो मेरे हिसाब से टीएडीके का मसला अब जरूरत, सुविधा या बार्गेनिंग के लिए कमजोर नस दबाने का न होकर सभी रेल अधिकारियों-कर्मचारियों के लिए स्वयं की, रेल की अस्मिता का और रेल को निजीकरण, निगमीकरण से बचाने की बची जिजीविषा की ज्वलंत प्रतिक्रिया और इसके लिए लड़ी जाने वाली अंतिम लड़ाई के रूप में होनी चाहिए।

#बोल कि लब आजाद हैं तेरे,

#बोल कि जबां अब तक तेरी है!

#बोल कि सुतवां जिस्म है तेरा,

#बोल की जां (रेल) अब तक तेरी है!!

—फ़ैज़





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कोटा मंडल, पश्चिम मध्य रेलवे में लगातार जारी हैं गंभीर अनियमितताएं

बोर्ड की रोक के बावजूद किया जा रहा है नए पदों का सृजन

सुरेश त्रिपाठी

रेलमंत्री पीयूष गोयल के निर्देश पर रेलवे बोर्ड द्वारा सभी जोनल रेलों और उत्पादन इकाईयों को लागत खर्चों में कटौती करने संबंधी कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके बावजूद कुछ जोनों/मंडलों द्वारा बोर्ड के इन निर्देशों को तनिक भी तवज्जो नहीं दी जा रही है। इनमें से पश्चिम मध्य रेलवे का कोटा मंडल भी शामिल है। कार्मिक शाखा, कोटा मंडल द्वारा 10 जून 2020 को पत्र सं. ईसी/1025/34/1, भाग-4 तथा समसंख्यक पत्र दि. 15.07.2020 जारी करके वाणिज्य निरीक्षकों के 4 रिक्त पदों के स्थान पर 6 अतिरिक्त यानि 6 नए पदों के सृजन के साथ कुल 10 वाणिज्य निरीक्षकों का चमन किया जा रहा है। इसकी परीक्षा गुरुवार, 6 अगस्त को मंडल प्रबंधक कार्यालय, कोटा में रखी गई है।

उल्लेखनीय है कि रेलवे बोर्ड द्वारा 2 जुलाई को नए पद सृजन के संबंध में पत्र सं. ई(एमपीपी)/2018/1/1 (आरबीई 48/2020) जारी करके लागत खर्च में कमी करने के लिए संरक्षा को छोड़कर अगले आदेश तक कोई भी नया पद सृजित नहीं करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा वर्तमान पदों में 50% की कटौती करने के साथ ही उन पदों, जो पिछले दो वर्षों में सृजित किए गए हैं और उन पर अब तक भर्ती नहीं की गई है, को सरेंडर करने को भी कहा है।

रेलवे बोर्ड ने उपरोक्त संबंधी आदेश 19 जून 2020 को भी अपने पत्र सं. 2015/बी/235 में जारी किया था।

इस पत्र के पैरा-III (ए) के अनुसार आउटसोर्सिंग गतिविधियों, विशेष रूप से ओबीएचएस, लिनन प्रबंधन, स्टेशन क्लीनिंग, लिफ्ट/एस्केलेटर्स मैनिंग और स्टेशन एनाउंसमेंट इत्यादि की समीक्षा गंभीरता से करने का निर्देश देते हुए इन सब गतिविधियों पर हो रहे अमापक खर्च पर कड़ाई से अंकुश लगाने को कहा था।

रेलवे बोर्ड के उपरोक्त निर्देशों के उल्लंघन के अलावा कोटा मंडल की वाणिज्य शाखा में कुछ अन्य गंभीर अनियमितताएं भी उजागर हुई हैं, जिसमें रेलवे बोर्ड के जिन नीति निर्देशों को दरकिनार किया गया है, वह इस प्रकार हैं-

कोटा मंडल द्वारा विभिन्न स्टेशनों पर कैडर में स्वीकृत ग्रुप ‘डी’ सफाई कर्मचारियों के पदों को सरेंडर कर 6 वाणिज्य निरीक्षकों के पदों का सृजन किया गया, जिसका मुख्य कारण पूरे मंडल में स्टेशनों को क्लब करते हुए जोन बनाकर सभी स्टेशनों पर सफाई का कार्य ठेके पर कराने की योजना थी।

कार्मिक कार्यालय के पत्र सं ईसी/1025/34/1 भाग-iv, दि. 10.06.2020 के अंतर्गत 10 वाणिज्य निरीक्षकों (08 अनारक्षित, 01 एससी, 01 एसटी) के पदों की रिक्तियों (लेवल-6 पे-बैंड 9300-34800 + 4200) को भरने हेतु आवेदन मंगाए गए। अब इन पदों पर रिक्तियों को भरे जाने हेतु होने वाली लिखित परीक्षा दि. 06.08.2020, पत्र सं. ईसी/1025/34/1 भाग-४, दि. 15.07.2020 जारी की गयी है।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि रेलवे बोर्ड का पत्र सं. 2015-बी-235 दि. 19.06.2020 के पैरा-III (ए) के अनुसार “आउटसोर्सिंग गतिविधियों – विशेष रूप से ओबीएचएस, लिनन प्रबंधन, स्टेशन क्लीनिंग, लिफ्ट/एस्केलेटर्स मैनिंग और स्टेशन एनाउंसमेंट इत्यादि – की गंभीर रूप से समीक्षा जानी चाहिए और इस पर अंकुश लगाया जाना चाहिए” के आधार पर पूरे मंडल में स्टेशनों को क्लब करते हुए जोन बनाकर सभी स्टेशनों पर सफाई का कार्य ठेके पर देने के जो भी कॉन्ट्रैक्ट थे, वे सभी मंडल रेल प्रबंधक, कोटा द्वारा निरस्त कर दिए गए हैं।

इस हिसाब से जो ग्रुप ‘डी’ सफाई कर्मचारियों के पद सरेंडर किए गए थे, वे भी स्वत: रद्द होने चाहिए थे और जिन पदों को सरेंडर कर जो पद सृजित किए गए थे, वे भी स्वत: रद्द होने चाहिए थे। परंतु कोटा मंडल द्वारा ऐसा कुछ नहीं किया गया।

उपरोक्त नियम के अनुपालन में यथोचित कार्य न करके इन नियमों को ताक पर रखकर वाणिज्य निरीक्षकों के नए पदों के साथ रिक्तियों के लिए कथित रूप से निजी हित साधने हेतु यह परीक्षा करवाई जा रही है, जबकि उक्त नियमों के अनुपालन में पिछले दो सालों में सृजित किए पदों को भी सरेंडर किया जाना है।

बताते हैं कि इस कार्य हेतु फाइल चलाई भी गई परंतु नए सृजित वाणिज्य निरीक्षकों के पदों को डीसीएमआई मैन पावर प्लानिंग पर दबाव बनाकर और उससे लिखवाकर इन पदों को यथावत रखकर केवल कागजी कार्यवाही कर ली गई और इस पर पुनः वित्तीय सहमति लिया जाना उचित नहीं समझा गया तथा गंभीर अनियमितता को मूर्त रूप दिया जा रहा है।

कर्मचारियों का कहना है कि वास्तव में इन पदों के सृजन की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि प.म.रे. मुख्यालय जबलपुर द्वारा दिए गए आदेश में यह प्रावधान दिया गया है कि “यदि कोई पर्यवेक्षक के पद पर लेवल-7, पे-बैंड 9300-34800+4600 ग्रेड पे में हो और प्रशासन उसे अपनी आवश्यकता के अनुरूप वाणिज्य निरीक्षक के पद पर काम लेना चाहे, तो उस पर्यवेक्षक से वर्तमान रिक्ति पर वाणिज्य निरीक्षक का कार्य लिया जा सकता है। तथापि उस पर्यवेक्षक का कार्यकाल 5 वर्ष से अधिक का नहीं होगा।

कर्मचारियों का कहना है कि मुख्यालय का तत्संबंधी आदेश मंडल कार्मिक शाखा के पास अवश्य उपलब्ध होना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि इतनी लचीली पालिसी उपलब्ध होते हुए भी नए पदों के सृजन की आवश्यकता क्यों हो रही है? इसका सीधा मतलब यही निकल रहा है कि मनवांछित व्यक्ति को पदोन्नत करके मनवांछित लाभ कमाने के इरादे से इन सब नियमों को ताक में रखा जा रहा है।

कर्मचारियों ने बताया कि मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय का पत्र सं. ईसी/174/2 (मर्जर ऑफ सीसी/ईसीआरसी दि. 02.01.2019 के अंतर्गत मंडल के समस्त वाणिज्य कैडर, जिसमें बुकिंग, पार्सल, गुड्स, टिकट चेकिंग स्टाफ को मर्ज करने और री-पिन प्वाइंटिंग भी मनवांछित व्यक्ति को पद पर लाने और मनवांछित लाभ कमाने के इरादे से की गई है।

इसी के तहत जहां कोटा बुकिंग और पीआरएस में केवल दो पर्यवेक्षक (एक कैश और एक स्टोर्स) के पद सालों से थे, वहां पर 7-7 पद सृजित कर दिए, जबकि इनका न तो कोई औचित्य है और न ही आवश्यकता है, वहीं कई स्टेशनों पर पर्यवेक्षक के पदों की आवश्यकता है, वहां यह पद सृजित नहीं किये गए हैं।

उनका कहना है कि यदि नए पद सृजित करने ही थे, तो उससे पहले पैरा 6 में वर्णित प.म.रे. मुख्यालय के आदेश में दिए गए प्रावधान का विचार कर उसका लाभ उठाते हुए रेल राजस्व बचाया जा सकता था। परंतु ऐसा नहीं किया गया, क्योंकि फिर वही मनवांछित व्यक्ति को पद पर लाने और मनवांछित लाभ कमाने के इरादे से की जा कोशिश बाधित हो जाती।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि वर्तमान कोटा मंडल की वित्तीय शाखा द्वारा भी कार्मिक शाखा के उक्त 6 नए वाणिज्य निरीक्षकों के पदों के सृजन के औचित्य पर बिना कोई सवाल उठाए आंख मूंदकर वित्तीय सहमति दे दी गई। जबकि रेलवे बोर्ड के उपरोक्त दिशा-निर्देशों के अंतर्गत सफाई वालों के पदों के एवज में जो पद सृजित किए गए हैं, उनकी समीक्षात्मक जांच की जानी चाहिए थी, जो कि वित्तीय शाखा द्वारा नहीं की गई। यह घोर अनियमितता एवं सरासर रेलवे बोर्ड द्वारा जारी किए गए उपरोक्त निर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन है।

रेलवे बोर्ड के उक्त निर्देशों की अवेहलना का आलम यह है कि मंडल प्रशासन ने भी अपनी आंखें बंद कर ली हैं, क्योंकि ऐसा लगता है कि मंडल की कार्मिक, वाणिज्य, परिचालन, वित्त और अन्य शाखाओं में जो खुलेआम कदाचार चल रहा है उस पर मंडल प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं रह गया है।

उपरोक्त तमाम कदाचार की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए और इनकी उच्च स्तरीय जांच कराने के लिए कई कर्मचारियों ने महाप्रबंधक/प.म.रे. को एक ज्ञापन भी सौंपा है और उनसे मांग की है कि गुरुवार 6 अगस्त को होने जा रही परीक्षा को तुरंत रोका जाए।

इस ज्ञापन की प्रतियां उन्होंने वरिष्ठ उप महाप्रबंधक एवं मुख्य सतर्कता अधिकारी, प्रमुख मुख्य परिचालन प्रबंधक, प्रमुख मुख्य वाणिज्य प्रबंधक, प्रमुख मुख्य वित्तीय सलाहकार एवं मुख्य लेखाधिकारी, पमरे/जबलपुर को भी उचित कार्यवाही हेतु प्रेषित की हैं। क्रमशः 





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क्या कारण है कि सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे में ही बनते हैं!

आखिर रेलवे बोर्ड के आईआई ही ज्यादा भ्रष्ट, निरंकुश और उत्पाती क्यों होते हैं?

सुरेश त्रिपाठी

रेलवे बोर्ड विजिलेंस ने “आरबी गैंग” के तीनों इंवेस्टीगेशन इंस्पेक्टर (आईआई) को रेलवे बोर्ड से मुक्ति के समसंख्यक आदेश (पत्र सं. 2020/ईआरबी-2/20/1) उसी दिन शुक्रवार, 17 जुलाई 2020 को दोपहर बाद  जीएम/कार्मिक, उत्तर रेलवे के लिए जारी कर दिए गए थे। अब जो अधिकारी इन तीनों कुख्यात आईआई को रेलवे बोर्ड में बनाए रखने की अभी भी पैरवी कर रहे हैं, उनको या तो यह पता नहीं है कि फील्ड में इन्होंने अपने साथ ही उनका भी नाम चर्चित कर रखा है, या फिर उनकी भी कोई मजबूरी है!

क्या बात है कि रेलवे बोर्ड के आईआई ही इतने ज्यादा भ्रष्ट, निरंकुश और उत्पाती होते हैं? “बिना ऊपर की शह और इशारे के ये तो हो ही नहीं सकता है” (अपनी सफाई में तो ये लोग फील्ड में यही कहते फिरते हैं)। इसका कारण खोजने पर जबाब आसानी से मिल जाएगा।

बहरहाल शनिवार, 18 जुलाई को “देर आए, दुरुस्त आए!“ शीर्षक से इन तीनों आईआई को रेलवे बोर्ड विजिलेंस से निकाले जाने की खबर “रेलसमाचार.कॉम” में और रविवार, 19 जुलाई को “कानाफूसी.कॉम” में “रेलवे विजिलेंस का आंख खोल देने वाला सच“ शीर्षक से प्रकाशित होने के बाद से सैकड़ों-हजारों रेलकर्मियों, अधिकारियों, जिसमें रिटायर्ड भी शामिल हैं और साथ ही आईआई का एग्जाम दे चुके कैंडिडेट भी, ने सत्यता उजागर करने पर “रेलसमाचार” का धन्यवाद करते हुए पीईडी/विजिलेंस/रे.बो. के इस आवश्यक कदम की सराहना की है और हर विभाग के कर्मचारी तथा अधिकारी लगातार कई विजिलेंस इंस्पेक्टरों/अधिकारियों की पोल खोलने वाली तथ्यात्मक बातें विभिन्न माध्यमों से साझा कर रहे हैं।

रेलवे बोर्ड और रेलवे बोर्ड विजिलेंस में काम कर चुके कुछ लोगों का तो सबूत के साथ यह भी कहना है कि अगर पिछले कुछ सालों की विजिलेंस फाइलों और मामलों की गहराई से विस्तृत ऑडिट तथा गहन जांच कराई जाए, तो सरकार रेलवे विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन को बंद करना ही पसंद करेगी।

विजिलेंस की आड़ में अब तक जितने भी रेलकर्मियों तथा अधिकारियों के साथ भ्रष्ट और अनैतिक तरीके से अनाचार, अत्याचार, शोषण, उत्पीड़न हुआ है, उसे देखकर तो “आईएसआईएस” भी शर्मशार हो जाएगा और शायद विजिलेंस के इन इंस्पेक्टरों और अधिकारियों में अपने सबसे योग्यतम उम्मीदवार भी मिल जाएंगे।

यह अलग बात है कि सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे कर्मचारियों, अधिकारियों के ही खिलाफ होते हैं। देश के सारे मंत्रालय और सारे पीएसयू को मिलाकर भी सबसे ज्यादा विजिलेंस केस रेलवे में ही बनते हैं। तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि रेलवे ही देश की सबसे भ्रष्टतम संस्था है?

जो लोग रेलवे फील्ड में काम करते हैं और फील्ड में काम करने का लंबा अनुभव रखते हैं, और जो लोग अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण 40-40 साल अपना अमूल्य योगदान देकर रेलवे से रिटायर हो चुके हैं, उनका कहना है कि “ऐसा बिल्कुल नहीं है। वस्तुतः विजिलेंस के लिए वहीं केस होता है, जहां भ्रष्टचार का स्पष्ट मामला हो और जहां उद्देश्य (इंटेंशन) भी स्पष्ट हो। क्योंकि फील्ड में कार्य बहुत सी चीजों पर निर्भर करता है और टाइम फैक्टर बहुत महत्वपूर्ण होता है। अतः फील्ड कर्मचारी, अधिकारी भले ही निर्धारित पॉलिसी का शब्दशः अनुपालन न करें, लेकिन वे रेल हित से कोई समझौता नहीं करते हैं।”

वैसे भी यह एक सर्वज्ञात तथ्य है कि सबसे बड़ा खेल पॉलिसी बनाने में ही होता है, जिस पर किसी विजिलेंस वाले ने रेलवे में अब तक शायद ही कभी कोई केस बनाया होगा। कुछ विभागों में पालिसी बनाई ही इस तरह से जाती है कि रामचरितमानस की चौपाई की तरह उसका कोई भी अपने बुद्धिविलास से किसी भी तरह की व्याख्या कर सकता है, खासकर वाणिज्य, कार्मिक और लेखा विभाग की पॉलिसियां इस बात का उदाहरण हैं।

ऐसे में यदि हरिश्चंद्र भी रेलवे विभाग में काम कर रहे होंगे, तो बहुत अच्छे से कोई इसी माफिया तंत्र के अनुभव का फायदा उठाकर कंप्लेंट कर देगा, तब उनको भी अपनी नौकरी बचाने के लाले पड़ जाएंगे। यही कारण है कि रेलवे में सिर्फ वही कर्मचारी-अधिकारी विजिलेंस केस में ज्यादा फंसते हैं, जो ज्यादा तेजतर्रार और रिजल्ट ओरिएंटेड तथा ईमानदार मनसा वाले होते हैं, जिन्हें दुनियादारी कम, अपना काम ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है।

क्या कोई बता सकता है कि आज तक रेलवे में महाघाघ लोग कभी विजिलेंस के द्वारा पकड़े गए हैं? जिनके लिए काम नहीं, दाम ज्यादा महत्वपूर्ण रहा है, क्या विजिलेंस ने कभी उनको पकड़ा है? अथवा उन पर हाथ डालने की कभी हिमाकत की है? यदि ऐसा कोई घाघ पकड़ा गया है, तो उसे बाहरी एजेंसी (सीबीआई) ने ही पकड़ा है, लेकिन उसमें भी अधिकांश लोग बचकर निकल जाते हैं और जो सीधा रहता है, वही पिसता है। कारण इसके कई हैं, लेकिन एक सबसे बड़ा कारण विजिलेंस में महाघाघ और महाभ्रष्ट इंस्पेक्टरों और अधिकारियों का वर्चस्व होना है। यही है रेलवे विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन की असलियत।

दूसरे मंत्रालयों में यदि सीधे-सीधे करप्शन का मामला नहीं होता है, तो वहां केस नहीं बनता, और न ही जलेबी जैसा घुमाया जाता है। लेकिन रेलवे में महाभ्रष्टों ने अपने को ईमानदार साबित करने का सबसे आसान रास्ता चुना है – दूसरे को बेईमान और भ्रष्ट साबित करने का!

यहां सीधा गणित है, जो जितनी ज्यादा संख्या में दूसरे को बेईमान बताएगा, वह यहां उतना ही बड़ा और ज्यादा ईमानदार माना जाएगा। अपनी खोट छिपाने के लिए और अपने अस्तित्व को न्यायोचित ठहराने के लिए वर्षों से रेलवे विजिलेंस यही कर रहा है।

एक बार यह समीक्षा हो जाए कि विजिलेंस की कार्यवाही से अब तक कितने भ्रष्ट कर्मचारी सही हुए हैं, अथवा सही रास्ते पर आ गए हैं और कितने ईमानदार तथा काम को वरीयता देने वाले कर्मचारियों/अधिकारियों का मनोबल बढ़ा है, विजिलेंस कार्यवाही के बाद कार्य की गति और गुणवत्ता दोनों बढ़ गई है, तब स्थिति एकदम स्पष्ट हो जाएगी। क्योंकि अगर भ्रष्ट आदमी पर कार्यवाही होगी और ईमानदार तथा काम को प्रधानता देने वाले उत्पीड़ित नहीं किए जाएंगे, तो रेलवे ऑर्गेनाइजेशन में काम की गति और गुणवत्ता अपने आप बहुत बढ़ जाएगी।

लेकिन क्या कोई रेल अधिकारी या कर्मचारी यह दावे के साथ कह सकता है कि उसे ये दोनों चीजें रेलवे में कहीं नजर आ रही हैं? जबकि यहां ईमानदार और काम करने वाले या तो हासिये पर डाल दिए गए हैं और पूरी तरह से हतोत्साहित हैं, या फिर किसी परेशानी में पड़ने के भय से उन्होंने निर्णय लेना ही छोड़ दिया है। और यह सब रेलवे विजिलेंस की देन है।

क्या किसी को पता है कि सीबीआई जिन अधिकारियों और कर्मचारियों को लाखों-करोड़ों की घूस लेते रंगेहाथ पकड़ती है, उनके ऊपर विजिलेंस ने क्या कभी कोई केस किया हुआ होता है? उनमें से किसी का भी नाम क्या “एग्रीड लिस्ट” अथवा “सीक्रेट लिस्ट” में भी डाला है? या किसी विजिलेंस वाले को, जो कार्यकाल के बीच में ही हटाया गया हो, क्या उसको इन दोनों लिस्टों में से किसी एक में आज तक कभी डाला गया है? इन सब सवालों का जबाब न में ही मिलेगा।

विजिलेंस माफिया और विभागों के बड़े माफिया मिलकर “एग्रीड लिस्ट” का इस्तेमाल कैसे ईमानदार या इनकी आंख में खटकने वाले अथवा इनके रास्ते के रोड़े बनने वाले कर्मचारी, अधिकारी को निपटाने में करते हैं? और “एग्रीड लिस्ट” को ये माफिया कैसे ब्रह्मास्त्र के रूप में इस्तेमाल करता है? जब ये माफिया हर तरह से प्रयास करके भी किसी ईमानदार कर्मचारी या अधिकारी को फंसाने में कामयाब नहीं हो पाता है, तब क्या करता है! इस पर विस्तार से आगे लिखा जाएगा। क्रमशः





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अब तय है रेलवे के ट्रैक पर प्राइवेट ट्रेन ऑपरेशन – RailSamachar

मान्यताप्राप्त रेल संगठनों को धिक्कार रहे हैं ठगा सा महसूस करते रेल कर्मचारी

कभी “देश नहीं बिकने दूंगा” की बात कहने वाले आज वास्तव में “देश बेचने” पर उतर आए हैं!

सुरेश त्रिपाठी

हम बीते 6 सालों से बुलेट ट्रेन चलाने और न जाने क्या-क्या बातें सुनते रहे हैं..

जिस तरह पहले रेल सेवाएं बंद की गईं, और सिर्फ गुड्स ट्रेनों का परिचालन जारी रखा गया, फिर अपनों को फायदा पहुंचाने के लिए कथित जरूरी सामानों की आपूर्ति के नाम पर धीरे से स्पेशल पार्सल ट्रेनों की शुरुआत कर दी गई।

इसके बाद जब व्यवस्था की नाकामी के चलते बड़ी संख्या में मजदूरों, श्रमिकों का सड़कों पर निकलकर अपने गांव जाने के लिए पैदल मार्च शुरू हो गया, तब श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के नाम पर भी कुछ चुनिंदा रूटों पर ट्रेनें चलाई गईं।

इसमें भी व्यवस्था की नाकामी और नीति-नियंताओं का निकम्मापन उजागर हुआ तथा जानबूझकर इस श्रमिक स्पेशल ट्रेनों को भटकाया गया, जिससे रेलवे की बदनामी हो और सरकार यह साबित करने के लिए कह सके कि रेलवे की वर्तमान व्यवस्था नाकाम हो चुकी है, अतः कुछ चुनिंदा मार्गों पर निजी क्षेत्र को रेल परिचालन का जिम्मा सौंपा जा रहा है।

कोरोना संकट के नाम पर भारतीय रेल की सामान्य सेवाएं बंद करके प्राइवेट पार्टियों को ट्रेन ऑपरेशन के लिए आमंत्रित करने का इससे बेहतर मौका सरकार को नहीं मिल सकता था।

सरकार कोरोना काल का भरपूर इस्तेमाल कर रही है, क्योंकि उसे पता है कि इस मौके पर कोई यूनियन अथवा संगठन विरोध के लिए मैदान में नहीं उतरेगा।

इसके अलावा, सभी विपक्षी राजनीतिक दल मरणासन्न पड़े हुए हैं, जिससे देश में एक बड़ा राजनीतिक शून्य पैदा हो गया है। सरकार इसका भरपूर लाभ उठा रही है।

इसके साथ ही राजनीतिक विपक्ष की अनुपस्थिति में विपक्षी दलों की भूमिका निभाने वाली मीडिया और देश के कुछ प्रमुख प्रतिष्ठित वरिष्ठ पत्रकारों को या तो डरा-धमकाकर स्वान बना दिया गया है, या फिर अपना जरखरीद गुलाम बना लिया गया है।

देश की वर्तमान स्थिति ऐसी है कि लोग अब अपनी इज्जत बचाए रखने और अनावश्यक बेइज्जती से बचने के लिए सच बोलने, कहने और लिखने में भारी संकोच कर रहे हैं।

सरकार के पक्षधर कुछ लोगों को छोड़कर बाकी ज्यादातर लोग सच लिखने और बोलने से बच रहे हैं। यह सही है कि लोग डरे हुए हैं।

जो कुछ लोग लिखने, बोलने और कहने का दुस्साहस कर भी रहे हैं, उन्हें बेवजह पुलिसिया कार्रवाई, कानूनी और अदालती पचड़ों में लपेटकर परेशान किया जा रहा है। इसीलिए उनमें एक तरह का भय समा गया है।

उपरोक्त तमाम स्थिति सरकार को पूरी तरह से सूट कर रही है। इसीलिए सरकार खुलकर खेल रही है और वह सब कुछ बेचने या लुटाने अथवा निजी क्षेत्र को सौंपकर लूटने पर उतारू है, जिसे उसने नहीं बनाया है।

हर दस-पंद्रह दिन में सरकार द्वारा एक नया जुमला देशवासियों को परोस दिया जाता है। कभी देश पांच ट्रिलियन इकोनॉमी की बात होती है, तो कभी कोरोना को एक अवसर के रूप में देखने की बात कही जाती है, तो कभी आत्मनिर्भर बनाया जाता है। कभी “देश नहीं बिकने दूंगा” की बात कहने वाले आज वास्तव में देश बेचने पर उतर आए हैं।

सरकार के वादों, सरकार के जुमलों और सरकार के इवेंट मैनेजमेंट की दास्तान या फेहरिस्त “हरि अनंत हरि कथा अनंता” जैसी हो चुकी है, जिसमें पूरा देश कसमसा रहा है। एक नया जुमला ईजाद करके अथवा एक नई इवेंट खड़ी करके हर बड़े मुद्दे से पूरे देश का ध्यान भटका दिया जाता है।

अब जहां तक रेलवे के मान्यताप्राप्त संगठनों की बात है, तो वे तो पहले से ही मरणासन्न स्थिति में पहुंच चुके हैं। उन्होंने सरकार के सामने पूरी तरह से घुटने टेक दिए हैं। चिट्ठी लिखने, ज्ञापन सौंपने और फोटो खिंचवाने से ज्यादा वह कुछ करने की स्थिति में नहीं रह गए हैं।

“धिक्कार है मान्यताप्राप्त रेल संगठनों को, जिन्होंने पिछले कुछ सालों से रेलकर्मियों को न सिर्फ गुमराह करके रखा, बल्कि रेलवे में अपनों को भर्ती कराने के एवज में रेल परिवार को बंधक बनाकर सरकार के सामने घुटने टेक दिए हैं!” यह कहना है तमाम रेलकर्मियों का।

लखनऊ से दिल्ली के बीच चली पहली निजी ट्रेन ‘तेजस एक्सप्रेस’ के विरोध के अवसर पर उत्तर रेलवे के ऑफिसर्स रेस्ट हाउस में चेयरमैन, रेलवे बोर्ड वी. के. यादव के साथ ट्रेनों के निजीकरण पर चर्चा करते हुए एआईआरएफ के महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा, नरमू के महामंत्री के. एल. गुप्ता एवं अन्य पदाधिकारीगण

सरकार के इस कदम से अब रेलवे की सभी उत्पादन इकाइयों के भी हजारों कर्मचारी अपने भविष्य को असुरक्षित होते हुए देखकर बुरी तरह चिंतित हो गए हैं। उनका कहना है कि “जब मान्यताप्राप्त यूनियनें रेल परिचालन का निजीकरण नहीं रोक पा रही हैं, तो उत्पादन इकाइयों का निगमीकरण और निजीकरण होने से कैसे रोक पाएंगी!”

अब भी समय है, सभी सरकारी कर्मचारी संगठित होकर सरकार की वादाखिलाफी का विरोध और यूनियनों का संपूर्ण बहिष्कार करें!





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डीआरएम/फिरोजपुर हैं सीनियर डीईएन अमित कुमार की असामयिक मौत का कारण?

इस “सिस्टम प्रायोजित हत्या” से सीख लेते हुए ऐसी गाइडलाइन बनाई जाएं जिसमें अधिकारी-कर्मचारी अपनी छुट्टियों का उपभोग अपनी मर्जी से कर सकें!

Suresh Tripathi

“सीनियर डीईएन/हेडक्वार्टर/फिरोजपुर मंडल अमित कुमार की असामयिक मौत का असली जिम्मेदार फिरोजपुर का डीआरएम है। इसकी निरंकुश और भ्रष्ट कार्यशैली के कारण ही इसके दो ब्रांच अफसरों को अकाल मृत्यु से गुजरना पड़ा है। यह एक सधे हुए डॉन की तरह “ॐ शांति” लिखकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेता है। लेकिन इसको नहीं पता है कि इसकी “ॐ शांति” के नाद से फिरोजपुर मंडल के सभी अधिकारी और कर्मचारी कितने आतंकित हैं। हमको इस बात की आशंका हमेशा घेरे रहती है कि इसके “ॐ शांति” के चल रहे सीरियल संदेशों में हमारा नंबर कब आएगा?”

उपरोक्त संतप्त प्रतिक्रिया फिरोजपुर मंडल के उन तमाम कर्मचारियों और अधिकारियों की है, जो सीनियर डीईएन अमित कुमार और सीनियर डीएमई राजकुमार की असामयिक मौत से अत्यंत व्यथित हैं। कुछ अधिकारियों का कहना था कि जहां हर जगह जो संवेदनशील जीएम, डीआरएम और विभाग प्रमुख हैं, वे बेवजह किसी अधिकारी और कर्मचारी को ऑफिस नहीं बुला रहे हैं, उन्हें घर से ही काम करने की स्वतंत्रता दे रहे हैं, लेकिन वहीं डीआरएम/फिरोजपुर जैसे कुछ नितांत सैडिस्टिक टाइप के लोग भी हैं, जो ऑफिस में भीड़ लगाए बिना मान नहीं रहे हैं।

खैर, अब जहां तक होनहार अधिकारी अमित कुमार, सीनियर डीईएन/हेडक्वार्टर/फिरोजपुर मंडल, की मौत की बात है, तो उनके आकस्मिक निधन के कारणों की विस्तृत चर्चा आवश्यक है, क्योंकि हमारे विभिन्न स्रोतों से और खुद डीआरएम सेल, फिरोजपुर से जो जानकारी मिली है, वह बहुत ज्यादा चौंकाने वाली है।

डीआरएम/फिरोजपुर मंडल के विषय में तमाम बातें खुली किताब की तरह अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच चर्चा का विषय हैं और यह सही है कि उनके कृत्यों से हर दिन लोगों का भरोसा व्यवस्था से उठता जा रहा है। डीआरएम ने अपनी कार्य-प्रणाली से कलियुग का लोहा मनवा दिया है। मंडल के अधिकारी और कर्मचारी मान चुके हैं कि ईमानदारी से जो काम करेगा, वह निश्चित रूप से मरेगा, और जो कलियुग के हर फन का माहिर होगा, वही खूब फले-फूलेगा।

जीएम, सीआरबी, विभाग प्रमुख, और यहां तक कि मंत्री भी, सब उसी की सुनेंगे, क्योंकि कलियुग के कालियाओं को बखूबी पता है कि फिलहाल कोई कृष्ण नहीं है, अतः उनकी ही सत्ता चलेगी। इस सत्ता में जो ईमानदारी से और अच्छा-बुरा सोचकर चलने वाला होगा, जो पूरी तरह से दासता स्वीकार नहीं करेगा, वह या तो बार-बार के ट्रांसफर झेलेगा और लगभग डिमोट होकर बिना चैम्बर के रहने का इनाम पाएगा या अमित कुमार की तरह बेवजह और असमय मारा जाएगा।

उपलब्ध तथ्य बताते हैं कि डीआरएम ने हालात ही ऐसे बना दिए थे कि उसमें एक्सीडेंट के अवसर 100% बन गए, अमित कुमार बच जाते, तो वह उनका सौभाग्य होता। लेकिन “कालिया नाग” का फंदा इतना मजबूत था कि उससे छूट पाना लगभग नामुमकिन ही होता है।

यह तथ्य तो मंडल में सबको पता है कि अपने कुछ चहेते अधिकारियों को छोड़कर डीआरएम/फिरोजपुर दूसरे अधिकारियों को छुट्टी के लिए रुला मारते हैं। जब तक अधिकारी उनके पास दसियों चक्कर नही कटेगा, गिड़गिड़ाएगा नहीं, नाक नहीं रगड़ेगा, और जब तक पूरी तरह से घुटने नहीं टेक देगा, तब तक उसे छुट्टी नहीं मिलती है। फिर चाहे उसका कितना भी जरूरी काम क्यों न हो। उसमें भी यदि कोई अधिकारी पांच दिन की छुट्टी मांगता है, तो उसे एक दिन की छुट्टी मिलती है, और वह भी अंतिम क्षण तक उसको पता नहीं होता है कि उसे छुट्टी मिलेगी भी कि नहीं!

जो नौकरी करते हैं उनको पता होता है कि अपने अधीनस्थों के मानसिक उत्पीड़न का यह सबसे खतरनाक तरीका है। इसी के चलते कई बार ऐसे मंजर भी देखने को मिले हैं जब यूनिफॉर्म सर्विसेज और यहां तक कि सेना में भी अधीनस्थों द्वारा अपने अधिकारी को गोली मार दी गई या इससे उत्पन्न मानसिक विषाद की अवस्था में अपने कई सहकर्मियों की हत्या कर दी गई।

इसीलिए कहा जाता है कि जो समझदार अधिकारी होते हैं, उनकी एक सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वे कभी भी अपने किसी भी अधीनस्थ की छुट्टी के आवेदन को अस्वीकृत नहीं करते, बल्कि बिना किसी किंतु-परंतु के मंजूर कर देते हैं। भले ही छुट्टी की अवधि ज्यादा हो या अव्यवहारिक लग रही हो, वे मुस्कुराते हुए उसे अपनी स्वीकृति प्रदान करते हैं। परिणामतः बदमाश से बदमाश तथा औसत दर्जे का अधीनस्थ भी इस तरह के अधिकारी को अपना सौ प्रतिशत बेहतर देता है।

अब जहां तक सबसे घटिया अधिकारी की बात है, तो उनकी पहचान ठीक इसके उलट होती है। जिसकी जिंदा मिसाल फिरोजपुर मंडल के डीआरएम हैं। इस तरह के अधिकारी के कारण सभी अधीनस्थ अनिश्चितता और अवसाद के माहौल में हतोत्साहित रहते हैं। फिरोजपुर मंडल इसका ज्वलंत उदाहरण है।

अमित कुमार का केस भी सुशांत सिंह राजपूत जैसा ही है। महज एक दुर्घटना जैसा दिखने वाला हादसा न होकर एक ऐसा माहौल और जानबूझकर बनाई गई परिस्थिति का परिणाम है अमित और सुशांत की मौत, जिसकी परिणति यही होनी थी, यह ऐसी होनी थी कि असल चेहरे धुंध बनकर रह जाएं और लोग पोस्टमार्टम को ही मानकर इसे ही नियति तथा दुर्घटनजन्य मौत मान लें।

डीआरएम/फिरोजपुर ने अमित कुमार की छुट्टी 18 जून को नामंजूर (रिग्रेट) कर दी थी। इस तथ्य को भली-भांति जानने के बावजूद भी कि लॉकडाउन के पहले से अमित अपनी पत्नी और नन्हीं नवजात बच्ची से मिल नहीं पाए हैं, जो अपने घर पर हाजीपुर, बिहार में थी। लॉकडाउन में अमित दिन रात काम पूरा करने में लगे रहे। ज्ञातव्य है कि 24 जून को ही उनकी शादी की दूसरी सालगिरह थी।

बिहार में हाजीपुर, जहां उनका घर था, फिरोजपुर से जाने में दो दिन लगते हैं। अगर वह सोमवार को चलते, तो मंगलवार की रात को घर पहुंचते। मतलब बिहार के अधिकारी को फिरोजपुर से घर जाने के लिए कम से कम चार दिन का ट्रांजिट टाइम लगेगा ही, और इस पर कोई सिर्फ पांच दिन की छुट्टी दे, तो मतलब स्पष्ट है कि सिर्फ एक दिन ही वह परिवार के साथ रह सकता है। लेकिन थकावट और समयाभाव के चलते वह न तो अपनी अन्य कोई जिम्मेदारी निभा सकता है, न ही किसी हित-नात से मिलने जा सकता है। वह भी तब जब वह एक लंबे समय के बाद अपने घर जा रहा हो।

अमित कुमार ने शायद इसी स्थिति को ध्यान में रखते हुए 20 जून से 28 जून तक की छुट्टी का आवेदन किया था। साफ जाहिर है कि उन्होंने इसमें अपनी तरफ से पहले ही काफी कंजूसी बरती थी, जिससे कि वह अगले सप्ताह के पहले कार्य-दिवस पर अपने ऑफिस में उपस्थित हो सकते।

डीआरएम की आंखों में शायद यही बात चुभ गई। उन्हें लगा कि वह ऐय्याशी करने जा रहा है और आगे-पीछे के दोनों शनिवार-रविवार भी इस्तेमाल करेगा। अतः उन्होंने अमित कुमार की छुट्टी रिग्रेट कर दी। यहां उनका रिग्रेट किया हुआ नोट देखा जा सकता है।

इसके बाद कोई भी यह अंदाजा लगा सकता है कि इस दौर में जहां कोरोना की वजह से वैसे ही चौतरफा एक आम मनहूसियत का माहौल छाया हुआ है, महीनों से अपनी नवजात बच्ची और पत्नी से दूर अमित कुमार की मन:स्थिति पर इसका क्या दुष्प्रभाव पड़ा होगा!

इसके बाद अमित कुमार ने डीआरएम की चिरौरी-विनती शुरू की, तब अंत में जाकर उन्हें पांच दिन की छुट्टी भीख में मिली, और वह भी पूरा एहसान जताते हुए दी गई।

बताते हैं कि अमित ने फर्स्ट एसी में अपना रिजर्वेशन भी कराया था, लेकिन छुट्टी ऐसे दी गई थी कि लुधियाना या जालंधर से 22 जून को ट्रेन पकड़ना गलत हो सकता था। तथापि इसी बीच डीआरएम और उनके दास लोगों ने अमित के कान में यह बात भी फूंक दी कि कोरोना के दौर में ट्रेन से सफर करना सेफ नहीं रहेगा!

ऐसे में अमित को सड़क के रास्ते निकलना ही सही लगा, क्योंकि वह हर हाल में अपनी शादी की वर्षगांठ के दिन घर पहुंचकर अपनी पत्नी और बच्ची को सरप्राइज देना चाहते थे और यहीं एक बेचारा होनहार अधिकारी डीआरएम द्वारा रचित “स्पीड डेथ ट्रैप” में फंस गया।

पांच दिन की छुट्टी में सड़क और गाड़ी की स्पीड को ही यह तय करना था कि अमित अपने परिवार के साथ घर पर अधिकतम कितना समय बिता सकता थे। कम छुट्टी में अपनों के लिए अधिक समय निकालने की चाहत ने स्पीड के डेथ ट्रैप में अमित को फंसा दिया।

अगर छुट्टी अमित की जरूरत या मांग के हिसाब से और उनके घर की दूरी को भी ध्यान में रखकर दी गई होती, तो आज एक होनहार अधिकारी हमारे बीच होता और दो घर तथा कई जिंदगियां उजड़ने से बच गई होतीं।

यह रेल प्रशासन के हित में होगा कि रेलवे में ऊपर बैठे लोग इस “सिस्टम प्रायोजित हत्या” से सीख लेते हुए ऐसी गाइडलाइन बनाई की जाएं कि जिसमें अधिकारियों – कर्मचारियों द्वारा साल में अपनी एलएपी और सीएल को अपनी मर्जी के हिसाब से उपभोग किया जा सके। इसके साथ ही इस नियम को आवश्यक (मैनडेटरी) बनाया जाए कि कोई सक्षम अधिकारी सिर्फ अपरिहार्य स्थिति अथवा कारण पर ही इसे रिग्रेट कर सके, न कि आदतन। रिग्रेट भी एक या दो बार से ज्यादा कतई नहीं किया जाना चाहिए।

डीआरएम/फिरोजपुर, जो कि जाने-अनजाने ही सही, अमित कुमार जैसे एक होनहार और परिश्रमी अधिकारी की असामयिक मौत का कारण बने हैं, के पूरे कार्यकाल की गतिविधियों की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए और तदनुसार उनके विरुद्ध कार्रवाई तय की जाए, जिससे अन्य लोगों को एक उचित सबक मिले और सर्वसामान्य कर्मचारियों एवं अधिकारियों का विश्वास व्यवस्था में बहाल हो सके तथा उनके डीआरएम रहते अन्य लोगों के साथ ऐसे किसी हादसे को टाला जा सके।



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शुरू हो गई ‘ई-डास’ ड्राइंग अप्रूवल सिस्टम की उन्नत प्रणाली – RailSamachar

अब सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर के लिए फिजिकली हर संबंधित विभाग के नहीं लगाने पड़ेंगे चक्कर

गोरखपुर ब्यूरो : पूर्वोत्तर रेलवे पर ड्राइंग अनुमोदन की उन्नत प्रणाली ‘ई-डास ऑनलाइन अप्रूवल सिस्टम’ लागू कर दिया गया है। रेलवे में विभिन्न प्रकार के ड्राइंग बनाए जाते हैं, जिनमें पैदल उपरिगामी पुल (एफओबी), इंजीनियरिंग स्केल प्लान (यार्ड प्लान), सिगनल इंडेक्स प्लान, सीमित ऊँचाई के सब-वे, स्टेशन भवन तथा छोटे-बड़े पुल आदि के ड्राइंग शामिल हैं।

इन ड्राइंग्स को बनाते समय छोटी-छोटी बातों का भी उल्लेख करना पड़ता है, जिससे कि कार्य सम्पादन में कोई दुविधा की स्थिति न हो। इसके साथ ही संबंधित विभिन्न विभागों की मांगों को भी समाहित करना होता है। ड्राइंग बनने के बाद सभी संबंधित विभागों के सक्षम अधिकारियों से इस पर हस्ताक्षर प्राप्त करना होता है, जिसमें मंडल एवं मुख्यालय के अधिकारी भी शामिल होते हैं।

पहले किसी भी ड्राइंग पर अनुमोदन प्राप्त करने के लिए विभिन्न स्थानों पर जाना तथा उन विभागों के संशोधन को समाहित करना, एक लम्बी प्रक्रिया थी। इस प्रक्रिया में बहुत ज्यादा समय लगता था तथा कोविड-19 की स्थिति में यह एक दुरूह कार्य हो गया था।

इस समस्या से निजात पाने के लिए पूर्वोत्तर रेलवे पर ड्राइंग अनुमोदन की उन्नत प्रणाली ई-डास को अपनाया गया है, जिसमें ड्राइंग को इलेक्ट्रानिकली संबंधित विभागों को भेजा जाता है। उक्त विभाग का सक्षम अधिकारी इस पर डिजिटल सिग्नेचर के माध्यम से हस्ताक्षर करते हैं।

इस उन्नत प्रणाली की अनेक विशेषताएं हैं। जहाँ एक ओर मैनुअल सिस्टम की अपेक्षा इसमें बहुत कम समय लगता है, वहीं दूसरी तरफ कार्यकुशलता में उल्लेखनीय वृद्धि भी होती है। पारदर्शिता की दृष्टि से भी यह प्रणाली अत्यंत कारगर है।

उल्लेखनीय है कि कोविड-19 के परिप्रेक्ष्य में ई-डास सिस्टम बहुत ही उपयोगी है। मैनुअल सिस्टम में ड्राइंग को विभिन्न विभागों में भेजने से संक्रमण की बहुत ज्यादा सम्भावना उत्पन्न होती। परंतु ई-डास सिस्टम में ऐसी कोई आशंका नही है। विदित हो कि पूर्वोत्तर रेलवे पर ई-ऑफिस की व्यवस्था भी शुरू की जा चुकी है।



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लॉकडाउन के दौरान प्रगति पर हैं महत्वपूर्ण विकास कार्य – RailSamachar

पूरा हुआ भटनी-औंड़िहार रेलखंड पर 125 रूट किमी का विद्युतीकरण

गोरखपुर ब्यूरो : कोविड-19 के चलते लागू देशव्यापी लाॅकडाउन एवं कोरोना संक्रमण के इस कठिन समय का सदुपयोग करत हुए पूर्वोत्तर रेलवे द्वारा कई महत्वपूर्ण विकास के कार्य सम्पादित किए जा रहे है। इसी क्रम में वाराणसी मंडल के भटनी-औंड़िहार रेलखंड पर 125 रूट किमी के विद्युतीकरण का चुनौतीपूर्ण कार्य पूरा करके 18 जून, 2020 को भटनी-किड़िहरापुर के बीच तथा 19 जून, 2020 को औड़िहार-इन्दारा के मध्य इलेक्ट्रिक इंजन ट्रायल सम्पन्न हुआ।

विद्युतीकृत इन दोनों रेलखंडों का शीघ्र ही रेल संरक्षा आयुक्त द्वारा निरीक्षण किया जाएगा। इस खंड के विद्युतीकरण से अब गोरखपुर से वाराणसी के मध्य एक बड़ा हिस्सा अब विद्युतीकृत रेलखंडों से जुड़ जाएगा, जिससे अन्य लाभों के अतिरिक्त गाड़ियों के समय-पालन में भी अपेक्षित सुधार होगा।

ऊर्जा संरक्षण को लेकर रेल प्रशासन अत्यंत सजग है। इसी क्रम में पूर्वोत्तर रेलवे ने पिछले वर्ष 540 रूट किमी. रेलवे ट्रैक के विद्युतीकरण का कार्य पूरा किया था। विगत कुछ वर्षों में पूर्वोत्तर रेलवे पर विद्युतीकरण के कार्य में अच्छी प्रगति हुई है।

वर्ष 2016-17 में 159.20 रूट किमी., 2017-18 में 167.14 रूट किमी. एवं 2018-19 में 431.23 रूट किमी. रेलखंड का विद्युतीकरण कार्य पूरा हुआ था। उल्लेखनीय है कि विद्युतीकरण से जहां पर्यावरण को लाभ पहुंचता है, ध्वनि प्रदूषण से मुक्ति मिलती है, वहीं डीजल पर निर्भरता समाप्त होगी, जिससे ईंधन खर्च में कमी आएगी तथा आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।

इस रेलखंड के अतिरिक्त अन्य खंडों पर भी विद्युतीकरण का कार्य लगभग पूरा कर लिया गया है। लखनऊ मंडल के गोंडा-सुभागपुर खंड (11 रूट किमी.) पर भी 19 जून, 2020 को इलेक्ट्रिक इंजन का ट्रायल सम्पन्न हुआ।

इज्जतनगर मंडल पर कासगंज-बरेली खंड (108 रूट किमी.) के विद्युतीकरण का कार्य भी लगभग पूरा हो गया है। इन खंडों पर शीघ्र ही रेल संरक्षा आयुक्त द्वारा निरीक्षण किया जाएगा। इन तीनों खंडों के विद्युतीकरण के बाद पूर्वोत्तर रेलवे पर कुल 1967 रूट किमी. रेलपथ विद्युतीकृत हो जाएगा।



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देश में भारी आर्थिक संकट के बावजूद जारी हो रहे करोड़ों-अरबों के अनावश्यक टेंडर

महामारी के संकटकाल में रेल अस्पतालों की दुर्दशा, नहीं मिल रहा रेलकर्मियों को उपचार

सुरेश त्रिपाठी

कोरोना महामारी के संकटकाल में रेलवे अस्पतालों और हेल्थ यूनिटों का बुरा हाल है। कोरोना फंड के नाम पर न जाने कितनी धनराशि रेल अस्पतालों को दी गई लेकिन परिणाम क्या निकला! आज स्थिति यह है कि रेल कर्मचारी और उनके परिवार रेल अस्पतालों में जाने से कतरे रहे है।

सामान्य रोगी को भी पहले जिला अस्पताल से कोविड टेस्ट कराने की सलाह रेलवे डॉक्टर दे रहे हैं। कमाल है, जो सामान्य मरीज है, वह क्यों कोरोना का टेस्ट कराए? अस्पताल के डॉक्टर तो ऐसे पीपीई किट पहन रहे हैं, मानो सिर्फ उन्हीं पर कोरोना अटैक करेगा, बाकी जो रेलकर्मी फील्ड और कार्यालयों में काम कर रहे हैं, मानो वे सब अमृत पीकर और कर्ण के कवच-कुंडल पहनकर आए हैं।

अगर ऐसे ही रेलवे अस्पतालों के हालात हैं तो फिर रेल अस्पताल बंद कर देने चाहिए और इस मद के फंड को सही जगह इस्तेमाल किया जाना चाहिए। डॉक्टर यदि अपने चैम्बर में ओपीडी का केस देख भी रहे हैं तो मरीज उनके चैम्बर के बाहर ही खड़ा होकर अपना दुखड़ा रोएगा और वहीं से दवा लिख दी जाएगी.. ऐसी दयनीय हालत हो गई है रेल कर्मचारियों और उनके परिवारों की! लेकिन रीढ़हीन यूनियन पदाधिकारी, अधिकारी और मंत्री सब मौन हैं।

उधर उत्तर रेलवे केंद्रीय अस्पताल (एनआरसीएच) का जो हाल है, वह अब सबको पता है कि वहां लंबे समय से मरीजों की बाहर से जांच कराने में किस कदर कमीशन का खेल चल रहा था और किस तरह अस्पताल प्रमुख को एमडी के पद से निवृत्त करके जनरल प्रैक्टिस में भेजने के पांच दिन बाद पुनः उसी पद पर उनकी नियुक्ति कर दी गई। जाहिर है कि सेटिंग और पहुंच बहुत ऊपर तक रही होगी। एनआरसीएच में कमीशनखोरी का यह खेल कानाफूसी.कॉम रेलसमाचार.कॉम की “उत्तर रेलवे केंद्रीय अस्पताल में जारी कमीशनखोरी का खेल” शीर्षक खबर प्रकाशित होने के बाद रेल प्रशासन यह कमीशनखोरी का खेल रोककर कोविद सहित सभी प्रकार की जांचें अब अस्पताल में ही करना अनिवार्य कर दिया है। 

Also Read: उत्तर रेलवे केंद्रीय अस्पताल में जारी कमीशनखोरी का खेल?

एक तरफ केंद्र सरकार कर्मचारियों की मूल सुविधाओं पर आर्थिक संकट दिखाकर कैंची चला रही है, तो दूसरी तरफ रेलवे और अन्य सरकारी विभागों में बिना वर्तमान परिस्थिति का आकलन किए अरबों-खरबों के टेंडर निकाले जा रहे हैं। सरकार का यह कृत्य विरोधाभासी है!

जब मुद्रा संकट है और देश चौतरफा आर्थिक संकट का सामना कर रहा है, तो अनावश्यक कार्यों को कुछ समय के लिए रोक दिया जाना चाहिए। टेंडर अवार्ड करने की इतनी जल्दी क्यों है? क्या स्टेशनों पर मेकेनाइज्ड क्लीनिंग का काम विभागीय सफाई कर्मचारियों से नहीं कराया जा सकता? वह भी तब जब अगले साल तक भी सामान्य रेल यातायात और ट्रैफिक बहाल होना मुश्किल लग रहा है, तब ऐसे में अनाप-शनाप और अनावश्यक खर्च क्यों किया जाना चाहिए??

यह सब जानते-बूझते होने के बाद भी यदि यही हाल है, तो कहना ही पड़ेगा कि कोरोना कहीं न कहीं अवसर भी लेकर आया है! लेकिन कमजोर विपक्ष के कारण इस चालाकी को कोई उजागर नहीं कर पा रहा है।

प्रयागराज स्टेशन की मेकेनाइज्ड तरीके से साफ-सफाई करने के लिए टेंडर 4 साल की अवधि के लिए अभी हाल ही में निकाला गया है जिसकी कीमत 29 करोड़ रुपया है। इसी हफ्ते कानपुर सेंट्रल के लिए भी लगभग 30 करोड़ रुपये का टेंडर निकलेगा। अब इसे अवसर नहीं तो क्या कहा जाए! इस वक्त इसकी क्या जरूरत थी?

उल्लेखनीय है कि अभी दो साल पहले ही प्रयागराज और कानपुर सेंट्रल दोनों रेलवे स्टेशनों की मेकेनाइज्ड साफ-सफाई के ठेके करीब 15-15 करोड़ में दिए गए थे, अब यह राशि पुनः बढ़कर दोगुनी हो गई है, जबकि दो साल पहले तक साफ-सफाई के यही ठेके ढ़ाई-तीन करोड़ के हुआ करते थे। स्टेशनों की सफाई को लेकर यह स्थिति सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि यही हाल सभी जोनल रेलों में भी हुआ है जिसमें कमीशनखोरी की प्रमुख भूमिका है।

इसके साथ ही उत्तर रेलवे वाराणसी मंडल द्वारा हाल ही में एक ऐसा ही सफाई का टेंडर (एम-सीएनडब्ल्यू-42/2019-20, इशू दि. 30.03.2020, क्लोज्ड दि. 20.05.2020) जारी किया गया है, जिसकी सेवा-शर्तें (टर्म्स एंड कंडीशंस) देखकर ही लगता है कि उक्त टेंडर किसी खास पार्टी को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इस टेंडर की कुल एडवरटाइज्ड वैल्यू ₹64448684.81 है।

क्या रेल प्रशासन को नहीं पता कि सामान्य रेल संचालन और यात्रियों की आवाजाही कम से कम इस साल तो सामान्य होने से रही, फिर किसके लिए रेल राजस्व को लुटाने की तैयारी क्यों की जा रही है?

विभागीय सफाई कर्मचारी अधिकांश अधिकारियों, निरीक्षकों, और सुपरवाइजरों के घरों में काम कर रहे हैं और उनके एवज में रेल प्रशासन साफ-सफाई का ठेका प्राइवेट पार्टी को देने के लिए टेंडर निकाल रहा है। इसी तरह सिग्नल एंड टेलीकम्यूनिकेशन, इंजीनियरिंग आदि विभागों में भी अनावश्यक कार्यों के लिए करोड़ों-अरबों के टेंडर निकाले जा रहे हैं जिनकी कम से कम इस साल तक सामान्यतः कोई विशेष जरूरत नहीं पड़ने वाली है।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान तथाकथित यात्री सुख-सुविधाओं और साफ-सफाई सहित सिविल इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल एवं एसएंडटी के टेंडर्स की लागत जिस तरह अनाप-शनाप बढ़ी है, या जानबूझकर बढ़ाई गई है, उसको देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि भ्रष्टाचार किस सीमा तक पहुंच चुका है और इस लूट का हिस्सा कहां तक पहुंच रहा होगा? जबकि आर्थिक संकट के नाम पर देशवासियों की भावनाओं को उभारकर तथा उनकी मनोदशा को दिग्भ्रमित करके राजनीतिक रोटियां सेंकने का खेल बदस्तूर जारी है।





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सैकड़ों रेलकर्मी हो रहे हैं कोरोना संक्रमित, परंतु रेल प्रशासन को नहीं है उनके मरने-जीने की कोई परवाह!

मुंबई, दिल्ली और चेन्नई, तीनों महानगरों में कार्यरत रेलकर्मियों को है कोरोना संक्रमण का ज्यादा खतरा

सुरेश त्रिपाठी

यह सर्वविदित है कि मुंबई महानगर कोरोना वायरस की महामारी से बुरी तरह जूझ रहा है। दिन प्रति प्रतिदिन इसके मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। फिलहाल निकट भविष्य में इनके नियंत्रण की कोई उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है। तथापि मजबूरीवश राज्य सरकार को सीमित लॉकडाउन के चलते भी कामकाजी गतिविधियां शुरू करनी पड़ रही हैं। इस हेतु अब राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए उसके कहने और टिकट भाड़ा वहन करने पर सोमवार, 15 जून से मध्य एवं पश्चिम रेलवे को सीमित लोकल ट्रेनों की भी शुरुआत करनी पड़ी है।

यह सही है कि किसी महामारी अथवा किन्हीं विपरीत परिस्थितियों के कारण तमाम कामकाजी और व्यावसायिक गतिविधियां लंबे समय तक रोककर नहीं रखी जा सकतीं। तथापि फील्ड में बड़ी संख्या में कार्यरत अपने कर्मचारियों के लिए उनसे बचाव के हरसंभव उपाय अवश्य अपनाए जा सकते हैं, क्योंकि तमाम नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों ने तो अपने बचाव के सभी संभव उपाय कर लिए हैं, यही कारण है कि एकाध अपवाद को छोड़कर इनमें से कोई भी इस महामारी से ज्यादा प्रभावित होता नजर नहीं आया। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं है कि कर्मचारियों के मामले में राज्य सरकार और रेल प्रशासन दोनों प्राधिकारों द्वारा भारी कोताही बरती जा रही है।

Railway workers are waiting for workman special at platform without maintaining any physical distancing

अब जहां तक रेलकर्मियों की बात है, तो ऐसा लगता है जैसे कि उनका कोई माई-बाप ही नहीं रह गया है और उन्हें इस महामारी से निपटने तथा काम करने के लिए भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। भले ही रेलवे द्वारा इस महामारी से मरने और संक्रमित होने वाले रेलकर्मियों का एकीकृत आंकड़ा जारी नहीं किया जा रहा है, परंतु एक अनुमान के अनुसार रेलवे में कार्यरत सैकड़ों कर्मचारियों की मौत हो चुकी है। हर दिन दो-चार-दस की संख्या में ऐसी मौतें होने की खबरें किसी न किसी जोनल रेलवे से आ रही हैं। तथापि जोनो/मंडलों में इन असामयिक मौतों को लेकर कोई चिंता है, ऐसा नहीं लगता!

इस महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित रेलवे का फील्ड स्टाफ हो रहा है, जिनमें टीटीई, लोको पायलट्स, गार्ड्स, ट्रैक मेनटेनर, सिग्नल मेनटेनर, कमर्शियल एवं ट्रैफिक स्टाफ प्रमुख रूप से शामिल है। इसके अलावा ऑफिस स्टाफ भी इसलिए प्रभावित हो रहा है, क्योंकि वहां भी काम करते हुए फिजिकल डिस्टेंसिंग नियमों का पर्याप्त रूप से पालन करना संभव नहीं हो पा रहा है, क्योंकि निर्देशित 20% स्टाफ के बजाय लगभग पूरे ऑफिस स्टाफ को जबरन ड्यूटी पर बुलाया जा रहा है। इस सब के लिए अधिकारियों की प्रशासनिक एवं अनुशासनिक दादागीरी और मनमानी भी जिम्मेदार है।

उदाहरण स्वरुप पश्चिम रेलवे के वसई स्टेशन पर पिछले हफ्ते चार रेलकर्मियों को कोरोना संक्रमित पाया गया था। इसके लिए उन्हें इलाज हेतु भेजने के बाद पता चला कि उन चारों के संपर्क में करीब 45-46 जो अन्य रेलकर्मी भी आए थे, उन्हें नियमानुसार 14 दिन के लिए होम कोरेंटीन की एडवाइस की गई थी और पूरा वसई स्टेशन बंद कर दिया गया था। परंतु अभी उनका यह निर्धारित पीरियड पूरा भी नहीं हुआ था कि राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए सोमवार, 15 जून से लोकल शुरू होते ही उन सभी को फौरन ड्यूटी पर पहुंचने का आदेश मुंबई सेंट्रल मंडल के संबंधित वाणिज्य अधिकारी द्वारा दनदना दिया गया।

इसी तरह पश्चिम रेलवे के ही सूरत रेलवे स्टेशन पर एक चीफ टिकट इंस्पेक्टर (सीटीआई) के 2 जून को कोरोना पॉजिटिव, जिसकी जांच रिपोर्ट 12 जून को मिली, पाए जाने के बाद वहां के 21-22 स्टाफ को होम कोरेंटीन किया गया था। इनमें दो एडीआरएम और एक डीसीएम जैसे बड़े अधिकारी भी शामिल थे। यह सभी लोग उक्त सीटीआई के संपर्क में आए थे। इसी प्रकार उधना रेलवे स्टेशन पर भी एक बुकिंग क्लर्क को पॉजिटिव पाए जाने पर वहां के स्टेशन स्टाफ को भी आइसोलेट किया गया।

वसई और सूरत के मामलों में मंडल अधिकारियों द्वारा बरती गई लापरवाही तथा मनमानी का विरोध दोनों यूनियनों (डब्ल्यूआरएमएस/डब्ल्यूआरईयू) के मंडल एवं मुख्यालय पदाधिकारियों द्वारा किया गया है, परंतु उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई, क्योंकि किसी की भी नहीं सुनने का जैसा रवैया केंद्र सरकार ने अपना रखा है, वैसा ही रवैया केंद्र सरकार के अधिकारियों ने भी लंबे समय से अपनाया हुआ है। नतीजा यह है कि कोई भी कितना ही चिल्लाता रहे, किसी की कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

इसके अलावा दक्षिण रेलवे, उत्तर रेलवे की स्थिति भी काफी डरावनी है। पिछले हफ्ते दक्षिण रेलवे के पेरंबूर, चेन्नई स्थित प्रमुख रेलवे अस्पताल में एक साथ बीस रेलकर्मियों की मौत की खबर स्थानीय अंग्रेजी दैनिक में प्रकाशित हुई थी। इसी तरह उत्तर रेलवे मुख्यालय बड़ौदा हाउस और भारतीय रेल के मुख्यालय “रेल भवन” में भी कई अधिकारी और कर्मचारी इस महामारी से प्रभावित हो चुके हैं। उत्तर रेलवे के सेंट्रल हॉस्पिटल की दुर्गति, कोविद केसेस की जांचों में कमीशनखोरी और एमडी को जनरल प्रैक्टिस में भेजे जाने के बाद पुनः उसी पद पर उनकी पुनर्नियुक्ति में रेल प्रशासन की पूरी मनमानी भी सामने आ चुकी है।

अन्य जोनल रेलों में भी उपरोक्त से स्थिति अलग नहीं है। मगर मुंबई, दिल्ली और चेन्नई में जो हालत चल रही है, उसको देखते हुए इन तीनों महानगरों में कार्यरत अधिकांश रेलकर्मियों को संक्रमण का खतरा ज्यादा है। अतः यदि सेफ और सिक्योर वर्किंग सुनिश्चित करनी है, तो रेल प्रशासन को अपने कर्मचारियों के लिए इस महामारी से बचाव के पर्याप्त इंतजाम करने के साथ ही केंद्रीय गृहमंत्रालय द्वारा जारी की गई नियमावली का अक्षरशः पालन करवाना भी सुनिश्चित करना होगा।

Chief Typist of SrDOM/G office, Mumbai Division, Central Railway, B. R. Damse expired on Monday, 15th June morning at Kalyan Railway hospital. He was admitted in Kalyan Railway Hospital on Sunday, 14th June of breathlessness. As per Doctors of Kalyan Railway Hospital, a case of suspected Covid. As per sources, he last attended office on 5/6/2020. Entire SrDOM office is being fully sanitised on Monday. The Office was Last sanitised on 12/6/2020.

“It is come to know that a vacant building, behind building no.8 is handed over to BMC for covid-19 patients, if it is true we all have to protest against it, to save containment of our Mazgaon Railway colony”, this message viral on social media on Saturday-Sunday in between employee and officers who resides at Mazgoan Railway colony.








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रेलयात्री, रेलवे का ग्राहक है, ग्राहक को भगवान का दर्जा प्राप्त है, उसका यथोचित सम्मान करें -महात्मा गांधी

“आपकी यात्रा सुरक्षित और सुखद हो” संदेश के साथ कानपुर सेंट्रल स्टेशन से हो रही यात्रियों की विदाई

Welcome initiative by DyCTM Kanpur to Passengers

कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन से नई दिल्ली को जाने वाली गाड़ी संख्या 02451 श्रमशक्ति विशेष सुपरफास्ट ट्रेन के यात्रियों को “आपकी यात्रा सुरक्षित एवं सुखद हो” का संदेश देते हुए गाड़ी के प्लेटफॉर्म को छोड़ते हुए प्रतिदिन इसी तरह गर्मजोशी के साथ वाणिज्य विभाग और रेल सुरक्षा बल के कर्मचारियों द्वारा यात्रियों को विदा किया जा रहा है।

कोविड-19 के मद्देनजर यात्रियों को भयमुक्त और सुरक्षित यात्रा का संदेश देने की इस अनोखी पहल का विचार हिमांशु शेखर उपाध्याय, उप मुख्य यातायात प्रबंधक, उ.म.रे, कानपुर का है, जिसे साकार करने के लिए वह स्वयं गाड़ी जाने समय स्टेशन पर मौजूद रहते हैं।

डिप्टी सीटीएम/कानपुर की इस अनोखी पहल की सराहना रेल मंत्रालय, मंडल रेल प्रबंधक, प्रयागराज और सबसे अहम यात्रियों द्वारा भी की गई है।

कोरोना महामारी के संकट काल में श्री उपाध्याय की भूमिका कानपुर क्षेत्र के रेलकर्मियों में अभिभावक की तरह रही है और लगभग सभी लोगों के स्वास्थ्य, राशन सामग्री की उपलब्धता इत्यादि को स्वयं के स्तर से पूर्ण करने का उनका प्रयास अभी भी लगातार जारी है। इसके अलावा स्थानीय सिविल प्रशासन से भी उनका समन्वय काफी बेहतर है, जिससे रेल प्रशासन और सिविल प्रशासन के बीच सहयोग बना हुआ है और काम करना आसान हो रहा है।

रेलयात्री, रेलवे का ग्राहक है, ग्राहक भगवान होता है, उसका यथोचित सम्मान किया जाए!

प्रबंधन को कुछ नया सृजन करते रहना चाहिए, मातहतों को नए-नए विचार देते रहना चाहिए। इससे उनका उत्साह और मनोबल दोनों बना रहता है। प्रबंधन का मान्य फंडा तो यही है कि “मातहतों के सीधे संपर्क में रहकर, उनकी कामकाज संबंधी समस्याओं को सरल कर, सुलझाकर, उनके दुख-सुख में शामिल होकर और उनके साथ ही स्थानीय सिविल प्रशासन से भी सार्थक समन्वय स्थापित करके जितना बेहतर आउटपुट हासिल किया जा सकता है, उतना डंडा चलाकर अथवा सिर्फ आदेश देकर कभी नहीं किया जा सकता।”

डिप्टी सीटीएम/कानपुर हिमांशु शेखर उपाध्याय न सिर्फ यही कर रहे हैं, बल्कि उनका विचार कहीं न कहीं गांधी जी के विचार से भी प्रेरित है, जो कि आज भी कई रेलवे स्टेशनों पर लगा देखा जा सकता है। परंतु भारतीय रेल में इसका उल्टा होते देखा जा रहा है। कहते हैं कि जिस चीज की अधिकता होती है, उसकी कद्र कम हो जाती है। भारतीय रेल में यात्रियों के साथ यही तो हो रहा है, क्योंकि रेलवे को वह इफरात में उपलब्ध हैं। रेलवे को निजी बस चालकों की तरह उन्हें ढ़ूंढ़ने, चौराहे पर आवाज लगाने नहीं जाना पड़ता। माल ढुलाई के मामले में इसी सोच ने रेलवे का भारी नुकसान किया।

दूसरी तरफ रेलवे में नरपतसिंह जैसे कुछ खुंदकी भी हैं, जो सिर्फ अपने अहं की संतुष्टि के लिए न सिर्फ मातहतों का उत्पीड़न करने में आत्मिक संतोष पाते हैं, बल्कि पद के घमंड में उन्हें अपनी हैसियत का भी विस्मरण हो जाता है। ऐसे बहुत नाम हमारे संज्ञान में हैं, पर फिलहाल यह एक ही पर्याप्त है। वैसे अनुभव में तो यही आया है कि कुछ अपवादों को छोड़कर कमोबेश सभी लूटने की अपनी-अपनी जुगाड़ में रहते हैं। इसमें नीचे से ऊपर तक सभी शामिल हैं। यदि यह कहा जाए कि बाड़ ही खेत खा रही है, तो रेलवे के मामले में शायद यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। तथापि हिमांशु शेखर उपाध्याय जैसे कुछ लोग अभी भी उम्मीद बनाए हुए हैं, जिससे वास्तव में यह व्यवस्था चल पा रही है।








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अति आवश्यक होने पर ही यात्रा करें! – RailSamachar

भारतीय रेल द्वारा देश भर में प्रतिदिन कई श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही हैं, ताकि श्रमिकों की अपने घरों तक पहुंच सुनिश्चित की जा सके। यह देखा जा रहा है कि कुछ ऐसे लोग भी श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में यात्रा कर रहे हैं, जो पहले से ही ऐसी बीमारियों से पीड़ित हैं जिनसे कोविड-19 महामारी के दौरान उनके स्वास्थ्य को खतरा बढ़ जाता है। यात्रा के दौरान पूर्वग्रसित बीमारियों से लोगों की मृत्यु होने के कुछ दुर्भाग्यपूर्ण मामले भी सामने आए हैं।

ऐसे पूर्व बीमारीग्रस्त लोगों की सुरक्षा हेतु रेल मंत्रालय, केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश क्र. 40-3/2020-DM -l(A) दि.17.05.2020 के तहत, अपील करता है कि पूर्व बीमारीग्रस्त (जैसे उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, कर्करोग, कम प्रतिरक्षा) वाले व्यक्ति, गर्भवती महिलाएं, 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चे एवं 65 वर्ष से ऊपर के बुजुर्ग अपने स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए, जब तक अत्यंत आवश्यक न हो, रेल यात्रा करने से बचें।

रेल मंत्रालय ने इस अपील में यह भी कहा है कि “हम समझ सकते हैं कि देश के कई नागरिक इस समय यात्रा करना चाहते हैं एवं उनको निर्बाध रूप से रेल सेवा मिलती रहे, इस हेतु भारतीय रेल और इसके सभी कर्मी चौबीसों घंटे, सातों दिन कार्य कर रहे हैं। परंतु यात्रियों की सुरक्षा हमारी सबसे पहली प्राथमिकता है।”

“इसके लिए सभी नागरिकों का यथोचित सहयोग अपेक्षित है। किसी भी कठिनाई या आकस्मिक समस्या होने पर नजदीकी रेलकर्मी से संपर्क करने में हिचकिचाएं नहीं। भारतीय रेल आपकी सेवा में हमेशा की तरह तत्पर है।”

(हेल्प लाइन नंबर – 139 & 138)








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सिर्फ कन्फर्म्ड आरक्षित टिकटधारी यात्रियों को ही स्टेशनों में प्रवेश और ट्रेनों में यात्रा की अनुमति – RailSamachar

रेल प्रशासन द्वारा रेलयात्रियों की सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित करने के लिए ट्रेनों और स्टेशनों पर पर्याप्त व्यवस्था की गई है। यात्रियों की भीड़ और आने-जाने वाले यात्रियों को अलग रखने के लिए सभी स्टेशनों पर अलग-अलग प्रवेश और निकास के साथ सीमांकन, साइनेज आदि का प्रावधान किया गया है।

प्लेटफॉर्म, कॉनकोर्स और अन्य यात्री क्षेत्रों को लगातार साफ और सेनेटाइज किया जा रहा है। शारीरिक दूरी के लिए फर्श पर निशान, बैरिकेडिंग आदि की व्यवस्था की गई है। स्वचालित सेनेटाइजर डिस्पेंसर आदि को स्पर्श बिंदुओं को कम करने के लिए स्टेशनों पर प्रदान किया गया है। सभी स्टेशनों पर यात्रियों की थर्मल स्क्रीनिंग की व्यवस्था की गई है।

ट्रेनों और स्टेशनों पर सिर्फ कन्फर्म्ड आरक्षित टिकटधारी यात्रियों को ही प्रवेश की अनुमति दी जा रही है। प्लेटफार्म के प्रवेश द्वार पर स्वचालित थर्मल स्कैनिंग मशीन लगाई गई है, जिससे यात्रियों का तापमान लिया जाएगा। इसके पश्चात हाथों को साफ (सेनेटाइज) करने के लिए भी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें बिना छुए ही हाथों को सेनेटाइज किया जा सकेगा।

सभी प्लेटफार्मों पर कैटरिंग स्टालों को खोले जाने हेतु निर्देशित कर दिया गया है जिससे यात्रियों को पैक्ड फूड आइटम एवं पानी की आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है। रेल प्रशासन ने यात्रियों से अनुरोध किया है कि कम से कम सामान लेकर यात्रा करें और साथ में खानापान की पर्याप्त सामग्री लेकर चलें।

सभी स्टेशनों पर जनउदघोषणा प्रणाली एवं अन्य माध्यमों से ट्रेनों के आने-जाने की जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है। रेल प्रशासन ने निर्देशित किया कि यात्रियों को सभी प्रकार की समुचित सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। प्रशासन ने यात्रियों से अनुरोध किया है कि यात्रा हेतु वही यात्री स्टेशन आएं जिनके पास कन्फर्म्ड आरक्षित टिकट हो। प्रतीक्षा सूची वाले टिकट पर यात्रा की अनुमति नहीं है।

कोरोनावायरस (कोविड-19) के संक्रमण को फैलने से रोकने हेतु यात्रा प्रारंभ करने से पहले यात्रीगण कृपया निम्नलिखित आवश्यक अनुदेशों का पालन सुनिश्चित करें :-

1. बिना कन्फर्म्ड आरक्षित टिकट के स्टेशन पर प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा रही है।

2. सभी यात्रियों को फेस मास्क पहनना आवश्यक है।

3. सभी यात्री, गाड़ी के प्रस्थान समय से डेढ़ से दो घंटे पहले स्टेशन पर पहुंचना सुनिश्चित करें।

4. सभी यात्रियों के मोबाइल में आरोग्य सेतु ऐप डाउनलोड करना अनिवार्य होगा।

5. टिकटधारक यात्री के अतिरिक्त अन्य किसी व्यक्ति को प्लेटफार्म पर प्रवेश की अनुमति नहीं है।

6. ट्रेन में यात्रा करने वाले सभी यात्री अपने साथ भोजन सामग्री, पानी, चादर, तकिया, कम्बल स्वयं लेकर आएं। यद्यपि स्टेशनों पर कैटरिंग स्टाल खुले रहेंगे, जिससे पानी की बोतल एवं पैक्ड खाद्य पदार्थ खरीदने की सुविधा उपलब्ध रहेगी।








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